अग्नि पुराण — पृष्ठ 871–880

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 871–880

पृष्ठ 871

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एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः यूषैः पुराणगोधूमयवशाल्यन्नमभ्यसेत् । रक्तषष्टिकगोधूमयवमुद्गादिकं लघु । वातशोणितनाशाय तोयं शस्तं सितं मधु । भृङ्गराजरसे सिद्धं तैलं धात्रीरसेऽपि वा । शीततोयान्नपानं च तिलानां विप्र भक्षणम् । गण्डूषं तिलतैलेन द्विजदादर्द्धकरं परम् । धात्रीफलान्यथाऽऽज्यं च शिरोलेपनमुत्तमम् । तैलं वा बस्तमूत्रं च कर्णपूरणमुत्तमम् । गिरिमृच्चन्दनं लाक्षा मालतीकलिका तथा । व्योषं त्रिफलया युक्तं तुत्थकं च तथा जलम् । आज्यभृष्टं शिलापिष्टं लोध्रकाञ्जिकसैन्धवैः । ८६७ विसर्पी ससिताक्षौद्रमृद्वीकादाडिमोदकम् ॥३७ ॥

' काकमाची च वेत्राग्रं वास्तुकं च सुवर्चला ॥ ३८ ॥

नासारोगेषु च हितं घृतं दूर्वाप्रसाधितम् ॥ ३ ९ ॥ नस्यं सर्वामयेष्विष्टं मूर्धजन्तूद्भवेषु च ॥४० ॥

द्विजदादर्द्धकरं प्रोक्तं तथा तुष्टिकरं परम् ॥४१ ॥

विडङ्गचूर्णं गोमूत्रं सर्वत्र कृमिनाशने ॥४२ ॥

शिरोरोगविनाशाय स्निग्धमुष्णं च भोजनम् ॥४३ ॥

कर्णशूलविनाशाय सर्वशुक्तानि वा द्विज ॥ ४४ ॥

संयोज्य या कृता वर्तिः क्षतश्वित्रहरी तु सा ॥ ४५ ॥

सर्वाक्षिरोगशमनं तथा चैव रसाञ्जनम् ॥४६ । ' आश्च्योतनविनाशाय सर्वनेत्रामये हितम् ॥४७ ॥

मूँग, अरहर और मसूर की दाल में सेंधानमक, घृत, सोंठ, मुनक्का, आमला और बेर को डालकर भोजन करे या सेंधानमक से लेकर ये सब चीजें तथा तिल, जंगली पशु - पक्षियों के मांस रस में डालकर आहार भोजन करे ॥३६-३७ ॥ वात रक्त को नाश करने के लिए मिश्री, मधु, मुनक्का, अनार को जल में घोलकर पिये । लाल चावल, साठी का चावल, गेहूँ और जव की रोटी भोजन करे, मूँग की दाल दे, जो भी लघु आहार हो उसे दे । मकोय, बेंत के अग्रभाग के पत्ते, बथुआ और हुरहुर के पत्ते का साग दे । जल में मधु - मिश्री मिलाकर दे । नासा रोग में दूर्वादि घृत का नस्य ले ॥३८-३९ ॥ भँगरैया के रस में अथवा आँवले के रस में पकाया हुआ तैल सम्पूर्ण मस्तिष्क के रोगों में तथा कृमिजन्य रोगों में लाभकारी होता है । ठण्डे जल के पीने से, ठण्डे ही अन्न पान करने से एवं तिलों के विशेष भक्षण से दाँत दृढ़ हो जाते हैं एवं सन्तुष्टि अधिक मिलती है । तिल के तैल का गंडूष ( कुल्ला ) लेने से दाँत अत्यन्त दृढ़ हो जाते हैं । जहाँ कृमि नाश करना हो वहाँ विडङ्ग चूर्ण तथा गोमूत्र का प्रयोग खाने - पीने के लिए तथा लेप के लिए भी प्रयोग करना चाहिए ॥४०-४२ ॥ शिरोरोग के विनाश के लिए स्निग्ध एवं उष्ण भोजन करे । सिर पर आँवला का लेप अथवा घृत का लेप उत्तम होता है । कर्णशूल में तैल या बकरे का मूत्र कान में डाले अथवा शुक्त ( सिरका ) कान में डाले । श्वित्र ( सफेद कोढ़ ) को दूर करने के लिए गेरू, लाल चन्दन, लाही और मालती के पुष्प की कली इन सबको पीसकर बत्ती बना ले उसे समय पर घिसकर लगाने से सम्पूर्ण श्वित्र नष्ट हो जाते हैं ॥४३-४५ ॥ व्योष ( सोंठ, मिर्च और पीपरि ), त्रिफला ( आँवला, हरड़ और बहेड़ा ), तूतिया और रसांजन को जल से बारीक पीसकर आँख में अंजन लगाने से नेत्र के सम्पूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं । लोध को घी में भूनकर कांजी और सेंधा-नमक के साथ पीसकर आँख में लगाने से नेत्र के सभी रोग दूर हो जाते हैं । गेरू तथा चन्दन को घिसकर नेत्र के १ छ. काकमारी । २ क. ङ. च शुक्लानि Sanskrit Academy । ३ छ., ' Janamu तशुक्रह. Digitized ) ४ क by आमवात S3 Foundation वि. ॥ USA

पृष्ठ 872

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८६८ अग्निपुराणम् गिरिमृच्चन्दनैर्लेपो बहिर्नेत्रस्य शस्यते । रात्रौ तु मधुसर्पिर्भ्यां दीर्घमायुर्जिजीविषुः । ' कलविङ्कानि माषाश्च वृष्यौ क्षीरघृतौ तथा । मधुकादिरसोपेता बलीपलितनाशिनी । कव्यं बुद्धिप्रदं चैव तथा सर्वार्थसाधनम् । रास्नासहचरैर्वाऽपि तैलं वातविकारिणाम् । सक्तुपिण्डी तथैवाऽऽम्ला पाचनाय प्रशस्यते । तथा सूच्युपचारश्च बलिकर्म विशेषतः भक्षणं निम्बपत्राणां सर्पदष्टस्य भेषजम् धूपो वृश्चिकदष्टस्य शिखिपत्रघृतेन वा नेत्रामयविघातार्थं त्रिफलां शीलयेत्सदा ॥ ४८ ॥

