अग्नि पुराण — पृष्ठ 981–990

अग्नि पुराण · Hindi Sahitya Sammelan Prayag · पृष्ठ 981–990

पृष्ठ 981

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द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ९ ७७ अथ द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः त्वरिताविद्या अग्निरुवाच विद्याप्रस्तावमाख्यास्ये ' धर्मकामादिसिद्धिदम् अनुलोमविलोमेन समस्तव्यस्तयोगतः ४ त्रित्रिकेण च योगेन देव्या संनद्धविग्रहः शास्त्रे शास्त्रे स्मृता मन्त्राः प्रयोगास्तत्र दुर्लभाः प्रस्तावे तत्र चैकार्णा वर्णा द्व्यर्णादयोऽभवन् । नव कोष्ठा भवन्त्येवं मध्यदेशे तथाऽऽदिमान् । प्रस्तावक्रमयोगेन ( ण ) प्रस्तावं यस्तु विन्दति । त्रैलोक्यं पादमूले स्यात्रवखण्डां भुवं लभेत् । श्मशानकर्पटे वाऽथ बाह्ये निष्क्रम्य मन्त्रवित् ) ॥ नवकोष्ठविभागेन विद्याभेदं च विन्दति ॥ १ ॥

। कर्णाविकर्णयोगेन अत ऊर्ध्वं विभागशः ॥२ ॥

। जानाति सिद्धिदान्मन्त्रान्प्रस्तावान्निर्गतान्बहून् ॥३ ॥

। गुरुः स्यात्प्रथमो वर्णः फुल्लपल्लववर्णवत् ॥४ ॥

( ' तिर्यगूर्ध्वगता रेखाश्चतुरश्चतुरो (? ) भजेत् ॥५ ॥

प्रदक्षिणेन संस्थाप्य प्रस्तावं भेदयेत्ततः ॥ ६ ॥

करमुष्टिस्थितास्तस्य साधकस्य हि सिद्धयः ॥७ ॥

कपाले तु समालिख्य शिवतत्त्वंं समन्ततः ॥८ ॥

तस्य मध्ये लिखेन्नाम कर्णिकोपरि संस्थितम् ॥९ ॥

अध्याय ३१२ त्वरिताविद्या अग्निदेव बोले- अब मैं धर्म और काम आदि की सिद्धि देनेवाले विद्याप्रस्तार का वर्णन करूँगा । नव कोष्ठों के विभाग से अनुलोम - विलोम भाव से, समस्त व्यस्त योग से, कर्ण और अविकर्ण योग से और अध - ऊर्ध्व विभाग से विद्या के अनेक भेद हो जाते हैं ॥१-२ ॥ कवच धारण करनेवाले साधक त्रित्रिक योग के बल से देवी के सिद्धिदायक मंत्रों तथा प्रस्तारों को जान लेते हैं । अनेक शास्त्रों में, अनेक मन्त्र बतलाये गये हैं । किन्तु उन मन्त्रों का प्रयोग करना कठिन है । ‘ फुल्ल ’, ‘ पल्लव ' अथवा ' वर्ण ' ( पदों ) के समान मन्त्र का प्रथम अक्षर गुरु होता है । प्रस्तार में एकाक्षर वर्ण द्वयक्षर माने गये हैं । चार पड़ी रेखाओं के ऊपर चार समानान्तर खड़ी रेखाएँ खींचकर नौ कोष्ठक बन जाते हैं । इनमें से बीच के कोष्ठक के ऊपर एक वृत्त बनाकर मन्त्र के विभिन्न अक्षरों को एक - एक कोष्ठक में लिखकर प्रस्तार का भेदन कर देना चाहिए || ३-६ ॥ जो साधक इस मन्त्र प्रस्तार तथा इसके विभिन्न कोष्ठकों में लिखे हुए मन्त्र को जानता है वह सभी सिद्धियों को करतलगत कर लेता है । तीनों लोक उसके चरण पर लोटते हैं और वह पृथ्वी के नवद्वीपों का लाभ कर लेता है । मन्त्रवेत्ता साधक को कपाल ( खप्पर ) पर शिवमन्त्र लिखकर श्मशान भूमि में जाकर मुर्दे के वस्त्र को उठा लाना चाहिए । इस वस्त्र के ऊपर उपर्युक्त देवी चन्द्र बनाकर उसके प्रत्येक दल पर १ क. ग. ङ. ॰स्तारमा । २ क. ङ. ' भेदश्च विद्यते । अ । ३ क. ङ. ' र्णाधिक ' । च. ' र्णाविवर्ण । ४ क. ङ. ' के शिवयो ” । ५ ख. ग. “ र्णः पहृत्युन्नव । ६ Sanskrit तिर्यगूर्ध्वगता Academy, , Jammmu मंत्रवित . Digitized क ङ्ख by, पुस्तकयोर्नास्तिड ६२

पृष्ठ 982

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९ ७८ अग्निपुराणम् तापयेत्खादिराङ्गारैर्भूर्जमाक्रम्य पादयोः । वज्रसंपुटगर्भे तु द्वादशारे तु लेखयेत् । कुड्ये फलकके वाऽथ शिलापट्टे हरिद्रया । विषरक्तेन संलिख्य श्मशाने कर्पटे बुधः । मारयेदचिरादेष श्मशाने निहतं रिपुम् । चक्रधारां गतां शक्तिं रपुनाम्ना रिपुं हरेत् । विदर्भरिपुनामाथ श्मशानाङ्गारलेखितम् । भेदने छेदने चैव मारणेषु शिवो भवेत् । दहनादि प्रयोगोऽयं ' शाकिनीं चैव कर्षयेत् । कुष्ठाद्या ( द्य ) व्याधिरोगं तु नाशयेन्नात्र संशयः । रक्षयेदात्मनो ' विद्यां प्रतिवादी सदाशिवः । सौम्यादि मध्यमान्तं तु गुरुत्वं जायते वटे । शत्रु का नाम लिखना चाहिए । तदनन्तर खैर की लकड़ी सप्ताहादानयेत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१० ॥

मध्ये तु गर्भगं नाम सदाशिवविदर्भितम् ॥११ ॥

मुखस्तम्भं गतिस्तम्भं सैन्यस्तम्भं तु जायते ॥ १२ ॥

षट्कोणं दण्डमाक्रान्तं समन्ताच्छक्तियोजितम् ॥१३ ॥

छेदं करोति राष्ट्रस्य चक्रमध्ये न्यसेद्रिपुम् ॥१४ ॥

तार्येणैव तु बीजेन खड्गमध्ये तु लेखयेत् ॥ १५ ॥

सप्ताहात्साधयेद्देशं ताडयेत्प्रेतभस्मना ॥१६ ॥

तारकं नेत्रमुद्दिष्टं शान्तिपुष्टौ नियोजयेत् ॥ १७ ॥

मेध्यादिवारुणीं " यावद्वक्रतुण्डसमन्वितः ॥ १८ ॥

मध्यादि उत्तरान्तं तु करालीबन्धनाज्जपेत् ॥१९ ॥

वारुण्यादि ततो न्यस्य ' ज्वरक्लेशविनाशनम् ॥२० ॥

पूर्वादिमध्यमान्तं तु लघुत्वं कुरुते क्षणात् ॥२१ ॥

से भोजपत्र को तपाकर उसे अपने पैरों के नीचे दबाना चाहिए । ऐसा करने से एक सप्ताह के भीतर चराचर सहित तीनों लोक उसके वशीभूत हो जायँगे ॥७-१० ॥ वज्र की रेखा से अंकित और सदाशिव मन्त्र के अक्षरों से विदर्भित द्वादश दल कमल के मध्य में अपने शत्रु का नाम लिखना चाहिए । दीवार, तख्ते या शिलापट्ट पर हल्दी से इस प्रकार लिखकर किसी ( शत्रु ) का वाक्स्तम्भ, गतिस्तम्भ तथा सैन्यस्तम्भ किया जा सकता है ॥११-१२ ॥ विद्वान् साधक को श्मशान के कपड़े पर विष मिश्रित रक्त से षट्कोण बनाना चाहिए, जो कि दण्ड से आक्रान्त तथा चारों ओर से शक्ति से वेष्टित हो । उस दण्ड से श्मशान में शत्रु के चित्र को मारने से शत्रु शीघ्र ही मर जाता है । चक्र के मध्य में शत्रु की प्रतिमा को रख देने से उसका राष्ट्र छिन्न - भिन्न हो जाता है ॥१३-१४ ॥ चक्र की धारा पर स्थित शक्ति से शत्रु का नाम लेकर प्रहार करने से शत्रु का नाश हो जाता है । गरुड़ के बीजमन्त्र से खड्ग के मध्य में श्मशान के कोयले से शत्रु का नाम विदर्भ विधि से लिखना चाहिए । फिर सात दिन उसके ऊपर प्रेतभस्म छिड़ककर श्मशान की साधना करनी चाहिए । ऐसा करने से साधक भेदन, छेदन तथा मारण कर्मों में शिव के समान सिद्धहस्त हो जाता है । तारक तथा नेत्र मन्त्रों का विनियोग शान्ति तथा पुष्टि कर्म के लिए करना चाहिए ॥१५-१७ ॥ यह कर्म दहनादि प्रयोग कहलाता है । इससे शाकिनी भी आकृष्ट हो जाती है । पूर्वोक्त नौ चक्रों में मध्यगत मन्त्राक्षर से लेकर पश्चिम दिशावर्ती कोष्ठक तक के अक्षरों को वक्रतुण्डा मन्त्र के साथ जपने से यह कुष्ठ आदि व्याधियों का नाश करता है, इसमें संशय नहीं है । उसी चक्र के मध्य से लेकर उत्तर पर्यन्त अक्षरों का कराली मन्त्र के साथ जप करने से अपनी विद्या की रक्षा वह सदाशिव के समान प्रतिवादी से भी कर लेता है । पश्चिम आदि दिशाओं में न्यास करने से ज्वर का क्लेश मिट जाता है । उत्तर से लेकर मध्यम तक न्यास करने से साधक की इच्छा के अनुसार वट का बीज भी भारी हो जाता है और पूर्व से लेकर मध्यम तक न्यास करने से वह तुरन्त हल्का हो जाता है ॥१८-२१ ॥ भोजपत्र के ऊपर गोरोचन से वज्रयुक्त उपर्युक्त चक्र को बनाकर १ क. ङ. सुधीः । २ ख. कं ' तत्त्वमु ' । ३ क. ङ. ' त् । देहाना रिपुयो । ४ " शाकिनी कर्षयेत्क्षणात् " इति क. ङ.. पुस्तकयोः पाठः । ५ क. ङ. “ द्वज्रतु ०.६ दोसा ), Dig शोकवि s Foda. म् । सोश्वादिमध्यमान्तस्तु गुरौं ।

पृष्ठ 983

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त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ९ ७ ९ भूर्जे रोचनयाऽऽलिख्य एतद्वज्राकुलं परम् । क्रमस्थैर्मन्त्रबीजैस्तु वेष्टितां भावहेम्ना च रक्षेयं रक्षां देहेषु कारयेत् ॥ २२ ॥

मृत्युनाशिनी । विघ्नपापारिदमनी सौभाग्यायुः प्रदा धृता ॥२३ ॥

द्यूते रणे च जयदा शक्रसैन्ये न संशयः । वन्ध्यानां पुत्रदा ह्येषा चिन्तामणिरिवापरा २ साधयेत्परराष्ट्राणि राज्यं च पृथिवीं जयेत् । फट् स्त्रीं क्षे हुं लक्षजप्याद्यक्षादिर्वशगो ॥२४ ॥

भवेत् ॥२५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये त्वरिताविद्यासिद्धिकथनं नाम द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥३१२ ॥

अथ त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः नानामन्त्राः अग्निरुवाच ॐ विनायकार्चनं वक्ष्ये यजेदाधारशक्तिकम् । धर्माद्यष्टककन्दं च नालं पद्मं च कर्णिकाम् ॥१ ॥

केसरं त्रिगुणं पद्मं तीव्रं च ज्वलिनीं यजेत् । नन्दां च सुयशां चोग्रां ' जीवन्तीं विन्ध्यवासिनीम् ॥२ ॥

गणमूर्ति गणपतिं हृदयं स्याद्गणंजयः । एकदन्तोत्कटशिरः शिखायाचलकर्णिने ॥३ ॥

गजवक्त्राय कवचं हूं फडन्तं तथाऽष्टकम् । महोदरी दण्डहस्तः पूर्वादौ मध्यतो यजेत् ॥४ ॥

सोने के ताबीज में रखकर भुजा पर बाँध लेने से शरीर की रक्षा हो जाती है । इससे मृत्यु का नाश होता है । इससे विघ्न पापरूपी शत्रु का दमन होता है और सौभाग्य तथा आयु की प्राप्ति होती है । यह विद्या द्यूत में तथा रण में इन्द्र - सेना से भी विजय दिलाती है, इसमें सन्देह नहीं है । यह वन्ध्याओं को पुत्र देती है । इसे दूसरा चिन्तामणि मन्त्र समझना चाहिए । इसके बल से मनुष्य दूसरे के राष्ट्र को जीत सकता है और राज्य तथा पृथिवी प्राप्त कर सकता है । फट् स्त्रीं झैं हूं - इस मन्त्र को एक लाख बार जपने से यक्ष आदि वशीभूत हो जाते हैं ॥२२-२५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में त्वरिताविद्यासिद्धि - कथन नामक तीन सौ बारहर्वा अध्याय समाप्त ॥३१२ ॥

अध्याय ३१३ नानामन्त्र- कथन अग्निदेव बोले - अब मैं विनायक की पूजा बतला रहा हूँ । पहले योगपीठ पर आधार शक्ति की पूजा करनी चाहिए । तदनन्तर पूर्व आदि दिशाओं में धर्म आदि आठ तत्त्वों की तथा कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका, केसर, त्रिगुण, पद्म की तथा तीव्रा, ज्वलिनी, नन्दा, सुयशा, उग्रा, जीवन्ती, विन्ध्यवासिनी आदि नौ शक्तियों की पूजा करे । तत्पश्चात् गणेश की मूर्ति का पूजन - ध्यान करे । अंगन्यास का प्रकार यह है - गणंजयाय हृदयाय नमः, एकदन्ताय उत्कटाय शिरसे स्वाहा, अचलाकर्णिने शिखायै वषट्, गजवक्त्राय हूं फट् कवचाय हुम्, महोदराय दण्डस्ताय अस्त्राय फट् । इन पाँच अंगो में से चार की तो पूर्वार्ध चार दिशाओं में और पाँचवें की मध्य भाग में पूजा करे ॥१-४ ॥ तदनन्तर गणंजय, १ ख. ' तां तारहे । २ साधयेत्परराष्ट्राणि " भवेत् नास्ति च. पुस्तके । ३ क. ङ. च. सनालं पञ्चक ' । ४ ख. ग. केशव । ५ ख. ग. जपेत् । ६ ख. ग. तेजोवती क. A Sideha. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 984

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९ ८० अग्निपुराणम् जयो गणाधिपो गणनायकोऽथ गणेश्वरः । वक्त्रो विकटनामाऽथ हूं पूर्वो विघ्ननाशिने । त्रिपुरायजनं वक्ष्ये असिताङ्गो रुरुस्तथा । ( ' संहारो भैरवो ब्राह्मी मुख ह्रस्वास्तु भैरवाः । समयपुत्रो व ( ब ) टुको योगिनीपुत्रकस्तथा । हेतुकः क्षेत्रपालश्च त्रिपुरान्तो द्वितीयकः । एकपादश्च भीमाक्ष ऐं क्षं प्रेतस्तथाऽऽसनम् । बिभ्रत्यभयपुस्तं च वामे वरदमालिकाम् । गोमध्ये नाम संलिख्य चाष्टपत्रे च मध्यतः । चिताङ्गारपिष्टकेन मूर्ति ध्यात्वा तु तस्य च । ॐ नमो भगवति जा ( ज्वा ) लामानि ( लि ) नि युद्धे गच्छञ्जपन्मन्त्रं पुमान्साक्षाज्जयो भवेत् ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रियै नमः वक्रतुण्ड एकदन्तोत्कटलम्बोदरो गजः ॥५ ॥

धूम्रवर्णो महेन्द्राद्यो बाह्ये विघ्नेशपूजनम् ॥६ ॥

चण्डः क्रोधस्तथोन्मत्तः कपाली भीषणः क्रमात् ॥७ ॥

ब्रह्माणी षण्मुखा दीर्घा अन्यादौ वटुकाः क्रमात् ) ॥८ ॥

सिद्धपुत्रश्च बटकः कुलपुत्रश्चतुर्थकः ॥ ९ ॥

अग्निवेतालोऽग्निजिह्नः करालीकाललोचनः ॥ १० ॥

( ॐ ) ऐं ह्रीं द्यौश्च त्रिपुरा पद्मासनसमास्थिता ॥११ ॥

मूलेन हृदयादि स्याज्जालपूर्णं च ' कार्मुकम् ॥ १२ ॥

श्मशानादिपटे श्मशानाङ्गारेण विलेखयेत् ॥१३ ॥

क्षिप्त्वोदरे नीलसूत्रैर्वेष्ट्य चोच्चाटनं भवेत् ॥ १४ ॥

गृध्रगणपरिवृते स्वाहा ॥१५ ॥

॥१६ ॥

॥१७ ॥

गणाधिप, गणनायक, गणेश्वर, वक्रतुण्ड, एकदन्त, उत्कट, लम्बोदर, गजवक्त्र, विकटनामा ( विकटानन ) इन सब की पद्मदलों में पूजा करे । फिर मध्य भाग में ' हूं विघ्ननाशनाय नमः ' ' महेन्द्राय धूम्रवर्णाय नमः ' यों बोलकर विघ्ननाशन और धूम्रवर्ण की पूजा करे । फिर बाहर की ओर विघ्नेश की अर्चना करनी चाहिए ॥५-६ ॥ अब मैं त्रिपुरा का पूजन बलता रहा हूँ । असिताङ्ग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण, संहार इन आठ भैरवों की आठ ह्रस्व स्वरों से तथा ब्राह्मी आदि आठ मातृकाओं की आठ दीर्घ स्वरों से पूजा करके आग्नेयी आदि दिशाओं में क्रमशः चार वटुकों की पूजा करनी चाहिए । समयपुत्र, योगिनीपुत्र, सिद्धपुत्र तथा कुलपुत्र में चार बटुक हैं । इनके बाद आठ क्षेत्रपाल पूजनीय हैं । इनके नाम - त्रिपुरान्त, अग्निवेताल, अग्निजिह्व, कराल, काललोचन, एकपाद तथा भीमाक्ष हैं । इन सबका पूजन करके त्रिपुरा देवी के प्रेत रूप पद्मासन की पूजा करे । जैसे ऐं क्षं प्रेतपद्मासनाय नमः । ‘ ॐ ऐं ह्रीं द्यौ: त्रुिपरायै प्रेतपद्मासनमास्थितायै नमः ' इस मन्त्र से प्रेत पद्मासन पर विराजमान त्रिपुरा भैरवी की पूजा करे । उनका ध्यान इस प्रकार है - उनके दायें हाथ में अभयास्त्र तथा पुस्तक विद्यमान है और बायें हाथ में वरदमुद्रा एवं माला । देवी बाणसमूह से भरा तरकस और धनुष भी लिये रहती है । इस प्रकार ध्यान करके मूलमन्त्र से हृदयादि न्यास करे । गायों के बीच में अष्टदल कमल के मध्य भाग में शत्रु का नाम श्मशान के कपड़े पर श्मशान के ही कोयले से लिखना चाहिए ॥७-१३ ॥ तत्पश्चात् चिता के कोयलों के चूर्ण से बनी ( शत्रु ) मूर्ति का ध्यान करके कमर में नीला धागा लपेट देना चाहिए ॥१४ ॥ ' ॐ नमो भगवति ज्वालामालिनि गृध्रगणपरिवृते स्वाहा ' - इस मन्त्र का जप करते

हुए, युद्ध में जाने से मनुष्य निश्चय ही विजय प्राप्त कर लेता है । ' ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रियै नमः ' - इस मन्त्र से उत्तर १ ' संहारो क्रमात् ' का झपुस्तकयोर्नास्तिकायाश्वश्च भीमाख्य ऐं । ३ ख. ग. कामकम् ।

पृष्ठ 985

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त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः उत्तरादौ च घृणिनी सूर्या पूज्या चतुर्दले । ॐ ह्रीं गौर्यै नमः गौरीमन्त्रः सर्वकरो होमाद्ध्यानाज्जपार्चनात् । अङ्कुशाभययुक्तां तां प्रार्थ्य सिद्धात्मना पुमान् । क्रुद्धः प्रसादी भवति युधि मन्त्राम्बुपानतः । तज्जपान्मैथुनं वश्ये तज्जपा ' द्योनिवीक्षणम् । सप्ताभिमन्त्रितं चान्नं भुञ्जंस्तस्य श्रियः सदा । अनङ्गरूपा शक्तिश्च द्वितीया मदनातुरा । अनङ्गमदनानङ्गमेखलां तां जपेच्छ्रिये । षट्कोणे वा ' घटे वाऽथ लिखित्वा स्याद्वशीकरम् । ॐ ह्रीं छू नित्यक्लिन्ने मदद्रवे । ॐ ॐ मूलमन्त्रः षडङ्गोऽयं रक्तवर्णे त्रिकोणके । ईशानादौ च मध्ये तां नित्यां पाशाङ्कुशौ तथा । ९ ८१ आदित्या प्रभावती च सोमात्रिमधुराच्छ्रियः (? ) ॥ १८ ॥

॥१९ ॥

रक्ता चतुर्भुजा पाशवरदा दक्षिणे परे ॥ २० ॥

जीवेद्वर्षशतं धीमान्न चौरारिभयं भवेत् ॥ २१ ॥

' अञ्जनं तिलकं वश्यो जिह्वाग्रे कविता भवेत् ॥२२ ॥

स्पर्शावशी तिलहोमात्सर्वं चैव तु सिद्धयति ॥ २३ ॥

अर्धनारीशरूपोऽयं लक्ष्म्यादिवैष्णवादिकः ॥२४ ॥

पवनवेगा भुवनपाला वै सर्वसिद्धिदा ॥२५ ॥

' पद्ममध्यदलेषु ह्रीं स्वरान्कादींस्ततः स्त्रियाः ॥२६ ॥

॥२७ ॥

॥२८ ॥

द्रावणी ह्लादकारिणी क्षोभिणी गुरुशक्तिका ॥ २ ९ ॥ कपालकल्पकतरूं वीणा रक्ता च तद्वती ॥ ३० ॥

आदि दिशाओं में चतुर्दल कमल से, घृणिनी, सूर्या, आदित्या तथा प्रभावती की पूजा करने से लक्ष्मी प्राप्त होती है । ये सभी देवियाँ सुवर्णं गिरि के समान सुन्दर कान्तिवाली हैं । ' ॐ ह्रीं गौर्यै नमः ' - इत्यादि गौरी मन्त्र से हवन, उसका ध्यान, जप तथा पूजन करने से सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं । भगवती का वर्ण लाल है, भुजाएँ चार हैं, दाहिने हाथों में पाश तथा वरद मुद्रा है और बायें हाथों में अंकुश तथा अभय मुद्रा है - ऐसा ध्यान करते हुए प्रार्थना करनेवाला सिद्धात्मा पुरुष सौ वर्ष तक जीवित रहता है और उसे चोर तथा शत्रु का भय नहीं रहता ॥ १५-२१ ॥ युद्ध में इस मन्त्र को पढ़कर जल पीने से क्रुद्ध व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है । इसको पढ़कर तिलक या अंजन लगाकर जिसकी ओर देखा जायगा वही वशीभूत हो जायगा । इसका जप करने से कविता जिह्वाग्रवर्तिनी होती है, मैथुन वशीभूत होता है तथा योनिवीक्षण करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है । किसी का स्पर्श कर देने से वह वशीभूत हो जाता है और इस मन्त्र को पढ़कर तिल से हवन करने से सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥२२-२३ ॥ इस मन्त्र से सात बार अन्न को अभिमंत्रित करके भोजन करने से सदैव के लिए श्री की प्राप्ति हो जाती है । इसके आदि में लक्ष्मी बीज ( श्रीं ) और वैष्णव बीज क्लीं जोड़ दिया जाय तो यह अर्धनारीश्वर मन्त्र हो जाता है । रूपा, अनङ्गमदनातुरा, पवनवेगा, भुवनपाला, सर्वसिद्धिदा, अनङ्गमदना तथा अनङ्गमेखला का पूजन करके इस मन्त्र का जप करने से लक्ष्मी प्राप्त होती है । षट्कोण या घट के ऊपर कमलदल के मध्य में ह्रीं स्वर, क आदि वर्ण तथा स्त्री का चित्रण करके मन्त्र का जप करने से वशीकरण सिद्ध होता है । ' ॐ ह्रीं छू ( ऐं ) नित्यक्लिन्ने महद्रवे । ॐ, ॐ ' यह षडङ्ग मूलमन्त्र कहलाता है । इसे रक्त वर्ण के त्रिकोणात्मक मन्त्र के ऊपर लिखना चाहिए ॥२४-२८३ ॥ ईशान आदि विदिशाओं में द्रावणी, ह्लादकारिणी, क्षोभिणी और गुरशक्तिका तथा मध्य में नित्या का पूजन करना चाहिए । यह नित्या अपने हाथों में पाश, अंकुश, कपाल, कल्पतरु लिये हुए है । यह रक्तवर्ण तथा रक्तवस्त्र और चीणा धारण १ ख. ङ. अर्जुनं । २ च. वश्यं । ३ ख. ग. निरीक्ष । ४ ख. ग. ° ले वह्निं स्व ॥ ५ ख. पटे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 986

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९ ८२ अग्निपुराणम् नित्याऽभया मङ्गला च नववीरा च मंगला । दुर्भगा मनोन्मनी पूज्या द्रावा पूर्वादितः स्थिता ॥३१ ॥

ॐ ह्रीम् अनङ्गाय नमः । ॐ ह्रीं स्मराय नमः ॥३२ ॥

मन्मथाय च माराय कामायैवं च पञ्चधा । कामाः पाशाङ्कुशौ चापबाणा ध्येयाश्च बिभ्रतः ॥३३ ॥

रतिश्च विरतिः प्रीतिर्विप्रीतिश्च मतिर्धृतिः । विधृतिः पुष्टिरेभिश्च क्रमात्कामादिकैर्युताः ॥ ३४ || ॐ छं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ॐ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ऌ ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्षः ॐ छं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा ' ॥३५ ॥

` आधारशक्तिं पद्मं च सिंहे देवीं हृदादिषु ॥३६ ॥

ॐ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि हूं फट् स्वाहा ॥३७ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये नानामन्त्रकथनं नाम त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३१३ ॥

अथ चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः त्वरिताज्ञानम् अग्निरुवाच ॐ ह्रीं हूं खे छेक्षः स्त्रीं हूं क्षे ह्रीं फट् त्वरितायै नमः ॥१ ॥

किये हुए है । नित्या, अभया, मंगला, नववीरा, सुमंगला, दुर्भगा, मनोन्मनी तथा द्रावा की पूजा क्रमशः पूर्वादि दिशाओं में करनी चाहिए । पाश, अंकुश, धनुष तथा बाण धारण किये हुए पाँच कामदेवों का ध्यान करके इस मन्त्र का जप करना चाहिए ‘ ॐ ह्रीं अनङ्गाय नम । ॐ ह्रीं स्मराय नमः, ॐ ह्रीं मन्मथाय नमः, ॐ ह्रीं माराय नमः, ॐ ह्रीं कामाय नमः, ये ही पाँच कामदेव हैं ॥ २ ९ -३३ ॥ इनके साथ रति - विरति, प्रीति- विप्रीति, मति - विमति, धृति - विधृति तथा तृष्टि - पुष्टि इन युगल कामवल्लभाओं का क्रमशः पूजन करके ' ॐ छं ( ऐं ) नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा ', यह नित्यक्लिन्ना विद्या है । सिंहासन पर आधारशक्ति तथा पद्म का पूजन करके उसके दलों में हृदय आदि अंगों की स्थापना एवं पूजन करने के बाद मध्यकर्णिका में देवी की पूजा करनी चाहिए । उसका मन्त्र यह है - ॐ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि हूं फट् स्वाहा ' ॥३४-३७ ॥ श्री अग्निमहापुराण में नानामन्त्र कथन नामक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥३१३ ॥

अध्याय ३१४ त्वरिता - ज्ञान कथन अग्निदेव बोले - ' ॐ ह्रीं त्वरितायै नमः ' - इस मन्त्र से अंगन्यास करके दो भुजाओंवाली अथवा आठ १ एतस्मात्पुरत: - ‘ हरीम्, ॐ ह्रीं नित्यशक्तिन्ने मदद्रवे स्वाहा ' इत्यधिकं क. ख. पुस्तके । २ आधारशक्तिं हृदादिषु नास्ति क. ख. ग. ङ. पुस्तकेषु । गहरी demy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 987

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चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः त्वरितां पूजयेन्त्र्यस्य द्विभुजां चाष्टबाहुकाम् पूर्वादौ गायत्रीं यजेन्मण्डले वै प्रणीतया ' हूंकारी क्षेमकारीं च फट्कारीं मध्यतो यजेत् तिलैर्होमश्च सर्वाप्त्यै नामव्याहृतिभिस्तथा स्वाहा वासुकिराजाय शङ्खपालाय वौषट् (? ) स्वाहा कर्कोटनागाय षट्पद्माय च वै नमः वस्त्रे पदे तनौ भूर्जे शिलायां यष्टिकासु च । ॐ हूं धूं छन्द च्छन्द चतुरः कण्ठकां कालरात्रिकाम् ' कराली नारवमालीकालीलमोक्षमोनली " । १३ ( पमयाटटयाटमोटमा मोटमा यमराजाद्बाह्यतो रं तं तोयं मारणात्मकम् । " अङ्गारेण सभायुक्तं पिङ्गलाधारसंयुतम् । ९ ८३ । आधारशक्तिं पद्मं च सिंहे देवीहृदादिकम् ॥२ ॥

। ' हुंकारां खेचरीं चण्डां छेदनीं क्षेपणीं स्त्रियाः ॥३ ॥

। जयां च विजयां द्वारि किंकरं च तदग्रतः ॥४ ॥

। अनन्ताय नमः स्वाहा कुलिकाय नमः स्वाहा ॥५ ॥

। ' तक्षकाय " वषनित्यं महापद्माय वै नमः ॥६ ॥

। लिखेन्निग्रहचक्रं तु एकाशीतिपदैर्नरः ॥७ ॥

मध्ये कोष्ठे साध्यनाम पूर्वादौ पट्टिकासु च ॥८ ॥

। ' ऐशादावशुपादो ' च यमराज्यं च बाह्यतः ॥९ ॥

मामोदेतत्तदेमोना रक्षत स्व स्व भक्ष या ” ॥१० ॥

। मोमोद्गाभूचिरिभूपाटटवीश्वरीश्चाटट ॥११ ॥

" कज्जलं निम्बनिर्यासमज्जासृग्विषसंयुतम् ॥१२ ॥

काकपक्षस्य लेखन्या श्मशाने वा चतुष्पथे ॥१३ ॥

भुजाओंवाली त्वरिता देवी की आधार शक्ति तथा अष्टदल कमल की तथा सिंहासन पर विराजित त्वरिता देवी की तथा उनके चारों तरफ हृदयादि अंगों की पूजा करनी चाहिए । पूर्व आदि दिशाओं में मण्डल के ऊपर प्रणीता मुद्रा से गायत्री, हूंकारा, खेचरी, चण्डा, छेदनी, क्षेपणी, हूंकारी तथा क्षेमकारी का यजन करना चाहिए । मध्य में फट्कारी की, द्वार पर जया, विजया की और उसके आगे किंकर की पूजा करनी चाहिए । नाम त्वरिता मन्त्र तथा ( ॐ भूर्भुवः स्वः ) व्याहृतियों का उच्चारण करके ' अनन्ताय नमः स्वाहा ', ' कुलिकाय नमः स्वाहा ', ' वासुकिराजाय स्वाहा ', ' शङ्खपालाय ' वौषट्, ' तक्षकाय ' वषट्, ' महापद्माय नमः ', ' कर्कोटनागाय स्वाहा ', ' पद्माय नमः ' मन्त्रों का पाठ करके तिल से आहुति देने से सभी वस्तुओं की प्राप्ति होती है ॥१-६३ ॥ अब मन्त्रों का विधान बताया जा रहा है । वस्त्र, पद, शरीर, भोजपत्र, शिला और यष्टिका के ऊपर, ' ओं हूं धूं छन्द च्छन्द ' इन चार बीजों को लिखे । फिर ईशान आदि कोणों में भीतर की ओर ' कालरात्रि मन्त्र ' लिखे तथा बाहर की ओर यमराज मन्त्र का उल्लेख करे ॥७ - ९ ॥ कराली नारवमालीकालीलमोक्षमोनली । मामोदेतत्तदेमोना रक्षत स्वस्वभक्ष या ' यह कालरात्रि मन्त्र है और ' यमावाटटमवाय माटमोटटमोटमा । वामभूरिरिभूमावा टटरीत्वत्वरीटट ' यह यमराज मन्त्र है । इस मन्त्र के बाह्यभाग में चारों ओर ' र ' बीज को लिखे फिर उस ( रं ) के नीचे ' य ' लिखे । इस प्रकार मारणात्मक निग्रह यन्त्र संपादित होता है । इसको काजल, नीम के गोंद, मज्जा, रक्त, विष, कोयले के चूर्ण से बनी हुई तथा लाल दावात में रखी हुई स्याही और काकपक्ष की बनी १ ग. ' हूं छावां खे ' । २ ग. हूंकारं । ३ ख. ग. ' हमैश्च । ४ ग. य जपान्नित्यं । ५ ख. ' षद् तुभ्यं म ' । ६ क. ङ. धने । ७ क. ग. ङ. ॰म् । एशाः ८ ख. दावथ पाः । ९ क. ङ. ' शुपदौ । १० कराली " मोक्षमोनली इत्यत्र काली मारणमाली च काली त्रैलोक्यमोहनीति च. पुस्तके । ११ ग. ' लगोक्ष " । १२ ख. ' व ' । १३ पमयाटट. निक्षिपेत् ग. पुस्तके नास्ति । १४ ख, तज्जलं । १५ ' अंगारेण संयुतम् । ' नास्ति ख. पुस्तके । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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९ ८४ अग्निपुराणम् निधापयेत्कुण्डाधस्ताद्वल्मीके वाऽथ निक्षिपेत् ) । विभीतद्रुमशाखाधो यन्त्रं सर्वारिमर्दनम् || १४ || लिखेच्चानुग्रहं चक्रं शुक्लपक्षेऽथ भूर्जके । लाक्षया कुङ्कुमेनाथ खटिकाचन्दनेन वा ॥ १५ ॥

भुवि भित्तौ च पूर्वादि नाम मध्यमकोष्ठके । खण्डेन्दुवारिमध्यस्थमों जं सोवाऽपि घट्टिगम् ' ॥१६ ॥

लक्ष्मी श्लोकं शिवादौ च राक्षसादिक्रमाल्लिखेत् । श्रीः सा मा मा ' मा सा ' श्रीः सा नौ याज्ञे ज्ञेया नौ सा माया लीला ला " ली या " सा ज्ञेया " नौ सा माया पद्मस्थं पद्मचक्रं च मृत्युजित्स्वर्गगं धृतिम् रुद्रे रुद्रसमाः कार्याः कोष्ठकास्तत्र तां लिखेत् विद्यावर्णक्रमेणैव संज्ञा १३ च वषडन्तिकाम् १४ ( एकाशीतिपदे सर्वामादिवर्णक्रमेण तु एषा प्रत्यङ्गिरा चान्या “ सर्वकार्यादिसाधनी " ) ॥१७ ॥

1 । लीला यत्र षडुक्ता बहिः शीघ्रां दिक्षु च कलशं वह्निः ॥ १८ ॥

। शान्तीनां परमा शान्तिः सौभाग्यादिप्रदायकम् ॥१९ ॥

। ॐ माद्यां हूं फडन्ता च आदिवर्णमथान्ततः ॥ २० ॥

। अधस्तात्प्रत्यङ्गिरैषा सर्वकामार्थसाधिका ॥ २१ ॥

। आदिमं यावदन्ते स्याद्वषडन्तं च नाम वै ॥२२ ॥

। निग्रहानुग्रहं चक्रं चतुःषष्टिपदैर्लिखेत् " ॥२३ ॥

हुई लेखनी से लिखना चाहिए । इस मन्त्र को श्मशान में, चौराहे पर गाड़ दे, कुण्ड अथवा गड्ढे में फेंक दे या बहेड़े के पेड़ के नीचे गाड़ देना चाहिए । इस प्रकार विधिवत् बनाया हुआ यन्त्र सभी शत्रुओं का नाशक होता है ॥१०-१४ ॥ ( अब अनुग्रह चक्र बतलाया जा रहा है ) शुक्लपक्ष में भोजपत्र के ऊपर भूमि पर या दीवाल पर लाख, कुंकुम, खड़िया अथवा चन्दन से अनुग्रह चक्र बनाना चाहिए । चक्र के मध्य वृत्त में ' ॐ जं सोवाऽपि घट्टिगम् ' मन्त्र लिखना चाहिए । पूर्व की ओर से गणना करने पर बायीं ओर के वृत्त में तथा उसकी परिधि के ऊपर और उसके पश्चिम की ओर भी यही मन्त्र लिखना चाहिए । चक्र के चारों ओर उसके दक्षिण - पूर्व और दक्षिण - पश्चिम की ओर लक्ष्मी श्लोक पढ़ना चाहिए — ‘ श्रीः सा मा या मा सा श्रीः सा नौ या ज्ञे ज्ञेया नौ सा । मा या ली ला ला ली या मा या ला ली ली ला या । उपर्युक्त पद्मचन्द्र का पूजन एक कमल के मध्य में होना चाहिए । यह चक्र मृत्यु को जीतनेवाला, स्वर्ग ले जानेवाला और धैर्य को देनेवाला है । यही शक्तियों में परमाशान्ति है । और सौभाग्यादि को प्रदान करनेवाला है ॥१५-१ ९ ॥ भीतिदायक यन्त्रों में यन्त्र को एक सौ ग्यारह कोष्ठकों में विभाजित करना चाहिए । इस चक्र के दोनों किनारे के कोष्ठकों में ‘ ॐ ' से आदि होनेवाले और ' हूं फट् ' पर समाप्त होनेवाले बीजमन्त्र को लिखना चाहिए और आदि के वर्णों को ( कोष्ठकों ) के बीच में लिख देना चाहिए । उपर्युक्त मन्त्रों के नीचे ' वषट् ' बीज से समाप्त होनेवाले मन्त्र वर्णों को लिखना चाहिए । यह ' प्रत्यङ्गिरा विद्या ' कहलाती है । यह सभी कामनाओं की पूर्ति करानेवाली हुआ करती है । इक्यासी कोष्ठवाले चक्र में आदि से ही वर्णक्रम के अनुसार सम्पूर्ण चक्रों में त्वरिता विद्या के अक्षर लिखे । शेष कोष्ठकों में साध्य का नाम तथा उसके अन्त में ' वषट् ' लिखे । यह दूसरी ' प्रत्यङ्गिरा ' विद्या है । जो समस्त कार्य आदि की सिद्धि करनेवाली है । चौंसठ कोष्ठ के पद में निग्रहानुग्रह चक्रों को बनाना चाहिए ॥२०-२३ ॥ अमृतिविद्या १ क. ङ. यद्दिशम् । २ क. ङ. च. रक्षरादि । ३ ग. स । ४ ग. मो । ५ ख. या । ६ ख. या । ७ ख. मा । ८ क. ङ. तौ । ९ ग. ज्ञेयां । १० क. ना । ११ क. ङ. या । १२ क. ख. ' या लानोलालीसानायाज्ञेवषडंताब ' । १३ क. संज्ञा संज्ञा च मध्यमम् । १४ ‘ एकाशीतिपदे - सर्वकार्यादिसाधनी ' क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । १५ क. ङ. ' कामार्थसा । १६ ग. ' र्यार्थसा । १७ क. ङ. ' पदे लिखे । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ९ ८५ अमृती सा विद्या ' चक्रं सः ह्रींनामाथ मध्यतः । फट्काराद्याऽन्यत्रगतां त्रिह्रींकारेण वेष्टयेत् ॥२४ ॥

कुम्भवधारिता सर्वशत्रुहृत्सर्वदायिका । विषं नश्येत्कर्णजपादक्षराद्यैश्च दण्डकैः ॥२५ ॥

इत्यादिमहापुराण आग्नेये त्वरितामन्त्रकथनं नाम चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१४ ॥

अथ पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः स्तम्भनादिमन्त्राः अग्निरुवाच स्तम्भनं मोहनं वश्यं विद्वेषोच्चाटनं वदे । विषव्याधिमरोगं च मारणं शमनं पुनः ॥ १ ॥

भूर्जे कूर्मं समालिख्य ताडनेन षडङ्गुलम् । मुखपादचतुष्केषु ततो मन्त्रं न्यसेद्द्विजः ॥२ ॥

चतुष्पादेषु क्रींकारं ' ह्रींकारं मुखमध्यतः । गर्भे विद्यां ततो लिख्य साधकं पृष्ठतो लिखेत् ॥३ ॥

मालामन्त्रैस्तु संवेष्ट्य इष्टकोपरि संन्यसेत् । पिधाय कूर्मपृष्ठेन करालेनाभिसंपठेत् ॥४ ॥

नामक इस चक्र में ' क्रीं सः - हुं फट् ' मन्त्र को ' हूं ' बीजमन्त्रों से तीन बार आवेष्टित कर देना चाहिए । कलश के ऊपर इस चक्र को रखकर मन्त्र का पाठ करने से साधक के सभी शत्रुओं का नाश हो जाता है, और सभी अभीष्टों को प्राप्त कर लेता है । सर्प से दष्ट अथवा विष के चिह्नों को प्रकट करनेवाले व्यक्ति के कान में इस मन्त्र का जप करने से तथा मन्त्राक्षरों से अंकित दण्ड से शरीर को छूने से सम्पूर्ण विष नष्ट हो जाता है ॥ २४-२५ ॥ श्री अग्निमहापुराण में त्वरितामन्त्र - कथन नामक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय समाप्त ॥३१४ ॥

अध्याय ३१५ स्तम्भनादिमन्त्र - कथन अग्निदेव बोले - अब मैं स्तम्भन, मोहन, वशीकरण, विद्वेषण और उच्चाटन करनेवाले मन्त्रों को बतला रहा हूँ । साथ ही उन मन्त्रों को भी बताऊँगा जो विष, व्याधि और रोगों को दूर करनेवाले तथा ( शत्रुओं का ) वध और शमन करानेवाले हैं । ताड़ की कलम से भोजपत्र के ऊपर कछुये का छह अंगुल लम्बा चित्र बनाना चाहिए । तदनन्तर उसके अन्दर की ओर के विभिन्न कोष्ठकों में उसके मुँह तथा चारों पैरों में न्यास - क्रिया के अनन्तर द्विज को मन्त्रों को लिखना चाहिए ॥१-२ ॥ उस ( कच्छप ) के पादप - प्रदेश में बने हुए चतुष्क में ' क्रींकार ' मन्त्रों तथा मुख - प्रदेश में ' ह्रींकार ' को लिखना चाहिए । उस ( कच्छप ) के उत्तर प्रदेश में त्वरिता विद्या तथा उसकी पीठ पर शत्रु अथवा उस व्यक्ति का नाम लिखना चाहिए जिसके विरुद्ध अभिचार किया जा रहा हो । इस चित्र को मालामन्त्रों से आवेष्टित करके एक ईंट के ऊपर रख देना चाहिए । तदनन्तर सम्पूर्ण चित्र को ढककर अभिचार के अनुकूल करालमन्त्रों का पाठ करना चाहिए ॥३-४ ॥ इसके १ क. ङ. च. द्या वज्र ' सं ह्रीं । २ क. ख. पासनं । ३ क. ख. च. ताडकेन । ४ क. ङ. ष्के तु त । ५ ख. हांकारं । ६ क. ख. संन्यस्य । ७ क. ख. ङ. ' भिवेष्टयेत् । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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९ ८६ अग्निपुराणम् महाकूर्मं पूजयित्वा पादप्रोक्षं तु निक्षिपेत् । ताडयेद्वामपादेन स्मृत्वा ' शत्रुं च सप्तधा ॥५ ॥

ततः संजायते शत्रोः स्तम्भनं मुखरागतः । कृत्वा तु भैरवं रूपं मालामन्त्रं समालिखेत् ॥ ६ ॥

ॐ शत्रुमुखस्तम्भनी ' कामरूपा आलीडिर्करीम् । ह्रीं फं फत्कारिणी मम शत्रूणां देवदत्तानां मुखं स्तम्भय ' स्तम्भय ( ' मम सर्वविद्वेषिणां मुखस्तम्भनं कुरु कुरु, ॐ हूं फं फत्कारिणी स्वाहा ॥७ ॥

पटहेतुं समालिख्य तज्जपन्तं महाबलम् । वामेनैव नगं शूलं संलिखेद्दक्षिणे करे || ८ || लिखेन्मन्त्रमघोरस्य संग्रामे स्तम्भयेदरीन् ॥९ ॥

ॐ नमो भगवत्यै ' भगमालिनि ' निर स्फुर ' निर स्फुर स्पन्द स्पन्द दित्यक्लिन्ने द्रव द्रव ) ( ° हूं सः ह्रींकाराक्षरे स्वाहा ॥१० ॥

एतेन रोचनाद्यैस्तु " तिलकान्मोहयेज्जगत् ॥११ ॥

ॐ फं हूं फटफटत्कारिणी ह्रीं ज्वल ज्वल ) त्रैलोक्यं मोहय मोहय । ॐ गुह्यकालिके स्वाहा ॥१२ ॥

अनेन तिलकं कृत्वा राजादीनां वशीकरम् । गर्दभस्य रजो गृह्य कुसुमं मृतकस्य १२ च ॥ १३ ॥

नारीरजः क्षिपेद्रात्रौ शय्यादौ द्वेषकृद्भवेत् । गोखुरं च तथा शृङ्गमश्वस्य च खुरं तथा ॥१४ ॥

शिरः सर्पस्य संक्षिप्तं गृहेषूच्चाटनं भवेत् । करवीरशिफा पीता संसिद्धार्था च मारणे ॥ १५ ॥

बाद महाकूर्म ( के चित्र ) का पूजन करके उसके ऊपर अपने पैरों को धोने के लिए लाये गये जल को छिड़ककर शत्रु का स्मरण करते हुए बायें पैर से सात बार प्रहार करना चाहिए । ऐसा करने से शत्रु का स्तम्भन हो जाता है और उसकी सारी बुद्धि नष्ट हो जाती है । साधक को अपना मुँह रँगकर भैरव रूप बनाकर इस प्रकार मालामन्त्र का उल्लेख करना चाहिए - ‘ ॐ शत्रुमुखस्तम्भनी फं फत्कारिणी स्वाहा । ' इसके बाद फट् और हेतु ( प्रयोग का उद्देश्य ) लिखकर उक्त मन्त्र का जप करते हुए उस महाबली भैरव के बायें हाथ में पर्वत और दाहिने हाथ में शूल बनाना चाहिए । अघोर मन्त्र का उल्लेख करने से संग्राम में शत्रुओं का स्तम्भन कर दिया जाता है ॥५ - ९ ॥ ' ॐ नमो भगवत्यै ह्रींकाराक्षरे स्वाहा । ' इस मन्त्र को पढ़कर गोरोचन आदि से तिलक लगाने से जगत् मोहित होता है । ‘ ॐ फं हूं गुह्यकालिके स्वाहा ' इस मन्त्र से तिलक करके मनुष्य राजा आदि को भी अपने वश में कर लेता है || १०-१२ ॥ गदहे के बैठने के स्थान की धूलि, शव के ऊपर चढ़ा हुआ फूल और स्त्री के रज को एक में मिलाकर मन्त्र से अभिमन्त्रित करके ) किसी की शय्या के ऊपर डालने से उसमें द्वेष उत्पन्न कर देता है । गाय ( उपर्युक्त सींग को, घोड़े के खुर को तथा सर्प के सिर को ( उपर्युक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित करके के खुर और से उच्चाटन हो जाता है । करवीर के पीले पुष्प की शिफा ( जड़ ) को उपर्युक्त ) किसी के घर में फेंकने के ऊपर प्रयोग करने से उसकी मृत्यु हो जाती है । इसी प्रकार सर्प रीति से अभिमन्त्रित करके किसी और छछुन्दर का रक्त और करवीर के फूलों का १ क. ङ. ' त्रु त्रीस ' । २ क. ङ. नत्वा । ३ ख. ग. कामरं । ४ क. ङ. ' रूपायनी निकरी ह्रीं हरें फट्कारि । ५ पदं नास्ति ख. ग. च. पुस्तकेषु । ६ मम द्रव द्रव क. ङ. पुस्तकयोर्नास्ति । ७ ख. ग. मालिन्यै । ८ च. वि । ९ ग. स्तम्भयेति च. स्पुर १० हूं सः ज्वल ज्वल च. पुस्तके नास्ति । && कैम १२ ख. रजकस्य । १३ ख. ग. " शिखा पी ' ॥