देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 11–20

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

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[ १० अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या प्रसूतिगृहसे हरण, कृष्णद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवती चण्डिकाद्वारा सोलह वर्ष के बाद पुनः पुत्रप्राप्तिका वर देना........... ५१७ । २५- व्यासजीद्वारा शाम्भवी मायाकी बलवत्ताका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा शिवजीकी प्रसन्नता लिये तप करना और शिवजीद्वारा उन्हें वरदान देना.. ५२३ | पंचम स्कन्ध १ - व्यासजीद्वारा त्रिदेवोंकी तुलनामें भगवतीकी उत्तमताका वर्णन. ५३१ । २ - महिषासुरके जन्म, तप और वरदान -प्राप्तिकी कथा ५३६ ३ - महिषासुरका दूत भेजकर इन्द्रको स्वर्ग खाली करनेका आदेश देना, दूतद्वारा इन्द्रका युद्धहेतु आमन्त्रण प्राप्तकर महिषासुरका दानववीरोंको युद्धके लिये सुसज्जित होनेका आदेश देना. ५४१ ४- इन्द्रका देवताओं तथा गुरु बृहस्पतिसे परामर्श करना तथा बृहस्पतिद्वारा जय-पराजयमें दैवकी प्रधानता बतलाना...... ५४६ ५- इन्द्रका ब्रह्मा, शिव और विष्णुके पास जाना; तीनों देवताओं सहित इन्द्रका युद्धस्थलमें आना तथा चिक्षुर, बिडाल और ताम्रको पराजित करना ५५१ ६- भगवान् विष्णु और शिवके साथ महिषासुरका भयानक युद्ध. ५५६ -61 महिषासुरको अवध्य जानकर त्रिदेवोंका अपने - अपने लोक लौट जाना, देवताओंकी पराजय तथा महिषासुरका स्वर्गपर आधिपत्य, इन्द्रका ब्रह्मा और शिवजीके साथ विष्णुलोकके लिये प्रस्थान ५६१ ८- ब्रह्माप्रभृति समस्त देवताओंके शरीरसे तेज: पुंजका निकलना और उस तेजोराशिसे भगवतीका प्राकट्य ५६६ ९- देवताओं द्वारा भगवतीको आयुध और आभूषण समर्पित करना तथा उनकी स्तुति करना, देवीका प्रचण्ड अट्टहास करना, जिसे ] अध्याय विषय पृष्ठ संख्या सुनकर महिषासुरका उद्विग्न होकर अपने प्रधान अमात्यको देवीके पास भेजना... ५७३ १०- देवीद्वारा महिषासुरके अमात्यको अपना उद्देश्य बताना तथा अमात्यका वापस लौटकर देवीद्वारा कही गयी बातें महिषासुरको बताना. ५७ ९ ११- महिषासुरका अपने मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करना और ताम्रको भगवतीके पास भेजना. ५८५ १२ - देवीके अट्टहाससे भयभीत होकर ताम्रका महिषासुरके पास भाग आना, महिषासुरका अपने मन्त्रियोंके साथ पुनः विचार - विमर्श तथा दुर्धर, दुर्मुख और बाष्कलकी गर्वोक्ति ५ ९ १ १३ - बाष्कल और दुर्मुखका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध. ५ ९ ७ १४- चिक्षुर और ताम्रका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध. ६०२ १५ - बिडालाख्य और असिलोमाका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध. ६०७ १६ - महिषासुरका रणभूमिमें आना तथा देवीसे प्रणय- याचना करना. ६१२ १७- महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना... ६१८ १८ - दुर्धर, त्रिनेत्र, अन्धक और महिषासुरका वध ६२३ १ ९ - देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति. ६२ ९ २०- देवीका मणिद्वीप पधारना तथा राजा शत्रुघ्नका भूमण्डलाधिपति बनना..... ६३५ २१- शुम्भ और निशुम्भको ब्रह्माजीके द्वारा वरदान, देवताओंके साथ उनका युद्ध और देवताओंकी पराजय ६४० २२ - देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति और उनका प्राकट्य ६४६ २३- भगवतीके श्रीविग्रहसे कौशिकीका प्राकट्य,

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[ ११ ] अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या देवीकी कालिकारूपमें परिणति, चण्ड-मुण्डसे देवीके अद्भुत सौन्दर्यको सुनकर शुभका सुग्रीवको दूत बनाकर भेजना, जगदम्बाका विवाहके विषयमें अपनी शर्त बताना २४ - शुम्भका धूम्रलोचनको देवीके पास भेजना और धूम्रलोचनका देवीको समझानेका प्रयास करना २५- भगवती काली और धूम्रलोचनका संवाद, कालीके हुंकारसे धूम्रलोचनका भस्म होना तथा शुम्भका चण्ड - मुण्डको युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना. २६ - भगवती अम्बिकासे चण्ड - मुण्डका संवाद और युद्ध, देवी कालिकाद्वारा चण्ड - मुण्डका वध. २७- शुम्भका रक्तबीजको भगवती अम्बिकाके पास भेजना और उसका देवीसे वार्तालाप २८ - देवीके साथ रक्तबीजका युद्ध, विभिन्न शक्तियोंके साथ भगवान् शिवका रणस्थलमें आना तथा भगवतीका उन्हें दूत बनाकर शुम्भके पास भेजना, भगवान् शिवके सन्देशसे दानवोंका क्रुद्ध होकर युद्धके लिये आना २ ९ - रक्तबीजका वध और निशुम्भा युद्धक्षेत्रके लिये प्रस्थान. ३०- देवीद्वारा निशुम्भका वध ३१ - शुम्भका रणभूमिमें आना और देवीसे वार्तालाप करना, भगवती कालिकाद्वारा उसका वध, देवीके इस उत्तम चरित्रके पठन और श्रवणका फल ३२ - देवीमाहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुरथ और समाधि वैश्यकी कथा. ३३ - मुनि सुमेधाका सुरथ और समाधिको देवीकी महिमा बताना. ३४ - मुनि सुमेधाद्वारा देवीकी पूजा - विधिका वर्णन. ३५ - सुरथ और समाधिकी तपस्यासे प्रसन्न १-६५२ २ -६५७ ३ -६६३ ६६८ ४-६७४ ६८० ६-६८५ ६ ९ १ ७-६ ९ ७ ८-७०३ ७० ९ ७१४ भगवतीका प्रकट होना और उन्हें इच्छित वरदान देना.. ७१८ षष्ठ स्कन्ध त्रिशिराकी तपस्यासे चिन्तित इन्द्रद्वारा तपभंगहेतु अप्सराओंको भेजना ७२३ इन्द्रद्वारा त्रिशिराका वध, क्रुद्ध त्वष्टाद्वारा अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे हवन करके वृत्रासुरको उत्पन्न करना और उसे इन्द्रके वधके लिये प्रेरित करना ७२८ वृत्रासुरका देवलोकपर आक्रमण, बृहस्पतिद्वारा इन्द्रकी भर्त्सना करना और वृत्रासुरको अजेय बतलाना, इन्द्रकी पराजय, त्वष्टाके निर्देशसे वृत्रासुरका ब्रह्माजीको प्रसन्न करनेके लिये तपस्यारत होना.... ७३२ तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीका वृत्रासुरको वरदान देना, त्वष्टाकी प्रेरणासे वृत्रासुरका स्वर्गपर आक्रमण करके अपने अधिकारमें कर लेना, इन्द्रका पितामह ब्रह्मा और भगवान् शंकरके साथ वैकुण्ठधाम जाना ७३७ भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे देवताओंका भगवतीकी स्तुति करना और प्रसन्न होकर भगवतीका वरदान देना. ७४३ भगवान् विष्णुका इन्द्रको वृत्रासुरसे सन्धिका परामर्श देना, ऋषियोंकी मध्यस्थतासे इन्द्र और वृत्रासुरमें सन्धि, इन्द्रद्वारा छलपूर्वक वृत्रासुरका वध ७४ ९ त्वष्टाका वृत्रासुरकी पारलौकिक क्रिया करके इन्द्रको शाप देना, इन्द्रको ब्रह्महत्या लगना, नहुषका स्वर्गाधिपति बनना और इन्द्राणीपर आसक्त होना. ७५४ इन्द्राणीको बृहस्पतिकी शरणमें जानकर नहुषका क्रुद्ध होना, देवताओंका नहुषको समझाना, बृहस्पतिके परामर्शसे इन्द्राणीका नहुषसे समय माँगनां, देवताओंका भगवान् विष्णुके पास जाना और विष्णुका उन्हें देवीको प्रसन्न करनेके लिये अश्वमेधयज्ञ करनेको कहना, बृहस्पतिका शचीको

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[ अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या भगवतीकी आराधना करने को कहना, शचीकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवीका प्रकट होना और शचीको इन्द्रका दर्शन होना ७५ ९ ९ - शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्रका शचीको सलाह देना कि वह नहुषसे ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें आनेको कहे, नहुषका ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना. ७६५ १० - कर्मकी गहन गतिका वर्णन तथा इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका उदाहरण ७७१ ११ - युगधर्म एवं तत्सम्बन्धी व्यवस्थाका वर्णन ७७४ १२ - पवित्र तीर्थोंका वर्णन, चित्तशुद्धिकी प्रधानता तथा इस सम्बन्धमें विश्वामित्र और वसिष्ठके परस्पर वैरकी कथा, राजा हरिश्चन्द्रका वरुणदेवके शापसे जलोदरग्रस्त होना. ७७ ९ १३ - राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करना, विश्वामित्रसे प्राप्त वरुणमन्त्रके जपसे शुनःशेपका मुक्त होना, परस्पर शापसे विश्वामित्र और वसिष्ठका बक तथा आडी होना ७८४ १४ - राजा निमि और वसिष्ठका एक - दूसरेको शाप देना, वसिष्ठका मित्रावरुणके पुत्रके रूपमें जन्म लेना. ७८ ९ १५ - भगवतीकी कृपासे निमिको मनुष्योंके नेत्र-पलकोंमें वासस्थान मिलना तथा संसारी प्राणियोंकी त्रिगुणात्मकताका वर्णन...... ७ ९ ४ १६ - हैहयवंशी क्षत्रियोंद्वारा भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार. ७ ९९ १७ - भगवतीकी कृपासे भार्गव - ब्राह्मणीकी जंघासे तेजस्वी बालककी उत्पत्ति, हैहयवंशी क्षत्रियोंकी उत्पत्तिकी कथा... ८०३ १८ - भगवती लक्ष्मीद्वारा घोड़ीका रूप धारणकर तपस्या करना ८० ९ १२ ] अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या १ ९ - भगवती लक्ष्मीको अश्वरूपधारी भगवान् विष्णु के दर्शन और उनका वैकुण्ठगमन ८१४ २०- राजा हरिवर्माको भगवान् विष्णुद्वारा अपना हैहयसंज्ञक पुत्र देना, राजाद्वारा उसका ' एकवीर ' नाम रखना. ८१ ९ २१- आखेटके लिये वनमें गये राजासे एकावलीकी सखी यशोवतीकी भेंट, एकावलीके जन्मकी कथा ८२४ २२- यशोवतीका एकवीरसे कालकेतुद्वारा एकावलीके अपहृत होनेकी बात बताना ८२ ९ २३- भगवतीके सिद्धिप्रदायक मन्त्रसे दीक्षितएकवीर-कालकेतुका वध, एकवीर और एकावलीका विवाह तथा हैहयवंशकीपरम्परा ८३५ | २४- धृतराष्ट्रके जन्मकी कथा. ८४१ २५ - पाण्डु और विदुरके जन्मकी कथा, पाण्डवोंका जन्म, पाण्डुकी मृत्यु, द्रौपदीस्वयंवर, राजसूययज्ञ, कपटद्यूत तथा वनवास और व्यासजीके मोहका वर्णन... ८४६ २६- देवर्षि नारद और पर्वतमुनिका एक-दूसरेको शाप देना, राजकुमारी दमयन्तीका नारदसे विवाह करनेका निश्चय ८५१ २७ - वानरमुख नारदसे दमयन्तीका विवाह, नारद तथा पर्वतका परस्पर शापमोचन ८५६ | २८ - भगवान् विष्णुका नारदजीसे मायाकी अजेयताका वर्णन करना, मुनि नारदको मायावश स्त्रीरूपकी प्राप्ति तथा राजा तालध्वजका उनसे प्रणय निवेदन करना ८६१ २ ९ - राजा तालध्वजसे स्त्रीरूपधारी नारदजीका विवाह, अनेक पुत्र - पौत्रोंकी उत्पत्ति और युद्धमें उन सबकी मृत्यु, नारदजीका शोक और भगवान् विष्णुकी कृपासे पुनः स्वरूपबोध ८६६ ३० - राजा तालध्वजका विलाप और ब्राह्मण-वेशधारी भगवान् विष्णुके प्रबोधनसे उन्हें वैराग्य होना, भगवान् विष्णुका नारदसे मायाके प्रभावका वर्णन करना ८७१ ३१ - व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना. ८७६

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श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य १३ श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य

देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम् ।

त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती ॥

श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि ।

श्लोकार्थं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम् ॥

पूजितं यद्गृहे नित्यं श्रीभागवतपुस्तकम् ।

तद्गृहं तीर्थभूतं हि वसतां पापनाशकम् ॥

यस्तु भागवतं देव्याः पठेद् भक्त्या शृणोति वा । धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं च लभते नरः

सुधां पिबन्नेक एव नरः स्यादजरामरः ।

देव्याः कथामृतं कुर्यात् कुलमेवाजरामरम् ॥

अष्टादशपुराणानां मध्ये सर्वोत्तमं परम् ।

देवीभागवतं नाम धर्मकामार्थमोक्षदम् ॥

ये शृण्वन्ति सदा भक्त्या देव्या भागवतीं कथाम् । तेषां सिद्धिर्न दूरस्था तस्मात् सेव्या सदा नृभिः

दिनमर्थं तदर्थं वा मुहूर्तं क्षणमेव वा ।

ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषां दुर्गतिः क्वचित् ॥

तावद् गर्जन्ति तीर्थानि पुराणानि व्रतानि च यावन्न श्रूयते सम्यग् देवीभागवतं नरैः तावत् पापाटवी नॄणां क्लेशदादभ्रकण्टका यावन्न परशुः प्राप्तो देवीभागवताभिधः तावत् क्लेशावहं नृणामुपसर्गमहातमः यावन्नैवोदयं प्राप्तो देवीभागवतोष्णगुः इदमखिलकथानां सारभूतं पुराणं निखिलनिगमतुल्यं सप्रमाणानुविद्धम् पठति परमभावाद्यः शृणोतीह भक्त्या स भवति धनवान्वै ज्ञानवान्मानवोऽत्र श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है । जो श्रीमद्देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह । परमगतिको प्राप्त होता है । जिस घरमें नित्य श्रीमद्देवीभागवतग्रन्थका पूजन किया जाता है, वह घर तीर्थस्वरूप हो जाता है तथा उसमें निवास करनेवाले लोगोंके पापोंका नाश हो जाता है । जो व्यक्ति भक्ति - भावसे देवीके इस भागवतपुराणका पाठ अथवा श्रवण करता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त कर लेता है । अमृत ॥ पानसे तो केवल एक ही मनुष्य अजर - अमर होता है, किंतु भगवतीका कथारूप अमृत सम्पूर्ण कुलको ही अजर-अमर बना देता है । सभी अठारह पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको प्रदान करनेवाला है । जो लोग सदा भक्ति-श्रद्धापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतकी कथा सुनते हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त होनेमें रंचमात्र भी विलम्ब नहीं होता, इसलिये मनुष्योंको इस पुराणका सदा पठन- श्रवण करना चाहिये । ॥ पूरे दिन, दिनके आधे समयतक, चौथाई समयतक, मुहूर्तभर अथवा एक क्षण भी जो लोग भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करते हैं, उनकी कभी भी दुर्गति नहीं होती । समस्त तीर्थ, पुराण और व्रत [ अपनी श्रेष्ठताका वर्णन करते हुए ] । तभीतक गर्जना करते हैं, जबतक मनुष्य श्रीमद्देवीभागवतका ॥ सम्यक् रूपसे श्रवण नहीं कर लेते । मनुष्योंके लिये पापरूपी अरण्य तभीतक दुःखप्रद एवं कंटकमय रहता । है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी परशु ( कुठार ) उपलब्ध ॥ नहीं हो जाता । मनुष्योंको उपसर्ग ( ग्रहण ) - रूपी घोर अन्धकार तभीतक कष्ट पहुँचाता है, जबतक । श्रीमद्देवीभागवतरूपी सूर्य उनके सम्मुख उदित नहीं हो ॥ जाता । इस संसारमें जो मनुष्य विशेष श्रद्धाके साथ उच्च विचारोंसे युक्त होकर सम्पूर्ण पुराणोंके सारस्वरूप, समस्त वेदोंकी तुलना करनेवाले तथा नानाविध प्रमाणोंसे परिपूर्ण । इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणका पाठ करता है तथा इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह ऐश्वर्य तथा ज्ञानसे सम्पन्न ॥ || हो जाता है |

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१४ श्रीमद्देवीभागवत

श्रुत्वैतत्तु महादेव्याः पुराणं परमाद्भुतम् ।

कृतकृत्यो भवेन्मर्त्यो देव्याः प्रियतमो हि सः ॥

मूलप्रकृतिरेवैषा यत्र तु प्रतिपाद्यते ।

समं तेन पुराणं स्यात्कथमन्यन्नृपोत्तम ॥

पाठे वेदसमं पुण्यं यस्य स्याज्जनमेजय ।

पठितव्यं प्रयत्नेन देव विबुधोत्तमैः ॥

नित्यं यः शृणुयाद्भक्त्या देवीभागवतं परम् ।

न तस्य दुर्लभं किञ्चित्कदाचित्क्वचिदस्ति हि ॥

अपुत्रो लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात् ।

विद्यार्थी प्राप्नुयाद्विद्यां कीर्तिमण्डितभूतलः ॥

वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवन्ध्या च याङ्गना ।

श्रवणादस्य तद्दोषान्निवर्तेत न संशयः ॥

यद्गेहे पुस्तकं चैतत्पूजितं यदि तिष्ठति ।

तद्गेहं न त्यजेन्नित्यं रमा चैव सरस्वती ॥

नेक्षन्ते तत्र वेतालडाकिनीराक्षसादयः ।

ज्वरितं तु नरं स्पृष्ट्वा पठेदेतत्समाहितः ॥

मण्डलान्नाशमाप्नोति ज्वरो दाहसमन्वितः ।

शतावृत्त्यास्य पठनात्क्षयरोगो विनश्यति ॥

प्रतिसन्ध्यं पठेद्यस्तु सन्ध्यां कृत्वा समाहितः । एकैकमस्य चाध्यायं नवरात्रे पठेन्नित्यं तस्याम्बिका तु सन्तुष्टा वैष्णवैश्चैव शैवैश्च सौरैश्च गाणपत्यैश्च पठितव्यं प्रयत्नेन वैदिकैर्निजगायत्रीप्रीतये वेदसारमिदं पुण्यं स नरो ज्ञानवान्भवेत् ॥

शारदीयेऽतिभक्तितः ।

ददातीच्छाधिकं फलम् ॥

रमोमा प्रीयते सदा ।

स्वेष्टशक्तेश्च तुष्टये ॥

नवरात्रचतुष्टये ।

नित्यशो मुने ॥

पुराणं द्विजसत्तमाः ।

वेदपाठसमं पाठे श्रवणे च तथैव हि ॥

[ महर्षि व्यासने राजा जनमेजयसे कहा- - ] महादेवीका यह परम अद्भुत पुराण सुनकर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और वह भगवतीका प्रियतम हो जाता है । है नृपश्रेष्ठ! जिस देवीभागवतमें साक्षात् मूलप्रकृतिका ही प्रतिपादन किया गया है, उसके समान अन्य कोई पुराण भला कैसे हो सकता है? हे जनमेजय! जिस देवीभागवतपुराणका पाठ करनेसे वेद- पाठके समान पुण्य प्राप्त होता है, उसका पाठ श्रेष्ठ विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये । [ श्रीसूतजी मुनियोंसे बोले - ] जो इस श्रेष्ठ श्रीमद्देवीभागवतका नित्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसके लिये कुछ भी कहीं और कभी दुर्लभ नहीं है । इसके श्रवणसे पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्र, धन चाहनेवालेको धन और विद्या अभिलाषीको विद्याकी प्राप्ति हो जाती है, साथ ही सम्पूर्ण पृथ्वीलोकमें वह कीर्तिमान् हो जाता है । जो स्त्री वन्ध्या, काकवन्ध्या अथवा मृतवन्ध्या हो; वह | इस पुराणके श्रवणसे उस दोषसे मुक्त हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है । यह पुराण जिस घरमें विधिपूर्वक पूजित होकर स्थित रहता है, उस घरको लक्ष्मी तथा सरस्वती कभी नहीं छोड़तीं और वेताल, डाकिनी तथा राक्षस आदि वहाँ झाँकतेतक नहीं । यदि ज्वरग्रस्त मनुष्यको स्पर्श करके एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका पाठ किया जाय तो दाहक ज्वर उसके मण्डलको छोड़कर भाग जाता है । इसकी एक सौ आवृत्तिके पाठसे क्षयरोग समाप्त हो जाता है । जो मनुष्य प्रत्येक सन्ध्याके अवसरपर दत्तचित्त होकर सन्ध्या - विधि सम्पन्न करके इस पुराणके एक - एक अध्यायका पाठ करता है, वह ज्ञानवान् हो जाता है । शारदीय नवरात्रमें परम भक्तिसे इस पुराणका नित्य पाठ करना चाहिये । इससे जगदम्बा उस व्यक्तिपर प्रसन्न होकर उसकी अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करती हैं । वैष्णव, शैव, सौर तथा गाणपत्यजनोंको अपने - अपने इष्टदेवकी शक्तिकी सन्तुष्टिके लिये चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ - इन मासोंके चारों नवरात्रोंमें इस पुराणका प्रयत्नपूर्वक पाठ करना चाहिये; इससे रमा, उमा आदि शक्तियाँ उसपर सदा प्रसन्न रहती हैं । हे मुने! इसी प्रकार वैदिकोंको भी अपनी गायत्रीकी प्रसन्नताके लिये इसका नित्य पाठ करना चाहिये । हे श्रेष्ठ मुनियो! यह पुराण परम पवित्र तथा वेदोंका सारस्वरूप है । इसके पढ़ने तथा सुननेसे वेदपाठके समान फल प्राप्त होता | है | [ श्रीमद्देवीभागवत ]

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अर्धश्लोकी देवी भागवत १५ अर्धश्लोकी जिस प्रकार सप्तश्लोकी दुर्गा ', सप्तश्लोकी गीता, पंचश्लोकी गणेशपुराण, ३ चतुःश्लोकी भागवत, ४. एकश्लोकी भागवत ', एकश्लोकी रामायण, एकश्लोकी योगवासिष्ठ, सार्धश्लोकी दुर्गा ' तथा एकश्लोकी महाभारत ' प्राप्त होता है; उसी प्रकार अर्धश्लोकी देवी भागवत भी प्राप्त होता है, दृष्टिसे बड़े ही महत्त्वका है । पुराण - वाङ्मयमें देवीभागवतका अत्यन्त महनीय स्थान है । इसमें भगवती जगदम्बाका पराशक्तिके रूपमें निरूपण हुआ है । इस पुराणके प्राकट्यके विषयमें इसी पुराणमें बताया गया है कि जब भगवान् वेदव्यासने अपने पुत्र श्रीशुकदेवजीको गृहस्थाश्रम ग्रहण करनेका परामर्श दिया तो ज्ञानमार्गके उपासक श्रीशुकदेवजीने प्रवृत्तिमार्गको स्वीकार नहीं किया, तब वेदव्यासजीने मोक्षमार्गाभिलाषी अपने पुत्रसे कहा- | -हे महाभाग! तुम मेरे द्वारा रचित वेदतुल्य श्रीमद्देवी-भागवतपुराणको पढ़ो, इसमें बारह स्कन्ध हैं, यह पुराण सभी पुराणोंका आभूषण है और इसके सुननेमात्रसे सत् और असत् वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान हो जाता है-‘ सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते । ' ( श्रीमद्देवीभा ० १। १५। ४ ९ ) व्यासजीने इस पुराणके प्राकट्यकी कथा १. ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि ० ' इत्यादि सात श्लोक । २. ' ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ० ' इत्यादि सात श्लोक । ३. श्रीविघ्नेशपुराणसारमुदितम् ० इत्यादि पाँच श्लोक । ४. अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् । पश्चादहं देवी भागवत । बताते हुए आगे कहा- हे महामते! एक समयकी बात है, जब महाप्रलयावस्थामें एकार्णवके मध्य वटपत्रपर भगवान्, विष्णु बालरूपमें शयन कर रहे थे और बड़े ही विचारमग्न थे कि किस चिदात्मा शक्तिने मुझे इस बालरूपमें उत्पन्न किया है, मैं उन्हें कैसे जानूँ? उसी समय आदिशक्ति भगवतीने आकाशवाणीके रूपमें आधे श्लोकमें ही सम्पूर्ण अर्थको प्रदान करनेवाले ज्ञानको बताते हुए कहा-' सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् ॥ ' ( श्रीमद्देवी भा ० १ । १५ ।५२ ) अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है । भगवान् बालमुकुन्द सोचने लगे कि इस सत्य वचनका उच्चारण किसने किया, उस कहनेवालेको मैं कैसे जानूँ, वह स्त्री है या पुरुष? तब उन्होंने उस | श्लोकार्धरूपी भागवतको अपने हृदयमें धारण कर लिया । वे उसके अर्थपर चिन्तन करने लगे और बार-बार उसका उच्चारण करने लगे । बालमुकुन्दको चिन्तातुर देखकर उसी समय भगवती पराशक्ति शंख, चक्र धारण | किये चतुर्भुजा महादेवीके रूपमें अपनी सखियोंसहित यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ ( श्रीमद्भा ० २।९ । ३२ – ३५ ) ५. आदौ देवकिदेवगर्भजननं गोपीगृहे वर्धनम् मायापूतनजीवतापहरणं गोवर्धनोद्धारणम् । कंसच्छेदनकौरवादिहननं कुन्तीसुतापालनम् एतद् भागवतं पुराणकथितं श्रीकृष्णलीलामृतम् ॥ ६. आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम् । वालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद् रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम् ॥

७. तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः । स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥

८. मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम् । शक्रादिस्तुतिकं चैव दूतसंवाद एव च ॥

शुम्भराजवधश्चैव नारायणीस्तुतिस्तथा । सार्धपाठमिदं प्रोक्तं नवपाठफलप्रदम् ॥

९. आदौ पाण्डवधार्तराष्ट्रजननं लाक्षागृहे दाहनं द्यूते श्रीहरणं वने विचरणं मत्स्यालये वर्तनम् । लीलागोग्रहणं रणे विहरणं सन्धिक्रियाजृम्भणं पश्चाद् भीष्मसुयोधनादिहननं चैतन्महाभारतम् ॥

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१६ श्रीमद्देवीभागवत वहाँ प्रकट हो गयीं, वे दिव्य वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत थीं और उनका स्वरूप बड़ा ही शान्त था । वे मन्द मन्द । मुसकरा रही थीं । उनका दर्शनकर भगवान् विष्णु बड़े ही विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने पूछा हे देवि! कुछ समय पूर्व मैंने जो आधा श्लोक सुना, वह परम रहस्यमय वचन किसने कहा था, मुझे बतानेकी कृपा करें । इसपर देवीने कहा-मैं सगुणरूपा चतुर्भुजा भगवती हूँ । सब गुणोंका आलय होते हुए मैं निर्गुणा भी हूँ । वह आधा श्लोक निर्गुणा । पराशक्तिने ही कहा था, आप इसे सब वेदोंका तत्त्वस्वरूप, कल्याणकारी और पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत समझिये । ' पुण्यं भागवतं विद्धि वेदसारं शुभावहम् । ' । ( श्रीमद्देवीभा ० १ | १६ | १५ ) आप इसे सदा अपने चित्तमें रखिये और कभी विस्मृत न कीजिये । यह सब शास्त्रोंका सार है तथा भगवती महाविद्याके द्वारा प्रकाशित किया गया है । तीनों लोकोंमें इससे बढ़कर अन्य कुछ भी ज्ञातव्य नहीं है । ऐसा कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं और भगवान् विष्णुने वह श्लोकार्थ – देवीभागवतरूपी मन्त्र अपने हृदयदेशमें सदाके लिये धारण कर लिया । कुछ समय बाद जब ब्रह्माजी दैत्योंके भयसे डरकर भगवान् विष्णुकी शरणमें गये तो भगवान्‌को ध्यानमें स्थित होकर मन्त्र - जप करते हुए देखकर ब्रह्माजी बोले - हे देवेश! आप किस देवताका जप कर रहे हैं, आपसे भी बढ़कर कोई है क्या? तब विष्णुजी बोले-हे महाभाग! हम सभीमें जो कार्यकारणरूपा शक्ति विद्यमान है, जिनके द्वारा यह संसार पालित - पोषित और तिरोहित किया जाता है, वे ही सनातनी पराविद्या हैं, वे ही सभी ईश्वरोंकी भी स्वामिनी हैं । उन भगवतीने आधे श्लोकमें जो कहा,. वही वास्तविक श्रीमद्देवीभागवत है । प्रत्येक द्वापरयुगमें उसीका विस्तार होगा -श्लोकार्थेन तया प्रोक्तं तद्वै भागवतं किल । विस्तरो भविता तस्य द्वापरादौ युगे तथा ॥ ( श्रीमद्देवीभा ० १ । १६ । २ ९ ) इतना कहनेके अनन्तर व्यासजीने शुकदेवजीसे फिर कहा - हे महाभाग! तब ब्रह्माजीने उस भागवतका संग्रह किया और उन्होंने इसे अपने पुत्र नारदजीको सुनाया । पूर्वकालमें वही भागवत देवर्षि नारदजीने मुझे दिया और फिर मैंने इसे बारह स्कन्धोंमें विस्तृत किया । हे पुत्र! यह पुराण वेदतुल्य है; सर्ग, प्रतिसर्ग आदि पाँच लक्षणोंसे युक्त है तथा भगवतीके उत्तम चरित्रोंसे ओत - प्रोत है । यह तत्त्वज्ञानके रससे परिपूर्ण, वेदार्थका उपबृंहण करनेवाला, ब्रह्मविद्याका निधान एवं भवसागरसे पार करनेवाला है । यह पुराण अत्यन्त पुण्यप्रद है । तुम इसके अठारह हजार श्लोकोंको हृदयंगम कर लो | यह पुराण पाठ तथा श्रवण करनेवाले लिये अज्ञानका नाश करनेवाला, दिव्य, ज्ञानरूपी सूर्यका बोध करानेवाला, सुखप्रद, शान्तिदायक, धन्य, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाला, कल्याणकारी तथा पुत्र - पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है—

गृहाण त्वं महाभाग योग्योऽसि मतिमत्तरः ।

पुण्यं भागवतं नाम पुराणं पुरुषर्षभ ॥

अष्टादशसहस्त्राणां श्लोकानां कुरु संग्रहम् ।

अज्ञाननाशनं दिव्यं ज्ञानभास्करबोधकम् ॥

सुखदं शान्तिदं धन्यं दीर्घायुष्यकरं शिवम् ।

शृण्वतां पठतां चेदं पुत्रपौत्रविवर्धनम् ॥

( श्रीमद्देवीभा ० १ । १६ । ३५-३७ ) इस प्रकार वेदव्यासजीके द्वारा प्रेरित किये जानेपर व्यासजीके शिष्य सूतजीने तथा श्रीशुकदेवजीने

श्लोकार्धसे विस्तृत हुए श्रीमद्देवीभागवतपुराणका अध्ययन

किया । भगवतीकी कृपासे भगवान् बालमुकुन्दको जो आधे श्लोकमें देवीभागवत प्राप्त हुआ, उसे ब्रह्माजीने ग्रहण किया और फिर उसीको व्यासजीने बारह स्कन्धोंमें विस्तृत किया, वही देवीभागवत हम सबको प्राप्त हुआ । यह भगवती आदिशक्ति तथा भगवान् वेदव्यासजीका जीवोंपर महान् अनुग्रह है । अर्धश्लोकात्मकं यत्तु देवीवक्त्राब्जनिर्गतम् । श्रीमद्भागवतं नाम वेदसिद्धान्तबोधकम् ॥

उपदिष्टं विष्णवे यद्वटपत्रनिवासिने । शतकोटिप्रविस्तीर्णं तत्कृतं ब्रह्मणा पुरा ॥

तत्सारमेकतः कृत्वा व्यासेन शुकहेतवे । अष्टादशसहस्रं तु द्वादशस्कन्धसंयुतम् ॥ ( श्रीमद्देवीभा ० १२ । १४ । १–३ )

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भवान्यष्टकम् १७ भवान्यष्टकम् न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता । न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः

पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।

कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं । गतिस्त्वं ० ॥

न जानामि दानं न च ध्यानयोगं

न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।

न जानामि पूजां न च न्यासयोगं । गतिस्त्वं ० ॥

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं

न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।

न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं ० ॥

कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः

कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।

कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं । गतिस्त्वं ० ॥

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं

दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।

न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये । गतिस्त्वं ० ॥

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे

जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।

अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि । गतिस्त्वं ० ॥

अनाथो दरिद्रो रोगयुक्

महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।

विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं । गतिस्त्वं ० ॥

हे भवानि! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, भृत्य, स्वामी, स्त्री, विद्या और वृत्ति – इनमें से कोई भी मेरा नहीं है, हे देवि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ १ ॥

१ ॥ मैं अपार भवसागरमें पड़ा हुआ हूँ, महान् दुःखोंसे भयभीत हूँ; कामी, लोभी, मतवाला तथा संसारके घृणित बन्धनोंमें बँधा हुआ हूँ, हे भवानि! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ २ ॥

२ ॥ हे भवानि! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यानमार्गका ही मुझे पता है, तन्त्र और स्तोत्र - मन्त्रोंका भी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदिकी क्रियाओंसे तो मैं एकदम कोरा हूँ, अब एकमात्र ३ ॥ तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥३ ॥

न मैं पुण्य जानता हूँ न तीर्थ, न मुक्तिका पता है न लयका । हे मातः! भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं है, हे भवानि! अब केवल तुम्हीं मेरी गति हो, ४ ॥ तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ४ ॥

मैं कुकर्मी, बुरी संगतिमें रहनेवाला, दुर्बुद्धि, दुष्टदास, कुलोचित सदाचारसे हीन, दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि रखनेवाला और सदा दुर्वचन बोलनेवाला हूँ, हे ५ ॥ भवानि! मुझ अधमकी एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ५ ॥

मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य किसी भी देवताको नहीं जानता, हे शरण देनेवाली भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं ६ ॥ मेरी गति हो ॥६ ॥

हे शरण्ये! तुम विवाद, विषाद, प्रमाद, परदेश, जल, अनल, पर्वत, वन तथा शत्रुओंके मध्यमें सदा ही मेरी रक्षा करो, हे भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी ७ ॥ गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥७ ॥

हे भवानि! मैं सदासे ही अनाथ, दरिद्र, जरा-जीर्ण, रोगी, अत्यन्त दुर्बल, दीन, गूँगा, विपद्ग्रस्त और नष्टप्राय हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, ८ ॥ तुम्हीं मेरी गति हो ॥८ ॥

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत भवान्यष्टक सम्पूर्ण हुआ ।

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* श्री श्रीजगद्धात्री परमेश

सिंहस्कन्धाधिरूढां नानालङ्कारभूषिताम् । चतुर्भुजां महादेवीं नागयज्ञोपवीतिनीम् ॥

शङ्खशार्ङ्गसमायुक्तवामपाणिद्वयान्विताम् । चक्रं च पञ्चबाणांश्च धारयन्तीं च दक्षिणे ॥ रत्नद्वीपे महाद्वीपे सिंहासनसमन्विते । प्रफुल्लकमलारूढां ध्यायेत्तां भवसुन्दरीम् ॥

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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि १ ९ श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि

देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम् ।

त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती ॥

श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि ।

श्लोकार्थं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है । जो श्रीमद्देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है । श्रीमद्देवीभागवतके नवानकी विधि है । दोनों नवरात्रोंमें तथा आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ एवं फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से नवमीतक इसके अनुष्ठानका विधान है । इसे ' नवाहयज्ञ ' कहा । जाता है । एतदर्थ कथा - स्थानकी भूमि का संशोधन, मार्जन - लेपनादिकर कदली - स्तम्भादिसे मण्डित मण्डप बनाना चाहिये । मण्डपका स्थान शुभ तथा बराबर होना चाहिये । उसका मान १६ हाथ लम्बा -- - चौड़ा हो । तथा उसे तोरण, विमान एवं ध्वजापताकासे मण्डित किया जाय । मण्डपके बीचमें चार हाथ लम्बी - चौड़ी तथा एक हाथ ऊँची वेदी होनी चाहिये । फिर प्रतिपद्को प्रातः उठकर हृदय या शिरोदेशमें उज्वल - पद्मके अन्तर्गत गुरुका ध्यान करना चाहिये । फिर शिखाके बीच इस रूपमें देवीका ध्यान करना चाहिये-प्रकाशमानां प्रथमे प्रयाणे प्रतिप्रयाणेऽप्यमृतायमानाम् I अन्तःपदव्यामनुसंचरन्ती-मानन्दरूपामबलां प्रपद्ये ॥ ( श्रीमद्देवीभा ० ७ । ४० । ३ ) प्रथम प्रयाणमें अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र में संचरण करनेपर प्रकाश - पुंजरूपवाली, प्रतिप्रयाणमें अर्थात् मूलाधारमें संचरण करनेपर अमृतमयस्वरूपवाली तथा अन्त: पदमें अर्थात् सुषुम्णा नाड़ीमें विराजने पर आनन्दमयी स्त्रीरूपिणी देवी कुण्डलिनीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ । तत्पश्चात् किसी नदी, तड़ाग, सरोवर या पहाड़ी झील, झरने आदिमें स्नानकर नित्यकृत्य करना चाहिये । फिर भूतशुद्धि, मातृकान्यास एवं हृल्लेखा - मातृकान्यास करना चाहिये । इसकी विधि यह है कि मूलाधारमें ' ह ' कार, हृदयमें ' र ' कार, भ्रूमध्य में ' ई'कार और मस्तकमें ' ह्रीं ' कारका न्यास करे । फिर उपयुक्त ब्राह्मणोंका वरणकर वेदीपर सिंहासन रखकर उसपर क्षौम ( रेशमी ) वस्त्र - युक्त चार हाथोंवाली जगदम्बिकाकी प्रतिमा स्थापित करे । उन्हें रत्नाभूषण तथा मुक्ताहारादिसे विभूषित करे । चार हाथोंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कराये या अठारह भुजावाली प्रतिमा स्थापित करे । प्रतिमाके अभावमें ' नवार्ण मन्त्र ' का यन्त्र ही रख दे । फिर पंचपल्लवादिसंयुक्त एक कलश वेद - मन्त्रोंसे संस्कृतकर श्रेष्ठ तीर्थके जलसे भरकर पास ही स्थापित करे । तत्पश्चात् गणपति - पूजन, बटुक, क्षेत्रपाल, योगिनी, मातृका, नवग्रह, तुलसी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, लोकपाल, दिक्पाल आदिकी पूजाकर षोडशोपचार तथा श्रीसूक्त या नवार्णमन्त्रसे भगवती महाशक्तिकी पूजा करे । | देवी - पूजनमें चन्दन, अगर या अष्टगन्ध * तथा अशोक, चम्पा, करवीर, मालती, मन्दार आदिके पुष्पों, बिल्व तथा तुलसी आदिका प्रयोग श्रेष्ठ है । फलोंमें नारियल, नारंगी, अनार, केला, आम शुभ हैं । तत्पश्चात् १६ उपचारोंसे देवीभागवत - ग्रन्थकी भी पूजा करे । अन्तमें फिर इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये -कात्यायनि महामाये भवानि भुवनेश्वरि ॥

संसारसागरे मग्नं मामुद्धर कृपामये ।

ब्रह्मविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके ॥

मनोऽभिलषितं देवि वरं देहि नमोऽस्तु ते । ( श्रीमद्देवीभा ० माहात्म्य ५ । ३१ -- ३३ ) हे कात्यायनि! हे महामाये! हे भुवनेश्वरि! हे कृपामये! हे भवानि! मैं संसार - सागरमें डूब रहा हूँ; मेरा उद्धार कीजिये तथा हे ब्रह्मा, विष्णु, महेशसे पूजनीया माता । जगदम्बिके! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये । हे देवि! आप मुझे * चन्दनागुरुकर्पूरचौरकुङ्कुमरोचनाः । जटामांसी कपियुता शक्तेर्गन्धाष्टकं विदुः ॥ ( तन्त्रसार - कलावती दीक्षा ५। १ ) अर्थात् चन्दन, अगुरु, कपूर, कृष्णशुंठी, कुंकुम ( केसर ), गोरोचन, जटामांसी तथा गांटना ( एक प्रकारका करंज ) मिलाकर शक्तिका अष्टगन्ध बनता है ।