शतावरीरसे सिद्धौ वृष्यौ क्षीरघृतौ स्मृतौ ॥४९ ॥

आयुष्या त्रिफला ज्ञेया पूर्ववन्मधुकान्विता ॥५० ॥

वचासिद्धघृतं विप्र भूतदोषविनाशनम् ॥ ॥५१ ५१ ॥ ॥ बलाकल्ककषायेण सिद्धमभ्यञ्जने हितम् ॥५२ ॥

अनभिष्यन्दि यच्चान्नं तद्व्रणेषु प्रशस्यते ॥५३ ॥

पक्वस्य च तथा भेदे निम्बचूर्णं च रोपणे ॥ ५४ ॥

। सूतिका च तथा रक्षा प्राणिनां तु सदा हिता ॥ ५५ ॥

। तालनिम्बदलं केश्यं जीर्णं तैलं यवा घृतम् ॥५६ ॥

। अर्कक्षीरेण संपिष्टं लेपो बीजं पलाशजम् ॥५७ ॥

ऊपर लेप करने से नेत्र रोग में अधिक लाभ होता है । तथा निरन्तर त्रिफला के सेवन से नेत्र रोग दूर हो जाता है ॥४६-४८ ॥ जीने की इच्छा रखनेवाला व्यक्ति रात्रि में मधु और घृत को ( असमान मात्रा में ) खावे तो आयु लम्बी हो जाती है । इसी तरह शतावरी के रस में घृत या दुग्ध पकाकर पीने से वह दुग्ध घृत वृष्य हो जाता है ( मैथुन की शक्ति बढ़ जाती है ) । केवाँच का बीज, उड़द, दूध और घृत वृष्य कहे जाते हैं । मुलहठी मिलाकर त्रिफला का निरन्तर सेवन पूर्व के कहे की भाँति आयुवर्धक है । मुलहठी के रस के साथ त्रिफला का सेवन करने से चमड़े पर झुर्रियाँ और बाल का सफेद होना दूर हो जाता है । वच ओषधि से घृत पकाकर सेवन करने से विशेष तथा अनेक दोषों का नाश हो जाता है । घृत बुद्धिप्रद है और अनेक अर्थों का साधक है । बला के कल्क और काढ़े से सिद्ध घृत आँख में अभ्यंजन के लिए हितकारी है ॥४९ -५२ ॥ रास्ना और कटसरैया द्वारा सिद्ध किया हुआ तेल सम्पूर्ण वात - व्याधियों को दूर करनेवाला है । जो अन्न कब्जियत लानेवाला न हो उसे फोड़ेवाले रोगी को देना चाहिए । व्रण फोड़ा को पकाने के लिए सत्तू का पिण्ड जो कांजी से सानकर बना हो वह हितकर है । पके हुए फोड़े के भेदन के लिए और घाव को भरने के लिए नीम का चूर्ण ( नीम के वल्कल का चूर्ण ) हितकारी है ॥५३-५४ ॥ उसी तरह सुई के द्वारा उपचार करे ( सूची बेध करे ) विशेष रूप में ( बलिकर्म का अर्थ है कि भोजन का ) कुछ भाग देवों तथा पितरों आदि के नाम पर निकालकर बाहर रख दे जिसे कौए, कुत्ते आदि खा जाते हैं । इसी प्रकार सूतिका स्त्री ( बच्चा पैदा होने के एक मास तक के प्रायः बच्चों की माँ को सूतिका कहते हैं ) की भी जीवाणुओं से सदा रक्षा करनी चाहिए । यह रक्षा हितकारी होती है ॥५५ ॥ नीम के पत्तों का चबाना साँप काटे की दवा है । बाल को काला

करने के लिए, झड़ने से बचाने के लिए नीम के पत्तों को एक में महीन पीसकर लेप करे । इसी तरह पुराना तेल और घृत तथा जवा भी केश के लिए हितकारी है । बिच्छू के काटने पर मयूरपत्री और घृत का धूप देना चाहिए तथा मदार के दूध से पलाश का बीज पीसकर लेप करे ॥५६-५७ ॥ और जिसे बिच्छू ने काटा है, विष चढ़ गया १ छ. ' लम्बिकानि । २. छु लोपा ।! ademy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 873

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अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः वृश्चिकार्तस्य कृष्णा वा शिवा च फलसंयुता पानाज्जयति दुर्वारं श्वविषं शीघ्रमेव च सर्पकीटविषाण्याशु जयत्यतिबलान्यपि निर्गुण्डी सारिवा सेलुलूंताविषहरोऽगदः सेलुलूताविषहरोऽगदः स्नेहपाने तथा बस्तौ तैलं घृतमनुत्तमम् त्रिवृद्धि रेचने श्रेष्ठा वमने मदनं तथा वातपित्तबलाशानां क्रमेण परमौषधम् इत्यादिमहापुराण आग्नेये सिद्धौषधकथनं ८६ ९ । अर्कक्षीरं तिलं तैलं पललं च गुडं समम् ॥ ५८ ॥

। पीत्वा मूलं त्रिवृत्तुल्यं तण्डुलीयस्य सर्पिषा ॥५९ ॥

। चन्दनं पद्मकं कुष्ठं ' लताम्बूशीरपाटलाः ॥६० ॥

॥ शिरोविरेचनं शिरोविरेचनं शस्तं गुडनागरकं द्विज ॥ ६१ ॥

। स्वेदनीयः परो वह्निः शीताम्भःस्तम्भनं परम् ॥६२ ॥

। बस्तिर्विरेको वमनं तैलं सर्पिस्तथा मधु ॥ ॥६३ ॥

नामैकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७ ९ ॥ अथाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः सर्वरोगहराण्यौषधानि धन्वन्तरिरुवाच शारीरमानसागन्तुसहजा व्याध मताः । शारीराज्वरकुष्ठाद्याः क्रोधाद्या मानसा मताः ॥१ ॥

