अग्नि पुराण — पृष्ठ 931–940
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 931–940
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पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ २७ कुर्याद्विषस्य स्तम्भादींस्तदुक्तमदवीक्षया । आकाशादेष भूबीजः पञ्चार्णाधिपतिर्मनुः ॥१८ ॥
संस्तम्भयेऽतिविषतो भाषया स्तम्भयेद्विषम् । व्यत्यस्तभूषणो बीजमंत्रोऽयं साधुसाधितः संप्लवप्लावययमशब्दाद्यः ॥१९ ॥
संहरेद्विषम् । दण्डमुत्थापयेदेष सुजप्ताम्भोऽभिषेकतः ॥२० ॥
सुजप्तशङ्खभेर्यादिनिस्वनश्रवणेन वा । संदहत्येव संयुक्तो भूतेजोव्यत्ययात्स्थितः ॥२१ ॥
भूवायुव्यत्ययान्मंत्रो विषं संक्रामयत्यसौ । अन्तस्थो निजवेश्मस्थो बीजाग्नीन्दुजलाम्बुभिः || ॥२२ २२ || ॥ कर्म नयेन्मंत्री गरुडाकृतिविग्रहः । तार्क्ष्यवरुणगेहस्थस्तज्जपान्नाशयेद्विषम् ॥२३ ॥
जानुदण्डीमुदितं स्वधाश्रीबीजलाञ्छितम् (? ) । स्नानपानात्सर्वविषं ज्वरा ( र ) रोगापमृत्युजित् ॥२४ ॥
पक्षि पक्षि महापक्षि महापक्षि वि वि स्वाहा । पक्षि पक्षि महापक्षि महापक्षि क्षि क्षि स्वाहा ॥२५ ॥
द्वावेतौ पक्षिराणमंत्री विषघ्नावभिमंत्रणात् ॥२६ ॥
पक्षिराजाय विद्महे पक्षिदेवाय धीमहि 1 । तन्नो गरुड (:) प्रचोदयात् ॥२७ ॥
वह्निस्थौ पार्श्वतत्पूर्वी दन्तश्रीकौ च दण्डिनौ । सकाली लाङ्गली चेति नीलकण्ठाद्यमीरितम् ॥ वक्ष कण्ठशिखाश्वेतं न्यसेत्स्तम्भे सुसंस्कृतौ ॥२८ ॥
से अभिमन्त्रित पाँचों उँगलियों को सर्प - दंश के ऊपर हिलाने से आगे विष का प्रसार रुक जाता है । हस्तचालन के समय जिस मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए, वह इस प्रकार है- आकाश से लेकर पृथ्वीपर्यन्त जो पाँच बीज हैं उन्हें पंचाक्षर मन्त्रराज कहा गया है । उसका स्वरूप है - हूं यं रं वं लं । मन्त्रज्ञ पुरुष इस मन्त्र के उच्चारण मात्र से भीषणतम विष को भी रोक देता है । यह व्यत्यस्तभूषण बीजमन्त्र है । इसको अच्छी तरह साध लिया जाय और इसके आदि में संप्लव प्लावय प्लावय - यह वाक्य जोड़ दिया जाय तो यह और भी अधिक प्रभा श्री हो जाता है । जिस रोगी के ऊपर उपर्युक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित जल छिड़क दिया जाता है वह निश्चय ही उठकर बिस्तर पर बैठ जाता है ॥१७-२० ॥ अच्छी तरह साधित मन्त्र से अभिमन्त्रित तुरही अथवा शंख का शब्द ही मरणासन्न रोगी को ठीक कर देता है क्योंकि शक्तिशाली वियति मन्त्र में भू बीज तथा तेजोबीज मन्त्र की शक्ति समन्वित रहती है । तदनन्तर अपने मूल तत्त्वों पृथ्वी, वायु से अलग होकर यह मन्त्र विष के ऊपर आक्रमण करता है तथा तेज अग्नि और जल इन अशेष तत्त्वों से उसे नष्ट कर देता है । विष - वैद्य के इस मन्त्र का सावधानीपूर्वक गरुड़ और वरुण के मन्दिर में जप करना चाहिए । इस अवसर पर उसे अपने - आपको अलौकिक गरुड़ की शक्ति में समन्वित समझकर अपना ध्यान एक भयंकर सर्पद्वेषी गरुड़ के रूप में करना चाहिए । स्वधा और श्री के बीजों से युक्त करके यदि इस मन्त्र को बोला जाय तो इसे जानुदण्डिमन्त्र कहते हैं । इससे जपपूर्वक स्नान और जलपान करने से साधक सब प्रकार के विष, ज्वर, रोग और अपमृत्यु पर विजय पा लेता है ॥२१-२४ ॥ ' पक्षि पक्षि महापक्षि महापक्षि वि वि स्वाहा ' और ' पक्षि पक्षि महापक्षि महापक्षि क्षि क्षि स्वाहा ' यह दोनों गरुड़ मन्त्र कहलाते हैं । इनके अभिमन्त्रण से सब प्रकार का विष नष्ट हो जाता है । गरुड़ के लिए गायत्री मन्त्र इस प्रकार है - ' पक्षिराजाय विद्महे पक्षिदेवाय धीमहि । तन्नो गरुड़ः प्रचोदयात् ' उपर्युक्त दोनों पक्षिराज - मन्त्रों को ' ए ' बीज से आवृत करके उनके पार्श्व भाग में भी ' रं ' बीज जोड़ दे । तदनन्तर दन्त, श्री, दण्डी, काली और लाङ्गली से उन्हें युक्त कर दे और आदि में पूर्वोक्त नीलकण्ठ मन्त्र जोड़ दे । इस प्रकार बताये गये मन्त्र का वक्षःस्थल, कण्ठ और शिखा में न्यास करे । उक्त दोनों मन्त्रों का सन्दर्भ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ २८ अग्निपुराणम् हर हर हृदयाय नमः कपर्दिने च शिरसि । अथ वर्म च कण्ठे नेत्रं कृत्तिवासास्त्रिनेत्रम् । अभयं वरदं चापं वासुकिं च दधद्भुजैः । पादजानुगुहानाभिहृत्कण्ठाननमूर्धसु । तर्जन्यादितदन्तासु सर्वमङ्गुष्ठयोर्न्यसेत् । कनिष्ठा ज्येष्ठया बद्धा तिस्रोऽन्याः प्रसृतेर्जवाः (? ) । ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय चिः अमलकण्ठाय चिः । अमलनीलकण्ठाय नैकसर्वविषापहाय । न संदेहः । कर्णजाप्या उपानहा वा यजेद्रुद्रविधानेन नीलग्रीवं महेश्वरम् । इत्यादिमहापुराण आग्नेये दष्टचिकित्साकथनं नीलकण्ठाय वै शिखां कालकूटविषभक्षणाय स्वाहा ॥२९ ॥
