देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 281–290
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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२७२ ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा वासुदेवं सा त्रिगुणा प्रकृतिः परा निर्गुणा शङ्करं देवमवोचदमृतं वचः देव्युवाच गृहाण हर गौरीं त्वं महाकालीं मनोहराम् कैलासं कारयित्वा च विहरस्व यथासुखम् । मुख्यस्तमोगुणस्तेऽस्तु गौणौ सत्त्वरजोगुणौ विहरासुरनाशार्थं रजोगुणतमोगुणौ । तपस्तप्तं तथा कर्तुं स्मरणं परमात्मनः शर्व सत्त्वगुणः शान्तो गृहीतव्यः सदानघ । सर्वथा त्रिगुणा यूयं सृष्टिस्थित्यन्तकारकाः
एभिर्विहीनं संसारे वस्तु नैवात्र कुत्रचित् ।
वस्तुमात्रं तु यद् दृश्यं संसारे त्रिगुणं हि तत् ॥
दृश्यं च निर्गुणं लोके न भूतं नो भविष्यति ।
निर्गुणः परमात्मासौ न तु दृश्यः कदाचन ॥
सगुणा निर्गुणा चाहं समये शङ्करोत्तमा ।
सदाहं कारणं शम्भो न च कार्यं कदाचन ॥
सगुणा कारणत्वाद्वै निर्गुणा पुरुषान्तिके ।
महत्तत्त्वमहङ्कारो गुणाः शब्दादयस्तथा ॥
कार्यकारणरूपेण संसरन्ते त्वहर्निशम् ।
सदुद्भूतस्त्वहङ्कारस्तेनाहं कारणं शिवा ॥
अहङ्कारश्च मे कार्यं त्रिगुणोऽसौ प्रतिष्ठितः ।
अहङ्कारान्महत्तत्त्वं बुद्धिः सा परिकीर्तिता ॥
महत्तत्त्वं हि कार्यं स्यादहङ्कारो हि कारणम् ।
तन्मात्राणि त्वहङ्कारादुत्पद्यन्ते सदैव हि ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ ब्रह्माजी बोले - – [ हे नारद! ] विष्णुसे ऐसा ॥ ६४ । कहकर उस त्रिगुणात्मिका तथा निर्गुणा परा प्रकृतिने देवाधिदेव शंकरसे अमृतमय वचन कहा ॥ ६४३ ॥
। देवी बोलीं- हे हर! आप इन मनोहरा महाकाली गौरीको अंगीकार कीजिये और कैलासशिखरकी ॥ ६५ रचना कराकर वहाँ सुखपूर्वक विहार कीजिये । तमोगुण आपमें प्रधानगुणके रूपमें विद्यमान रहेगा और सत्त्वगुण तथा रजोगुण आपमें गौणरूपसे व्याप्त ॥ ६६ | रहेंगे ॥ ६५-६६ ॥ रजोगुण और तमोगुणके द्वारा दैत्योंके विनाशके लिये आप वहाँ विहार करें और हे शर्व! परमात्माका ॥ ६७ स्मरण - ध्यान करनेके लिये आप तप कर चुके हैं । आप शान्तिप्रधान सत्त्वगुणका अवलम्बन कीजिये । हे अनघ! त्रिगुणात्मक आप तीनों देवता सृष्टि, पालन ॥ ६८ एवं संहार करनेवाले हैं ॥६७-६८ ॥ संसारमें कहीं भी कोई भी वस्तु इन तीनों गुणोंसे रहित नहीं है । जगत्की जितनी भी दृश्य ६ ९ वस्तुएँ हैं, वे सब त्रिगुणात्मिका हैं ॥ ६ ९ ॥ इस संसारमें ऐसी कोई भी दृश्य वस्तु गुणरहित न तो हुई और न होगी । निर्गुण तो एकमात्र ७० वह परमात्मा ही है और वह कभी दृष्टिगोचर नहीं होता ॥ ७० ॥
हे शंकर! समय आनेपर मैं श्रेष्ठरूपा ही वह ७१ सगुणा या निर्गुणा हो जाती हूँ । हे शम्भो! मैं सर्वदा कारण हूँ, कार्य कभी नहीं ॥ ७१ ॥
किसी कारणविशेषसे मैं सगुणा होती हूँ तो उस ७२ परमपुरुषके सांनिध्य में निर्गुणा रहती हूँ । महत्तत्त्व, अहंकार, तीनों गुण और शब्द आदि विषय कार्य-कारणभावसे निरन्तर गतिशील रहते हैं । सत्से अहंकार ७३ उत्पन्न होता है; इसीलिये मैं शिवा सबका कारण हूँ ॥ ७२-७३ ॥ अहंकार मेरा कार्य है और वह त्रिगुणात्मक ७४ रूपमें प्रतिष्ठित है । उस अहंकारसे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है; उसीको बुद्धि कहा गया है ॥ ७४ ॥
वह महत्तत्त्व कार्य है तथा अहंकार उसका ७५ । कारण है । इसी अहंकारसे तन्मात्राओंकी सदा
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अ ० ६ ]
