देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 271–280

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 271 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ सृजसि पासि जगज्जगदम्बिके हे जगदम्बिके! आप अपनी कलासे जगत्की स्वकलया कियदिच्छसि नाशितुम् । रचना तथा पालन करती हैं और जब चाहती हैं तब रमयसे स्वपतिं पुरुषं सदा उसका संहार कर देती हैं । आप सदा अपने पति तव गतिं न हि विद्म वयं शिवे ॥ १२ । परमपुरुषको रमण कराती रहती हैं । हे शिवे! आपकी जननि देहि पदाम्बुजसेवनं इस लीलाको हम नहीं जान सकते ॥ १२ ॥

हे जननि! नारीभावको प्राप्त हमलोगोंको सदा युवतिभावगतानपि नः सदा । अपने चरणकमलोंकी सेवा करनेका अवसर दें; पुरुषतामधिगम्य पदाम्बुजा- क्योंकि कालान्तरमें पुनः पुंस्त्व प्राप्त होनेपर आपके द्विरहिताः क्व लभेम सुखं स्फुटम् ॥ १३ चरणकमलोंसे पृथक् रहकर हमलोगोंको वह प्रत्यक्ष न रुचिरस्ति ममाम्ब पदाम्बुजं तव विहाय शिवे भुवनेष्वलम् निवसितुं नरदेहमवाप्य च त्रिभुवनस्य पतित्वमवाप्य वै सुदति नास्ति मनागपि मे रति-युवतिभावमवाप्य तवान्तिके । पुरुषता क्व सुखाय भवत्यलं तव पदं न यदीक्षणगोचरम् ॥ त्रिभुवनेषु भवत्वियमम्बिके मम सदैव हि कीर्तिरनाविला । युवतिभावमवाप्य पदाम्बुजं परिचितं तव संसृतिनाशनम् ॥ भुवि विहाय तवान्तिकसेवनं क इह वाञ्छति राज्यमकंटकम् । त्रुटिरसौ किल याति युगात्मतां न निकटं यदि तेऽङ्घ्रिसरोरुहम् ॥ तपसि ये निरता मुनयोऽमला-स्तव विहाय पदाम्बुजपूजनम् । जननि ते विधिना किल वञ्चिताः परिभवो विभवे परिकल्पितः ॥ न तपसा न दमेन समाधिना

न च तथा विहितैः क्रतुभिर्यथा ।

तव पदाब्जपरागनिषेवणा-द्भवति मुक्तिरजे भवसागरात् ॥

सुख कहाँ प्राप्त होगा! ॥ १३ ॥

। हे अम्ब! हे शिवे! आपके चरणकमलोंको त्यागकर यह नरदेह प्राप्त करके तीनों लोकोंका स्वामित्व प्राप्त करके भी समस्त लोकोंमें कहीं भी ॥१४ रहनेकी मेरी रुचि नहीं है— चाहे मुझे त्रिभुवनका स्वामित्व ही क्यों न मिल जाय ॥ १४ ॥

हे सुदति! आपके सांनिध्य में स्त्रीभावको प्राप्त कर लेनेपर अब पुरुषभावमें मेरी थोड़ी भी रुचि नहीं १५ है । जिसे पाकर आपके चरणारविन्दके दर्शनका सौभाग्य न मिले, वह पुरुषता कैसे सुख प्रदान कर सकती है? ॥ १५ ॥

हे अम्बिके! स्त्रीका रूप पाकर मैं भवबन्धनसे मुक्त करनेवाले आपके चरणकमलोंसे परिचित हो १६ गया हूँ । आपकी कृपासे तीनों लोकोंमें मेरा सुयश स्थिर रहे ॥ १६ ॥

इस संसारमें ऐसा कौन प्राणी होगा, जो आपके सांनिध्यका सेवन छोड़कर निष्कण्टक राज्य करना चाहेगा? क्योंकि जिसे आपके चरणकमलका १७ सांनिध्य प्राप्त नहीं होता, उसके लिये क्षणांश भी युगके समान प्रतीत होता है ॥ १७ ॥

हे जननि! जो शुद्ध चित्तवाले मुनि आपके चरण - कमलकी सेवा त्यागकर केवल तपश्चर्यामें १८ लगे रहते हैं, वे निश्चितरूपसे विधाताके द्वारा ठगे गये हैं और अपनी हानिको ही लाभ समझते हैं ॥ १८ ॥

हे अजे! आपके पदारविन्दके परागकी सेवासे जैसी मुक्ति इस संसार सागरसे प्राप्त होती है, वैसी मुक्ति तपस्या, इन्द्रियदमन, समाधि तथा विभिन्न १ ९ । वेदविहित यज्ञोंसे भी नहीं होती ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 272

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 272 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ] कुरु दयां दयसे यदि देवि मां कथय मन्त्रमनाविलमद्भुतम् । समभवं प्रजपन्सुखितो ह्यहं सुविशदं च नवार्णमनुत्तमम् ॥ प्रथमजन्मनि afrat मया

तदधुना न विभाति नवाक्षरः ।

कथय मां मनुमद्य भवार्णवा-ज्जननि तारय तारय तारके ॥

ब्रह्मोवाच

इत्युक्ता सा तदा देवी शिवेनाद्भुततेजसा ।

उच्चचाराम्बिका मन्त्रं प्रस्फुटं च नवाक्षरम् ॥

तं गृहीत्वा महादेवः परां मुदमवाप ह ।

प्रणम्य चरणौ देव्यास्तत्रैवावस्थितः शिवः ॥

जपन्नवाक्षरं मन्त्रं कामदं मोक्षदं तथा । बीजयुक्तं शुभोच्चारं शङ्करस्तस्थिवांस्तदा

तं तथावस्थितं दृष्ट्वा शङ्करं लोकशङ्करम् ।

अवोचं तां महामायां संस्थितोऽहं पदान्तिके ॥

न वेदास्त्वामेवं कलयितुमिहासन्नपटवो यतस्ते नोचुस्त्वां सकलजनधात्रीमविकलाम् । यदा स्वाहाभूता सकलमखहोमेषु विहिता तदा त्वं सर्वज्ञा जननि खलु जाता त्रिभुवने ॥ कर्ताहं प्रकरोमि सर्वमखिलं ब्रह्माण्डमत्यद्भुतं कोऽन्योऽस्तीह चराचरे त्रिभुवने मत्तः समर्थः पुमान् । धन्योऽस्यत्र न संशयः किल यदा ब्रह्मास्मि लोकातिगो मग्नोऽहं भवसागरे प्रवितते गर्वाभिवेशादिति तृतीय स्कन्ध २६३. हे देवि! यदि आप मेरे प्रति दयालु हैं तो मुझपर दया कीजिये और अपना निर्मल, अद्भुत, सर्वश्रेष्ठ एवं विशद नवार्ण मन्त्र ( ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ) मुझे प्रदान कीजिये, जिससे उसका निरन्तर २० जप करके मैं सर्वदाके लिये सुखी हो जाऊँ ॥ २० ॥

पूर्वजन्ममें मैंने नवार्ण मन्त्रकी दीक्षा पायी थी; परंतु वह मुझे अब स्मरण नहीं रह गया है । इसलिये हे तारके! हे जननि! आज पुनः वह मन्त्र मुझे प्रदान कीजिये और भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये ॥ २१ ॥

२१ ब्रह्माजी बोले – [ हे नारद! ] अद्भुत तेजस्वी शिवजीके ऐसा कहनेपर जगदम्बाने स्पष्ट शब्दोंमें नवाक्षर मन्त्रका उच्चारण किया । उस मन्त्रको ग्रहण करके शिवजी बहुत प्रसन्न हो गये और भगवतीके चरणोंमें प्रणाम करके वहींपर स्थित २२ हो गये ॥ २२-२३ ॥ उस समय सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ, मुक्तिप्रदायक तथा शुभ उच्चारणसे सम्पन्न उस २३ बीजयुक्त नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए शंकरजी वहाँ विराजमान रहे ॥ २४ ॥

संसारका कल्याण करनेवाले शिवजीको इस ॥ २४ प्रकार बैठा देखकर मैं उन महामायाके चरणोंके समीप बैठ गया और उनसे कहने लगा ॥ २५ ॥

हे जननि! वेद सभी लोगोंको धारण करनेवाली २५ तथा सनातनी आप भगवतीकी कल्पना करनेमें अकुशल हैं- ऐसी बात नहीं है; क्योंकि साधारण कार्योंमें उन्होंने आप भगवतीकी चर्चा नहीं की है । यदि वे आपको न जानते तो सभी यज्ञों तथा हवन-कार्यों में आपको ही स्वाहादेवीके रूपमें प्रतिष्ठित कैसे करते? इसलिये आप तीनों लोकोंमें सर्वज्ञाके २६ रूपमें विख्यात हुईं ॥ २६ ॥

मैं स्रष्टा हूँ, मैं अत्यन्त अद्भुत सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका निर्माण करता हूँ, इस चराचर त्रिभुवनमें मुझसे बढ़कर समर्थ दूसरा पुरुष कौन है, मैं निस्सन्देह धन्य हूँ, मैं लोकोत्तर ब्रह्मा हूँ — इस मिथ्या अहंकारके कारण मैं सर्वदा इस विस्तृत संसारसागरमें निमग्न रहता हूँ; ॥ २७ । तथापि आज आपके चरण - कमलोंकी पराग - प्राप्तिके

पृष्ठ 273

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 273 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५ अद्याहं तव पादपङ्कजपरागादानगर्वेण वै धन्योऽस्मीति यथार्थवादनिपुणो जातः प्रसादाच्च ते । याचे त्वां भवभीतिनाशचतुरां मुक्तिप्रदां चेश्वरीं हित्वा मोहकृतं महार्तिनिगडं त्वद्भक्तियुक्तं कुरु अतोऽहञ्च जातो विमुक्तः कथं स्यां सरोजादमेयात्त्वदाविष्कृताद्वै तवाज्ञाकरः किङ्करोऽस्मीति नूनं शिवे पाहि मां मोहमग्नं भवाब्धौ ॥ न जानन्ति ये मानवास्ते वदन्ति प्रभुं मां तवाद्यं चरित्रं पवित्रम् । यजन्तीह ये याजकाः स्वर्गकामा न ते ते प्रभावं विदन्त्येव कामम् ॥ त्वया निर्मितोऽहं विधित्वे विहारं विकर्तुं चतुर्धा विधायादिसर्गम् । अहं वेद्मि कोऽन्यो विवेदादिमाये क्षमस्वापराधं त्वहङ्कारजं मे ॥ श्रमं येऽष्टधा योगमार्गे प्रवृत्ताः प्रकुर्वन्ति मूढाः समाधौ स्थिता वै । न जानन्ति ते नाम मोक्षप्रदं वा समुच्चारितं जातु मातर्मिषेण ॥ विचारे परे तत्त्वसंख्याविधाने पदे मोहिता नाम ते संविहाय । न किं ते विमूढा भवाब्धौ भवानि त्वमेवासि संसारमुक्तिप्रदा वै ॥ परं तत्त्वविज्ञानमाद्यैर्जनैयै-रजे चानुभूतं त्यजन्त्येव ते किम् । निमेषार्धमात्रं पवित्रं चरित्रं शिवा चाम्बिका शक्तिरीशेति नाम ॥ गर्वसे मैं वस्तुतः धन्य हो गया हूँ और आपकी कृपासे ही आज मैं यथातथ्यके ज्ञानमें निपुण हो गया हूँ । सांसारिक भयका नाश करनेमें दक्ष, मुक्तिदायिनी आप परमेश्वरीसे मैं यही प्रार्थना ॥ २८ करता हूँ कि मोहनिर्मित महादुःखदायी भवबन्धनसे मुक्त करके आप मुझे अपनी भक्तिसे समन्वित कीजिये ॥ २७-२८ ॥ आपसे ही निर्मित अद्भुत कमलसे मैं आविर्भूत हुआ हूँ और मैं आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ, अतः २ ९ मैं कैसे मुक्त हो सकूँगा? हे शिवे! इस भवसागरमें पड़े हुए मुझ मोहमग्नकी रक्षा कीजिये ॥ २ ९ ॥ इस संसारमें जो लोग आपके सनातन पवित्र चरित्रको नहीं जानते, वे लोग मुझे ही ईश्वर कहते हैं और जो यज्ञकर्ता स्वर्गकी इच्छासे [ इन्द्र आदि ३० देवताओंका ] यजन करते हैं, वे भी सर्वथा आपके प्रभावको नहीं जानते ॥ ३० ॥

हे आदिमाये! सर्वप्रथम सृष्टिको चार भागों [ अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और पिण्डज - जरायुज ] -में विभक्त करनेके लिये ही आपने मुझे ब्रह्माके पदपर बैठाया, परंतु [ मैंने यह समझ लिया कि ] मैं ही सब ३१ कुछ जानता हूँ, दूसरा कौन जान सकता है — मेरे इस अहंकारजन्य अपराधको आप क्षमा कीजिये ॥ ३१ ॥

जो लोग अष्टांगयोगका आश्रय लेते हैं और समाधि लगाकर व्यर्थ श्रम करते हैं, वे अज्ञानी हैं । हे माता! वे यह नहीं जानते कि किसी भी बहाने ३२ आपके नामोच्चारणमात्रसे ही उन्हें मुक्ति प्राप्त हो सकती है ॥ ३२ ॥

कुछ लोग ( सांख्यवादी ) तो आपके नामका आश्रय छोड़कर विमोहित हो तत्त्वोंकी संख्याके फेरमें पड़ जाते हैं; क्या वे इस भवसागरमें मूर्ख नहीं हैं? हे भवानि! संसारसे मुक्ति प्रदान करनेवाली ३३ तो आप ही हैं ॥ ३३ ॥

हे अजे! जिन विष्णु - शिव आदिने परम तत्त्वज्ञानका अनुभव कर लिया है, वे क्या आधे निमेषमात्रके लिये भी आपके पवित्र चरित्र तथा शिवा, अम्बिका, शक्ति, ईश्वरी आदि नामोंको विस्मृत ३४ करते हैं? ॥३४ ॥

पृष्ठ 274

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 274 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५ ] न किं त्वं समर्थासि विश्वं विधातुं

दृशैवाशु सर्वं चतुर्धा विभक्तम् ।

विनोदार्थमेवं विधिं मां विधाया-दिसर्गे किलेदं करोषीति कामम् ॥

हरिः पालकः किं त्वयासौ मधोर्वा तथा कैटभाद्रक्षित: सिन्धुमध्ये । हरः संहृतः किं त्वयासौ न काले कथं मे भ्रुवोर्मध्यदेशात्स जातः ॥ न ते जन्म कुत्रापि दृष्टं श्रुतं वा कुतः सम्भवस्ते न कोऽपीह वेद । किलाद्यास शक्तिस्त्वमेका भवानि स्वतन्त्रैः समस्तैरतो बोधितासि ॥ त्वया संयुतोऽहं विकर्तुं समर्थो हरिस्त्रातुमम्ब त्वया संयुतश्च । हरः सम्प्रहर्तुं त्वयैवेह युक्तः क्षमा नाद्य सर्वे त्वया विप्रयुक्ताः यथाहं हरिः शङ्करः किं तथान्ये न जाता न सन्तीह नो वाभविष्यन् न मुह्यन्ति केऽस्मिंस्तवात्यन्तचित्रे तृतीय स्कन्ध २६५ क्या आप विश्वकी रचना करनेमें समर्थ नहीं हैं? हे आदिसर्गे! आपके दृष्टिनिक्षेपमात्रसे ही यह सम्पूर्ण विश्व चार प्रकारके ( अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, पिण्डज - जरायुज ) जीवोंके रूपमें शीघ्र ही विभक्त ३५ हुआ है । इस प्रकार मुझ ब्रह्माकी सृष्टि तो आप अपने मनोविनोदके लिये करके पुनः स्वतन्त्र भावसे जो चाहती हैं, वह करती हैं ॥ ३५ ॥

[ महाप्रलयकी स्थितिमें ] यदि महासागरमें आप मधु - कैटभसे विष्णुकी रक्षा न करतीं तो वे सृष्टि-पालक कैसे बन पाते और यदि आप सबके संहारक ३६ शिवका संहार न करतीं तो वे मेरे भ्रूमध्यसे कैसे प्रकट होते? ॥ ३६ ॥

आपका जन्म कहाँ हुआ— इसे न तो किसीने देखा और न सुना और कोई यह भी नहीं जान पाया कि आपकी उत्पत्ति कहाँ हुई? हे भवानि! एकमात्र ३७ आप ही आद्या शक्ति हैं, अतएव वेदोंने इसी रूपमें आपका वर्णन किया है ॥ ३७ ॥

हे अम्ब! आपकी ही शक्तिसे प्रेरित होकर मैं सृष्टि करनेमें, विष्णु पालन करनेमें तथा शिव संहार करनेमें समर्थ होते हैं । आपकी शक्तिसे विलग रहकर अब हमलोग कुछ भी करनेमें सक्षम ॥ ३८ नहीं हैं ॥३८ ॥

जिस प्रकार मैं ( ब्रह्मा ), विष्णु और शिव उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार क्या अन्य प्राणी उत्पन्न । नहीं हुए, अथवा विद्यमान नहीं हैं या उत्पन्न नहीं होंगे? किंतु अल्प बुद्धिवाले प्राणियोंके लिये विवादास्पद विनोदे विवादास्पदेऽल्पाशयानाम् ॥ ३ ९ तथा अत्यन्त विचित्र आपके इस लीलाविनोदसे अकर्ता गुणस्पष्ट एवाद्य देवो निरीहो ऽनुपाधिः सदैवाकलश्च तथापीश्वरस्ते वितीर्णं विनोदं सुसम्पश्यतीत्याहुरेवं विधिज्ञाः दृष्टादृष्टविभेदेऽस्मिन्प्राक्त्वत्तो वै पुमान्परः नान्यः कोऽपि तृतीयोऽस्ति प्रमेये सुविचारिते कौन भ्रमित नहीं हो जाते? ॥ ३ ९ ॥ वे आदिदेव ईश्वर अकर्ता, गुणोंसे स्फुट होनेवाले, । निष्काम, उपाधिरहित तथा निर्गुण हैं, फिर भी वे आपके विस्तृत लीला - विनोदको भलीभाँति देखते रहते हैं— ज्ञानीजन ऐसा ही कहते हैं ॥ ४० ॥

॥ ४० मूर्त और अमूर्त भेदोंसे युक्त इस संसारमें आपसे पूर्व वे ही परमपुरुष थे; ज्ञान - तत्त्वपर सम्यक् प्रकारसे । विचार करनेपर यह सर्वथा सिद्ध होता है कि अन्य ॥ ४१ । तीसरा कोई भी नहीं है ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 275

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 275 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२६६ न मिथ्या वेदवाक्यं वै कल्पनीयं कदाचन विरोधोऽयं मयात्यन्तं हृदये तु विशङ्कितः एकमेवाद्वितीयं यद् ब्रह्म वेदा वदन्ति वै सा किं त्वं वाप्यसौ वा किं सन्देहं विनिवर्तय निःसंशयं न मे चेतः प्रभवत्यविशङ्कितम् । द्वित्वैकत्वविचारेऽस्मिन्निमग्नं क्षुल्लकं मनः

स्वमुखेनापि सन्देहं छेत्तुमर्हसि मामकम् ।

पुण्ययोगाच्च मे प्राप्ता सङ्गतिस्तव पादयोः ॥

पुमानसि त्वं स्त्री वासि वद विस्तरतो मम ।

ज्ञात्वाहं परमां शक्तिं मुक्तः स्यां भवसागरात् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ । [ यह सिद्धान्त है कि ] वेद - वाक्यको कभी ॥ ४२ मिथ्या नहीं समझना चाहिये । वेद ब्रह्मको अद्वितीय और एक बताते हैं; तो फिर आप क्या हैं और वह । ब्रह्म क्या है? यह विरोध मेरे हृदयमें महान् शंका उत्पन्न करता है । आप मेरे इस सन्देहका निवारण ॥ ४३ करें ॥ ४२-४३ ॥ इस प्रकार द्वैत - अद्वैतके इस विचारमें डूबा हुआ मेरा क्षुद्र मन निश्चितरूपसे शंकारहित नहीं हो पा रहा ॥ ४४ है ॥४४ ॥

अब आप ही स्वयं अपने मुखसे मेरी इस शंकाका निवारण करनेकी कृपा करें; क्योंकि [ अनेक ४५ जन्मोंके ] पुण्ययोगसे ही आपके चरणोंका यह सांनिध्य मुझे प्राप्त हुआ है ॥ ४५ ॥

आप पुरुष हैं अथवा स्त्री - यह मुझे विस्तारपूर्वक बतायें, जिससे मैं आप परम शक्तिको जानकर ४६ । भवसागर से मुक्त हो जाऊँ ॥ ४६ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे हरब्रह्मकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः भगवती जगदम्बिकाद्वारा अपने स्वरूपका वर्णन तथा ' महासरस्वती ', ' महालक्ष्मी ' और ' महाकाली ' नामक अपनी शक्तियोंको क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिवको प्रदान करना ब्रह्मोवाच

इति पृष्टा मया देवी विनयावनतेन च ।

उवाच वचनं श्लक्ष्णमाद्या भगवती हि सा ॥

देव्युवाच

सदैकत्वं न भेदोऽस्ति सर्वदैव ममास्य च ।

योऽसौ साहमहं योऽसौ भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात् ॥

आवयोरन्तरं सूक्ष्मं यो वेद मतिमान्हि सः ।

विमुक्तः स तु संसारान्मुच्यते नात्र संशयः ॥

एकमेवाद्वितीयं वै ब्रह्म नित्यं सनातनम् ।

द्वैतभावं पुनर्याति काल उत्पित्सुसंज्ञके ॥

ब्रह्माजी बोले – अत्यन्त नम्र भावसे मेरे पूछनेपर वे आद्या भगवती मधुर वचन कहने लगीं ॥ १ ॥

१ देवी बोलीं- मैं और परब्रह्म सदा एक ही हैं; कोई भेद नहीं है; क्योंकि जो वे हैं, वही मैं हूँ, और जो मैं हूँ, वही वे हैं । बुद्धिभ्रमसे ही हम दोनोंमें भेद दिखायी पड़ता है ॥२ ॥

२ इसलिये हम दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको जो बुद्धिमान् जानता है, वह संसारके बन्धनसे छूटकर सदाके लिये मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं ३ है ॥ ३ ॥

ब्रह्म अद्वितीय, एक, नित्य एवं सनातन है; केवल सृष्टि रचनाके समय वह पुनः द्वैतभावको ४ प्राप्त होता है ॥ ४ ॥

पृष्ठ 276

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 276 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ६ ]

यथाद्वीपस्तथोपाधेर्योगात्सञ्जायते द्विधा ।

छायेवादर्शमध्ये वा प्रतिबिम्बं तथावयोः ॥

भेद उत्पत्तिकाले वै सर्गार्थं प्रभवत्यज ।

दृश्यादृश्यविभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा ॥

नाहं स्त्री न पुमांश्चाहं न क्लीबं सर्गसंक्षये ।

सर्गे सति विभेदः स्यात्कल्पितोऽयं धिया पुनः ॥

अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा ।

श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा ॥

कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रा तन्द्रा जराजरा ।

विद्याविद्या स्पृहा वाञ्छा शक्तिश्चाशक्तिरेव च ॥

वसा मज्जा च त्वक्चाहं दृष्टिर्वागनृतानृता । परा मध्या च पश्यन्ती नाड्यो ऽहं विविधाश्च याः

किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं किमस्ति हि ।

सर्वमेवाहमित्येवं निश्चयं विद्धि पद्मज ॥

एतैर्मे निश्चितै रूपैर्विहीनं किं वदस्व मे तस्मादहं विधे चास्मिन्सर्गे वै वितताभवम् नूनं सर्वेषु देवेषु नानानामधरा ह्यहम् । भवामि शक्तिरूपेण करोमि च पराक्रमम् गौरी ब्राह्मी तथा रौद्री वाराही वैष्णवी शिवा वारुणी चाथ कौबेरी नारसिंही च वासवी उत्पन्नेषु समस्तेषु कार्येषु प्रविशामि तान् करोमि सर्वकार्याणि निमित्तं तं विधाय वै जले शीतं तथा वह्नावौष्ण्यं ज्योतिर्दिवाकरे निशानाथे हिमा कामं प्रभवामि यथा तथा तृतीय स्कन्ध २६७ जिस प्रकार एक ही दीपक उपाधिभेदसे दो ५ प्रकारका दिखायी देता है अथवा दर्पणमें पड़ती हुई छाया दर्पणभेदसे भिन्न - भिन्न प्रतीत होती है, उसी प्रकार मैं और ब्रह्म एक होते हुए भी उपाधिभेदसे अनेक हो जाते हैं ॥ ५ ॥

६ हे अज! जगत्का निर्माण करनेके लिये सृष्टिकालमें भेद दिखता ही है । तब दृश्यादृश्यकी प्रतीति होना अनिवार्य ही है; क्योंकि बिना दोके ७ सृष्टि होना असम्भव है ॥ ६ ॥

सृष्टिके प्रलयकालमें मैं न स्त्री हूँ, न पुरुष हूँ और न ही नपुंसक हूँ । परंतु जब पुनः सृष्टि होने ८ लगती है, तब पूर्ववत् यह भेद बुद्धिके द्वारा उत्पन्न हो जाता है ॥ ७ ॥

मैं ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति, अशक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, सत्यासत्य वाणी, परा, मध्या, पश्यन्ती आदि || १० वाणीके भेद और जो विभिन्न प्रकारकी नाड़ियाँ हैं— वह सब मैं ही हूँ॥८–१० ॥ हे पद्मयोने! आप यह देखिये कि इस संसारमें ११ मैं क्या नहीं हूँ और मुझसे पृथक् कौन - सी वस्तु है? इसलिये आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि । सब कुछ मैं ही हूँ ॥ ११ ॥

॥ १२ हे विधे! मेरे इन निश्चित रूपोंके अतिरिक्त यदि कुछ हो तो मुझे बतायें, अतः इस सृष्टिमें सर्वत्र मैं ही व्याप्त हूँ ॥१२ ॥

निश्चित ही मैं समस्त देवताओंमें भिन्न - भिन्न ॥ १३ नामोंसे विराजती हूँ तथा शक्तिरूपसे प्रकट होती हूँ । और पराक्रम करती हूँ । मैं ही गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौबेरी, नारसिंही ॥ १४ और वासवी शक्तिके रूपमें विद्यमान हूँ । सब कार्योंके उपस्थित होनेपर मैं उन देवताओंमें प्रविष्ट हो जाती । हूँ और देवविशेषको निमित्त बनाकर सब कार्य ॥ १५ सम्पन्न कर देती हूँ॥१३–१५ ॥ जलमें शीतलता, अग्निमें उष्णता, सूर्यमें प्रकाश । और चन्द्रमामें ज्योत्स्नाके रूपमें मैं ही यथेच्छ प्रकट ॥ १६ | होती हूँ ॥ १६ ॥

पृष्ठ 277

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 277 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ मया त्यक्तं विधे नूनं स्पन्दितुं न क्षमं भवेत् । विधे! इस संसारका कोई भी जीव मुझसे जीवजातं च संसारे निश्चयोऽयं ब्रुवे त्वयि ॥ १७ रहित होकर स्पन्दन भी करनेमें समर्थ नहीं हो अशक्तः शङ्करो हन्तुं दैत्यान्किल मयोज्झितः शक्तिहीनं नरं ब्रूते लोकश्चैवातिदुर्बलम्

रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनाः किल ।

शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम् ॥

पतितः स्खलितो भीतः शान्तः शत्रुवशं गतः ।

अशक्तः प्रोच्यते लोके नारुद्रः कोऽपि कथ्यते ॥

तद्विद्धि कारणं शक्तिर्यथा त्वं च सिसृक्षसि ।

भविता च यदा युक्तः शक्त्या कर्ता तदाखिलम् ॥

तथा हरिस्तथा शम्भुस्तथेन्द्रोऽथ विभावसुः ।

शशी सूर्यो यमस्त्वष्टा वरुणः पवनस्तथा ॥

धरा स्थिरा तदा धर्तुं शक्तियुक्ता यदा भवेत् ।

अन्यथा चेदशक्ता स्यात्परमाणोश्च धारणे ॥

तथा शेषस्तथा कूर्मो येऽन्ये सर्वे च दिग्गजाः ।

मद्युक्ता वै समर्थाश्च स्वानि कार्याणि साधितुम् ॥

जलं पिबामि सकलं संहरामि विभावसुम् ।

पवनं स्तम्भयाम्यद्य यदिच्छामि तथाचरम् ॥

तत्त्वानां चैव सर्वेषां कदापि कमलोद्भव । सकता । यह मेरा निश्चय है । इसे मैं आपको बता दे । रही हूँ । इसी प्रकार यदि मैं शिवको छोड़ दूँ तो वे शक्तिहीन होकर दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ नहीं हो ॥ १८ सकते । इसीलिये तो संसारमें भी अत्यन्त दुर्बल पुरुषको लोग शक्तिहीन कहते हैं ॥। १७ - १८ ॥ लोग अधम मनुष्यको विष्णुहीन या रुद्रहीन नहीं १ ९ कहते बल्कि उसे शक्तिहीन ही कहते हैं । जो गिर गया हो, स्खलित हो गया हो, भयभीत हो, निश्चेष्ट हो गया हो अथवा शत्रुके वशीभूत हो गया हो –—वह संसारमें अरुद्र नहीं कहा जाता, अपितु अशक्त ही २० कहा जाता है ॥ १ ९ -२० ॥ [ हे ब्रह्मन्! ] आप ही जब सृष्टि करना चाहते हैं तब उसमें शक्ति ही कारण है, ऐसा जानिये । २१ जब आप शक्तिसे युक्त होते हैं तभी सृष्टिकर्ता हो पाते हैं ॥ २१ ॥

इसी प्रकार विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, यम, विश्वकर्मा, वरुण और वायुदेवता भी २२ शक्ति सम्पन्न होकर ही अपना - अपना कार्य सम्पादित करते हैं ॥ २२ ॥

पृथ्वी भी जब शक्तिसे युक्त होती है, तब स्थिर २३ होकर सबको धारण करनेमें समर्थ होती है । यदि वह शक्तिहीन हो जाय तो एक परमाणुको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी । शेषनाग, कच्छप एवं दसों दिग्गज मेरी शक्ति पाकर ही अपने - अपने कार्य २४ सम्पन्न करनेमें समर्थ हो पाते हैं ॥ २३-२४ ॥ यदि मैं चाहूँ तो सम्पूर्ण संसारका जल पी जाऊँ, अग्निको नष्ट कर दूँ और वायुकी गति रोक दूँ; मैं २५ जैसा चाहती हूँ, वैसा करती हूँ ॥ २५ ॥

हे कमलोद्भव! सभी तत्त्वोंके अभावका सन्देह अब आप कभी न कीजिये; क्योंकि कभी - कभी असतां भावसन्देहः कर्तव्यो न कदाचन ॥ २६ किसी वस्तुविशेषका प्रागभाव ( जिसका आदि न हो, पर अन्त हो ) तथा प्रध्वंसाभाव ( जिसका आदि हो, कदाचित्प्रागभावः स्यात्प्रध्वंसाभाव एव वा । किंतु अन्त न हो ) उसी प्रकार हो जाता है, जिस मृत्पिण्डेषु प्रकार मिट्टी के पिण्डों में और कपालोंमें घटाभाव प्रतीत

कपालेषु घटाभावो यथा तथा ॥ २७ । होता है ॥ २६-२७ ॥

पृष्ठ 278

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 278 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ६ ] तृतीय

अद्यात्र पृथिवी नास्ति क्व गतेति विचारणे ।

सञ्जाता इति विज्ञेया अस्यास्तु परमाणवः ॥ २८

शाश्वतं क्षणिकं शून्यं नित्यानित्यं सकर्तृकम् ।

अहंकाराग्रिमञ्चैव सप्तभेदैर्विवक्षितम् ॥ २ ९

गृहाणाज महत्तत्त्वमहङ्कारस्तदुद्भवः ।

ततः सर्वाणि भूतानि रचयस्व यथा पुरा ॥ ३०

व्रजन्तु स्वानि धिष्ण्यानि विरच्य निवसन्तु वः ।

स्वानि स्वानि च कार्याणि कुर्वन्तु दैवभाविताः ॥ ३१

गृहमां विधे शक्तिं सुरूपां चारुहासिनीम् ।

महासरस्वतीं नाम्ना रजोगुणयुतां वराम् ॥ ३२

श्वेताम्बरधरां दिव्यां दिव्यभूषणभूषिताम् ।

वरासनसमारूढां क्रीडार्थं सहचारिणीम् ॥ ३३

एषा सहचरी नित्यं भविष्यति वराङ्गना ।

मावमंस्था विभूतिं मे मत्वा पूज्यतमां प्रियाम् ॥ ३४

गच्छ त्वमनया सार्धं सत्यलोकं बताशु वै ।

बीजाच्चतुर्विधं सर्वं समुत्पादय साम्प्रतम् ॥ ३५

लिङ्गकोशाश्च जीवैस्तैः सहिताः कर्मभिस्तथा ।

वर्तन्ते संस्थिताः काले तान्कुरु त्वं यथा पुरा ॥ ३६

कालकर्मस्वभावाख्यैः कारणैः सकलं जगत् ।

स्वभावस्वगुणैर्युक्तं पूर्ववत्सचराचरम् ॥ ३७

माननीयस्त्वया विष्णुः पूजनीयश्च सर्वदा ।

सत्त्वगुणप्रधानत्वादधिकः सर्वतः सदा ॥ ३८

यदा यदा हि कार्यं वो भविष्यति दुरत्ययम् ।

करिष्यति पृथिव्यां वै अवतारं तदा हरिः ॥ ३ ९

तिर्यग्योनावथान्यत्र मानुषीं तनुमाश्रितः ।

दानवानां विनाशं वै करिष्यति जनार्दनः ॥ ४०

स्कन्ध २६ ९ आज यहाँ पृथ्वी नहीं है, तब वह कहाँ चली गयी? इसपर विचार करनेपर वह पृथ्वी परमाणुरूपसे विद्यमान तो है ही - ऐसा जानना चाहिये ॥ २८ ॥

शाश्वत, क्षणिक, शून्य, नित्य, अनित्य, सकर्तृक और अहंकार — इन सात भेदोंमें सृष्टिका वर्णन विवक्षित है । इसलिये हे अज! अब आप उस महत्तत्त्वको ग्रहण कीजिये, जिससे अहंकारकी उत्पत्ति होती है । तत्पश्चात् आप पूर्वकी भाँति समस्त प्राणियोंकी रचना कीजिये ॥ २ ९ -३० ॥ अब आपलोग जाइये तथा अपने - अपने लोकोंकी रचना करके निवास कीजिये और दैवका चिन्तन करते हुए अपने - अपने कार्य कीजिये ॥ ३१ ॥

हे विधे! सुन्दर रूपवाली, दिव्य हासवाली, रजोगुणसे युक्त, श्रेष्ठ श्वेत वस्त्र धारण करनेवाली, अलौकिक, दिव्याभूषणोंसे विभूषित, उत्तम आसनपर विराजमान इस महासरस्वती नामक शक्तिको क्रीडाविहारके लिये अपनी सहचरीके रूपमें स्वीकार कीजिये ॥ ३२-३३ ॥ यह सुन्दरी सदा आपकी सहचरी बनकर रहेगी । इस पूज्यतम प्रेयसीको मेरी विभूति समझकर कभी भी इसका तिरस्कार न कीजियेगा । अब आप शीघ्र ही इसे साथ लेकर सत्यलोकमें प्रस्थान करें और तत्त्वबीजसे चार प्रकारकी समस्त सृष्टि करनेमें तत्पर हो जायँ ॥ ३४-३५ ॥ समस्त जीवों और कर्मोंके साथ जो लिंगकोश हैं, उन्हें पूर्वकी भाँति आप प्रतिष्ठित कर दें । काल, कर्म और स्वभाव नामवाले- इन कारणोंसे समस्त चराचर सृष्टिको पूर्वकी भाँति अपने - अपने स्वभाव और गुणोंसे युक्त कर दीजिये ॥ ३६-३७ ॥ विष्णु आपके सदा माननीय और पूजनीय हैं; क्योंकि सत्त्वगुणकी प्रधानताके कारण वे सर्वदा सब प्रकारसे श्रेष्ठ हैं ॥३८ ॥

जब - जब आपलोगोंका कोई कठिन कार्य उपस्थित होगा, उस समय भगवान् श्रीहरि पृथ्वीपर अवतार ग्रहण करेंगे ॥ ३ ९ ॥ कहीं तिर्यक् - योनिमें तथा कहीं मानवयोनिमें शरीर धारण करके ये भगवान् जनार्दन दानवोंका अवश्य विनाश करेंगे ॥ ४० ॥

पृष्ठ 279

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 279 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

२७० भवोऽयं ते सहायश्च भविष्यति महाबलः समुत्पाद्य सुरान्सर्वान्विहरस्व यथासुखम् ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या नानायज्ञैः सदक्षिणैः यजिष्यन्ति विधानेन सर्वान्वः सुसमाहिताः मन्नामोच्चारणात्सर्वे मखेषु सकलेषु च । सदा तृप्ताश्च सन्तुष्टा भविष्यध्वं सुराः किल

शिवश्च माननीयो वै सर्वथा यत्तमोगुणः ।

यज्ञकार्येषु सर्वेषु पूजनीयः प्रयत्नतः ॥

यदा पुनः सुराणां वै भयं दैत्याद्भविष्यति ।

शक्तयो मे तदोत्पन्ना हरिष्यन्ति सुविग्रहाः ॥

वाराही वैष्णवी गौरी नारसिंही सदाशिवा ।

एताश्चान्याश्च कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव ॥

नवाक्षरमिमं मन्त्रं बीजध्यानयुतं सदा ।

जपन्सर्वाणि कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव ॥

मन्त्राणामुत्तमोऽयं वै त्वं जानीहि महामते ।

हृदये ते सदा धार्यः सर्वकामार्थसिद्धये ॥

इत्युक्त्वा मां जगन्माता हरिं प्राह शुचिस्मिता ।

विष्णो व्रज गृहाणेमां महालक्ष्मीं मनोहराम् ॥

सदा वक्षःस्थले स्थाने भविता नात्र संशयः ।

क्रीडार्थं ते मया दत्ता शक्तिः सर्वार्थदा शिवा ॥

त्वयेयं नावमन्तव्या माननीया च सर्वदा ।

लक्ष्मीनारायणाख्योऽयं योगो वै विहितो मया ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ । ये महाबली शंकरजी भी आपकी सहायता ४१ करेंगे । अब आप समस्त देवताओंका सृजन करके स्वेच्छया सुखपूर्वक विहार कीजिये ॥ ४१ ॥

। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यलोग दक्षिणायुक्त नानाविध यज्ञोंसे विधिपूर्वक पूर्ण मनोयोगके साथ ॥ ४२ आप सबकी पूजा करेंगे ॥ ४२ ॥

हे देवो! सभी यज्ञोंमें मेरे नामका उच्चारण करते ही आप सभी लोग निश्चितरूपसे सदैव तृप्त ॥ ४३ । एवं सन्तुष्ट हो जायँगे ॥ ४३ ॥

आपलोग तमोगुणसम्पन्न शंकरजीका सब प्रकारसे सम्मान कीजियेगा और सभी यज्ञकार्योंमें प्रयत्नपूर्वक ४४ उनकी पूजा कीजियेगा ॥ ४४ ॥

जब कभी भी देवताओंके समक्ष दैत्योंसे भय उत्पन्न होगा, उस समय सुन्दर रूपोंवाली वाराही, वैष्णवी, गौरी, नारसिंही, सदाशिवा तथा अन्य ४५ देवियोंके रूपमें मेरी शक्तियाँ प्रकट होकर उनका भय दूर कर देंगी । अतः हे कमलोद्भव! अब आप अपने कार्य करें ॥ ४५-४६ ॥ ४६ हे कमलोद्भव! बीज तथा ध्यानसे युक्त मेरे इस नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए आप समस्त कार्य कीजिये ॥ ४७ ॥

हे महामते! आप इस मन्त्रको सभी मन्त्रोंसे ४७ श्रेष्ठ जानिये । सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आपको इस मन्त्रको सदा अपने हृदयमें धारण करना चाहिये ॥ ४८ ॥

४८ मुझसे ऐसा कहकर पवित्र मुसकानवाली जगज्जननीने भगवान् विष्णुसे कहा - हे विष्णो! अब आप इन मनोहर महालक्ष्मीको स्वीकार कीजिये ४ ९ और यहाँसे प्रस्थान कीजिये ॥ ४ ९ ॥ ये आपके वक्षःस्थलमें सदा निवास करेंगी, इसमें सन्देह नहीं है । आपके लीलाविनोदके लिये मैंने आपको यह सभी मनोरथ प्रदान करनेवाली कल्याणमयी ५० शक्ति अर्पित की है ॥५० ॥

आप इनका सर्वदा सम्मान करते रहियेगा और कभी भी तिरस्कार न कीजियेगा । लक्ष्मीनारायण ५१ नामक यह संयोग मेरे द्वारा ही रचा गया है ॥५१ ॥

पृष्ठ 280

देवी भागवत पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 280 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ६ ] तृतीय

जीवनार्थं कृता यज्ञा देवानां सर्वथा मया ।

अविरोधेन सङ्गेन वर्तितव्यं त्रिभिः सदा ॥ ५२

त्वं च वेधाः शिवस्त्वेते देवा मद्गुणसम्भवाः ।

मान्याः पूज्याश्च सर्वेषां भविष्यन्ति न संशयः ॥ ५३

ये विभेदं करिष्यन्ति मानवा मूढचेतसः ।

निरयं ते गमिष्यन्ति विभेदान्नात्र संशयः ॥ ५४

यो हरिः स शिवः साक्षाद्यः शिवः स स्वयं हरिः ।

एतयोर्भेदमातिष्ठन्नरकाय भवेन्नरः ॥ ५५

तथैव द्रुहिणो ज्ञेयो नात्र कार्या विचारणा ।

अपरो गुणभेदोऽस्ति शृणु विष्णो ब्रवीमि ते ॥ ५६

मुख्यः सत्त्वगुणस्तेऽस्तु परमात्मविचिन्तने ।

गौणत्वेऽपि परौ ख्यातौ रजोगुणतमोगुणौ ॥ ५७

लक्ष्म्या सह विकारेषु नानाभेदेषु सर्वदा ।

रजोगुणयुतो भूत्वा विहरस्वानया सह ॥ ५८

वाग्बीजं कामराजं च मायाबीजं तृतीयकम् ।

मन्त्रोऽयं त्वं रमाकान्त मद्दत्तः परमार्थदः ॥ ५ ९

गृहीत्वा जप तं नित्यं विहरस्व यथासुखम् ।

न ते मृत्युभयं विष्णो न कालप्रभवं भयम् ॥ ६०

यावदेष विहारो मे भविष्यति सुनिश्चयः ।

संहरिष्याम्यहं सर्वं यदा विश्वं चराचरम् ॥ ६१

भवन्तोऽपि तदा नूनं मयि लीना भविष्यथ ।

स्मर्तव्योऽयं सदा मन्त्रः कामदो मोक्षदस्तथा ॥ ६२

उद्गीथेन च संयुक्तः कर्तव्यः शुभमिच्छता ।

कारयित्वाथ वैकुण्ठं वस्तव्यं पुरुषोत्तम ॥ ६३

विहरस्व यथाकामं चिन्तयन्मां सनातनीम् । स्कन्ध २७१ मैंने देवताओंकी जीविकाके लिये ही यज्ञोंकी रचना की है । आप तीनों विरोधभावनासे रहित होकर व्यवहार कीजिये ॥ ५२ ॥

आप ( विष्णु ), ब्रह्मा, शिव तथा ये सभी देवता मेरे ही प्रभावसे प्रादुर्भूत हुए हैं । अतएव निस्सन्देह आपलोग सभी प्राणियोंके मान्य एवं पूज्य होंगे ॥ ५३ ॥

जो अज्ञानी मनुष्य इनमें भेदभाव करेंगे, वे इस विभेदके कारण नरकमें पड़ेंगे । इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५४ ॥

जो विष्णु हैं, वे ही साक्षात् शिव हैं और जो शिव हैं, वे ही स्वयं विष्णु हैं । इन दोनोंमें भेद रखनेवाला मनुष्य नरकगामी होता है ॥ ५५ ॥

ब्रह्माजीके सम्बन्धमें भी ऐसा ही जानिये; इसमें कोई सन्देह नहीं है । हे विष्णो! गुणोंके कारण इनमें जो भेद हैं; उन्हें आपको बता रही हूँ, आप सुनें ॥ ५६ ॥

परमात्म - चिन्तनकी दृष्टिसे आपका मुख्य गुण सत्त्वगुण है । दूसरे रजोगुण तथा तमोगुण आपके लिये गौण हैं । अतएव विभिन्न भेदयुक्त विकारोंमें रजोगुणसे सम्पन्न होकर आप इन लक्ष्मीके साथ विहार कीजिये ॥ ५७-५८ ॥ हे लक्ष्मीकान्त! मेरे द्वारा आपको दिया गया वाग्बीज ( ऐं ), कामराज ( क्लीं ) तथा तृतीय मायाबीज ( ह्रीं ) इनसे युक्त यह मन्त्र परमार्थ प्रदान करनेवाला है । आप इसे ग्रहण करके निरन्तर इसका जप कीजिये तथा सुखपूर्वक विहार कीजिये । हे विष्णो! ऐसा करनेसे आपको न तो मृत्युभय होगा और न कालजनित भय ही होगा ॥ ५ ९ -६० ॥ जबतक मैं विहार करती रहूँगी, तबतक यह सृष्टि निश्चितरूपसे रहेगी और जब मैं सम्पूर्ण | चराचर जगत्का संहार कर दूँगी, उस समय आपलोग भी मुझमें समाहित हो जायँगे । आपलोग समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले इस मन्त्रका अनवरत स्मरण करते रहें ॥ ६१-६२ ॥ अपना कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको इस मन्त्रके साथ ‘ ओंकार ' जोड़कर चतुरक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये । हे पुरुषोत्तम! अब आप वैकुण्ठका निर्माण कराकर उसीमें निवास कीजिये और मुझ सनातनीका सतत ध्यान करते हुए इच्छापूर्वक विहार कीजिये ॥ ६३३ ॥