पूर्वाद्यैराननैर्युक्तं श्वेतपीतारुणासितैः ॥३० ॥
यस्योपवीतपार्श्वस्था गौरी रुद्रोऽस्य देवता ॥ ३१ ॥
मंत्रार्णान्त्र्यस्य करयोरङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीषु च ॥ ३२ ॥
ध्यात्वैवं संहरेत्क्षिप्रं बद्धया शूलमुद्रया ॥३३ ॥
विषनाशे वामहस्तमन्यस्मिन्दक्षिणं करम् ॥३४ ॥
सर्वज्ञकण्ठाय चिः क्षिप क्षिप, ॐ स्वाहा ॥ नमस्ते रुद्र मन्यव इति संमार्जनाद्विषं विनश्यति ॥३५ ॥
विषव्याधिविनाशः स्यात्कृत्वा रुद्रविधानकम् ॥३६ ॥
नाम पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ५ ॥ करके उन्हें स्तम्भ में अंकित करे । इसके पश्चात् निम्नाङ्कित रूप से न्यास करे- ' हर हर हृदयाय नमः कपर्दिने शिरसे स्वाहा नीलकण्ठाय शिखायै वषट् कालकूट विषभक्षणाय स्वाहा हुं फट् कवचाय हुम्, कृत्तिवासो नेत्रत्रयाय वौषट नीलकण्ठाय स्वाहा अस्त्राय फट् । जिनके पूर्व आदि मुख क्रमशः श्वेत, पीत, अरुण, श्याम हैं जो अपने चारों हाथों में क्रमशः अभय, वरद, धनुष तथा वासुकि नाग को धारण करते हैं, जिनके गले में यज्ञोपवीत शोभा पाता है और पार्श्व भाग में गौरी देवी विराजमान हैं, वे भगवान् रुद्र इस मन्त्र के देवता हैं ॥ २५-३१ ॥ पैरों, घुटनों, भुजाओं, नाभि, हृदय, ग्रीवा, मुख और सिर में मन्त्र के अक्षरों का न्यास करना चाहिए । तदनन्तर दोनों हाथों के अंगुष्ठ से आदि अँगुलियों में मन्त्राक्षरों का न्यास करके सम्पूर्ण मन्त्र का अंगुष्ठों में न्यास करना चाहिए । इस प्रकार ध्यान और न्यास करके शीघ्र ही बाँधी गयी शूल- मुद्रा के द्वारा विष का संहार करे । कनिष्ठा अँगुली ज्येष्ठा से बँध जाय और तीन अँगुलियाँ फैल जायँ तो शूल - मुद्रा होती है । विष के प्रभाव को मन्द करने के लिए बायें हाथ का प्रयोग करना चाहिए किन्तु अन्य अवसरों पर दाहिने हाथ से ही काम लेना चाहिए । ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय चिः अमलकण्ठाय चिः, सर्वज्ञकण्ठाय चिः ' क्षिप क्षिप ' ॐ स्वाहा अमलनीलकण्ठाय नैकसर्पविषापहाय । नमस्ते रुद्र मन्यवे ” इस मन्त्र से ( रोगी के शरीर का ) सम्मार्जन करने से विष नष्ट हो जाता है । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है । इस मन्त्र का रोगी के कान में जप करने से अथवा मन्त्र पढ़ते हुए जूते से रोगी के पास की भूमि पीटने से भी विष उतर जाता है । ( विष दूर करने के लिए ) रुद्र - विधान से नीलकण्ठ महेश्वर का पूजन करना चाहिए । क्योंकि रुद्र-विधान विष से उत्पन्न होनेवाली सभी व्याधियों का विनाश कर देता है ॥३२-३६ ॥ श्री अग्निमहापुराण में दष्टचिकित्सा - कथन नामक दो सौ पञ्चानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥२९ ५ ॥ १ ङ. ' य टि, अ ' । च. ' य, इति । अ ' । २ ङ. उपलता । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ २ ९ अथ षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पञ्चाङ्गरुद्रविधानम् अग्निरुवाच वक्ष्ये रुद्रविधानं तु पञ्चाङ्गं सर्वदं परम् । हृदयं शिवसंकल्पः शिरः सूक्तं तु पौरुषम् ॥१ ॥
शिखाऽद्भ्यः संभृतं सूक्तमाशुः कवचमेव च । ' शतरुद्रीयसंज्ञस्य रुद्रस्याङ्गानि पञ्च हि ॥२ ॥
पञ्चाङ्गान्यस्य तं ध्यात्वा जपेद्रुद्रांस्ततः क्रमात् । यज्जाग्रत इति सूक्तं षडृचं मानसं विदुः ॥३ ॥
ऋषिः स्याच्छिवसंकल्पश्छन्दस्त्रिष्टुवुदाहृतम् । शिरः सहस्त्रशीर्षेति तस्य नारायणोऽप्यृषिः ॥४ ॥
देवता पुरुषोऽनुष्टुप्छन्दो ज्ञेयं च त्रैष्टुभम् । अद्भ्यः संभृतसूक्तस्य ऋषिरुत्तरगो नरः ॥ ५ ॥
