देवासुराख्याति — पृष्ठ 1–10

देवासुर ख्याति · पृष्ठ 1–10

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11 t 11 देवासुरख्यातिः * शंकर श्री* शिक्षायतम पुस्तकालय नईदिल्ली समीक्षाचक्रवर्तिनः स्व ० पं ० श्रीमधुसूदनशर्म मैथिलः ।

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समीक्षा चक्रवतिं स्व ० पं ० श्री मधुसुदन शर्मा मैथिलाः ।

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भूमिका वेदरहस्योद्धारक समीक्षाचक्रवर्ती स्वर्गीय पूज्य गुरुवर्य पं ० श्री मधुसूदनजी महाराज ने सहस्राब्दियों से विलुप्त वैदिक विज्ञान का पुनरुज्जीवन करने के लिये वेदों में आये हुए ब्रह्म, यज्ञ, धर्म, इतिहास, वेदाङ्ग आदि सभी विषयों पर उनके रहस्यों को प्रकाशित करने वाले ग्रन्थों का निर्माण किया । इन प्रन्थों को उन्होंने १ - यज्ञ, २ - विधान, ३ - इतिहास और ४ - प्रकीर्ण इन चार भागों में विभक्त किया | इतिहास सम्बन्धी मन्थों का प्रधान विभाग पुराण- समीक्षा है । इस विभाग में कतिपय अवान्तर विभाग हैं । उन अवान्तर विभागों में पश्च ख्याति के अन्तर्गत यह देवासुरख्याति नामक ग्रन्थ है । इस पुस्तक में सर्वप्रथम संक्षेप से मानव जाति का इतिहास बतलाया है, जिसमें कि निम्नलिखित विषयों का निरूपण किया गया है:: -१ – वेदसृष्टि २– प्रजासृष्टि ३ – लोकसृष्टि ४ – धर्मसृष्टि ५ - त्रैलोक्य निरूपण ६ – चातुर्वर्ण्य आदि । ---

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* २ -मानव जाति के इतिहास के विचार से सृष्टि के प्रारम्भकाल से लेकर आजतक के समय को चार भागों में विभक्त किया है । इन चारों का नामकरण आदियुग १, आदित्रेतायुग २, देवयुग ३, वर्तमान युग ४. किया है । जब मानव - समाज में मनुष्यमात्रवृत्ति विशिष्ट ज्ञान का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था, वह श्रेविज्ञानकाल भादियुग शब्द से यहां व्यवहृत हुआ है 1 २. इसी तरह भौतिकविद्यारूप शिल्पविज्ञान का एवं प्राण-विद्यारूप यज्ञ विज्ञान का प्रादुर्भावकाल आदित्रेतायुग शब्द सेव्वत हुआ है । ३. विज्ञान - प्रौढिकाल देवयुग शब्द से व्यवहृत हुआ है । ४. एवं धीरे - धीरे देवसमाज व सुरसमाज में परस्पर विद्रोह बढ़ जाने से युद्ध होजाने पर दोनों का ही नाश होजाने के कारण विज्ञान का ह्रासकाल वर्तमानयुग से व्यवहृत हुआ है । इस तरह से इस विज्ञान के तारतम्य के कारण ही उपर्युक्क चारों युगों को क्रमशः अविज्ञानकाल, यज्ञविज्ञानप्रादुर्भावकाल; यज्ञविज्ञानाभ्युन्नतिकाल तथा यज्ञविज्ञानपतनकाल भी कहते हैं । च्यादित्रेतायुग व देवयुग में जन्ता का सर्वप्रथम एक धर्मगुरु होता था और उसकी ब्रह्म संज्ञा थी । इसलिये इस

