अग्नि पुराण — पृष्ठ 941–950
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 941–950
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नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ९ ३७
कपिरोमनखैर्धूपो दशमी रोदनी ग्रही । तच्चेष्टा रोदनं शश्वत्सुगन्धो नीलवर्णता ॥१७ ॥
धूपो निम्बेन भूतोग्रराजीसर्जरसैर्लिपेत् । बलिं बहिर्हरेल्लाजकुल्माषकरकौदनम् यावत्त्रयोदशाहं स्यादेवं धूपादिका क्रिया काकवद्रोदनं श्वासो मूत्रगन्धोऽक्षिमीलनम् पीतवस्त्रं ददेद्रक्तस्रग्गन्धैस्तैलदीपकः करञ्जाधो यमदिशि सप्ताहं तैर्बलिं हरेत् छर्दिः स्यान्मुखशोषादि पुष्पगन्धांशुकानि च तृतीये गोमुखी निद्रा सविण्मूत्रप्ररोदनम् क्षीरं पूर्वे ददेन्मध्येऽहनि धूपश्च सर्पिषा तनुः शीता पूतिगन्धः शोषः स म्रियते ध्रुवम् ॥१८ ॥
। गृह्णाति मासिकं वत्सं पूतना ' शकुनी ग्रही ॥१९ ॥
। गोमूत्रस्नपनं तस्य गोदन्तेन च धूपनम् ॥२० ॥
। त्रिविधं पायसं मद्यं तिलं मांसं चतुर्विधम् ॥२१ ॥
। द्विमासिकं च मुकुटा वपुः पीतं च शीतलम् ॥२२ ॥
। अपूपमोदनं दीपः ' कृष्णनीरादिधूपकम् ॥२३ ॥
। यवाः प्रियङ्गुः पललं कुल्माषं शाकमोदनम् ॥२४ ॥
। पञ्चभङ्गेन तत्स्नानं चतुर्थे पिङ्गलाऽऽर्तिकृत् ॥२५ ॥
। पञ्चमी ललना गात्रसादः स्यान्मुखशोषणम् ॥२६ ॥
को आक्रान्त करनेवाली ग्रही का नाम रोदनी है ॥१५- १६३ ॥ इस ग्रही के प्रभाव से शिशु रोता है, उसके शरीर से कुछ सुगन्धि निकलती है और उसका वर्ण कुछ नीला हो जाता है । इसकी शान्ति के लिए नीम की धूप करनी चाहिए और वत्सनाभ, श्वेत सरसों तथा सर्ज वृक्ष के रस को मिलाकर ( उसके शरीर पर लेप करना चाहिए । खील, कुल्थी, नारियल तथा चावल आदि की बलि भी ( घर के ) बाहर देनी चाहिए ॥१७-१८ ॥ इसी प्रकार तेरहवें दिन तक धूपादि करते रहना चाहिए । एक मास के बच्चे के ऊपर दुष्टा पक्षी का रूप धारण करनेवाली पूतना ग्रही का आक्रमण होता है । उसके द्वारा आक्रान्त बच्चा कौए के समान रोता है, लम्बी - लम्बी श्वास छोड़ता है, उसके मूत्र में विशेष प्रकार की गन्ध उत्पन्न हो जाती है और बच्चा बार - बार नेत्र मूँदता है । उसकी शान्ति के लिए बच्चे को गोमूत्र में स्नान कराना चाहिए तथा गोदन्त ( हड़ताल ) से धूप देनी चाहिए ॥१९ -२० ॥ रक्तमाल्य और रक्तचन्दन के साथ पीले वस्त्र का दान देना चाहिए, तेल का दीपक जलाना चाहिए तथा तीन प्रकार की खीर, मदिरा, तिल और चार प्रकार के उड़द की बलि देनी चाहिए । यह बलि दक्षिण दिशा में करञ्ज वृक्ष के नीचे सात दिनों तक देते रहना चाहिए । दो मास के शिशु को ' मुकुटा ' नाम की ग्रही पकड़ती है । इससे बच्चे का शरीर पीला और ठण्डा पड़ जाता है ॥२१-२२ ॥ बार - बार वमन करता है तथा उसके मुख में खुश्की आती है । इसकी शान्ति हेतु पुष्प, गन्ध और वस्त्रादि का दान करना चाहिए । अपूप ( पुआ ), चावल आदि की बलि देनी चाहिए तथा कालागुरु आदि से धूप, दीप देना चाहिए । तृतीय मास की ग्रही का नाम गोमुखी है । इसके द्वारा आक्रान्त शिशु को निद्रा अधिक सताती है । वह मल, मूत्र अधिक विसर्जित करता है तथा रोता भी अधिक है । इसकी शान्ति के लिए दिन के पूर्व भाग में यव, प्रियंगु लता, मांस, कुल्थी, शाक, चावल तथा दूध की बलि देनी चाहिए । मध्याह्न काल में घृत से धूप देकर पञ्चभङ्ग से स्नान कराना चाहिए । चतुर्थ मास की ग्रही का नाम पिङ्गला है जो कि अत्यन्त पीड़ादायिनी होती है ॥ २३-२५ ॥ उसके द्वारा आक्रान्त शिशु का शरीर अत्यधिक शीतल रहता है और शरीर से दुर्गन्ध निकलती है और गला सूख जाता है । वह बालक निश्चय ही मर जाता है । पञ्चम मास की ग्रही का नाम ललना है । उससे आक्रान्त शिशु का शरीर दुर्बल हो जाता १ ख. शकुली । छ. संकुली । २ छ. कृष्णं नी । ३ च. छ. पलनं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ३८ अग्निपुराणम् अपानः पीतवर्णश्च मत्स्याद्यैर्दक्षिणे बलिः । मत्स्यमांससुराभक्तपुष्पगन्धादिभिर्बलिः । पिष्टमांससुरामांसैर्बलिः स्याद्यमुनाष्टमे । नवमे कुम्भकर्ण्यार्तो ज्वरी छर्दति पालके । दशमे तापसी चेष्टा निराहारोऽक्षिमीलनम् । राक्षस्येकादशी पीडा ' नेत्रादौ न चिकित्सतम् । बलिः पूर्वेऽथ मध्याह्ने कुल्माषाद्यैस्तिलादिभिः । तिलमांसमद्यमांसैर्बलिः स्नानादि पूर्ववत् ।
गुडौदनं तिलापूपः प्रतिमा तिलपिष्टजा ।
षण्मासे पङ्कजा चेष्टा रोदनं विकृतस्वरः ॥२७ ॥
सप्तमे तु निराहारा पूतिगन्धादिदन्तरुक् ॥ २८ ॥
विस्फोटशोषणाद्यं स्यात्तच्चिकित्सां न कारयेत् ॥२९ ॥
रोदनं मांसकुल्माषमद्याद्यैरैशके बलिः ॥ ३० ॥