है, उसे पीपरि या हरडामैनफल के साथ चूर्ण बनाकर पानी के साथ पीने को दे । जिसे विषैले कुत्ते ने काट लिया है उसे मदार का दूध, तिल का तेल, मांस का रस एवं गुड़ सबको बराबर मिलाकर पीने को देने से कुत्ते, सियार आदि कुत्ते के जातिवाले जानवरों का विष दूर हो जाता है । निसोथ और चौराई की जड़ पीसकर घृत के साथ पीने को देने से दुर्निवार सर्प एवं बिच्छू आदि के विष नष्ट हो जाते हैं ॥५८-५९ ३ ॥ चन्दन, पद्माख, कूठ, लता, सुगन्धवाला, खश, पाढ़ा, मेउड़ी ( निर्गुण्डी ), अनन्तमूल और एलुआ ( घी कुमार की मज्जा ) ये सब ओषधि मकड़ी के विष की दवा हैं । गुड़ एवं शुंठी को मिलाकर नस्य देना सिर का रेचक है ( अर्थात् सिर में स्थित कफ, पित्त को बाहर निकाल देता है ) स्नेहपान कराने के लिए तथा वस्ति में प्रयोग करने के लिए घृत तथा तेल उत्तम है । स्वेदन के लिए अग्नि उत्तम है तथा स्तम्भन के लिए जल उत्तम है ॥६०-६२ ॥ निसोथ विरेचन ( दस्त लाने की दवा ) के लिए और मैनफर वमन के लिए श्रेयस्कर है । वायु शमन के लिए वस्ति, पित्त शमन के लिए विरेचन और श्लेष्मा शमन के लिए वमन हितकारी है । इसी तरह वायु शान्त करने के लिए तेल, पित्त शान्त करने के लिए घृत और श्लेष्मा शान्त करने के लिए मधु सर्वोत्तम ओषधि है ॥६३ ॥

श्री अग्निमहापुराण में सिद्धौषध कथन नामक दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय समाप्त ॥२७९ ॥

अध्याय २८० सर्वरोगहरौषध धन्वन्तरि बोले- शारीरिक, मानसिक, आगन्तुक तथा सहज व्याधियाँ होती हैं । ज्वर, कुष्ठ आदि शारीरिक १ च. ' ताश्चोशी । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 874

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८७० अग्निपुराणम् आगन्तवो विधातोत्थाः सहजाः क्षुज्जरादयः । लवणं सहिरण्यं च ' विप्रायाऽऽर्घ्यं समर्पयेत् । तैलं शनैश्चरे दद्यादाश्विने गोरसान्नदः । गायत्र्या ' हावयेद्वह्रौ दूर्वां त्रिमधुराप्लुताम् । मानसानां रुजादीनां विष्णोः स्तोत्रं हरं भवेत् । भुक्तं पक्वाशयादन्नं द्विधा याति च ' सुश्रुत । किट्टभागो मलस्तत्र विण्मूत्रस्वेदरूपवान् ' । रसभागाद्रसस्तत्र समाच्छोणिततां व्रजेत् । अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्रं शुक्राद्रागस्तथौजसः । ज्ञात्वा चिकित्सितं कुर्याद्भेषजस्य तथा बलम् । हरिगोद्विजचन्द्रार्कसुरादीन्प्रतिपूज्य च ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कानिलानलाः शारीरागन्तुनाशाय सूर्यवारे घृतं गुडम् ॥२ ॥

चन्द्रे चाभ्यङ्गदो विप्रे सर्वरोगैः प्रमुच्यते ॥३ ॥

घृतेन पयसा लिङ्गं संस्नाप्य ' स्यानुगुज्झितः ॥ ४ ॥

यस्मिन्भे व्याधिमाप्नोति तस्मिन्स्थाने बलिः शुभे ॥५ ॥

वातपित्तकफा दोषा धातवश्च तथा शृणु ॥ । ६ ॥ अंशेनैकेन किट्टत्वं रसतां चापरेण च ॥७ ॥

नासामलः कर्णमलस्तथा देहमलः स्मृतः ॥८ ॥

मांसं रक्तात्ततो मेदो मेदसोऽस्थनश्च संभवः ॥ ९ ॥

देशमार्तिं बलं शक्तिं कालं प्रकृतिमेव च ॥ १० ॥

तिथिं रिक्तां त्यजेद्भौमं मन्दभं दारुणोग्रकम् ॥११ ॥

। शृणु मंत्रमिमं विद्वन्भेषजारम्भमाचरेत् ॥१२ ॥

। ऋषयश्चौषधिग्रामा भूतसंघाश्च पान्तु ते ॥ १३ ॥

और क्रोध आदि मानस व्याधि कही जाती हैं । चोट, प्रहार या अन्य किसी प्रकार के बाह्य अभिघात के कारण जो व्याधि होती है उसे आगन्तुक व्याधि कहते हैं । भूख, जरा ( बुढ़ापा ) आदि व्याधियाँ स्वाभाविक व्याधि कही जाती हैं॥१-१३ ॥ शारीर एवं आगन्तुक व्याधियों के नाश के लिए रविवार के दिन घृत, गुड़, नमक और सोना ( सुवर्ण ) को ब्राह्मण की पूजा करके उसे दान दे । सोमवार को शरीर पर मालिश करने की वस्तु तैल उबटन आदि दे । शनैश्चर को तिल का दान करे । कुआर महीने में दूध, दधि और अन्न का दान दे । शिवलिंग की स्थापना करके घृत एवं दुग्ध से स्नान कराये तो रोग से मुक्त हो जाय ॥२-४ ॥ अग्नि में गायत्री मन्त्र से घृत, मधु और गुड़ को दूर्वा में मिलाकर उसी से हवन करे । जिस नक्षत्र में व्याधि उत्पन्न हुई है उस नक्षत्र में शुभ स्थान पर बलि चढ़ावे । मानस रोगों को विष्णु सहस्र नाम के पाठ से दूर करना चाहिए । वायु, पित्त, कफ और धातुओं का वर्णन सुनो - हे सुश्रुत! भुक्त ( खाया हुआ ) अन्न आमाशय ( पेट ) से नीचे जाता है तो उसके दो भाग हो जाते हैं । एक भाग से रस और किट्ट बनता है और दूसरे भाग से रस बनता है ॥५-७ ॥ जो किट्ट भाग बनता है वही मल टट्टी, मूत्र और पसीना है तथा नासिका, कान एवं देहमल भी मल ही है । रस भाग से रस, रक्त से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा, मज्जा से वीर्य, वीर्य से ओज का राग ( प्रेम ) होता है ॥८ - ९ ॥ रोग, देश, काल एवं रोगी के बल, उसकी प्रकृति और उसकी शक्ति का ज्ञान करके और ओषधि के बल का ज्ञान करके चिकित्सा करे । रिक्ता तिथि मंगलवार मंद संज्ञक नक्षत्र, दारुण और उग्र नक्षत्र को त्यागकर अन्य तिथि, वार और नक्षत्र में चिकित्सा करे । विष्णु, गौ, ब्राह्मण, चन्द्र, सूर्य तथा देवताओं का पूजन करके और इस मन्त्र को पढ़कर चिकित्सा प्रारम्भ करे ॥१०-१२ ॥ ब्रह्मा, दक्ष प्रजापति, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, वायु, अग्नि, ऋषि, ओषधि - समूह और भूतसंघ १ छ. “ यापूपमर्चये CC ” - । 0. २ JK ख Sanskrit . “ प्य च Academy गुडेन तु Jammmhu , । गः । ३. कृ. खः एड या होमयेः । ४ ख. शुश्रुम । ५ छ. ' ददूषिकाः । ना ।