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३ --विचार से इन चारों युगों को क्रमशः ब्रह्मपदानुदयकाज, त्रह्मपद-प्रादुर्भावकाल, ब्रह्मप्रभावकाल, तथा ब्रह्मपदपतनकाल भी कह् सकते हैं । इन युगों में वर्तमान युग का प्रारम्भ महाभारत युद्धकाल के बाद जनमेजय राजा के राज्यकाल से माना जाता है । इससे पूर्व तीन हजार व पांच हजार वर्षों का देवयुगकाल माना जाता है । इससे भी पूर्व आदित्रेतायुग की सत्ता मानी जाती है और इससे भी पूर्व वैज्ञानिक आदियुगकाल की सत्ता । आदियुग में मनुष्य जाति पशुओं की तरह आहार विहार में रत थी । न उसमें आचार व विचार था, न निवास स्थान ही थे, न नगर ही थे एवं न वे वस्त्र आदि के निर्माण से परिचित थे, और न शस्त्रप्रक्रिया ही उनमें थी । धीरे - धीरे बुद्धि के विकसित होने पर कुछ सभ्य पुरुषों ने जीवननिर्वाह के उपयोगी साधनों की परिपूर्णता के लिये प्रयन्न करके विज्ञानप्रतिपादकशास्त्र वेदों की ऊहना की और उससे शिल्पविशेषों और यज्ञविशेत्रों की या कर के जीवननिर्वाह के तथा समाज के उपयोगी गृह, ग्राम, नगर, कृषि, व्यापार, पशुराण, मस्त्ररचना, मार्गनिर्माण, राज - सत्ता, दण्ड - धारण व्ययदि चीजों की व्यवस्था की । इसका निरूपण ब्रह्माण्डपुराण में उपलब्ध होता है । यही आदित्रेतायुग था, जिसमें उपर्युक्त सभ्यता का विकास हुआ । इसीं युग में यज्ञादि कर्मों तथा शिल्लकीपति के लिये " तायासिक

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समाज - व्ययस्थापकों ने इस समय को १ - साध्य, २- महाराजिक, ३- श्रभास्वर ४- तुषित भेदों में विभक्त किया यज्ञादि द्वारा निर्वाह करने वाले शान्त कर्मकारी विज्ञान-प्रधान पुरुष साध्य, युद्धद्वृत्ति से निर्वाह करने वाले उग्रकर्मकारी विक्रम प्रधान पुरुष महाराजिक, वाणिज्य व कृषिवृत्ति करने वाले व्यापार - प्रधान आभास्वर तथा शिल्पवृत्ति वाले कलाकोविंद सुषित शब्द से व्यवहृत होते थे । इस तरह विज्ञान, दण्डधारण, वाणिज्य व शिल्प भेद से धर्म के चार प्रकार का होने से कर्मानु-सार चातुर्य की स्थापना सर्वप्रथम उन्होंने की । बाद में कर्मसौष्ठव व कर्मप्रावीण्य के लिये कर्मानुसारिणी चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था का सम्बन्ध वंश - परम्परा से कर दिया गया । वंश. परम्परा से सम्बद्ध होने के कारण ही यह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था जन्मतः चातुर्वर्ण्य व्यवस्थारूप में परिणत हो गई । इसी तरह सभी कर्मों को ऐहिक व पारलौकिक भेद से द्विधा विभक्त कर उनकी सिद्धि के लिये चातुराश्रम्य व्यवस्था का जन्म भी उसी श्रादित्रेतायुग में हुआ ।, क्योंकि ऐहिक सुख का साधन कर्ममार्ग है किन्तु कर्म के लिये ज्ञान की अत्यन्त श्रावश्यकता होती है । श्रतः सर्वप्रथम प्रारम्भिक अवस्था में कर्मोपयोगी ज्ञानका उपार्जन, तथा द्वितीय आश्रम में ऐहिक सुख के साधनभूत कर्म का श्रचरण, इस तरह ऐहिक सुखसाधना के लिये दो आश्रम बन जाते हैं और इसके बाद पारलौकिक सुख का साधन बच जाता

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५ * -है । पारलौकिक सुख का साधन कर्म न होकर ज्ञान है, किन्तु वह ज्ञानाराधन भी बिना कर्म के नहीं हो सकता । अतः ज्ञानोपयोगी कर्म की निप्पत्ति के लिये तृतीय वानप्रस्थ आश्रम का निर्माण किया । गया है । और वदनस्तर साध्यभूत ज्ञान के घावरण के • लिये चतुर्थ संन्यासालमा का निर्माण है । इस तरह १०० वर्ष की आयु में मनुष्य कर्म व ज्ञान को आराधना द्वारा उस ज्ञानकर्ममय भगवान को आराधना पूर्ण कर लेता है, किन्तु ज्ञानकर्माराधनरूप कर्म को मानव एक समय में कर नहीं सकता । उसी के लिये जीवन को चार भागों में विभक्त कर उसको पूर्ण करने के लिये चातुराश्रम्य का निर्माण किया गया था । समाज में ज्ञान तथा कर्म का ठीक पालन करवाने के लिये उस समय दो अध्यक्षों की भी कल्पना की गई थी । उसमें ज्ञानाः ध्यक्ष गुरु कहलाता था और कर्माध्यक्ष प्रभु कहलाता था । गुरु के तारतम्य की अपेक्षा से उपाध्याय, ऋत्विक, पुरोहित तथा आचार्य ये चार भेद थे । और इसी तरह प्रभु के भी उसी तारतम्य के कारण राजा, स्वराट्, सम्राट् तथा विराट् ये चार भेद थे । इन दोनों विभागों में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ माना जाता था तथा पूर्व - पूर्व कनिष्ठ... बायुक्त विकास आदित्रेतायुग में हो चुका था । इसके बाद: देवयुग आता है जो कि विज्ञान के पूर्णाभ्युदय का काल था । इस युग में ब्राह्मणों में ही विद्या के तारतस्य को अपेक्षा से विप्र, ऋषि, देव, ब्रह्मा इन चार विभागों की कल्पना की गई । इनमें जो ब्राह्मण विद्वान् होते हुए वेद के एक देश के ज्ञाता थे अथवा

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स्वयं प्राकृतिक तत्वों के द्रष्ट न होकर द्रष्टा के द्वारा सुन करें प्राकृतिक अर्थों को जानने वाले थे, वे चिम कहलाते थे और जो संसार में जो भी जानने योग्य वस्तु है उसको जान चुके थे अर्थात् विदित - वेदितव्य, परावरज्ञ व श्रधिगत याथातथ्य ये श्रेयवा प्राकृतिक तत्वों के खर्य द्रष्टा या आविष्कारक थे में ऋषि कहलाते थे । 15 DE इसी तरह जो ज्योतिष्टोमादि सोमयज्ञ व चयनादि आग्नेय यज्ञों के करा दिव्यात्मा को प्राप्त कर अमर बन गये थे वै देव कहलाते थे । ' और इन ब्राह्मणों में सर्वाधिक विज्ञान-प्राधान्य के कारण विराट्रं - पदारूढ विज्ञानमयमूर्ति, इन सब का मूल पुरुष व्यक्ति ब्रह्मा कहलाता था । अन्य सभी वैज्ञानिक इस ब्रह्मा के सम्बन्ध से तथा विज्ञान के कोर रंग ही शरण कहलाते थे । उस विज्ञानप्रधान देवयुगकाल में यह ब्रह्मा ही विज्ञानप्राधान्य के कारण चतुर्वस्मिक मनुष्य समाज में ' सर्व मान्य व सर्व-प्रधान बन गया था । इसी वैज्ञानिक मूघन्य मह्मा ने श्रम व तपस्या करे के नित्यसिद्ध प्राकृतिक अपौरुषेय दीदी की शान प्राप्त किया ) " सेषी त्रय्येव त्रिंद्या सर्पति, श्रेया भावाविद्याया सर्वाणि भूतानि " इत्यादि शतपथ प्रतियां इस नित्यसिद्ध अपौरुषेय वेद का II " निरूप रंग कर रही हैं । उसने नित्यसिद्ध पौरुषेय वेद के अनुसार इस लोक में वेदसृष्टि, प्रजास्सृष्टि, लोकसृष्टिच धर्मष्टि भेद से चार प्रकार की सृष्टि की रचना की । से चारों प्रकार की सुट्टियां पैरुषेय व अपौरुषेय भेद से दो प्रकार की हैं ।

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इन चतुर्विध सृष्टियों में सर्व प्रथम वेदसृष्टि का निरूपण किया जा रहा है । १ - वेद - सृष्टि: -वेद शब्द का प्रयोग विज्ञान, विज्ञान विषयोभूर्त श्र विज्ञानविषयक को बतलाने वाले मन्त्र तथा उन मन्त्रा ' श्रं " का समूह प्रन्य इन चार अर्थों में होता है । उनमें से विज्ञान व विज्ञा । विययक अर्थरूप • वेदसृष्टि अपौरुषेय है । क्यों न कि से कार्य कारण से अतीत परब्रह्म विज्ञान प. तथा जगत् का कारण महद् अक्षर, ब्रह्म श्रभिप्रेत है । वे दोनों ही अपौरुषेय हैं । और उस अक्षर ब्रह्म से तर ब्रह्म की सहायता से जिन सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि प्राकृतिक तत्वों की उत्पति होती है वे विज्ञानविषयभूत अर्थ भी परमेश्वर द्वारा विरचित हैं न कि पुरुष प्रयत्न- चिरचित हैं । अतः वे भी अपौरुषेयं हैं । इन दोनों से से अतिरिक्त विज्ञानविषयभूत सूर्य चन्द्र आदि प्राकृतिक तत्वों के रहस्य के निरूपक वेदमन्त्र गृह, क्षेत्र, उपवन, नगर आदि वस्तुओं की तरह पुरुष - प्रयत्न - बिरचित हैं अतः वे भी पौरुषेय हैं । वेदमन्त्रों की रचना आदित्रेतायुग में अज, पृश्नि, बालखिल्य आदि तथा देवयुग में भृगु, अत्रि, अङ्गिरा आदि सप्त ऋषियों ने अन्य वैज्ञानिक पुरुषों ने प्राकृतिक I तत्वों का साक्षात्कार कर व उनके रहस्य को जान कर उनके रहस्य प्रकाशन के लिये की । अतः अपौरुषेय तत्वों के व उनके विज्ञान के अपौरुषेय होने पर भी तंद्रहस्य प्रकाशनपरक वर्णसमूहरूप वेद ऋषिविरचित व i

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--पौरुषेय ही है । इसी तरह वेदमन्त्र समूहरूप मन्थ भी ऋषि-विरचित व पौरुषेय ही है । वेद, ब्रह्म व विद्या ये तीनों शन्द्र प्रायः एकार्थक ही हैं, बहुत कम अन्तर है । उनमें विज्ञानविषयीभूत अर्थ अथवा विषयविशिष्ट विज्ञान का विद्या शब्द से व्यपदेश होता. वह विद्या परविद्या, अक्षरविद्या व तर विद्या भेद से तीन प्रकार. की है । इनमें से क्षरविद्या- प्रज्ञाविद्या, प्रारणविद्या व भूतविद्या भेद से पुन: त्रिधा विभक्त है । इन तीनों में भूतविद्या को पदार्थविद्या कहते हैं । इसमें भूतसम्बन्धी सामर्थ्य की परीक्षा की जाती है । उसके द्वारा, किस प्रकार स्थूल व सूक्ष्म भूतों से यह स्थावर जङ्गम रूप सृष्टि पैदा होती है इस प्रक्रिया का, भूतों > के सामर्थ्य का शिल्पकलाओं व लौकिक मानव व्यवहार आदि लोक - विद्याओं का ज्ञान हो जाता है । प्राणविद्या को यज्ञविद्या कहते हैं । अग्नि, वायु, वरुण, सोम, विद्युत आदि आधिदैविक प्राणरूप देव हैं । ये प्राणात्मक देव त्रैलोक्यव्यापी हैं न कि मनुष्य देवों की तरह लोकसीमित । इन प्राणों के कर्म हो दैविक व आधिदैविक बल कहलाते है । इनका यथावत् विज्ञान ही यज्ञविद्या है । यज्ञों के द्वारा आधिदैविक बलों की प्राप्ति ही यज्ञकर्ता करते हैं । यज्ञविद्या का योगविद्या शब्द से शास्त्रों में व्यपदेश किया है । इसमें आध्यात्मिक मानस सामर्थ्य की परीक्षा की जाती है ।