अद्यानां तिसृणां त्रिष्टुप्छन्दोऽनुष्टुब्द्वयोरपि । छन्दस्त्रैष्टुभमन्त्यायाः पुरुषोऽस्यास्ति देवता || ६ || आशुरिन्द्रो द्वादशानां छन्दस्त्रिष्टुवुदाहृतम् । ऋषिः प्रोक्तः प्रतिरथः सूक्ते सप्तदशर्चके ॥७ ॥
पृथक्पृथग्देवताः स्युः पुरुविदङ्गदेवता । अवशिष्टदैवतेषु च्छन्दोऽनुष्टुवुदाहृतम् ॥८ ॥
असौ यस्ताम्रो भवति पुरुलिङ्गोक्तदेवता । पंक्तिश्छन्दोऽथ मर्माणि त्रिष्टुब्लिङ्गोक्तदेवताः ॥९ ॥
अध्याय २ ९ ६ पञ्चाङ्गरुद्रविधान अग्निदेव बोले - अब मैं पाँच अङ्गों से युक्त रुद्र विधान का वर्णन कर रहा हूँ । यह सब - कुछ देनेवाला और अत्यन्त श्रेष्ठ है । शिव संकल्प नामक मन्त्र से हृदय, पुरुषसूक्त से सिर, ' अद्भ्यः संभृतं ' सूक्त से शिखा और ‘ आशुः ’ मन्त्र से कवच का न्यास करना चाहिए । शतरुद्रीय मन्त्र के साथ उपर्युक्त चारों मन्त्र रुद्र विधान के पाँच अङ्ग कहे जाते हैं । पञ्चांगों का ध्यान करके क्रमशः ( विभिन्न ) रुद्र मन्त्रों का जप करना चाहिए । उसका प्रथम मन्त्र समूह छह ऋचाओं से युक्त ‘ यज्जाग्रत ' नामक मानस - सूक्त है ॥१-३ ॥ इसका ऋषि शिवसंकल्प तथा छन्द त्रिष्टुप् कहा गया है । सिर के न्यास करने के लिए प्रयुक्त ' सहस्रशीर्षा ' इत्यादि पुरुषसूक्त के ऋषि नारायण, पुरुष देवता और छन्द अनुष्टुप् और त्रिष्टुप् हैं । ' अद्भ्यः सम्भृतः ' सूक्त के ऋषि उत्तरग नामक व्यक्ति हैं । प्रथम तीन ऋचाओं का छन्द त्रिष्टुप् है तथा बाद की दो ऋचाओं का छन्द अनुष्टुप् कहा गया है । अन्तिम मन्त्र त्रिष्टुप् छन्द में है । इसका देवता पुरुष कहा गया है ॥४-६ ॥ ' आशुः ' इत्यादि बारह मन्त्रों का देवता इन्द्र तथा छन्द त्रिष्टुप् कहा गया है । सत्रह ऋचाओं से युक्त इस सूक्त का ऋषि प्रतिरथ है । ( इस सूक्त के ) विभिन्न मन्त्रों के देवता ( भी ) भिन्न - भिन्न हैं और पुरुविद् इसका अङ्गदेवता है । अन्य देवताओं से सम्बद्ध मन्त्रों का छन्द ' अनुष्टुप् ' है । ' असौ यस्ताम्रो ' आदि सूक्त में बहुत - से देवता हैं । उसमें पङ्क्ति छन्द है । ' मर्माणि ते ' मन्त्र का त्रिष्टुप् छन्द है और लिङ्गोक्त देवता है ॥७ - ९ ॥ १ छ. ' यमस्त्रं च रु ' । २ छ. यदृच । ५ ९ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ३० अग्निपुराणम् रौद्राध्याये च सर्वस्मिन्नृषिः स्यात्परमेष्ठ्यथ । प्रजापतिर्वा देवानां कुत्सश्च तिसृणां पुनः ॥ १० ॥
मनोद्वयोरुगेका स्याद्भुद्रो रुद्राश्च देवताः । आद्योऽनुवाकोऽथ पूर्व एकरुद्राख्यदैवतः ॥११ ॥
छन्दो गायत्रमाद्याया अनुष्टुप्तिसृणामृचाम् । तिसृणां च तथा पंक्तिरनुष्टुवथ संस्मृतम् ॥१२ ॥
द्वयोश्च जगतीछन्दो रुद्राणामप्यशीतयः । हिरण्यबाहवस्तिस्रो नमो वः किरिकाय च ॥१३ ॥
पञ्चर्चो रुद्रदेवाः स्युर्मन्त्रे रुद्रानुवाककः । विंशके रुद्रदेवास्ताः प्रथमा बृहती स्मृता ॥ १४ ॥
ऋद्वितीया त्रिजगती तृतीया त्रिष्टुबेव च । अनुष्टभो यजुस्तिस्त्र आर्योऽभिज्ञः सुसुद्धिभाक् । त्रैलोक्यमोहनेनापि विषव्याध्यादिमर्दनम् ॥१५ ॥
इं श्रीं ह्रीं हुं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः ॥१६ ॥
अनुष्टुभनृसिंहेन विषव्याधिविनाशनम् ॥१७ ॥
ॐ हम्, इम्, उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ॥१८ ॥
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् । अयमेव तु पञ्चांगो मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥१९ ॥
द्वादशाष्टाक्षरौ मन्त्रौ विषव्याधिविमर्दनौ । कुब्जिका त्रिपुरा गौरी ' चन्द्रिका विषहारिणी || २० || प्रसादमन्त्रो विषहृदायुरारोग्यवर्धनः । सौरो विनायकस्तद्वगुद्रमन्त्राः सदाऽखिलाः ॥ २१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये पञ्चाङ्गरुद्रविधानं नाम षण्णवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ६ ॥ सम्पूर्ण रौद्राध्याय में ऋषि परमेष्ठि अथवा प्रजापति हैं किन्तु तीन देवताओं से सम्बद्ध मन्त्रों के ऋषि कुत्स हैं । ' मनस् ’ इत्यादि से प्रारम्भ होनेवाले दो मन्त्रों का देवता रुद्र है किन्तु प्रथम अनुवाक् का देवता एक रुद्र कहा गया है । पहली ऋचा का छन्द गायत्री तथा शेष अन्य ऋचाओं का छन्द अनुष्टुप् है । उससे आगेवाले तीन मन्त्रों का छन्द पङ्क्ति तथा शेष मन्त्रों का छन्द अनुष्टुप् है ॥