पृष्ठ 875

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अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ८७१ रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा ' वातश्लेष्मकरो देशो बहुवृक्षो बहूदकः । किंचिद्वृक्षोदको देशस्तथा साधारणः स्मृतः । रुक्षः शीतश्चलो वायुः पित्तमुष्णं कटुत्रयम् । वृद्धिः समानैरेतेषां विपरीतैर्विपर्ययः कटुतिक्तकषायाश्च वातलाः श्लेष्मनाशनाः । तिक्तस्वादुकषायाश्च तथा पित्तविनाशनाः । वीर्योष्णाः कफवातघ्नाः शीताः पित्तविनाशनाः । शिशिरे च वसन्ते च निदाघे च तथा क्रमात् । निदाघवर्षारात्रौ च तथा शरदि सुश्रुत । मेघकाले च शरदि हेमन्ते च तथा क्रमात् । वर्षादयो विसर्गास्तु हेमन्ताद्यास्तथा त्रयः । सौम्यो विसर्गस्त्वादानमाग्नेयं परिकीर्तितम् । सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ॥१४ ॥

अनूप इति विख्यातो जाङ्गलस्तद्विवर्जितः ॥१५ ॥

जाङ्गलः पित्तबहुलो मध्यः साधारणः स्मृतः ॥१६ ॥

स्थिराम्लस्निग्धमधुरं बलासं च प्रचक्षते ॥१७ ॥

। रसाः स्वाद्वम्ललवणाः श्लेष्मला वायुनाशनाः ॥१८ ॥

कट्वम्ललवणा ज्ञेयास्तथा पित्तविवर्धनाः ॥ १ ९ ॥ रसस्यैष गुणो नास्ति विपाकस्यैष इष्यते ॥ २० ॥

प्रभावतस्तथा कर्म ते कुर्वन्ति च सुश्रुत ॥ २१ ॥

चयप्रकोपप्रशमाः कफस्य तु प्रकीर्तिताः ॥ २२ ॥

चयप्रकोपप्रशमाः पवनस्य प्रकीर्तिताः ॥२३ ॥

चयप्रकोपप्रशमास्तथा पित्तस्य कीर्तिताः ॥ २४ ॥

शिशिराद्यास्तथाऽऽदाने ' ग्रीष्मान्ता ऋतवस्त्रयः ॥ २५ ॥

। वर्षादींस्त्रीनृतून्सोमश्चरन्पर्यायशो रसान् ॥२६ ॥

तेरी रक्षा करें । ऋषियों को जिस प्रकार रसायन लाभकारी हुआ, देवों को अमृत लाभदायक हुआ, उत्तम नागों को जिस प्रकार सुधा लाभदायक हुई उसी तरह यह ओषधि तुम्हारे लिये हो || १३-१४ ॥ वायु और श्लेष्मा को उत्पन्न करनेवाला अधिक वृक्ष और जलवाला देश अनूप देश कहा जाता है । वृक्षों और जलों से रहित देश जांगल देश कहा जाता है । जिस देश में थोड़े वृक्ष एवं थोड़ा जल हो वह देश साधारण कहा जाता है । जांगल देश में पित्त की अधिकता होती है और साधारण देश में वायु, पित्त, श्लेष्मा समान रहते हैं । रुक्ष, शीत और चल गुणवाला वायु है । पित्त उष्ण एवं त्रिकटु है ( इसमें तिक्त एवं कडुवा स्वाद होता है ), कफ में स्थिर, अम्ल, स्निग्ध एवं मधुर गुण है ॥१५-१७ ॥ अपने - अपने गुणों के समान गुणवाले आहार से वायु, पित्त और श्लेष्मा की वृद्धि होती है एवं विपरीत गुण-वाले आहार से हानि होती है । मधुर, अम्ल और नमकीन रस श्लेष्मा को बढ़ानेवाला एवं वायु को नष्ट करनेवाला है । कटु, तिक्त एवं कषाय रस वायु को बढ़ानेवाला तथा कफ का विनाश करनेवाला है । कटु, अम्ल एवं लवण ( नमकीन ) पित्त को बढ़ानेवाला है । तिक्त, मधुर एवं कषाय रस पित्तविनाशक है । रस का यह गुण नहीं है । इनके विपाक का यह गुण है ॥१८-२० ॥ उष्ण वीर्य पित्तवर्धक और शीत वीर्य कफ - वातवर्धक हैं । सुश्रुत! ओषधियाँ प्रभाव से भी अपने - अपने कर्मों को करती हैं । शिशिर, वसन्त और निदाघ गर्मी में क्रमशः श्लेष्मा का संचय, प्रकोप और प्रशमन होता है । गर्मी में, वर्षा में एवं शरद् तथा रात्रि में वायु का क्रमशः संचय, प्रकोप और शमन होता है । वर्षा, शरद् और हेमन्त में क्रमशः पित्त का संचय, प्रकोप तथा प्रशमन होता है ॥२१-२४ ॥ वर्षा, शरद् और हेमन्त ये तीनों ऋतुएँ विसर्ग काल कही जाती हैं एवं हेमन्त, वसन्त तथा ग्रीष्म ये तीन ऋतुएँ आदान काल कही जाती हैं । विसर्ग काल सौम्य एवं आदान काल आग्नेय कहा जाता है । वर्षा, शरद् और हेमन्त ऋतुओं में सोम ( चन्द्र ) १ ख. छ. ' श्लेष्मातको दे ' । च. ' श्लेष्मान्तको दे । २ ख. ग. रसालं । ३ क. ख. ग. छ. ' स्यैतद्गुणं ना " । ४ छ. " दानं ग्री । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 876

