अग्नि पुराण — पृष्ठ 921–930
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 921–930
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त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः आग्नेयस्य मनोः ( ' सौम्यमंत्रस्यैतद्विपर्ययात् दुष्टर्क्षराशिविद्वेषिवर्णादीन्वर्जयेन्मनून् गोपालककुटीं प्रायात्पूर्णामित्युदिता लिपि: । वेला गुरुः स्वराः ( र: ) शोणः कर्मणैवेति भेदिताः । लिपौ चतुष्पथस्थायामाख्यावर्णपदान्तराः । सिद्धादीन्कल्पयेदेवं सिद्धोऽत्यन्तगुणैरपि । सुसिद्धो ध्यानमात्रेण साधकं नाशयेदरिः । प्रविश्य विधिवद्दीक्षामभिषेकावसानिकाम् । धीरो दक्षः शुचिर्भक्तो जपध्यानादितत्परः । निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते । कुर्वन्नाचार्यशुश्रूषां सिद्धोत्साही स शिष्यकः । ९ १७ । प्रबोधकालं जानीयादुभयोरुभयोरहः ॥९ ॥
। राज्यलाभोपकाराय प्रारभ्यारिः स्वरः कुरून् ॥१० ॥
नक्षत्रेषु क्रमाद्योज्यौ स्वरान्त्यौ रेवतीयुजौ ॥११ ॥
लिप्यर्णा वशिषु ज्ञेया (: ) षष्ठेशादींश्च योजयेत् ॥१२ ॥
सिद्धाः साध्या द्वितीयस्थाः सुसिद्धा वैरिणः परे ॥१३ ॥
सिद्धे सिद्धो जपात्साध्यो जपपूजाहुतादिना ॥ १४ ॥
दुष्टार्णप्रचुरो यः स्यान्मंत्र: सर्वविनिन्दितः ॥१५ ॥
श्रुत्वा तन्त्रं गुरोर्लब्धं साधयेदीप्सितं मनुम् ॥१६ ॥
सिद्धस्तपस्वी कुशलस्तन्त्रज्ञः सत्यभाषणः ॥१७ ॥
शान्तो दान्तः पटुश्चीर्णब्रह्मचर्यो हविष्यभुक् ॥१८ ॥
स तूपदेश्यः पुत्रश्च विनयी वसुदस्तथा ॥ १ ९ ॥ मन्त्रों का जागरण काल इनसे भिन्न समझना चाहिए । वैसे इन दोनों मन्त्रों का प्रबोध काल दिन ही हुआ करता है ॥७ - ९ ॥ दुष्ट नक्षत्र राशि और शत्रु ( के नाम आदि ) का अक्षरों से युक्त मन्त्रों का वर्णन करते रहना चाहिए । राज्यप्राप्ति तथा परोपकार के लिए प्रयुक्त किये जानेवाले मन्त्रों में स्वरयुक्त अक्षरों के विरोधी स्वरों को एक क्रम में रखना चाहिए ॥ १० ॥ गोपाल मन्त्रों की गणना के अनुसार ही अन्य मन्त्रों की गणना करनी चाहिए अथवा उन मन्त्रों को
नक्षत्र चक्रों से भी जाना जा सकता है । ( ऋ ॠ और ऌ ॡ को छोड़कर ) अ से लेकर अः अक्षरों को अश्विनी से रोहिणी तक भिन्न - भिन्न नक्षत्रों में प्रयुक्त करना चाहिए । नक्षत्र चक्र के विभिन्न कोष्ठकों को सिद्ध ( फलित जैसे नवम, प्रथम और पञ्चम कोष्ठक ), साध्य ( फल देने योग्य, जैसे षष्ठ, दशम, द्वितीय कोष्ठक ), सुसिद्ध ( भली-भाँति फलित जैसे तृतीय, सप्तम और एकादश कोष्ठक ) और अरि ( जैसे चतुर्थ, अष्टम और द्वादश कोष्ठक ) समझना चाहिए । जिस व्यक्ति को मन्त्र देना हो उसे नाम के अनुसार ही इन मन्त्रों के स्वभाव का पता लगाना चाहिए । सिद्ध मन्त्र का जप करने मात्र से मुक्ति प्राप्त हो जाती है, किन्तु साध्य मन्त्र तब फलप्रद होता है जब उसके साथ हवन और पूजन भी किया जाता है । सुसिद्ध मन्त्र का ध्यानमात्र ही अपने उपासक को मोक्ष प्रदान कर देता है । किन्तु अरिष्ट मन्त्र अपने जप करनेवाले को निश्चय ही नष्ट कर देता है । जिस मन्त्र में वर्जित स्वर और वर्ण हों, उन्हें छोड़ ही देना चाहिए ॥११-१५ ॥ विधिपूर्वक अभिषेकपर्यन्त दीक्षा प्राप्त करके और विषय - विशेष के आचार्य से तन्त्र का श्रवण करके उसकी साधना करनी चाहिए । धैर्यशाली, दक्ष, पवित्रान्तःकरण, भक्त, जप और ध्यानादि में विरत, सिद्ध, तपस्वी, क्रियाकुशल, तन्त्रों के मर्मज्ञ, सत्यभाषी, इन्द्रियजित्, अनुग्रहकर्त्ता, सर्वसमर्थ पुरुष ही गुरु कहे जाते हैं और शान्त स्वभाव, जितेन्द्रिय, दक्ष, ब्रह्मचर्यपरायण, हविष्यान्नभोजी, गुरुशुश्रूषा करनेवाला, कार्य में अटल तथा उत्साही व्यक्ति ही शिष्य कहला सकता है । गुरु को सुयोग्य शिष्य, पुत्र और विनयशील तथा दक्षिणा देनेवाले को ही मन्त्रों का उपदेश करना चाहिए ॥१६-१९ ॥ गुरु को शिष्य को तभी मन्त्र देना चाहिए जब वह यह समझ १ सौम्यमंत्र ' ' दुर्गा गुरु क. ङ. च. पुस्तकेषु नास्ति । २ ग. छ. ' त्रेक्षक्र ' । ३ ख. ग. ' श्च ह्यभ्यासी व ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ १८ अग्निपुराणम् मन्त्रं दद्यात्सुसिद्धौ तु सहस्त्रं देशिको जपेत् । पत्रे स्थितं च गाथां च जनयेद्यद्यनर्थकम् । क्रियाभिर्भूरिभिस्तस्य सिध्यन्ते स्वल्पसाधनात् ।
बहुमन्त्रवतः पुंसः का कथा शिव ' एव सः ।
वर्णवृद्ध्या जपह्रासस्तेनान्येषां समूहयेत् ॥
संख्यानुक्तौ शतं साष्टं सहस्त्रं वा जपादिषु । द्रव्यानुक्तौ घृतं होमे जपोऽशक्तस्य सर्वतः । जपात्सशक्तिमन्त्रस्य कामदा मन्त्रदेवताः । उच्चैर्जपाद्विशिष्टः स्यादुपांशुर्दशभिर्गुणैः ।
प्राङ्मुखोऽवाङ्मुखो वाऽपि मंत्रकर्म समारभेत् ।
यदृच्छया श्रुतं मन्त्रं छलेनाथ बलेन वा ॥ २० ॥
मन्त्रं यः साधयेदेकं जपहोमार्चनादिभिः ॥२१ ॥
सम्यक्सिद्धैकमन्त्रस्य नासाध्यमिह किंचन ॥ २२ ॥
दशलक्षजपादेकवर्णो मन्त्रः प्रसिध्यति ॥ २३ ॥
बीजाद्द्वित्रिगुणान्मन्त्रान्मालामन्त्रे जपक्रिया ॥२४ ॥
जपाद्दशांशं सर्वत्र साभिषेकं हुतं विदुः ॥ २५ ॥
मूलमन्त्राद्दशांशः स्यादङ्गादीनां जपादिकम् ॥ २६ ॥
साधकस्य भवेत्तृप्ता ध्यानहोमार्चनादिना ॥२७ ॥
जिह्वाजपे शतगुणः सहस्रो मानसः स्मृतः ॥ २८ ॥
प्रणवाद्याः सर्वमंत्रा वाग्यतो विहिताशनः ॥ २ ९ ॥
ले कि शिष्य ने कुछ सिद्धि प्राप्त कर ली है । शिष्य को एक मन्त्र का एक सहस्र बार जप करना चाहिए । बिना गुरु मुख से सुने हुए केवल अपनी इच्छा से, छल - बल से अथवा किसी यन्त्रादि में लिखे हुए मन्त्र का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी वह निरर्थक होता है । जो साधक जप, होम और विविध प्रकार की अर्चना से युक्त बहुत - सी क्रियाओं से एक मन्त्र को सिद्ध कर लेता है वह साधक बाद में थोड़े - से साधन से भी मन्त्रों को सिद्ध कर लेता है । जिस पुरुष ने एक मन्त्र को भी भली - भाँति सिद्ध कर लिया है उसके लिए इस संसार में कोई भी कार्य असाध्य नहीं रहता है ॥ २०-२२ ॥ फिर जिसने बहुत - से मन्त्रों को सिद्ध कर लिया है उसके विषय में तो कहना ही क्या? वह साक्षात् शङ्कर रूप ही हो जाता है । स्ववर्णवाले मन्त्र का दस लाख बार जप करने से सिद्धि होती है । वर्णों की वृद्धि के ही क्रम से जप में न्यूनता होती जाती है । इसी प्रकार अन्य मन्त्रों के विषय में भी समझ लेना चाहिए । मालामन्त्रों की अपेक्षा बीजमन्त्रों का जप द्विगुणित और त्रिगुणित तक होना चाहिए । मन्त्रों में जहाँ उनके जप की संख्या न दी गयी हो वहाँ एक सौ आठ या एक हजार आठ संख्या समझ लेनी चाहिए । सभी मन्त्रों के जप की संख्या की दशांश संख्या अभिषेक और हवन के लिए बतायी गयी है ॥२३-२५ ॥ जप के अनन्तर होम के लिए किसी द्रव्य - विशेष का उल्लेख होने पर घृत की ही आहुति देनी चाहिए । यदि कोई घृत की आहुति देने में असमर्थ हो तो उसे ( मूल मन्त्रों के अक्षरों की संख्या के ) दशांश संख्या में अधिक मन्त्रों का जप और कर लेना चाहिए । मूल मन्त्र ( की संख्या की ) दशांश ( संख्या में ) अङ्ग मन्त्रों का जप करना चाहिए । अङ्गों के सहित मन्त्र का जप करने से तथा ध्यान, हवन और अर्चना आदि के द्वारा तृप्त किये गये मन्त्र के देवता साधक के ऊपर प्रसन्न होते हैं और उसकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं । जोर - जोर से किये जानेवाले जप की अपेक्षा मन्त्र का मूक जप दसगुना विशिष्ट है, जिह्वा जप ( जिस जप में केवल जीभ ही हिलती है ) सौ गुना श्रेष्ठ है तथा मानस जप हजार गुना श्रेष्ठ है ॥२६-२८ ॥ मन्त्र का आरम्भ पूर्वाभिमुख अथवा अधोमुख होकर करना चाहिए । समस्त मन्त्रों के आदि में प्रणव ( ओङ्कार ) का प्रयोग अवश्य करना चाहिए । साधक को मौन रहकर भोजन करना चाहिए । उसे देवता और आचार्य को तुल्य समझते हुए १ ख. ग. देव । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः आसीनस्तु जपेन्मन्त्रान्देवताचार्यतुल्यदृक् । सिद्धौ यवागूपूपैर्वा पयो भक्ष्यं हविष्यकम् । कृष्णाष्टमीचतुर्दश्योर्ग्रहणादौ च साधकः सर्पाः पितरोऽथ भगोऽर्यमा शीतेतरद्युतिः । विश्वे देवा हृषीकेशो वासवः सतिलाधिपः 1 । अग्निर्दस्त्रावुमानिघ्नौ नागश्चन्द्रो दिवाकरः । पञ्चदश्याः शशाङ्कस्तु पितरस्तिथिदेवताः । एते सूर्यादिवारेशा लिपिन्यासोऽथ कथ्यते । नासागण्डौष्ठदन्तेषु द्वे द्वे मूर्धास्ययोः क्रमात् । पार्श्वयोः पृष्ठतो नाभौ हृदये च क्रमान्यसेत् । त्वगसृङ्मांसमेदोस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः । श्रीकण्ठोऽनन्तसूक्ष्मौ च त्रिमूर्तिरमरेश्वरः । दण्डीशो भौतिकः सद्योजातश्चानुग्रहेश्वरः । ९ १ ९ कुटी विविक्ता देशाः स्युर्देवालयनदीह्रदाः ॥ ३० ॥
मन्त्रस्य देवता ' तावत्तिथिवारेषु वै यजेत् ॥३१ ॥
। दत्रो यमोऽनलो धाता शशी रुद्रो गुरुर्दितिः ॥ ३२ ॥
त्वष्टा मरुत इन्द्राग्नी मित्रेन्द्रौ निर्ऋतिर्जलम् ॥३३ ॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यः पूषाऽश्विन्यादिदेवताः ॥३४ ॥
मातृदुर्गा दिशामीशः कृष्णो वैवस्वतः शिवः ॥३५ ॥
हरो दुर्गा गुरु ) विष्णुब्रह्मा लक्ष्मीर्धनेश्वरः ॥ ३६ ॥
केशान्तेषु च वृत्तेषु चक्षुषोः श्रवणद्वये ॥ ३७ ॥
वर्णान्पञ्चसु वर्गाणां बाहुचरणसंधिषु ॥ ३८ ॥
यादींश्च हृदये न्यस्येदेषां स्युः सप्त धातवः ॥ ३ ९ ॥ रसाद्यैश्च पयोन्तैश्च लिख्यन्ते च लिपीश्वरैः ॥४० ॥
अग्नीशो भारभूतिश्च तिथीशः स्थाणुको हरः ॥ ४१ ॥
अक्रूरश्च महासेनः शरण्या देवता अमूः ॥४२ ॥
स्थिर चित्त होकर मन्त्र का जप करना चाहिए । साधक की कुटी एकान्त स्थान में होनी चाहिए । देवालय, नदी और तालाब ही मन्त्र साधना के लिए उपयुक्त स्थान माने गये हैं ॥२९ -३० ॥ साधक को सिद्धि प्राप्त हो जाने पर यवागू ( लप्सी ) और पुए के साथ दूध और हविष्यान्न खाना चाहिए । मन्त्र के देवताओं की अर्चना निश्चित तिथियों और दिनों में ही करनी चाहिए । साधक को देवताओं की अर्चना कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी तथा ग्रहण आदि के समय करनी चाहिए । अश्विनीकुमार, यम ( यमराज ),, अनल ( अग्नि ), ब्रह्मा, चन्द्र, रुद्र, बृहस्पति, दिति ( दैत्यों की माता ), सर्प, पितृगण, भग, अर्यमा, शीतेतर द्युति ( सूर्य ), त्वष्टा, मरुत, इन्द्र, वरुण, अज, एकपाद्, अहिर्बुध्न्य, उमा, नाग, चन्द्रमा, सूर्य, दुर्गादि माताएँ, दिशाओं के स्वामी, कृष्ण, यम, शिव, पूर्णिमा का चन्द्रमा, पितृगण - ये विभिन्न तिथियों के देवता हैं । शङ्कर, दुर्गा, बृहस्पति, विष्णु, ब्रह्मा, लक्ष्मी, कुबेर ये ही रविवार आदि दिनों के देवता हैं ॥३१-३६ ॥ अब लिपिन्यास बताया जाता है । केशान्तों में, वृत्तों में, दोनों नेत्रों में, दोनों कानों में, नासा, गण्डस्थल, ओष्ठ और दाँतों में, मूर्धा और मुख में दो - दो वर्णों का न्यास करना चाहिए । बाहु और चरण आदि की पाँचों सन्धियों में भी वर्णों का न्यास करना चाहिए । पार्श्वभाग में, पृष्ठभाग में, नाभि तथा हृदय में भी वर्णों का न्यास करना चाहिए । इन वर्णों की सात धातुएँ होती हैं । त्वक् ( चर्म ), असृक् ( खून ), मांस, मेदा, अस्थि ( हड्डी ), मज्जा और शुक्र ( वीर्य ) ये ही सात धातुएँ हैं ॥३७-३९ ३ ॥ मन्त्र बनानेवाले रस से प्रारम्भ करके जल से समाप्त करते हैं । श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर ( इन्द्र ), अग्नि, ईश, भारभूति, तिथीश, स्थाणु, हर, दण्डी, ईश, भूताधिपति, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर, महासेन - ये देवता शरणागत रक्षक हैं ॥४०-४२ ॥ सूचीश, चण्ड, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, रुद्र, १ ख. ग. तारा तिथि । २ छ. जपेत् । ३ छ. वायसः । ४ छ. भावभू । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ २० अग्निपुराणम् ' ततः सूचीशचण्डौ च पञ्चान्तकशिवोत्तमौ अजेशः शर्मसोमेशौ तथा लाङ्गलिदारुकौ । अत्रिर्मीनश्च मेषश्च लोहितश्च शिखी तथा । भुजंगश्च पिनाकी च खड्गीशश्च बकः पुनः । रुद्रान्सशक्ता ( क्ती ) न्विलिखेन्नमोन्तान्विन्यसेत्क्रमात् । हृल्लेखाव्योमसंपूर्णान्येतान्यङ्गानि विन्यसेत् । स्वाहा शिरस्यथ वषट् शिखायां कवचे च हूम् । निरङ्गस्याऽऽत्मना चाङ्गं न्यस्य तं नियुतं जपेत् । लिपिदेवी साक्षसूत्रकुम्भपुस्तकपद्मधृक् निष्कविर्निर्मलः सर्वे मन्त्राः सिध्यन्ति मातृभिः । तथैव रुद्रकूर्मी च त्रिनेत्रश्चतुराननः ॥४३ ॥
अर्धनारीश्वरश्चोमाकान्तश्चाऽऽषाढिदण्डिनौ ॥४४ ॥
शूलगण्डद्विगण्डौ द्वौ समहाकालबालिनी ' ॥ ४५ ॥
श्वेतो भृगुर्गुडाकाक्षः क्षयः संवर्तकः स्मृतः ॥ ४६ ॥
अङ्गानि विन्यसेत्सर्वे मन्त्राः साङ्गास्तु सिद्धिदाः ॥ ४७ ॥
हृदादीन्यङ्गमन्त्रान्तैर्योजयेद्धृदये नमः ॥४८ ॥
वौषणनेत्रेऽस्त्राय फट्स्यात्पञ्चाङ्गं नेत्रवर्जितम् ॥४९ ॥
क्रमेण देवीं वागीशां यथोक्तांस्तु तिलान्हुनेत् ॥ ५० ॥
। कवित्वादि प्रयच्छेत कर्मादौ सिद्धये न्यसेत् ॥ ॥५१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये मन्त्रपरिभाषाकथनं नाम त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२९ ३ ॥ कूर्म, त्रिनेत्र, चतुरानन, अज, ईश, कल्याणकर, सोम, ईश, लाङ्गली ( बलभद्र ), दारुक, अर्धनारीश्वर, उमाकान्त, आषाढ़ी, दण्डी, अत्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, शूलगण्ड, द्विगण्ड, महाकाल, बाली, भुजङ्ग, पिनाकी, खड्गी, ईश, बक, श्वेत, भृगु, गुडाकाक्ष, क्षय, संवर्तक और शालियों के सहित रुद्रों को लिखकर उनके अन्त में ' नमो ' शब्द का प्रयोग करना चाहिए । अङ्ग मन्त्रों से भी न्यास करना चाहिए क्योंकि साङ्ग मन्त्र ही सिद्धिदायक हुआ करते हैं ॥४३-४७ ॥ न्यास, हृदयादि सम्पूर्ण अंगों का करना चाहिए । अङ्गन्यास के मन्त्रों से हृदयादि की योजना इस प्रकार करनी चाहिए । ‘ हृदये नमः ’, ‘ शिरसि स्वाहा ', ' शिखायां वषट् ', ' कवचे हुम् ', ' नेत्रे वौषट् । नेत्र को छोड़कर शेष पञ्चाङ्ग के लिए ‘ अस्त्राय फट् ’ का उच्चारण करना चाहिए । यद्यपि मन्त्र निरङ्ग है तथापि उनके अङ्गों की कल्पना स्वयं करके उनका न्यास करना चाहिए और उनका दस लाख बार जप ( भी ) करना चाहिए । क्रम से वागीश्वरी देवी तथा यथोक्त देवताओं को क्रमश: तिल की आहुति देनी चाहिए । अक्ष ( रथ चक्र ), सूत्र, कुम्भ, पुस्तक तथा पद्म को धारण करनेवाली लिपि देवी कवित्व शक्ति प्रदान करती है अतः कार्य की सिद्धि के लिए उसका न्यास करना चाहिए । मातृकाओं से सभी मन्त्रों की सिद्धि होती है ॥४८-५१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में मन्त्रपरिभाषाकथन नामक दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥२९ ३ ॥ १ च. छ. ' तः क्रोधीश । २ छ. ' लवासिनौ ' । ३ क ङ. तू! विधाधिनिर्मः USA CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by
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चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ २१ अथ चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः नागलक्षणानि अग्निरुवाच नागादयोऽथ भावादिदशस्थानानि कर्म च । शेषवासुकितक्षाख्याः कर्कटाब्जौ महाम्बुजः दशाष्टपञ्चत्रिगुणशतमूर्धन्वितौ क्रमात् तदन्वयाः पञ्चशतं तेभ्यो जाता असंख्यकाः व्यन्तरा दोषमिश्रास्ते सर्पा दर्वीकराः स्मृताः गोनसा मन्दगा दीर्घा मण्डलैर्विविधैश्चिताः व्यन्तरा मिश्रचिह्नाश्च भूवर्षाग्नेयवायवः । त्रयोदश च राजीला व्यन्तरा एकविंशतिः ।
आषाढादित्रिमासैः स्याद्गर्भो मासचतुष्टये ।
सूतकं दष्टचेष्टेति सुप्त ' लक्षणसंयुता (? ) ॥१ ॥
। शङ्खपालश्च कुलिक इत्यष्टौ नागवर्यकाः ॥२ ॥
। विप्रौ नृपौ विशौ शूद्रौ द्वौ द्वौ नागेषु कीर्तितौ ॥३ ॥
। फणिमण्डलिराजीलवातपित्तकफात्मकाः ॥४ ॥
। रथाङ्गलाङ्गलच्छत्रस्वस्तिकाङ्कुशधारिणः ॥५ ॥
। राजिलाश्चित्रिताः स्निग्धास्तिर्यगूर्ध्वविराजिभिः ॥६ ॥
चतुर्विधास्ते षड्विंशभेदाः षोडश गोनसाः ॥७ ॥
येऽनुक्तकाले जायन्ते सर्पास्ते व्यन्तराः स्मृताः ॥८ ॥
अण्डकानां शते द्वे च चत्वारिंशत्प्रसूयते ॥९ ॥
अध्याय २ ९ ४ नागलक्षण अग्निदेव बोले- अब मैं नागों की उत्पत्ति, सर्पदंश के अशुभ नक्षत्र आदि सर्पदंश के विविध भेद, दंश के स्थान, मर्मस्थल, सूतक और सर्पदष्ट मनुष्य की चेष्टा- - इन सात लक्षणों का वर्णन करता हूँ । शेष, वासुकि, तक्षक, कर्कट, अब्ज, महाम्बुज, शङ्खपाल और कुलिक - ये आठ नाग श्रेष्ठ बतलाये गये हैं ॥१-२ ॥ इन नागों में से क्रमशः दो नाग ब्राह्मण, दो नाग क्षत्रिय, दो नाग वैश्य और दो नाग शूद्र कहे गये हैं । ये चार वर्णों के नाग क्रमशः दस सौ, आठ सौ, पाँच सौ और फणों से युक्त होते हैं । उपर्युक्त उन्हीं नागों के वंश में पाँच सौ नाग हुए, जिनसे वे असंख्य हो गये । फणी ( फणधारी ), मण्डली ( मण्डलाकृति ), राजील ( जल - सर्प ) तथा वात, पित्त, कफात्मक सर्प व्यन्तर कहलाते हैं । दोष - मिश्रित सर्प दर्वीकर नाम से प्रसिद्ध हैं । रथ के अंग चक्रादि, लाङ्गल ( हल ), छत्र, स्वस्तिक तथा अंकुश धारण करनेवाले सर्प गोनस नाम से प्रसिद्ध हैं । मन्दगति से चलनेवाले, दीर्घ, विविध मण्डलों से परिपूर्ण, स्निग्ध, तिर्यक् और ऊर्ध्व रेखाओं से युक्त सर्प ' राजिल ' कहलाते हैं ॥ ३ - ६ ॥ व्यन्तर तथा मिश्र चिह्नवाले सर्प, पृथ्वी, अग्नि तथा वायु के भेदों से चार प्रकार के हुआ करते हैं । उन चार प्रकार के सर्पों के पुनः छब्बीस भेद हो जाते हैं । गोनस के सोलह भेद होते हैं । राजील तेरह प्रकार का होता है और व्यन्तर नामक सर्प के इक्कीस भेद होते हैं । अनिश्चित समय में पैदा होनेवाले सर्प व्यन्तर कहलाते हैं । सर्पिणियाँ आषाढ़, श्रावण तथा भाद्रपद मासों में चार मास के लिए गर्भ धारण करती हैं । वे चार मास की अवधि के अनन्तर दो सौ चालीस अण्डे पैदा करती हैं ॥७ - ९ ॥ यह भी प्रसिद्ध है १ च. छ. ' णमुच्यते । शे ' । २ क. ङ. ' विधैः स्मृताः । ग. विधैः स्थिताः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ २२ अग्निपुराणम् सर्पा ग्रसन्ति सूतौघान्विना स्त्रीपुंनपुंसकान् द्वादशाहात्सुबोधः स्याद्दन्ताः स्युः सूर्यदर्शनात् कराली मकरी कालरात्रिश्च यमदूतिका षण्मासान्मुच्यते कृत्तिं जीवेत्षष्टिसमाद्वयम् स्वेषां षट्प्रतिवारेषु कुलिकः सर्वसंधिषु द्वयोर्वा नाडिकामात्रमन्तरं कुलिकोदयः कृत्तिका भरणी स्वाती मूलं पूर्वत्रयाश्विनी हस्तौ मन्दकुजौ वारौ पञ्चमी चाष्टमी तिथिः संध्याचतुष्टयं दुष्टं दु ( द ) ग्धयोगाश्च राशयः अदंशमवगुप्तं स्याद्वंशमेवं चतुर्विधम् नक्तं त्वेकाङ्घ्रिकूर्माभा दंशाश्च यमचोदिता: कि सर्पिणियाँ बिना पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग तथा नपुंसक । उन्मीलितेऽक्ष्णि सप्ताहात्कृष्णो मासाद्भवेद्बहिः ॥१० ॥
। द्वात्रिंशद्दिनविंशत्या चतस्त्रस्तेषु दंष्ट्रिकाः ॥ ११ ॥
। एतास्ताः सविषा दंष्ट्रा वामदक्षिणपार्श्वगाः ॥१२ ॥
। नागाः सूर्यादिवारेशाः सप्त उक्ता दिवा निशि ॥१३ ॥
। शङ्खेन वा महाब्जेन सह तस्योदयोऽथ वा ॥१४ ॥
। दुष्टः स कालः सर्वत्र सर्पदंशे विशेषतः ॥ १५ ॥
। विशाखाऽऽर्द्रा मघाऽऽश्लेषा चित्रा श्रवणरोहिणी ॥१६ ॥
। षष्ठी रिक्ता शिवा निन्द्या पञ्चमी च चतुर्दशी ॥१७ ॥
। एकद्विबहवो दंशा दष्टं विद्धं च खण्डितम् ॥१८ ॥
। त्रयो द्व्येकक्षता दंशा वेदना रुधिरोल्बणा ॥१९ ॥
। दाही पिपीलिकास्पर्शी कण्ठशोथरुजान्वितः ॥२० ॥
का विचार किये प्रसूत अण्डों को खा जाती हैं । साधारण सर्प सात दिनों के अनन्तर अण्डे ही में नेत्र खोल देते हैं और तब बाहर आते हैं । कृष्ण सर्प एक मास बाद अण्डों से बाहर आता है ॥१० ॥ सर्पों में बारह दिनों के बाद चेतना आ जाती है । सूर्य के दर्शन के बीस दिन बाद सर्पों के
दाँत निकलते हैं । ये बत्तीस होते हैं । इनमें चार दाढ़े ( विषैले दाँत ) निकलते हैं । ये विषैले दाँत हैं- कराली, मकरी, कालरात्रि और यमदूतिका जो कि मुख में बायें तथा दायें भाग में होते हैं । छह मास के अनन्तर सर्प केंचुल छोड़ते हैं तथा एक सौ बीस वर्ष तक जीवित रहते हैं । सात नाग रविवार इत्यादि दिनों के स्वामी कहे गये हैं ॥११-१३ ॥ शेष आदि सात नाग अपने - अपने वारों में उदित होते हैं किन्तु कुलिक का उदय सबके अन्त में होता है । अथवा शङ्ख और महापद्म के साथ उसका उदय होता है । मतान्तर से शंख और महापद्म के मध्य की दो घड़ियों में कुलिक का उदय होता है । कुलिक योग का समय सभी कार्यों में वर्जनीय और अशुभ फलदायक है । इस समय सर्प के काटने पर यह विशेष रूप से दुष्ट फल देनेवाला होता है ॥१४-१५ ॥ कृत्तिका, भरणी, स्वाती, मूल, तीनों पूर्वा ( पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपद ), अश्विनी, विशाखा, आर्द्रा, मघा, आश्लेषा, चित्रा, श्रवण, रोहिणी, हस्त ये नक्षत्र शनैश्चर और मंगलवार - ये दो दिन पञ्चमी, अष्टमी, षष्ठी और रिक्ता ( चतुर्थी, चतुर्दशी, नवमी ) ये तिथियाँ कल्याणकारिणी हैं तथा पञ्चमी एवं चतुर्दशी तिथियाँ निन्द्य हैं ॥१६-१७ ॥ चारों सन्ध्याएँ, दग्धयोगवाली राशियाँ भी अनिष्टकारिणी हैं । सर्प एक, दो अथवा बहुत - से दाँतों में काटते हैं । ये क्रमशः दष्ट, विद्ध, खण्डित कहलाते हैं । अदंश अवगुप्त कहलाता है । इस प्रकार सर्प दंशन के चार भेद हैं । तीन, दो अथवा एक दाँत से काटने पर महती वेदना होती है और रक्त की धारा बहने लगती है । रात्रि में एक चरण तथा कूर्म के सदृश दिखायी पड़नेवाला सर्पदंश ( का चिह्न ) महाभयानक होता है । दाहोत्पादक पिपीलिकास्पर्शी ( मानो चीटियाँ लिपटी हों ), कण्ठ में शोथ उत्पन्न कर CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ २३ सतोदो ग्रन्थितो दंशः सविषोऽन्यस्तु निर्विषः । देवालये ' शून्यगृहे वल्मीकोद्यानकोटरे
रथ्यासंधौ श्मशाने च नद्यां च सिन्धुसंगमे । द्वीपे चतुष्पथे ॥२१ ॥
बिलद्वारे जीर्णकूपे सौधे गृहेऽब्जे पर्वताग्रतः ॥ २२ ॥
जीर्णवेश्मनि कुड्यके । शिग्रुश्लेष्मान्तकाक्षेषु जम्बूदुम्बरवेणुषु ॥२३ ॥
वटे च जीर्णप्राकारे खास्यहृत्कक्षजत्रुणि । तालौ शङ्खे गले मूर्ध्नि चिबुके नाभिपादयोः
दंशोऽशुभ: शुभो दूतः पुष्पहस्तः सुवाक्सुधीः । लिङ्गवर्णसमानश्च ॥२४ ॥
शुक्लवस्त्रोऽमलः शुचिः ॥ २५ ॥
अपद्वारगतः शस्त्री प्रमादी भूगतेक्षणः । विवर्णवासाः पाशादिहस्तो गद्गदवर्णभाक् शुष्ककाष्ठाश्रितः खिन्नस्तिलालक्तकरांशुकः ॥२६ ॥
। आर्द्रवासाः कृष्णरक्तपुष्पयुक्तशिरोरुहः ॥२७ ॥
कुचमर्दी नखंच्छेदी गुदस्पृक्पादलेखकः । केशालुञ्ची तृणच्छेदी दुष्टा दूतास्तथैकशः इडाऽन्या वा वहेद्द्द्वेधा यदि दूतस्य चाऽऽत्मनः । आभ्यां द्वाभ्यां पुष्टयास्मान्विद्यास्त्रीपुंनपुंसकान् ॥२८ ॥
दूतः स्पृशति यद्गात्रं तस्मिन्दंशमुदाहरेत् । दूताङ्घ्रिचलनं ॥२९ ॥
जीवपार्श्वे दुष्टमुत्थितिर्निश्चला शुभा ॥ ३० ॥
शुभो दूतो दुष्टोऽन्यत्र समागतः । जीवो गतागतैर्दुष्टः शुभो दूतनिवेदने ॥ ३१ ॥
देनेवाला, पीड़ादायक तथा गाँठयुक्त दंश को विषयुक्त समझना चाहिए और अन्य दंशों को विषरहित ॥१८-२०३ ॥ देवालय, शून्यगृह, वल्मीक, उद्यान, गली, श्मशान, नदी, नदियों का सगंम, द्वीप, चौराहा, भवन, कमल, पर्वताग्रभाग, बिलद्वार, प्राचीन कूप, जीर्णगृह, दीवार, शिग्रु ( वृक्ष - विशेष ), श्लेष्मान्तक ( लसोड़े का वृक्ष ), जामुन, गूलर, बाँस, बरगद, पुरानी खाईं इत्यादि स्थानों में और कान, मुख, हृदय, पार्श्वभाग, जत्रु ( गले के नीचे की दो हड्डियाँ ), तालु, शंख, ग्रीवा, मस्तक, चिबुक ( ठुड्ढी ), नाभि और चरण आदि शरीर के अंगों से होनेवाला सर्पदंश अशुभ होता है ॥२१-२४ ॥ हाथ में पुष्प धारण करनेवाला, मधुरभाषी, बुद्धिमान्, सुन्दर वर्ण और चिह्नयुक्त, शुक्लवस्त्र धारण करनेवाला निर्मल और पवित्र ( सर्प - विष - वैद्य को बुलाने के लिए भेजे गये ) दूत शुभ बताये गये हैं । बुरे मार्ग से आनेवाले, शस्त्रधारी, आलसी, नीचे की ओर देखनेवाले, कुरूप, कुवस्त्रधारी, पाश आदि को हाथ में लेनेवाले, गद्गद वाणी से बोलनेवाले, सूखी लकड़ियाँ लिये हुए, खिन्न आकृतिवाले, तिल तथा लाल वस्त्रों को लिये हुए, भीगे वस्त्रोंवाले, काले और लाल पुष्पों को सिर पर धारण करनेवाले, कुचमर्दन करनेवाले, नखच्छेदन करनेवाले, गुदा का स्पर्श करनेवाले, पैर से भूमि खरोचनेवाले, बालों को उखाड़नेवाले तथा तिनकों को तोड़नेवाले दूत अनिष्टसूचक बताये गये हैं ॥२५-२८ ॥ जिस सर्प ने काटा हो उसका लिंग - ज्ञान विष - वैद्य तथा दूत के वाम, दक्षिण तथा दोनों नासापुटों से निकलनेवाले श्वास के आधार पर हो सकता है । यदि विष - वैद्य के बायें नासापुट से श्वास वेग से निकल रहा हो तो सर्प को स्त्री समझना चाहिए । किन्तु यदि श्वास दूत के दाहिने नासापुट से आ रहा हो तो पुरुष समझना चाहिए । यदि विष - वैद्य और दूत दोनों ही नासापुटों से श्वास ले रहे हों तो सर्प को नपुंसक समझना चाहिए । जिस अंग को ( विष - वैद्य के सम्मुख ) दूत सहसा अनजान में ही अपने हाथ से छू ले रोगी के उसी स्थान पर सर्पदंश समझना चाहिए । विष - वैद्य के पास आकर दूत का अपने पैरों को हिलाना अशुभ माना जाता है, किन्तु दूत का स्थिर होकर बैठना शुभ माना गया है ॥ २ ९ -३० ॥ दूत के साथ - साथ विष - वैद्य के समीप किसी पशु का आ जाना शकुन माना जाता है, किन्तु किसी पशु का वहाँ पर इधर - उधर घूमना अपशकुनसूचक होता है । दूत की वाणी में जिस प्रकार १ छ. शूद्रगृ । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ २४ अग्निपुराणम् दूतस्य वाक्प्रदुष्टा सा पूर्वामजार्धनिन्दिता आद्यैः स्वरैश्च काद्यैश्च वर्णैर्भिन्नलिपिर्द्विधा वाताग्नीन्द्रजलात्मानो वर्गेषु च चतुष्टयम् दुष्टौ दूतस्य वाक्पादौ वाताग्नी मध्यमो हरिः प्रस्थाने मङ्गलं वाक्यं गर्जितं मेघहस्तिनोः शुभा गीतादिशब्दाः स्युरीदृशं स्याद्धि सिद्धये ' वेश्या ' विप्रो नृपः कन्या गौर्दन्ती मुरजध्वजौ तण्डुला हेम रूप्यं च सिद्धयेऽभिमुखा अमी गलस्थटङ्को गोमायुगृध्रोलूककपर्दिकाः विषरोगाश्च सप्त स्युर्धातोर्धात्वन्तराप्तितः । विभक्तैस्तस्य वाक्यान्तैर्विषैर्निर्विकालता ॥३२ ॥
। स्वरजो वसुमान्वर्गी इति ज्ञेया च मातृका ॥३३ ॥
। नपुंसकाः पञ्चमाः स्युः स्वराः शक्राम्बुयोनयः ॥ ३४ ॥
। प्रशस्ता वारुणा वर्णा अतिदुष्टा नपुंसकाः ॥ ३५ ॥
। प्रदक्षिणं फले वृक्षे वामस्य च रुतं जितम् ॥३६ ॥
। अनर्थगी रथाक्रन्दो दक्षिणे विरुतं क्षुतम् ॥ ३७ ॥
। क्षीराज्यदधिशङ्खाम्बुच्छत्रं भेरी फलं सुराः ' ॥ ३८ ॥
। सकाष्ठः सानलः कारुर्मलिनाम्बरवासभृत् ॥३९ ॥
। तैलं कपालकार्पासे निषिद्धे भस्मनष्टये ॥ ४० ॥
। विषदंशो ललाटं यात्यतो नेत्रं ततो मुखम् ॥ आस्याच्च वचनीनाड्यौ (? ) धातून्प्राप्नोति हि क्रमात् ॥४१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये नागलक्षणकथनं नाम चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२९ ४ ॥ के कारकों का प्रयोग होता है, वे इस बात के सूचक हैं कि रोगी में विष कितनी देर तक रहेगा । वर्णमाला के अक्षरों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, इसमें से स्वरों को शुभ तथा वसुमान वर्ग के अन्तर्गत बताया गया है । व्यञ्जनों के पाँचों वर्गों के प्रथम चार - चार अक्षर क्रमशः वायु, अग्नि, इन्द्र और वरुण देवता से सम्बद्ध हैं । जबकि प्रत्येक वर्ग का पाँचवाँ अक्षर अशुभ तथा नपुंसकलिङ्गवाला होता है और उनके अधिष्ठाता देवता इन्द्र और वरुण कहे गये हैं ॥३१-३४ ॥ वायु तथा अग्नि देवता से सम्बद्ध अक्षरों का दूत की वाणी में आना अशुभसूचक है किन्तु इन्द्र से सम्बद्ध अक्षर मध्यम फलवाले होते हैं । दूत की वाणी में नपुंसकलिङ्ग माने जानेवाले अक्षर सबसे अधिक घातक तथा वरुण से सम्बद्ध अक्षर सबसे अधिक शुभ हुआ करते हैं । रोगी के घर जाते हुए मार्ग में दूत और विष - वैद्य की बातचीत शुभसूचक है । दूत और विष - वैद्य के प्रस्थान - काल में होनेवाला हाथी अथवा मेघ का गर्जन अत्यन्त शुभ समझना चाहिए । विष - वैद्य के प्रस्थान से पूर्व फलदार वृक्ष की परिक्रमा कर लेनी चाहिए । प्रस्थान-काल में वाम भाग में होनेवाले गीतादि शब्द सिद्धिसूचक होते हैं । दाहिनी ओर विलाप, असत्य वार्तालाप और रथ का शब्द अनिष्टकारी होता है ॥३५-३७ ॥ ( विष - वैद्य के प्रस्थान - काल में ) वेश्या, विप्र, नृप, कन्या, गौ, गज, मुरज, पताका, दूध, घृत, दधि, शंख, जल, छत्र, भेरी, फल, देवता, चावल, सुवर्ण और चाँदी आदि का सम्मुख दिखायी देना शुभ होता है । मलिन वस्त्रवाला, काष्ठधारी, वह्नियुक्त, गले में टङ्क को लिये हुए शिल्पी, शृगाल, गृद्ध, उलूक, कौड़ी, तेल, कपाल और कपास इन सबका दर्शन निषिद्ध बताया गया है । भस्म का दर्शन होना ( रोगी के नाश की सूचना देता है ) । सात धातुओं के परस्पर सम्पर्क से विष रोग भी सात प्रकार के होते हैं । विष का प्रकोप क्रमशः पहले ललाट, तब नेत्र, मुख और समस्त धातुओं में व्याप्त हो जाता है ॥३८-४१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नागलक्षण - कथन नामक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥२९ ४ ॥ १ छ. वैश्यो । २ छ. क्षुतो । ३ ख. ग. सुरा । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ २५ अथ पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मंत्रध्यानौषधैर्दष्टचिकित्सां ॐ नमो भगवते जपनाद्विषहानिः स्यादौषधं जङ्गमं सर्पमूषादि शृङ्गादि दष्टचिकित्सा अग्निरुवाच प्रवदामि ते ॥१ ॥
नीलकण्ठायेत ॥२ ॥
जीवरक्षणम् । साज्यं सकृद्रसं पेयं द्विविधं विषमुच्यते स्थावरं विषम् । शान्तस्वरान्वितो ब्रह्मा लोहितस्तारकः शिवः ॥ ३ ॥
वियतेर्नाममंत्रोऽयं तार्क्ष्यः शब्दमयः स्मृतः 11811 ॐ ज्वल महामते हृदयाय, गरुडविरालशिरसे, गरुडशिखायै, गरुड विषभञ्जन प्रभेदन प्रभेदन वित्रासय वित्रासय विमर्दय विमर्दय कवचाय, अप्रतिहतशासनं हूं फट्, अस्त्राय, उग्र रूपधारक सर्वभयंकर भीषय भीषय सर्वं दह दह भस्मीकुरु कुरु स्वाहा नेत्राय सप्तवर्गान्तयुग्माष्टदिग्दलस्वर केशरादिवर्णरुद्धं वह्निराभूतकर्णिकं मातृकाम्बुजम् ॥५ ॥
अध्याय २ ९ ५ दष्टचिकित्सा अग्निदेव बोले - अब मैं मन्त्रों के ध्यान तथा ओषधियों के प्रयोग से सर्प के द्वारा काटे हुए की चिकित्सा बतला रहा हूँ । ‘ ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय ' इस मन्त्र के जप करने से विष दूर हो जाता है । जीव रक्षा करनेवाली ओषधि यह है कि ( सर्पदंश में ) घृत के साथ गोबर के रस का पान करना चाहिए । विष दो प्रकार का होता है, सर्प और मूषक आदि का विष जंगम ( विष ) कहलाता है और सींग आदि ( के लग जाने से उत्पन्न ) विष स्थावर कहलाता है । वियति नामक ( सर्पदंश को दूर करनेवाले ) मन्त्र में शान्त स्वर से युक्त ब्रह्मा लोहित, तारक और शिव इन चार देवताओं के बीजाक्षर से वियति सम्बन्धी नाम मन्त्र बनता है । यह मन्त्र शब्दमय ' गरुड़ शिरसे स्वाहा ' कहा गया है ॥१-४ ॥ ‘ ॐ ज्वल महामते हृदयाय नमः ' से हृदय का, ' गरुड़ विराल ' से सिर का, ' गरुड़ शिखायै वषट् ' से शिखा का, गरुड़ विषभञ्जन प्रभेदन प्रभेदन वित्रासय वित्रासय विमर्दय विमर्दय कवचाय हुम् इस मन्त्र से कवच का उग्ररूप धारक सर्वभयङ्कर भीषय भीषय सर्वं दह दह भस्मीकुरु कुरु स्वाहा इस मन्त्र से नेत्रों का और ‘ अप्रतिहतशासनं हूं फट् अस्त्राय फट् ' इससे करतल का स्पर्श करना चाहिए । ( यह विधि तन्त्रशास्त्र में षडङ्गन्यास के नाम से प्रसिद्ध है । ) मातृकामय पद्म में वर्णमाला के विभिन्न वर्ण हुआ करते हैं और आठों दिशाओं की ओर फैले हुए उसके दल स्वर रूप देवताओं से युक्त रहा करते हैं । इसके पूर्वादि दलों में दो - दो के क्रम से समस्त स्वर वर्णों को लिखे । उस ( मातृका पद्म ) का पराग सप्तवर्ग ( सुख की सात अवस्थाओं ) से युक्त रहा करता है । उस कमल के केसर भाग को वर्ग के आदि अक्षरों से संयोजित करे तथा कर्णिका में अग्निबीज ( रं ) लिखे । मन्त्रज्ञ को यह कमल अपने हृदय में स्थापित करके अपने बायें हाथ की हथेली में इसका चिन्तन करना चाहिए । उसे वियति CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ २६ अग्निपुराणम् कृत्वा हृदिस्थं तन्मन्त्री वामहस्ततले स्मरेत् । पीतं वज्रचतुष्कोणं पार्थिवं शक्रदैवतम् । त्र्यस्त्रं ( त्रं? ) स्वस्तिकयुक्तं च तैजसं वह्निदैवतम् । अङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीमध्यपर्यस्तेषु स्ववेश्मसु । वियतेश्चतुरो वर्णान्सुमण्डलसमत्विषः । कनिष्ठामध्यपर्वस्थे न्यसेत्तस्याऽऽद्यमक्षरम् । भूतादिवर्णान्विन्यसेदङ्गुष्ठाद्यन्तपर्वसु । स्पर्शनादेव तार्क्ष्यण हस्ते हन्याद्विषद्वयम् । श्रेष्ठद्व्यङ्गुलिभिर्देहनाभिस्थानेषु पर्वसु । कुङ्कुमारुणमाकण्ठादाकेशान्तात्सितेतरम् । नीलोग्रनाशमात्मानं महापक्षं स्मरेद्बुधः । मुष्टिस्तार्क्ष्यकरस्यान्तः स्थिताऽङ्गुष्ठविषापहा । नामक मन्त्र के विभिन्न अक्षरों का जो उसकी विभिन्न अङ्गुष्ठादौ न्यसेद्वर्णान्वियतेर्भेदिताः कलाः ॥६ ॥
वृत्तार्धमाप्यपद्मार्थं शुक्लं वरुणदैवतम् ॥७ ॥
वृत्तं विन्दुवृतं वायुदैवतं कृष्णमालिनम् ॥८ ॥
सुवर्णनागवाहेन वेष्टितेषु न्यसेत्क्रमात् ॥९ ॥
अरूपे रवतन्मात्रे आकाशे शिवदैवते ॥ ॥१० १० ॥ ॥ नागानामादिवर्णांश्च स्वमण्डलगतान्यसेत् ॥११ ॥
तन्मात्रादिगुणाभ्यर्णानङ्गुलीषु न्यसेद्बुधः ॥ १२ ॥
मण्डलादिषु तान्वर्णान्वियतेः कवयो जितान् ॥ १३ ॥
आजानुतः सुवर्णाभमानाभेस्तुहिनप्रभम् ॥१४ ॥
ब्रह्माण्डव्यापिनं तार्क्ष्यं चन्द्राख्यं नागभूषणम् ॥१५ ॥
एवं तार्क्ष्यात्मनो वाक्यान्मंत्रः स्यान्मंत्रिणोविषे ॥१६ ॥
तार्क्ष्य हस्तं समुद्यम्य तत्पञ्चाङ्गुलिचालनात् ॥१७ ॥
कलाएँ हैं, अपने दाहिने हाथ के अँगूठे आदि के ऊपर न्यास करना चाहिए ॥५-६ ॥ चतुष्कोण के रूप में फैली हुई किरणें पीतवर्ण की होती हैं और उनके देवता इन्द्र कहे गये हैं । दो भागों में कटे हुए कमल के सदृश अर्धवृत्त का वर्ण श्वेत तथा देवता वरुण होता है । त्रिकोण में स्वस्तिकाकार बना हुआ प्रकाशपुञ्ज अग्नि देवता से सम्बद्ध तथा उसके तेज से युक्त होता है । अन्तिम ( बाह्य ) विन्दुयुक्त वृत्ताकार मण्डल कृष्णवर्ण तथा वायु देवता से सम्बद्ध होता है ॥ ७-८ ॥ तत्पश्चात् वियति मन्त्र के मुख्य अक्षरों का न्यास अँगूठे इत्यादि अँगुलियों के मध्यवर्ती स्थानों में करना चाहिए जो सुनहले सर्प से आवेष्टित माने जाते हैं । इस मन्त्र के चार वर्णों की कान्ति उनके सुन्दर मण्डलों के समान है । इस प्रकार न्यास करने के पश्चात् रूपरहित शब्दतन्मात्रमय शिव देवता के आकाश तत्त्व में इस मन्त्र के प्रथम अक्षर को कनिष्ठिका के मध्यपर्व पर स्थित समझना चाहिए । इसी प्रकार नाग शब्द के आदि और अन्तिम अक्षरों का भी उनके मण्डलों में न्यास करना चाहिए ॥९ -११ ॥ पृथ्वी आदि भूतों से सम्बद्ध अक्षरों का न्यास अँगूठे आदि अँगुलियों के अन्तिम पर्वों पर करना चाहिए । ( पञ्च ) तन्मात्राओं से सम्बद्ध अक्षरों का न्यास अँगुलियों पर करना चाहिए । इस प्रकार गरुड़ मन्त्र की शक्ति से समन्वित हाथ के एक स्पर्श से ही सभी प्रकार का स्थावर - जंगम विष दूर हो जाता है । तदनन्तर मन्त्रज्ञ को पृथ्वीमण्डल आदि में विन्यस्त वियति मन्त्र के चारों अक्षरों का अपनी श्रेष्ठ दो अँगुलियों के द्वारा शरीर के नाभिस्थानों और पर्वों में न्यास करे उस ( गरुड़ देवता ) को घुटनों से नाभि तक स्वर्ण वर्ण का, नाभि से ऊपर हिम धवल, कण्ठ तक केसरिया और केशपर्यन्त श्याम वर्णवाला समझना चाहिए । वह गरुड़ देवता समूचे ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं । उनका चन्द्र नाम का नागमय आभूषण है । उनकी नासिका का अग्रभाग नीले रंग का है और उनके पंख बड़े विशाल हैं । सर्प दंश की चिकित्सा करनेवाले विष - वैद्य के मन्त्र में इस अलौकिक गरुड़ का वर्णन प्रधान हुआ करता है ॥१२-१६ मन्त्र से अभिमन्त्रित हाथ की मुट्ठी का प्रहार सभी प्रकार के सर्प - विषों को दूर करनेवाला ॥ इस प्रकार गरुड़ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized होता है । उपर्युक्त मन्त्र