घण्टा पताका ' पिष्टाक्ता सुरामांसबलिः समे ॥ ३१ ॥
' चञ्चला द्वादशे श्वासस्त्रासादिकविचेष्टितम् ॥३२ ॥
यातना तु द्वितीयेऽब्दे यातनं रोदनादिकम् ॥३३ ॥
तृतीये रोदनी कम्पो रोदनं रक्तमूत्रकम् ॥३४ ॥
तिलस्नानं पञ्चपत्रैर्धूपो राजफलत्वचा ॥३५ ॥
है, मुख में खुश्की आ जाती है, अपान वायु का प्रकोप अधिक हो जाता है और उसका वर्ण पीला पड़ जाता है । इसकी शान्ति के लिए मछली और मांसादि से दक्षिण दिशा में बलि देनी चाहिए । छठे मास की ग्रही का नाम पङ्कजा है । उसके द्वारा आक्रान्त बालक रोता अधिक है और उसके शरीर में विकार उत्पन्न हो जाता है । उसकी शान्ति के लिए मछली, मांस, सुरा, भात, पुष्प, गन्ध आदि की बलि देनी चाहिए । सातवें मास की ग्रही का नाम निराहारा है, इसके द्वारा पीड़ित बालक के शरीर से तीव्र गन्ध निकलती है और बालक के दाँत उगने की पीड़ा होती है । इसकी शान्ति के लिए पिसे हुए उड़द की पीठी, सुरा तथा मांस की बलि देनी चाहिए । आठवें मास की ग्रही का नाम यमुना है । इसके द्वारा पीड़ित बालक के बहुत - से फोड़े निकल आते हैं तथा उसका शरीर सूखकर काँटा हो जाता है । इसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिए ॥ २६-२९ ॥ नवम मास की ग्रही कुम्भकर्णी है । इससे आक्रान्त शिशु ज्वर र - - पीड़ित रहता है, व्याकुलतावश रक्षक के ऊपर ही वमन कर देता है और अत्यधिक रोता - चिल्लाता है । इसकी शान्ति के लिए ईशानकोण में उड़द, कुल्थी, मद्य आदि की बलि देनी चाहिए । दसवें मास की ग्रही का नाम तापसी है । इसके द्वारा आक्रान्त शिशु कुछ खाता नहीं है और रह - रहकर नेत्र बन्द करता रहता है । इसकी शान्ति के लिए घण्टा, पताका तथा पिष्टान्न आदि का दान करना चाहिए तथा सुरा, मांस आदि की बलि देनी चाहिए । ग्यारहवीं ग्रही का नाम राक्षसी है । यह शिशु के नेत्रों में पीड़ा उत्पन्न करती है । इसकी कोई ओषधि नहीं है । बारहवें मास की ग्रही का नाम चञ्चला है । इसके द्वारा आक्रान्त होने पर बच्चे की श्वास गति वेग से चलने लगती है और बच्चा भयभीत - सा होकर चेष्टाएँ करने लगता है ॥३०-३२ ॥ इसकी शान्ति के लिए मध्याह्न में पूर्व दिशा में कुल्थी तथा तिल आदि से बलि देनी चाहिए । द्वितीय वर्ष में बालक को पीड़ित करनेवाली ग्रही का नाम ' यातना ' है । वह बच्चों को अनेक प्रकार की यातनाएँ दिया करती है तथा बच्चे को अत्यधिक रुलाती है । इसकी शान्ति के लिए तिल, उड़द, मदिरा और मांस आदि की बलि देनी चाहिए । तथा बालक को पूर्ववत् स्नान कराना चाहिए । तृतीय वर्ष की ग्रही का नाम रोदनी है जिसके आक्रमण से बच्चा रोता तथा काँपता है और उसका मूत्र लाल हो जाता है । इसकी शान्ति के लिए गुड़, चावल, तिल, अपूप ( पुआ ) और तिल के चूर्ण से बनी हुई प्रतिमा का दान करना चाहिए । बालक को तिलमिश्रित जल से स्नान कराकर पंचपल्लव तथा राजफल ( परवल ) के छिलके से धूप देनी चाहिए ॥३३-३५ ॥ चतुर्थ वर्ष १ ख. च. छ. पिष्टोक्ता । २ छ. नेन्नाद्यं । ३ ' चञ्चला विचेष्टितम् गु पुस्तके जास्ति । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by 33
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नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः चतुर्थे चटकाशोफो ज्वरः सर्वाङ्गसादनम् चञ्चला पञ्चमेऽब्दे तु ज्वरस्त्रासोऽङ्गसादनम् पलाशोदुम्बुराश्वत्थवटबिल्वदलाम्बुधृक् । सप्ताहोभिर्बलिः पूर्वैर्धूपः स्नानं च भृङ्गकैः । मांसपायसमद्याद्यैर्बलिः स्नानं च धूपनम् । कृशरापूपदध्याद्यैर्बलिः स्नानं च धूपनम् । बलिः स्यात्कृशरापूपसक्तुकुल्माषपायसैः । पोलिकापूपदध्यन्नैः पञ्चरात्रं बलिं हरेत् । देवदूती निष्ठुरवाग्बलिर्लेपादि पूर्ववत् । त्रयोदशे वायवी च मुखरोगोऽङ्गसादनम् । ९ ३ ९ । मत्स्यमांसतिलाद्यैश्च बलिः स्नानं च धूपनम् ॥३६ ॥
। मांसौदनाद्यैश्च बलिर्मेषशृङ्गेण धूपनम् ॥ ३७ ॥
षष्ठेऽब्दे धावनी शोषो वैरस्यं गात्रसादनम् ॥ ३८ ॥
सप्तमे यमुना ' छर्दिरवचोहासरोदनम् ॥३९ ॥
अष्टमे वा जातवेदा निराहारं प्ररोदनम् ॥४० ॥
कालाब्दे नवमे बाह्वोरास्फोटो गर्जनं भयम् ॥४१ ॥
दशमेऽब्दे कलहंसी दाहोऽङ्गकृशता ज्वरः ॥४२ ॥
निम्बधूपकुष्ठलेपावेकादशमके ग्रही ॥४३ ॥
बलिका द्वादशे श्वासो बलिलेपादि पूर्ववत् ॥ ४४ ॥
रक्तान्नगन्धमाल्याद्यैर्बलिः पञ्चदलैः स्नपेत् ॥४५ ॥