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८७२ अग्निपुराणम् जनयत्यम्ललवणमधुरांस्त्रीन्यथाक्रमम् विवर्धयेत्तथा तिक्तकषायकटुकान्क्रमात् क्रमशोऽथ मनुष्याणां हीयमानासु हीयते आदिमध्यावसानेषु कफपित्तसमीरणाः प्रकोपोत्तरके काले शमस्तेषां प्रकीर्तितः रोगा हि सर्वे जायन्ते वेगोदीरणधारणैः आश्रयं पवनादीनां तथैकमवशेषयेत् कर्तव्यमेतदेवात्र मया सारं प्रकीर्तितम् बलासपित्तवातानां देहे स्थानं प्रकीर्तितम् देहस्य मध्ये हृदयं स्थानं तन्मनसः स्मृतम् व्योमगश्च तथा स्वप्ने वातप्रकृतिरुच्यते स्वप्ने च दीप्तिमत्प्रेक्षी पित्तप्रकृतिरुच्यते क्रमशः रसों में चरता है ( इसमें अपना अंश देता है । शिशिरादीनृतून्नर्कश्चरन्पर्यायशो रसान् ॥२७ ॥

। यथा रजन्यो वर्धन्ते बलमेवं हि वर्धते ॥ २८ ॥

। रात्रिभुक्तदिनानां च वयसश्च तथैव च ॥ २ ९ ॥ । प्रकोपं यान्ति कोपादौ काले तेषां चयः स्मृतः ॥ ३० ॥

। अतिभोजनतो विप्र तथा चाभोजनेन च ॥ ३१ ॥

। अन्नेन कुक्षेर्द्वावंशावेकं पानेन पूरयेत् ॥ ३२ ॥

। व्याधेर्निदानस्य तथा विपरीतमथौषधम् ॥३३ ॥

। नाभेरूर्ध्वमधश्चैव गुदश्रोण्योस्तथैव च ॥ ३४ ॥

। तथाऽपि सर्वगाश्चैते देहे वायुर्विशेषतः ॥ ३५ ॥

। कृशोऽल्पकेशश्चपलो बहुवाग्विषमानलः ॥ ३६ ॥

। अकालपलितः क्रोधी प्रस्वेदी मधुरप्रियः || ३७ ॥ ॥ दृढाङ्गः स्थिरचित्तश्च सुप्रभः स्निग्धमूर्धजः ॥ ३८ ॥

) । अतः अम्ल, लवण और मधुर रसों को यथाक्रम बढ़ाता है । शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतुओं में पर्याय से सूर्य रसों में चरता है । तिक्त, कषाय और कटु रसों को क्रमशः बढ़ाता है । जैसे - जैसे रात्रि बढ़ती जाती है वैसे - वैसे मनुष्यों का बल बढ़ता जाता है ॥२५-२८ ॥ ज्यों - ज्यों रात्रि छोटी होती जाती है त्यों - त्यों मनुष्यों का बल क्रमशः कम होता जाता है । रात्रि, भोजन, दिन और वय के आदि में कफ की वृद्धि, मध्य में पित्त की तथा अन्त में वायु की वृद्धि होती है । और प्रकोप के पूर्व उन दोषों का संचय होता है ॥२९-३० ॥ प्रकोप के उत्तर काल में उन दोषों का शमन हो जाता है । हे विप्र! अति भोजन तथा अति अभोजन और मल, मूत्र तथा अपान वायु के आये हुए वेगों के रोकने से एवं न आये हुए वेगों के उदीरण से समस्त रोग उत्पन्न होते हैं । अन्न से पेट के दो भाग को और जल से एक भाग को भर ले । वायु आदि के आश्रय के लिए एक भाग खाली छोड़े । रोग के और रोग के कारण के विपरीत चिकित्सा करे ॥३१-३३ ॥ यही नीरोग रहने के लिए कर्त्तव्य है जिसका सारभूत मैंने कहा । यद्यपि शरीर में नाभि के ऊपर ( आमाशय ) कफ का स्थान है । नाभि के नीचे ( अग्न्याशय तथा पार्श्व में यकृत ) पित्त का स्थान है । गुदा तथा श्रोणि के मध्य ( पक्वाशय ) वायु का स्थान है । तथापि ये तीनों दोष शरीर में व्यापक ( सर्वग ) हैं । इन्हीं में वायु विशेष रूप से शरीर में सर्वचर है ॥३४-३५ ॥ शरीर के मध्य में हृदय है वही मन का निवास - स्थान है । जो व्यक्ति दुर्बल हो, बाल बहुत कम हो, चञ्चल एवं बहुत बोलनेवाला हो, जिसकी जठराग्नि विषम हो और स्वप्न में आकाश में उड़नेवाला हो उसे वात प्रकृतिवाला कहते हैं । जिसके असमय में ही बाल पक जायँ, क्रोधी हो, पसीना बहुत आवे और मधुर आहार का प्रेमी हो, स्वप्न में प्रकाश की वस्तुएँ दीख पड़ें उसे पित्त प्रकृतिवाला कहा जाता है । जिसके अंग मजबूत ( दृढ़ ) हों, स्थिर चित्तवाला हो, मुख पर तेज टपकता है-CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ८७३ शुद्धाम्बुदर्शी स्वप्ने च कफप्रकृतिको नरः मनुष्या मुनिशार्दूल वातपित्तकफात्मकाः कदन्नभोजनाद्वायुर्देहे शोकाच्च कुप्यति पित्तं प्रकोपमायाति भयेन च तथा द्विज । श्लेष्मा प्रकोपमायाति तथा ये चालसा जनाः अस्थिभङ्गः कषायत्वमास्ये शुष्कास्यता तथा नखनेत्रशिराणां तु पीतत्वं कटुता मुखे । आलस्यं च प्रसेकश्च गुरुता मधुरास्यता । स्निग्धोष्णमन्नमभ्यङ्गस्तैलं पानादि वातनुत् । सक्षौद्रं त्रिफला तैलं व्यायामादि कफापहम् ॥ तामसा राजसाश्चैव सात्त्विकाश्च तथा स्मृताः ॥३९ ॥

