देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 1–10

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10

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॥ श्रीहरिः ॥ 1897 श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण [ प्रथम खण्ड ] ( सचित्र, सरल हिन्दी - व्याख्यासहित ) गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS. GORAKHPUR गीताप्रेस, गोरखपर

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॥ श्रीहरिः ॥ 1897 महर्षि वेदव्यासप्रणीत श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण [ प्रथम खण्ड ] ( सचित्र, सरल हिन्दी - व्याख्यासहित ) स्कन्ध १ से ६ तक त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ गीताप्रेस, गोरखपुर 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 1A

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सं ० २०६७ प्रथम संस्करण १०,००० * मूल्य - १५० रु ० ( एक सौ पचास रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक— गीताप्रेस, गोरखपुर - – २७३००५ ( गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स: ( ०५५१ ) २३३६ ९९ ७ e - mail: booksales@gitapress.org website: www.gitapress.org 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —1B

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निवेदन पुराणवाङ्मयमें ' श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण ' का अत्यन्त महिमामय स्थान है । पुराणोंकी परिगणनामें वेदतुल्य, पवित्र और सभी लक्षणोंसे युक्त यह पुराण पाँचवाँ है । शक्तिके उपासक इस पुराणको ' शाक्तभागवत ' कहते हैं । इस ग्रन्थके आदि, मध्य और अन्तमें - सर्वत्र भगवती आद्याशक्तिकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है । इस पुराणमें मुख्य रूपसे परब्रह्म परमात्माके मातृरूप और उनकी उपासनाका वर्णन है । भगवती आद्याशक्तिकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन लीलाकथाओंका प्रतिपादन ही इस ग्रन्थका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है, जिसके सम्यक् अवगाहनसे साधकों तथा भक्तोंका मन देवीके पद्मपरागका भ्रमर बनकर भक्तिमार्गका पथिक बन जाता है । संसारमें सभी प्राणियोंके लिये मातृभावकी महती महिमा है । मानव अपनी सबसे अधिक श्रद्धा स्वाभाविक रूपसे माताके ही चरणोंमें अर्पित करता है; क्योंकि सर्वप्रथम माताकी ही गोदमें उसे लोक-दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होता है, इसलिये माता ही सभी प्राणियोंकी आदिगुरुके रूपमें प्रतिष्ठित है । उसकी करुणा और कृपा बालकोंके लौकिक तथा पारलौकिक कल्याणका आधार है; इसीलिये ' मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव ' —— इन श्रुतिवाक्यों में सबसे पहले माताका ही स्थान है । जो भगवती महाशक्तिस्वरूपिणी देवी तथा समष्टिस्वरूपिणी सम्पूर्ण जगत्की माता हैं, वे ही सम्पूर्ण लोकोंको कल्याणका मार्ग प्रदर्शित करनेवाली ज्ञानगुरुस्वरूपा भी हैं । वास्तवमें महाशक्ति ही परब्रह्मके रूपमें प्रतिष्ठित हैं, जो विभिन्न रूपोंमें अनेकविध लीलाएँ करती रहती हैं । उन्हींकी शक्तिसे ब्रह्मा विश्वका सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं, अतः ये ही जगत्‌का सृजन - पालन - संहार करनेवाली आदिनारायणी शक्ति हैं । ये ही महाशक्ति नौ दुर्गाओं तथा दस महाविद्याओंके रूपमें प्रतिष्ठित हैं और ये ही महाशक्ति देवी अन्नपूर्णा, जगद्धात्री, कात्यायनी, ललिता तथा अम्बा हैं । गायत्री, भुवनेश्वरी, काली, तारा, बगला, षोडशी, त्रिपुरा, धूमावती, मातंगी, कमला, पद्मावती, दुर्गा आदि देवियाँ इन्हीं भगवतीके ही रूप हैं । ये ही शक्तिमती हैं और शक्ति हैं; नर हैं और नारी भी हैं; ये ही माता - धाता - पितामह आदि रूपसे अधिष्ठित हैं । अभिप्राय यह है कि परमात्मस्वरूपिणी महाशक्ति ही विविध शक्तियोंके रूपमें सर्वत्र क्रीडा करती हैं — ‘ शक्तिक्रीडा जगत् सर्वम् ' सम्पूर्ण जगत् शक्तिकी क्रीडा ( लीला ) है । शक्तिसे रहित हो जाना ही शून्यता है । शक्तिहीन मनुष्यका कहीं भी आदर नहीं किया जाता है । ध्रुव तथा प्रह्लाद भक्ति - शक्तिके कारण ही पूजित हैं । गोपिकाएँ प्रेमशक्तिके कारण ही जगत् में पूजनीय हुईं । हनुमान् तथा भीष्मकी ब्रह्मचर्यशक्ति; वाल्मीकि तथा व्यासकी कवित्वशक्ति; भीम तथा अर्जुनकी पराक्रमशक्ति; हरिश्चन्द्र तथा युधिष्ठिरकी सत्यशक्ति और शिवाजी तथा राणाप्रतापकी वीरशक्ति ही इन महात्माओंके प्रति श्रद्धा - समादर अर्पित करनेके लिये सभी लोगोंको प्रेरणा प्रदान करती है । सभी जगह शक्तिकी ही प्रधानता है । इसलिये प्रकारान्तरसे कहा जा सकता है कि ' सम्पूर्ण विश्व महाशक्तिका ही विलास है । ' श्रीमद्देवीभागवतमें 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 1C

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४ श्रीमद्देवीभागवत भगवती स्वयं उद्घोष करती हैं ' सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् । ' अर्थात् समस्त जगत् मैं ही हूँ, मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ भी सनातन तत्त्व नहीं है । वास्तवमें श्रीमद्देवीभागवतकी समस्त कथाओं और उपदेशोंका सार यह है कि हमें आसक्तिका त्यागकर वैराग्यकी ओर प्रवृत्त होना चाहिये तथा सांसारिक बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये एकमात्र पराम्बा भगवतीकी शरणमें जाना चाहिये । मनुष्य अपने ऐहिक जीवनको किस प्रकार सुख - समृद्धि एवं शान्तिसे सम्पन्न कर सकता है और उसी जीवनसे जीवमात्रके कल्याणमें सहायक होता हुआ कैसे अपने परम ध्येय पराम्बा भगवतीकी करुणामयी कृपाको प्राप्त कर सकता है - इसके विधिवत् साधनोंको उपदेशपूर्ण इतिवृत्तों, कथानकोंके साथ इस पुराणमें प्रस्तुत किया गया है । ' श्रीमद्देवीभागवत ' एवं ' श्रीमद्भागवत ' - – इन दोनोंमें महापुराणकी गणनामें किसे माना जाय? कभी-कभी यह प्रश्न उठता है । शास्त्रोंके अनुसार कल्पभेद कथाभेदका सुन्दर समाधान माना जाता है । इस कल्पभेदमें क्या होता है? देश, काल और अवस्थाका भेद है – ये तीनों भेद जड़प्रकृतिके हैं, चेतन संवित्में नहीं । कल्पभेदका एक अर्थ दर्शनभेद भी होता है । श्रीमद्भागवतका अपना दर्शन है और श्रीमद्देवीभागवतका अपना । दोनों ही दर्शन अपने - अपने स्थानपर सुप्रतिष्ठित हैं । श्रीमद्देवीभागवतका सम्बन्ध सारस्वतकल्पसे तथा श्रीमद्भागवतका सम्बन्ध पाद्मकल्पसे है । ' श्रीमद्देवीभागवतपुराण ' के श्रवण और पठनसे स्वाभाविक ही पुण्यलाभ तथा अन्तःकरण की परिशुद्धि, पराम्बा भगवतीमें रति और विषयोंमें विरति तो होती ही है, साथ ही मनुष्योंको ऐहिक और पारलौकिक हानि - लाभका यथार्थ ज्ञान भी हो जाता है, तदनुसार जीवनमें कर्तव्यका निश्चय करनेकी अनुभूत शिक्षा मिलती है, साथ ही जो जिज्ञासु शास्त्रमर्यादाके अनुसार अपना जीवनयापन करना चाहते हैं, उन्हें इस पुराणसे कल्याणकारी ज्ञान, साधन, सुन्दर एवं पवित्र जीवनयापनकी शिक्षा भी प्राप्त होती है । इस प्रकार यह पुराण जिज्ञासुओंके लिये अत्यधिक उपादेय, ज्ञानवर्धक, सरस तथा उनके यथार्थ अभ्युदयमें पूर्णतः सहायक है । संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत सन् १ ९ ६० ई ० में कल्याणके विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित हुआ था । सुधीजनोंकी यह भावना थी कि भाषा - टीकासहित मूल श्रीमद्देवीभागवतका प्रकाशन किया जाय । इस दृष्टिसे पिछले दो वर्षों ( सन् २००८ तथा २०० ९ ई ० ) - में सम्पूर्ण देवीभागवतमहापुराणका अनुवाद श्लोकसंख्यासहित कल्याणके विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित किया गया, इसके साथ ही मूल देवीभागवत भी पुस्तकरूपमें प्रकाशित की गयी । इस महापुराणका कलेवर बड़ा होनेके कारण विशेषाङ्कमें मूल और अर्थ - दोनों देना सम्भव नहीं था । अतः अब पुस्तकरूपमें भाषा - टीकासहित श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण दो भागों में प्रकाशित किया जा रहा है । भक्तजनोंमें श्रीमद्देवीभागवतकी कथा एवं पारायणके अनुष्ठानकी परम्परा भी है । इस दृष्टिसे श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि तथा सांगोपांग पूजा - अर्चन - हवनका विधान प्रस्तुत किया गया है । साथ ही नवाह्न पारायणके तिथिक्रमका भी उल्लेख किया गया है । आशा है साधकगण इससे लाभान्वित होंगे । - राधेश्याम खेमका 189- श्रीमदेवी.... महानुगण प्रथम खण्ड ] - D

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॥ श्रीहरिः ॥ विषय - सूची अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या १- निवेदन. २ - श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य ३ - अर्धश्लोकी देवीभागवत ४ - भवान्यष्टकम्. ५ - श्री श्रीजगद्धात्री [ चित्र ] ६- श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि. माहात्म्य १ - सूतजीके द्वारा ऋषियोंके ३ .१३ १५ १७ १८ १ ९ प्रति श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणकी महिमाका कथन ३३ २ - श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें स्यमन्तकमणिकी कथा. ३८ ३ - श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुद्युम्नकी कथा ४- श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें रेवती नक्षत्रके पतन और पुनः स्थापनकी कथा तथा श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे राजा दुर्दमको मन्वन्तराधिप - पुत्रकी प्राप्ति..... ५१ ५ - श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी श्रवण - विधि, श्रवणकर्ताके लिये पालनीय नियम, श्रवणके फल तथा माहात्म्यका वर्णन. ५ ९ प्रथम स्कन्ध १- महर्षि शौनकका सूतजीसे श्रीमद्देवी-भागवतपुराण सुनानेकी प्रार्थना करना... ६ ९ । २- सूतजीद्वारा श्रीमद्देवीभागवतके स्कन्ध, अध्याय तथा श्लोकसंख्याका निरूपण और उसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन. ७१ ३ - सूतजीद्वारा पुराणोंके नाम तथा उनकी

श्लोकसंख्याका कथन, उपपुराणों तथा

प्रत्येक द्वापरयुगके व्यासोंका नाम ७५ ४- नारदजीद्वारा व्यासजीको देवीकी महिमा बताना ७ ९ ५- भगवती लक्ष्मीके शापसे विष्णुका मस्तक कट जाना, वेदोंद्वारा स्तुति करनेपर अध्याय विषय पृष्ठ संख्या देवीका प्रसन्न होना, भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी कथा.. ८५ ६- शेषशायी भगवान् विष्णुके कर्णमलसे मधु - कैटभकी उत्पत्ति तथा उन दोनोंका ब्रह्माजीसे युद्धके लिये तत्पर होना........ ९ ६ ७- ब्रह्माजीका भगवान् विष्णु तथा भगवती योगनिद्राकी स्तुति करना १०० ८- भगवान् विष्णु योगमायाके अधीन क्यों हो गये - ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें सूतजीद्वारा उन्हें आद्याशक्ति भगवतीकी महिमा सुनाना.. १०६ ९- भगवान् विष्णुका मधु - कैटभसे पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध करना, विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा मोहित मधु - कैटभका विष्णुद्वारा वध. ११० १० - व्यासजीकी तपस्या और वर - प्राप्ति..... ११८ ११- बुधके जन्मकी कथा १२१ १२ - राजा सुद्युम्नकी इला नामक स्त्रीके रूपमें परिणति, इलाका बुधसे विवाह और पुरूरवाकी उत्पत्ति, भगवतीकी स्तुति करनेसे इलारूपधारी राजा सुद्युम्नकी सायुज्यमुक्ति १२८ १३ - राजा पुरूरवा और उर्वशीकी कथा..... १३३ १४ - व्यासपुत्र शुकदेवके अरणिसे उत्पन्न होनेकी कथा तथा व्यासजीद्वारा उनसे गृहस्थधर्मका वर्णन १३६ १५ - शुकदेवजीका विवाहके लिये अस्वीकार करना तथा व्यासजीका उनसे श्रीमद्देवी-भागवत पढ़नेके लिये कहना १४२ १६ - बालरूपधारी भगवान् विष्णुसे महा-लक्ष्मीका संवाद, व्यासजीका शुकदेवजीसे देवीभागवतप्राप्तिकी परम्परा बताना तथा शुकदेवजीका मिथिला जानेका निश्चय करना.. १४८

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[ ६ ] अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या १७- शुकदेवजीका राजा जनकसे मिलनेके लिये मिथिलापुरीको प्रस्थान तथा राजभवनमें प्रवेश.. १८ - शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश १ ९- शुकदेवजीका व्यासजीके आश्रममें वापस आना, विवाह करके सन्तानोत्पत्ति करना तथा परम सिद्धिकी प्राप्ति करना... २० - सत्यवतीका राजा शन्तनुसे विवाह तथा दो पुत्रोंका जन्म, राजा शन्तनुकी मृत्यु, चित्रांगदका राजा बनना तथा उसकी मृत्यु, विचित्रवीर्यका काशिराजकी कन्याओंसे विवाह और क्षयरोगसे मृत्यु, व्यासजीद्वारा धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति. द्वितीय स्कन्ध १ - ब्राह्मणके शापसे अद्रिका अप्सराका मछली होना और उससे राजा मत्स्य तथा मत्स्यगन्धाकी उत्पत्ति २ - व्यासजीकी उत्पत्ति और उनका तपस्या के लिये जाना. ३- राजा शन्तनु, गंगा और भीष्मके पूर्वजन्मकी कथा ४- गंगाजीद्वारा राजा शन्तनुका पतिरूपमें वरण, सात पुत्रोंका जन्म तथा गंगाका उन्हें अपने जलमें प्रवाहित करना, आठवें पुत्रके रूपमें भीष्मका जन्म तथा उनकी शिक्षा - दीक्षा ५ - मत्स्यगन्धा ( सत्यवती ) - को देखकर राजा शन्तनुका मोहित होना, भीष्मद्वारा आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण करनेकी प्रतिज्ञा करना और शन्तनुका सत्यवतीसे विवाह ६ - दुर्वासाका कुन्तीको अमोघ कामद मन्त्र देना, मन्त्रके प्रभावसे कन्यावस्थामें ही कर्णका जन्म, कुन्तीका राजा पाण्डुसे विवाह, शापके कारण पाण्डुका सन्तानोत्पादनमें असमर्थ होना, मन्त्र - प्रयोगसे कुन्ती और माद्रीका पुत्रवती होना, पाण्डुकी मृत्यु और पाँचों ७-१५४ १६० १६५ पुत्रों को लेकर कुन्तीका हस्तिनापुर आना २०१ धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे दुर्योधनके पिण्डदानहेतु धन माँगना, भीमसेनका प्रतिरोध; धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती, विदुर और संजयका वनके लिये प्रस्थान, वनवासी धृतराष्ट्र तथा माता कुन्तीसे मिलनेके लिये युधिष्ठिरका भाइयोंके साथ वनगमन, विदुरका महाप्रयाण, धृतराष्ट्रसहित पाण्डवोंका व्यासजीके आश्रमपर आना, देवीकी कृपासे व्यासजी-द्वारा महाभारतयुद्धमें मरे कौरवों - पाण्डवोंके परिजनोंको बुला देना.. २०८ ८ - धृतराष्ट्र आदिका दावाग्निमें जल जाना, १७० प्रभासक्षेत्रमें यादवोंका परस्पर युद्ध और संहार, कृष्ण और बलरामका परमधामगमन, परीक्षित्को राजा बनाकर पाण्डवोंका हिमालयपर्वतपर जाना, परीक्षित्‌को शापकी १७७ प्राप्ति, प्रमद्वरा और रुरुका वृत्तान्त. २१४ ९ - सर्पके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु, रुरुद्वारा १८१ १८५ १० -१ ९ ० अपनी आधी आयु देकर उसे जीवित कराना, मणि - मन्त्र - औषधिद्वारा सुरक्षित राजापरीक्षित्का सात तलवाले भवनमें निवास करना......... २१८ महाराज परीक्षित्‌को डँसनेके लिये तक्षकका प्रस्थान, मार्गमें मन्त्रवेत्ता कश्यपसे भेंट, तक्षकका एक वटवृक्षको डँसकर भस्म कर देना और कश्यपका उसे पुनः हरा-भरा कर देना, तक्षकद्वारा धन देकर कश्यपको वापस कर देना, सर्पदंशसे राजा परीक्षित्की मृत्यु. २२२ १ ९ ५ ११ - जनमेजयका राजा बनना और उत्तंककी प्रेरणा से सर्प - सत्र करना, आस्तीकके कहनेसे राजाद्वारा सर्प - सत्र रोकना...... २२८ १२ - आस्तीकमुनिके जन्मकी कथा, कद्रू और विनताद्वारा सूर्यके घोड़ेके रंगके विषयमें शर्त लगाना और विनताको दासीभावकी प्राप्ति, कद्रूद्वारा अपने पुत्रोंको शाप..... २३४

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[ ७ ] अध्याय विषय पृष्ठ- - संख्या अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या तृतीय स्कन्ध १ - राजा जनमेजयका ब्रह्माण्डोत्पत्तिविषयक प्रश्न तथा इसके उत्तरमें व्यासजीका पूर्वकालमें नारदजीके साथ हुआ संवाद सुनाना २- भगवती आद्याशक्तिके प्रभावका वर्णन. ब्रह्मा, विष्णु और महेशका विभिन्न लोकोंमें जाना तथा अपने ही सदृश अन्य ब्रह्मा, विष्णु और महेशको देखकर आश्चर्यचकित होना, देवीलोकका दर्शन ४- भगवतीके चरणनखमें त्रिदेवोंको सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका दर्शन होना, भगवान् विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति करना ब्रह्मा और शिवजीका भगवतीकी स्तुति Y जगदम्बिकाद्वारा अपने स्वरूपका वन तथा ‘ महासरस्वती ', ' महालक्ष्मी ' और ' महाकाली ' नामक अपनी शक्तियोंको क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिवको प्रदान करना ७- ब्रह्माजीके द्वारा परमात्माके स्थूल और सूक्ष्म स्वरूपका वर्णन; सात्त्विक, राजस और तामस शक्तिका वर्णन; पंचतन्मात्राओं, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचीकरण-क्रियाद्वारा सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन.... ८- सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणका वर्णन ९ - गुणोंके परस्पर मिश्रीभावका वर्णन, देवी बीजमन्त्रकी महिमा. १०- देवीके बीजमन्त्रकी महिमाके प्रसंगमें सत्यव्रतका आख्यान. ११- सत्यव्रतद्वारा बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र ' ऐ - ऐ ' का उच्चारण तथा उससे प्रसन्न होकर भगवतीका सत्यव्रतको समस्त विद्याएँ प्रदान करना. १२ - सात्त्विक, राजस और तामस यज्ञोंका वर्णन; मानसयज्ञकी महिमा और व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको देवी - यज्ञके लिये प्रेरित करना. २ ९९ १३ - देवीकी आधारशक्तिसे पृथ्वीका अचल २४१ २४५ २४ ९ होना तथा उसपर सुमेरु आदि पर्वतोंकी रचना, ब्रह्माजीद्वारा मरीचि आदिकी मानसी सृष्टि करना, काश्यपी सृष्टिका वर्णन; ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास और स्वर्ग आदिका निर्माण; भगवान् विष्णुद्वारा अम्बायज्ञ करना और प्रसन्न होकर भगवती आद्याशक्तिद्वारा आकाशवाणीके माध्यमसे उन्हें वरदान देना. ३०६ १४ - देवीमाहात्म्यसे सम्बन्धित राजा ध्रुवसन्धिकी कथा, ध्रुवसन्धिकी मृत्यु २५५ बाद राजा युधाजित् और वीरसेनका अपने - अपने दौहित्रोंके पक्षमें विवाद ३११ २६० १५ - राजा युधाजित् और वीरसेनका युद्ध, वीरसेनकी मृत्यु, राजा ध्रुवसन्धिकी रानी मनोरमाका अपने पुत्र सुदर्शनको लेकर भारद्वाजमुनिके आश्रम में जाना तथा वहीं निवास करना. ३१६ २६६ | १६ - युधाजित्का भारद्वाजमुनिके आश्रमपर आना और उनसे मनोरमाको भेजनेका आग्रह करना, प्रत्युत्तरमें मुनिका ‘ शक्ति हो तो ले जाओ ' - ऐसा कहना. ३२२ १७- युधाजित्का अपने प्रधान अमात्यसे परामर्श २७४ २७८ २८३ २८७ २ ९ ३ | १८ करना, प्रधान अमात्यका इस सन्दर्भमें वसिष्ठ - विश्वामित्र - प्रसंग सुनाना और परामर्श मानकर युधाजित्का वापस लौट जाना, बालक सुदर्शनको दैवयोगसे कामराज नामक बीजमन्त्रकी प्राप्ति, भगवतीकी आराधनासे सुदर्शनको उनका प्रत्यक्ष दर्शन होना तथा काशिराजकी कन्या शशिकलाको स्वप्नमें भगवतीद्वारा सुदर्शनका वरण करनेका आदेश देना.. ३२८ - राजकुमारी शशिकलाद्वारा मन - ही - मन सुदर्शनका वरण करना, काशिराजद्वारा स्वयंवरकी घोषणा, शशिकलाका सखीके माध्यमसे अपना निश्चय माताको बताना ३३३

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[ ८ ] अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या अध्याय विषय पृष्ठ संख्या १ ९ - माताका शशिकलाको समझाना, शशि-कलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना, सुदर्शन तथा अन्य राजाओंका स्वयंवरमें आगमन, युधाजित्द्वारा सुदर्शनको मार डालने की बात कहनेपर केरलनरेशका उन्हें समझाना.. २० - राजाओंका सुदर्शनसे स्वयंवरमें आनेका कारण पूछना और सुदर्शनका उन्हें स्वप्नमें भगवतीद्वारा दिया गया आदेश बताना, राजा सुबाहुका शशिकलाको समझाना, परंतु उसका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना २१- राजा सुबाहुका राजाओंसे अपनी कन्याकी इच्छा बताना, युधाजित्का क्रोधित होकर सुबाहुको फटकारना तथा अपने दौहित्रसे शशिकलाका विवाह करनेको कहना, माताद्वारा शशिकलाको पुनः समझाना, किंतु शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना २२- शशिकलाका गुप्त स्थानमें सुदर्शनके साथ विवाह, विवाहकी बात जानकर राजाओंका सुबाहुके प्रति क्रोध प्रकट करना तथा सुदर्शनका मार्ग रोकनेका निश्चय करना २३- सुदर्शनका शशिकलाके साथ भारद्वाज-आश्रमके लिये प्रस्थान, युधाजित् तथा अन्य राजाओंसे सुदर्शनका घोर संग्राम, भगवती सिंहवाहिनी दुर्गाका प्राकट्य, भगवतीद्वारा युधाजित् और शत्रुजित्का वध, सुबाहुद्वारा भगवतीकी स्तुति २४ - सुबाहुद्वारा भगवती दुर्गासे सदा काशीमें रहनेका वरदान माँगना तथा देवीका वरदान देना, सुदर्शनद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीका उसे अयोध्या जाकर राज्य करनेका आदेश देना, राजाओंका सुदर्शनसे अनुमति लेकर अपने - अपने राज्योंको प्रस्थान... २५- सुदर्शनका शत्रुजित्की माताको सान्त्वना देना, सुदर्शनद्वारा अयोध्यामें तथा राजा सुबाहुद्वारा काशीमें देवी दुर्गाकी स्थापना २६ - नवरात्रव्रत - विधान, कुमारीपूजामें प्रशस्त कन्याओं का वर्णन.. ३७५ २७- कुमारीपूजामें निषिद्ध कन्याओंका वर्णन, नवरात्रव्रतके माहात्म्यके प्रसंगमें सुशील ३३८ नामक वणिक्की कथा ३८० २८ - श्रीरामचरित्रवर्णन ३८६ २ ९ - सीताहरण, रामका शोक और लक्ष्मणद्वारा उन्हें सान्त्वना देना ३ ९ २ ३० - श्रीराम और लक्ष्मणके पास नारदजीका ३४४ ३५० १ -२-३५६ ३-४-1-३६१ ६-३६७ ७-३७१ आना और उन्हें नवरात्रव्रत करनेका परामर्श देना, श्रीरामके पूछनेपर नारदजीका उनसे देवीकी महिमा और नवरात्रव्रतकी विधि बतलाना, श्रीरामद्वारा देवीका पूजन और देवीद्वारा उन्हें विजयका वरदान देना... ३ ९ ७ चतुर्थ स्कन्ध वसुदेव, देवकी आदिके कष्टोंके कारणके सम्बन्धमें जनमेजयका प्रश्न. ४०३ व्यासजीका जनमेजयको कर्मकी प्रधानता समझाना. ४०७ वसुदेव और देवकीके पूर्वजन्मकी कथा ४१२ व्यासजीद्वारा जनमेजयको मायाकी प्रबलता समझाना. ४१७ नर - नारायणकी तपस्यासे चिन्तित होकर इन्द्रका उनके पास जाना और मोहिनी माया प्रकट करना तथा उससे भी अप्रभावित रहनेपर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंको भेजना... ४२१ कामदेवद्वारा नर - नारायणके समीप वसन्त ऋतुकी सृष्टि, नारायणद्वारा उर्वशीकी उत्पत्ति, अप्सराओं द्वारा नारायणसे स्वयंको अंगीकार करनेकी प्रार्थना.. ४२५ अप्सराओंके प्रस्तावसे नारायणके मनमें ऊहापोह और नरका उन्हें समझाना तथा अहंकारके कारण प्रह्लादके साथ हुए युद्धका स्मरण कराना. ४३१

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[ ९ ] अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या अध्याय विषय पृष्ठ- ठ- संख्या ८ - व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको प्रह्लादकी कथा सुनाना और इस प्रसंगमें च्यवनऋषिके पाताललोक जानेका वर्णन ९ - प्रह्लादजीका तीर्थयात्राके क्रममें नैमिषारण्य पहुँचना और वहाँ नर - नारायणसे उनका घोर युद्ध, भगवान् विष्णुका आगमन और उनके द्वारा प्रह्लादको नर - नारायणका परिचय देना. १० - राजा जनमेजयद्वारा प्रह्लादके साथ नर-नारायणके युद्धका कारण पूछना, व्यासजीद्वारा उत्तरमें संसारके मूल कारण अहंकारका निरूपण करना तथा महर्षि भृगुद्वारा भगवान् विष्णुको शाप देनेकी कथा ११ - मन्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये शुक्राचार्यका तपस्यारत होना, देवताओं द्वारा दैत्योंपर आक्रमण, शुक्राचार्यकी माताद्वारा दैत्योंकी रक्षा और इन्द्र तथा विष्णुको संज्ञाशून्य कर देना, विष्णुद्वारा शुक्रमाताका वध.. १२- महात्मा भृगुद्वारा विष्णुको मानवयोनिमें जन्म लेनेका शाप देना, इन्द्रद्वारा अपनी पुत्री जयन्तीको शुक्राचार्यके लिये अर्पित करना, देवगुरु बृहस्पतिद्वारा शुक्राचार्यका रूप धारणकर दैत्योंका पुरोहित बनना १३ - शुक्राचार्यरूपधारी बृहस्पतिका दैत्योंको उपदेश देना.. १४ - शुक्राचार्यद्वारा दैत्योंको बृहस्पतिका पाखण्ड-पूर्ण कृत्य बताना, बृहस्पतिकी मायासे मोहित दैत्योंका उन्हें फटकारना, क्रुद्ध शुक्राचार्यका दैत्योंको शाप देना, बृहस्पतिका अन्तर्धान हो जाना, प्रह्लादका शुक्राचार्यजीसे क्षमा माँगना और शुक्राचार्यका उन्हें प्रारब्धकी बलवत्ता समझाना. १५ - देवता और दैत्योंके युद्धमें दैत्योंकी विजय, इन्द्रद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीका प्रकट होकर दैत्योंके पास जाना, प्रह्लादद्वारा भगवतीकी स्तुति, देवीके आदेशसे दैत्योंका पातालगमन. ४७१ ४३६ | १६ -१७ -४४० १८-४४५ भगवान् श्रीहरिके विविध अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन. ४७८ श्रीनारायणद्वारा अप्सराओंको वरदान देना, राजा जनमेजयद्वारा व्यासजीसे श्रीकृष्णावतारका चरित सुनानेका निवेदन करना ४८१ पापभारसे व्यथित पृथ्वीका देवलोक जाना, इन्द्रका देवताओं और पृथ्वीके साथ ब्रह्मलोक जाना, ब्रह्माजीका पृथ्वी तथा इन्द्रादि देवताओंसहित विष्णुलोक जाकर विष्णुकी स्तुति करना, विष्णुद्वारा अपनेको भगवतीके अधीन बताना....... ४८५ १ ९- देवताओंद्वारा भगवतीका स्तवन, भगवतीद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनको निमित्त बनाकर अपनी शक्तिसे पृथ्वीका भार दूर करनेका ४५० आश्वासन देना ४ ९ ० २० - व्यासजीद्वारा जनमेजयको भगवतीकी महिमा सुनाना तथा कृष्णावतारकी कथाका उपक्रम ४ ९ ५ २१- देवकीके प्रथम पुत्रका जन्म, वसुदेवद्वारा प्रतिज्ञानुसार उसे कंसको अर्पित करना ४५५ और कंसद्वारा उस नवजात शिशुका वध ५०३ २२ - देवकीके छः पुत्रोंके पूर्वजन्मकी कथा, ४६० सातवें पुत्रके रूपमें भगवान् संकर्षणका अवतार, देवताओं तथा दानवोंके अंशावतारोंका वर्णन.... ५०७ २३- कंसके कारागारमें भगवान् श्रीकृष्णका ४६६ २४ अवतार, वसुदेवजीका उन्हें गोकुल पहुँचाना और वहाँसे योगमायास्वरूपा कन्याको लेकर आना, कंसद्वारा कन्याके वधका प्रयास, योगमायाद्वारा आकाशवाणी करनेपर कंसका अपने सेवकोंद्वारा नवजात शिशुओंका वध कराना ५१२ - श्रीकृष्णावतारकी संक्षिप्त कथा, कृष्णपुत्रका