देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 151–160

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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१४२

तस्माद्दारान्प्रकुर्वीत तज्जयाय महामते ।

वार्धके तप आतिष्ठेदिति शास्त्रोदितं वचः ॥

विश्वामित्रो महाभाग तपः कृत्वातिदुश्चरम् ।

त्रीणि वर्षसहस्राणि निराहारो जितेन्द्रियः ॥

मोहितश्च महातेजा वने मेनकया स्थितः ।

शकुन्तला समुत्पन्ना पुत्री तद्वीर्यजा शुभा ॥

दृष्ट्वा दाशसुतां कालीं पिता मम पराशरः ।

कामबाणार्दितः कन्यां तां जग्राहोडुपे स्थितः ॥

ब्रह्मापि स्वसुतां दृष्ट्वा पञ्चबाणप्रपीडितः ।

धावमानश्च रुद्रेण मूर्च्छितश्च निवारितः ॥

तस्मात्त्वमपि कल्याण कुरु मे वचनं हितम् ।

कुलजां कन्यकां वृत्वा वेदमार्गं समाश्रय ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ हे महामते! इसलिये उन बलवान् इन्द्रियोंपर ६५ विजय पानेके लिये स्त्रीपरिणय करके गृहस्थ बनना चाहिये, तत्पश्चात् वृद्धावस्थामें तप करना चाहिये-यह शास्त्रवचन है ॥ ६५ ॥

६६ हे महाभाग! वनमें स्थित महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र किसी समय तीन सहस्र वर्षोंतक निराहार और जितेन्द्रिय रहकर अत्यन्त कठोर तप करके भी मेनकाको देखकर मोहित हो गये और उन्हींके तेजसे ६७ पुत्रीरूपमें सुन्दर शकुन्तला पैदा हुई ॥ ६६-६७ ॥ मेरे पिता पराशरजी भी धीवरकी कृष्णवर्णा कन्याको देखकर काम - बाणसे आहत हो गये और ६८ उन्होंने नावपर ही उसे स्वीकार कर लिया था ॥ ६८ ॥

ब्रह्माजी भी अपनी कन्या को देखकर कामसे पीड़ित हो गये और बेसुध होकर उसके पीछे दौड़ते ६ ९ रहे; तब शिवजीने उन्हें रोका ॥६ ९ ॥ अतः हे कल्याणकारी पुत्र! तुम मेरा हितकर वचन मान लो और किसी कुलीन कन्यासे विवाह ७० । करके सनातन वेदमार्गका पालन करो ॥ ७० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे व्यासेन गृहस्थधर्मवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

IIIII III I अथ पञ्चदशोऽध्यायः शुकदेवजीका विवाहके लिये अस्वीकार करना तथा व्यासजीका उनसे श्रीमद्देवीभागवत पढ़नेके लिये कहना श्रीशुक उवाच नाहं गृहं करिष्यामि दुःखदं सर्वदा पितः वागुरासदृशं नित्यं बन्धनं सर्वदेहिनाम् धनचिन्तातुराणां हि क्व सुखं तात दृश्यते स्वजनैः खलु पीड्यन्ते निर्धना लोलुपा जनाः इन्द्रोऽपि न सुखी तादृग्यादृशो भिक्षुनिःस्पृहः । श्रीशुकदेवजी बोले - हे पिताजी! सर्वदा । दुःख देनेवाले गृहस्थाश्रमको मैं कभी स्वीकार ॥ १ नहीं करूँगा; क्योंकि [ पशु - पक्षियोंको फँसानेवाले ] जालके समान यह आश्रम सभी मानवोंके लिये सदा बन्धनस्वरूप है ॥ १ ॥

हे तात! धन - धान्यकी चिन्तामें व्याकुल लोगों के । लिये सुख कहाँ दिखायी पड़ता है? निर्धन और ॥ २ लोभके वशीभूत मनुष्य अपने ही परिवारजनोंद्वारा सर्वदा कष्ट पाते रहते हैं ॥२ ॥

इन्द्र भी वैसे सुखी नहीं रहते, जैसा एक सुखी नि: स्पृह भिक्षुक रहता है । तब भला इस संसारमें तीनों लोकोंका वैभव पाकर भी दूसरा कौन

कोऽन्यः स्यादिह संसारे त्रिलोकीविभवे सति ॥ ३ । सुखी रह सकता है? ॥ ३ ॥

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अ ० १५ ]

तपन्तं तापसं दृष्ट्वा मघवा दुःखितोऽभवत् ।

विघ्नान्बहुविधानस्य करोति च दिवस्पतिः ॥

ब्रह्मापि न सुखी विष्णुर्लक्ष्मीं प्राप्य मनोरमाम् ।

खेदं प्राप्नोति सततं संग्रामैरसुरैः सह ॥

करोति विपुलान्यनांस्तपश्चरति दुश्चरम् ।

रमापतिरपि श्रीमान्कस्यास्ति विपुलं सुखम् ॥

शङ्करोऽपि सदा दुःखी भवत्येव च वेद्मयहम् ।

तपश्चर्यां प्रकुर्वाणो दैत्ययुद्धकरः सदा ॥

कदाचिन्न सुखी शेते धनवानपि लोलुपः ।

निर्धनस्तु कथं तात सुखं प्राप्नोति मानवः ॥

जानन्नपि महाभाग पुत्रं वा वीर्यसम्भवम् ।

नियोक्ष्यसि महाघोरे संसारे दुःखदे सदा ॥

जन्मदुःखं जरादुःखं दुःखं च मरणे तथा ।

गर्भवासे पुनर्दुःखं विष्ठामूत्रमये पितः ॥

तस्मादतिशयं दुःखं तृष्णालोभसमुद्भवम् ।

याच्ञायां परमं दुःखं मरणादपि मानद ॥

प्रतिग्रहधना विप्रा न बुद्धिबलजीवनाः ।

पराशा परमं दुःखं मरणं च दिने दिने ॥

पठित्वा सकलान् वेदाञ्छास्त्राणि च समन्ततः । गत्वा च धनिनां कार्या स्तुतिः सर्वात्मना बुधैः एकोदरस्य का चिन्ता पत्रमूलफलादिभिः । येनकेनाप्युपायेन सन्तुष्ट्या च प्रपूर्यते भार्या पुत्रास्तथा पौत्राः कुटुम्बे विपुले सति पूरणार्थं महद्दुःखं क्व सुखं पितरद्भुतम् प्रथम स्कन्ध १४३ किसी तपस्वीको तप करते हुए देखकर स्वर्गलोकके ४ स्वामी इन्द्र भी चिन्तित हो उठते हैं और उसके तपमें अनेक प्रकारके विघ्न करने लगते हैं ॥ ४ ॥

ब्रह्मा भी सुखी नहीं हैं और मनोरम लक्ष्मीको पाकर विष्णु भी सुखी नहीं हैं; उन्हें भी दैत्योंके ५ साथ युद्धके द्वारा निरन्तर कष्ट सहन करने पड़ते हैं । उन ऐश्वर्यशाली रमापति विष्णुको भी [ सुखप्राप्तिके लिये ] अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं और कठोर ६ तपस्या करनी पड़ती है । [ इस संसारमें ] किसको बहुत सुख है? ॥ ५-६ ॥ भगवान् शंकर भी सदैव दुःखी रहते हैं - ऐसा ७ मैं जानता हूँ; क्योंकि वे सदैव तपस्या करते हुए भी दैत्योंसे युद्ध करते रहते हैं ॥ ७ ॥

हे तात! जब धनवान् होते हुए भी लोभी ८ मनुष्य कभी भी सुखपूर्वक सो नहीं पाता, तब भला निर्धन मनुष्य कैसे सुख पा सकता है? इसलिये हे महाभाग! यह जानते हुए भी आप अपने तेजसे ९ उत्पन्न पुत्रको दुःखदायक तथा महाभयानक संसारमें क्यों लगा रहे हैं? ॥ ८ - ९ ॥ हे पिताजी! जहाँ जन्ममें दु: ख, बुढ़ापेमें दुःख, १० मरणमें दुःख तथा पुनः विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गर्भमें दुःख सहन करना पड़ता है; उससे भी अधिक दुःख तृष्णा और लोभसे उत्पन्न होता है । हे मानद! ११ मरनेसे भी अधिक दुःख माँगनेमें होता है ॥ १०-११ ॥ ब्राह्मण प्रतिग्रहद्वारा धन प्राप्त करते हैं और वे बुद्धि - बलका उपयोग नहीं करते । दूसरेके भरोसेपर रहना परम दुःखकर है तथा वह अहर्निश मृत्युके १२ समान होता है ॥ १२ ॥

सभी वेद - शास्त्रोंका भलीभाँति अध्ययन करके भी विद्वानोंको धनिकोंके पास जाकर सब प्रकारसे ॥ १३ उनकी प्रशंसा करनी पड़ती है । केवल पेटके लिये कोई चिन्ताकी बात नहीं; उसे तो केवल पत्र, फल एवं कन्द - मूल आदिसे किसी भी प्रकार सन्तुष्टिपूर्वक

॥ १४ भरा जा सकता है ॥। १३-१४ ॥

हे पिताजी! भार्या, पुत्र, पौत्र आदि बड़े कुटुम्बके । पालनमें तो अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं । ऐसी दशामें ॥ १५ गृहस्थको सुख कहाँ है? ॥ १५ ॥

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१४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ योगशास्त्रं वद मम ज्ञानशास्त्रं सुखाकरम् । इसलिये हे तात! मुझे सुखदायी ज्ञानशास्त्र और कर्मकाण्डेऽखिले तात न रमेऽहं कदाचन ॥ १६ योगशास्त्रका उपदेश कीजिये । सम्पूर्ण कर्मकाण्डमें मेरा मन कभी नहीं लगता ॥ १६ ॥

वद कर्मक्षयोपायं प्रारब्धं सञ्चितं तथा । अतः कर्मक्षयका कोई उपाय बताइये; जिससे वर्तमानं संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण - तीनों प्रकारके यथा नश्येत् त्रिविधं कर्ममूलजम् ॥ १७ कर्मफल नष्ट हो जायँ ॥ १७ ॥

जलूकेव सदा नारी रुधिरं पिबतीति वै । मूर्खस्तु न विजानाति मोहितो भावचेष्टितैः भोगैर्वीर्यं धनं पूर्णं मनः कुटिलभाषणैः । कान्ता हरति सर्वस्वं कः स्तेनस्तादृशोऽपरः ।

निद्रासुखविनाशार्थं मूर्खस्तु दारसंग्रहम् ।

करोति वञ्चितो धात्रा दुःखाय न सुखाय च ॥

सूत उवाच

एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा व्यासः शुकस्य च ।

सम्प्राप महतीं चिन्तां किं करोमीत्यसंशयम् ॥

तस्य सुस्रुवुरश्रूणि लोचनाद्दुःखजानि च ।

वेपथुश्च शरीरेऽभूद् ग्लानिं प्राप मनस्तथा ॥

शोचन्तं पितरं दृष्ट्वा दीनं शोकपरिप्लुतम् ।

उवाच पितरं व्यासं विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥

अहो मायाबलं चोग्रं यन्मोहयति पण्डितम् ।

वेदान्तस्य च कर्तारं सर्वज्ञं वेदसम्मितम् ॥

न जाने का च सा माया किंस्वित्सातीव दुष्करा ।

या मोहयति विद्वांसं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥

पुराणानां च वक्ता च निर्माता भारतस्य च ।

विभागकर्ता वेदानां सोऽपि मोहमुपागतः ॥

स्त्री जोंकके समान सदा [ पुरुषका ] रक्त चूसती रहती है, जिसे बुद्धिहीन मनुष्य उसकी ॥ १८ भावपूर्ण चेष्टाओंसे मोहित होनेके कारण नहीं जान पाता ॥ १८ ॥

स्त्री अपने संसर्गसे उसके तेजका तथा १ ९ अपनी वचनचातुरीद्वारा उसके सम्पूर्ण धन और

मनका — इस प्रकार सर्वस्वका हरण कर लेती है ।

उससे बढ़कर दूसरा चोर कौन है? ॥ १ ९ ॥

इसलिये मेरे विचारमें तो मूर्ख मनुष्य ही २० केवल निद्रासुखका नाश करनेके लिये स्त्रीपरिणय करता है । विधाताद्वारा वह दुःखके लिये ही ठगा जाता है, सुखके लिये नहीं ॥ २० ॥

सूतजी बोले- इस प्रकार शुकदेवकी युक्तियुक्त २१ ये बातें सुनकर व्यासजी बड़ी चिन्तामें पड़ गये । वे मन - ही - मन सोचने लगे - ' अब मैं क्या करूँ? ' तत्पश्चात् उनकी आँखोंसे दुःखके आँसू बहने लगे, शरीर काँपने लगा और मनमें ग्लानि होने २२ | लगी ॥ २१-२२ ॥ इस प्रकार शोक करते हुए अपने दीन तथा शोकाकुल पिताको देखकर आश्चर्यसे विस्मित २३ नेत्रवाले शुकदेवजीने अपने पिता व्यासजीसे कहा- - अहो! माया कितनी प्रबल है, जो कि यह वेदान्तदर्शनके प्रणेता तथा वेदका सांगोपांग ज्ञान २४ रखनेवाले सर्वज्ञ पण्डित मेरे पिताजीको भी मोहित कर रही है! ॥ २३-२४ ॥ न जाने वह कौन - सी तथा कैसी अति दुष्कर माया है, जो सत्यवतीसुत विद्वान् व्यासजीको भी २५ मोहित कर रही है! ॥ २५ ॥

जो पुराणोंके वक्ता, महाभारतके रचयिता, वेदोंके विभागकर्ता हैं, वे भी [ मायाजनित ] मोहको २६ । प्राप्त हो गये हैं ॥ २६ ॥

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अ ० १५ ]

तां यामि शरणं देवीं या मोहयति वै जगत् ।

ब्रह्मविष्णुहरादींश्च कथान्येषां च कीदृशी ॥

कोऽप्यस्ति त्रिषु लोकेषु यो न मुह्यति मायया ।

यन्मोहं गमिताः पूर्वे ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥

अहो बलमहो वीर्यं देव्या खलु विनिर्मितम् ।

माययैव वशं नीतः सर्वज्ञ ईश्वरः प्रभुः ॥

विष्णवंशसम्भवो व्यास इति पौराणिका जगुः ।

सोऽपि मोहार्णवे मग्नो भग्नपोतो वणिग्यथा ॥

अश्रुपातं करोत्यद्य विवश: प्राकृतो यथा ।

अहो मायाबलं चैतद्दुस्त्यजं पण्डितैरपि ॥

कोऽयं कोऽहं कथं चेह कीदृशोऽयं भ्रमः किल ।

पञ्चभूतात्मके देहे पितापुत्रेति वासना ॥

बलिष्ठा खलु मायेयं मायिनामपि मोहिनी । ययाभिभूतः कृष्णोऽपि करोति रोदनं द्विजः । सूत उवाच

तां नत्वा मनसा देवीं सर्वकारणकारणाम् ।

जननीं सर्वदेवानां ब्रह्मादीनां तथेश्वरीम् ॥

पितरं प्राह दीनं तं शोकार्णवपरिप्लुतम् ।

अरणीसम्भवो व्यासं हेतुमद्वचनं शुभम् ॥

पाराशर्य महाभाग सर्वेषां बोधदः स्वयम् ।

किं शोकं कुरुषे स्वामिन्यथाज्ञः प्राकृतो नरः ॥

प्रथम स्कन्ध १४५ इसलिये मैं उन्हीं देवी महामायाकी शरणमें २७ जाऊँ, जो समस्त जगत् तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिको भी मोहित कर देती हैं, तब दूसरोंकी बात ही क्या है? ॥ २७ ॥

इन तीनों लोकोंमें कौन ऐसा है जो मायासे २८ मोहित न होता हो? उस मायाने तो ब्रह्मा आदि देवताओं को भी पूर्वकालमें मोहित कर दिया था ॥ २८ ॥

अहो! उन भगवती जगदम्बाके द्वारा रचित मायाका बल तथा पराक्रम महान् आश्चर्यजनक है; २ ९ उन्होंने अपनी मायाके प्रभावसे ही सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी ईश्वरको भी अपने वशमें कर रखा है ॥ २ ९ ॥ ३० पौराणिकोंद्वारा कहा गया है कि व्यासजी भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; तथापि वे आज शोक - सागरमें इस प्रकार डूब रहे हैं जैसे समुद्रमें भग्न जलयानवाला वणिक् ॥ ३० ॥

३१ आज वे भी मायाके वशीभूत होकर एक साधारण व्यक्तिके समान आँसू बहा रहे हैं । अहो! माया बड़ी प्रबल है, जिसे बड़े - बड़े विद्वान् भी नहीं ३२ त्याग पाते ॥३१ ॥

व्यास कौन हैं? मैं कौन हूँ? यह संसार क्या वस्तु है? और यह कैसा भ्रम है? इस पांचभौतिक शरीरमें पिता - पुत्रकी भावना कहाँसे आयी? यह माया ३३ अतीव प्रबल है, जो मायावियोंको भी मोहित कर देती है, जिसके वशीभूत होकर यहाँ द्विज कृष्णद्वैपायन भी रुदन कर रहे हैं ॥ ३२-३३ ॥ सूतजी बोले- सब कारणोंकी एकमात्र कारण, सब देवताओंकी जननी तथा ब्रह्मा आदि देवताओंकी ३४ भी स्वामिनी आदिशक्ति भगवतीको मनसे स्मरण करके शोकसागरमें डूबे हुए अपने दुःखी पिता श्रीव्यासजीसे अरणीपुत्र शुकदेवजीने इस प्रकार नीतियुक्त ३५ वचन कहा- ॥ ३४-३५ ॥ हे पराशरनन्दन! हे महाभाग! आप तो स्वयं सब लोगोंको ज्ञान देनेवाले हैं तब हे स्वामिन्! आप ऐसा शोक क्यों करते हैं, जैसा कोई अज्ञ साधारण ३६ । व्यक्ति करता है? ॥ ३६ ॥

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१४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५

अद्याहं तव पुत्रोऽस्मि न जाने पूर्वजन्मनि ।

कोऽहं कस्त्वं महाभाग विभ्रमोऽयं महात्मनि ॥

कुरु धैर्यं प्रबुध्यस्व मा विषादे मनः कृथाः ।

मोहजालमिमं मत्वा मुञ्च शोकं महामते ॥

क्षुधानिवृत्तिर्भक्ष्येण न पुत्रदर्शनेन च ।

पिपासा जलपानेन याति नैवात्मजेक्षणात् ॥

घ्राणं सुखं सुगन्धेन कर्णजं श्रवणेन च ।

स्त्रीसुखं तु स्त्रिया नूनं पुत्रोऽहं किं करोमि ते ॥

अजीगर्तेन पुत्रोऽपि हरिश्चन्द्राय भूभुजे ।

पशुकामाय यज्ञार्थे दत्तो मौल्येन सर्वथा ॥

सुखानां साधनं द्रव्यं धनात्सुखसमुच्चयः ।

धनमर्जय लोभश्चेत्पुत्रोऽहं किं करोम्यहम् ॥

मां प्रबोधय बुद्ध्या त्वं दैवज्ञोऽसि महामते ।

यथा मुच्येयमत्यन्तं गर्भवासभयान्मुने ॥

दुर्लभं मानुषं जन्म कर्मभूमाविहानघ ।

तत्रापि ब्राह्मणत्वं वै दुर्लभं चोत्तमे कुले ॥

बद्धोऽहमिति मे बुद्धिर्नापसर्पति चित्ततः ।

संसारवासनाजाले निविष्टा वृद्धिगामिनी ॥।

सूत उवाच

इत्युक्तस्तु तदा व्यासः पुत्रेणामितबुद्धिना ।

प्रत्युवाच शुकं शान्तं चतुर्थाश्रममानसम् ॥

व्यास उवाच

पठ पुत्र महाभाग मया भागवतं कृतम् ।

शुभं न चातिविस्तीर्णं पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ॥

हे महाभाग! इस समय मैं आपका पुत्र हूँ, परंतु ३७ यह कौन जानता है कि पूर्वजन्ममें मैं कौन था और आप कौन थे? यह संसार तो महात्माओंके लिये एक भ्रममात्र है ॥ ३७ ॥

३८ अतएव आप धैर्य रखें, विवेक धारण करें तथा मनमें खेद न करें । हे महामते! इसे मोहजाल समझकर आप शोकका परित्याग करें ॥ ३८ ॥

३ ९ भूख भोजनसे मिटती है, पुत्रके देखनेसे नहीं । प्यास भी जल पीनेसे मिटती है, केवल पुत्र - दर्शनसे नहीं । इसी प्रकार सुगन्धित पदार्थसे नाकको तथा अच्छी बातोंसे कानोंको एवं स्त्रीसे विषय -सुखका I ४० आनन्द मिलता है । मैं आपका पुत्र हूँ, बताइये मैं आपके लिये क्या करूँ? ॥३ ९ -४० ॥ किसी समय अजीगर्त नामक ब्राह्मणने धन ४१ लेकर अपने पुत्र शुनःशेषको यज्ञपशुके रूपमें राजा हरिश्चन्द्रके हाथ बेच दिया था । सुखका साधन केवल धन ही है, धन ही सुखकी राशि है । अतः यदि ४२ । आपको लोभ हो, तो धनका संचय कीजिये । मैं आपका पुत्र हूँ, अतः [ आपके सुखके लिये ] मैं क्या करूँ? ॥ ४१-४२ ॥ ४३ हे महामते! आप दैवज्ञ हैं । अतः हे मुने! आप मुझे अपनी बुद्धिसे ऐसा ज्ञान दीजिये, जिससे मैं गर्भवासजनित महान् भयसे मुक्त हो जाऊँ ॥ ४३ ॥

४४ हे पवित्रात्मन्! इस कर्मभूमिमें मनुष्य जन्म अति दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम कुलमें ब्राह्मणका जन्म और भी दुर्लभ है ॥ ४४ ॥

४५ ' मैं आबद्ध हूँ'– यह बुद्धि मेरे चित्तसे नहीं हटती । संसारके वासनाजालमें यह उत्तरोत्तर बढ़ती हुई फँसती ही जाती है ॥ ४५ ॥

सूतजी बोले – असीम बुद्धिवाले अपने पुत्र शुकदेवके ऐसा कहनेपर व्यासजीने शान्त एवं ४६ संन्यास आश्रमके लिये उत्सुक मनवाले शुकदेवजीसे कहा - ॥ ४६ ॥

व्यासजी बोले- हे महाभाग पुत्र! मेरेद्वारा रचित श्रीमद्देवीभागवतपुराणको तुम पढ़ो; वेदतुल्य ४७ यह पवित्र पुराण अधिक विस्तृत भी नहीं है ॥ ४७ ॥

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अ ० १५ ]

स्कन्धा द्वादश तत्रैव पञ्चलक्षणसंयुतम् ।

सर्वेषां च पुराणानां भूषणं मम सम्मतम् ॥

सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते ।

येन भागवतेनेह तत्पठ त्वं महामते ॥

वटपत्रशयानाय विष्णवे बालरूपिणे ।

केनास्मि बालभावेन निर्मितोऽहं चिदात्मना ॥

किमर्थं केन द्रव्येण कथं जानामि चाखिलम् ।

इत्येवं चिन्त्यमानाय मुकुन्दाय महात्मने ॥

श्लोकार्थेन तया प्रोक्तं भगवत्याखिलार्थदम् ।

सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् ॥

तद्वचो विष्णुना पूर्वं संविज्ञातं मनस्यपि ।

केनोक्ता वागियं सत्या चिन्तयामास चेतसा ॥

कथं वेद्मि प्रवक्तारं स्त्रीपुंसौ वा नपुंसकम् ।

इति चिन्ताप्रपन्नेन धृतं भागवतं हृदि ॥

पुनः पुनः कृतोच्चारस्तस्मिन्नेवास्तचेतसा ।

वटपत्रे शयानः सन्नभूच्चिन्तासमन्वितः ॥

तदा शान्ता भगवती प्रादुरास चतुर्भुजा ।

शङ्खचक्रगदापद्मवरायुधधरा शिवा ॥

दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता ।

संयुता सदृशीभिश्च सखीभिः स्वविभूतिभिः ॥

प्रादुर्बभूव तस्याग्रे विष्णोरमिततेजसः । मन्दहास्यं प्रयुञ्जाना महालक्ष्मीः शुभानना । सूत उवाच

तां तथा संस्थितां दृष्ट्वा हृदये कमलेक्षणः ।

विस्मितः सलिले तस्मिन्निराधारां मनोरमाम् ॥

प्रथम स्कन्ध इसमें बारह स्कन्ध हैं, यह ४८ लक्षणोंसे युक्त है । मेरे विचारमें पुराणोंका आभूषण है ॥४८ ॥

हे महामते! जिस भागवतके ४ ९ और असत् वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान तुम पढ़ो ॥ ४ ९ ॥ [ एक बार महाप्रलयकालमें ] १४७ पुराणोंके पाँचों यह पुराण सभी सुननेमात्रसे सत् हो जाता है, उसे वटपत्रपर शयन ५० करते हुए बालरूपधारी भगवान् विष्णु वहाँ सोच रहे थे कि किस चिदात्माने, किस प्रयोजनसे तथा किस द्रव्यसे मुझे बालरूपमें उत्पन्न किया है? इन सब ५१ विषयोंका ज्ञान मुझे कैसे हो? इस प्रकार चिन्तन कर रहे महात्मा बालमुकुन्दसे उन आदिशक्ति भगवतीने सम्पूर्ण अर्थको प्रदान करनेवाले ज्ञानको आधे श्लोकमें ५२ ही इस प्रकार कहा - ' सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् ' अर्थात् यह सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है ॥ ५०-५२ ॥ ५३ यह बात पहले भी भगवान् विष्णुके हृदयमें उत्पन्न हुई थी । इसलिये अब वे सोचने लगे कि इस सत्य वचनका उच्चारण किसने किया? इस ५४ कहनेवालेको मैं कैसे जानूँ? वह स्त्री है या पुरुष अथवा नपुंसक है? ऐसी चिन्तावाले भगवान् विष्णुने भागवतको हृदयमें धारण किया और उसी श्लोकार्धमें ५५ मन लगाये हुए वे बार - बार उसका उच्चारण करने लगे । इस प्रकार वटपत्रपर सोये हुए वे भगवान् विष्णु चिन्तातुर हो गये ॥ ५३-५५ ॥ ५६ उसी समय शंख, चक्र, गदा, पद्म – इन श्रेष्ठ आयुधोंको धारण किये हुए, चतुर्भुजा, शान्तिस्वरूपा, शान्ता शिवा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित होकर ५७ अपने ही समान विभूतियोंवाली सखियोंसहित प्रादुर्भूत हुईं । वे सुन्दर मुखवाली भगवती महालक्ष्मी परम तेजस्वी भगवान् विष्णुके समक्ष मन्द - मन्द ५८ मुसकराती हुई प्रकट हुईं ॥ ५६-५८ ॥ सूतजी बोले- उस अपार प्रलय - सागरमें बिना अवलम्बके स्थित मनोरम रूपवाली उन दिव्य देवीको देखकर कमलनयन भगवान् विष्णु बड़े ही ५ ९ । विस्मयमें पड़े ॥ ५ ९ ॥

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१४८ रतिर्भूतिस्तथा बुद्धिर्मतिः कीर्तिः स्मृतिर्धृतिः श्रद्धा मेधा स्वधा स्वाहा क्षुधा निद्रा दया गतिः तुष्टिः पुष्टिः क्षमा लज्जा जृम्भा तन्द्रा च शक्तयः संस्थिताः सर्वतः पार्श्वे महादेव्याः पृथक्पृथक् वरायुधधराः सर्वा नानाभूषणभूषिताः मन्दारमालाकुलिता मुक्ताहारविराजिताः तां दृष्ट्वा ताश्च संवीक्ष्य तस्मिन्नेकार्णवे जले । विस्मयाविष्टहृदयः सम्बभूव जनार्दनः चिन्तयामास सर्वात्मा दृष्टमायोऽतिविस्मितः । कुतो भूताः स्त्रियः सर्वाः कुतोऽहं वटतल्पगः अस्मिन्नेकार्णवे घोरे न्यग्रोधः कथमुत्थितः केनाहं स्थापितोऽस्म्यत्र शिशुं कृत्वा शुभाकृतिम् ममेयं जननी नो वा माया वा कापि दुर्घटा दर्शनं केनचित्त्वद्य दत्तं वा केन हेतुना

किं मया चात्र वक्तव्यं गन्तव्यं वा न वा क्वचित् ।

मौनमास्थाय तिष्ठेयं बालभावादतन्द्रितः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ । वहाँ रति, भूति, बुद्धि, मति, कीर्ति, स्मृति, धृति, ॥ ६० श्रद्धा, मेधा, स्वधा, स्वाहा, क्षुधा, निद्रा, दया, गति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, जृम्भा, तन्द्रा- ये शक्तियाँ । अलग - अलग रूपमें उन महादेवीके समीप सभी ओर खड़ी थीं ॥ ६०-६१ ॥ ॥ ६१ वे सभी श्रेष्ठ आयुध धारण किये हुए थीं, नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थीं तथा उनके । हृदयपर मन्दारकी मालाएँ और मोतियोंके हार सुशोभित ॥ ६२ हो रहे थे ॥६२ ॥

उन भगवती महालक्ष्मी तथा उनकी सभी अन्यान्य सखियोंको उस प्रलयसागरके जलमें उपस्थित ॥ ६३ देखकर भगवान् विष्णुके मनमें बड़ा विस्मय हुआ ॥ ६३ ॥

इस प्रकार भगवतीकी माया देखकर अति चकित सर्वात्मा भगवान् विष्णु सोचने लगे-॥ ६४ ये देवियाँ कहाँसे आ गयीं, मैं वटवृक्षके पत्तेपर कैसे आ गया, इस एकार्णव महासागरमें वटवृक्ष । कहाँसे उत्पन्न हो गया और किसके द्वारा मैं सुन्दर स्वरूपवाला बालक बनाकर उसपर स्थापित किया ॥ ६५ गया । माया ॥ ६६ दर्शन चला हूँ? ॥६४-६५ ॥ ये मेरी माता तो नहीं हैं! अथवा यह कोई दुर्घट है? किसने और किस कारणसे मुझे इस समय दिये हैं? ॥ ६६ ॥

अब मैं इस विषयमें क्या कहूँ? मैं यहाँसे कहीं जाऊँ अथवा मौन धारण करके बालभावसे ६७ । सावधान होकर यहीं स्थित रहूँ ॥ ६७ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकवैराग्यवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

अथ षोडशोऽध्यायः बालरूपधारी भगवान् विष्णुसे महालक्ष्मीका संवाद, व्यासजीका शुकदेवजीसे देवीभागवतप्राप्तिकी परम्परा बताना तथा शुकदेवजीका मिथिला जानेका निश्चय करना व्यास उवाच व्यासजी बोले- - इस प्रकार वटपत्रपर सोये दृष्ट्वा तं विस्मितं देवं शयानं वटपत्रके । हुए उन भगवान् विष्णुको आश्चर्यचकित देखकर मन्द मुसकान करती हुई देवीने यह वचन कहा— उवाच सस्मितं वाक्यं विष्णो किं विस्मितो ह्यसि ॥ १ | ' विष्णो! आप विस्मयमें क्यों पड़े हैं? ' ॥ १ ॥

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अ ० १६ ] प्रथम स्कन्ध १४ ९

महाशक्त्याः प्रभावेण त्वं मां विस्मृतवान्पुरा ।

प्रभवे प्रलये जाते भूत्वा भूत्वा पुनः पुनः ॥

निर्गुणा सा परा शक्तिः सगुणस्त्वं तथाप्यहम् ।

सात्त्विकी किल या शक्तिस्तां शक्तिं विद्धि मामिकाम् ॥

त्वन्नाभिकमलाद् ब्रह्मा भविष्यति प्रजापतिः ।

स कर्ता सर्वलोकस्य रजोगुणसमन्वितः ॥

स तदा तप आस्थाय प्राप्य शक्तिमनुत्तमाम् ।

रजसा रक्तवर्णञ्च करिष्यति जगत्त्रयम् ॥

सगुणान्पञ्चभूतांश्च समुत्पाद्य महामतिः ।

इन्द्रियाणीन्द्रियेशांश्च मनः पूर्वान्समन्ततः ॥

करिष्यति ततः सर्गं तेन कर्ता स उच्यते ।

विश्वस्यास्य महाभाग त्वं वै पालयिता तथा ॥

तभ्रुवोर्मध्यदेशाच्च क्रोधाद् रुद्रो भविष्यति ।

तपः कृत्वा महाघोरं प्राप्य शक्तिं तु तामसीम् ॥

कल्पान्ते सोऽपि संहर्ता भविष्यति महामते ।

तेनाहं त्वामुपायाता सात्त्विकीं त्वमवेहि माम् ॥

स्थास्येऽहं त्वत्समीपस्था सदाहं मधुसूदन ।

हृदये ते कृतावासा भवामि सततं किल ॥

विष्णुरुवाच

श्लोकस्यार्धं मया पूर्वं श्रुतं देवि स्फुटाक्षरम् ।

तत्केनोक्तं वरारोहे रहस्यं परमं शिवम् ॥

तन्मे ब्रूहि वरारोहे संशयोऽयं वरानने ।

निर्धनो हि यथा द्रव्यं तत्स्मरामि पुनः पुनः ॥

व्यास उवाच

विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा महालक्ष्मीः स्मितानना ।

उवाच परया प्रीत्या वचनं चारुहासिनी ॥

आप उस महाशक्तिकी मायासे पूर्वकालमें भी २ सृष्टिकी उत्पत्ति तथा प्रलय होनेपर इसी प्रकार बार - बार जन्म लेकर मुझे भूलते रहे हैं ॥ २ ॥

वे पराशक्ति निर्गुणा हैं, मैं और आप तो सगुण हैं । जो सात्त्विकी शक्ति है, उसे आप मेरी ही शक्ति समझिये ॥ ३ ॥

आपके नाभिकमलसे प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न ४ होंगे । वे ही रजोगुणसे युक्त होकर समस्त ब्रह्माण्डकी सृष्टि करेंगे ॥ ४ ॥

वे ब्रह्मा ही तपोबलका आश्रय लेकर श्रेष्ठ ५ शक्ति प्राप्त करके रजोगुणके द्वारा त्रिभुवनको लाल वर्णका कर देंगे । गुणोंसहित पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु – इन पाँचों महाभूतोंकी एवं ६ मनके साथ इन्द्रियों तथा उनके अधिष्ठातृदेवताओंकी रचना करके वे बुद्धिमान् ब्रह्माजी जगत्की सृष्टि करेंगे; इसी कारण वे कर्ता कहे जायँगे और आप इस ७ विश्वके पालक होंगे ॥५-७ ॥ उनके क्रोध करनेपर उनकी भौंहोंके मध्यभागसे रुद्र उत्पन्न होंगे । हे महामते! वे ही रुद्र घोर तप ८ करके तामसी शक्ति प्राप्तकर कल्पान्तके समय सृष्टि संहारकर्ता होंगे । इसी कारण मैं आपके पास ९ आयी हूँ; आप मुझे वही सात्त्विकी शक्ति समझिये । हे मधुसूदन! मैं यहीं रहूँगी । मैं तो सर्वदा आपके ही पास रहती हूँ । आपके हृदयमें मैं निरन्तर निवास १० करती हूँ॥८–१० ॥ विष्णु बोले – हे देवि! हे वरारोहे! कुछ समय पूर्व मैंने स्पष्ट अक्षरोंवाला जो आधा

श्लोक सुना, वह परम कल्याणप्रद तथा रहस्यमय

११ वाक्य किसने कहा था? हे वरारोहे! यह मुझे शीघ्र बताइये; हे सुमुखि! इस विषयमें मुझे महती शंका है । जिस प्रकार निर्धन पुरुष धनकी चिन्ता १२ करता रहता है, उसी प्रकार मैं उसका बार - बार स्मरण किया करता हूँ ॥ ११-१२ ॥ व्यासजी बोले- विष्णुका वह वचन सुनकर मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली महालक्ष्मी मधुर हास्यके १३ । साथ अत्यन्त प्रेमसे बोलीं- ॥ १३ ॥

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१५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ महालक्ष्मीरुवाच

शृणु शौरे वचो मह्यं सगुणाहं चतुर्भुजा ।

मां जानासि न जानासि निर्गुणां सगुणालयाम् ॥

त्वं जानीहि महाभाग तया तत्प्रकटीकृतम् ।

पुण्यं भागवतं विद्धि वेदसारं शुभावहम् ॥

कृपां च महतीं मन्ये देव्याः शत्रुनिषूदन ।

यया प्रोक्तं परं गुह्यं हिताय तव सुव्रत ॥

रक्षणीयं सदा चित्ते न विस्मार्यं कदाचन ।

सारं हि सर्वशास्त्राणां महाविद्याप्रकाशितम् ॥

नातः परं वेदितव्यं वर्तते भुवनत्रये ।

प्रियोऽसि खलु देव्यास्त्वं तेन ते व्याहृतं वचः ॥

व्यास उवाच

इति श्रुत्वा वचो देव्या महालक्ष्म्याश्चतुर्भुजः ।

दधार हृदये नित्यं मत्वा मन्त्रमनुत्तमम् ॥

कालेन कियता तत्र तन्नाभिकमलोद्भवः ।

ब्रह्मा दैत्यभयात्त्रस्तो जगाम शरणं हरेः ॥

ततः कृत्वा महायुद्धं हत्वा तौ मधुकैटभौ ।

जजाप भगवान्विष्णुः श्लोकार्थं विशदाक्षरम् ॥

जपन्तं वासुदेवं च दृष्ट्वा देवः प्रजापतिः ।

पप्रच्छ परमप्रीतः कञ्जञ्जः कमलापतिम् ॥

किं त्वं जपसि देवेश त्वत्तः कोऽप्यधिकोऽस्ति वै ।

यत्स्मृत्वा पुण्डरीकाक्ष प्रीतोऽसि जगदीश्वर ॥

हरिरुवाच

मयि त्वयि च या शक्तिः क्रियाकारणलक्षणा ।

विचारय महाभाग या सा भगवती शिवा ॥

यस्याधारे जगत्सर्वं तिष्ठत्यत्र महार्णवे ।

साकारा या महाशक्तिरमेया च सनातनी ॥

महालक्ष्मी बोलीं- हे शौरे! मेरी बात सुनिये । मैं सगुणरूपा चतुर्भुजा भगवती हूँ । आप मुझे जानते १४ हों या न जानते हों, किंतु मैं सब गुणोंका आलय होती हुई निर्गुणा भी हूँ ॥१४ ॥

हे महाभाग! आप यह जान लें कि वह १५ अर्धश्लोक उसी पराशक्तिने कहा था । आप उसे सब वेदोंका तत्त्वस्वरूप, कल्याणकारी और पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत समझिये । हे शत्रुमर्दन!! हे सुव्रत! मैं १६ भगवतीकी परम कृपा मानती हूँ, जिसने ऐसा गुप्त एवं परम रहस्यमय मन्त्र आपके कल्याणके लिये कहा है ॥ १५-१६ ॥ १७ आप इसे सर्वदा चित्तमें रखिये और कभी भी इसे विस्मृत न कीजिये; यह सब शास्त्रोंका सार है तथा महाविद्याके द्वारा प्रकाशित किया गया है ॥ १७ ॥

१८ इससे बढ़कर त्रिभुवनमें कुछ भी ज्ञातव्य नहीं है । आप निश्चय ही देवीके परम प्रिय हैं, इसीलिये उन्होंने यह मन्त्र आपको बताया है ॥ १८ ॥

व्यासजी बोले — महादेवी लक्ष्मीके इस वचनको १ ९ सुनकर चतुर्भुज भगवान् विष्णुने इसे सर्वश्रेष्ठ मन्त्र समझकर सदाके लिये हृदयमें धारण कर लिया ॥ १ ९ ॥ २० कुछ दिनोंके बाद उनके नाभिकमलसे उत्पन्न ब्रह्माजी दैत्योंके भयसे डरकर भगवान् विष्णुकी शरणमें गये । तब वे भगवान् विष्णु भयंकर युद्ध करके २१ मधु - कैटभका वधकर उस विशद अक्षरोंवाले

श्लोकार्धरूप मन्त्रका जप करने लगे ॥ २०-२१ ॥

भगवान् वासुदेवको जप करते हुए देखकर २२ प्रजापति ब्रह्माजीने प्रेमपूर्वक कमलापतिसे पूछा— हे देवेश! हे पुण्डरीकाक्ष! हे जगदीश्वर! आप किसका जप कर रहे हैं? आपसे भी बढ़कर दूसरा २३ कौन है, जिसका ध्यान करके आप इतने प्रसन्न हो रहे हैं? ॥ २२-२३ ॥ विष्णु बोले - हे महाभाग! विचार कीजिये कि आपमें और मुझमें जो कार्यकारणस्वरूपा शक्ति २४ विद्यमान है, वे ही भगवती शिवा हैं । जिनके आधारपर एकार्णव महासागरमें यह समस्त जगत् ठहरा हुआ है । जो महाशक्ति साकार, असीम तथा २५ | सनातनी भगवती हैं और यह समस्त जड - चेतन

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अ ० १६ ]

यया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ।

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ॥

सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ।

संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥

अहं त्वमखिलं विश्वं तस्याश्चिच्छक्तिसम्भवम् ।

विद्धि ब्रह्मन्न सन्देहः कर्तव्यः सर्वदानघ ॥

श्लोकार्थेन तया प्रोक्तं तद्वै भागवतं किल ।

विस्तरो भविता तस्य द्वापरादौ युगे तथा ॥

व्यास उवाच

ब्रह्मणा संगृहीतं च विष्णोस्तु नाभिपङ्कजे ।

नारदाय च तेनोक्तं पुत्रायामितबुद्धये ॥

नारदेन तथा मह्यं दत्तं हि मुनिना पुरा ।

मया कृतमिदं पूर्णं द्वादशस्कन्धविस्तरम् ॥

तत्पठस्व महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।

पञ्चलक्षणयुक्तं च देव्याश्चरितमुत्तमम् ॥

तत्त्वज्ञानरसोपेतं सर्वेषामुत्तमोत्तमम् ।

धर्मशास्त्रसमं पुण्यं वेदार्थेनोपबृंहितम् ॥

वृत्रासुरवधोपेतं नानाख्यानकथायुतम् ।

ब्रह्मविद्यानिधानं तु संसारार्णवतारकम् ॥

गृहाण त्वं महाभाग योग्योऽसि मतिमत्तरः ।

पुण्यं भागवतं नाम पुराणं पुरुषर्षभ ॥

अष्टादशसहस्त्राणां श्लोकानां कुरु संग्रहम् ।

अज्ञाननाशनं दिव्यं ज्ञानभास्करबोधकम् ॥

सुखदं शान्तिदं धन्यं दीर्घायुष्यकरं शिवम् ।

शृण्वतां पठतां चेदं पुत्रपौत्रविवर्धनम् ॥

प्रथम स्कन्ध १५१ संसार जिनके द्वारा रचा गया है, वे ही जब प्रसन्न २६ होती हैं तब मनुष्योंके उद्धारके लिये वरदायिनी

होती हैं । २४-२६ ॥

वे ही सनातनी परमा विद्या हैं, संसारके बन्धन २७ एवं मुक्तिकी कारणस्वरूपा हैं और वे ही सभी ईश्वरोंकी भी स्वामिनी हैं ॥ २७ ॥

मैं, आप तथा समस्त संसार उन्हींकी चैतन्य २८ शक्तिसे उत्पन्न हुए हैं । हे ब्रह्मन्! हे निष्पाप! ऐसा आप सत्य जानिये, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २८ ॥

उन भगवतीने आधे श्लोकमें ही जो कहा है, २ ९ वही वास्तविक श्रीमद्देवीभागवत है । द्वापरयुगके आदिमें पुनः उसका विस्तार होगा ॥ २ ९ ॥ व्यासजी बोले – इस प्रकार भगवान् विष्णुके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माजीने उस भागवतका संग्रह किया । तत्पश्चात् उन्होंने अपने परम बुद्धिमान् ३० पुत्र नारदजीसे इसे कहा । पूर्वकालमें वही भागवत देवर्षि नारदजीने मुझे दिया और फिर मैंने उसे बारह स्कन्धोंमें विस्तृत करके पूर्ण किया ॥ ३०-३१ ॥ ३१ हे महाभाग! वेदतुल्य, पाँच लक्षणोंसे युक्त तथा भगवतीके उत्तम चरितोंसे ओत - प्रोत इस 4 श्रीमद्देवीभागवत ' पुराणको पढ़ो ॥ ३२ ॥

३२ तत्त्वज्ञानके रससे परिपूर्ण, वेदार्थके द्वारा उपबृंहित और धर्मशास्त्र के समान पुण्यप्रद यह भागवत सभी पुराणोंमें श्रेष्ठतम है । यह वृत्रासुरवधके ३३ कथानकसे युक्त, विविध आख्यानोपाख्यानोंसे समन्वित, ब्रह्मविद्याका निधान एवं भवसागर से पार करनेवाला है ॥ ३३-३४ ॥ ३४ अतः हे महाभाग! तुम उस भागवतको अवश्य पढ़ो; तुम अत्यन्त बुद्धिमान् और योग्य हो । हे नरश्रेष्ठ! यह श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण ३५ पुण्यप्रद है ॥ ३५ ॥

तुम इसके अठारह हजार श्लोकोंको हृदयंगम कर लो; यह पुराण पाठ तथा श्रवण करनेवालेके लिये ३६ अज्ञानका नाश करनेवाला, दिव्य ज्ञानरूपी सूर्यका बोध करानेवाला, सुखप्रद, शान्तिदायक, धन्य, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाला, कल्याणकारी तथा पुत्र-३७ पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ३६-३७ ॥