। रक्तपित्तं व्यवायाच्च गुरुकर्मप्रवर्तनैः ॥४० ॥

। विदाहिनां तथोल्कानामुष्णान्नाध्वनिषेविणाम् ॥४१ ॥

अत्यम्बुपानगुर्वन्नभोजिनां भुक्तशायिनाम् ॥४२ ॥

। वाताद्युत्थानि रोगाणि ज्ञात्वा शाम्यानि लक्षणैः ॥४३ ॥

। जृम्भणं रोमहर्षश्च वातिकव्याधिलक्षणम् ॥४४ ॥

तृष्णा दाहोष्णता चैव पित्तव्याधिनिदर्शनम् ॥४५ ॥

उष्णाभिलाषिता चेति श्लैष्मिकव्याधिलक्षणम् ॥४६ ॥

आज्यं क्षीरं सिताद्यं च चन्द्ररश्म्यादि पित्तनुत् ॥४७ ॥

सर्वरोगप्रशान्त्यै स्याद्विष्णोर्ध्यानं च पूजनम् ॥४८ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये सर्वरोगहरौषधादिकथनं नामाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८० ॥

चिकने सिर के बाल हों एवं स्वप्न में शुद्ध जल को देखता हो वह कफ प्रकृतिवाला मनुष्य है । ऊपर कहे गये वात प्रकृतिवाले को तामस, पित्त प्रकृतिवाले को राजस एवं कफ प्रकृतिवाले को सात्त्विक कहा जाता है ॥३६-३९ ॥ हे मुनिशार्दूल! मनुष्य वात, पित्त एवं कफात्मक हैं । अत्यधिक मैथुन से तथा बहुत बड़ा कार्य ( सामर्थ्य के बाहर का ) करने से रक्त पित्त होता है । शरीर में रुक्ष अन्न के सेवन से एवं शोक से वायु कुपित होती है । उष्ण पदार्थों ( मिर्च - - म मसाला आदि ) के सेवन से, अग्नि के सेवन से और अध्वगमन से और भय से पित्त का प्रकोप होता है । अधिक जल पीने से, गुरु आहार के सेवन से, भोजन के बाद तुरन्त सो जाने से श्लेष्मा का प्रकोप होता है । जो आलसी व्यक्ति होते हैं उन्हें भी श्लेष्मा का प्रकोप होता है । वातादि से उत्पन्न रोगों को लक्षणों द्वारा समझकर रोगों को शान्त करें ॥४०-४३ ॥ हड्डी का टेढ़ा हो जाना, मुख का स्वाद कषाय होना, मुख सूख जाना, जँभाई आना, रोमांच हो जाना वातिक व्याधि का लक्षण है । नख, नयन और शिराओं का पीला होना, मुख का स्वाद कटु होना, प्यास अधिक लगना, शरीर में दाह एवं गर्मी पैदा होना पित्तजन्य व्याधि का लक्षण है । शरीर में आलस्य बना रहना, मुख में पानी भर आना, शरीर में भारीपन, मुख का मीठापन और उष्ण पदार्थ के सेवन की इच्छा होना, श्लेष्मिक व्याधि का लक्षण है ॥४४-४६ ॥ स्निग्ध तथा उष्ण भोजन, तेल की मालिश एवं तैल का पान वायु को नष्ट करता है ॥ घृत, दुग्ध, मिश्री आदि तथा चन्द्रमा की किरणें पित्तनाशक हैं । मधु के साथ त्रिफला का सेवन, तेल का सेवन और व्यायाम आदि श्लेष्मानाशक हैं सब रोगों की शान्ति के लिए विष्णु का ध्यान और पूजन हितकर है ॥४७-४८ ॥ श्री अग्निमहापुराण में सर्वरोगहरौषधादि कथन नामक दो सौ अस्सीवाँ अध्याय समाप्त ॥ २८० ॥

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८७४ अग्निपुराणम् अथैकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः रसादिलक्षणम् धन्वन्तरिरुवाच रसादिलक्षणं वक्ष्ये भेषजानां गुणं शृणु रसाः स्वाद्वम्ललवणाः सोमजाः परिकीर्तिताः । त्रिधा विपाको द्रव्यस्य कट्वम्ललवणात्मकः अनिर्देश्यप्रभावश्च ओषधीनां द्विजोत्तम । शीतवीर्याः समुद्दिष्टाः शेषास्तूष्णाः प्रकीर्तिताः । उष्णा कषायाऽपि तथा पथ्या भवति मानद लवणो मधुरश्चैव विपाकमधुरौ स्मृतौ वीर्यपाके विपर्यस्तप्रभावात्तत्र निश्चयः क्वाथयेत्षोडशगुणं पिबेद्द्रव्याच्चतुर्गुणम् । कषायं तु भवेत्तोयं स्नेहपाके चतुर्गुणम् ॥ रसवीर्यविपाकज्ञो नृपादीन्रक्षयेन्नरः ॥१ ॥