की ग्रही का नाम चटका है । इससे आक्रान्त बालक ज्वरग्रस्त हो जाता है और उसके समस्त अङ्गों में क्षीणता तथा सूजन उत्पन्न हो जाती है । इसकी शान्ति के लिए मछली, मांस तथा तिल आदि की बलि देनी चाहिए । बालक को स्नान कराना चाहिए, उसे धूप भी देनी चाहिए । पञ्चम वर्षवाली ग्रही का नाम चञ्चला है । इसका आक्रमण होने पर शिशु को ज्वर आता है, वह भयभीत बना रहता है, उसके अङ्गों में दुर्बलता आ जाती है । इसके प्रशमनार्थ मांस और चावल की बलि देकर भेंड़ के सींग, पलाश, गूलर, पीपल, बरगद, बेलपत्र तथा रास्ना नामक ओषधि के चूर्ण को मिलाकर धूप देना चाहिए । छठें वर्ष की ग्रही का नाम ' धावनी ' है । इससे आक्रान्त शिशु के शरीर में शोष उत्पन्न हो जाता है, वह सूख जाता है और उसमें दुर्बलता आ जाती है ॥ ३६-३८ ॥ इसकी शान्ति के लिए प्रति सप्ताह धूप तथा बलि देनी चाहिए और भृङ्ग नामक ओषधि मिश्रित जल से बालक को स्नान कराना चाहिए । सप्तम वर्ष की ग्रही का नाम यमुना है । इससे आक्रान्त बालक वमन अधिक करता है, जीभ लड़खड़ाने लगती है । खूब हँसता है और रोता है । इसके दोष के प्रशमन के लिए मांस, खीर तथा मदिरा आदि की बलि देनी चाहिए तथा बालक को स्नान कराकर उसे धूप देनी चाहिए । आठवें वर्ष की ग्रही का नाम ‘ जातवेदा ' है । इसके द्वारा अभिभूत बालक आहार छोड़ देता है और रोता रहता है । इसकी शान्ति के लिए खिचड़ी, अपूप ( पुआ ) तथा दधि आदि की बलि देनी चाहिए, शिशु को स्नान कराना चाहिए और धूप देनी चाहिए । नवें वर्ष की ग्रही का नाम काला है । इसके द्वारा आक्रान्त बालक बाहु के जोड़ों को फोड़ता है, घोर शब्द करता है तथा भयभीत रहता है । इसकी शान्ति के लिए खिचड़ी, अपूप, सत्तू, कुल्थी और खीर की बलि देनी चाहिए ॥३९ -४१३ ॥ दसवें वर्ष की ग्रही का नाम कलहंसी है । यह बच्चे के शरीर में दाह, अंगों में कृशता तथा ज्वर पैदा करती है । इसकी शान्ति के लिए पञ्चरात्रि तक गेहूँ की रोटी, अपूप ( पुआ ) तथा दहीबड़े की बलि देनी चाहिए । नीम के पत्र आदि की धूप करनी चाहिए और शरीर में कुष्ठ नामक ओषधि का लेप करना चाहिए । ग्यारहवें वर्ष की ग्रही का नाम देवदूती है । उसके द्वारा अभिभूत बालक कठोर वाणी बोलता है । उसकी शान्ति के लिए पूर्ववत् बलि देकर उसके शरीर पर लेप करना चाहिए । बारहवें वर्ष की ग्रही का नाम बलिका है । इसके द्वारा आक्रान्त बालक जल्दी - जल्दी श्वास लेने लगता है । उसकी शान्ति के लिए पूर्ववत् बलि और लेप आदि होनी चाहिए । तेरहवें वर्ष की ग्रही का नाम वायवी है । इसके द्वारा आक्रान्त बालक के मुख में ( नाना प्रकार के ) रोग पैदा हो जाते हैं तथा वह शरीर से क्षीण हो जाता है । उसकी शान्ति के लिए रक्त, अन्न, गन्ध, माल्य आदि की बलि देनी चाहिए तथा आम, बरगद, पीपल, पाकड़ तथा गूलर आदि के पत्तों ( के जल ) से स्नान कराना चाहिए ॥४२-४५ ॥ १ ख. ग. र्दिर्न रावो हास । २ छ. खवाह्याङ्ग ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ४० अग्निपुराणम् राजीनिम्बदलैर्धूपो यक्षिणी च चतुर्दशे । चेष्टा शूलो ज्वरो दाहो ' मांसभक्ष्यादिकैर्बलिः ॥ ४६ ॥
स्नानादि पूर्ववच्छान्त्यै मुण्डिकार्तिस्त्रिपञ्चके । तच्चेष्टाऽसृक्स्स्रवः शश्वत्कुर्यान्मातृचिकित्सनम् ॥४७ ॥
वानरी षोडशी भूमौ पतेन्निद्रा सदा ज्वरः । पायसाद्यैस्त्रिरात्रं च बलिः स्नानादि पूर्ववत् ॥४८ ॥
गन्धवती सप्तदशे गात्रोद्वेगः प्ररोदनम् ॥ कुल्माषाद्यैर्बलिः स्नानधूपलेपादि पूर्ववत् ॥ ॥४९ ४ ९ ॥ ॥ दिनेशाः पूतना नाम वर्षेशाः ` सुकुमारिकाः 114011 ॐ नमः सर्वमातृभ्यो बालपीडासंयोगं भुञ्ज भुञ्ज चुट चुट स्फोटय स्फोटय स्फुर स्फुर गृह्ण ` गृह्णाऽऽक्रन्दयाऽऽक्रन्दय, एवं सिद्धरूपो ज्ञापयति ॥५१ ॥
हर हर निर्दोषं कुरु कुरु बालिकां बालं स्त्रियं पुरुषं वा, सर्वग्रहाणामुपक्रमात् । चामुण्डे नमो देव्यै ह्रं हूं ह्री मपसरापसर दुष्टग्रहान्ह्रूं तद्यथा गच्छन्तु गृह्यकाः, अन्यत्र पन्थानं रुद्रो ज्ञापयति ॥५२ ॥
सर्वबालग्रहेषु स्यान्मन्त्रोऽयं सर्वकामदः ॥५३ ॥
ॐ नमो भगवति चामुण्डे मुञ्च मुञ्च ' बालं बालिकां वा बलिं गृह्ण गृह्ण जय जय वस वस ॥५४ ॥
सर्वत्र बलिदानेऽयं रक्षाकृत्पठ्यते मनुः । ब्रह्मा विष्णुः शिवः स्कन्दो गौरी लक्ष्मीर्गणादयः रक्षन्तु ज्वरदाहार्तं मुञ्चन्तु च कुमारकम् ॥५५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये बालग्रहहरबालतन्त्रकथनं नाम नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥२९९ ॥
श्वेत सरसों तथा नीम के पत्तों से धूप देना भी लाभदायक है । चौदहवें वर्ष की ग्रही का नाम यक्षिणी है । उसके द्वारा गृहीत बालक शरीर में शूल का अनुभव करता है, ज्वर से पीड़ित रहता है और उसके शरीर में जलन होती रहती है । इसकी शान्ति के लिए मांस तथा मछली आदि की बलि देनी चाहिए तथा पूर्ववत् स्नान, धूप आदि भी होना चाहिए । पन्द्रहवें वर्ष की ग्रही का नाम मुण्डिका है । इसके द्वारा पीड़ित बालक के निरन्तर रक्त प्रवाहित होता रहता है । इसकी चिकित्सा शीघ्र ही करनी चाहिए । सोलहवें वर्ष की ग्रही का नाम वानरी है । इसके द्वारा गृहीत बालक बारम्बार भूमि पर गिरता है, उसे नींद अधिक आती है और उसके शरीर में सदा ही ज्वर बना रहता है । उसकी शान्ति के लिए तीन रात तक खीर आदि की बलि देनी चाहिए तथा बालक को पूर्ववत् स्नान आदि कराना चाहिए ॥४६-४८ ॥ सत्रहवें वर्ष की ग्रही का नाम गन्धवती होता है । इसके द्वारा पीड़ित बालक शारीरिक उद्वेग का अनुभव करता है और रोता अधिक है । इसकी शान्ति के लिए कुल्थी आदि की बलि देकर उसे पूर्ववत् स्नान कराना और धूप देना चाहिए । ये ग्रहियाँ दिनों की स्वामिनी ‘ पूतना ’ के नाम से तथा वर्षों की स्वामिनी ' सुकुमारी ' के नामों से भी प्रसिद्ध हैं ॥४९ -५० ॥ ' ॐ नमः सर्वमातृभ्यो वस वस ' यह रक्षा करनेवाला मन्त्र सर्वत्र बलिदान के समय पढ़ा जाता है । ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, गौरी, लक्ष्मी तथा सभी गण ज्वर - दाह पीड़ित कुमार की रक्षा करें और उसे सब प्रकार के कष्टों से छुटकारा दिला दें ॥५१-५५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में बालग्रहहरबालतन्त्रकथन नामक दो सौ निन्यान्नबेवाँ अध्याय समाप्त ॥२९९ ॥
१ ख. छ, ' भक्षादि ' । २ ख. ग. स्वर्गमारिकाः । ३ छ. ' ह्वाकट्टयाऽऽकट्टु छ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation 4 सर्वकामिकः । ५ छ. बलिं ।
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त्रिशततमोऽध्यायः ९ ४१ अथ त्रिशततमोऽध्यायः ग्रहहृन्मन्त्रादिकथनम् अग्निरुवाच ग्रहोपहारमन्त्रादीन्वक्ष्ये ग्रहविमर्दनान् । हर्षेच्छाभयशोकादिविरुद्धा ` शुचिभोजनात् ॥१ ॥
गुरुदेवादिकोपाच्च पश्चोन्दमादा भवन्त्यथ । त्रिदोषजाः संन्निपाता आगन्तव इति स्मृताः ॥२ ॥
देवादयो ग्रहा जाता रुद्रक्रोधादनेकधा । सरित्सरस्तडागादौ शैलोपवनसेतुषु ॥३ ॥
नदीसङ्गे शून्यगृहे बिलद्वार्येकवृक्षके । ग्रहा गृह्णन्ति पुंसश्च श्रियं सुप्तां च गर्भिणीम् ॥४ ॥
आसन्नपुष्पां नग्नां च ऋतुस्नानं करोति या । अवमानं नृणां वैरं विघ्नं भाग्यविपर्ययम् ' ॥५ ॥
देवतागुरुधर्मादिसदाचारादिलङ्घनम् । पतनं शैलवृक्षादेर्विधुन्वन्मूर्धजान्मुहुः || ६ || रुदन्नृत्यति रक्ताक्षो " हंरूपोऽनुग्रही नरः । उद्विग्नः शूलदाहार्तः क्षुत्तृष्णार्तः शिरोर्तिमान ॥७ ॥
देहि देहीति याचेत बालिकामग्रही नरः । स्त्रीमालाभोगस्नानेच्छुरतिकामग्रही नरः ॥८ ॥
अध्याय ३०० ग्रहहृन्मन्त्रादि - कथन अग्निदेव बोले- अब मैं ग्रहों के द्वारा पीड़ित होने पर उनसे छुटकारा दिलानेवाले उपचार और मन्त्रों को बतलाऊँगा । हर्ष, इच्छा, भय, शोक आदि से, स्वभाव विरुद्ध और अपवित्र भोजन करने से तथा श्रेष्ठ पुरुषों और देवता इत्यादि को क्रुद्ध करने से पाँच प्रकार के उन्माद होते हैं । त्रिदोष ( वात - पित्त - कफ ) से उत्पन्न तीन प्रकार के तथा सन्निपातज और आगुन्तक ये पाँच प्रकार के उन्माद कहलाते हैं ॥ १-२ ॥ भगवान् रुद्र के भीषण क्रोध करने पर देवादिक ग्रह अनेक रूप धारण कर लेते हैं । ग्रह पुरुषों को नदी, सरोवर, तालाब, पर्वत, उपवन, सेतु, नदियों के संगम, शून्यगृह, ' बिलद्वार ', अकेले वृक्ष आदि स्थानों में पकड़ लेते हैं । ग्रहों का आक्रमण सोती हुई, गर्भिणी, आसन्न ऋतुकालवाली, नग्न और ऋतुस्नाता स्त्री पर भी हो जाता है । ३-४ ॥ ग्रहों के द्वारा गृहीत व्यक्ति दूसरों का अपमान करने लगता है, सबके साथ वैर - भाव रखने लगता है, सुन्दर कार्यों में विघ्न डालता है, अपने क्रूर कर्मों द्वारा अपने भाग्य को भी बदल देता है, देवाराधन नहीं करता, गुरुजनों की आज्ञा का पालन नहीं करता, धर्म तथा सदाचार आदि का उल्लंघन करता है । पर्वतों तथा वृक्षों पर चढ़कर वहाँ से कूदता है, बारम्बार सिर के बालों को घसीटता है, रोता है, नृत्य करता है, उसके नेत्र लाल हो जाते हैं, ये ' रूप ' ग्रह - विशेष से पीड़ित व्यक्ति के लक्षण हैं । जो उद्विग्न हो जाता है, शूल और दाह से पीड़ित होता है, उसे भूख और प्यास ( विशेष ) लगती है और वह मस्तक - पीड़ा का अनुभव करने लगता है ॥५-७ ॥ बलि चाहनेवाले ग्रह के द्वारा अभिभूत मनुष्य उक्त लक्षणों के साथ ' कुछ दो, कुछ दो ' कहकर याचना करने लगता है । रत्यभिलाषी ग्रह के द्वारा आक्रान्त मनुष्य, स्त्री, माला, भोग तथा स्नान की इच्छा प्रकट करता है । १ छ. ग्रहाप ' । २ ख. ग. द्धान्नविभो । ३ ख. छ. ' गन्तुरिति ते स्मृ । ४ ख. ग. स्त्रियं । ५ ख. छ. र्ययः । दे ' । ६ छ. ° र्धजं मुहुः । ७ ख. ग. पालेम ik Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ४२ अग्निपुराणम् महासुदर्शनो व्योमव्यापी विटपनासिकः । ( ' पृश्नीहिङ्गुबचाचक्रशिरीषदयितं परम् । खट्वाङ्गाब्जादिशक्तिं च दधानं चतुराननम् । आदित्यादियुतं प्रार्च्य उदितेऽर्केऽर्ध्यकं ददेत् । अर्काय भूर्भुवः स्वश्च ज्वालिनीं कुलमुद्गरम् (? ) । उदारः पद्मधृग्दोर्भ्या ' सोमः सर्वाङ्गभूषितः । विद्युत्पुञ्जनिभं वस्त्रं श्वेतः सोमोऽरुणः कुजः । कृष्णाङ्गारनिभो राहुर्धूम्रः केतुरुदाहृतः । स्वनामाद्यैस्तु बीजान्तैर्हस्तौ संशोध्य चास्त्रतः । मूलबीजैस्त्रिभिः प्राणध्यायकं (? ) न्यस्य साङ्गकम् । गन्धपुष्पाक्षतं न्यस्य दूर्वामर्घ्यं च मन्त्रयेत् ।
प्रभूतं विमलं सारमाराध्यं परमं सुखम् ।
पातालनारसिंहाद्या (! ) चण्डीमन्त्रा ग्रहार्दनाः ॥ ९ ॥
पाशाङ्कुशधरं देवमक्षमालाकपालिनम् ॥१० ॥
अन्तर्बाह्यादिखट्वाङ्ग पद्मस्थं रविमण्डले ॥११ ॥
श्वासविषाग्निविप्रकुण्डी हृल्लेखासकलो भृगुः (? ) ॥१२ ॥
पद्मासनोऽरुणो रक्तवस्त्रः सद्युतिविश्वकः ( कृत् ) ॥१३ ॥
' रव्यादयो ग्रहाः सौम्याः वरदाः पद्मधारिणः ॥१४ ॥
बुधस्तद्वद्गुरुः पीतः शुक्लः शुकः शनैश्चरः ॥१५ ॥
वामोरुवामहस्तान्तदक्ष ' हस्तोरुजानुषु ॥१६ ॥
अङ्गुष्ठादौ तले नेत्रहृदाद्यं व्यापकं न्यसेत् ॥१७ ॥
प्रक्षाल्य पात्रमस्त्रेण मूलेनाऽऽपूर्व वारिणा ॥ १८ ॥
आत्मानं तेन संप्रोक्ष्य पूजाद्रव्यं च वै ध्रुवम् ॥१९ ॥
पीठाद्यान्कल्पयेदेतान्हृदा मध्ये विदिक्षु च ॥२० ॥
' महासुदर्शन ', ' व्योमव्यापी ', ' विटपनासिक ' तथा पातालनारसिंह मन्त्र एवं चण्डिका के मन्त्र ग्रहपीड़ा से मुक्ति दिलानेवाले हैं ॥८ - ९ ॥ सूर्यदेव, पृश्निपर्णी, बच, चक्र ( तगर पुष्प ) तथा शिरीष पुष्प के प्रेमी हैं । दाहिने हाथों में पाश, अंकुश, अक्षमाला और कपाल को धारण करनेवाले हैं और बायें चार हाथों में खटवाङ्ग नामक अस्त्र, कमल, शक्ति आदि को धारण करते हैं । ये चार मुँहवाले हैं । रवि - मण्डल के अन्दर - बाहर खट्वाङ्ग और पद्म पर स्थित भगवान् सूर्य का आदित्यों के साथ पूजन करना चाहिए । इस प्रकार सूर्य भगवान् की पूजा करके सूर्योदय काल में अर्घ्य देना चाहिए ॥१०-११३ ॥ श्वास ( य ), विष ( ओं ), अग्नि ( र् ), विप्रकुण्डी ( ओं ), हृल्लेखा ( ह्रीं ) इनको जोड़ देने पर मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार बनता है ' यो रों ह्रीं अर्काय भूर्भुवः स्वरश्च ज्वालिनी कुलमुद्गर । ' इस मन्त्र से सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए । भगवान् सूर्य अरुण कान्तिवाले पद्मासन पर आसीन, रक्तवस्त्रधारी, विश्व को प्रकाशित करनेवाले, उदार तथा भुजाओं पर कमलों को धारण करनेवाले हैं । भगवान् चन्द्रदेव समस्त अंगों से विभूषित हैं । सूर्यादि सभी ग्रह सौम्यरूपवाले वरदायक तथा पद्म धारण करनेवाले हैं ॥१२-१४ ॥ वे सब विद्युत्पुञ्ज के समान वस्त्र धारण करनेवाले हैं । चन्द्रमा का वर्ण श्वेत है, मंगल ( ग्रह ) का वर्ण रक्त बताया गया है । बुध भी लाल वर्णवाले कहे गये हैं, बृहस्पति का वर्ण पीला है । शुक्र का वर्ण शुक्ल प्रसिद्ध है, शनैश्चर काले कोयले के समान वर्ण के हैं । राहु और केतु धूम्रवर्णवाले कहे गये हैं । बीजमन्त्र के साथ ग्रहों के नामों के आदि अक्षरों से हाथों को शुद्ध करके बायीं जाँघ, बायें हाथ, दायें हाथ, घुटनों, अंगुष्ठादि ( उँगलियों ), नेत्रों एवं हृदय का न्यास करना चाहिए ॥१५-१७ के बाद अंगमन्त्रों से युक्त तीन बीजमन्त्रों से पात्र का प्रक्षालन करना चाहिए । ऐसा करने से अस्त्रमन्त्रों ॥ अङ्गन्यास हुए मूल - मन्त्र से उस ( पात्र ) को जल से भरना चाहिए । उस जल में गन्ध, पुष्प, अक्षत तथा दूब छोड़कर का जप करते से अभिमन्त्रित करके उसी को अपने ऊपर तथा पूजन - सामग्रियों के ऊपर छिड़कना चाहिए । तत्पश्चात् उसे मन्त्रों एवं मध्य भाग में प्रभूत, विमल, सार, आराध्य और परमसुख नाम से पादपीठों की कल्पना करनी आग्नेयादि कोणों चाहिए ॥१८-२० ॥ ५ छ. रक्ताहृदाद १ ‘ पृश्नीहिङ्गुवचा ' । ६ छ. ' तः चन्द्रज्ञगुरुभार्गवाः सौम्यो hai छ केवलं शुक्लः छ. पुस्तक एव । २ छ, खट्टाङ्गा Foundation ' । ३ USA छ. ' ' खट्टाङ्गाप । ४ छ. सौम्यः । छ, हस्ताभयप्रदा । स्व "
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त्रिशततमोऽध्यायः पीठोपरि हृदो मध्ये दिक्षु चैव विदिक्षु च वां दीप्तां वीं तथा सूक्ष्मां वुं जयां वूं च भद्रिकाम् वौं सर्वतोमुखीं वं पीठं वः प्रार्च्य रविं यजेत् खकारौ दण्डिनौ चण्डौ मज्जादशनसंयुता वह्नीशरक्षोमरुतां दिक्षु पूज्या हृदादयः पूर्वादिदिक्षु संपूज्याश्चन्द्रज्ञगुरुभार्गवाः ) नस्याञ्जनादि कुर्वीत साजमूत्रैर्ग्रहापहैः अजाक्षीराढके पक्वं सर्पिः सर्वग्रहान्हरेत् अपस्मारविनाशाय तज्जलं त्वभियोजयेत् द्रोणे सयष्टिकूष्माण्डरसे सर्पिश्च संस्कृतम् पीठ के ऊपर हृदय के मध्य भाग में, दिशाओं और ९ ४३ । पीठोपरि हृदाब्जं च केसरेत्वष्ट शक्तयः ॥ २१ ॥
। वें विभूतिं वैं विमलां वोमसिघातविद्युताम् ॥२२ ॥
। आवाह्य दद्यात्पाद्यादि हृत्षडङ्गेन सुव्रत ॥ २३ ॥
। मांसदीर्घा जरद्वायुहृदैतत्सर्वदं रवेः (? ) ॥ २४ ॥
। स्वमन्त्रैः कर्णिकान्तस्था दिक्ष्वस्त्रं पुरतः सदृक् ॥२५ ॥
। ' पृश्निहिङ्गुवचाचक्रशिरीषलशुनामयैः ॥२६ ॥
॥ पाठापथ्यावचाशिग्रुसिन्धुव्योषैः पृथक्पलैः ॥ २७ ॥
। वृश्चिकाली फला कुष्ठं लवणानि च शार्ङ्गकम् ॥२८ ॥
। विदारिकुशकाशेक्षुक्वाथजं पाययेत्पयः ॥२९ ॥
। पञ्चगव्यं घृतं तद्वद्योगं ज्वरहरं शृणु ॥३० ॥
विदिशाओं में, हृदयकमल का तथा हृदयकमल के केसरों में आठों शक्तियों का आवाहन करना चाहिए । ' वां ' बीजमन्त्र से ' दीप्ता ' शक्ति की, ' वीं ' बीजमन्त्र से ' सूक्ष्मा ' शक्ति की, ' वुं ' बीजमन्त्र से जया शक्ति की, ' वूं ' बीजमन्त्र से ' भद्रिका ' शक्ति की, ' वें ' बीजमन्त्र से ' विभूति ' शक्ति की, ‘ वैं ' बीजमन्त्र से ‘ विमला ’ शक्ति की, ' वोम् ' बीजमन्त्र से ' असिघातविद्युता ' शक्ति की, ' वौं ' बीजमन्त्र से ' सर्वतोमुखी ' शक्ति की और ' वं ' बीजमन्त्र से पीठ की अर्चना करके सूर्योपासना करनी चाहिए । हे सुव्रत! तत्पश्चात् रवि आदि मूर्तियों का आवाहन करके उन्हें पाद्यादि समर्पित करे और क्रमशः हृदयादि षडङ्गन्यासपूर्वक पूजन करे ॥२१-२३ ॥ ‘ खकारौ ’ इत्यादि श्लोक में ' खं खखोल्काय नम: ' इस सूर्य मन्त्र का उद्धार किया गया है । सूर्य का यह मन्त्र मनुष्य की सब कामनाओं को पूरा करनेवाला है । अग्नि, ईशान, नैर्ऋत्य और वायव्यकोणों में तथा मध्य में हृदादि पाँच अङ्गों की उनके नाम मन्त्रों से पूजा करनी चाहिए । वे कर्णिका के भीतर ही पूजनीय हैं । अस्त्र की पूजा अपने सामने की दिशा में करनी चाहिए ॥२४-२५ ॥ पूर्वादि दिशाओं में चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र की पूजा करनी चाहिए । ग्रहों के दोष को दूर करनेवाले पृश्निपर्णी, हींग, बच, चक्र ( तगर का पुष्प ), शिरीष और लहसुन के चूर्ण को बकरी के मूत्र में मिलाकर नास, अञ्जन आदि देना चाहिए । पाठा, हरीतकी, वच, शिग्रु ( सहिन ), सेंधानमक, सोंठ, मिर्च और पीपरि को एक - एक पल लेकर एक आढक ( अढैया ) बकरी के दूध में पकाकर घृत बना लेना चाहिए, वह घृत समस्त ग्रहों की पीड़ा का निवारण करनेवाला होता है । वृश्चिकाली, कला ( नागकेसर ), कुष्ठ ( ओषधि - विशेष ), पाँचों नमक तथा शार्ङ्गक ( ओषधि ) के मिश्रण से बनाये गये जल का उपयोग अपस्मार ( मृगी ) के निवारण में करना चाहिए ॥२६-२८ ॥ विदारीकन्द, कुश, काश और ईख का क्वाथ पिलाना चाहिए । यष्टि ( जीववृक्ष ) और कूष्माण्ड के द्रोण परिमाण रस के मिश्रण से बना हुआ घृत ज्वर को दूर करता है । पञ्चगव्य और घृत को मिलाकर देने से १ पृश्नि शब्द स्थाने ख. ग. पुस्तकयोः Sanskrit षष्ठीशब्दो Readenly, Jammmu विद्यते ।. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ४४ अग्निपुराणम्
ॐ भस्मास्त्राय विद्महे । एकदंष्ट्राय धीमहि । तन्नो ज्वरः प्रचोदयात् ॥३१ ॥
कृष्णोषणनिशारास्नाद्राक्षातैलं गुडं लिहेत् । श्वासवानथ वा भार्गी सयष्टिमधुसर्पिषा ॥३२ ॥
पाठातिक्ताकणाभार्गीमथ वा मधुना लिहेत् । धात्री विश्वा सिता कृष्णा मुस्ता खर्जूरमागधी ॥३३ ॥
पीवरा चेति हिक्कानं तत्त्रयं मधुना लिहेत् । कामलीजीरमाण्डूकीनिशाधात्रीरसं पिबेत् ॥३४ ॥
व्योषपद्मकत्रिफलाविडङ्गदेवदारवः । रास्नाचूर्णं समं खण्डैर्जग्ध्वा कासहरं ध्रुवम् ॥ ३५ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये ग्रहहृन्मन्त्रादिकथनं नाम त्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०० ॥
अथैकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः सूर्यार्चनम् अग्निरुवाच
शय्या तु दण्डी साजेशपावकश्चतुराननः । सर्वार्थसाधकमिदं बीजं पिण्डार्थमुच्यते ॥१ ॥
स्वयं दीर्घस्वराद्यं च बीजेष्वङ्गानि सर्वशः । खातं साधु विषं चैव सबिन्दुं सकलं तथा || २ || ( भी ) ज्वर शान्त हो जाता है । ॐ भस्मात्राय... ' ' प्रचोदयात् ' यह मन्त्र भी ज्वरनाशक है ॥२९ - ३१ ॥ गजपीपरि, मिर्च, हल्दी, रास्ना, द्राक्षा, तेल और गुड़ से बने हुए अवलेह के चाटने से श्वास - रोग दूर होता है । अथवा पाठा, कटुका, पीपरि और भँगरैया के रस को मधु के साथ मिलाकर चाटने से भी श्वास रोग दूर हो जाता है । हिचकी दूर करने के लिए आँवला, अतीस, शक्कर, गजपीपरि, मुस्ता, खजूर, छोटी इलायची और शतावरि के चूर्ण को मधु के साथ चाटना चाहिए । कामली, जीरा, माण्डूकी, हल्दी और आँवला का रस पीने से हिचकी दूर हो जाती है । सोंठ, मिर्च, पीपरि, पद्मक, आँवला, हरड़, बहेड़ा, विडङ्ग और देवदारु का चूर्ण कास को दूर करता है । शक्कर के साथ रास्ना का प्रयोग करने से भी खाँसी निश्चय ही दूर हो जाती है ॥ ३२-३५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में ग्रहहृन्मन्त्रादिकथन नामक तीन सौवाँ अध्याय समाप्त || ३०० ॥ अध्याय ३०१ सूर्यार्चन अग्निदेव बोले - शार्ङ्ग ( गकार ), दण्डी ( अनुस्वारयुक्त ) हो । उसके साथ पद्मेश ( विष्णु ) ( ईकार ) और पावक ( रकार ) हो तो इन चार वर्णों के मेल से पिण्डीभूत बीज ( ग्रीं ) प्रकट होता है । यह गणपति का बीजमन्त्र सभी प्रकार के फलों को देने में समर्थ है || १ || इस बीज के आदि में क्रमशः दीर्घ स्वरों ( आ, ई, ऊ, ऐ, औ, अ:) जोड़कर उनसे अंगन्यास को करे । ‘ खातम् ' आदि श्लोकार्थ से गणपति के पाँच अन्स, बीजमन्त्रों का उद्धार किया गया CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by है ।
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एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः गणस्य पञ्च बीजानि पृथग्दृष्टफलं महत् गणंजयाय नम एकदंष्ट्राय चलकर्णिने गजवक्त्राय महोदरहस्ताय पञ्चाङ्गं सर्वसामान्यं सिद्धिः स्याल्लक्षजाप्यतः गणाधिपतये गणेश्वराय गणनायकाय गणक्रीडाय दिग्दले पूजयेन्मूर्तीः पुरावच्चाङ्गपञ्चकम् वक्रतुण्डायैकदंष्ट्राय महोदराय गजवक्त्राय विकटाय विघ्नराजाय धूम्रवर्णाय दिग्विदिक्षु यजेदेतांल्लोकां ( के ) शांश्चैव मुद्रया । मध्यमातर्जनीमध्यगताङ्गुष्ठौ ९ ४५ ॥३ ॥
॥४ ॥
॥५ ॥
॥६ ॥
11911 ॥८ ॥
समुष्टिकौ ॥९ ॥
चतुर्भुजं मोदकाढ्यं दण्डपाशाङ्कुशान्वितम् । दन्तभक्ष्यधरं रक्तं साब्जपाशांकुशैर्वृतम् ॥१० ॥
पूजयेत्तं चतुर्थ्यां च विशेषेणाथ नित्यशः । श्वेतार्कमूलेन कृतं सर्वाप्तिः स्यात्तिलैर्हुतैः ॥ ११ ॥
तण्डुलैर्दधिमध्वाज्यैः सौभाग्यं वश्यतामियात् । घोषासृक्प्राणधात्वर्दी दण्डी मार्तण्डभैरवः ॥ १२ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां कर्ता विश्वपुटीवृतः । ह्रस्वाः स्युर्मूर्तयः पञ्च दीर्घाण्यङ्गानि तस्य च ॥१३ ॥
सेन्द्रवारुणमीशानवामार्धदयितं रविम् । पाशांकुशधरं देवं ह्यक्षमालाकपालिनम् ॥१४ ॥
ये बीज पृथक् - पृथक् महान् फल देते हैं ॥२-३ || ' गणंजयाय ' ' महोदरहस्ताय ' यह गणपति सामान्य पञ्चांग न्यास है । इस मन्त्र का एक लाख जप करने से सिद्धि की प्राप्ति होती है ॥४-५ ॥ ' गणाधिपतये गणक्रीडाय ' इन मन्त्रों का उच्चारण करते हुए पूर्वादि चार दिशाओं के कमल दलों में गणेश जी के चार विग्रहों का पूजन करे । अंग पंचक का पूजन पूर्व अध्याय में प्रदर्शित क्रम से विदिशाओं और मध्य में करे । ' वक्रतुण्डायैकदंष्ट्राय धूम्रवर्णाय ' गणपति की इन मूर्तियों की कमलचक्र के दिग्वर्ती तथा कोणवर्ती दलों में पूजा करे । फिर इन्द्र आदि लोकपालों तथा उनके अस्त्रों की अर्चना करे । मध्यमा और तर्जनी के मध्य में अँगूठे को डालकर मुट्ठी बन्द कर लेने पर गणेश मुद्रा बनती है । पूजन के समय इस मुद्रा का प्रदर्शन होना चाहिए ॥ ६ - ९ ॥ गणपति की उस मूर्ति का ध्यान करना चाहिए जिसके चार हाथ हैं, जो मोदक, दण्ड, पाश और अंकुश से युक्त हैं । दाँतों में उन्होंने भक्ष्य पदार्थ ( लड्डू ) को दबा रखा है । उनकी अंगकान्ति लाल है । वे कमल, पाश और अंकुश से घिरे हुए हैं । वैसे तो गणपति का पूजन नित्य ही करना चाहिए, चतुर्थी के दिन उनकी पूजा विशेष विधानपूर्वक करनी चाहिए । मदार की जड़ से उनकी मूर्ति बनाकर पूजा करनेवाला और उनके लिए तिल की आहुति देनेवाला व्यक्ति इस जीवन में सभी सुखों को प्राप्त कर लेता है ॥१०-११ ॥ दही, मधु तथा आज्य से मिले हुए तण्डुलों की आहुति सौभाग्यदायिनी और प्राणियों को वश में करनेवाली होती है । घोष ( ह ), असृक् ( र ), प्राण ( य ), धातु ( औ ), अर्दी ( ओं ) तथा दण्डी ( अनुस्वार ) –यह सब मिलकर सूर्यदेवता का मार्तण्ड वैभव नामक बीज ( ह्यौ ओं ) बनता है । इसको बिम्ब बीज से संपुटित कर दिया जाय तो यह साधकों को चारों पुरुषार्थों को देनेवाला होता है । पाँच ह्रस्व स्वरों से मूर्तियों का तथा छह दीर्घस्वरों से अंगों का न्यास करे ॥१२-१३ ॥ सूर्य मण्डल का वर्ण लाल होता है, उसका दक्षिणार्ध पुरुष तथा वामार्ध स्त्री देवता के रूप में होता है । इस देवता का पूजन ईशानकोण में होना चाहिए तथा सूर्य और मंगल आदि ग्रहों का पूजन १ ख. ग. घोषसृक्प्रणधात्वर्वाद Sanskrit पतबिम्बपटावः bigitized by S3 Foundation USA ६०
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९ ४६ अग्निपुराणम् खट्वाङ्गादिकशक्तिं च दधानं चतुराननम् । आदित्यादियुतं प्रार्च्य ' उदितेऽर्केऽर्धकं ददेत् । अर्काय भूर्भुवः स्वरेज्वालिकुरस्त्र्यसङ्गकम् (? ) । उदानः पद्मदृग्दोर्भ्यां धूम्रकेतुरुदाहृतः । विद्युत्पुञ्जनिभः स्वर्कः श्वेतः सोमोऽरुणः कुजः । कृष्णाङ्गारनिभो राहुर्धूम्रकेतुरुदाहृतः ) । स्वनामाद्यन्तबीजास्ते हस्तौ संशोध्य चास्त्रतः मूलबीजैस्त्रिभिः प्राणव्यापकं न्यस्य साङ्गकम् गन्धपुष्पाक्षतं न्यस्य दूर्वामर्घ्यं च मन्त्रयेत् प्रभूतं विमलं सारमाराध्यं परमं सुखम् पीठोपरि हृदाद्यं च केसरेष्वस्त्रशक्तयः रें विभूतिं रैं विमलां " रोमयोद्याथ विद्युतम् आवाह्य दद्यात्पाद्यादि हृत्षडङ्गेन सुव्रतः आग्नेयी दिशाओं में होना चाहिए । सूर्य की अर्चना अन्तर्बाह्ये विषद्भक्तं (? ) पद्मस्थं रविमण्डलम् ॥१५ ॥
श्वासं विषाग्निविपदण्डीन्दुलेखासकलो भृगुः ॥ १६ ॥
पद्मासनोऽरुणो रक्तवस्तुसद्युतिबिम्बगः ॥१७ ॥
( रक्ता हृदादयः सौम्या वरदाः पद्मधारिणः ॥१८ ॥
बुधस्तद्वद्गुरुः पीतः शुक्रिः (? ) शुक्रः शनैश्चरः ॥१९ ॥
वामोरुवामहस्तास्ते दक्षहस्ताभयप्रदाः ॥ २० ॥
। अङ्गुष्ठादौ तले नेत्रे हृदाद्यं व्यापकं न्यसेत् ॥२१ ॥
। प्रक्षाल्य पात्रमस्त्रेण मूलेनाऽऽपूर्य वारिणा ॥ २२ ॥
। आत्मानं तेन संप्रोक्ष्य पूजाद्रव्यं च वैभवम् ॥ २३ ॥
। पीठाद्यान्कल्पयेदेतान्हदा मध्ये विदिक्षु च ॥ २४ ॥
। रां दीप्तां रीं तथा सूक्ष्मां रं ( रुं ) जयां रूंच भद्रया ॥ २५ ॥
। रौंसर्वतोमुखी रं च पीठं प्रार्च्य रविं यजेत् ॥ २६ ॥
। खकारौ दण्डिनौ चण्डौ मज्जादशनसंयुता ॥ २७ ॥
करनेवाले को पहले स्नान करना चाहिए और तदनन्तर अर्घ्य आदि से सूर्य का पूजन करना चाहिए । आग्नेयी कोण में सूर्य के रूप को पुष्पों की माला का अर्पण करना चाहिए और उनकी काल्पनिक मूर्ति के सम्मुख जलता हुआ दीपक दिखाना चाहिए । सूर्य के लिए रोली, केसर, शीतल जल, रक्त चन्दन, दूर्वा, बाँस के बीज, यव, शालि, श्यामाक, तिल, राजिक और यव, पुष्पों से पूर्ण घट सूर्य को अर्पण करना चाहिए । सूर्योपासक को वही घट अपने सिर के ऊपर धारण करना चाहिए । उसे चारों दिशाओं में जाकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए । ब्रह्मा अरुण वर्ण के हैं । धूमकेतु भुजाओं से युक्त कहे गये हैं । हृदय इत्यादि रक्त वर्ण के सौम्य वर प्रदान करनेवाले हैं ॥१४-१८ ॥ सूर्य विद्युत्पुञ्ज के समान, सोम श्वेत और मंगल अरुण वर्ण के होते हैं । बुध और गुरु पीले, शुक्र शुक्ल, शनैश्चर कृष्ण, राहु अंगार के समान और केतु धूम्रवर्ण का कहा गया है । उन ( देवताओं ) के बायें और दाहिने हाथ अभय प्रदान करनेवाले हैं । हाथों को शुद्ध करके उन देवताओं के नामों के अन्तिम भाग को बीजमन्त्र मानकर अँगूठा इत्यादि नेत्र तथा हृदय का न्यास करना चाहिए । तीन मूलमन्त्रों से प्राणों और अंगों का न्यास करना चाहिए । तदनन्तर एक पात्र को धोकर और उसे जल से भरकर उसमें गन्ध, पुष्प, अक्षत डालकर उस अर्घ्य को अभिमन्त्रित कर लेना चाहिए । तत्पश्चात् उस जल को अपने - आप तथा पूजन - सामग्री के ऊपर छिड़कना चाहिए । इससे परमसुख की प्राप्ति होती है ॥१९ -२३३ ॥ ' री, रूं, रें, रैं रों, रौं तथा रं - इन बीजमन्त्रों से क्रमशः सूर्य की दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, विभूति, विमला, विद्युत्, सर्वतोमुखी मूर्तियों और पीठ की अर्चना करनी चाहिए । व्रती को ( उपर्युक्त मन्त्रों से ) सूर्य का आवाहन करके हृदय इत्यादि षडङ्गों से उसे पाद्य देना चाहिए । सूर्य के लिए खकार, दण्डी, चण्ड, मज्जा और दशन से युक्त मांसा, दीर्घा तथा हृदया - यह सब - कुछ देनेवाले होते हैं ॥२४-२७३ ॥ १ ख. ग. तेऽर्क उर्ध्वकं । २ उक्ता केतुरुदाहृत 20 पुस्तके नास्ति! ४ ममोघाऽथ ।