देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 161–170
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170
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१५२ शिष्योऽयं मम धर्मात्मा लोमहर्षणसम्भवः पठिष्यति त्वया सार्धं पुराणीं संहितां शुभाम् सूत उवाच इत्युक्तं तेन पुत्राय मह्यं च कथितं किल मया गृहीतं तत्सर्वं पुराणं चातिविस्तरम् कोऽधीत्य पुराणं तु स्थितो व्यासाश्रमे शुभे न लेभे शर्म धर्मात्मा ब्रह्मात्मज इवापरः एकान्तसेवी विकलः स शून्य इव लक्ष्यते नात्यन्तभोजनासक्तो नोपवासरतस्तथा चिन्ताविष्टं शुकं दृष्ट्वा व्यासः प्राह सुतं प्रति किं पुत्र चिन्त्यते नित्यं कस्माद्व्यग्रोऽसि मानद आस्से ध्यानपरो नित्यमृणग्रस्त इवाधनः का चिन्ता वर्तते पुत्र मयि ताते तु तिष्ठति सुखं भुंक्ष्व यथाकामं मुञ्च शोकं मनोगतम् ज्ञानं चिन्तय शास्त्रोक्तं विज्ञाने च मतिं कुरु न चेन्मनसि ते शान्तिर्वचसा मम सुव्रत गच्छ त्वं मिथिलां पुत्र पालितां जनकेन ह स ते मोहं महाभाग नाशयिष्यति भूपतिः जनको नाम धर्मात्मा विदेहः सत्यसागरः तं गत्वा नृपतिं पुत्र सन्देहं स्वं निवर्तय वर्णाश्रमाणां धर्मांस्त्वं पृच्छ पुत्र यथातथम् ॥ जीवन्मुक्तः स राजर्षिर्ब्रह्मज्ञानमतिः शुचिः तथ्यवक्तातिशान्तश्च योगी योगप्रियः सदा सूत उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासस्यामिततेजसः प्रत्युवाच महातेजाः शुकश्चारणिसम्भवः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ । लोमहर्षणसे उत्पन्न मेरे शिष्य ये धर्मात्मा ॥ ३८ सूतजी भी तुम्हारे साथ इस शुभ पुराण - संहिताका अध्ययन करेंगे ॥ ३८ ॥
सूतजी बोले- हे मुनियो! व्यासजीने मुझसे । और अपने पुत्रसे इस प्रकार कहा था, तब ॥ ३ ९ मैंने उस सम्पूर्ण विस्तृत पुराण - संहिताको विधिवत् पढ़ा था ॥ ३ ९ ॥ । उस समय भागवतपुराणका अध्ययन करके ॥ ४० शुकदेवजी व्यासजीके पवित्र आश्रममें ही रहने लगे, परंतु दूसरे ब्रह्मापुत्र नारदकी भाँति उन धर्मात्माको । वहाँ शान्ति न मिल सकी ॥ ४० ॥
॥ ४१ एकान्तमें रहनेवाले तथा व्याकुलचित्त वे उदासीनकी भाँति दिखायी पड़ते थे । न वे अधिक भोजन करते । थे और न उपवासपूर्वक ही रहते थे ॥ ४१ ॥
॥ ४२ इस प्रकार अपने पुत्र शुकदेवको चिन्तित देखकर व्यासजी बोले - हे पुत्र! तुम क्या चिन्ता करते रहते । हो? हे मानद! तुम किसलिये व्याकुल रहते हो? ॥ ४३ ऋणग्रस्त निर्धन व्यक्तिकी भाँति तुम सदा चिन्ता करते रहते हो । हे पुत्र! मुझ पिताके रहते तुम्हें किस । बातकी चिन्ता हो रही है? ॥ ४२-४३ ॥ ॥ ४४ तुम मनकी ग्लानि छोड़ो; यथेष्टरूपसे सुखोपभोग करो, शास्त्रोक्त ज्ञानका चिन्तन करो और । आत्मचिन्तनमें मन लगाओ ॥ ४४ ॥
॥ ४५ हे सुव्रत! यदि मेरे उपदेशसे तुम्हें शान्ति नहीं मिलती, तो राजा जनकके द्वारा पालित मिथिलापुरी । चले जाओ । हे महाभाग! वे विदेह राजा जनक ॥ ४६ तुम्हारे मोहका नाश कर देंगे; क्योंकि वे सत्यसिन्धु तथा धर्मात्मा हैं ॥ ४५-४६ ॥ । हे पुत्र! उन राजाके पास जाकर तुम अपना ४७ सन्देह दूर करो और वर्णाश्रम - धर्मके रहस्यको उनसे यथार्थरूपमें पूछो ॥४७ ॥
। वे राजर्षि जीवन्मुक्त, ब्रह्मज्ञानका चिन्तन ॥ ४८ करनेवाले, पवित्र, यथार्थ वक्ता, शान्तचित्त तथा सदा योगप्रिय भी हैं ॥ ४८ ॥
सूतजी बोले- परम तेजस्वी उन व्यासजीका । वचन सुनकर अरणिसे उत्पन्न महातेजस्वी शुकदेवजीने ॥ ४ ९ । उत्तर दिया । हे धर्मात्मन्! आपके द्वारा यह जो कहा
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अ ० १६ ]
दम्भोऽयं किल धर्मात्मन्भाति चित्ते ममाधुना ।
जीवन्मुक्तो विदेहश्च राज्यं शास्ति मुदान्वितः ॥
वन्ध्यापुत्र इवाभाति राजासौ जनकः पितः ।
कुर्वन् राज्यं विदेहः किं सन्देहोऽयं ममाद्भुतः ॥
द्रष्टुमिच्छाम्यहं भूपं विदेहं नृपसत्तमम् ।
कथं तिष्ठति संसारे पद्मपत्रमिवाम्भसि ॥
सन्देहोऽयं महांस्तात विदेहे परिवर्तते ।
मोक्षः किं वदतां श्रेष्ठ सौगतानामिवापरः ॥
कथं भुक्तमभुक्तं स्यादकृतं च कृतं कथम् ।
व्यवहारः कथं त्याज्य इन्द्रियाणां महामते ॥
माता पुत्रस्तथा भार्या भगिनी कुलटा तथा ।
भेदाभेदः कथं न स्याद्यद्येतन्मुक्तता कथम् ॥
कटु क्षारं तथा तीक्ष्णं कषायं मिष्टमेव च ।
रसना यदि जानाति भुंक्ते भोगाननुत्तमान् ॥
शीतोष्णसुखदुःखादिपरिज्ञानं यदा भवेत् । मुक्तता कीदृशी तात सन्देहोऽयं ममाद्भुतः शत्रुमित्रपरिज्ञानं वैरं प्रीतिकरं सदा । व्यवहारे परे तिष्ठन्कथं न कुरुते नृपः चौरं वा तापसं वापि समानं मन्यते कथम् असमा यदि बुद्धिः स्यान्मुक्तता तर्हि कीदृशी दृष्टपूर्वो न मे कश्चिज्जीवन्मुक्तश्च भूपतिः शङ्केयं महती तात गृहे मुक्तः कथं नृपः प्रथम स्कन्ध १५३ जा रहा है, उससे मेरे चित्तमें शंका उठती है कि कहीं ५० यह दम्भ तो नहीं । जीवन्मुक्त तथा विदेह होते हुए भी राजा जनक हर्षके साथ कैसे राज्य करते हैं? हे पिताजी! यह बात तो वैसे ही असम्भव है जैसे किसी वन्ध्याको पुत्र हो! अतः वे राजा जनक राज्य करते ५१ हुए भी विदेह कैसे हैं? यह मुझे अद्भुत सन्देह हो रहा है! ॥४ ९ –५१ ॥ अब मैं नृपश्रेष्ठ विदेह जनकको देखना ५२ चाहता हूँ कि वे जलमें कमलपत्रकी भाँति संसारमें कैसे रहते हैं? हे तात! उनके विदेह होनेके विषयमें मुझे बड़ा सन्देह हो रहा है! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! ५३ सौगतोंकी भाँति वे भी मोक्षकी एक दूसरी परिभाषा तो नहीं हैं! ॥ ५२-५३ ॥ हे महामते! भला भोगा हुआ भोग अभोग और किया हुआ कर्म अकर्म कैसे हो सकता है? ५४ इन्द्रियोंका सहज व्यवहार कैसे छोड़ा जा सकता है? ॥५४ ॥
एक पुत्रका अपनी माता, पत्नी, बहन तथा ५५ किसी असती स्त्रीके साथ भेद - अभेदका सम्बन्ध क्यों नहीं होगा? और ऐसा होनेपर जीवन्मुक्तता कैसी? ॥ ५५ ॥
यदि जिह्वा कटु, क्षार, तीक्ष्ण, कषाय, मधुर आदि स्वादोंको जानती है तो वे अच्छे - अच्छे ५६ पदार्थोंका रसास्वादन करते ही होंगे । यदि शीत, उष्ण, सुख - दुःखका परिज्ञान उन्हें होता होगा तो भला यह मुक्तता कैसी? हे तात! मुझे यह अद्भुत ॥ ५७ सन्देह हो रहा है! ॥ ५६-५७ ॥ शत्रु और मित्रको पहचानकर उनके साथ वैर अथवा प्रीतिका व्यवहार किया जाता है, तो ॥ ५८ राज्यसिंहासनपर बैठे हुए राजा जनक शत्रुता या मित्रताका व्यवहार क्या नहीं रखते होंगे? उनके । राज्यमें साधु और चोर समान कैसे समझे जाते हैं? यदि उनके प्रति समान बुद्धि नहीं है, तब भला वह ॥ ५ ९ जीवन्मुक्तता कैसी? ॥ ५८-५९ ॥ ऐसा जीवन्मुक्त कोई राजा मेरे द्वारा पहले देखा । नहीं गया । हे तात! यह बहुत बड़ी शंका है कि वे ॥ ६० । राजा जनक घरमें रहकर भी मुक्त कैसे हैं? उन
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१५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ दिदृक्षा महती जाता श्रुत्वा तं भूपतिं तथा । राजाके विषयमें सुनकर उन्हें देखनेकी बड़ी लालसा उत्पन्न हो गयी है । अतः सन्देह - निवृत्तिके लिये मैं
सन्देहविनिवृत्त्यर्थं गच्छामि मिथिलां प्रति ॥ ६१ । मिथिलापुरी जा रहा हूँ॥६०-६१ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकं प्रति व्यासोपदेशवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः शुकदेवजीका राजा जनकसे मिलनेके लिये मिथिलापुरीको प्रस्थान तथा राजभवनमें प्रवेश सूत उवाच
इत्युक्त्वा पितरं पुत्रः पादयोः पतितः शुकः ।
बद्धाञ्जलिरुवाचेदं गन्तुकामो महामनाः ॥ १
आपृच्छे त्वां महाभाग ग्राह्यं ते वचनं मया ।
विदेहान्द्रष्टुमिच्छामि पालिताञ्जनकेन तु ॥ २
विना दण्डं कथं राज्यं करोति जनकः किल ।
धर्मे न वर्तते लोको दण्डश्चेन्न भवेद्यदि ॥ ३
धर्मस्य कारणं दण्डो मन्वादिप्रहितः सदा ।
स कथं वर्तते तात संशयोऽयं महान्मम ॥ ४
मम माता त्वियं वन्ध्या तद्वद्भाति विचेष्टितम् ।
पृच्छामि त्वां महाभाग गच्छामि च परन्तप ॥ ५
सूत उवाच
तं दृष्ट्वा गन्तुकामं च शुकं सत्यवतीसुतः ।
आलिङ्ग्योवाच पुत्रं तं ज्ञानिनं निःस्पृहं दृढम् ॥ ६
व्यास उवाच
स्वस्त्यस्तु शुक दीर्घायुर्भव पुत्र महामते ।
सत्यां वाचं प्रदत्त्वा मे गच्छ तात यथासुखम् ॥ ७
आगन्तव्यं पुनर्गत्वा ममाश्रममनुत्तमम् ।
न कुत्रापि च गन्तव्यं त्वया पुत्र कथञ्चन ॥ ८
सुखं जीवामि पुत्राहं दृष्ट्वा मुखपङ्कजम् ।
अपश्यन्दुःखमाप्नोमि प्राणस्त्वमसि मे सुत ॥ ९ ।