कटुतिक्तकषायाश्च तथाऽऽग्नेया ' महाभुज ॥२ ॥

। द्विधा वीर्यं समुद्दिष्टमुष्णं शीतं तथैव च ॥३ ॥

मधुरश्च कषायश्च तिक्तश्चैव तथा रसः ॥४ ॥

गुडूची तत्र तिक्ताऽपि भवत्युष्णाऽतिवीर्यतः ॥ ५ ॥

। मधुरोऽपि तथा मांस उष्ण एव प्रकीर्तितः ॥ ६ ॥

। अम्लोष्णश्च तथा प्रोक्तः शेषाः कटुविपाकिनः ॥ ७ ॥

। मधुरोऽपि कटुःपाके यच्च क्षौद्रं प्रकीर्तितम् ॥८ ॥

कल्पनैषा कषायस्य यत्र नोक्तो विधिर्भवेत् ॥९ ॥

द्रव्यतुल्यं समुद्धृत्य द्रव्ये स्नेहं क्षिपेद्बुधः ॥ १० ॥

अध्याय २८१ रसादि लक्षण धन्वन्तरि बोले - रस आदि का लक्षण कहूँगा । ओषधियों के गुणों को सुनो । रस, वीर्य और विपाक का जाननेवाला राजा आदि की रक्षा कर सकता है । हे महाभुज, मधुर अम्ल और लवण रस सोम से उत्पन्न ( सोमजसौम्य ) कहे जाते हैं और कटु, तिक्त एवं कषाय रस आग्नेय ( अग्नि से उत्पन्न ) कहे जाते हैं ॥१-२ ॥ द्रव्य का तीन प्रकार का विपाक होता है - कटु, अम्ल और लवण । दो वीर्य होता है - उष्ण एवं शीत । ओषधियों का प्रभाव अनिर्देश्य-रसादि द्वारा दोषों को शान्त करने के नियम से रहित होता है । मधुर, कषाय एवं तिक्त रस शीत वीर्य होता है । शेष रस - कटु, लवण और अम्ल उष्ण वीर्य होते हैं किन्तु गुर्च तिक्त होने पर भी वीर्य का अतिक्रमण करके उष्ण होती है ॥३-५ ॥ हरड़ कषाय होने पर भी उष्ण होती है । हे मानद! मांस मधुर होने पर भी उष्ण होता है । लवण और मधुर का विपाक मधुर होता है, अम्ल का उष्ण ग - - शेष रस का कटु विपाक होता है ॥६-७ ॥ वीर्य एवं विपाक के विपरीत प्रभाव अपना कार्य करता है । मधुर रस भी पाक में कटु हो जाता है इसका दृष्टान्त मधु है । काढ़ा बनाने की विधि जिस स्थान पर न कही गयी हो वहाँ पर द्रव्य की मात्रा से १६ गुने जल में द्रव्य पकावे और चतुर्गुण के शेष रहने पर काढ़े को छान ले ॥८ - ९ ॥ घृत तैल को पकाने के लिए जो काढ़ा घृत या तेल में डाला जाता १ क. ङ. “ ग्नेयाः प्रकीर्तिताः । त्रि । २ छ. हं पिबेदबुः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ८७५ तावत्प्रमाणं द्रव्यस्य स्नेहपादं ततः क्षिपेत् । संवर्तितौषधः पाकः स्नेहानां परिकीर्तितः । स्वच्छमल्पौषधं क्वाथं कषायं चोक्तवद्भवेत् । मध्यमैषा स्मृता मात्रा नास्ति मात्राविकल्पना । समवेक्ष्य महाभाग मात्रायाः कल्पना भवेत् । मधुरास्तु विशेषेण विज्ञेया धातुवर्धनाः । तदेव वृद्धये ज्ञेयं विपरीतं क्षयावहम् ' । आहारो मैथुनं निद्रा तेषु यत्नः सदा भवेत् । क्षयस्य बृंहणं कार्यं स्थूलदेहस्य कर्षणम् । उपक्रमद्वयं प्रोक्तं तर्पणं वाऽप्यतर्पणम् । ओषधीनां पञ्चविधा तथा भवति कल्पना । है वह स्नेह ( घृत या तेल ) का चतुर्गुण रहे । काढ़े में तोयवर्जं तु यद्द्द्रव्यं स्नेहद्रव्यं तथा भवेत् ॥ ११ ॥

तत्तुल्यता तु लेह्यस्य तथा भवति सुश्रुत ॥१२ ॥

अक्षं चूर्णस्य निर्दिष्टं कषायस्य चतुष्पलम् ॥१३ ॥

वयः कालं बलं वह्निं देशं द्रव्यं रुजं तथा ॥१४ ॥

सौम्यास्तत्र रसाः प्रायो विज्ञेया धातुवर्धनाः ॥ १५ ॥

दोषाणां चैव धातूनां द्रव्यं समगुणं तु यत् ॥१६ ॥

उपक्रमत्रयं प्रोक्तं देहेऽस्मिन्मनुजोत्तम ॥१७ ॥

असेवनात्सेवनाच्च अत्यन्तं नाशमाप्नुयात् ॥१८ ॥

रक्षणं मध्यकायस्य देहभेदास्त्रयो मताः ॥ १ ९ ॥ हिताशी च मिताशी च जीर्णाशी च तथा भवेत् ॥ २० ॥

रसः कल्कः शृतः शीतः फाण्टश्च मनुजोत्तम ॥२१ ॥

से द्रव्य निकालकर जितना द्रव्य काढ़े में डाला गया हो उतना ही स्नेह की मात्रा होनी चाहिए । उस स्नेह ( घृत या तैल ) में पकते समय द्रव्य की मात्रा स्नेह से १ / ४ वाँ भाग ( कल्क के रूप में ) छोड़ दे । जल के सिवा या जो द्रव्य स्नेह में पकने के लिए छोड़ा जायगा उसे स्नेह द्रव्य कहते हैं ॥१०-११ ॥ स्नेह के पकते समय उसे चलाते रहें जिससे ओषधि का रस स्नेह में मिल जाय इसे स्नेहों का पाक कहते हैं । जिस प्रकार स्नेह पाक किया जाता है उसी तरह अवलेह भी पकाया जाता है । अवलेह में स्नेह की मात्रा जितनी होती है उतनी ही चीनी आदि डालनी चाहिए ( अवलेह बनाते समय कुछ द्रव्य पकते समय और कुछ द्रव्य पकने और ठण्डा होने पर छोड़े जाते हैं ) || १२ || स्वच्छ और थोड़ी ओषधि का क्वाथ बनता है और कषाय पूर्व में कहे हुए की भाँति बनता है । ओषधि के चूर्ण की मात्रा एक तोला ले और कषाय के लिए ४ पल ( १६ तोला ) । हे महाभाग! यह मात्रा जो ओषधियों की कही गयी है वह मध्यम मात्रा है । मात्रा का निश्चय ( विकल्पना ) नहीं है । रोगी की उम्र, बल, काल ( समय ), देश, जठराग्नि, द्रव्य और रोग का विचार करके मात्रा निश्चय करे । इनमें सौम्य रस प्रायः धातुवर्धक होता है ॥१३-१५ ॥ मधुर रस तो विशेष रूप से धातुवर्धक है । दोष एवं धातुओं के जो द्रव्य समगुण होता है वही वृद्धि करता है और जो समगुण नहीं होता वह हानि करता है । है मनुजों में उत्तम! इस देश में ३ उपक्रम कहे गये हैं- आहार, मैथुन और निद्रा । अतः इन तीनों में सदा प्रयत्नशील रहे । इनके असेवन से और सेवन से मनुष्य नाश को प्राप्त होता है ॥ १६-१८ ॥ क्षीण शरीर को बढ़ाने का यत्न ( बृंहण ) करे और स्थूल शरीर को क्षीण ( कर्षण ) करने का यत्न करे और मध्यम शरीर ( जो न अत्यन्त दुबला हो न अत्यन्त मोटा ही हो ) को उसी अवस्था में रखने का यत्न करे । इस प्रकार शरीर के तीन भेद हैं । दो उपक्रम कहा गया है- शरीर को बढ़ाना ( तर्पण ) तथा शरीर को घटाना ( अपतर्पण ) । मनुष्य को चाहिए कि वह हितकारक आहार करे एवं आहार को मात्रा से करे तथा पूर्व आहार के जीर्ण होने पर ही आहार करे ॥१९ -२० ॥ हे मनुजोत्तम! ओषधियों की कल्पना पाँच प्रकार की होती है - रस, कल्क, शृत, शीत और फाण्ट ( काढ़ा ) । ओषधियों के दबाने से जो रस निकलता है उसे रस कहते हैं । कल्क उसे १ क. ङ. भयावहम् । २ कुखुराक शुष्ककायस्य cademy, । Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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८७६ अग्निपुराणम् रसश्च पीडको ज्ञेयः कल्क आलोडिताद् भवेत् । क्वथितश्च शृतो ज्ञेयः शीतः पर्युषितो निशि ॥२२ ॥

