देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 241–250
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250
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२३२ अहिंसा परमो धर्मो विप्राणां नात्र संशयः दया सर्वत्र कर्तव्या ब्राह्मणेन विजानता यज्ञादन्यत्र विप्रेन्द्र न हिंसा याज्ञिकी मता उत्तङ्क उवाच सर्पयोनेर्विनिर्मुक्तो ब्राह्मणोऽसौ रुरुस्ततः कृत्वा तस्य च शापान्तं परित्यक्तं च हिंसनम् विवाहिता तेन बाला मृता सञ्जीविता पुनः कदनं सर्वसर्पाणां कृतं वैरमनुस्मरन् त्वं तु वैरं समुत्सृज्य वर्तसे पन्नगेष्वथ विमन्युर्भरतश्रेष्ठ पितृघातकरेषु वै अन्तरिक्षे मृतस्तातः स्नानदानविवर्जितः तस्योद्धारं च राजेन्द्र कुरु हत्वाथ पन्नगान् पितुर्वैरं न जानाति जीवन्नेव मृतो हि सः दुर्गतिस्ते पितुस्तावद्यावत्तान्न हनिष्यसि । अम्बामखमिषं कृत्वा कुरु यज्ञं नृपोत्तम सर्पसत्रं महाराज पितुर्वैरमनुस्मरन् । सूत उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा जन्मेजयस्तदा ॥
नेत्राभ्यामश्रुपातं च चकारातीव दुःखितः ।
धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धेर्वृथा मानकरस्य वै ॥
पिता यस्य गतिं घोरां प्राप्तः पन्नगपीडितः ।
अद्याहं मखमारभ्य करोम्यपचितिं पितुः ॥
हत्वा सर्पानसन्दिग्धो दीप्यमाने विभावसौ ।
आहूय मन्त्रिणः सर्वान् राजा वचनमब्रवीत् ॥
कुर्वन्तु यज्ञसम्भारं यथार्हं मन्त्रिसत्तमाः ।
गङ्गातीरे शुभां भूमिं मापयित्वा द्विजोत्तमैः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ । लिये अहिंसा परम धर्म है, इसमें सन्देह नहीं । अतः ॥ ३ ९ विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि वह सर्वत्र दया करे I विप्रवर! यज्ञसे अतिरिक्त कहीं भी की गयी हिंसा । याज्ञिकी हिंसा नहीं कही गयी है ॥ ३५–३९ उत्तंक बोले- तब वह ब्राह्मण सर्पयोनिसे मुक्त ॥ ४० हो गया । इस प्रकार उस ब्राह्मणके शापका अन्त करके रुरुने भी हिंसा छोड़ दी । उन्होंने मरी हुई उस । सुन्दरीको पुनः जीवित कर दिया और उसके साथ ॥ ४१ विवाह कर लिया ॥ ४०-४१ ॥ हे राजन्! उस मुनिने इस प्रकार शत्रुताका । स्मरण करते हुए सभी सर्पोंका संहार किया था, परंतु ॥ ४२ हे भरतश्रेष्ठ! आप तो वैर भूलकर अपने पिताको । मारनेवाले सर्पोंके प्रति क्रोधशून्य बने रहते हैं । आपके पिता स्नान - दान किये बिना अन्तरिक्षमें ही ॥ ४३ मर गये । इसलिये हे राजेन्द्र! सर्पोंका नाश करके । आप उनका उद्धार कीजिये । जो पुत्र पिताके शत्रुओंसे ॥ ४४ बदला नहीं लेता, वह जीते हुए भी मृतकतुल्य है । हे नृपश्रेष्ठ! जबतक आप सर्पोंका विनाश नहीं करते, तबतक आपके पिताकी दुर्गति ही रहेगी । ॥ ४५ हे महाराज! आप देवीयज्ञके व्याजसे अपने पिताकी शत्रुताका स्मरण करते हुए सर्पसत्र नामक यज्ञ कीजिये ॥ ४२–४५३ ॥ सूतजी बोले M - उत्तंकमुनिका यह वचन सुनकर ४६ राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखी हुए और उनके नेत्रोंसे अश्रुपात होने लगा । [ वे मनमें सोचने लगे ] जिसके पिता सर्पसे दंशित होकर इस प्रकार दुर्गतिको प्राप्त ४७ हों, उस मुझ मिथ्याभिमानी तथा दुर्बुद्धिको धिक्कार है । मैं आज ही यज्ञ आरम्भ करके प्रज्वलित अग्निमें ४८ सर्पोंकी आहुति देकर अवश्य ही पिताकी मृत्युका बदला लूँगा ॥ ४६–४८३ ॥ सभी मन्त्रियोंको बुलाकर राजाने यह वचन ४ ९ कहा - हे मन्त्रिप्रवरो! गंगाके किनारे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे उत्तम भूमिकी माप कराकर आपलोग यथोचित यज्ञसामग्रीका प्रबन्ध करें । हे मेरे बुद्धिमान् मन्त्रियो! ५० | सौ खंभोंवाले एक सुरम्य मण्डपका निर्माण कराकर
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अ ० ११ ] द्वितीय