१०-१२ । इस अनुवाक् के दो - दो मन्त्र जगती छन्द में हैं । इनमें परिगणित ८० ( अस्सी ) रुद्र इनके देवता हैं । ' हिरण्य - वाहवः ' आदि पाँच ऋचाओं के देवता रुद्र हैं । इन ऋचाओं में से पहली ऋचा का छन्द ‘ बृहती ' है । बाद की तीन ऋचाओं का छन्द जगती है और उनके बाद की ऋचा का छन्द त्रिष्टुप् है । उसके बाद चार यजुष् मन्त्र हैं, जिनका छन्द अनुष्टुप् है । इन मन्त्रों को सम्यक् प्रकार से जाननेवाला व्यक्ति आर्य है, वह सभी सिद्धियों का भागी भी है ॥१३-१४ ॥ । ' त्रैलोक्यमोहन ' नामक मन्त्र से भी विषव्याधि का विनाश हो जाता है । यह मन्त्र है- “ इं श्रीं ह्रीं हूं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः । ' अनुष्टुप् नामक छन्द में निबद्ध नृसिंह मन्त्र भी विषव्याधि का विनाशक है । वह मन्त्र है - ' ॐ हम् इम् उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तम् सर्वतो मुखम् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् । ' वह पञ्चांग मन्त्र है जो सभी मनोरथों को सिद्ध करनेवाला है ॥१५-१९ ॥ बारह और आठ अक्षरोंवाले विष्णु के मन्त्र भी विषव्याधि दूर करनेवाले हैं । कुब्जिका, त्रिपुरा, गौरी और चन्द्रिका देवियाँ विषापहारिणी हैं । ‘ प्रसाद मन्त्र ' विष का अपहरण करनेवाला तथा आरोग्यवर्धक है । सूर्य और विनायक तथा रुद्र के सभी मन्त्र उसी प्रकार ( विषापहारक तथा आरोग्यवर्धक ) हुआ करते हैं ॥२०-२१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में पञ्चाङ्ग रुद्र - विधान - कथन नामक दो सौ छियानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥२९ ६ ॥ १ छ. चण्डिका । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ ३१ अथ सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः विषहृन्मत्रौषधम् अग्निरुवाच ॐ नमो भगवते रुद्राय च्छिन्दच्छिन्दविषं ज्वलितपरशुपाणयेच । नमो भगवते पक्षिरुद्राय दष्टकमुत्थापयोत्थापय दष्टकं कम्पय कम्पय सर्वदष्टमुत्थापयोत्थापय जल्पय जल्पय लल लल बन्ध बन्ध मोचय मोचय वररुद्र गच्छ गच्छ वध वध त्रुट त्रुट वुक बुक भीषय भीषय मुष्टिना विषं संहर संहर ठ ठ पक्षिरुद्रेण ह विषं नाशमायाति मन्त्रणात् ॥१ ॥
ॐ नमो भगवते रुद्र नाशय विषं स्थावरजङ्गमं कृत्रिमाकृत्रिममुपविषं ॥२ ॥
नाशय नानाविषं दष्टकविषं नाशय धम धम दम दम वम वम मेघान्धकारधारावर्ष निर्विषी भव संहर संहर गच्छ गच्छाऽऽवेशयाऽऽवेशय विषोत्थापनरूपं मन्त्राद्विविषधारणम् । ॐ क्षिप, ॐ क्षिप स्वाहा ॐ ह्रां ह्रीं खीं सः, ठं द्रौं ह्रीं ठः ॥३ ॥
जपादिना साधितस्तु सर्पान्बध्नाति नित्यशः । एकद्वित्रिचतुर्बीजः गोपीजनवल्लभाय कृष्णचक्राङ्गपञ्चकः ॥ स्वाहा सर्वार्थसाधकः ॐ नमो भगवते रुद्राय ' प्रेताधिपतये शृणु शृणु गर्ज गर्ज भ्रामय ॥४ ॥
भ्रामय मुञ्च मुञ्च मुह्य मुह्य कट्ट कट्ट, आविश आविश सुवर्णपतङ्ग ' रुद्रो ज्ञापयति ठ ठ 11411 पातालक्षोभमन्त्रोऽयं मन्त्रणाद्विषनाशनः । दंशकाहिदंशे सद्यो दष्टः काष्ठशिलादिना ॥६ ॥
विषशान्त्यै दहेद्दंशज्वालकोकनदादिना । शिरीषबीजपुष्पार्क क्षीरबीजकटुत्रयम् ॥७ ॥
अध्याय २ ९ ७ विषहृन्मन्त्रौषध अग्निदेव बोले- ' ॐ नमो भगवते रुद्राय संहर ठ ठ ' इस पक्षि रुद्र नामक मन्त्र से मन्त्रित करने पर निश्चय ही ( सर्प ) विष का नाश होता है ॥ १-२ ॥ ' ॐ नमो भगवते रुद्र नाशय... द्रौं ह्रीं ठः ' इस मन्त्र के जपादि से सिद्ध किया हुआ मन्त्र नित्य सर्पों को बन्धन में डाल देता है । एक द्वित्रि चतुर्बीजात्मक तथा कृष्णचक्र जिसका पाँचवाँ अङ्ग है । ऐसा ‘ गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ' यह मन्त्र समस्त मनोरथों को सिद्ध करनेवाला है ॥३-४ ॥ ' ॐ नमो भगवते रुद्राय ं‘ ज्ञापयति ठ ठ ' इस पाताल क्षोभ नामक मन्त्र के जप से ( सर्प ) विष का नाश होता है । दंशक सर्प के काट लेने पर काटे हुए भाग को जलते हुए काष्ठ, गरम पत्थर अथवा कोकनद आदि से जला देना चाहिए । इससे विष शान्त हो जाता है । शिरीष वृक्ष का बीज तथा पुष्प, मदार का दूध और बीज, कटुत्रय ( सोंठ, मिर्च, पीपरि ), इन ओषधियों के पान, लेपन तथा अञ्जनादि से सर्प - विष का नाश होता है । शिरीष पुष्प के रस से सोंधी हुई सफेद मिर्च के पीने १ छ. “ ये गुत्त्व गुत्त्व गरौं । करुड़ो pademy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ३२ अग्निपुराणम्
विषं विनाशयेत्पानलेपनेनाञ्जनादिना । शिरीषपुष्पस्य रसभावितं मरिचं सितम् ॥८ ॥
' पाननस्याञ्जनाद्यैश्च विषं हन्यान्न संशयः । कोषातकीवचाहिङ्गुशिरीषार्कपयोयुतम् ॥९ ॥
कटुत्रयं समेषाम्भो हरेन्नस्यादिना विषम् । रामठेक्ष्वाकुसर्वाङ्गचूर्णं नस्याद्विषापहम् ॥१० ॥
इन्द्रबलाग्निकं द्रोणं तुलसी देविका सहा । तद्रसाक्तं त्रिकटुकं चूर्णं भक्ष्यं विषापहम् ॥ ११ ॥
पञ्चाङ्गं कृष्णपञ्चम्यां शिरीषस्य विषापहम् ॥१२ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये विषहृन्मन्त्रौषधकथनं नाम सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ७ ॥ अथाष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः गोनसादिचिकित्सा अग्निरुवाच गोनसादिचिकित्सां च वशिष्ठ शृणु वच्मि ते ॥१ ॥
ॐ ह्रां ह्रीम्, अमलपक्षि स्वाहा ॥२ ॥
ताम्बूलखादनान्मन्त्री हरेन्मण्डलिनो विषम् । लशुनं रामठफलं कुष्ठोग्रा व्योषकं विषे ॥३ ॥
स्नुही क्षीरं गव्यघृतं पक्वं पीत्वाऽहिजे विषे । अथ राजिलदष्टे च पेया कृष्णा ससैन्धवा || ४ || तथा नस्य अञ्जनादि रूप में उसका प्रयोग करने से निश्चित ही विष दूर हो जाता है ॥५-८३ ॥ कोषातकी, वच, हींग, शिरीष, मदार का दूध, सोंठ, मिर्च और पीपरि - इस सबसे तैयार किये गये जल के न्यास लेने से सर्प - विष दूर हो जाता है । अंकोल और कड़वी तुम्बी के सर्वाङ्ग चूर्ण से नस्य लेने पर विष का अपहरण हो जाता है । इन्द्र ( कुटक ), बल ( वरुण वृक्ष ), अग्नि ( भेलावाँ ), द्रोण, तुलसी और देविका ( धत्तूर ) के रस में सोंठ, मिर्च और पीपरि के चूर्ण को मिलाकर खाने से सर्पविष दूर हो जाता है । कृष्णपक्ष की पञ्चमी तिथि को लाये गये शिरीष पुष्प के ( मूल, छाल, पत्ते, पुष्प और फल ) इन पाँचों अङ्गों के सेवन से भी सर्प - विष दूर हो जाता है ॥९ -१२ ॥ श्री अग्निमहापुराण में विषहृन्मन्त्रौषध - कथन नामक दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥२९ ७ ॥ अध्याय २ ९ ८ गोनसादि - चिकित्सा अग्निदेव बोले - हे वशिष्ठ! गोनस आदि ( सर्पों ) के काटे हुए रोगी की चिकित्सा तुमको बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥१ ॥ ‘ ॐ ह्रां ह्रीम् अमलपक्षि स्वाहा ' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित ताम्बूल के खाने से सर्पमन्त्र का ज्ञाता मण्डली
सर्प के विष को दूर कर देता है । लहसुन, हींग, कुष्ठ, उग्रा, सोंठ, मिर्च और पीपरि का चूर्ण विष दूर करनेवाला होता है । गाय के घी में सेंहुड़ के दूध को पकाकर पीने से सर्प - विष में लाभ होता है । राजिल नामक सर्प के काटने १ ख. ' नलेपाञ्ज ' । ' ३ क. ई. पक्ष स्वाग ३ कड.. हा । Lhy पञ्चाङ्गस्वा S3 Foundation USA
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अष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः आज्यं क्षौद्रं शकृत्तोयं ' पुरीतत्या विषापहम् व्योषं पिच्छं बिडालास्थिनकुलाङ्गरुहैः समैः रोमनिर्गुण्डिकाकोलवर्णैर्वा लशुनं समम् मूषिकाः षोडश प्रोक्ता रसं कार्पासजं पिबेत् सनागरगुडं भक्ष्यं तद्विषारोचकापहम् पद्मकं पाटली कुष्ठं नतमुशीरचन्दनम् गुञ्जानिर्गुण्डिकङ्कोलपर्णं शुण्ठी निशाद्वयम् मञ्जिष्ठा चन्दनं व्योषपुष्पाशिरीषकौमुदम् ॐ नमो भगवते रुद्राय चिवि चिवि च्छिन्द च्छिन्द शूलेन भेदय भेदय चक्रेण दारय दारय ॐ हूं फट् मंत्रेण मंत्रितो देयो गर्दभादीन्निकृन्तति अजाक्षीरेण पानादौ गर्दभादेर्विषं हरेत् पर सेंधानमक के साथ कृष्णा ( गजपीपरि ) का पान ९ ३३ । सकृष्णाखण्डदुग्धाज्यं पातव्यं तेन माक्षिकम् ॥५ ॥
। चूर्णितैर्मेषदुग्धाक्तैर्धूपः सर्वविषापहः ॥६ ॥
। मुनिपत्रैः कृतस्वेदं दष्टं काञ्जिकपाचितैः ॥७ ॥
। सतैलं मूषिकार्तिघ्नं फलिनीकुसुमं तथा ॥८ ॥
। चिकित्सा विंशतिः प्रोक्ता लूता विषहरो गणः ॥९ ॥
॥ निर्गुण्डी सारिवा शेलु लूतार्तं सेचयेज्जलैः ॥१० ॥
। करञ्जास्थि च तत्पङ्कैर्वृश्चिकार्तिहरं शृणु ॥११ ॥
। संयोज्याश्चतुरो योगा लेपादौ वृश्चिकापहाः ॥ १२ ॥
किरि किरि भिन्द भिन्द खड्गेन च्छेदय च्छेदय ॥१३ ॥
। त्रिफलोशीरमुस्ताम्बुमांसीपद्मकचन्दनम् ॥१४ ॥
। हरेच्छिरीषपञ्चांगव्योषं शतपदीविषम् ॥१५ ॥
करना चाहिए ॥ २-४ ॥ घृत, मधु और शकृत्तोय ( पशु विष्ठा का जल ) नाड़ियों में फैले हुए विष को भी दूर कर देते हैं । गजपीपरि के समस्त अङ्ग, दुग्ध और घी के सहित मधु को पीने से सर्प विष दूर होता है । सोंठ, मिर्च, पीपरि, मयूरपिच्छ, विडाल की हड्डी, नेवले के रोयें इन सबके सम भाग को पीसकर भेड़ के दूध में मिलाकर धूप देने से सब प्रकार का विष दूर हो जाता है । सिन्धुवार, अश्वगन्धा तथा लहसुन भी विषनाशक है । काञ्जी के रस में पकाये हुए अगस्त्य ( वृक्ष ) के पत्तों से धूनी देने से भी सर्प विष दूर हो जाता है ॥५-७ ॥ मूषकों के सोलह भेद बताये गये हैं । उनके काटने पर कपास के पत्तों का रस पीना चाहिए । फलिनी लता के फूलों के रस को तेल के साथ पीने से भी मूषकों का विष शान्त हो जाता है । मूषक के काटने पर उसके विष से उत्पन्न पीड़ा को दूर करने के लिए गुड़ के साथ नागरमोथा का सेवन करना चाहिए । लूता ( रोग-विशेष जिसमें शरीर में फुंसियाँ निकल आती हैं अथवा मकड़ी के मूत्रोत्सर्ग से उत्पन्न होनेवाली फुंसियाँ ) आदि के विषों की चिकित्सा बीस प्रकार से बतायी गयी है ॥८ - ९ ॥ लूता के रोगी के लिए पद्मक, पाटली, अश्वगन्धा, तगर की जड़, खस, चन्दन, म्योड़ी, सारिवा, शेलु ओषधियाँ लाभदायक हुआ करती हैं । लूता के रोगी का उक्त ओषधियों के जल से सेचन करना चाहिए । घुँघुची, म्योड़ी, कंकोल के पत्र, सोंठ, दोनों हल्दी, करञ्जा की छाल तथा उसके लेप से लूता विष से पीड़ित रोगी की पीड़ा दूर होती है । अब बिच्छू के विष को दूर करनेवाली ओषधियों को सुनो ॥१०-११ ॥ मञ्जिष्ठ, चन्दन, व्योष ( सोंठ, मिर्च, पीपरि ), कोकाबेली और शिरीष पुष्प के लेप से बिच्छू की पीड़ा शान्त होती है । ‘ ॐ नमो भगवते “ ॐ हूं फट्- ' -मन्त्र से अभिमन्त्रित त्रिफला ( आँवला, हर्रा, बहेड़ा ), खस, नागरमोथा, रास्नालता, जटामासी, पद्मक और चन्दन को बकरी के दूध में पीने से गर्दभादि के काटने का विष शान्त हो जाता है ॥१२-१४३ ॥ १ क. ङ. ' रीद्वारा वि ' । २ ' चिकित्सा विंशतिः प्रोक्ता ' इत आरभ्य " त्वरिताज्ञानमाख्यास्ये " इत्यस्मात्प्रागध्यायदशक-परिमितोः क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ३४ अग्निपुराणम् सकन्धरं शिरीषास्थि हरेदुन्दूरजं विषम् क्षारव्योषवचाहिङ्गुविडङ्गं सैन्धवं नतम् यष्टिव्योषगुडक्षीरयोगः ' शुनो विषापहः ॐ सुभद्रायै नमः, ॐ सुप्रभायै नमः यान्यौषधानि गृह्यन्ते विधानेन विना जनैः तां प्रणम्यौषधीम् पश्चाद्यवान्प्रक्षिप्य मुष्टिना त्वामुद्धराम्यूर्ध्वनेत्रामनेनैव च भक्षयेत् आत्मनैवाभिजानाति रणे कृष्ण पराजयम् नमो वैदूर्यमात्रे ' तत्र रक्ष रक्ष मां सर्वविषेभ्यो औषधादी प्रयोक्तव्यो मन्त्रोऽयं स्थाविरे विषे पाययेत्सघृतं क्षौद्रं विषिञ्चेत्तदनन्तरम् । व्योषं ससर्पिः पिण्डीतमूलमस्य विषं हरेत् ॥ १६ ॥
। अम्बष्ठाऽतिबला कुष्ठं सर्वकीटविषं हरेत् ॥ ॥१७ ॥
॥१८ ॥
1 । तेषां बीजं त्वया ग्राह्यमिति ब्रह्माऽब्रवीच्च ताम् ॥१९ ॥
। दश जप्त्वा मन्त्रमिमं नमस्कुर्यात्तदौषधम् ॥२० ॥
। नमः पुरुषसिंहाय नमो गोपालकाय च ॥२१ ॥
। अनेन सत्यवाक्येन अगदो मेऽस्तु सिध्यतु ॥ २२ ॥
गौरि गान्धारि चाण्डालि मातङ्गिनि स्वाहा हरिमाये ॥ २३ ॥
। मुक्तमात्रे स्थिते ज्वाले पद्मशीताम्बुसेवितम् ॥ ॥२४ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये गोनसादिचिकित्साकथनं नामाष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ८ ॥ शतपदी ( गोजर ) नामक कीट के काटने का विष शिरीष पुष्प के पञ्चांग ( मूल, छाल, पत्ते, पुष्प और फल ) के साथ सोंठ, मिर्च और पीपरि के सेवन से शान्त हो जाता है । शाखा सहित शिरीष पुष्प की छाल छछुन्दर के विष को शान्त करती है । व्योष ( सोंठ, मिर्च और पीपरि ), बच, हींग, विडङ्ग, सेंधानमक, नत ( तगर की जड़ ), ब्राह्मी लता, अतिबला तथा कुष्ठ का लेप सभी कीड़ों का विष दूर करता है ॥१५ - १६३ ॥ यष्टि, व्योष ( सोंठ, मिर्च, पीपरि, गुड़ तथा दूध ) के मिश्रण से कुत्ते का विष दूर हो जाता है । ब्रह्मा ने सुभद्रा और सुप्रभा से कहा कि जिन ओषधियों को मनुष्य बिना किसी विधान के ग्रहण करते हैं उन ओषधियों की शक्ति तुमको ले लेना चाहिए । अतः मनुष्य को योग्य है कि किसी भी ओषधि को ग्रहण करते समय ' ॐ सुभद्रायै नमः ', ' ॐ सुप्रभायै नमः ' - इस मन्त्र का उच्चारण करे । इस मन्त्र से ओषधि को प्रणाम करके तत्पश्चात् मुट्ठी भर यव ( इधर - उधर फेंकना चाहिए । उपर्युक्त मन्त्र का दस बार पुनः जप करके उस ओषधि को प्रणाम करना चाहिए ॥१७-२० ॥ ' अयि ओषधि! मैं तुम्हें प्रबुद्ध कर रहा हूँ, ' नेत्र को ऊपर करो ', ऐसा कहते हुए ओषधि को उखाड़ना चाहिए और निम्नांकित मन्त्र से उसका भक्षण करना चाहिए । ' भगवन् नृसिंह को नमस्कार है, गोपालक ( भगवान् कृष्ण ) को नमस्कार है । अयि कृष्ण! आप युद्ध में अपने से ही पराजित होते हैं ( किसी अन्य से नहीं ), इस सत्य वाक्य से मुझमें नीरोगता हो और औषध मेरे लिये सिद्ध हो । ' स्थावर विष ( को दूर करने ) में औषध प्रयोग के पूर्व ' नमो वैदूर्यमात्रे स्वाहा हरिमाये ' मन्त्र का प्रयोग कर लेना चाहिए । यदि विष केवल खाया ही गया हो तो कमल और शीतल जल का प्रयोग करना चाहिए । ( शरीर में ) विष शेष रह जाने पर घी और मधु मिलाकर पिलाना चाहिए और ( विष से उत्पन्न ) जलन का अनुभव होने पर रोगी को स्नान कराना चाहिए ॥ २१-२४ ॥ श्री अग्निमहापुराण में गोनसादिचिकित्सा - कथन नामक दो सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥२९ ८ ॥ १ ख. ग. ' गः खिलवि । च. ' गः स्यातु वि ० । २ छ. तन्नर । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ ३५ अथ नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः बालादिग्रहहरबालतन्त्रम् अग्निरुवाच बालतन्त्रं प्रवक्ष्यामि बालादिग्रहमर्दनम् गात्रोद्वेगो निराहारो नानाग्रीवाविवर्तनम् मत्स्यमांससुराभक्ष्यगन्धस्त्रग्धूपदीपकैः महिषाक्षेण धूपश्च द्विरात्रे भीषणी ग्रही अजामूत्रयुतैः कृष्णा सेव्याऽपामार्गचन्दनैः ग्रही त्रिरात्रे घण्टाली तच्चेष्टा क्रन्दनं मुहुः । केशराञ्जनगोहस्तिदन्तं साजपयो लिपेत् ॥ अथ जातदिने वत्सं ग्रही गृह्णाति पापिनी ॥ १ ॥
। तच्चेष्टितमिदं तत्स्यान्मातॄणां च बलं हरेत् ॥ २ ॥
। लिम् धातकीलोध्रमञ्जिष्ठातालचन्दनैः ॥३ ॥
। तच्चेष्टा कासनिःश्वासौ गात्रसंकोचनं मुहुः ॥४ ॥
। गोशृङ्गदन्तकेशैश्च धूपयेत्पूर्ववद्बलिः ॥ ५ ॥
जृम्भणं स्वनितं त्रासो गात्रोद्वेगमरोचनम् ॥६ ॥
नखराजीबिल्वदलैर्धूपयेच्च बलिं हरेत् ॥७ ॥
अध्याय २ ९९ बालादिग्रहहर - बालतन्त्र अग्निदेव बोले- ( अब ) मैं बालक आदि के ग्रहजन्य दोषों को दूर करनेवाले बालतन्त्र का वर्णन कर रहा हूँ । पापिनी नाम की ग्रही ( स्त्री ग्रह ) बालक के जन्म के दिन से ही बच्चे को पकड़ लेती है । उसके आक्रमण करते ही बच्चे के अंगों में पीड़ा होती है, वह भोजन छोड़ देता है तथा उसकी गर्दन में मरोड़ उत्पन्न हो जाता है, यह तो बच्चे की दशा हो जाती है, उधर माता का भी बल क्षीण हो जाता है ॥ १-२ ॥ ग्रही की शान्ति के लिए मछली, मांस, मद्य आदि भक्ष्य पदार्थों की बलि देकर तथा माल्य और धूप, दीप आदि से उसे प्रसन्न करना चाहिए और बच्चे के शरीर के ऊपर धातकी, लोध्र, मंजीठ, ताल, चन्दन आदि का लेप करना चाहिए । और गुग्गुल से धूप देना चाहिए । रात्रि में भीषणी नाम की ग्रही बालक को पकड़ लेती है । उसके द्वारा अभिभूत होने पर बच्चे को खाँसी आती है, श्वास चलने लगती है तथा शरीर में बार - बार सिकुड़न उत्पन्न हो जाती है । उसकी शान्ति के लिए लटजीरा, चन्दन और बकरी के मूत्र के साथ गजपीपरि का सेवन कराना चाहिए । साथ ही, गोशृङ्ग, बबूल, गोदन्त ( हड़ताल ) और गोकेश की धूप देनी चाहिए तथा उसे भी पूर्ववत् मछली और मांसादि की बलि देनी चाहिए ॥३-५ ॥ तीसरी रात्रि में बालक को घण्टाली नाम की ग्रही पीड़ित करती है, इससे बच्चा बारम्बार रोता है, बार - बार जम्हाई लेता है, चिल्लाता है, भय की मुद्रा दिखलाता है, अंगों में उद्विग्नता होने लगती है तथा उसे कोई भी वस्तु अच्छी नहीं लगती । इस ग्रही के द्वारा गृहीत बालक के ऊपर बकरी के दूध में केसर, अञ्जन, गोदन्त ( हड़ताल ) तथा हस्तिदन्त को मिलाकर लेप करना चाहिए और नख, श्वेत सरसों तथा बेल के पत्तों की धूप देकर ( ग्रही के लिए ) बलि देनी CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ३६ अग्निपुराणम् ग्रही चतुर्थी काकोली गात्रोद्वेगः प्ररोचनम् । गजदन्ताहिनिर्मोकवाजिमूत्रप्रलेपनम् । हंसाधिका पञ्चमी स्याज्जृम्भाश्वासोर्ध्वधारिणी । मेषशृंगबलालोध्रशिलातालैः शिशुं लिपेत् । निराहारोऽङ्गविक्षेपो हरेन्मत्स्यादिना बलिम् । सप्तमे मुक्तकेश्यार्तः पूतिगन्धो विजृम्भणम् । बचागोमयगोमूत्रैः श्रीदण्डी चाष्टमे ग्रही । बलिः पूर्वैश्च मत्स्त्याद्यैर्धूपलेपे च हिङ्गुना ।
उद्वेजनोर्ध्वनिःश्वासः स्वमुष्टिद्वयखादनम् ।
फेनोद्गारो दिशो दृष्टि: कुल्माषैः सासवैर्बलिः ॥ ८ ॥
सराजीनिम्बपत्रेण ' वृककेशेन धूपयेत् ॥९ ॥
मुष्टिबन्धश्च तच्चेष्टा बलिं मत्स्यादिना हरेत् ॥१० ॥
फट्कारी तु ग्रही षष्ठी भयमोहप्ररोदनम् ॥ ११ ॥
राजी गुग्गुलुकुष्ठेभदन्ताद्यैर्धूपलेपनैः ॥ १२ ॥
नादः प्ररोदनं कासो धूपो व्याघ्रनखैलिपेत् ॥१३ ॥
दिशो निरीक्षणं जिह्वाचालनं कासरोदनम् ॥१४ ॥
वचासिद्धार्थलशुनैश्चोर्ध्वग्राही महाग्रही ॥१५ ॥
रक्तचन्दनकुष्ठाद्यैर्धूपयेल्लेपयेच्छिशुम् ॥ १६ ॥
चाहिए । चतुर्थ रात्रि में ( बालक को पीड़ित करनेवाली ) ग्रही का नाम काकोली है । उसके द्वारा पीड़ित बालक के शरीर में पीड़ा होती है, वह चिल्लाता है, उसके मुख से फेन ( झाग ) गिरता है और वह भौचक्का इधर - उधर देखता रहता है । इसकी शान्ति के लिए मदिरा के साथ कुल्थी की बलि देनी चाहिए ॥६-८ ॥ बालक के ऊपर गजदन्त, सर्प की केंचुल तथा घोड़े के मूत्र का लेप करना चाहिए । नीम के पत्ते, सरसों तथा भेड़िये के बालों से धूप देना चाहिए । पञ्चमी रात्रि में बालक को पीड़ित करनेवाली ग्रही का नाम हंसाधिका है । इसके द्वारा आक्रान्त बालक ( बार-बार ) जम्हाई लेता है । उसकी श्वास ऊपर की ओर चलने लगती है और वह बारम्बार मुट्ठी बाँधता है । इसकी शान्ति के लिए मछली, मांस, सुरा आदि की बलि देनी चाहिए ॥९ - १० ॥ इसमें बच्चे के ऊपर भेंड़ की सींग, बलालता, लोध्र तथा शिलाताल से लेप करना चाहिए । छठी ग्रही का नाम फट्कारी है । इसके द्वारा पीड़ित शिशु भयभीत रहता है, मूर्च्छित हो जाता है, रोता है, आहार त्याग देता है और अंगों को इधर - उधर फेंकने लगता है । उसकी शान्ति के लिए मछली एवं मांस आदि की बलि देनी चाहिए तथा सरसों, गुग्गुल, कुष्ठ और गजदन्त आदि की धूप देकर इन्हीं का लेप करना चाहिए ॥११-१२ ॥ सातवें दिन की ग्रही का नाम मुक्तकेशी है । इसके द्वारा पीड़ित शिशु के शरीर से दुर्गन्ध आने लगती है । वह जम्हाई लेता है, जोर - जोर से शब्द करता है, रोता है और खाँसता है । उसकी शान्ति के लिए व्याघ्रनख से धूप देना चाहिए । बच तथा गाय के गोबर एवं मूत्र से शिशु के ऊपर लेप करना ( भी ) लाभदायक है । आठवें दिन बालक को पीड़ित करनेवाली ग्रही का नाम श्रीदण्डी है । उसके द्वारा आक्रान्त शिशु इधर-उधर भौचक्का - सा देखता है, बार - बार जीभ हिलाता है, खाँसता है और रोता है ॥१३-१४ ॥ उसकी शान्ति के लिए पहले कहे हुए मछली और मांस आदि से बलि देनी चाहिए । हींग की धूप देकर बच्चे के शरीर में हींग, बच, सरसों तथा लहसुन का लेप करना चाहिए । नवें दिन बालक को पीड़ित करनेवाली ग्रही का नाम है ऊर्ध्वग्राही । इसके द्वारा पीड़ित बालक सदा विह्वल रहता है, उल्टी श्वास लेता है और अपनी दोनों मुट्ठियों को मुख में डालता है । इस ग्रही के द्वारा अभिभूत बालक को नीरोग करने के लिए रक्तचन्दन, कुष्ठ तथा वानर के नख एवं रोम आदि का धूप देना चाहिए और ( बालक के ऊपर ) लाल चन्दन आदि इन्हीं वस्तुओं का लेप करना चाहिए । दसवें दिन बालक १ ख. घृतकेशेन । छ. घूतकेशेन । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA