देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 251–260

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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२४२ हर्षशोकयुतास्ते वै निद्रालस्यसमन्विताः सप्तधातुमयास्तेषां देहाः किं वान्यथा मुने कैर्द्रव्यैर्निर्मितास्ते वै कैर्गुणैरिन्द्रियैस्तथा भोगश्च कीदृशस्तेषां प्रमाणमायुषस्तथा निवासस्थानमप्येषां विभूतिं च वदस्व मे श्रोतुमिच्छाम्यहं ब्रह्मन् विस्तरेण कथामिमाम् व्यास उवाच दुर्गमः प्रश्नभारोऽयं कृतो राजंस्त्वयाधुना ब्रह्मादीनां समुत्पत्तिः कस्मादिति महामते एतदेव मया पूर्व पृष्टोऽसौ नारदो मुनिः विस्मितः प्रत्युवाचेदमुत्थितः शृणु भूपते ॥ कस्मिंश्च समये चाहं गङ्गातीरे स्थितं मुनिम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ । हे मुने! क्या वे हर्ष, शोक आदि द्वन्द्वोंसे ॥ ८ युक्त हैं, क्या वे निद्रा एवं प्रमाद आदिसे प्रभावित हैं तथा क्या उनके शरीर सप्त धातुओं ( अन्नरस, । रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य ) - से निर्मित हैं अथवा नहीं? ॥ ८ ॥

॥ ९ वे किन द्रव्योंसे निर्मित हैं, वे किन - किन गुणको धारण करते हैं, उनमें कौन - कौन - सी इन्द्रियाँ । अवस्थित हैं, उनका भोग कैसा होता है तथा उनकी ॥ १० आयुका परिमाण क्या है? ॥९ ॥

इनके निवास - स्थान एवं विभूतियोंके भी विषयमें मुझको बतलाइये । हे ब्रह्मन्! इस कथाको । विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है ॥ १० ॥

व्यासजी बोले - हे महामति राजन्! ब्रह्मादि ॥ ११ देवोंकी उत्पत्ति किससे हुई, इस समय आपने यह बड़ा दुर्गम प्रश्न किया है ॥ ११ ॥

। हे राजन्! पूर्वमें मैंने यही प्रश्न देवर्षि नारदजीसे १२ पूछा था । तब विस्मित होकर वे उठ खड़े हुए और उन्होंने जो उत्तर दिया था, उसे आप सुनें ॥ १२ ॥

। किसी समय मैंने शान्त, सर्ववेत्ता तथा वेद-अपश्यं नारदं शान्तं सर्वज्ञं वेदवित्तमम् ॥ १३ विद्वानोंमें श्रेष्ठ नारदमुनिको गंगाके किनारे विद्यमान

दृष्ट्वाहं मुदितो भूत्वा पादयोरपतं मुनेः ।

तेनाज्ञप्तः समीपेऽस्य संविष्टश्च वरासने ॥

श्रुत्वा कुशलवार्तां वै तमपृच्छं विधेः सुतम् ।

निविष्टं जाह्नवीतीरे निर्जने सूक्ष्मबालुके ॥

मुनेऽतिविततस्यास्य ब्रह्माण्डस्य महामते ।

कः कर्ता परमः प्रोक्तस्तन्मे ब्रूहि विधानतः ॥

कस्मादेतत्समुत्पन्नं ब्रह्माण्डं मुनिसत्तम ।

अनित्यं वा तथा नित्यं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम ॥

एककर्तृकमेतद्वा बहुकर्तृकमन्यथा ।

अकर्तृकं न कार्यं स्याद्विरोधोऽयं विभाति मे ॥

देखा ॥१३ ॥

मुनिको देखकर तथा प्रसन्न होकर मैं उनके चरणोंपर गिर पड़ा । तदनन्तर उनके द्वारा आज्ञा देनेपर १४ मैं उनके पासमें ही एक सुन्दर आसनपर बैठ गया ॥ १४ ॥

कुशल - क्षेमकी वार्ता सुन करके सूक्ष्म बालूवाले गंगा - तटके निर्जन स्थानपर बैठे हुए बह्मापुत्र देवर्षि १५ नारदसे मैंने पूछा- ॥१५ ॥

हे महामति मुनिदेव! इस अति विस्तीर्ण ब्रह्माण्डका प्रधान कर्ता कौन कहा गया है? उसे आप १६ मुझे सम्यक् रूपसे बताइये ॥ १६ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति किससे हुई है? हे विप्रवर! आप मुझे यह भी बताइये कि यह ब्रह्माण्ड नित्य है अथवा अनित्य? ॥ १७ ॥

१७ यह ब्रह्माण्ड किसी एकके द्वारा विरचित है अथवा अनेक कर्ताओं द्वारा मिलकर इसका निर्माण किया गया

है? किसी कर्ता बिना कार्यकी सत्ता सम्भव नहीं है ।

१८ । इस विषयमें मुझे अत्यन्त सन्देह हो रहा है ॥ १८ ॥

पृष्ठ 252

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अ ० १ ]

इति सन्देहसन्दोहे मग्नं मां तारयाधुना ।

विकल्पकोटीः कुर्वाणं संसारेऽस्मिन् प्रविस्तरे ॥

ब्रुवन्ति शङ्करं केचिन्मत्वा कारणकारणम् ।

सदाशिवं महादेवं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम् ॥

आत्मारामं सुरेशं च त्रिगुणं निर्मलं हरम् ।

संसारतारकं नित्यं सृष्टिस्थित्यन्तकारणम् ॥

अन्ये विष्णुं स्तुवन्त्येनं सर्वेषां प्रभुमीश्वरम् ।

परमात्मानमव्यक्तं सर्वशक्तिसमन्वितम् ॥

भुक्तिदं मुक्तिदं शान्तं सर्वादिं सर्वतोमुखम् ।

व्यापकं विश्वशरणमनादिनिधनं हरिम् ॥

धातारं च तथा चान्ये ब्रुवन्ति सृष्टिकारणम् ।

तमेव सर्ववेत्तारं सर्वभूतप्रवर्तकम् ॥

चतुर्मुखं सुरेशानं नाभिपद्मभवं विभुम् ।

स्त्रष्टारं सर्वलोकानां सत्यलोकनिवासिनम् ॥

दिनेशं प्रवदन्त्यन्ये सर्वेशं वेदवादिनः ।

स्तुवन्ति चैव गायन्ति सायं प्रातरतन्द्रिताः ॥

यजन्ति च तथा यज्ञे वासवं च शतक्रतुम् ।

सहस्राक्षं देवदेवं सर्वेषां प्रभुमुल्वणम् ॥

यज्ञाधीशं सुराधीशं त्रिलोकेशं शचीपतिम् ।

यज्ञानां चैव भोक्तारं सोमपं सोमपप्रियम् ॥

वरुणं च तथा सोमं पावकं पवनं तथा ।

यमं कुबेरं धनदं गणाधीशं तथापरे ॥

हेरम्बं गजवक्त्रं च सर्वकार्यप्रसाधकम् ।

स्मरणात्सिद्धिदं कामं कामदं कामगं परम् ॥

तृतीय स्कन्ध २४३ इस प्रकार इस विस्तृत ब्रह्माण्डके विषयमें १ ९ विविध कल्पना करते हुए तथा सन्देहसागरमें डूबते हुए मुझ दुःखीका आप उद्धार कीजिये ॥ १ ९ ॥ कुछ लोग सदाशिव, महादेव, प्रलय तथा २० उत्पत्तिसे रहित, आत्माराम, देवेश, त्रिगुणात्मक, निर्मल, हर, संसारसे उद्धार करनेवाले, नित्य तथा सृष्टि-पालन - संहार करनेवाले भगवान् शंकरको ही मूल २१ कारण मानकर उन्हें ही इस ब्रह्माण्डका रचयिता कहते हैं ॥ २०-२१ ॥ दूसरे लोग श्रीहरि विष्णुको सबका प्रभु, ईश्वर, २२ | परमात्मा, अव्यक्त, सर्वशक्तिसम्पन्न, भोग तथा मोक्षप्रदाता, शान्त, सबका आदि, सर्वतोमुख, व्यापक, समग्र संसारको शरण देनेवाला तथा आदि - अन्तसे रहित २३ जानकर उन्हींका स्तवन करते हैं ॥ २२-२३ । अन्य लोग ब्रह्माजीको सृष्टिका कारण, सर्वज्ञ, सभी प्राणियोंका प्रवर्तक, चार मुखोंवाला, २४ सुरपति, विष्णुके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत, सर्वव्यापी, सभी लोकोंकी रचना करनेवाला तथा सत्यलोकमें निवास करनेवाला बताते हैं । २४-२५ ॥ २५ कुछ वेदवेत्ता विद्वान् सर्वेश्वर भगवान् सूर्यको ब्रह्माण्डकर्ता मानते हैं और सावधान होकर सायं-प्रात: उन्हींकी स्तुति करते हैं तथा उन्हींका यशोगान २६ करते हैं ॥ २६ ॥

यज्ञमें निष्ठाभाव रखनेवाले लोग धनप्रदाता, शतक्रतु, सहस्राक्ष, देवाधिदेव, सबके स्वामी, बलशाली, २७ यज्ञाधीश, सुरपति, त्रिलोकेश, यज्ञोंका भोग करनेवाले, सोमपान करनेवाले तथा सोमपायी लोगोंके प्रिय शचीपति इन्द्रको [ सर्वश्रेष्ठ मानकर ] यज्ञोंमें उन्हींका २८ यजन करते हैं ॥ २७-२८ ॥ कुछ लोग वरुण, सोम, अग्नि, पवन, यमराज, धनपति कुबेरकी तथा कुछ लोग हेरम्ब, गजमुख, २ ९ सर्वकार्यसाधक, स्मरणमात्रसे सिद्धि प्रदान करनेवाले, कामस्वरूप, कामनाओंको प्रदान करनेवाले, स्वेच्छ विचरण करनेवाले, परम देव गणाधीश गणेशकी ३० | स्तुति करते हैं ॥ २ ९ -३० ॥

पृष्ठ 253

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२४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १

भवानीं केचनाचार्याः प्रवदन्त्यखिलार्थदाम् ।

आदिमायां महाशक्तिं प्रकृतिं पुरुषानुगाम् ॥ ३१

ब्रह्मैकतासमापन्नां सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम् ।

मातरं सर्वभूतानां देवतानां तथैव च ॥ ३२

अनादिनिधनां पूर्णां व्यापिकां सर्वजन्तुषु ।

ईश्वरीं सर्वलोकानां निर्गुणां सगुणां शिवाम् ॥ ३३

वैष्णवीं शाङ्करीं ब्राह्मीं वासवीं वारुणीं तथा ।

वाराहीं नारसिंहीं च महालक्ष्मीं तथाद्भुताम् ॥ ३४

वेदमातरमेकां च विद्यां भवतरोः स्थिराम् ।

सर्वदुःखनिहन्त्रीं च स्मरणात्सर्वकामदाम् ॥ ३५

मोक्षदां च मुमुक्षूणां कामदां च फलार्थिनाम् ।

त्रिगुणातीतरूपां च गुणविस्तारकारकाम् ॥ ३६

निर्गुणां सगुणां तस्मात्तां ध्यायन्ति फलार्थिनः ।

निरञ्जनं निराकारं निर्लेपं निर्गुणं किल ॥ ३७

अरूपं व्यापकं ब्रह्म प्रवदन्ति मुनीश्वराः ।

वेदोपनिषदि प्रोक्तस्तेजोमय इति क्वचित् ॥ ३८

सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्रनयनस्तथा ।

सहस्रकरकर्णश्च सहस्त्रास्यः सहस्रपात् ॥ ३ ९

विष्णोः पादमथाकाशं परमं समुदाहृतम् ।

विराजं विरजं शान्तं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ४०

पुरुषोत्तमं तथा चान्ये प्रवदन्ति पुराविदः ।

नैकोऽपीति वदन्त्यन्ये प्रभुरीशः कदाचन ॥ ४१

अनीश्वरमिदं सर्वं ब्रह्माण्डमिति केचन ।

न कदापीशजन्यं यज्जगदेतदचिन्तितम् ॥ ४२

सदैवेदमनीशं च स्वभावोत्थं सदेदृशम् ।

अकर्तासौ पुमान्प्रोक्तः प्रकृतिस्तु तथा च सा ॥ ४३ ।

एवं वदन्ति सांख्याश्च मुनयः कपिलादयः । कुछ आचार्य भवानीको ही सब कुछ देनेवाली, आदिमाया, महाशक्ति तथा पुरुषानुगामिनी परा प्रकृति कहते हैं । वे उनको ब्रह्मस्वरूपा, सृजन - पालन - संहार करनेवाली, सभी प्राणियों एवं देवताओंकी जननी, आदि - अन्तरहित, पूर्णा, सभी जीवोंमें व्याप्त, सभी लोकोंकी स्वामिनी, निर्गुणा, सगुणा तथा कल्याणस्वरूपा मानते हैं ॥ ३१–३३ ॥ फलकी आकांक्षा रखनेवाले उन भवानीका वैष्णवी, शांकरी, ब्राह्मी, वासवी, वारुणी, वाराही, नारसिंही, महालक्ष्मी, विचित्ररूपा, वेदमाता, एकेश्वरी, विद्यास्वरूपा, संसाररूपी वृक्षकी स्थिरताकी कारणरूपा, सभी कष्टोंका नाश करनेवाली और स्मरण करते ही सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, मुक्ति चाहने-वालोंके लिये मोक्षदायिनी, फलकी अभिलाषा रखनेवालोंके लिये कामप्रदायिनी, त्रिगुणातीतस्वरूपा, गुणों का विस्तार करनेवाली, निर्गुणा - सगुणा- रूपमें ध्यान करते हैं ॥ ३४–३६३ ॥ कुछ मुनीश्वर निरंजन, निराकार, निर्लिप्त, गुणरहित, रूपरहित तथा सर्वव्यापक ब्रह्मको जगत्‌का कर्ता बतलाते हैं । वेदों तथा उपनिषदोंमें कहीं - कहीं उसे अनन्त सिर, नेत्र, हाथ, कान, मुख और चरणसे युक्त तेजोमय विराट् पुरुष कहा गया है ॥ ३७–३९ ॥ कुछ मनीषीगण आकाशको विष्णुके परम पादके रूपमें मानते हैं और उन्हें विराट्, निरंजन तथा शान्तस्वरूप कहते हैं ॥ ४० ॥

कुछ तत्त्वज्ञानी पुराणवेत्ता पुरुषोत्तमको सृष्टिका निर्माता कहते हैं । कुछ लोग कहते हैं कि इस अनन्त ब्रह्माण्डकी रचनामें केवल एक ईश्वर कदापि समर्थ नहीं हो सकता है ॥ ४१ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि यह जगत् अचिन्त्य है, अतः यह ईश्वररचित कदापि नहीं हो सकता; उनके मतमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ईश्वररहित है । ' यह जगत् सदासे ही ईश्वरीय सत्तासे रहित रहा है और यह स्वभावसे उत्पन्न होता है तथा सदासे ऐसा ही है । यह पुरुष तो कर्तृत्वभावसे रहित कहा गया है और वह प्रकृति ही सर्वसंचालिका है'-कपिल आदि सांख्यशास्त्रके आचार्य ऐसा ही कहते हैं ॥ ४२-४३३ ॥

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अ ० २ ] एते सन्देहसन्दोहाः प्रभवन्ति तथापरे विकल्पोपहतं चेतः किं करोमि मुनीश्वर धर्माधर्मविवक्षायां न मनो मे स्थिरं भवेत् को धर्मः कीदृशोऽधर्मश्चिह्नं नैवोपलभ्यते देवाः सत्त्वगुणोत्पन्नाः सत्यधर्मव्यवस्थिताः पीड्यन्ते दानवैः पापैः कुत्र धर्मव्यवस्थितिः धर्मस्थिताः सदाचाराः पाण्डवा मम वंशजाः दुःखं बहुविधं प्राप्तास्तत्र धर्मस्य का स्थितिः अतो मे हृदयं तात वेपतेऽतीव संशये कुरु मे संशयं चेतः समर्थोऽसि महामुने त्राहि संसारवार्धेस्त्वं ज्ञानपोतेन मां मुने मज्जन्तं चोत्पतन्तं च मग्नं मोहजलाविले तृतीय स्कन्ध २४५ ॥ ४४ हे मुनिनाथ! मेरे मनमें ये तथा अन्य प्रकारके और भी सन्देहपुंज उत्पन्न होते रहते हैं । नाना । प्रकारकी कल्पनाओंसे उद्विग्न मनवाला मैं क्या करूँ? धर्म तथा अधर्म विषयमें मेरा मन स्थिर नहीं हो ॥ ४५ पाता है॥४४-४५ ॥ । क्या धर्म है और क्या अधर्म है; इसका कोई स्पष्ट लक्षण प्राप्त नहीं होता है । लोग कहते हैं कि ॥ ४६ देवता सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुए हैं और वे सत्यधर्ममें स्थित रहते हैं फिर भी वे देवगण पापाचारी दानवोंद्वारा । प्रताड़ित किये जाते हैं, तो फिर धर्मकी व्यवस्था कहाँ ॥ ४७ रह गयी? धर्मनिष्ठ और सदाचारी मेरे वंशज पाण्डव भी नाना प्रकारके कष्ट सहनेको विवश हुए, ऐसी । स्थितिमें धर्मकी क्या मर्यादा रह गयी? अतः हे तात! इस संशयमें पड़ा हुआ मेरा मन अतीव चंचल रहता ॥ ४८ है ॥ ४६–४८ ॥ हे महामुने! आप सर्वसमर्थ हैं, अतः मेरे । हृदयको संशयमुक्त कीजिये | हे मुने! संसार - सागरके ॥ ४ ९ मोहसे दूषित जलमें गिरे हुए तथा बार - बार डूबते-उतराते मुझ अज्ञानीकी अपने ज्ञानरूपी जहाजसे ॥ ५० | रक्षा कीजिये ॥ ४ ९ -५० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे भुवनेश्वरीवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः भगवती आद्याशक्तिके प्रभावका वर्णन व्यास उवाच

यत्त्वया च महाबाहो पृष्टोऽहं कुरुसत्तम ।

तान्प्रश्नान्नारदः प्राह मया पृष्टो मुनीश्वरः ॥

नारद उवाच

व्यास किं ते ब्रवीम्यद्य पुरायं संशयो मम ।

उत्पन्नो हृदयेऽत्यर्थं सन्देहासारपीडितः ॥

गत्वाहं पितरं स्थाने ब्रह्माणममितौजसम् ।

अपृच्छं यत्त्वया पृष्टं व्यासाद्य प्रश्नमुत्तमम् ॥

व्यासजी बोले - हे महाबाहो! हे कुरुश्रेष्ठ! आपने मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उन्हीं प्रश्नोंको मेरेद्वारा १ मुनिराज नारदजीसे पूछे जानेपर उन्होंने इस विषयमें ऐसा कहा था ॥ १ ॥

नारदजी बोले – हे व्यासजी! मैं आपसे इस समय क्या कहूँ? प्राचीन कालमें यही शंका मेरे भी मनमें उत्पन्न हुई थी और सन्देहकी बहुलतासे मेरा २ मन उद्वेलित हो गया था ॥२ ॥

हे व्यासजी! तदनन्तर मैंने ब्रह्मलोकमें अपने अमित तेजस्वी पिता ब्रह्माजीके पास पहुँचकर यही प्रश्न पूछा ३ था, जो उत्तम प्रश्न आपने आज मुझसे पूछा है ॥ ३ ॥

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२४६

पितः कुतः समुत्पन्नं ब्रह्माण्डमखिलं विभो ।

भवत्कृतेन वा सम्यक् किं वा विष्णुकृतं त्विदम् ॥

रुद्रकृतं वा विश्वात्मन् ब्रूहि सत्यं जगत्पते ।

आराधनीयः कः कामं सर्वोत्कृष्टश्च कः प्रभुः ॥

तत्सर्वं वद मे ब्रह्मन्सन्देहांश्छिन्धि चानघ ।

निमग्नो ह्यस्मि संसारे दुःखरूपेऽनृतोपमे ॥

सन्देहान्दोलितं चेतो न प्रशाम्यति कुत्रचित् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ [ मैंने पूछा— ] हे पिताजी! इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका ४ आविर्भाव कैसे हुआ? हे विभो! इसका निर्माण आपने किया है अथवा विष्णुने अथवा शिवने इसकी रचना की है? हे विश्वात्मन्! मुझे सही - सही बताइये । हे जगत्पते! सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन है और ५ किसकी आराधना की जानी चाहिये? ॥ ४-५ ॥ हे ब्रह्मन्! वह सब कुछ बताइए और मेरे सन्देहों को दूर कीजिये । हे निष्पाप! मैं असत्य तथा ६ दुःखरूप संसारमें डूबा हुआ हूँ ॥६ ॥

सन्देहोंसे दोलायमान मेरा मन तीर्थोंमें, देवताओंमें तथा अन्य साधनोंमें - कहीं भी शान्त नहीं हो पा न तीर्थेषु न देवेषु साधनेष्वितरेषु च ॥ रहा है ॥७ ॥

अविज्ञाय परं तत्त्वं कुतः शान्तिः परन्तप ।

विकीर्णं बहुधा चित्तं नैकत्र स्थिरतां व्रजेत् ॥

कं स्मरामि यजे कं वा कं व्रजाम्यर्चयामि कम् ।

स्तौमि कं नाभिजानामि देवं सर्वेश्वरेश्वरम् ॥

ततो तां प्रत्युवाचेदं ब्रह्मा लोकपितामहः ।

मया सत्यवतीसूनो कृते प्रश्ने सुदुस्तरे ॥

ब्रह्मोवाच

किं ब्रवीमि सुताद्याहं दुर्बोधं प्रश्नमुत्तमम् ।

त्वयाशक्यं महाभाग विष्णोरपि सुनिश्चयात् ॥

रागी को s पि न जानाति संसारेऽस्मिन्महामते ।

विरक्तश्च विजानाति निरीहो यो विमत्सरः ॥

एकार्णवे पुरा जाते नष्टे स्थावरजङ्गमे ।

भूतमात्रे समुत्पन्ने सञ्जज्ञे कमलादहम् ॥

नापश्यं तरणिं सोमं न वृक्षान्न च पर्वतान् ।

कर्णिकायां समाविष्टश्चिन्तामकरवं तदा ॥

हे परन्तप! परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त किये बिना शान्ति मिल भी कैसे सकती है? अनेक प्रकारसे उलझा हुआ मेरा मन एक जगह स्थिर नहीं हो पा रहा है ॥ ८ ॥

८ मैं किसका स्मरण करूँ, किसका यजन करूँ, कहाँ जाऊँ, किसकी अर्चना करूँ और किसकी स्तुति करूँ? हे देव! मैं तो उस सर्वेश्वर परमात्माको जानता भी नहीं हूँ ॥९ ॥

हे सत्यवतीतनय व्यासजी! मेरे द्वारा किये गये दुरूह प्रश्नोंको सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने तब १० मुझसे ऐसा कहा - ॥१० ॥

ब्रह्माजी बोले – हे पुत्र! तुमने आज एक दुरूह तथा उत्तम प्रश्न किया है, उसके विषयमें मैं क्या कहूँ? हे महाभाग! साक्षात् विष्णुद्वारा भी इन प्रश्नोंका निश्चित उत्तर दिया जाना सम्भव नहीं है ॥ ११ ॥

११ हे महामते! इस संसारके क्रियाकलापोंमें आसक्त कोई भी ऐसा नहीं है, जो इस तत्त्वका ज्ञान रखता हो । कोई विरक्त, निःस्पृह तथा विद्वेषरहित ही इसे १२ जान सकता है ॥ १२ ॥

प्राचीन कालमें जल - प्रलयके होनेपर स्थावर-जंगमादिक प्राणियोंके नष्ट हो जाने तथा मात्र पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति होनेपर मैं कमलसे आविर्भूत १३ हुआ ॥ १३ ॥

उस समय मैंने सूर्य, चन्द्र, वृक्षों तथा पर्वतोंको नहीं देखा और कमलकर्णिकापर बैठा हुआ मैं विचार १४ | करने लगा -॥१४ ॥

पृष्ठ 256

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अ ० २ ]

कस्मादहं समुद्भूतः सलिलेऽस्मिन्महार्णवे ।

को मे त्राता प्रभुः कर्ता संहर्ता वा युगात्यये ॥

न च भूर्विद्यते स्पष्टा यदाधारं जलं त्विदम् ।

पङ्कजं कथमुत्पन्नं प्रसिद्धं रूढियोगयोः ॥

पश्याम्यद्यास्य पङ्कं तं मूलं वै पङ्कजस्य च ।

भविष्यति धरा तत्र मूलं नास्त्यत्र संशयः ॥

उत्तरन्सलिले तत्र यावद्वर्षसहस्त्रकम् ।

अन्वेषमाणो धरणीं नावाप तां यदा तदा ॥

तपस्तपेति चाकाशे वागभूदशरीरिणी ।

ततो मया तपस्तप्तं पद्मे वर्षसहस्त्रकम् ॥

सृजेति पुनरुद्भूता वाणी तत्र श्रुता मया ।

विमूढोऽहं तदाकर्ण्य कं सृजामि करोमि किम् ॥

तदा दैत्यावपि प्राप्तौ दारुणौ मधुकैटभौ ।

ताभ्यां विभीषितश्चाहं युद्धाय मकरालये ॥

ततोऽहं नालमालम्ब्य वारिमध्यमवातरम् ।

तदा तत्र मया दृष्टः पुरुषः परमाद्भुतः ॥

मेघश्यामशरीरस्तु पीतवासाश्चतुर्भुजः ।

शेषशायी जगन्नाथो वनमालाविभूषितः ॥

शङ्खचक्रगदापद्माद्यायुधैः सुविराजितः ।

तमद्राक्षं महाविष्णुं शेषपर्यङ्कशायिनम् ॥

योगनिद्रासमाक्रान्तमविस्पन्दिनमच्युतम् 1 शयानं तं समालोक्य भोगिभोगोपरि स्थितम् ॥

चिन्ता ममाद्भुता जाता किं करोमीति नारद ।

मया स्मृता तदा देवी स्तुता निद्रास्वरूपिणी ॥

तृतीय स्कन्ध २४७ इस महासागरके जलमें मेरा प्रादुर्भाव किससे १५ हुआ? मेरा निर्माण करनेवाला, रक्षा करनेवाला तथा युगान्तके समय संहार करनेवाला प्रभु कौन है? ॥ १५ ॥

कहीं भूमि भी स्पष्ट दिखायी नहीं दे रही है, जिसके आधारपर यह जल टिका है तो फिर यह १६ कमल कैसे उत्पन्न हुआ, जिसकी उत्पत्ति जल और पृथ्वी संयोगसे ही प्रसिद्ध है? ॥१६ ॥

आज मैं इस कमलका मूल आधार पंक अवश्य १७ देखूँगा; और फिर उस पंककी आधारस्वरूपा भूमि भी अवश्य मिल जायगी, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १७ ॥

तदनन्तर मैं जलमें नीचे उतरकर हजार वर्षोंतक १८ | पृथ्वीको खोजता रहा, किंतु जब उसे नहीं पाया तब आकाशवाणी हुई कि ‘ तपस्या करो ' । तत्पश्चात् मैं उसी कमलपर आसीन होकर हजार वर्षोंतक घोर १ ९ तपस्या करता रहा ॥ १८-१९ ॥ इसके बाद पुनः एक अन्य वाणी उत्पन्न हुई-' सृष्टि करो ', इसे मैंने साफ - साफ सुना । उसे सुनकर व्याकुल चित्तवाला मैं सोचने लगा, किसका सृजन २० करूँ और किस प्रकार करूँ? ॥२० ॥

उसी समय मधु - कैटभ नामवाले दो भयानक दैत्य मेरे सम्मुख आ गये । उस महासागरमें युद्धके लिये तत्पर २१ उन दोनों दैत्योंसे मैं अत्यधिक भयभीत हो गया ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् मैं उसी कमलकी नालका आश्रय लेकर जलके भीतर उतरा और वहाँ एक अत्यन्त २२ अद्भुत पुरुषको मैंने देखा ॥ २२ ॥

उनका शरीर मेघके समान श्याम वर्णवाला था । वे पीत वस्त्र धारण किये हुए थे और उनकी चार २३ भुजाएँ थीं । वे जगत्पति वनमालासे अलंकृत थे तथा शेषशय्यापर सो रहे थे ॥ २३ ॥

वे शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि आयुध धारण किये हुए थे । इस प्रकार मैंने शेषनागकी शय्या पर २४ शयन करते हुए उन महाविष्णुको देखा ॥ २४ ॥

हे नारदजी! योगनिद्राके वशीभूत होनेके कारण निष्पन्द पड़े उन भगवान् अच्युतको शेषनागके ऊपर २५ सोया हुआ देखकर मुझे अद्भुत चिन्ता हुई और मैं | सोचने लगा कि अब क्या करूँ? तब मैंने निद्रास्वरूपा भगवतीका स्मरण किया और मैं उनकी स्तुति करने २६ | लगा ॥ २५-२६ ॥

पृष्ठ 257

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२४८ देहान्निर्गत्य सा देवी गगने संस्थिता शिवा अवितर्क्यशरीरा सा दिव्याभरणमण्डिता विष्णोर्देहं विहायाशु विरराज नभः स्थिता उदतिष्ठदमेयात्मा तया मुक्तो जनार्दनः पञ्चवर्षसहस्त्राणि कृतवान्युद्धमुत्तमम् तदा विलोकितौ दैत्यौ हरिणा विनिपातितौ उत्सङ्गं विपुलं कृत्वा तत्रैव निहतौ च तौ रुद्रस्तत्रैव सम्प्राप्तो यत्रावां संस्थितावुभौ त्रिभिः संवीक्षितास्माभिः स्वस्था देवी मनोहरा संस्तुता परमा शक्तिरुवाचास्मानवस्थितान् कृपावलोकनैः कृत्वा पावनैर्मुदितानथ देव्युवाच काजेशाः स्वानि कार्याणि कुरुध्वं समतन्द्रिताः सृष्टिस्थितिविशिष्टानि हतावेतौ महासुरौ । कृत्वा स्वानि निकेतानि वसध्वं विगतज्वराः प्रजाश्चतुर्विधाः सर्वाः सृजध्वं स्वविभूतिभिः । ब्रह्मोवाच तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः पेशलं सुखदं मृदु

अब्रूम तामशक्ताः स्मः कथं कुर्मस्त्विमाः प्रजाः ।

न मही वितता मातः सर्वत्र विततं जलम् ॥

न भूतानि गुणाश्चापि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च ।

तदाकर्ण्य वचोऽस्माकं शिवा जाता स्मितानना ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ । [ मेरी स्तुतिसे ] वे कल्याणी भगवती विष्णु-॥ २७ भगवान्‌के शरीरसे निकलकर आकाशमें विराजमान हुईं । उस समय दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत वे भगवती कल्पनाओंसे परे विग्रहवाली प्रतीत हो

रही थीं ॥ २७ ॥

॥ २८ इस प्रकार विष्णुका शरीर तत्काल छोड़कर जब वे आकाशमें विराजित हो गयीं, तब उनके द्वारा मुक्त । किये गये अनन्तात्मा वे जनार्दन उठ गये ॥ २८ ॥

॥ २ ९ तत्पश्चात् उन्होंने पाँच हजार वर्षोंतक उन दैत्योंके साथ घोर युद्ध किया । पुनः उन महामाया भगवतीके दृष्टिपातसे मोहित किये गये उन दोनों । दैत्योंको भगवान् विष्णुने मार दिया । अपनी जाँघोंको ॥ ३० विस्तृत करके भगवान् विष्णुने उसीपर उन दोनोंका वध किया । उसी समय जहाँ हम दोनों थे, वहीं पर । शंकरजी भी आ गये ॥ २ ९ -३० ॥ तब हम तीनोंने गगन - मण्डलमें विराजमान ॥ ३१ उन मनोहर देवीको देखा । हमलोगोंके द्वारा उन परम शक्तिकी स्तुति किये जानेपर अपनी पवित्र कृपादृष्टिसे | हमलोगोंको प्रसन्न करके उन्होंने वहाँ स्थित हमलोगोंसे कहा— ॥ ३१‍ ॥ देवी बोलीं- हे ब्रह्मा, विष्णु, महेश! अब ॥ ३२ आपलोग सृष्टि, पालन एवं संहारके अपने - अपने कार्य प्रमादरहित होकर कीजिये । अब आपलोग अपना - अपना निवास बनाकर निर्भीकतापूर्वक रहिये; ॥ ३३ क्योंकि उन दोनों महादैत्योंका संहार हो गया है । अतः आपलोग अपनी विभूतियोंसे अण्डज, पिण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज - चारों प्रकारकी सभी प्रजाओंका सृजन कीजिये ॥ ३२-३३३ ॥ ब्रह्माजी बोले- उन भगवतीका वह मनोहर, ॥ ३४ सुखकर तथा मधुर वचन सुनकर हमलोगोंने उनसे कहा - हे माता! हमलोग शक्तिहीन हैं, अतः इन प्रजाओंका सृजन कैसे करें? अभी विस्तृत पृथ्वी ही नहीं है और सभी ओर जल - ही - जल फैला हुआ है । ३५ सृष्टिकार्यके लिये आवश्यक पंचतत्त्व, गुण, तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ - ये कुछ भी नहीं हैं । हमलोगों के ये वचन सुनकर भगवतीका मुखमण्डल मुसकानसे भर ३६ | उठा ॥ ३४-३६ ॥

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अ ० ३ ] झटित्येवागतं तत्र विमानं गगनाच्छुभम् । सोवाचास्मिन्सुराः कामं विशध्वं गतसाध्वसाः

विमाने ब्रह्मविष्ण्वीशा दर्शयाम्यद्य चाद्भुतम् ।

तन्निशम्य वचस्तस्या ओमित्युक्त्वा पुनर्वयम् ॥

समारुह्योपविष्टाः स्मो विमाने रत्नमण्डिते ।

मुक्तादामसुसंवीते किंकिणीजालशब्दिते ॥

सुरसद्मनिभे रम्ये त्रयस्तत्राविशंकिताः ।

सोपविष्टांस्ततो दृष्ट्वा देव्यस्मान्विजितेन्द्रियान् ॥

स्वशक्त्या तद्विमानं वै नोदयामास चाम्बरे तृतीय स्कन्ध २४ ९ उसी समय वहाँ आकाशसे एक रमणीक विमान ॥ ३७ आ पहुँचा । तत्पश्चात् उन भगवतीने कहा – हे देवताओ! आप लोग निर्भीक होकर इस विमान में इच्छानुसार बैठ जायँ ॥ ३७ ॥

३८ हे ब्रह्मा, विष्णु और शिव! मैं आपलोगोंको आज इस विमानमें एक अद्भुत दृश्य दिखाऊँगी । उनका यह वचन सुनकर हम तीनों उनकी बात स्वीकार करके ३ ९ रत्नजटित, मोतियोंकी झालरोंसे शोभायमान, घंटियोंकी ध्वनिसे गुंजित तथा देव - भवनके तुल्य उस रमणीक विमानपर संशयरहित भावसे चढ़कर बैठ गये । तब ४० भगवतीने हम जितेन्द्रिय देवताओंको बैठा हुआ देखकर उस विमानको अपनी शक्तिसे आकाशमण्डलमें || ४१ | उड़ाया ॥ ३८ - ४१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विमानेन ब्रह्मादीनाङ्गतिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः ब्रह्मा, विष्णु और महेशका विभिन्न लोकोंमें जाना तथा अपने ही सदृश अन्य ब्रह्मा, विष्णु और महेशको देखकर आश्चर्यचकित होना, देवीलोकका दर्शन ब्रह्मोवाच

विमानं तन्मनोवेगं यत्र स्थानान्तरे गतम् ।

न जलं तत्र पश्यामो विस्मिताः स्मो वयं तदा ॥

वृक्षाः सर्वफला रम्याः कोकिलारावमण्डिताः ।

मही महीधराः कामं वनान्युपवनानि च ॥

नार्यश्च पुरुषाश्चैव पशवश्च सरिद्वराः ।

वाप्यः कूपास्तडागाश्च पल्वलानि च निर्झराः ॥

पुरतो नगरं रम्यं दिव्यप्राकारमण्डितम् ।

यज्ञशालासमायुक्तं नानाहर्म्यविराजितम् ॥

प्रत्यभिज्ञा तदा जाताप्यस्माकं प्रेक्ष्य तत्पुरम् ।

स्वर्गोऽयमिति केनासौ निर्मितोऽस्ति तदाद्भुतम् ॥

ब्रह्माजी बोले – मनके समान वेगसे उड़नेवाला वह विमान जिस स्थानपर पहुँचा, वहाँ जब हमने जल नहीं देखा तब हमलोगोंको महान् आश्चर्य हुआ ॥ १ ॥

१ उस स्थानके वृक्ष सभी प्रकारके फलोंसे लदे हुए और कोकिलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजायमान थे । वहाँकी भूमि, पर्वत, वन और उपवन - ये सभी सुरम्य २ दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २ ॥

उस स्थानपर स्त्रियाँ, पुरुष, पशु, बड़ी नदियाँ, बावलियाँ, कुएँ, तालाब, पोखरे तथा झरने ३ इत्यादि विद्यमान थे ॥ ३ ॥

वहाँ भव्य चहारदीवारीसे घिरा हुआ एक मनोहर नगर था, जो यज्ञशालाओं तथा अनेक प्रकारके दिव्य महलोंसे सुशोभित था ॥ ४ ॥

४ तब उस नगरको देखकर हमलोगोंको ऐसी प्रतीति हुई, मानो यही स्वर्ग है और फिर हम लोगोंकी यह जिज्ञासा हुई कि इस अद्भुत नगरका निर्माण किसने किया है, ५ उस समय हमलोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ! ॥ ५ ॥

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२५०

राजानं देवसङ्काशं व्रजन्तं मृगयां वने ।

अस्माभिः संस्थिता दृष्टा विमानोपरि चाम्बिका ॥

क्षणाच्चचाल गगने विमानं पवनेरितम् ।

मुहूर्ताद्वा ततः प्राप्तं देशे चान्ये मनोहरे ॥

नन्दनं च वनं तत्र दृष्टमस्माभिरुत्तमम् ।

पारिजाततरुच्छायासंश्रिता सुरभिः स्थिता ॥

चतुर्दन्तो गजस्तस्याः समीपे समवस्थितः ।

अप्सरसां तत्र वृन्दानि मेनकाप्रभृतीनि च ॥

क्रीडन्ति विविधैर्भावैर्गाननृत्यसमन्वितैः ।

गन्धर्वाः शतशस्तत्र यक्षा विद्याधरास्तथा ॥

मन्दारवाटिकामध्ये गायन्ति च रमन्ति च ।

दृष्टः शतक्रतुस्तत्र पौलोम्या सहितः प्रभुः ॥

वयं तु विस्मिताश्चास्म दृष्ट्वा त्रैविष्टपं तदा ।

यादः पतिं कुबेरं च यमं सूर्यं विभावसुम् ॥

विलोक्य विस्मिताश्चास्म वयं तत्र सुरान्स्थितान् ।

तदा विनिर्गतो राजा पुरात्तस्मात्सुमण्डितात् ॥

देवराज इवाक्षोभ्यो नरवाह्यावनौ स्थितः ।

विमानस्था वयं तच्च चचाल तरसागतम् ॥

ब्रह्मलोकं तदा दिव्यं सर्वदेवनमस्कृतम् ।

तत्र ब्रह्माणमालोक्य विस्मितौ हरकेशव ॥

सभायां तत्र वेदाश्च सर्वे साङ्गाः स्वरूपिणः ।

सागराः सरितश्चैव पर्वताः पन्नगोरगाः ॥

मामूचतुश्चतुर्वक्त्र कोऽयं ब्रह्मा सनातनः ।

ताववोचमहं नैव जाने सृष्टिपतिं पतिम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ हमलोगोंने आखेटके उद्देश्यसे वनमें जाते हुए ६ । एक देवतुल्य राजाको देखा । उसी समय हमलोगोंको जगदम्बा भगवती भी विमानपर स्थित दिखायी पड़ीं ॥ ६ ॥

थोड़ी ही देर बाद हमारा विमान वायुसे प्रेरित ७ होकर आकाशमें पुनः उड़ने लगा और मुहूर्त भरमें वह पुनः एक अन्य सुरम्य देशमें पहुँच गया ॥ ७ ॥

वहाँपर हमलोगोंको अत्यन्त रमणीक नन्दनवन दृष्टिगत हुआ, जिसमें पारिजातवृक्षकी छायाका आश्रय ८ लिये कामधेनु स्थित थी ॥ ८ ॥

कामधेनुके समीप ही चार दाँतोंवाला ऐरावत हाथी विद्यमान था और वहाँ मेनका आदि अप्सराओंके ९ समूह अपने नृत्यों तथा गानोंमें विविध भाव - भंगिमाओंका प्रदर्शन करते हुए अनेक प्रकारकी क्रीडाएँ कर रहे थे । वहाँ मन्दार - वृक्षकी वाटिकाओं में सैकड़ों गन्धर्व, १० यक्ष और विद्याधर गा रहे थे और रमण कर रहे थे । वहाँपर इन्द्रभगवान् भी इन्द्राणीके साथ दृष्टिगोचर हुए ॥ ९ –११ ॥ ११ स्वर्गमें निवास करनेवाले देवताओंको देखकर हमें परम विस्मय हुआ । वहाँपर वरुण, कुबेर, यम, सूर्य, अग्नि तथा अन्य देवताओंको स्थित देखकर हम १२ आश्चर्यचकित हुए । उसी समय उस सुसज्जित नगरसे वह राजा निकला ॥ १२-१३ ॥ देवताओंके राजा इन्द्रकी भाँति पराक्रमी वह १३ राजा धरातलपर पालकीमें बैठा था । वह विमान हमलोगोंको लेकर द्रुत गति से आगे बढ़ा ॥ १४ ॥

तदनन्तर हमलोग अलौकिक ब्रह्मलोकमें पहुँच गये । वहाँपर सभी देवताओंसे नमस्कृत ब्रह्माजीको १४ विद्यमान देखकर भगवान् शंकर एवं विष्णु विस्मयमें पड़ गये ॥ १५ ॥

वहाँ ब्रह्माजीक सभामें सभी वेद अपने-१५ | अपने अंगोंसहित मूर्तरूपमें विराजमान थे । साथ ही समुद्र, नदियाँ, पर्वत, सर्प एवं नाग भी उपस्थित थे ॥ १६ ॥

१६ तत्पश्चात् भगवान् विष्णु और शंकरने मुझसे पूछा - हे चतुर्मुख! ये दूसरे सनातन ब्रह्मा कौन हैं? तब मैंने उनसे कहा कि मैं सबके स्वामी तथा १७ । सृष्टिकर्ता इन ब्रह्माको नहीं जानता ॥ १७ ॥

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अ ० ३ ] तृतीय

को s हं कोऽयं किमर्थं वा भ्रमोऽयं मम चेश्वरौ ।

क्षणादथ विमानं तच्चचालाशु मनोजवम् ॥ १८

कैलासशिखरे प्राप्तं रम्ये यक्षगणान्विते ।

मन्दारवाटिकारम्ये कीरकोकिलकूजिते ॥ १ ९

वीणामुरजवाद्यैश्च नादिते सुखदे शिवे ।

यदा प्राप्तं विमानं तत्तदैव सदनाच्छुभात् ॥ २०

निर्गतो भगवाञ्छम्भुर्वृषारूढस्त्रिलोचनः ।

पञ्चाननो दशभुजः कृतसोमार्धशेखरः ॥ २१

व्याघ्रचर्मपरीधानो गजचर्मोत्तरीयकः ।

पाणिरक्षौ महावीरौ गजाननषडाननौ ॥ २२

शिवेन सह पुत्रौ द्वौ व्रजमानौ विरेजतुः ।

नन्दिप्रभृतयः सर्वे गणपाश्च वराश्च ते ॥ २३

जयशब्दं प्रयुञ्जाना व्रजन्ति शिवपृष्ठगाः ।

तं वीक्ष्य शङ्करं चान्यं विस्मितास्तत्र नारद ॥ २४

मातृभिः संशयाविष्टस्तत्राहं न्यवसं मुने ।

क्षणात्तस्माद् गिरेः शृङ्गाद्विमानं वातरंहसा ॥ २५

वैकुण्ठसदनं प्राप्तं रमारमणमन्दिरम् ।

असम्भाव्या विभूतिश्च तत्र दृष्टा मया सुत ॥ २६

विसिष्मिये तदा विष्णुर्दृष्ट्वा तत्पुरमुत्तमम् ।

सदनाग्रे ययौ तावद्धरिः कमललोचनः ॥ २७

अतसीकुसुमाभासः पीतवासाश्चतुर्भुजः ।

द्विजराजाधिरूढश्च दिव्याभरणभूषितः ॥ २८

वीज्यमानस्तदा लक्ष्म्या कामिन्या चामरैः शुभैः ।

तं वीक्ष्य विस्मिताः सर्वे वयं विष्णुं सनातनम् ॥ २ ९

स्कन्ध २५१ हे ईश्वरो! मैं कौन हूँ, ये कौन हैं और हम दोनोंका क्या प्रयोजन है? इसमें मैं भ्रमित हूँ । थोड़ी ही देर में वह विमान पुनः मनके सदृश वेगसे आगेकी ओर बढ़ा ॥१८ ॥

तत्पश्चात् वह विमान यक्षगणोंसे सुशोभित, मन्दार - वृक्षकी वाटिकाओंके कारण अति सुरम्य, शुक और कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे गुंजित, वीणा और मृदंग आदि वाद्य - यन्त्रोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित, सुखदायक तथा मंगलकारी कैलास - शिखरपर पहुँचा ॥ १ ९ ३ ॥ उस शिखरपर जब वह विमान पहुँचा; उसी समय वृषभपर आरूढ, पंचमुख, दस भुजाओंवाले, मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये हुए भगवान् शंकर अपने दिव्य भवनसे बाहर निकले ॥ २०-२१ ॥ उस समय वे व्याघ्रचर्म पहने हुए तथा गजचर्म ओढ़े हुए थे । महाबली गजानन ( श्रीगणेश ) तथा षडानन ( कार्तिकेय ) उनके अंगरक्षकके रूपमें विद्यमान थे ॥ २२ ॥

भगवान् शंकरके साथ चल रहे उनके दोनों पुत्र अतीव सुशोभित हो रहे थे । नन्दी आदि सभी प्रधान शिवगण जयघोष करते हुए भगवान् शिवके पीछे - पीछे चल रहे थे । हे नारद! वहाँ अन्य लोगों तथा शंकरको मातृकाओंसहित देखकर हमलोग विस्मयमें पड़ गये और हे मुने! मैं संशयग्रस्त हो गया । थोड़ी ही देरमें वह विमान उस कैलास-शिखरसे वायुगतिसे लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुके वैकुण्ठलोकमें जा पहुँचा । हे पुत्र! मैंने वहाँ अद्भुत विभूतियाँ देखीं ॥ २३ - २६ ॥ उस अति रमणीक नगरको देखकर भगवान् विष्णु विस्मयमें पड़ गये । उसी समय कमललोचन भगवान् विष्णु अपने भवनसे बाहर निकले ॥२७ ॥

उनका वर्ण अलसीके पुष्पकी भाँति श्याम था, वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, उनकी चार भुजाएँ थीं, वे पक्षिराज गरुडपर आरूढ़ थे और दिव्य अलंकारोंसे विभूषित थे । भगवती लक्ष्मी उन्हें शुभ चँवर डुला रही थीं । उन सनातन भगवान् विष्णुजीको देखकर । हम सभीको महान् आश्चर्य हुआ ॥ २८-२९ ॥