अग्नि पुराण — पृष्ठ 971–980
अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 971–980
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नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ९ ६७ शङ्खचक्राब्जशूलासित्रिशूलां रौद्ररूपिणीम् । युद्धादौ संजयेदेतां यजेत्खड्गादिके जये ॥ २ ९ ॥ ॐ नमो भगवति ज्वालामालिनि गृध्रगणपरिवृते च रक्षणि स्वाहा ॥३० ॥
युद्धार्थे च जपेन्मन्त्रं शत्रूं जयति योधकः ॥३१ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये लक्ष्म्यादिपूजावर्णनं नामाष्टाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०८ ॥
अथ नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः त्वरितापूजा अग्निरुवाच त्वरिताज्ञानमाख्यास्ये भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ओमाधारशक्त्यै नमः । ॐ प्रों पुरु पुरु महासिंहाय नमः, ॐ पद्माय नमः, ( ' ॐ ह्रीं क्षः स्त्रीं हूं थें ह्रीं फट् त्वरितायै नमः । खे च हृदयाय नमः । च च्छे शिरसे नमः । छे नमः । क्षः स्त्रीं कवचाय नमः, ) स्त्रीं हूं नेत्राय नमः । ह्रूं क्षेमस्त्राय फट्, नमः ॐ त्वरिताविद्यां विद्महे ' तूर्णविद्यां च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥१ ॥
ह्रूं खे च च्छे क्षः शिखायै ॥२ ॥
॥३ ॥
श्री प्रणीतायै नमः, हूं वामायै नमः । ओंकारायै नमः, ॐ खे च हृदयाय नमः, खेचर्यै नमः, चण्डायै नम:, क्षस्त्री कवचाय नमः । छेदन्यै नमः क्षेपण्यै नमः स्त्रियै हूंकार्यै नमः । क्षेमंकर्यै जयायै
विजयायै किंकराय रक्ष । ॐ त्वरिताज्ञया स्थिरो भव वषट् ॥४ ॥
युद्ध के आरम्भ में इस जयदुर्गा मन्त्र का जप करे । विजय के लिए खड्ग आदि पर दुर्गा का पूजन करना चाहिए । ‘ ॐ नमो भगवति ‘ ' ' स्वाहा ' - इस मन्त्र का जप करने से युद्धाभिलाषी योद्धा युद्ध में शत्रुओं को जीत लेता है ॥२९ -३१ ॥ श्री अग्निमहापुराण में लक्ष्म्यादि- पूजा - वर्णन नामक तीन सौ आठवाँ अध्याय समाप्त ॥३०८ ॥
अध्याय ३० ९ त्वरितापूजा अग्निदेव बोले - अब मैं त्वरिता देवी के इस ज्ञान के सम्बन्ध में बतलाऊँगा, जो ( इस लोक में ) भोग तथा ( परलोक में ) मोक्ष देनेवाला है ॥१ ॥ पहले ' ओमाधारशक्त्यै नम: ' इस मन्त्र से आधारशक्ति का स्मरण और वन्दन
करे । फिर सिंहासन की ‘ ॐ प्रों पुरु पुरु महासिंहाय नम: ' इस मन्त्र से तथा आसन की ' ॐ पद्माय नमः ' इस मन्त्र से पूजा करे । तदनन्तर ' ॐ ह्रीं हूं त्वरितायै नमः ' – इस मूलमन्त्र का उच्चारण करे । इसका अंगन्यास यह है- खे च हृदयाय नमः, च च्छे शिरसे नमः, छे क्षः शिखायै नमः, क्षः स्त्रीं कवचाय नमः, स्त्रीं हूं नेत्राय नमः, हूं क्षेमस्त्राय फट्, नमः । अंगन्यास के बाद इस गायत्री का जप करे । ' ॐ त्वरिताविद्यां विद्महे तूर्णविद्यां च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात् । ' तदनन्तर श्री प्रणीतायै नमः स्थिरो भव वषट् ' - इत्यादि से प्रणीता आदि देवियों का पूजन करे ॥ २-४ ॥ यह विद्या १. ' ओं ह्रीं कवचाय नमः. च. पुस्तके तास्ति । me. हे तृष्णावि । Foundation USA
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९ ६८ अग्निपुराणम् तोतला त्वरिता तूर्णेत्येवं विद्येयमीरिता ऊर्वोश्च जानुजङ्घोरुद्वये चरणयोः क्रमात् पार्वती शबरी चेशा वरदाभयहिस्तका सिंहासनस्था मायूरबर्हच्छत्रसमन्विता * विप्राहिकर्णाभरणा क्षत्रकेयूरभूषणा एवं रूपात्मिका भूत्वा तन्मन्त्रं नियुतं जपेत् जपेद्ध्यायेत्पूजयेत्तां सर्वसिद्धये विषादिहृत् अङ्गगायत्री प्रणीता हूंकाराद्या दलाग्रके लोकेशायुधवर्णास्ताः ' फट्कारी तु धनुर्धरा किंकरा बर्बरी मुण्डी लगुडी च तयोर्बहिः हेमलाभोऽर्जुनैर्धान्यैर्गोधूमैः पुष्टिसंपदः । शिरोभ्रूमस्तके कण्ठे हृदि नाभौ च गुह्यके ॥५ ॥
। न्यस्ताङ्गो न्यस्तमन्त्रस्तु समस्तं व्यापकं न्यसेत् ॥ ६ ॥
। मयूरबलया पिच्छमौलिः किसलयांशुका ॥७ ॥
। त्रिनेत्रा श्यामला देवी वनमालाविभूषणा ॥८ ॥
। वैश्यनागकटीबन्धा वृषाहिकृतनूपुरा ॥९ ॥
। ईशः किरातरूपोऽभूत्पुरा गौरी च तादृशी ॥१० ॥
। अष्टसिंहासने पूज्या दले पूर्वादिके क्रमात् ॥ ११ ॥
। फट्कारी चाग्रतो देव्याः श्रीबीजेनार्चयेदिमाः ॥१२ ॥
। जया च विजया द्वाःस्थे पूज्ये ' सौवर्णपुष्टिके ॥१३ ॥
। इष्ट्वैवं सिद्धये द्रव्यैः कुण्डे योन्याकृतौ हुनेत् ॥१४ ॥
। यवैर्धान्यैस्तिलैः सर्वसिद्धिरीतिविनाशनम् ॥१५ ॥
तोतला, त्वरिता, तूर्णा इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । इसके अक्षरों का सिर, भ्रू, मस्तक, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्य, उरुओं, घुटना, जङ्घा, दोनों चरण आदि अवयवों में न्यास करके समस्त विद्या द्वारा व्यापक न्यास करना चाहिए ॥५-६ ॥ पार्वती, शबरी, ईशा, वरदा, अभयहस्तिका, मयूरबलया, पिच्छमौलि, किसलयांशुका, सिंहासनस्था, मयूरबर्हच्छत्रसमन्विता, त्रिनेत्रा, श्यामला, वनमालाविभूषणा, विप्राहिकर्णाभरणा, क्षत्रकेयूरभूषणा, वैश्यनागकटीबन्धा, वृषाहिकृतनूपुरा नामों से त्वरिता देवी का ध्यान करते हुए साधक स्वयं भी देवीस्वरूप होकर ( उपर्युक्त ) मन्त्रों का एक लक्ष बार जप करना चाहिए ॥७ - ९ ३ ॥ प्राचीन काल में श्री शंकर भगवान् ने किरात का तथा गौरी ने भी उसी प्रकार का रूप धारण किया था । सर्वविद्यासिद्धि के हेतु और विष इत्यादि के निवारणार्थ गौरी का जप, ध्यान और पूजन करना चाहिए । अष्टसिंहासन पर पूर्वादिक दल में निम्नांकित देवियों की पूजा करनी चाहिए । हृदयादि छह अंगों सहित प्रणीता और गायत्री का पूजन करे । पूर्वादि दलों में हूंकारी आदि की पूजा करे । दलाग्रभाग में देवी त्वरिता के सम्मुख फट्कारी की पूजा करे । इन सब देवियों के नाम मन्त्र के साथ ' श्री ' बीज लगाकर उसी से इनकी पूजा करनी चाहिए । हूंकारी आदि के आयुध और वर्ण उस - उस दिशा के दिक्पालों के ही समान है । परन्तु फट्कारी धनुर्धरा है । द्वार पर सोने की छड़ी हाथ में लिये जया और विजया देवियों की पूजा करनी चाहिए । किंकरा, बर्बरी, मुण्डी, लगुडी इन देवियों की पूजा बाहर करनी चाहिए । इस प्रकार सिद्धि के लिए पूजा करके योनि के सदृश बने हुए कुण्ड. में द्रव्यों की आहुति करनी चाहिए ॥१०-१४ ॥ अर्जुन पुष्पों से आहुति करने से सुवर्ण की प्राप्ति होती है, गोधूमादि धान्य की आहुति करने से शारीरिक पुष्टि होती है । यव धान्य ( चावल ) तथा तिल की आहुति करने से सर्वसिद्धि की प्राप्ति तथा ईतियों ( अतिवृष्टि आदि ) का विनाश होता है । अक्षों ( बहेड़ों ) की आहुति से शत्रु उन्मत्त हो १ ख. ग. फलकारा ध ° । २ च. र्णयष्टि " । * विप्राहिकर्णाभरणा आदि चार विशेषणों का यह अभिप्राय है कि त्वरिता देवी के कानों के आभूषण ब्राह्मणजातीय दो नाग ( अनन्त और कुलिक ) हैं, क्षत्रियजातीय दो नाग ( वासुकि और शंखपाल ) उनके बाजूबन्द हैं । वैश्यजातीय दो नाग ( तक्षक और महापद्म ) कटि प्रदेश की किंकिणी बने हैं और शूद्रजातीय दो सर्प ( पद्म तथा कर्कोटक ) देवी के चरणों के मपुर है । Digitized by S3 Foundation USA
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दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ९ ६ ९ अक्षैरुन्मत्तता शत्रोः शाल्मलीभिश्च मारणम् । जम्बूभिर्धनधान्याप्तिस्तुष्टिर्नीलोत्पलैरपि ॥१६ ॥
रक्तोत्पलैर्महापुष्टिः कुन्दपुष्पैर्महोदयः । मल्लिकाभिः पुरक्षोभः कुमुदैर्जनवल्लभः ॥ १७ ॥
अशोकैः पुत्रलाभः स्यात्पाटलाभिः शुभाङ्गना । आम्रैरायुस्तिलैर्लक्ष्मीर्बिल्वैः श्रीश्चम्पकैर्धनम् ॥ १८ ॥
इष्टं मधुकपुष्पैश्च बिल्वैः सर्वज्ञतां लभेत् । त्रिलक्षजप्यात्सर्वाप्तिर्होमाद्भूयानात्तथेज्यया ॥१९ ॥
मण्डलेऽभ्यर्च्य गायत्र्या आहुती: पञ्चविंशतिम् । दद्याच्छतत्रयं ' मूलात्पल्लवैर्दीक्षितो भवेत् । पञ्चगव्यं पुरा पीत्वा चरुकं प्राशयेत्सदा ॥२० ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये त्वरितापूजाविधिकथनं नाम नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३०९ ॥
अथ दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः त्वरितामन्त्रादि अग्निरुवाच अपरां त्वरिताविद्यां वक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्तिदाम् । पुरे वज्राकुले देवीं रजोभिर्लिखिते यजेत् ॥१ ॥
पद्मगर्भे दिग्विदिक्षु चाष्टौ वज्राणि वीथिकाम् । द्वारशोभोपशोभां च लिखेच्छीघ्रं स्मरेन्नरः ॥ २ ॥
जाता है । शाल्मली की लकड़ियों से आहुति करने से शत्रु की मृत्यु हो जाती है । जामुन के द्वारा आहुति धनधान्य और नील कमल की आहुति से संतोष की प्राप्ति होती है । रक्त कमल की आहुति से महापुष्टि और कुन्दपुष्प की आहुति से महान् अभ्युदय होता है । मल्लिका पुष्प की आहुति से नगर में क्षोभ तथा कुमुद पुष्पों के द्वारा आहुति करने पर जनप्रियता प्राप्त होती है । अशोक पत्रों से आहुति करने पर पुत्रलाभ, गुलाब से आहुति करने से सुन्दर स्त्री, आम के पुष्प की आहुति से आयु, तिल की आहुति से लक्ष्मी, बिल्व से श्री तथा चम्पक पुष्प की आहुति करने पर धन, इष्टवस्तु और बेल की आहुति से सर्वज्ञता की प्राप्ति होती है ॥१५ -१८ ॥ ( उपर्युक्त मन्त्र का ) तीन लाख बार जप, होम, ध्यान तथा पूजन से सब प्रकार की प्राप्ति होती है । मण्डल में अर्चना करके त्वरिता गायत्री की पचीस आहुतियाँ देनी चाहिए । तत्पश्चात् मूलमन्त्र से पल्लवों की तीन सौ आहुतियाँ देनी चाहिए । इससे व्यक्ति दीक्षित हो जाता है । पहले पञ्चगव्य का प्राशन करके तत्पश्चात् चरु का भक्षण करना चाहिए ॥१९ -२० । श्री अग्निमहापुराण में त्वरितापूजा - कथन नामक तीन सौ नववाँ अध्याय समाप्त ॥३०९ ॥
अध्याय ३१० त्वरितामन्त्रादि अग्निदेव बोले - अब मैं भुक्ति - मुक्ति को देनेवाली दूसरी त्वरिता विद्या ( अर्थात् त्वरिता के मन्त्र आदि ) के सम्बन्ध में बताऊँगा । धूलि से निर्मित, वज्रचिह्न से आवृत, चौकोर मण्डल में त्वरिता देवी की पूजा करे । उस मण्डल के भीतर योग पीठ पर कमल - निर्माण होना चाहिए । इस मण्डल की दिशाओं और विदिशाओं में आठ वज्र, वीथिका ( गली ), द्वारशोभा तथा उपशोभा का उल्लेख करके मनुष्य को त्वरिता देवी का ध्यान इस प्रकार से करना चाहिए-१ क. ख. ग. ' लात्पूर्णावै k Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ७० अग्निपुराणम् अष्टादशभुजां सिंहे वामजङ्घा प्रतिष्ठिता । दक्षिणा द्विगुणा तस्याः पादपीठे समीप्सिता ॥३ ॥
नागभूषां वज्रदण्डे खड्गं चक्रं गदां क्रमात् । शूलं शरं तथा शक्तिं वरदं दक्षिणैः करैः ॥४ ॥
धनुः पाशं शरं घण्टां तर्जनीं शङ्खमंकुशम् । अभयं च तथा वज्रं वामपार्श्वे धृतायुधम् ॥५ ॥
पूजनाच्छत्रुनाशः स्याद्राष्ट्रं जयति लीलया । ' दीर्घायू राष्ट्रभूतिः स्याद्दिव्यादिव्यादि सिद्धिभाक् || ६ || तलेतिसप्तपातालाः कालाग्निभुवनान्तकाः । ओंकारादीश्वरा ( शमा (? ) रभ्य यावद्ब्रह्माण्डवाचकम् ॥७ ॥
तकाराद्भ्रामयेत्तोयं तोतला त्वरिता ततः तालुवर्गः कवर्गः स्यात्तृतीयो जिह्वतालुकः षष्ठोऽष्टपुटसम्पन्नो मिश्रवर्गस्तु सप्तमः षष्ठस्वरसमारूढमूष्मणान्तं सविन्दुकम् जिह्वातालुसमायोगे प्रथमं केवलं भवेत् ( ' एकादशस्वरैर्युक्तं प्रथमं तालुवर्गतः षोडशस्वरसंयुक्तमूष्मणश्च द्वितीयकम् । प्रस्तावं संप्रवक्ष्यामि स्वरवर्गं लिखेद्भुवि ॥ ८ ॥
। चतुर्थस्तालुजिह्वाग्रो जिह्वादन्तस्तु पञ्चमः ॥ ९ ॥
। ऊष्माणः स्याच्छवर्गस्तु उद्धरेच्च मनुं ततः ॥ १० ॥
। तालुवर्गं द्वितीयं तु स्वरैकादशयोजितम् ॥११ ॥
। तदेव च द्वितीयं तु अधस्तात्पुनरेव तु ॥१२ ॥
। ऊष्मणश्च द्वितीयं तु अधस्ताद्दृश्य (? ) योजयेत् ॥१३ ॥
। जिह्वादन्तसमायोगे प्रथमं योजयेदधः ॥१४ ॥
' देवी की अट्ठारह भुजाएँ हैं, उनकी बायीं जङ्घा सिंह के ऊपर स्थित है । उनकी दाहिनी जङ्घा उससे दूनी बड़ी आकृति में पादपीठ पर अवस्थित है ॥१-३ ॥ वे नागमय आभूषणों से सुशोभित हैं । वे दायें हाथों में क्रमशः वज्र, दण्ड, खड्ग, चक्र, गदा, शूल, बाण, शक्ति तथा वरद मुद्रा धारण करती हैं और अपने बायें हाथों में धनुष, पाश, शर, घण्टा, तर्जनी, शङ्ख, अंकुश, अभयमुद्रा तथा वज्र नामक आयुध धारण किये हुई हैं । उनकी पूजा करने से शत्रुओं का नाश होता है । तथा दूसरे राष्ट्र पर सरलता से अधिकार हो जाता है । ( इतना ही नहीं ) दीर्घ आयु, राष्ट्र विभूति और दिव्यादिव्य सब प्रकार की सिद्धियाँ भी प्राप्त हो जाती हैं ॥४-६ ॥ तल शब्द से कालाग्निभुवन पर्यन्त सात पाताल अभिप्रेत हैं । ओंकार शब्द ईश्वर से लेकर पूरे ब्रह्माण्ड का वाचक है । इस प्रकार शिव से लेकर कालाग्निरुद्र पर्यन्त सभी भुवनों की त्वरिता आद्य कारण है । यही देवी सृष्टि के प्रारम्भ में जल में तीव्र गति पैदा करती है । अतएव त्वरिता देवी को तोतला कहा गया है । अब मैं उनके पूजन के लिए वर्णों का प्रस्तार बतला रहा हूँ । पहले भूमि पर स्वर वर्ग का उल्लेख करना चाहिए ॥७-८ ॥ तदनन्तर तालु वर्ग क वर्ग का, ततः तीसरे जिह्वा तथा तालु से सम्बन्ध रखनेवाले च वर्ग का, चौथा तालु एवं जिह्वा के अग्रभाग से सम्बन्ध रखनेवाला ट वर्ग, पाँचवाँ जिह्वा तथा दाँतों से सम्बन्ध रखनेवाला त वर्ग, छठा ओष्ठपुट से सम्बद्ध प वर्ग, सातवाँ मिश्र वर्ग तथा आठवाँ सोष्म श वर्ग - इनका क्रमशः उल्लेख करना चाहिए । इसके बाद त्वरिता मन्त्र का उद्धार करना चाहिए । मन्त्र का उद्धार इस प्रकार है कि षष्ठ स्वर अकार पर आरूढ़, विन्दु सहित ऊष्म वर्ग का अन्तिम अक्षर होना चाहिए ( हूं ) । तदनन्तर होता स्वर से युक्त तालु वर्ग का द्वितीय अक्षर ( खे ) और जिह्वा तथा तालु के संयोग से उत्पन्न प्रथम वर्ण ( च एकादश ) और उसके बाद उसी के द्वितीय वर्ण ( छ ) का प्रयोग करना चाहिए ॥९ -१२ । वह एकादश स्वर से युक्त तालु वर्ग के प्रथम तथा द्वितीय सोष्मवर्ण को बाद में प्रयुक्त करना चाहिए और हो ( च्छे ) दे ( क्षः ) द्वितीय ऊष्मा और जिह्वा तथा दन्त के संयोग से उत्पन्न उसे सोलहवें स्वर से युक्त कर होनेवाले प्रथम अक्षर ( त ) का प्रयोग करना चाहिए । १ ख. ' र्घायुराप्तभू ' । २ घ. ङ. ' मओ ' का ' । ३ ख. ग. ङ. प्रस्तार । ४ एकादशस्वरैर्युक्तं पुस्तकातिरिक्तपुस्तकेषु नास्ति -0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA संयुतम् च. छ.
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दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ९ ७१ मिश्रवर्गाद्वितीयं तु अधस्तात्वुनरेव तु । ऊष्मणश्च द्वितीयं तु अधस्ताद्विनियोजयेत् । पञ्चस्वरसमारूढं षष्ठं सम्पुटयोगतः । प्रथमं पञ्चमे योज्यं स्वरार्धेनोद्धृता इमे । ॐ ह्रीं ह्रूं ह्रः, हृदयं हां हश्चेति शिरः । ह्रीं श्रीं क्षूं नेत्रत्रयाय विद्यानेत्रं प्रकीर्तितम् त्वरिताङ्गानि वक्ष्यामि विद्याङ्गानि शृणुश्व मे पञ्चषष्ठः शिला प्रोक्तं कवचं सप्तमाष्टमात् । तोतलेति समाख्याता वज्रतुण्डे ततो भवेत् । खेचरी ज्वालिनी ज्वाले खखेति ज्वालिनी दश । छे छेदनि करालिनि खखेति ह कराल्यपि चतुर्थस्वरसंभिन्नं तालुवर्गादिसंयुतम् ) ॥१५ ॥
स्वरैकादशभिन्नं तु ऊष्मणान्तं सविन्दुकम् ॥१६ ॥
द्वितीयमक्षरं चान्यजिह्वाग्रे तालुयोगतः ॥१७ ॥
ओंकाराद्या नमोन्ताश्च जपेत्स्वाहाग्निकार्यके ॥१८ ॥
शिखां ह्रीं ज्वल ज्वल शिखा स्यात्कवचं हुलुहुलु द्वयम् ॥१९ ॥
। क्षौं हः खौं हूं फडस्त्राय गुह्याङ्गानि पुरा न्यसेत् ॥२० ॥
। आदिद्विहृदयं प्रोक्तं त्रिचतुः शिर इष्यते ॥ २१ ॥
तारकं तु भवेन्नेत्रं नवार्धाक्षरलक्षणम् ॥२२ ॥
ख ख हूं दशबीजा स्याद्वज्रतुण्डेन्द्रदूतिका ॥२३ ॥
वर्चे शरविभीषणि खखेति च शबर्यपि ॥२४ ॥
। वक्षः श्रवद्रवप्लवङ्गी ख ख दूती प्लवङ्ग्यपि ॥ २५ ॥
मिश्रवर्ग के द्वितीय वर्ण ( र ) तथा चतुर्थ स्वर ( ई ) से युक्त हो । तालु वर्ग के आदि अक्षर ( क ) का भी प्रयोग करना चाहिए ॥१३-१५ ॥ इसको द्वितीय ऊष्मा के साथ आदि एकादश स्वर से युक्त करे ( क्षे ) । इसके बाद विन्दु और ऊष्मा वर्ग के अन्तिम अक्षर ( ह ) का प्रयोग करना चाहिए । जो कि पाँचवें अक्षर ( उ ) पर आरूढ़ हो ( हुं ) । ओष्ठ पुट संयोग से दूसरा अक्षर ( फ् ) और जिह्वाग्र में तालु के योग से उत्पन्न होनेवाले द्वितीय वर्ग ( ठ ) में पाँचवें वर्ण ( ण ) और छठे स्वरों का संयोग करना चाहिए । स्वरार्ध के साथ प्रथम वर्ण की योजना करनी चाहिए । इनके आदि में ओंकार और अन्त में नमः जोड़ने पर जो मन्त्र बने, उसका तो जप करे, किन्तु अग्नि कार्य ( हवन ) में नमः को हटाकर ' स्वाहा ' जोड़ देना चाहिए । पूरे सन्दर्भ का तात्पर्य यह है कि ' ॐ हूं खे च्छे क्षः स्त्री क्षे हुं फट् नमः ' यह मन्त्र जप का है और ‘ ॐ हूं खे च्छे क्षः स्त्री क्षे हुं फट् स्वाहा ' यह हवनोपयोगी मन्त्र है ॥१६-१८ ॥ इसका अंगन्यास इस प्रकार है – ‘ ॐ ह्रीं ह्रूं ह्रः हृदयाय नमः ' हां हः शिरसे स्वाहा, ह्रीं ज्वलज्वल शिखायै वषट् हनु हनु ( अथवा हुलु हुलु ) कवचाय हुम्, ह्रीं श्रीं क्षं नेत्रत्रयाय वौषट् । नवाँ ( फ ) और आधा अक्षर ( ट् ) रूप जो तोतला त्वरिता विद्या है, उसी को देवी का नेत्र कहा गया है । ' क्षौं हः खौं हूं फट् अस्त्राय फट् ', ये गुह्य अंग मन्त्र हैं । इनका पहले न्यास करना चाहिए । त्वरिता के अंगों का वर्णन आगे चलकर करूँगा । अभी त्वरिता विद्या के अंगों का वर्णन मुझसे सुनो । प्रथम दो बीजाक्षर हृदय हैं । तीसरा और चौथा ये दो अक्षर सिर हैं, पाँचवाँ अथवा छठा शिखा के लिए प्रयुक्त है, सातवाँ और आठवाँ कवच मन्त्र है, और नवाँ तथा आधा अक्षर ( फट् ) नेत्र मन्त्र कहा गया है । ( प्रयोग - ॐ हूं हृदयाय नमः खे च्छे शिरसे स्वाहा, क्षः स्त्री शिखायै वषट्, क्षे हुम् कवचाय हुम्, फट् नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ १ ९ -२२ ॥ ' तोतले वज्रतुण्डे ख ख हूं ' इन दस अक्षरों से युक्त ' वज्रतुण्डिका ' नामक ' इन्द्रदूतिका ' विद्या है । ' खेचरि ज्वालिनि ज्वाले ख ख ' इन दस अक्षरों से युक्त ' ज्वालिनि विद्या ' है । ' वर्चे शरविभीषणि ख ख ' यह दशाक्षरा ' शबरी विद्या ' है । ' छे छेदनि करालिनि ख ख ' यह दशाक्षरा ‘ कराली विद्या है । ' वक्षः द्रव द्रव प्लवङ्गि ख ख ' यह दशाक्षरा ' प्लवंगदूती विद्या ' है ॥२३-२५ ॥। CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ७२ अग्निपुराणम् ( ' स्त्रीबले कलिधुनिनि शासी श्वसनवेगिका ह्रं तेजोवती रौद्री च मातङ्गी रौद्रदूतिका वैतालिनि दशार्णाः स्युस्त्यजान्यहिपलालवत् पादादारभ्य मूर्धान्तं शिर आरभ्य पादयोः वक्त्रमण्डलमूर्ध्वं च अधोर्ध्वं ' चाऽऽदिबीजतः विशन्तं ब्रह्मरन्ध्रेण साधकस्तु विचिन्तयेत् आदिबीजं न्यसेन्मन्त्री तर्जन्यादि पुनः पुनः यो जानाति न मृत्युः स्यात्तस्य न व्याधयो जपात् मुद्रा वक्ष्ये प्रणीताद्याः प्रणीताः पञ्चधा स्मृताः तर्जनीं मूर्ध्नि संलग्नां विन्यसेत्तां शिरोपरि ऊर्ध्वं तु कन्यसामध्ये सबीजां तां विदुर्द्विजाः ज्येष्ठाग्रं निक्षिपेन्मध्ये भेदनी सा प्रकीर्तिता कराली तु महामुद्रा हृदये योज्य मन्त्रिणः । क्षे पक्षे कपिले हस हस कपिला नाम दूतिका ) ॥२६ ॥
। पुटे पुटे ख ख खड्गे फड्ब्रह्मकदूतिका (? ) ॥२७ ॥
। हृदादिकल्पसादौ स्यान्मध्ये नेत्रं न्यसेत्सुधीः ॥ २८ ॥
। अङ्घ्रिजानूरुगुह्ये च नाभिहृत्कण्ठदेशतः ॥ २ ९ ॥ ॥ सोमरूपं ततोऽकारं धारामूलसुवासिनम् ' ॥ ॥३० ३० ॥ ॥ । मूर्धास्यकण्ठहृन्नाभौ गुह्योरुजानुपादयोः ॥३१ ॥
। ऊर्ध्वं सोममधः पद्मं शरीरं बीजविग्रहम् ॥ ३२ ॥
। यजेज्जपेत्तां विन्यस्य ध्यायेद्देवीं शताष्टकम् ॥३३ ॥
। ग्रथितौ तु करौ कृत्वा मध्येऽङ्गुष्ठौ निपातयेत् ॥३४ ॥
। प्रणीतेयं समाख्याता हृद्देशे तां समानयेत् ॥३५ ॥
। नियोज्य तर्जनीमध्येऽनेकलग्नां परस्परम् ॥३६ ॥
। नाभिदेशे तां बद्ध्वा अङ्गुष्ठाम्बु क्षिपेत्ततः ॥ ३७ ॥
। पुनस्तु पूर्ववद्ब्रह्मलग्नां ज्येष्ठां समुत्क्षिपेत् ॥ ३८ ॥
' स्त्रीबले कलिधुनिनि शासी ' यह दशाक्षरा ' श्वसनवेगिका ' विद्या है । ' क्षे पक्षे कपिले हस हस ' यह दक्षाशरा कपिलदूतिका विद्या है । ‘ हूं तेजोवति रौद्रि मातङ्गि ' यह दशाक्षरा रौद्रीदूतिका विद्या है । ' पुटे पुटे ख ख खड्गे फट् ' यह दशाक्षरा ब्रह्मदूतिका विद्या है । वैतालिनि विद्या भी दशार्ण की होती है । अन्य विस्तार की सारहीन बातों को पुआल की भाँति छोड़ देना चाहिए । हृदयादि न्यास में नेत्रन्यास का स्थान मध्य में है ॥२६-२८ ॥ चरणों से लेकर सिर तक और सिर से लेकर चरणों तक - पाद, जानु, उरु, गुह्य, नाभि, हृदय, कण्ठ, मुखमण्डल पर्यन्त ऊपर - नीचे सब स्थानों में आदि बीजमन्त्र से निर्गत ‘ अकार ' का ध्यान करना चाहिए । साधक को सोचना चाहिए कि यह अकार अमृत की धारा एवं सुवास से परिपूर्ण है, ब्रह्मरन्ध्र से मुझमें प्रवेश कर रहा है । तत्पश्चात् मस्तक, मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्याङ्ग, उरु, जानु तथा चरणों में तथा तर्जनी आदि में बार - बार आदि बीजमन्त्र का न्यास करना चाहिए । बीजविग्रह शरीर के ऊर्ध्वभाग में सोम है और अधोभाग में पद्म है - जिसे ऐसा ज्ञान हो जाता है, उसकी मृत्यु नहीं होती तथा न्यास एवं देवी का ध्यान करके इस मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करने से सभी व्याधियाँ दूर हो जाती हैं ॥ २ ९ -३३ ॥ अब मैं प्रणीता आदि मुद्राओं को बतलाऊँगा । प्रणीता पाँच प्रकार की कही गयी है । प्रणीता, सबीजा, भेदनी, कराली और वज्रतुण्डा ॥ हाथों को जोड़कर बीच में अँगूठे को रखकर फिर तर्जनी को ऊपर से लगाकर सिर करे । इस मुद्रा को ‘ प्रणीता ' कहा जाता है । उसे हृदयदेश में लगाना चाहिए । तर्जनी को पर उसका न्यास मध्य में रखने से ' सबीजा ' मुद्रा होती है, ऐसा द्विजगण मानते हैं । मध्य में अनेक ऊपर उठाकर कनिष्ठा को को रखकर अँगूठे के स्पर्श से बनी हुई ' भेदनी ' कहलाती है ॥३४-३६३ अँगुलियों के साथ मिली हुई तर्जनी से अँगूठे के द्वारा जल निक्षेप करने से ' कराली ' नामक ॥ नाभिदेश में उस मुद्रा को बाँधकर वहाँ महामुद्रा बन जाती है । उसको हृदय से लगाकर फिर पहले १ ' स्त्रीवले दूतिका ' पुस्तके नास्ति २ ख दि देशतः ३... Foundation USA ' सुकर्षिणम् ।
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एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ९ ७३ वज्रतुण्डा समाख्याता वज्रदेशे तु बन्धयेत् । उभाभ्यां चैव हस्ताभ्यां मणिबन्धं तु बन्धयेत् ॥३९ ॥
त्रीणि त्रीणि प्रसार्येति वज्रमुद्रा प्रकीर्तिता । दण्डः खड्गं चक्रगदा मुद्रा चाऽऽकारतः स्मृता ॥ ४० ॥
अङ्गुष्ठेनाऽऽक्रामेत्त्रीणि त्रिशूलं चोर्ध्वतो भवेत् । एका तु मध्यमोर्ध्वा तु शक्तिरेव विधीयते ॥४१ ॥
शरं च वरदं चापं पाशं भारं च घण्टया । शङ्खमङ्कुशमभयं पद्ममष्ट च विंशतिः ॥४२ ॥
ग्रहणी मोक्षणी चैव ज्वालिनी चामृताऽभया । प्रणीताः पञ्च मुद्रास्तु पूजाहोमे च योजयेत् ॥४३ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये त्वरितामन्त्रादिकथनं नाम दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१० ॥
अथैकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः त्वरितामूलमन्त्रादि अग्निरुवाच दीक्षादि वक्ष्ये विन्यस्य सिंहवज्राकुलेऽब्जके ॥१ ॥
त्तु त्तु हेति वज्रदेति पुरु पुरु लुलु लुलु गर्ज गर्ज ह ह सिंहाय नमः ॥२ ॥
तिर्यगूर्ध्वगता रेखाश्चत्वारश्चतुरो भवेत् । नवभागविभागेन कोष्ठकान्कारयेद्बुधः ॥३ ॥
ग्राह्या दिशागताः कोष्ठा विदिशासु विनाशयेत् । बाह्या वै कोष्ठकोणेषु बाह्यरेखाष्टकं स्मृतम् ॥४ ॥
की तरह ब्रह्मलग्न अँगूठे को ऊपर की ओर उठाना चाहिए । इसका नाम ' वज्रतुण्डा ' मुद्रा है । इसे वज्रदेश में बाँधना चाहिए । तीन - तीन अँगुलियों को फैलाकर दोनों हाथों से मणिबन्ध को बाँधने से ' वज्रमुद्रा ' बनती है । दण्ड, खड्ग, गदा तथा मुद्रा - ये सब मुद्राएँ अपने - अपने आकार की कही गयी हैं ॥ ३७-४० ॥ अँगूठे से तीन अँगुलियों को आक्रान्त करके उनको ऊपर उठावे तो यह त्रिशूल मुद्रा कहलाती है । एकमात्र मध्यमा ऊपर उठी हो तो शक्ति मुद्रा होती है । शर, वरद, चाप, पाश, भार, घण्टा, शंख, अंकुश, अभय तथा पद्म को मिलाकर अट्ठाईस मुद्राएँ होती हैं । ग्रहणी, मोक्षणी, ज्वालिनी, अमृता तथा अभया नामक पाँच प्रणीता मुद्राओं का प्रयोग पूजन और हवन काल में करना चाहिए ॥४१-४३ ॥ श्री अग्निमहापुराण में त्वरिता मन्त्रादि कथन नामक तीन सौ दसवाँ अध्याय समाप्त ॥३१० ॥
अध्याय ३११ त्वरितामूलमन्त्रादि अग्निदेव बोले - अब मैं त्वरिता की दीक्षा आदि के विषय में बतलाऊँगा । सिंह, वज्र तथा पद्म के रेखाचित्रों से पूर्ण स्थान में ' त्तु त्तु हेति वज्रदेति पुरु सिंहाय नमः ' - इस मन्त्र से अंगन्यास करके विद्वान् साधक को तिरछी तथा ऊपर की ओर गयी हुई चार - चार रेखाएँ खींचनी चाहिए । उसके बाद नव भागों में विभक्त कोणों का निर्माण करना चाहिए । परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि दिशाओं में बनाये गये कोष्ठ शुभकारक होते हैं और विदिशाओं के नाशकारक, फिर कोष्ठ के कोणों से बाहर - आठ बाह्य रेखाएँ खींचनी चाहिए ॥१-४ ॥ ये रेखाएँ बाह्य कोष्ठ के CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ७४ अग्निपुराणम् बाह्यकोष्ठस्य बाह्ये तु मध्ये यावत्समानयेत् । बाह्यरेखा भवेद्वक्रा द्विभंगा कारयेद्बुधः । कृष्णेन रजसाऽऽलिख्य कुलिशाशिस ( सिश ) रार्धता । द्वारे प्रदापयेन्मन्त्री चतुरो वज्रसंपुटान् ।
गर्भ रक्तं केसराणि मण्डले दीक्षिताः स्त्रियः ।
मूर्ति प्रणवसंदीप्तां हूंकारेण नियोजयेत् ॥
प्रथमेन पुनश्चैव कर्णिकायां प्रपूजयेत् दलमध्ये तु विद्यां गामाग्नेय्यां पञ्च नैर्ऋतम् हुतयः केशरस्थास्तु वामदक्षिणपार्श्वतः लोकपालान्यसेदष्टौ बाह्यतो गर्भमण्डले 1 पञ्चदशेन चाऽऽक्रान्तं स्वैः स्वैर्नामभियोजयेत् अष्टाभिर्वेष्टयेत्कुम्भैर्मन्त्राष्टशतमन्त्रितैः बाहर तथा मध्य पर्यन्त आनी चाहिए । वज्र के चित्रों वज्रस्य मध्यमं शृङ्गं बाह्यरेखा द्विधार्धतः ॥५ ॥
मध्यकोष्ठं भवेत्पद्यं ' पीतकर्णिकमुज्ज्वलम् ॥६ ॥
बाह्यतश्चतुरस्त्रं तु वज्रसंपुटलाञ्छितम् ॥७ ॥
( ' पद्मनाभ भवेद्वामवीथी चैव समा भवेत् ॥८ ॥
यजेच्च परराष्ट्राणि क्षिप्रं राज्यमवाप्नुयात् ॥९ ॥
मूलविद्यां समुच्चार्य मरुद्व्योमगतां द्विज ॥१० ॥
। एवं प्रदक्षिणं पूज्य एकैकं बीजमादितः ॥ ११ ॥
। मध्ये नेत्रं दिशास्त्रं च गुह्यकाङ्गे तु रक्षणम् ॥१२ ॥
। पञ्च पञ्च प्रपूज्यास्तु स्वैः स्वैर्मन्त्रैः प्रपूजयेत् ॥१३ ॥
। वर्णान्तमग्निमारूढं षष्ठस्वरविभेदितम् ॥१४ ॥
। शीघ्रं सिंहे कर्णिकायां यजेद्गन्धादिभिः श्रिये ॥१५ ॥
। मन्त्रमष्टसहस्त्रं तु जप्त्वाऽङ्गानां दशांशकम् ॥१६ ॥
के मध्य में शृंग का चित्र बनाना चाहिए । बाह्य रेखा को मध्य भाग से दो खण्ड कर देना चाहिए । बाह्य रेखा टेढ़ी होनी चाहिए । उसे विद्वान् साधक को दो स्थानों पर काट देना चाहिए । कोष्ठ के मध्य में पीली कर्णिकावाले श्वेत कमल की रचना करनी चाहिए । फिर कृष्णरज से वज्र, खड्ग तथा शर का चित्र बनाकर बाहर की ओर वज्र के चिह्न से चिह्नित चतुरस्र का निर्माण करना चाहिए । द्वार पर चार वज्र सम्पुटों का निर्माण करना चाहिए । उपर्युक्त प्रकार से बने हुए मण्डल के केन्द्र विन्दु को रक्तवर्ण के पराग से चिह्नित करना चाहिए । इस प्रकार के बने हुए मण्डल से स्त्रियों को भी दीक्षित किया जा सकता है । यदि कोई राजा इस प्रकार से दीक्षा लेता है तो वह दूसरों के राज्यों पर विजय प्राप्त कर लेता है और अपने भी खोये हुए राज्य को पुनः प्राप्त कर लेता है ॥५ - ९ ॥ अये द्विज! तत्पश्चात् साधक को वायु और आकाश के बीज ( यं हं ) से व्याप्त मूल विद्या का उच्चारण करते हुए उसकी प्रणव ( ओंकार ) से प्रकाशित मूर्ति को ' हूं ' कार के साथ स्थापित करना चाहिए । फिर कर्णिका के ऊपर प्रथम मन्त्र से पूजा करके प्रदक्षिणा करनी चाहिए । इस प्रकार आदि से एक - एक बीजमन्त्र से दल के बीच में विद्या तथा गौ की पूजा करके आग्नेय एवं नैर्ऋत्यकोणों में पाँच अङ्ग देवताओं का पूजन करना चाहिए, उसके बाद मध्य में नेत्र की तथा सम्पूर्ण दिशाओं में अस्त्र की पूजा करनी चाहिए । गुह्याङ्ग में रक्षा की तथा वाम - दक्षिण पार्श्व में केसरों के ऊपर विद्यमान पाँच - पाँच हुतियों की अपने - अपने मन्त्रों से अर्चना करनी चाहिए ॥१०-१३ ॥ गर्भमण्डल से बाहर आठ लोकपालों की स्थापना करनी चाहिए । वर्णान्त. ( क्ष ) को अग्नि ( र ) के ऊपर चढ़ाकर उसे छठे स्वर ( ऊ ) से विभेदित करे और ' पन्द्रहवें स्वर ' ( अनुस्वार ) को उसके सिर पर चढ़ाकर बने ‘ क्षूं ' बीज को आदि में रखकर अपने - अपने नाम मन्त्रों से लोकपालों का पूजना करना चाहिए । श्री प्राप्ति के लिए गन्ध, पुष्पादि से कर्णिका के ऊपर शीघ्र ही सिंह की पूजा करनी चाहिए । फिर उस कमल को एक सौ आठ मन्त्रों से अभिमन्त्रित आठ कलशों से वेष्टित कर आठ हजार मन्त्र का जाप करना चाहिए और उसके दशमांश ( अर्थात् १ ग. ' तवर्णीवसृज्जवप CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammimu. पानात by राज्यसत्त्रान्नुयात् च. पुस्तके नास्ति ।
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एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ९ ७५ होमं कुर्यादग्निकुण्डे वह्निमन्त्रेण चालयेत् । निक्षिपेद्धृदयेनाग्नि शक्तिं मध्येऽिग्नगां गर्भाधानं पुंसवनं जातकर्म च होमयेत् स्मरेत् ॥१७ ॥
। हृदयेन शतं ह्येकं गुह्याङ्गे जनयेच्छिखिम् ॥१८ ॥
पूर्णाहुतिं तु विद्यायाः शिवाग्निर्जनितो भवेत् । होमयेन्मूलमन्त्रेण निवेदयेत्ततो देव्यास्ततः शतं चाङ्गं दशांशतः ॥१९ ॥
शिष्यं प्रवेशयेत् । अस्त्रेण ताडनं कृत्वा गुह्याङ्गानि ततो न्यसेत् ॥२० ॥
विद्याङ्गैश्चैव संनद्धं विद्याङ्गेषु नियोजयेत् ॥ ' पुष्पं क्षिपाययेच्छिष्यमानयेदग्निकुण्डकम्॥२१ यवैर्धान्यैस्तिलैराज्यैर्मूलविद्याशतं ॥ हुनेत् । स्थावरत्वं पुरा होमं सरीसृपमतः परम् ॥२२ ॥
पक्षिमृगपशुत्वं च मानुषं ब्रह्ममेव च । विष्णुत्वं चैव रुद्रत्वमन्ते पूर्णाहुतिर्भवेत् ॥ २३ ॥
एकया चैव ' ह्याहुत्या शिष्यः स्याद्दी ( ष्योऽस्य दी ) क्षितोभवेत् । अधिकारो भवेदेवं शृणु मोक्षमतः परम् ' ॥२४ ॥
सुमेरुस्थो यदा मन्त्री सदाशिवपदे स्थितः । परे च होमयेत्स्वस्थोऽकर्मकर्मशतान्दश (? ) ॥२५ ॥
पूर्णाहुत्या तु तद्योगी धर्माधर्मैर्न लिप्यते । मोक्षं याति परं स्थानं यद्गत्वा न निवर्तते ॥२६ ॥
यथा जले जलं क्षिप्तं जलं देही शिवस्तथा । कुम्भैः कुर्याच्चाभिषेकं जयराज्यादिसर्वभाक्॥२७ ॥
आठ सौ मन्त्रों से ) अग्निकुण्ड में हवन करना चाहिए । पहले वह्निमन्त्र ( रं ) से कुण्ड में अग्नि को ले जाय और उठाकर हृदय मन्त्र से अग्नि की स्थापना करे तथा अग्निगामिनी शक्ति का ध्यान करना चाहिए ॥१४-१७ ॥ फिर गर्भाधान, पुंसवन तथा जातकर्म के लिए हृदय मन्त्र से एक सौ बार हवन करना चाहिए । इसके लिए गुह्याङ्ग मन्त्रों के जप से अग्नि उत्पन्न करना चाहिए । ( देवी के मन्त्रों की ) विद्या से पूर्णाहुति देनी चाहिए । इससे शिवाग्नि का जन्म सम्पादित होता है । तदनन्तर मूल मन्त्र से सौ बार हवन करके अंग देवता के लिए उसके दशांश की आहुति देनी चाहिए । उसके बाद देवी की स्तुति करके शिष्य का प्रवेश कराना चाहिए । उसे अस्त्र मन्त्र से ताड़न करके गुह्याङ्गन्यास करना चाहिए ॥१८-२० ॥ विद्याङ्गों में विद्याङ्ग मन्त्रों से कवच की स्थापना करनी चाहिए । उस पर शिष्य से पुष्पार्पण कराकर उसको अग्निकुण्ड के समीप ले जाना चाहिए । उसमें मूलमन्त्र से यव, धान्य, तिल तथा घी की सौ आहुतियाँ देनी चाहिए । पहले स्थावर को और तदनन्तर जंगम पक्षी, मृग, पशु, मनुष्य, ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश को आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति देनी चाहिए । इस प्रकार एक ही आहुति देने से शिष्य दीक्षित हो जाता है और उसको सभी ( धर्म ) कर्म करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है ॥ २१-२४ ॥ अब शिष्य को मोक्ष की प्राप्ति किस प्रकार होती है? इस सम्बन्ध में सुनो । जब मन्त्रसाधक सुमेरु स्थित होकर सदाशिव पद पर अवस्थित हो जाय तब कर्माकर्म की पूर्णता के लिए इस परम पद में एक सौ दस बार एकाग्र चित्त से होम करना चाहिए । जब पूर्णाहुति हो जाय तब वह धर्माधर्म से अलिप्त होकर परम पद मोक्ष को प्राप्त हो जायगा । जहाँ से फिर कहीं लौटना नहीं होता है । जैसे जल में फेंकने से वह जल ही हो जाता है उसी तरह जीव ( शिव से मिलकर ) शिव हो जाता है । कलशों के जल से अभिषेक करनेवाले को विजय तथा राज्य की प्राप्ति होती है ॥२५-२७ ॥ अनन्तर कुमारी ब्राह्मणी की पूजा करके गुरु आदि को दक्षिणा १ ग. पुष्पाक्षिपायसेच्छि ' । २ क. ' ष्पं विपाचये । ख. ष्पं क्षिपापये । ३ ख. ग. क्षिमूलप । ४ ख. चैवाऽऽज्याहु । ५ क. ' म् । खमे ' । ख. ग. ' म् । खमेकस्तोय ' । ६ ख. ग. ' पदास्थि ' । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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९ ७६ अग्निपुराणम्
' कुमारी ब्राह्मणी पूज्या गुर्वादेर्दक्षिणां ददेत् ।
तिलाज्यपूरहोमेन देवी श्रीः कामदा भवेत् ॥
जप्त्वा यक्षरलक्षं तु निधानाधिपतिर्भवेत् । चतुर्गुणेन ब्रह्मत्वं ततो विष्णुपदं भवेत् । दश जप्त्वा देहशुद्धयै तीर्थस्नानफलं शतात् । शतं सहस्रमयुतं जपे होमे प्रकीर्तितम् । महिषाजमेधमांसेन नरजेन पुरेण वा । श्रीफलैराज्यसंयुक्तैर्होमयित्वा व्रतं चरेत् । एकवासाविचित्रेण रक्तपीतासितेन वा । व्रजेद्दक्षिणदिग्भागं द्वारे दद्याद्बलिं बुधः । एवं च सर्वकामाप्तिं भुङ्क्ते सर्वां महीं नृपः यजेत्सहस्रमेकं तु पूजां कृत्वा दिने दिने ॥ २८ ॥
ददाति विपुलान्भोगान्यदन्यच्च समीहते ॥ ॥२९ २ ९ ॥ ॥ द्विगुणेन भवेद्राज्यं त्रिगुणेन च यक्षिणी ॥ ३० ॥
षड्गुणेन महासिद्धिर्लक्षेणैकेन पापहा ॥३१ ॥
पटे वा प्रतिमायां वा शीघ्रं वै स्थण्डिले यजेत् ॥३२ ॥
एवं विधानतो जप्त्वा लक्षमेकं तु होमयेत् ॥३३ ॥
तिलैर्यवैस्तथा लाजैव्रीहिगोधूमकाम्बुजैः ॥३४ ॥
अर्धरात्रेषु संनद्धः खड्गचापशरादिमान् ॥३५ ॥
नीलेन वाऽथ वस्त्रेण देवीं तैरेव चार्चयेत् ॥३६ ॥
दूतीमन्त्रेण द्वारादावेकवृक्षे ४ श्मशानके ॥ ॥३७ ॥
इत्यादिमहापुराण आग्नेये त्वरितामूलमन्त्रादिकथनं नामैकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३११ ॥
देनी चाहिए । इस तरह प्रतिदिन पूजा करके एक सहस्र बार तिल और घी से हवन करने से लक्ष्मी देवी कामनाओं को पूर्ण करती हैं और उन विपुल अभीष्ट भोगों को प्रदान करती हैं, जो - जो भी साधक उनसे चाहता है । मन्त्र में जितने अक्षर हैं, उतने लाख बार जप करने से मनुष्य निधियों का अधिपति हो जाता है । उसका दूना जप करने से राज्य की प्राप्ति होती है । तिगुना जप करने से यक्षिणी सिद्ध हो जाती है, चौगुना जप करने से ब्रह्मपद तथा पाँच-गुना जप से विष्णुपद की प्राप्ति होती है । एक लाख बार इस मन्त्र का जप करने से पापों का नाश होता है ॥२८-३१ ॥ दस बार जप करने से देहशुद्धि होती है और सौ बार जप करने से तीर्थस्थान के फल की प्राप्ति होती है । स्थण्डिल ( एक हाथ का बनाया हुआ रेत का चबूतरा ) पर पट ( पटलिखित चित्र ) या प्रतिमा रखकर देवी का पूजन, जप तथा होम एक सौ बार, एक हजार बार अथवा दस हजार बार करना चाहिए । इस प्रकार विधिपूर्वक जप करके एक लाख आहुतियाँ देनी चाहिए । भैंसा, बकरा तथा भेंड़े के मांस से या नर के मांस से अथवा गुग्गुलु, तिल, यव, लावा, व्रीहि, गेहूँ, कमल, श्रीफल एवं घी से हवन करके व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए ॥३२-३४३ ॥ आधी रात को कवच, खड्ग, धनुष, बाण तथा केवल एक वस्त्र धारण करके रंग - बिरंगे, लाल, पीले, काले अथवा नीले वस्त्र से देवी का पूजन करना चाहिए । फिर दक्षिण दिशा की ओर कुछ दूर चलकर दूती मन्त्र से द्वार पर बलि चढ़ानी चाहिए । यह बलि द्वार आदि में अथवा एक वृक्षवाले श्मशान में भी दी जा सकती है । ऐसा करनेवाला राजा सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करके भूमण्डल का उपयोग करता है ॥३५-३७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में त्वरिता मूलमन्त्रादि कथन नामक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥३११ ॥
१ कुमारी " ददेत् CC ग -. 0. पुस्तके JK Sanskrit नास्ति Academy । २, Jammmu ख. ग. पूर्णां . Digitized । ३ by कङ्ग S3 Foundat न मेरजेला परे । ४ क. ङ. ' क्षेण शौन ' ।