सूतजी बोले - [ हे मुनियो! ] पितासे यह कहकर महात्मा पुत्र शुकदेवजी उनके चरणोंपर गिर पड़े तथा हाथ जोड़कर चलनेकी इच्छासे बोले - हे महाभाग! अब आपसे आज्ञा चाहता हूँ । मुझे आपका वचन स्वीकार्य है । अतः मैं महाराज जनकद्वारा पालित मिथिलापुरी देखना चाहता हूँ ॥ १-२ ॥ राजा जनक दण्ड दिये बिना ही कैसे राज्य चलाते हैं? क्योंकि यदि दण्डका भय प्रजाओंको न हो तो लोग धर्मका पालन नहीं करेंगे ॥ ३ ॥
मनु आदिके द्वारा धर्माचरणका मूल कारण सदा दण्ड - विधान ही कहा गया है । इस राजधर्मका निर्वाह बिना दण्डके कैसे हो सकेगा? हे पिताजी! इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है । हे महाभाग! यह बात वैसी ही अनर्गल प्रतीत होती है, जैसे कोई कहे कि मेरी यह माता वन्ध्या है । हे परन्तप! अब मैं आपसे अनुमति लेता हूँ और यहाँसे जा रहा हूँ ॥ ४-५ ॥ सूतजी बोले- इस प्रकार शुकदेवजीको जनकपुर जानेका इच्छुक देखकर व्यासजीने अपने ज्ञानी एवं नि: स्पृह पुत्रका दृढ़ आलिंगन करके कहा —॥६ ॥
व्यासजी बोले- हे महामते! हे पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो, हे शुक! तुम दीर्घायु होओ । हे तात! तुम मुझे यह सत्य वचन देकर सुखपूर्वक जाओ कि यहाँसे जाकर मेरे इस उत्तम आश्रममें पुनः आओगे 1 हे पुत्र! तुम वहाँसे कहीं और कभी भी मत चले जाना ॥ ७-८ ॥ हे पुत्र! मैं तुम्हारा मुखकमल देखकर ही सुखपूर्वक जीता हूँ और तुम्हें न देखनेपर दुःखी रहता हूँ । हे सुत! तुम्हीं मेरे प्राण हो ॥ ९ ॥
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अ ० १७ ]
दृष्ट्वा त्वं जनकं पुत्र सन्देहं विनिवर्त्य च ।
अत्रागत्य सुखं तिष्ठ वेदाध्ययनतत्परः ॥
सूत उवाच
इत्युक्तः सोऽभिवाद्यार्यं कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम् ।
चलितस्तरसातीव धनुर्मुक्तः शरो यथा ॥
सम्पश्यन्विविधान्देशाँल्लोकांश्च वित्तधर्मिणः ।
वनानि पादपांश्चैव क्षेत्राणि फलितानि च ॥
तापसांस्तप्यमानांश्च याजकान्दीक्षयान्वितान् ।
योगाभ्यासरतान्योगिवानप्रस्थान्वनौकसः ॥
शैवान्याशुपतांश्चैव सौराञ्छाक्तांश्च वैष्णवान् ।
वीक्ष्य नानाविधान्धर्माञ्जगामातिस्मयन्मुनिः ॥
वर्षद्वयेन मेरुं च समुल्लङ्घ्य महामतिः ।
हिमाचलं च वर्षेण जगाम मिथिलां प्रति ॥
प्रविष्टो मिथिलां मध्ये पश्यन्सर्वर्द्धिमुत्तमाम् ।
प्रजाश्च सुखिताः सर्वाः सदाचाराः सुसंस्थिताः ॥
क्षत्रा निवारितस्तत्र कस्त्वमत्र समागतः ।
किं ते कार्यं वदस्वेति पृष्टस्तेन न चाब्रवीत् ॥
निःसृत्य नगरद्वारात्स्थितः स्थाणुरिवाचलः ।
विस्मितोऽतिहसंस्तस्थौ वचो नोवाच किञ्चन ॥
प्रतीहार उवाच
ब्रूहि मूकोऽसि किं ब्रह्मन्किमर्थं त्वमिहागतः ।
चलनं च विना कार्यं न भवेदिति मे मतिः ॥
राजाज्ञया प्रवेष्टव्यं नगरेऽस्मिन्सदा द्विज ।
अज्ञातकुलशीलस्य प्रवेशो नात्र सर्वथा ॥
तेजस्वी भासि नूनं त्वं ब्राह्मणो वेदवित्तमः ।
कुलं कार्यं च मे ब्रूहि यथेष्टं गच्छ मानद ॥
प्रथम स्कन्ध १५५ हे पुत्र! वहाँ राजर्षि जनकसे मिलकर और १० अपना सन्देह दूर करके फिर उसके बाद यहाँ आकर वेदाध्ययनमें रत रहते हुए सुखपूर्वक रहो ॥ १० ॥
सूतजी बोले - व्यासजीके ऐसा कहनेपर शुकदेवजी अपने पिताको प्रणाम तथा उनकी ११ प्रदक्षिणा करके शीघ्र ही इस प्रकार चल पड़े जैसे धनुषसे छूटा हुआ बाण ॥ ११ ॥
मार्गमें चलते हुए अनेक समृद्धिशाली देशों, १२ नागरिकों, वनों, वृक्षों, फले - फूले खेतों, तप करते हुए तपस्वीजनों, दीक्षा लिये हुए याजकजनों, योगाभ्यासमें तत्पर योगीजनों, वनमें रहनेवाले वानप्रस्थों, वैष्णव, १३ पाशुपत, शैव, शाक्त एवं सूर्योपासक और अनेक धर्मा - वलम्बियोंको देखकर वे शुकदेवमुनि अति विस्मयमें पड़ गये ॥ १२–१४ ॥ १४ इस प्रकार वे महामति शुकदेवजी लगभग दो वर्षोंमें मेरुपर्वत और एक वर्षमें हिमालयको पार करके मिथिला - देशमें पहुँचे ॥ १५ ॥
१५ जब वे मिथिलामें प्रविष्ट हुए, तब उन्होंने वहाँकी श्रेष्ठ ऐश्वर्यसम्पदाको देखा तथा वहाँकी सारी प्रजाको सुखी एवं सदाचारसम्पन्न देखा ॥ १६ ॥
१६ वहाँ द्वारपालने उन्हें रोका और पूछा- तुम कौन हो और कहाँसे आये हो, तुम्हारा क्या कार्य है; बताओ । ऐसा पूछनेपर भी शुकदेवजी मौन रहे, कुछ १७ बोले नहीं । वे नगरद्वारसे बाहर जाकर स्थाणुकी तरह खड़े हो गये और थोड़ी देर में आश्चर्यचकित होकर हँसते हुए वहीं स्थित हो गये, पर किसीसे १८ | कुछ बोले नहीं ॥ १७-१८ ॥ द्वारपालने पूछा — हे ब्रह्मन्! बोलिये, आप गूँगे तो नहीं हैं । आपका किस हेतु यहाँ आना हुआ है? मेरे विचारमें तो कोई कहीं भी निष्प्रयोजन नहीं जाता ॥ १ ९ ॥ १ ९ हे विप्र! इस नगरमें राजाकी आज्ञा पाकर ही कोई प्रवेश कर सकता है । अज्ञात कुल तथा शीलवाले व्यक्तिका प्रवेश यहाँ कदापि नहीं होता है ॥ २० ॥
२० हे मानद! आप निश्चय ही तेजस्वी एवं वेदवेत्ता ब्राह्मण प्रतीत हो रहे हैं । इसलिये आप अपने कुल तथा प्रयोजनके विषयमें मुझे बता दें और फिर अपने २१ । इच्छानुसार चले जायँ ॥ २१ ॥
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१५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ शुक उवाच
यदर्थमागतोऽस्म्यत्र तत्प्राप्तं वचनात्तव ।
विदेहनगरं द्रष्टुं प्रवेशो यत्र दुर्लभः ॥
मोहोऽयं मम दुर्बुद्धेः समुल्लङ्घ्य गिरिद्वयम् ।
राजानं द्रष्टुकामोऽहं पर्यटन्समुपागतः ॥
वञ्चितोऽहं स्वयं पित्रा दूषणं कस्य दीयते । भ्रामितोऽहं महाभाग कर्मणा वा महीतले ।
धनाशा पुरुषस्येह परिभ्रमणकारणम् ।
सा मे नास्ति तथाप्यत्र सम्प्राप्तोऽस्मि भ्रमात्किल ॥
निराशस्य सुखं नित्यं यदि मोहे न मज्जति ।
निराशोऽहं महाभाग मग्नोऽस्मिन्मोहसागरे ॥
क्व मेरुर्मिथिला क्वेयं पद्भ्यां च समुपागतः ।
परिश्रमफलं किं मे वञ्चितो विधिना किल ॥
प्रारब्धं किल भोक्तव्यं शुभं वाप्यथवाशुभम् ।
उद्यमस्तद्वशे नित्यं कारयत्येव सर्वथा ॥
न तीर्थं न च वेदोऽत्र यदर्थमिह मे श्रमः ।
अप्रवेशः पुरे जातो विदेहो नाम भूपतिः ॥
इत्युक्त्वा विररामाशु मौनीभूत इव स्थितः ।
ज्ञातो हि प्रतिहारेण ज्ञानी कश्चिद् द्विजोत्तमः ॥
सामपूर्वमुवाचासौ तं क्षत्ता संस्थितं मुनिम् ।
गच्छ भो यत्र ते कार्यं यथेष्टं द्विजसत्तम ॥
शुकदेवजी बोले- मैं जिस कार्यके लिये यहाँ आया था, वह तुम्हारे कथनमात्र से ही पूरा हो गया । मैं विदेहनगर देखने आया था, परंतु यहाँ तो २२ प्रवेश ही दुर्लभ है ॥ २२ ॥
मुझ अज्ञानीकी यह भूल थी, जो दो पर्वतोंको लाँघकर महाराजसे मिलनेकी इच्छासे घूमते हुए २३ यहाँ चला आया ॥ २३ ॥
मैं तो स्वयं अपने पिताद्वारा ही ठगा गया हूँ । इसमें किसी अन्यको ही क्या दोष दिया जाय? अथवा हे महाभाग! यह मेरे दुर्भाग्यका ही दोष है, २४ जिसके कारण इस भूमिपर मुझे इतना चक्कर काटना पड़ा ॥ २४ ॥
इस संसारमें लोगोंका भ्रमण करनेका उद्देश्य धनोपार्जन ही है, किंतु मुझे उसकी कोई इच्छा नहीं २५ है । मैं तो केवल भ्रमवश ही यहाँ आ गया हूँ ॥ २५ ॥
आशारहित पुरुषको ही सर्वदा सुख प्राप्त होता है, यदि वह मोहमें न पड़े । किंतु हे महाभाग! मैं तो २६ निराश होकर भी, न जानें क्यों इस मोहसागरमें निमग्न हो रहा हूँ! ॥२६ ॥
कहाँ सुमेरुपर्वत और कहाँ यह मिथिलापुरी! पैदल ही चलकर मैं यहाँ आया हूँ । इस परिश्रमका २७ फल मुझे क्या मिला? प्रारब्धने ही मुझे ठगा है । प्रारब्धका भोग अवश्य ही भोगना पड़ता है, चाहे वह शुभ हो या अशुभ | उद्योग भी तो सदा २८ उसी दैवके अधीन ही रहता है; वह जैसा चाहे वैसा कराता है ॥ २७-२८ ॥ यहाँ न कोई तीर्थ है न ज्ञानप्राप्ति होनी है, जिसके लिये यह मेरा परिश्रम हुआ । मैं तो महाराज २ ९ जनकका ' विदेह ' नाम सुनकर उत्सुकतासे यहाँ आया था, किंतु उनके नगरमें तो प्रवेश करना भी निषिद्ध है ॥२ ९ ॥ ३० इतना कहकर शुकदेवजी चुप हो गये और मौन होकर खड़े रहे । द्वारपालको लगा कि ये कोई ज्ञानी श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं । तब उसने वहाँ खड़े मुनिसे शान्तिपूर्वक निवेदन किया - हे द्विजश्रेष्ठ! आपका ३१ जहाँ कार्य हो, वहाँ यथेष्ट चले जाइये ॥ ३०-३१ ॥
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अ ० १७ ]
अपराधो मम ब्रह्मन्यन्निवारितवानहम् ।
तत्क्षन्तव्यं महाभाग विमुक्तानां क्षमा बलम् ॥
शुक उवाच
किं तेऽत्र दूषणं क्षत्तः परतन्त्रोऽसि सर्वदा ।
प्रभुकार्यं प्रकर्तव्यं सेवकेन यथोचितम् ॥
न भूपदूषणं चात्र यदहं रक्षितस्त्वया ।
चोरशत्रुपरिज्ञानं कर्तव्यं सर्वथा बुधैः ॥
ममैव सर्वथा दोषो यदहं समुपागतः ।
गमनं परगेहे यल्लघुतायाश्च कारणम् ॥
प्रतीहार उवाच
किं सुखं द्विज किं दुःखं किं कार्यं शुभमिच्छता ।
कः शत्रुर्हितकर्ता को ब्रूहि सर्वं ममाद्य वै ॥
शुक उवाच
द्वैविध्यं सर्वलोकेषु सर्वत्र द्विविधो जनः ।
रागी चैव विरागी च तयोश्चित्तं द्विधा पुनः ॥
विरागी त्रिविधः कामं ज्ञातोऽज्ञातश्च मध्यमः ।
रागी च द्विविधः प्रोक्तो मूर्खश्च चतुरस्तथा ॥
चातुर्यं द्विविधं प्रोक्तं शास्त्रजं मतिजं तथा ।
मतिस्तु द्विविधा लोके युक्तायुक्तेति सर्वथा ॥
प्रतीहार उवाच
यदुक्तं भवता विद्वन्नार्थज्ञोऽहं द्विजोत्तम ।
तत्सर्वं विस्तरेणाद्य यथार्थं वद सत्तम ॥
शुक उवाच रागो यस्यास्ति संसारे स रागीत्युच्यते ध्रुवम् । दुःखं बहुविधं तस्य सुखं च विविधं पुनः धनं प्राप्य सुतान्दारान्मानं च विजयं तथा । तदप्राप्य महद्दुःखं भवत्येव क्षणे क्षणे प्रथम स्कन्ध १५७ हे ब्रह्मन्! मैंने जो आपको रोका था, वह ३२ मेरा अपराध हुआ । उसके लिये आप क्षमा करें; क्योंकि हे महाभाग! मुक्तजनोंका तो क्षमा ही बल है ॥३२ ॥
शुकदेवजी बोले- हे द्वारपाल! इसमें तुम्हारा ३३ क्या दोष है; तुम तो सर्वदा पराधीन हो । सेवकको तो स्वामीकी आज्ञाका यथोचित पालन करना ही चाहिये । तुमने मुझे जो रोका इसमें राजाका भी कोई ३४ दोष नहीं है; क्योंकि बुद्धिमानोंको चोर और शत्रुओंका सम्यक् ज्ञान रखना चाहिये ॥ ३३ - ३४ ॥ यह सर्वथा मेरा ही दोष है, जो मैं यहाँ आ ३५ गया । [ बिना बुलाये ] दूसरेके घर जाना लघुताका कारण होता है ॥ ३५ ॥
द्वारपालने कहा — हे विप्र! सुख क्या है, दुःख क्या है, कल्याण चाहनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है? ३६ शत्रु कौन है और मित्र कौन है? आप मुझे यह सब बताइये ॥ ३६ ॥
शुकदेवजी बोले- सभी लोकोंमें सर्वत्र द्वैविध्य रहता है । इसलिये मनुष्य भी दो प्रकारके हैं - एक ३७ रागी और दूसरा विरागी । उन दोनोंके मन भी दो प्रकारके होते हैं । उनमें भी विरागी तीन प्रकारके होते हैं – ज्ञात, अज्ञात एवं मध्यम । रागी भी दो प्रकारके ३८ । कहे गये हैं- मूर्ख तथा चतुर । चातुर्य भी दो प्रकारका कहा गया है — शास्त्रजनित तथा बुद्धिजनित | इसी प्रकार लोकमें बुद्धि भी युक्त और अयुक्त - भेदसे दो ३ ९ प्रकारकी होती है ॥ ३७–३९ ॥ द्वारपालने कहा- हे विद्वन्! हे विप्रवर! आपने जो कुछ कहा है, उसे मैं भलीभाँति नहीं समझ पाया । अतएव हे श्रेष्ठ! आप फिरसे विस्तारपूर्वक इस ४० विषयको यथार्थरूपसे समझाइये ॥ ४० ॥
शुकदेवजी बोले- इस संसार में जिसको राग है, वह निश्चय ही रागी कहलाता है । उस रागीको अनेक प्रकारके सुख एवं दुःख आते ही ॥ ४१ रहते हैं ॥ ४१ ॥
धन, पुत्र, कलत्र, मान - प्रतिष्ठा और विजय प्राप्त करके ही सुख प्राप्त होता है । इनके न मिलनेपर ॥ ४२ । प्रतिक्षण महान् दुःख होता ही है ॥ ४२ ॥
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१५८ कार्यस्तस्य सुखोपायः कर्तव्यं सुखसाधनम् तस्यारातिः स विज्ञेयः सुखविघ्नं करोति यः सुखोत्पादयिता मित्रं रागयुक्तस्य सर्वदा । चतुरो नैव मुह्येत मूर्खः सर्वत्र मुह्यति
विरक्तस्यात्मरक्तस्य सुखमेकान्तसेवनम् ।
आत्मानुचिन्तनं चैव वेदान्तस्य च चिन्तनम् ॥
दुःखं तदेतत्सर्वं हि संसारकथनादिकम् । शत्रवो बहवस्तस्य विज्ञस्य शुभमिच्छतः
कामः क्रोधः प्रमादश्च शत्रवो विविधाः स्मृताः ।
बन्धुः सन्तोष एवास्य नान्योऽस्ति भुवनत्रये ॥
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मत्वा तं ज्ञानिनं द्विजम् ।
क्षत्ता प्रवेशयामास कक्षां चातिमनोरमाम् ॥
नगरं वीक्षमाणः संस्त्रैविध्यजनसङ्कुलम् ।
नानाविपणिद्रव्याढ्यं क्रयविक्रयकारकम् ॥
रागद्वेषयुतं कामलोभमोहाकुलं तथा ।
विवदत्सुजनाकीर्णं वसुपूर्णं महत्तरम् ॥
पश्यन्स त्रिविधाँल्लोकान्प्रासरद् राजमन्दिरम् ।
प्राप्तः परमतेजस्वी द्वितीय इव भास्करः ॥
निवारितश्च तत्रैव प्रतीहारेण काष्ठवत् ।
तत्रैव च स्थितो द्वारि मोक्षमेवानुचिन्तयन् ॥
छायायामातपे चैव समदर्शी महातपाः ।
ध्यानं कृत्वा तथैकान्ते स्थितः स्थाणुरिवाचलः ॥
तं मुहूर्तादुपागत्य राज्ञोऽमात्यः कृताञ्जलिः ।
प्रावेशयत्ततः कक्षां द्वितीयां राजवेश्मनः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ । अतः जैसे सुख प्राप्त हो सके, वैसा उपाय ॥ ४३ करना चाहिये और सुखके साधनका संग्रह करना चाहिये । जो उस सुखमें विघ्न डाले, उसे शत्रु समझना चाहिये । जो रागी पुरुषके सुखको सर्वदा ॥ ४४ बढ़ाये, वही मित्र है । चतुर मनुष्य मोहमें फँसता नहीं है; किंतु मूर्ख सर्वत्र आसक्त रहता है ॥ ४३-४४ ॥ विरागी तथा आत्माराम पुरुषको एकान्तवास, ४५ आत्म - चिन्तन तथा वेदान्तशास्त्रका अनुशीलन करनेसे ही सुख होता है । सांसारिक विषयोंकी चर्चा आदि - यह सब उनके लिये दुःखरूप है । कल्याण ॥ ४६ चाहनेवाले विद्वान् पुरुषके लिये बहुत शत्रु हैं; काम, क्रोध, प्रमाद आदि अनेक प्रकारके शत्रु बताये गये हैं; किंतु व्यक्तिका सच्चा बन्धु तो ४७ एकमात्र सन्तोष ही है; तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी नहीं है ॥ ४५ - ४७ ॥ सूतजी बोले- शुकदेवजीकी बात सुनकर उन्हें ज्ञानी द्विज समझकर उसने शुकदेवजीको एक अत्यन्त ४८ रमणीय कक्षसे प्रवेश कराया ॥ ४८ ॥
तीन प्रकारके नागरिकजनोंसे भरे हुए; अनेक प्रकारके क्रय - विक्रयकी वस्तुओंसे सजी ४ ९ दूकानोंवाले; राग -द्वेष -, काम, लोभ, मोहसे युक्त एवं परस्पर वाद - विवादमें संलग्न श्रेष्ठीजनोंसे सुशोभित और धन - धान्यसे परिपूर्ण विशाल नगरको ५० देखते हुए शुकदेवजी चले । इस तरह तीन प्रकारके लोगोंको देखते हुए शुकदेवजी राजभवनकी ओर बढ़े । इस प्रकार द्वितीय सूर्यके समान परम ५१ तेजस्वी शुकदेवजी द्वारपर पहुँचे; द्वारपालने उन्हें अन्दर जानेसे रोका । तब वे काष्ठके समान वहीं द्वारपर खड़े हो गये और मोक्षसम्बन्धी विषयपर ५२ विचार करने लगे ॥ ४ ९ –५२ ॥ धूप तथा छायाको समान - समझनेवाले महातपस्वी शुकदेवजी वहाँ एकान्तमें ध्यान करके इस प्रकार ५३ खड़े रहे मानो कोई अचल स्तम्भ हो ॥ ५३ ॥
थोड़ी देर बाद राजमन्त्रीने हाथ जोड़े हुए स्वयं आकर उन्हें राजभवनके दूसरे कक्षमें प्रवेश ५४ | कराया ॥ ५४ ॥
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अ ० १७ ] प्रथम स्कन्ध १५ ९
तत्र दिव्यं मनोरम्यं पुष्पितं दिव्यपादपम् ।
तद्वनं दर्शयित्वा तु कृत्वा चातिथिसत्क्रियाम् ॥ ५५
वारमुख्याः स्त्रियस्तत्र राजसेवापरायणाः ।
गीतवादित्रकुशलाः कामशास्त्रविशारदाः ॥ ५६
ता आदिश्य च सेवार्थं शुकस्य मन्त्रिसत्तमः I निर्गतः सदनात्तस्माद्व्यासपुत्रः स्थितस्तदा ॥ ५७
पूजितः परया भक्त्या ताभिः स्त्रीभिर्यथाविधि ।
देशकालोपपन्नेन नानान्नेनातितोषितः ॥ ५८
ततोऽन्तःपुरवासिन्यस्तस्यान्तःपुरकाननम् ।
रम्यं संदर्शयामासुरङ्गनाः काममोहिताः ॥ ५ ९
स युवा रूपवान्कान्तो मृदुभाषी मनोरमः ।
दृष्ट्वा ता मुमुहुः सर्वास्तं च काममिवापरम् ॥ ६०
जितेन्द्रियं मुनिं मत्त्वा सर्वाः पर्यचरंस्तदा ।
आरणेयस्तु शुद्धात्मा मातृभावमकल्पयत् ॥ ६१
आत्मारामो जितक्रोधो न हृष्यति न तप्यति ।
पश्यंस्तासां विकारांश्च स्वस्थ एव स तस्थिवान् ॥ ६२
तस्मै शय्यां सुरम्यां च ददुर्नार्यः सुसंस्कृताम् ।
परार्ध्यास्तरणोपेतां नानोपस्करसंवृताम् ॥ ६३
स कृत्वा पादशौचं च कुशपाणिरतन्द्रितः ।
उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां ध्यानमेवान्वपद्यत ॥ ६४ ।
याममेकं स्थितो ध्याने सुष्वाप तदनन्तरम् ।
सुप्त्वा यामद्वयं तत्र चोदतिष्ठत्ततः शुकः ॥ ६५
पाश्चात्यं यामिनीयामं ध्यानमेवान्वपद्यत ।
स्नात्वा प्रातः क्रियाः कृत्वा पुनरास्ते समाहितः ॥ ६६ ।
वहाँ एक दिव्य रमणीय उपवन था, जिसमें विविध प्रकारके पुष्पोंसे लदे दिव्य वृक्ष सुशोभित हो रहे थे । उस वनको दिखाकर मन्त्रीने उनका यथोचित आतिथ्य सत्कार किया । वहाँ राजाकी सेवा करनेवाली अनेक वारांगनाएँ थीं, वे नृत्य - गानमें कुशल तथा कामशास्त्रमें निपुण थीं । शुकदेवजीकी सेवाके लिये उन्हें आदेश देकर राजमन्त्री उस भवनसे निकल गये और शुकदेवजी वहीं स्थित रहे । उन वारांगनाओंने परम भक्तिके साथ उनकी पूजा की और देशकालानुसार उपलब्ध अनेक प्रकारके भोजनसे उन्हें सन्तुष्ट किया ॥ ५५-५८ ॥ तत्पश्चात् अन्तःपुरनिवासिनी कामिनी स्त्रियोंने उन्हें अन्तःपुरका वन दिखाया, जो अत्यन्त रमणीय था । वे युवा, रूपवान्, कान्तिमान्, मृदुभाषी एवं मनोरम थे । दूसरे कामदेवके समान उन शुकदेवजीको
देखकर वे सभी मुग्ध हो गयीं ॥। ५ ९ -६० ॥
मुनिको जितेन्द्रिय जानकर वे सब उनकी परिचर्या करने लगीं । अरणिनन्दन शुद्धात्मा शुकदेवजीने उन्हें माताके समान समझा ॥ ६१ ॥
वे आत्माराम तथा क्रोधको जीतनेवाले शुकदेवजी न हर्षित होते थे और न दुःखी । उनकी चेष्टाओंको देखकर भी वे शान्तचित्त होकर स्थित रहे ॥ ६२ ॥
तब उन स्त्रियोंने उनके लिये सुरम्य, कोमल तथा बहुमूल्य आस्तरण और नानाविध उपकरणोंसे सुसज्जित शय्या बिछायी । शुकदेवजी हाथ - पाँव धोकर हाथमें कुश लेकर सावधान हो सायंकालीन सन्ध्योपासन सम्पन्न करके भगवान्के ध्यानमें लग गये ॥ ६३-६४ ॥ इस प्रकार एक प्रहरतक ध्यानावस्थित होकर वे शयन करने लगे । दो प्रहर शयन करके पुनः वे शुकदेवजी उठ गये T । रात्रिके चौथे प्रहरमें वे पुनः ध्यानमें स्थित रहे; तदनन्तर स्नान करके प्रातः-कालीन क्रियाएँ सम्पन्न करके पुनः समाधिस्थ हो गये ॥ ६५-६६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य राजमन्दिरप्रवेशवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
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१६० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ अथाष्टादशोऽध्यायः शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश सूत उवाच
श्रुत्वा तमागतं राजा मन्त्रिभिः सहितः शुचिः ।
पुरः पुरोहितं कृत्वा गुरुपुत्रं समभ्यगात् ॥
कृत्वार्हणां नृपः सम्यग् दत्तासनमनुत्तमम् ।
पप्रच्छ कुशलं गां च विनिवेद्य पयस्विनीम् ॥
स च तां नृपपूजां वै प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि ।
पप्रच्छ कुशलं राज्ञे स्वं निवेद्य निरामयम् ॥
कृत्वा कुशलसंप्रश्नमुपविष्टं सुखासने ।
शुकं व्याससुतं शान्तं पर्यपृच्छत पार्थिवः ॥
किं निमित्तं महाभाग निःस्पृहस्य च मां प्रति ।
जातं ह्यागमनं ब्रूहि कार्यं तन्मुनिसत्तम ॥
शुक उवाच
व्यासेनोक्तो महाराज कुरु दारपरिग्रहम् ।
सर्वेषामाश्रमाणां च गृहस्थाश्रम उत्तमः ॥
मया नाङ्गीकृतं वाक्यं मत्त्वा बन्धं गुरोरपि ।
न बन्धोऽस्तीति तेनोक्तो नाहं तत्कृतवान्पुनः ॥
इति सन्दिग्धमनसं मत्वा स मुनिसत्तमः ।
उवाच वचनं तथ्यं मिथिलां गच्छ मा शुचः ॥
याज्योऽस्ति जनकस्तत्र जीवन्मुक्तो नराधिपः ।
विदेहो लोकविदितः पाति राज्यमकण्टकम् ॥
कुर्वन् राज्यं तथा राजा मायापाशैर्न बध्यते ।
त्वं बिभेषि कथं पुत्र वनवृत्तिः परन्तप ॥
पश्य तं नृपशार्दूलं त्यज मोहं मनोगतम् ।
कुरु दारान्महाभाग पृच्छ वा भूपतिं च तम् ॥
सन्देहं ते मनोजातं कथयिष्यति पार्थिवः ।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मामेहि तरसा सुत ॥
सूतजी बोले- शुकदेवजीको आया हुआ सुनकर पवित्रात्मा राजा जनक अपने पुरोहितको आगे करके १ मन्त्रियोंसहित उन गुरुपुत्रके पास गये ॥१ ॥
महाराज जनकने उन्हें बड़े आदरसे उत्तम आसन देकर विधिवत् सत्कार करनेके पश्चात् एक २ दूध देनेवाली गौ प्रदान करके उनसे कुशल पूछा ॥ २ ॥
शुकदेवजीने भी राजाकी पूजाको यथाविधि स्वीकार किया और अपना कुशल बताकर राजासे भी ३ कुशल - मंगल पूछा ॥ ३ ॥
इस प्रकार कुशल - प्रश्न करके सुखदायी आसनपर ४ बैठे हुए शान्तचित्तवाले व्यासपुत्र शुकदेवजीसे महाराज जनकने पूछा — हे महाभाग! मेरे यहाँ आप नि: स्पृहका आगमन किस कारण हुआ? हे मुनिश्रेष्ठ! उस ५ प्रयोजन को बताइये? ॥ ४-५ ॥ शुकदेवजी बोले- महाराज! मेरे पिता व्यासजीने मुझसे कहा कि विवाह कर लो; क्योंकि सब आश्रमोंमें गृहस्थ - आश्रम ही श्रेष्ठ है । गुरुरूप पिताकी ६ आज्ञाको बन्धनकारक मानकर मैंने उसे स्वीकार नहीं किया । उन्होंने समझाया कि गृहस्थाश्रम बन्धन नहीं है, फिर भी मैंने उसे स्वीकार नहीं किया ॥ ६-७ ॥ ७ इस प्रकार मुझे संशययुक्त चित्तवाला समझकर मुनिश्रेष्ठ व्यासने तथ्ययुक्त वचन कहा- तुम मिथिला ८ चले जाओ, खेद न करो । वहाँ राजर्षि जनक रहते हैं, वे याज्ञिक एवं जीवन्मुक्त राजा हैं । संसारमें विदेह नामसे विख्यात वे वहाँ निष्कण्टक राज्य कर रहे हैं ॥ ८ - ९ ॥ ९ हे पुत्र! महाराज जनक राज्य करते हुए भी मायाके जालमें नहीं बँधते, तब हे परन्तप! तुम वनवासी होते हुए भी क्यों भयभीत हो रहे हो? ॥ १० ॥
१० उन नृपश्रेष्ठ विदेहको देखो और अपने मनमें उठते हुए मोहका त्याग करो । हे महाभाग! विवाह ११ करो, अन्यथा जाकर उन राजासे ही पूछो । वे राजा तुम्हारे मनमें उत्पन्न सन्देहका समाधान कर देंगे । तत्पश्चात् हे पुत्र! उनकी बात सुनकर तुम शीघ्र ही १२ | मेरे पास चले आना ॥ ११-१२ ॥
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अ ० १८ ]
सम्प्राप्तोऽहं महाराज त्वत्पुरे च तदाज्ञया ।
मोक्षकामोऽस्मि राजेन्द्र ब्रूहि कृत्यं ममानघ ॥
तपस्तीर्थव्रतेज्याश्च स्वाध्यायस्तीर्थसेवनम् ।
ज्ञानं वा वद राजेन्द्र मोक्षं प्रति च कारणम् ॥
जनक उवाच
शृणु विप्रेण कर्तव्यं मोक्षमार्गाश्रितेन यत् ।
उपनीतो वसेदादौ वेदाभ्यासाय वै गुरौ ॥
अधीत्य वेदवेदान्तान्दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम् ।
समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो निवसेन्मुनिः ॥
न्यायवृत्तिस्तु सन्तोषी निराशी गतकल्मषः ।
अग्निहोत्रादिकर्माणि कुर्वाणः सत्यवाक्शुचिः ॥
पुत्रं पौत्रं समासाद्य वानप्रस्थाश्रमे वसेत् ।
तपसा षड्रिपूञ्जित्वा भार्यां पुत्रे निवेश्य च ॥
सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित् ।
वसेत्तुर्याश्रमे श्रान्तः शुद्धे वैराग्यसम्भवे ॥
विरक्तस्याधिकारोऽस्ति संन्यासे नान्यथा क्वचित् ।
वेदवाक्यमिदं तथ्यं नान्यथेति मतिर्मम ॥
शुकाष्टचत्वारिंशद्वै संस्कारा वेदबोधिताः ।
चत्वारिंशद् गृहस्थस्य प्रोक्तास्तत्र महात्मभिः ॥
अष्टौ च मुक्तिकामस्य प्रोक्ताः शमदमादयः ।
आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति शिष्टानुशासनम् ॥
शुक उवाच
उत्पन्ने हृदि वैराग्ये ज्ञानविज्ञानसम्भवे ।
अवश्यमेव वस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु वा ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -6 A प्रथम स्कन्ध १६१ हे महाराज! मैं उन्हींके आदेशसे आपकी १३ पुरीमें आया हूँ । हे राजेन्द्र! हे अनघ! मैं मोक्षका अभिलाषी हूँ, अतः जो कार्य मेरे लिये उचित हो, वह बताइये ॥ १३ ॥
हे राजेन्द्र! तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, १४ तीर्थसेवन और ज्ञान – इनमेंसे जो मोक्षका साक्षात् साधन हो, वह मुझे बताइये ॥ १४ ॥
जनकजी बोले- मोक्षमार्गावलम्बी विप्रको जो करना चाहिये, उसे सुनिये । उपनयनसंस्कारके बाद १५ सर्वप्रथम वेदशास्त्रका अध्ययन करने हेतु गुरुके सांनिध्यमें रहना चाहिये । वहाँ वेद - वेदान्तोंका अध्ययन करके दीक्षान्त गुरुदक्षिणा देकर वापस लौटे मुनिको १६ विवाह करके पत्नीके साथ गृहस्थीमें रहना चाहिये । [ गृहस्थाश्रममें रहते हुए ] न्यायोपार्जित धनका अर्जन करे, सर्वदा सन्तुष्ट रहे और किसीसे कोई आशा न १७ रखे । पापोंसे मुक्त होकर अग्निहोत्र आदि कर्म करते हुए सत्यवचन बोले और [ मन, वचन, कर्मसे सदा ] पवित्र रहे । पुत्र - पौत्र हो जानेपर [ समयानुसार ] वानप्रस्थ आश्रममें रहे । वहाँ तपश्चर्याद्वारा [ काम, १८ क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य – इन ] छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके अपनी स्त्रीरक्षाका भार पुत्रको सौंप देनेके पश्चात् वह धर्मात्मा सब अग्नियोंका १ ९ अपनेमें न्यायपूर्वक आधान कर ले और सांसारिक विषयोंके भोगसे शान्ति मिल जानेके बाद हृदयमें विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न होनेपर चौथे आश्रमका आश्रय २० ले ले । विरक्तको ही संन्यास लेनेका अधिकार है, अन्य किसीको नहीं - यह वेदवाक्य सर्वथा सत्य है, असत्य नहीं - ऐसा मेरा मानना है ॥ १५–२० ॥ २१ हे शुकदेवजी! वेदोंमें कुल अड़तालीस संस्कार कहे गये हैं । उनमें गृहस्थके लिये चालीस संस्कार महात्माओंने बताये हैं । मुमुक्षुके लिये शम, दम आदि आठ संस्कार कहे गये हैं । एक आश्रमसे ही २२ [ क्रमश: ] दूसरे आश्रम में जाना चाहिये, ऐसा शिष्टजनोंका आदेश है॥२१-२२ ॥ शुकदेवजी बोले- चित्तमें वैराग्य और ज्ञान -विज्ञान उत्पन्न हो जानेपर अवश्य ही गृहस्थादि २३ । आश्रमोंमें रहना चाहिये अथवा वनों में ॥ २३ ॥