कुर्वन्तु मण्डपं स्वस्थाः शतस्तम्भं मनोहरम् ।
वेदी यज्ञस्य कर्तव्या ममाद्य सचिवाः खलु ॥ ५१
तदङ्गत्वे विधेयो वै सर्पसत्रः सुविस्तरः ।
तक्षकस्तु पशुस्तत्र होतोत्तङ्को महामुनिः ॥ ५२
शीघ्रमाहूयतां विप्राः सर्वज्ञा वेदपारगाः । सूत उवाच मन्त्रिणस्तु तदा चक्रुर्भूपवाक्यैर्विचक्षणाः ॥ ५३
यज्ञस्य सर्वसम्भारं वेदीं यज्ञस्य विस्तृताम् ।
हवने वर्तमाने तु सर्पाणां तक्षको गतः ॥ ५४
इन्द्रं प्रति भयार्तोऽहं त्राहि मामिति चाब्रवीत् ।
भयभीतं समाश्वास्य स्वासने सन्निवेश्य च ॥ ५५
ददावभयमत्यर्थं निर्भयो भव पन्नग ।
तमिन्द्रशरणं ज्ञात्वा मुनिर्दत्ताभयं तथा ॥ ५६
उत्तङ्कोऽयदुद्विग्नः सेन्द्रं कृत्वा निमन्त्रणम् ।
स्मृतस्तदा तक्षकेण यायावरकुलोद्भवः ॥ ५७
आस्तीको नाम धर्मात्मा जरत्कारुसुतो मुनिः ।
तत्रागत्य मुनेर्बालस्तुष्टाव जनमेजयम् ॥ ५८
राजा तमर्चयामास दृष्ट्वा बालं सुपण्डितम् ।
अर्चयित्वा नृपस्तं तु छन्दयामास वाञ्छितैः ॥ ५ ९
स तु वव्रे महाभाग यज्ञोऽयं विरमत्विति ।
सत्यबद्धो नृपस्तेन प्रार्थितश्च पुनस्तथा ॥ ६०
होमं निवर्तयामास सर्पाणां मुनिवाक्यतः ।
भारतं श्रावयामास वैशम्पायन विस्तरात् ॥ ६१
श्रुत्वापि नृपतिः कामं न शान्तिमभिजग्मिवान् ।
व्यासं पप्रच्छ भूपालो मम शान्तिः कथं भवेत् ॥ ६२
स्कन्ध २३३ आपलोग उसमें आज ही यज्ञके लिये वेदीका भी निर्माण सम्पन्न करा लें । उस यज्ञके अंगरूपमें विस्तारसहित सर्पसत्र भी करना है । महामुनि उत्तंक उस यज्ञके होता होंगे और तक्षकनाग उसमें यज्ञपशु होगा । आपलोग शीघ्र ही सर्वज्ञाता एवं वेदपारगामी ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करें ॥ ४ ९ –५२३ ॥ सूतजी बोले- बुद्धिमान् मन्त्रियोंने राजाके कथनानुसार यज्ञसम्बन्धी समस्त सामग्रीका प्रबन्ध कर लिया और विस्तृत यज्ञवेदी भी निर्मित करायी । सर्पोंका हवन आरम्भ होनेपर तक्षक इन्द्रके यहाँ गया और उनसे बोला- मैं भयाकुल हूँ, मेरी रक्षा कीजिये । तत्पश्चात् इन्द्रने उस भयभीत तक्षकको सान्त्वना देकर अपने आसनपर बैठाकर उसे अभय प्रदान किया और कहा - हे पन्नग! तुम निर्भय हो जाओ ॥ ५३ - ५५३ ॥ तदनन्तर उत्तंकमुनि उस तक्षकको इन्द्रका शरणागत और उनसे अभयदान पाया हुआ जानकर उद्विग्न हो उठे और उन्होंने मन्त्रप्रभावसे इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया । तब तक्षकने यायावरवंशमें उत्पन्न जरत्कारुपुत्र धर्मनिष्ठ आस्तीक - नामक मुनिका स्मरण किया । वे मुनिबालक आस्तीक वहाँ आकर जनमेजयकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५६ - ५८ ॥ राजा जनमेजयने उस बालकको महान् पण्डित देखकर उसकी पूजा की । पूजन - अर्चन करके राजाने अपनी मनोवांछित वस्तु माँगनेके लिये उससे निवेदन किया ॥ ५ ९ ॥ तब आस्तीकने याचना की - हे महाभाग! इस यज्ञको समाप्त किया जाय । उसने सत्य वचनमें आबद्ध राजासे बार - बार ऐसी प्रार्थना की ॥ ६० ॥
तत्पश्चात् मुनिके वचनानुसार राजाने सर्पोंका हवन बन्द कर दिया और फिर वैशम्पायनऋषिने उन्हें विस्तारपूर्वक महाभारतकी कथा सुनायी ॥ ६१ ॥
उस कथाको सुनकर भी राजाको विशेष शान्ति नहीं प्राप्त हुई तब राजाने व्यासजीसे पूछा- मुझे किस प्रकार शान्ति मिलेगी? मेरा मन अशान्तिकी
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२३४ मनोऽतिदह्यते कामं किं करोमि वदस्व मे । पिता मे दुर्भगस्यैव मृतः पार्थसुतात्मजः
क्षत्रियाणां महाभाग सङ्ग्रामे मरणं वरम् ।
रणे वा मरणं व्यास गृहे वा विधिपूर्वकम् ॥
मरणं न पितुर्मेऽभूदन्तरिक्षे मृतोऽवशः ।
शान्त्युपायं वदस्वात्र त्वं च सत्यवतीसुत ॥
यथा स्वर्गं व्रजेदाशु पिता मे दुर्गतिं गतः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ अग्निमें अत्यधिक दग्ध हो रहा है, मैं क्या करूँ? ॥ ६३ मुझको बतलाइये । मुझ मन्दभाग्यके पिता और अर्जुनपौत्र परीक्षित् अकाल- - मृत्युको प्राप्त हुए हैं । हे महाभाग! युद्धमें होनेवाली मृत्यु ही क्षत्रियोंके लिये श्रेष्ठ होती है । हे व्यासजी! रणमें अथवा घरमें विधिपूर्वक ६४ होनेवाली मृत्यु ही अच्छी मानी जाती है, किंतु मेरे पिताका वैसा मरण नहीं हुआ । वे तो असहाय अवस्थामें अन्तरिक्षमें मृत्युको प्राप्त हुए । हे सत्यवतीपुत्र! आप उनकी शान्ति प्राप्तिका कोई उपाय बतलाइये, ६५ जिससे दुर्गतिको प्राप्त मेरे पिताजी शीघ्र ही स्वर्ग चले ६६ | जायँ ॥ ६२–६६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे सर्पसत्रवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः आस्तीकमुनिके जन्मकी कथा, कद्रू और विनताद्वारा सूर्यके घोड़ेके रंगके विषयमें शर्त लगाना और विनताको दासीभावकी प्राप्ति, कद्रूद्वारा सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासः सत्यवतीसुतः ।
उवाच वचनं तत्र सभायां नृपतिं च तम् ॥१
व्यास उवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराणं गुह्यमद्भुतम् ।
पुण्यं भागवतं नाम नानाख्यानयुतं शिवम् ॥ २
अध्यापितं मया पूर्वं शुकायात्मसुताय वै 1 श्रावयामि नृप त्वां हि रहस्यं परमं मम ॥ ३
धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं श्रवणात्किल ।
शुभदं सुखदं नित्यं सर्वागमसमुद्धृतम् ॥ ४
जनमेजय उवाच
आस्तीकोऽयं सुतः कस्य विघ्नार्थं कथमागतः ।
प्रयोजनं किमत्रास्य सर्पाणां रक्षणे प्रभो ॥५
अपने पुत्रोंको शाप सूतजी बोले - राजा जनमेजयका वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासने सभामें उन राजासे कहा— ॥ १ ॥
व्यासजी बोले - हे राजन्! सुनिये, मैं आपसे एक पुनीत, कल्याणकारक, रहस्यमय, अद्भुत तथा विविध कथानकोंसे युक्त देवीभागवत नामक पुराण कहूँगा ॥२ ॥
मैंने पूर्वकालमें उसे अपने पुत्र शुकदेवको पढ़ाया था । हे राजन्! मैं अपने परम रहस्यमय पुराणका श्रवण आपको कराऊँगा ॥ ३ ॥
सभी वेदों एवं शास्त्रोंके सारस्वरूप तथा धर्म-अर्थ - काम - मोक्षके कारणभूत इस पुराणका श्रवण करनेसे यह मंगल तथा आनन्द प्रदान करनेवाला होता है ॥ ४ ॥
जनमेजय बोले- हे प्रभो! यह आस्तीक किसका पुत्र था और यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये क्यों आया? यज्ञमें सर्पोंकी रक्षा करनेके पीछे इसका क्या उद्देश्य था? ॥ ५ ॥
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अ ० १२ ] द्वितीय
कथयैतन्महाभाग विस्तरेण कथानकम् ।
पुराणं च तथा सर्वं विस्तराद्वद सुव्रत ॥ ६
व्यास उवाच
जरत्कारुर्मुनिः शान्तो न चकार गृहाश्रमम् ।
तेन दृष्टा वने गर्ते लम्बमानाः स्वपूर्वजाः ॥ ७
ततस्तमाहुः कुरु पुत्र दारा-न्यथा च नः स्यात्परमा हि तृप्तिः । स्वर्गे व्रजामः खलु दुःखमुक्ता वयं सदाचारयुते सुते वै ॥ ८ स तानुवाचाथ लभे समाना-मयाचितां चातिवशानुगां च । तदा गृहारम्भमहं करोमि ब्रवीमि तथ्यं मम पूर्वजा वै ॥ ९
इत्युक्त्वा ताञ्जरत्कारुर्गतस्तीर्थान्प्रति द्विजः ।
तदैव पन्नगाः शप्ता मात्राग्नौ निपतन्त्विति ॥ १०
कश्यपस्य मुनेः पत्न्यौ कद्रूश्च विनता तथा ।
दृष्ट्वादित्यरथे चाश्वमूचतुश्च परस्परम् ॥ ११
तं दृष्ट्वा च तदा कद्रूर्विनतामिदमब्रवीत् ।
किंवर्णोऽयं हयो भद्रे सत्यं प्रब्रूहि माचिरम् ॥ १२
विनतोवाच
श्वेत एवाश्वराजोऽयं किं वा त्वं मन्यसे शुभे ।
ब्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततस्तु विपणावहे ॥ १३
कगुरुवाच
कृष्णवर्णमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते ।
एहि सार्धं मया दिव्यं दासीभावाय भामिनि ॥ १४
स्कन्ध २३५ हे महाभाग! उस आख्यानको विस्तारपूर्वक बताइये । हे सुव्रत! उस सम्पूर्ण पुराणको भी विस्तारके साथ कहिये ॥६ ॥
व्यासजी बोले- जरत्कारु एक शान्त स्वभाववाले ऋषि थे, उन्होंने गार्हस्थ्य - जीवन अंगीकार नहीं किया था । उन्होंने एक बार वनमें एक गड्ढेके भीतर अपने पूर्वजोंको लटकते हुए देखा ॥ ७ ॥
तदनन्तर पूर्वजोंने उनसे कहा – हे पुत्र! तुम विवाह कर लो, जिससे हमारी परम तृप्ति हो सके । तुझ सदाचारी पुत्रके ऐसा करनेपर हम-लोग निश्चितरूपसे दुःखमुक्त होकर स्वर्गकी प्राप्ति कर लेंगे ॥ ८ ॥
तब उन जरत्कारुने उनसे कहा - हे मेरे पूर्वजो! जब मुझे अपने समान नामवाली तथा अत्यन्त वशवर्तिनी कन्या बिना माँगे ही मिलेगी तभी मैं विवाह करके गृहस्थी बसाऊँगा, मैं यह सत्य कह | रहा हूँ ॥ ९ ॥
उनसे ऐसा कहकर ब्राह्मण जरत्कारु तीर्थाटनके लिये चल पड़े । उसी समय सर्पोंको उनकी माताने शाप दे दिया कि वे अग्निमें गिर जायँ ॥ १० ॥
कश्यपऋषिकी कद्रू और विनता नामक दो पत्नियाँ थीं । सूर्यके रथमें जुते हुए घोड़ेको देखकर वे आपसमें वार्तालाप करने लगीं ॥११ ॥
उस घोड़ेको देखकर कद्रूने विनतासे यह कहा— हे कल्याणि! यह घोड़ा किस रंगका है? यह मुझे शीघ्र ही सही - सही बताओ ॥१२ ॥
विनता बोली- यह अश्वराज श्वेत रंगका है । हे शुभे! तुम इसे किस रंगका मानती हो? तुम भी इसका रंग बता दो । तब हम दोनों आपसमें इसपर शर्त लगायें ॥१३ ॥
कद्रू बोली - हे शुभ मुसकानवाली! मैं तो इस घोड़ेको कृष्णवर्णका समझती हूँ । हे भामिनि! आओ, मेरे साथ शर्त लगाओ कि जो हारेगी, वह दूसरेकी दासी होना स्वीकार करेगी ॥ १४ ॥
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२३६ सूत उवाच कद्रूश्च स्वसुतानाह सर्वान्सर्पान्वशे स्थितान् बालाञ्छ्यामान्प्रकुर्वन्तु यावतो ऽश्वशरीरके नेति केचन तत्राहुस्तानथासौ शशाप ह जनमेजयस्य यज्ञे वै गमिष्यथ हुताशनम् ॥
अन्ये चक्रुर्हयं सर्पाः कर्बुरं वर्णभोगकैः ।
वेष्टयित्वास्य पुच्छं तु मातुः प्रियचिकीर्षया ॥
भगिन्यौ च सुसंयुक्ते गत्वा ददृशतुर्हयम् ।
कर्बुरं तं हयं दृष्ट्वा विनता चातिदुःखिता ॥
तदाजगाम गरुडः सुतस्तस्या महाबलः ।
स दृष्ट्वा मातरं दीनामपृच्छत्पन्नगाशनः ॥
मातः कथं सुदीनासि रुदितेव विभासि मे ।
जीवमाने मयि सुते तथान्ये रविसारथौ ॥
दुःखितासि ततो वां धिग्जीवितं चारुलोचने ।
किं जातेन सुतेनाथ यदि माता सुदुःखिता ॥
शंस मे कारणं मातः करोमि विगतज्वराम् । विनतोवाच सपत्न्या दास्यहं पुत्र किं ब्रवीमि वृथा क्षता ॥ वह मां सा ब्रवीत्यद्य तेनास्मि दुःखिता सुत । गरुड उवाच वहिष्येऽहं तत्र किल यत्र सा गन्तुमुत्सुका ॥ मा शोकं कुरु कल्याणि निश्चिन्तां त्वां करोम्यहम् । व्यास उवाच इत्युक्ता सा गता पार्श्वं कद्रोश्च विनता तदा ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ सूतजी बोले - कद्रूने अपने सभी आज्ञाकारी । सर्पपुत्रोंसे कहा कि तुम सभी लिपटकर उस घोड़े के ॥ १५ शरीरमें जितने बाल हैं, उन्हें काला कर दो ॥ १५ ॥
उनमेंसे कुछ सर्पोंने कहा कि हम ऐसा । नहीं करेंगे । उन सर्पोंको कद्रूने शाप दे दिया कि तुम लोग जनमेजयके यज्ञमें हवनकी अग्निमें १६ गिर पड़ोगे ॥१६ ॥
अन्य सर्पोंने माताको प्रसन्न करनेकी कामनासे उस घोड़ेकी पूँछमें लिपटकर अपने विभिन्न रंगोंसे १७ घोड़ेको चितकबरा कर दिया ॥ १७ ॥
तदनन्तर दोनों बहनोंने साथ - साथ जाकर घोड़ेको देखा । उस घोड़ेको चितकबरा देखकर विनता बहुत १८ दु: खी हुई ॥१८ ॥
उसी समय सर्पोंका आहार करनेवाले महाबली विनतापुत्र गरुडजी वहाँ आ गये । उन्होंने अपनी १ ९ माताको दुःखित देखकर उनसे पूछा —॥१ ९ ॥ हे माता! आप बहुत उदास क्यों हैं? आप मुझे रोती हुई प्रतीत हो रही हैं । हे सुनयने! मेरे एवं २० सूर्यसारथि अरुणसदृश पुत्रोंके जीवित रहते यदि आप दुःखी हैं, तब हमारे जीवनको धिक्कार है! यदि माता ही परम दुःखी हों तो पुत्रके उत्पन्न २१ होनेसे क्या लाभ? हे माता! आप मुझे अपने दुःखका कारण बताइये, मैं आपको दुःखसे मुक्त करूँगा ॥ २०-२१३ ॥ विनता बोली - हे पुत्र! मैं अपनी सौतकी दासी २२ हो गयी हूँ । अब व्यर्थमें मारी गयी मैं क्या कहूँ? वह मुझसे अब कह रही है कि मैं उसे अपने कन्धेपर ढोऊँ । हे पुत्र! मैं इसीसे दुःखी हूँ ॥ २२३ ॥
गरुडजी बोले – वे जहाँ भी जानेकी कामना करेंगी, मैं उन्हें ढोकर वहाँ ले जाऊँगा । हे कल्याणि! २३ आप शोक न करें, मैं आपको निश्चिन्त कर देता ॥ २३३ ॥
व्यासजी बोले- गरुडद्वारा ऐसा कहे जानेपर विनता उसी समय कद्रूके पास चली गयी । २४ | महाबली गरुड भी अपनी माता विनताको दास्य-
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अ ० १२ ] द्वितीय दासीभावमपाकर्तुं गरुडोऽपि महाबलः । उवाह तां सपुत्रां वै सिन्धोः पारं जगाम ह । २५
गत्वा तां गरुडः प्राह ब्रूहि मातर्नमोऽस्तु ते ।
कथं मुच्येत मे माता दासीभावादसंशयम् ॥ २६
कगुरुवाच
अमृतं देवलोकात्त्वं बलादानीय मे सुतान् ।
समर्पय सुताद्याशु मातरं मोचयाबलाम् ॥ २७
व्यास उवाच
इत्युक्तः प्रययौ शीघ्रमिन्द्रलोकं महाबलः ।
कृत्वा युद्धं जहाराशु सुधाकुम्भं खगोत्तमः ॥ २८
समानीयामृतं मात्रे वैनतेयः समर्पयत् ।
मोचिता विनता तेन दासीभावादसंशयम् ॥ २ ९
अमृतं सञ्जहारेन्द्रः स्नातुं सर्पा यदा गताः ।
दासीभावाद्विनिर्मुक्ता विनता विपतेर्बलात् ॥ ३०
तत्रास्तीर्णाः कुशास्तैस्तु लीढाः पन्नगनामकैः ।
द्विजिह्वास्ते सुसम्पन्नाः कुशाग्रस्पर्शमात्रतः ॥ ३१
मात्रा शप्ताश्च ये नागा वासुकिप्रमुखाः शुचा ।
ब्रह्माणं शरणं गत्वा ते होचुः शापजं भयम् ॥ ३२
तानाह भगवान्ब्रह्मा जरत्कारुर्महामुनिः ।
वासुकेर्भगिनीं तस्मै अर्पयध्वं सनामिकाम् ॥ ३३
तस्यां यो जायते पुत्रः स वस्त्राता भविष्यति ।
आस्तीक इति नामासौ भविता नात्र संशयः ॥ ३४
वासुकिस्तु तदाकर्ण्य वचनं ब्रह्मणः शिवम् ।
वनं गत्वा सुतां तस्मै ददौ विनयपूर्वकम् ॥ ३५
स्कन्ध २३७ भावसे मुक्ति दिलानेके उद्देश्यसे कद्रूको उसके पुत्रोंसहित अपनी पीठपर बैठाकर सागरके उस पार ले गये ॥ २४-२५ ॥ वहाँ जाकर गरुडने कद्रू से कहा - हे जननि! आपको बार - बार प्रणाम है । अब आप मुझे यह बतायें कि मेरी माता दासीभावसे निश्चित ही कैसे मुक्त होंगी? ॥ २६ ॥
कद्रू बोली- हे पुत्र! तुम स्वर्गलोकसे बलपूर्वक अमृत लाकर मेरे पुत्रोंको दे दो और शीघ्र ही अपनी अबला माताको मुक्त करा लो ॥ २७ ॥
व्यासजी बोले – कद्रूके ऐसा कहनेपर पक्षिश्रेष्ठ महाबली गरुड उसी समय इन्द्रलोक गये और देवताओंसे युद्ध करके उन्होंने सुधा - कलश छीन लिया । अमृत लाकर उन्होंने उसे अपनी विमाता कद्रूको अर्पण कर दिया और उन्होंने विनताको दासीभावसे निःसन्देह मुक्त करा लिया ॥ २८-२९ ॥ जब सभी सर्प स्नान करनेके लिये चले गये, तब इन्द्रने अमृत चुरा लिया । इस प्रकार गरुडके प्रतापसे विनता दासीभावसे छूट गयी ॥ ३० ॥
अमृतघटके पास कुश बिछे हुए थे, जिन्हें सर्प अपनी जिह्वासे चाटने लगे । तब कुशके अग्रभागके स्पर्शमात्रसे ही वे दो जीभवाले हो | गये ॥ ३१ ॥
जिन सर्पोंको उनकी माताने शाप दिया था, वे वासुकि आदि नाग चिन्तित होकर ब्रह्माजीके पास गये और उन्होंने अपने शाप - जनित भयकी बात बतायी । ब्रह्माजीने उनसे कहा- जरत्कारु नामके एक महामुनि हैं, तुमलोग उन्हींके नामवाली वासुकिनागकी बहन । जरत्कारुको उन्हें अर्पित कर दो । उस कन्यासे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुमलोगोंका रक्षक होगा । वह 4 ' आस्तीक ' - इस नामवाला होगा; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३२-३४ ॥ ब्रह्माजीका वह कल्याणकारी वचन सुनकर वासुकिने वनमें जाकर अपनी बहन उन्हें विनयपूर्वक | समर्पित कर दी || ३५ ॥
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२३८ सनामां तां मुनिर्ज्ञात्वा जरत्कारुरुवाच तम् अप्रियं मे यदा कुर्यात्तदा तां सन्त्यजाम्यहम् वाग्बन्धं तादृशं कृत्वा मुनिर्जग्राह तां स्वयम् दत्त्वा च वासुकिः कामं भवनं स्वं जगाम ह कृत्वा पर्णकुटीं शुभ्रां जरत्कारुर्महावने । तया सह सुखं प्राप रममाणः परन्तप
एकदा भोजनं कृत्वा सुप्तोऽसौ मुनिसत्तमः ।
भगिनी वासुकेस्तत्र संस्थिता वरवर्णिनी ॥
न सम्बोधयितव्योऽहं त्वया कान्ते कथञ्चन ।
इत्युक्त्वा तु गतो निद्रां मुनिस्तां सुदतीं तदा ॥
रविरस्तगिरिं प्राप्तः सन्ध्याकाल उपस्थिते ।
किं करोमि न मे शान्तिस्त्यजेन्मां बोधितः पुनः ॥
धर्मलोपभयाद्भीता जरत्कारुरचिन्तयत् ।
नोचेत्प्रबोधयाम्येनं सन्ध्याकालो वृथा व्रजेत् ॥
धर्मनाशाद्वरं त्यागस्तथापि मरणं ध्रुवम् ।
धर्महानिर्नराणां हि नरकाय भवेत्पुनः ॥
इति सञ्चिन्त्य सा बाला तं मुनिं प्रत्यबोधयत् ।
सन्ध्याकालोऽपि सञ्जात उत्तिष्ठोत्तिष्ठ सुव्रत ॥
उत्थितोऽसौ मुनिः कोपात्तामुवाच व्रजाम्यहम् ।
त्वं तु भ्रातृगृहं याहि निद्राविच्छेदकारिणी ॥।
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ । जरत्कारुमुनिने उसे अपने ही समान नामवाली ॥ ३६ जानकर उनसे कहा- जब भी यह मेरा अप्रिय करेगी, तब मैं इसका परित्याग कर दूँगा ॥३६ ॥
। वैसी प्रतिज्ञा करके जरत्कारुमुनिने उस जरत्कारुको पत्नीरूपसे ग्रहण कर लिया । वासुकिनाग भी अपनी ॥ ३७ बहन उन्हें प्रदानकर आनन्दपूर्वक अपने घर लौट गये ॥ ३७ ॥
हे परन्तप! मुनि जरत्कारु उस महावनमें सुन्दर ॥ ३८ पर्णकुटी बनाकर उसके साथ रमण करते हुए सुख भोगने लगे ॥३८ ॥
एक समय मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु भोजन करके ३ ९ विश्राम कर रहे थे, वासुकिकी बहन सुन्दरी जरत्कारु भी वहीं बैठी हुई थी । [ मुनिने उससे कहा ] हे कान्ते! तुम मुझे किसी भी प्रकार जगाना मत - उस सुन्दर दाँतोंवालीसे ऐसा कहकर वे मुनि ४० | सो गये ॥३ ९ -४० ॥ सूर्य अस्ताचलको प्राप्त हो गये थे । सन्ध्या-वन्दनका समय उपस्थित हो जानेपर धर्मलोपके ४१ भयसे डरी हुई जरत्कारु सोचने लगी — मैं क्या करूँ? मुझे शान्ति नहीं मिल रही है । यदि मैं इन्हें जगाती हूँ तो ये मेरा परित्याग कर देंगे और यदि नहीं जगाती हूँ तो यह सन्ध्याकाल व्यर्थ ही चला ४२ जायगा ॥ ४१-४२ ॥ धर्मनाशकी अपेक्षा त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि मृत्यु तो निश्चित है ही । धर्मके नष्ट होनेपर मनुष्यों को ४३ निश्चित ही नरकमें जाना पड़ता है - ऐसा निश्चय करके उस स्त्रीने उन मुनिको जगाया और कहा— हे सुव्रत! उठिये, उठिये, अब सन्ध्याकाल भी उपस्थित हो गया है ॥ ४३-४४ ॥ ४४ जगने पर मुनि जरत्कारुने क्रोधित होकर उससे कहा- अब मैं जा रहा हूँ और मेरी निद्रामें विघ्न डालनेवाली तुम अपने भाई वासुकिके घर चली ४५ | जाओ ॥ ४५ ॥
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अ ० १२ ] द्वितीय
वेपमानाब्रवीद्वाक्यमित्युक्ता मुनिना तदा ।
भ्रात्रा दत्ता यदर्थं तत्कथं स्यादमितप्रभ ॥ ४६
मुनिः प्राह जरत्कारुं तदस्तीति निराकुलः ।
गता सा मुनिना त्यक्ता वासुकेः सदनं तदा ॥ ४७
पृष्टा भ्रात्राब्रवीद्वाक्यं यथोक्तं पतिना तदा ।
अस्तीत्युक्त्वा च हित्वा मां गतोऽसौ मुनिसत्तमः ॥ ४८
वासुकिस्तु तदाकर्ण्य सत्यावाङ्मुनिरित्युत ।
विश्वासं च परं कृत्वा भगिनीं तां समाश्रयत् ॥ ४ ९
ततः कालेन कियता जातोऽसौ मुनिबालकः ।
आस्तीक इति नामासौ विख्यातः कुरुसत्तम ॥ ५०
तेनायं रक्षितो यज्ञस्तव पार्थिवसत्तम ।
मातृपक्षस्य रक्षार्थं मुनिना भावितात्मना ॥ ५१
भव्यं कृतं महाराज मानितोऽयं त्वया मुनिः ।
यायावरकुलोत्पन्नो वासुकेर्भगिनीसुतः ॥ ५२
स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो भारतं सकलं श्रुतम् ।
दानानि बहु दत्तानि पूजिता मुनयस्तथा ॥ ५३
कृतेन सुकृतेनापि न पिता स्वर्गतिं गतः ।
पावितं न कुलं कृत्स्नं त्वया भूपतिसत्तम ॥ ५४
देव्याश्चायतनं भूप विस्तीर्णं कुरु भक्तितः । येन वै सकला सिद्धिस्तव स्याज्जनमेजय । ५५
पूजिता परया भक्त्या शिवा सकलदा सदा ।
कुलवृद्धिं करोत्येव राज्यं च सुस्थिरं सदा ॥ ५६
स्कन्ध २३ ९ मुनिके ऐसा कहनेपर भयसे काँपती हुई उसने कहा - हे महातेजस्वी! मेरे भाईने जिस प्रयोजनसे मुझे आपको सौंपा था, वह प्रयोजन अब कैसे सिद्ध होगा? ॥ ४६ ॥
तदनन्तर मुनिने शान्तचित्त होकर जरत्कारुसे कहा - ' वह तो है ही । ' इसके बाद मुनिके द्वारा परित्यक्त वह कन्या वासुकिके घर चली गयी ॥ ४७ ॥
भाई वासुकिके पूछने पर उसने पतिद्वारा कही गयी बात उनसे यथावत् कह दी और [ वह यह भी बोली कि ] ' अस्ति ' – ऐसा कहकर वे मुनिश्रेष्ठ मुझको छोड़कर चले गये ॥ ४८ ॥
यह सुनकर वासुकिने सोचा कि मुनि सत्यवादी हैं; तत्पश्चात् पूर्ण विश्वास करके उन्होंने अपनी उस बहनको अपने यहाँ आश्रय प्रदान किया ॥ ४ ९ ॥ हे कुरुश्रेष्ठ! कुछ समय बाद मुनिबालक उत्पन्न हुआ और वह आस्तीक नामसे विख्यात हुआ ॥ ५० ॥
हे नृपश्रेष्ठ! पवित्र आत्मावाले उन्हीं आस्तीक-मुनिने अपने मातृ - पक्षकी रक्षाके लिये आपका सर्पयज्ञ रुकवाया है ॥ ५१ ॥
हे महाराज! यायावर वंशमें उत्पन्न और वासुकिकी बहनके पुत्र आस्तीकका आपने सम्मान किया, यह तो बड़ा ही उत्तम कार्य किया है ॥ ५२ ॥
हे महाबाहो! आपका कल्याण हो । आपने सम्पूर्ण महाभारत सुना, नानाविध दान दिये और मुनिजनोंकी पूजा की । हे भूपश्रेष्ठ! आपके द्वारा इतना महान् पुण्यकार्य किये जानेपर भी आपके पिता स्वर्गको प्राप्त नहीं हुए और न आपका सम्पूर्ण कुल ही पवित्र हो सका । अतः हे महाराज जनमेजय! आप भक्तिभावसे युक्त होकर देवी भगवतीके एक विशाल मन्दिरका निर्माण कराइये, जिसके द्वारा आप समस्त सिद्धिको प्राप्त कर लेंगे ॥ ५३ - ५५ ॥ सर्वस्व प्रदान करनेवाली भगवती दुर्गा परम श्रद्धापूर्वक पूजित होनेपर सदा वंश - वृद्धि करती हैं । तथा राज्यको सदा स्थिरता प्रदान करती हैं ॥ ५६ ॥
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२४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२
देवीमखं विधानेन कृत्वा पार्थिवसत्तम ।
श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं परमं शृणु ॥५७
त्वामहं श्रावयिष्यामि कथां परमपावनीम् ।
संसारतारिणीं दिव्यां नानारससमाहृताम् ॥ ५८
न श्रोतव्यं परं चास्मात्पुराणाद्विद्यते भुवि ।
नाराध्यं विद्यते राजन्देवीपादाम्बुजादृते ॥ ५ ९
ते सभाग्याः कृतप्रज्ञा धन्यास्ते नृपसत्तम ।
येषां चित्ते सदा देवी वसति प्रेमसंकुले ॥ ६०
सुदुःखितास्ते दृश्यन्ते भुवि भारत भारते ।
नाराधिता महामाया यैर्जनैश्च सदाम्बिका ॥ ६१
ब्रह्मादयः सुराः सर्वे यदाराधनतत्पराः ।
वर्तन्ते सर्वदा राजंस्तां न सेवेत को जनः ॥ ६२
य इदं शृणुयान्नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
भगवत्या समाख्यातं विष्णवे यदनुत्तमम् ॥ ६३
तेन श्रुतेन ते राजंश्चित्ते शान्तिर्भविष्यति ।
पितॄणां चाक्षयः स्वर्गः पुराणश्रवणाद्भवेत् ॥६४ ।
हे भूपश्रेष्ठ! विधि - विधानके साथ देवीयज्ञ करके आप श्रीमद्देवीभागवत नामक महापुराणका श्रवण कीजिये ॥ ५७ ॥
अत्यन्त पुनीत, भवसागरसे पार उतारनेवाली, अलौकिक तथा विविध रसोंसे सम्पृक्त उस कथाको मैं आपको सुनाऊँगा ॥ ५८ ॥
हे राजन्! सम्पूर्ण संसारमें इस पुराणसे बढ़कर अन्य कुछ भी श्रवणीय नहीं है और भगवतीके चरणारविन्दके अतिरिक्त अन्य कुछ भी आराधनीय नहीं है ॥५ ९ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! जिनके प्रेमपूरित हृदयमें सदा भगवती विराजमान रहती हैं; वे ही सौभाग्यशाली, ज्ञानवान् एवं धन्य हैं ॥६० ॥
हे भारत! इस भारतभूमिपर वे ही लोग सदा दु: खी दिखायी देते हैं, जिन्होंने कभी भी महामाया अम्बिकाकी आराधना नहीं की है ॥ ६१ ॥
हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी जिन भगवतीकी आराधनामें सर्वदा लीन रहते हैं, उनकी आराधना भला कौन मनुष्य नहीं करेगा? ॥ ६२ ॥
जो मनुष्य इस पुराणका नित्य श्रवण करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं । स्वयं भगवतीने भगवान् विष्णुके समक्ष इस अतिश्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था ॥ ६३ ॥
हे राजन्! इस पुराणके श्रवणसे आपके चित्तको परम शान्ति प्राप्त होगी और आपके पितरोंको अक्षय स्वर्ग प्राप्त होगा ॥६४ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे श्रोतृप्रवक्तृप्रसङ्गो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ द्वितीयः स्कन्धः समाप्तः ॥
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॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण तृतीयः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः राजा जनमेजयका ब्रह्माण्डोत्पत्तिविषयक प्रश्न तथा इसके उत्तरमें व्यासजीका पूर्वकालमें नारदजीके साथ हुआ संवाद सुनाना जनमेजय उवाच
भगवन् भवता प्रोक्तं यज्ञमम्बाभिधं महत् ।
सा का कथं समुत्पन्ना कुत्र कस्माच्च किंगुणा ॥ १
कीदृशश्च मखस्तस्याः स्वरूपं कीदृशं तथा ।
विधानं विधिवद् ब्रूहि सर्वज्ञोऽसि दयानिधे ॥ २
ब्रह्माण्डस्य तथोत्पत्तिं वद विस्तरतस्तथा ।
यथोक्तं यादृशं ब्रह्मन्नखिलं वेत्सि भूसुर ॥ ३
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवा मया श्रुताः ।
सृष्टिपालनसंहारकारकाः सगुणात्वमी ॥ ४
स्वतन्त्रास्ते महात्मानः पाराशर्य वदस्व मे आहोस्वित्परतन्त्रास्ते श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥ ५
मृत्युधर्माश्च ते नो वा सच्चिदानन्दरूपिणः ।
अधिभूतादिभिर्युक्ता न वा दुःखैस्त्रिधात्मकैः ॥ ६
कालस्य वशगा नो वा ते सुरेन्द्रा महाबलाः ।
कथं ते वै समुत्पन्नाः कस्मादिति च संशयः ॥ ७
जनमेजय बोले – हे भगवन्! आपने महान् अम्बा- - यज्ञके विषयमें कहा है । वे अम्बा कौन हैं, वे कैसे, कहाँ और किसलिये उत्पन्न हुई हैं और वे कौन - कौनसे गुणोंवाली हैं? ॥ १ ॥
उनका यह यज्ञ कैसा है और उसका क्या स्वरूप है? हे दयानिधान! आप सब कुछ जाननेवाले हैं; उस यज्ञका विधान सम्यक् रूपसे बताइये ॥ २ ॥
हे ब्रह्मन्! आप विस्तारपूर्वक ' ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिका भी वर्णन कीजिये । हे भूसुर! इस विषय में अन्य ज्ञानियोंने जैसा कहा है, वह सब कुछ भी आप भलीभाँति जानते हैं ॥ ३ ॥
मैंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश -- इन तीनों देवताओंके विषयमें सुना है कि ये सगुण रूपमें सम्पूर्ण जगत्का सृजन, पालन एवं संहार करते हैं ॥ ४ ॥
हे पराशरसुत व्यासजी! वे तीनों देवश्रेष्ठ स्वाधीन हैं अथवा पराधीन; आप मुझे बताइये, मैं इस समय । सुनना चाहता हूँ ॥५ ॥
वे सच्चिदानन्दस्वरूप देवगण मरणधर्मा हैं । अथवा नहीं; और वे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक – इन तीन प्रकारके दुःखोंसे युक्त हैं अथवा नहीं? ॥ ६ ॥
वे तीनों महाबली देवेश कालके वशवर्ती हैं अथवा नहीं; और वे कैसे तथा किससे आविर्भूत हुए, । मेरी यह भी एक शंका है ॥७ ॥