सद्योभिशृतपूतं यत्तत्फाण्टमभिधीयते यो वेत्ति स ह्यजेयः स्यात्संबन्धे बाहुशौण्डिकः ससिन्धुत्रिफलां चाद्यात्सुष्ठु राज्ञ्यभिवर्णदाम् रसाधिकं समं कुर्यान्नरो वाताधिकोऽपि वा वसन्ते मध्यमं ज्ञेयं निदाघे मर्दनोल्बणम् स्नायूरुधिरदेहेषु अस्थि चातीव मांसलम् अरिवन्मर्दयेत्प्राज्ञो जत्रु वक्षश्च पूर्ववत् प्रसारयेदङ्गसंधीन्न च क्षेपेण चाक्रमात् दिनस्य तु चतुर्भाग ऊर्ध्व तु प्रहरार्धके । व्यायामं ( । करणानां शतं चैव षष्टिश्चैवाधिका स्मृता ॥ २३ ॥

। आहारशुद्धिरग्न्यर्थमग्निमूलं बलं नृणाम् ॥२४ ॥

। जाङ्गलं च रसं सिन्धुयुक्तं दधि पयः कणाम् ॥२५ ॥

। निदाघे मर्दनं प्रोक्तं शिशिरे च समं बहु ॥ २६ ॥

। त्वचं तु प्रथमं मर्धं मज्जां च तदनन्तरम् ॥२७ ॥

। स्कन्धो बाहू तथैवेह तथा जङ्घे सजानुनी ॥ २८ ॥

। अङ्गसंधिषु सर्वेषु निष्पीड्य बहुलं तथा ॥ २ ९ ॥ । नाजीर्णे तु श्रमं कुर्यान्न भुक्त्वा पीतवान्नरः ॥ ३० ॥

मो ) नैव कर्तव्यं ( व्यः ) स्नायाच्छीताम्बुनासकृत् ॥ ३१ ॥

कहते हैं - जो द्रव्य चटनी की भाँति पीसकर रख दिया जाय । ओषधियों का जो काढ़ा बनता है उसे शृत कहा है । जिस द्रव्य को सायं भिगोकर रख दे और उसे प्रातः मसलकर छान ले एवं जो जल शेष रह जाता है उसे शृत कहते हैं । जिस द्रव्य को खौलते पानी में उबालकर तुरन्त छान ले उसे फाण्ट कहते हैं । ओषधियों को खिलाने के लिए १६० कारण ( सहायक- अनुमान ) कहे गये हैं ॥२१ - २३ ॥ जो व्यक्ति ऊपर लिखी गयी बातों को जानता है वह अजेय है इस सम्बन्ध में वह जितहस्त ( बाहुशौण्डिक ) कहा जाता है । आहार की शुद्धि जठराग्नि की रक्षा के लिए है और मनुष्यों का बल अग्निमूलक ही है । सैन्धव नमक के साथ त्रिफला ( आँवला, हरड़ और बहेड़ा ) को खाने से रानी के समान शरीर का वर्ण खिल जाता है । इसी तरह सैन्धव नमक के साथ जंगली पशु - पक्षियों के मांस का रस भी लेने से त्वचा का वर्ण बढ़ जाता है । दधि, दूध और मांसरस को एक में मिलायें किन्तु मांसरस अधिक रहे । इसमें पीपरि ( कणा ) का चूर्ण मिलाकर लेने से कितना ही शरीर में वायु अधिक बढ़ा हो लाभ होता है । गर्मी में शरीर पर तेल की थोड़ी मालिश करावे, शिशिर ऋतु में अत्यधिक मालिश करावे ॥२४-२६ ॥ और वसन्त में मध्यम रूप ( अधिक न कम ) से मालिश करावे । गर्मी में मर्दन केवल ऊपर - ऊपर करावे । त्वचा का मर्दन पहले करावे पश्चात् मज्जा का मर्दन करावे । स्नायु रुधिर ( रक्त बहानेवाली शिरा एवं धमनियाँ ) मांसल हड्डियाँ, कन्धा, बाँह, जाँघ और घुटने को शत्रु की भाँति मर्दन करे या करावे । सम्पूर्ण शरीर की सन्धियों पर मालिश खूब ॥२७-२९ ॥ अंग - सन्धियों को फैलावे और सिकोड़े किन्तु धीरे - धीरे झटके के साथ नहीं फैलावे और मर्दन न करावे फैलावे किन्तु धीरे - ही - धीरे समस्त अंग - सन्धियों का संकोच और प्रसार करे । भोजन के पश्चात् एवं पेय एकाएक पदार्थ के पीने के पश्चात् व्यायाम न करे एवं अजीर्ण रहने पर भी व्यायाम न करे । दिन के चार भाग के पश्चात् प्रहर के पूर्व व्यायाम नहीं करना चाहिए । व्यायाम के पश्चात् ठण्डे जल से एक बार स्नान और आधे करना चाहिए ॥३०-३१ ॥ १ छ. निशाम् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA