देवासुराख्याति — पृष्ठ 11–20

देवासुर ख्याति · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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मानसिक शक्ति का विज्ञान ही योग - विद्या शब्द से व्यवहृत होता है । इस तरह उपर्युक्त रीति से तर विद्या तीन प्रकार की है । इनमें उत्तरोत्तर विद्या अधिक शक्तिशाली है । क्योंकि भूत प्राणों के तथा प्रारण प्रज्ञा के अधीन हैं । चरविद्या से उत्कृष्ट अतरविद्या तथा उससे भी उत्कृष्ट परविद्या है । किन्तु ब्रह्मविद्या में इन सभी विद्याओं का समावेश है । इस ब्रह्मविद्या में वेदविद्या से अतिरिक्त अङ्गविद्या व उपाङ्गविद्या आदि अन्य विद्याओं का भी समावेश है । ब्रह्म-विद्या वाला व्यक्ति सर्वविध सामर्थ्ययुक्त होने से सव वुछ सम्पन्न कर सकता है । इसी लिये यह वेद का उद्घोष है कि " ब्रह्मविद्यया वै सवं भविष्यन्तो मन्यते चाचार्या " इति । इस ब्रह्मविद्या को उपदेश ब्रह्मा ने अपने पुत्र अथर्वा को दिया था । उसने श्रगिरों को आ भरद्वाज को तथा भरद्वाज मे अङ्गिरा ( आङ्गिरसे ) को जिसका कि निरूपण मुण्डकोपनिषद् के प्रारम्भ में मिलता है के यह यज्ञविद्या भी पौरुषेय व अपौरुषेय भेदसदी प्रकार की है । पुरुष सृक्त में “ तत्मात् यज्ञात् सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे । च्छन्दांसि जज्ञिरे तरमायजु-स्तस्मादजायत ” इस श्रुति में जिस यज्ञ का निरूपण किया है. और जिससे ऋग, यजु, साम की उत्पत्ति बतलाई है वह अपौरुषेय नित्यसिद्ध यज्ञ है । इसी तरह ईश्वरीय. सृष्टि में सूर्य, चन्द्र, ' ' 7. पृथिवी आदि सभी तत्व एक एक यज्ञ है । ये सभी पुरुष प्रयत्न से असाध्य हैं, अतः अपौरुषेय है । “ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा इत्यादि गीतावाक्य में भी इसी अपौरुपेय यज्ञ का: निरूपण है ।

पृष्ठ 12

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किन्तु इस नित्य भपौरुषेय प्रकृतिसिद्ध यज्ञ के अनुसार मानुषं ब्रह्मी मैं भी अपने में दिव्य व अन्य सामर्थ्य पैदा करने के लिये यज्ञों की कल्पना की । वे सब ज्योतिष्टोमादि यज्ञ पुरुष प्रयंत्र - साध्य होने से पौरुषेय हैं । उनका निरूपण " प्रजापतिर्हि यज्ञं ससृजे तेन ह सृष्टेन देवा ईजिरे । तेन हेष्ट्वा सर्वान् कामांना पु " इत्यादि श्रुतियों में किया गया है । इस तरह से वेदसृष्टि पौरुषेय व अपौरुषेयं भेद से दो तरह की है । २- प्रजा - सृष्टि-: प्रजासृष्टि भी वेदसृष्टि की तरह अपीरुपेय व पौरुषेय भेद से दो प्रकार की है । प्राकृतिक प्राणरूप प्रजासृष्टि अपौरुषेय है । ऊपर वेदसृष्टि में बतलाया जा चुका है कि प्राणात्मक देवता परमेश्वर से ही पैदा होते हैं वहां मनुष्य - प्रयत्न की आवश्यकता नहीं होती, अतः अपौरुषेय है । वे प्राण - ऋषि, पितर, देव, गन्धर्व व मनुभेद से पांच तरह के हैं । इन पचविव प्राणों में देवप्राण देव व असुर उभयविध प्राणों का बोधक है । इनमें ऋषिप्राण के ७, पितृप्राण के ८, देवप्राण के ३३, असुरप्राण के ६६, गन्धर्वप्राण के २७ तथा मनुप्राण के ४ अथवा १४ भेद हैं । इनके अवान्तर भेदों का निरूपण वेदों में व पुराणों में मिलता है । ये सेब अपौरुषेय प्रजायें हैं । re इस अपौरुषेय प्रजा की नकल पर मानुप ब्रह्मा ने मी ऋषि, पितर, देव, तिर्यग्योनि और मनुष्य भेदं से पांच प्रकारे की.

पृष्ठ 13

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* ११ ४-प्रजासृष्टि की रचना की । इन पांचों प्रजा सृष्टियों को [ " बेक में पञ्चजन व पञ्चकृष्टि शब्द से कहा गया है । इन पौरुषेय प्रजाओं का स्थान पृथ्वी प्रदेश ही है । jink - दिन ऋषियों के भृगु, भय, अत्रि, मत्स्य, वशिष्ठ, अगस्त्य, मरीचि, प्रचेता, नारद, पुलस्त्य, पुलह व ऋतु ये १२ भेद हैं । मरीच्यादि शब्द वस्तु: गोत्र के बोधक हैं न कि व्यक्ति क्रे । किन्तु उनका व्यक्ति में, भी लक्षण या प्रयोग होता है । अक्तरं मेरीच्यादि ऋषियों की ही सन्तान है । अग्निज्वात, बर्हिषद्, सोमसद्, हर्विमु क्, सोमप, आज्यप, सुकाली भेद से उ जाति के हैं । ये सातो पितृजातिय उदन्यती, पीलुमतों वयों से त्रिघा विभक्त स्वर्ग के प्रयो भाग में रहती हैं जैसा कि-' उदधती द्यौरवमा पीलुमंतीति मध्यमा तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितरं आसते । देव जाति-इस आथर्वण मंन्त्र में लिखा है । पितृजाति से देवजाति की सृष्टि हुई । पितृजातीय प्रजाओं की ही कुछ शाखाओं ने अपनी वीरता के प्रभाव से स्वाराज्यपद् प्राप्त कर लिया और देवजाति कहलाने लगीं । इन्ही देवताओं में कुछ अत्यन्त महिमाशाली व विशिष्ट प्रभाव वाले देव प्रधान अधिकारी और लोकपाल वन गये । ये लोकपाल ब्रह्मा, शक्र, अनि, निऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान तथा विष्णु हैं । ब्रह्माद्रि

पृष्ठ 14

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- * १२ शब्द व्यक्तिविशेष के बोधक नहीं है किन्तु अधिकारबोधक हैं । उस पद अधिकार पर जो भी व्यक्ति प्रतिष्टित होता था: बह उसी नाम से कहा जाता था ये देवजातीय नर कुछ समय बीतने पर दो भागों में विभक्त हो गये । विद्या ( ज्ञान ) को श्रेष्ठ मानने वाले, विद्याप्रधान यज्ञ, तप, दान आदि कर्मों को श्रेष्ठ समझ कर उन्हीं का अनुष्ठान करने वाले, ऐहलौकिक कर्म की अपेक्षा पारलौकिक कर्म में अधिक तत्पर रहते वाले मानसबल सम्पन्न पुरुष देव - विभाग में माने जाने लगे । एवं कर्म को प्रधान मानने वाले कर्मप्रधान, इष्ट, आपूर्त, दत्त आदि कर्मों में निरत रहने वाले पारलौकिक सुख-सधुनों की अपेक्षा पेहलौकिक सुख - साधनों व शिल्प - विद्या में तत्पर, शरीरबल - सम्पन्न पुरुष प्राण - प्रधान होने से असुर कहलाने लगे । असुर शब्द भी व्युत्पत्ति से प्राण प्राण - प्रधान प्रधान अर्थात् शरीरबलसम्पन्न व्यक्ति का बोध कराता है । इसी लिये असुरों में विज्ञान की अपेक्षा वल की प्रधानता होती है । एक ध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न थे और दूसरे श्राधिभौतिक शक्ति सम्पन्न | देवों का अधिष्ठाता इन्द्र था और असुरों का वरुण । यद्यपि असुर भी पहिले देवशब्द से ही व्यवहुत होते थे पर बाद में उन्होंने देवताओं से विद्वेष होने से देव संज्ञा को छोड़कर असुर नामको ग्रहण किया 1 । क्यों कि वरुण प्रारण प्रधान तत्व है अतः उसके अधिष्ठाता होने के: कारण उन्होंने असुर संज्ञा को ग्रहण किया । इन असुरों के प्रधान दो भेदथे देवदानव इनके अवान्तर भेद कालक, दौहद, मौर्य,

पृष्ठ 15

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- * १३ * -इत्यादि अनेक थे । परस्पर विद्वेष के कारण एक होते हुए.. भी विभिन्न शक्ति प्रधान व विभिन्न संज्ञा वाले इन देवों व असुरों में ११ - नरसिंह, २ - वामन, ३ - वाराह, ४ - अमृत- मन्थन, ५ - तारकामय, ६- आडीवक, ७ पुर, ८ - अन्धकारिक, ε- ध्वज,? १० वार्त, : ११ - हालाहल, १२ - कोलाहल नामक बारह महायुद्ध हुए जिनका निरूपण पुराणों में मिलता है । देवों व असुरों में देवजाति के तारतम्य को लेकर फिर दो भाग होगये । विशिष्ट विज्ञानसम्पन्न व शक्तिसम्पन्न देव देवविभाग के अन्तर्गत और क्षुद्र कार्य करने वाले तथा शिल्प वृत्ति वाले देव देवयोनि के अन्तर्गत माने गये । यक्ष, विद्याधर, गन्धर्व, अप्सरस्, किन्नर, गुह्यक, सिद्धू, राक्षस, पिशाच, भूत ये दस भेद देवयोनि विभाग में आते है ।. । उपर्युक्त दस प्रकार की देवयोनियों का निवासस्थान पार्थिव त्रैलोक्यान्तर्वर्ती अन्तरिक्षस्थान था । इरावती नदी के निर्गम स्थान से उत्तर की तरफ तथा मेरुप्रदेश से एशिया की तरफ हिमालय के प्रदेश वन, प्रान्तर आदि स्थान सब अन्तरिक्ष कहलाते थे जो कि इन देवयोनियों के निवास स्थान थे; इन्हीं हिमालय प्रदेशों में महाभारत आदि में गन्धर्व सिद्ध आदि की स्थिति बतलाई गई है । अन्तरिक्ष से उत्तर की तरफ समुद्र पर्यन्त भौम त्रैलोक्य का स्वर्ग था जहां पार्थिव देवता अर्थात् पचकृष्टि विभागान्तर्गत देवता रहते थे । इरावती नदी के निर्गमस्थान

पृष्ठ 16

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से दक्षिण की तरफ समुद्रपर्यन्तं भौमत्रैलोक्य का पृथिवी लोक था जो कि मनुष्यों का निवासस्थान था । इस त्रैलोक्य से अति-रिक्त पृथिवी के नीचे का पाताललोक जो कि आजकल अमेरिका के नाम से प्रसिद्ध है, कालक समुद्र से नैऋत्यदिशा तक का प्रदेश जोकि आजकल एफ्रिका नाम से प्रसिद्ध है एवं अन्य प्रान्तर प्रदेश असुरों के निवास स्थान थे । देवासुर युद्ध के पश्चात् यह भौमत्रैलोक्यव्यवस्था व मानुप ब्रह्मा द्वारा निर्मित समाजव्यवस्था भग्न हो गई अतः देवनिवासस्थानों में असुर व असुर-निवासस्थानों में देवता आदि निवास करने लगे और उनका परस्पर साङ्कर्य हो गया । ४. मनुष्यजाति– इन देवों व असुरों से मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई जैसा कि प्रकृति में देवासुर - प्रारण से मनुष्यसृष्टि की उत्पत्ति हुई है और जिसका कि निरूपण मनुस्मृति के निम्नपद्य में मिलता है-ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवदानवाः । देवेभ्यश्च जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ इति ॥ मानवजाति देवों व असुरों से न्यून शक्तिशाली नहीं थी अपितु कुछ मनुष्य रजि नहुप; ययाति यदि देवों व असुरों से भी अधिक बलशाली थे । और न मनुष्यजाति भौमत्रैलोक्य के पृथिवीलोक में ही निवास करती हो वही नियम था क्यों कि चन्द्रवंशी राजा पुरुरवा आदि का गन्धर्व देशों में निवास

पृष्ठ 17

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* १५ * ---इतिहास द्वारा सिद्ध है । भवः से दोनों ही कारण मनुष्य जाति के देवजाति व असुरजाति से प्रथम व्यवहार में कारण नहीं हैं । इसी तरह न मनुजातत्व अर्थात् मनु से उत्पन्न होना ही मनुष्यजाति के के मनुष्यत्व व्यवहार में कारण है, क्योंकि मनु से यदि स्वयम्भू-मनु का ग्रहण करते. हैं तो ऋषि पितर द्वेष आदि सभी की उससे उत्पत्ति होने से मनुजातत्य लक्षण यतिव्याप्ति - दोषप्रस्त होता है और यदि मनुपद से वैवस्वत मनु का ग्रहण कर इस दोष का परिहार करते हैं तो मनुष्य ब्राह्मणों में मनुजातत्व की अन्याप्ति हो जाती है क्यों कि. ब्राह्मणा वशिष्ठ अत्रि आदि ऋषियों की सन्तान हैं न कि मनु की । अतः मनुष्य व्यवहार व मानवव्यवहार में मनु जातत्य भी कारण नहीं है किन्तु रूढि को लेकर ही मनुष्यजाति वालों में मनुष्यव्यवहार हुआ है । ५ तैर्यग्योन-इस विभाग में नाग, सुपर्ण, उदकचर आदि का समावेश है । इस प्रकार मानुष ब्रह्मा ने अपौरुषेय पश्चविधसृष्टि के आधार पर इस पौरुषेय ऋषि, पितर देवासुर, मनुष्य व तैर्यग्योन भेद.. से पांच विभागों में तात्कालिक नरसमाज को विभक्त किया था । से ही ब्रह्मा द्वारा निर्मित पांच प्रकार की सृष्टियां, जैसा कि ऊपर बतलाया जा चुका है पञ्चष्टि, पञ्चजन, व पञ्चचर्षणि शब्द से वेद में व्यवहृत की गई हैं । वे सब मर्त्य है । यह पांचों प्रकार का नरसमाज भूमि पर ही निवास करता था । ऐतिहासिक ग्रन्थों में जहां इन्द्र, चन्द्र आदि देवों, गन्धर्वो व असुरों का निरूपण

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- १६ ४-मिलता है वहाँ इसी मानव ब्रह्मा द्वारा व्यवस्थापित मर्त्य देवों, गन्धवों व श्रसुरों का हो # हण करना चाहिये न कि स्वयम्भू परमेश्वर द्वारा उत्पादित प्राणरूप देवों, गन्धर्वो व असुरों का । इतिहास में व काव्यग्रन्थों मैं जहां २ दिलीप, दुष्यन्त आदि राजाओं का स्वर्गगमन का निर्देश है वहां वहां उसे स्वर्ग से भौमस्वर्ग लेना चाहिये और देवताओं से भी भौमस्वर्ग के मर्त्य देवता ही लेने चाहिए न कि प्राणविंध अपौरुषेयदेवता । जहां इतिहास में सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी राजाओं की उत्पत्ति देवताओं से बतलाई है - जैसे पांचों पाण्डवों की, वहां मौमस्वर्गनिवासी मनुष्यदेवों का ही ग्रहण करना चाहिये । इस तरह प्रजासृष्टि भी उपर्युक्त रीति से पौरुषेय अपौरुषेय भेद से दो प्रकार की है । इन पांचों ऋषियों का अध्यक्ष ब्रह्मा था, इसीने सर्वप्रथम तप व श्रम द्वारा अपौरुषेय विज्ञानरूप वेद का साक्षात्कार कर उसके आधार पर उपर्युक्त रीति से नरसमाज की व्यवस्था की थी । इस ब्रह्मा की उपाधि स्वयंभू थी, क्यों कि इसको किसी ने ब्रह्मा बनाया नहीं था अपितु विज्ञानशक्तिसम्पन्न होने से सर्वाधिष्ठातृत्व ब्रह्मपद को इसने स्वतः प्राप्त किया था । इस स्वयंभू ब्रह्मा के अधीन इसके द्वारा बनाये हुए दस ब्रह्मा और थे जोकि इसकी अधीनता में स्वाधीनस्थ जनपदों में, जनता में धर्म और विज्ञान की शिक्षा देते थे और उसकी देखरेख करते थे । प्रधान ब्रह्मा के अधीन भू-मण्डल पर सात ब्रह्मपरिपमें बनी हुई थीं । उन्हीं साता षदों में ये दस ब्रह्मा कार्य करते थे । उन ब्रह्माओं के नाम निम्नलिखित हैं-

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१- मरीचि, २- श्रङ्गिरा, ३ - अत्रि, ४ - पुलस्त्य, ५- पुलह ६- क्रतु, ७- प्राचेतस, ८ - वशिष्ठ, ε- भृगु, १०- नारद । इन दसों ब्रह्मपरिषदों के ऊपर एक और परिषत् थी जिसका बधिष्ठाता वह स्वयम्भू ब्रह्मा स्वयं था । जैसे इन्द्र की सभा का नाम सुधर्मा था और वह अवरावती में थी । उसी प्रकार इस ब्रह्मा की सभा का नाम ज्योतिष्मती था और वह प्राग्ज्योतिषनगर में - प्रतिष्ठित थी । इस ब्रह्मा की एक सभा और थी जिसका नाम कांतिमती था और: वह विरजानगर में थी । जैसे इन्द्र की सभा देवसभा, राजसभा व शासनसभा कहलाती थी, उसी प्रकार ब्रह्मा की सभा धर्मसभा: व प्रदेशसभा कहलाती थी । इन्द्र की सभा में जैसे दस लोकपाल शासन का सचालन करते थे, वैसे ही बूझा की सभा में दस विद्वान् धर्म का उपदेश व शासन करते थे जिसका निरूपण... मनुस्मृति में मिलता है । जैसे-त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुको धर्मपाठकः । त्रयश्वाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद्दशावरा ॥; ३ - लोकसृष्टि -वेदसृष्टि व प्रजासृष्टिकी तरह लोकसृष्टि भी अपौरुषेय, पौरुषेय.. भेद से दो प्रकार की है । एक हिरण्यगर्भ द्वारा निर्मित: अपौरुषेयः . निव्यसिद्ध, लोकसृष्टि और दूसरी उसके आधार पर मानुषबूझा -द्वारा निर्मित पौरुषेय लोकसृष्टि । प्राकृतिक अपौरुषेय लोकसृष्टि में लोकों के ९ - नाक,

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१८. * २- शैलोक्य, 4- देवयान व ४ - द्विक् भेद से चार विभाग हैं । इन विभागों की स्थिति प्रकृति में निम्न निर्दिष्ट रीति से है मोकाश में ध्रुवस्थान विष्णुपद व ब्रह्मपद भेदसे दो प्रकार का है जिस आकाशमार्ग से सूर्य पश्चिम से पूर्व की तरफ भ्रमण करता हुआ एक वर्ष में एक परिक्रमा कर लेता है, वह संवत्सर चक्र कहलाता है उसे ही आधुनिक ज्योतिषी क्रान्तिवृत्त कहते " हैं । इसका तवृत्त को एक पृष्ठकेन्द्रस्थान है + जिसको श्राधुनिक ज्योतिषी कदम्ब कहते हैं । यह कदम्ब ही वैदिक परिभाषा में ' विष्णुपदनाम वस्थान हैं । यह क्रान्तिवृत्त का पृष्ठकेन्द्रस्थान है, द्वार कान्तिवृत्त अचल हैं अत: यह भी अचल हैं । इसी से यह त्र व कहलाता है । यही नाक कहलाता है । यहां पर गये हुए व्यक्ति इस संसार में RSS पुनः नहीं आते FEE हैं । इस नाकापरपर्याय विष्णुपद ध्रुवस्थान से २३ अक्षांश व २८ कला की दूरी पर विष्णुपदवृत्त में वर्तमान एक घ्रवस्थान और है । सभी नक्षत्र, तारा, ग्रह आदि पूर्व से पश्चिम की तरफ जाते हुए प्रपने स्थानों का परित्याग करदेते हैं किन्तु एक सपने स्थान को नहीं छोड़ता वही ताराज्योति निश्चल होने से ध्रुव कहलाती है । यही ब्रह्मपद ' स्थान कहलाता है । विष्णुपदे अबस्थान से लेकर ब्रह्मपद धवस्थान पर्यन्त प्राधे विष्कम्भ का एक गोलार्द्ध बनाया जाय तो वह ' गोलार्द्ध परिमितं मण्डल प्राकृतिक लोक है । वह्मपदध व स्थान से सप्तर्षिमण्डल पर्यन्त स्थान अन्तरिक्षेोक • सप्तर्षिमण्डल से नागवीथी पर्यन्त लोक देव और है ।