कारणं पञ्चभूतानां तानि सर्वसमुद्भवे ।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि च ॥
महाभूतानि पञ्चैव मनः षोडशमेव च ।
कार्यञ्च कारणञ्चैव गणोऽयं षोडशात्मकः ॥
परमात्मा पुमानाद्यो न कार्यं न च कारणम् ।
एवं समुद्भवः शम्भो सर्वेषामादिसम्भवे ॥
संक्षेपेण मया प्रोक्तस्तव तत्र समुद्भवः ।
व्रजन्त्वद्य विमानेन कार्यार्थं मम सत्तमाः ॥
स्मरणाद्दर्शनं तुभ्यं दास्येऽहं विषमे स्थिते ।
स्मर्तव्याहं सदा देवाः परमात्मा सनातनः ॥
उभयोः स्मरणादेव कार्यसिद्धिरसंशयम् । ब्रह्मोवाच इत्युक्त्वा विससर्जास्मान्दत्त्वा शक्तीः सुसंस्कृताः ॥
विष्णवेऽथ महालक्ष्मीं महाकालीं शिवाय च ।
महासरस्वतीं मह्यं स्थानात्तस्माद्विसर्जिताः ॥
स्थलान्तरं समासाद्य ते जाताः पुरुषा वयम् ।
चिन्तयन्तः स्वरूपं तत्प्रभाव परमाद्भुतम् ॥
विमानं तत्समासाद्य संरूढास्तत्र वै त्रयः ।
न द्वीपोऽसौ न सा देवी सुधासिन्धुस्तथैव च ।
पुनर्दृष्टं विमानं वै तत्रास्माभिर्न चान्यथा ॥
आसाद्य तस्मिन्वितते विमाने प्राप्ता वयं पङ्कजसन्निधौ च । महार्णवे यत्र हृतौ दुरत्ययौ मुरारिणा तौ मधुकैटभाख्यौ ॥ तृतीय स्कन्ध २७३ उत्पत्ति होती है । वे तन्मात्राएँ [ पृथ्वी, जल आदि ] ७६ पंचमहाभूतोंका कारण हैं । सबके सृजनमें पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और सोलहवाँ मन – यह षोडशात्मक समूह कार्य और कारणरूप ७७ होता है ॥ ७५–७७ ॥ वह आदिपुरुष परमात्मा न कार्य है और न कारण । हे शिव! सबकी प्रारम्भिक सृष्टिके उत्पत्तिका ७८ यही क्रम है ॥ ७८ ॥
अभी मैंने आपलोगोंकी यह उत्पत्ति - परम्परा संक्षेपमें कही । इसलिये हे श्रेष्ठदेव! अब आपलोग ७ ९ मेरा कार्य सम्पन्न करनेके लिये इस विमानसे प्रस्थान करें ॥ ७ ९ ॥ जब आपलोगोंपर कोई संकट आयेगा, तब मैं ८० स्मरणमात्रसे तत्काल आपलोगोंको दर्शन दूँगी । अतः हे देवो! आपलोग सर्वदा मेरा तथा सनातन परमात्माका स्मरण करते रहें । हम दोनोंके स्मरणसे ही निःसन्देह आपलोगोंकी कार्यसिद्धि होगी ॥ ८० ३ ॥ ८१ ब्रह्माजी बोले- हे नारद! ऐसा कहकर भगवतीने अपनी अद्भुत शक्तियाँ प्रदानकर हमें विदा किया । विष्णुको महालक्ष्मी, शिवको महाकाली और मुझे ८२ महासरस्वती प्रदान करके उस स्थानसे विदा कर दिया ॥ ८१-८२ ॥ उनके स्वरूप तथा अत्यन्त अद्भुत प्रभावका स्मरण करते हुए अन्य स्थानपर पहुँचकर हमलोग ८३ पुनः पुरुषरूपमें हो गये ॥८३ ॥
तब लौटकर हम तीनों पुन: उसी विमानमें बैठ गये । [ हमने देखा कि ] वहाँ न तो वह मणिद्वीप है, न वे महामाया हैं और न वह सुधासागर है । उस ८४ समय वहाँ उस विमानके अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता था ॥ ८४ ॥
उस विशाल विमानमें बैठकर हम तीनों पुनः उसी महासागरमें विद्यमान उस कमलके निकट पहुँचे, जहाँ भगवान् विष्णुने मधु - कैटभ नामक दुर्धर्ष ८५ दैत्योंका वध किया था ॥ ८५ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे ब्रह्मणे श्रीदेव्या उपदेशवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
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२७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ अथ सप्तमोऽध्यायः ब्रह्माजीके द्वारा परमात्मा के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूपका वर्णन; सात्त्विक, राजस और तामस शक्तिका वर्णन; पंचतन्मात्राओं, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचीकरण - क्रियाद्वारा सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन ब्रह्मोवाच एवंप्रभावा सा देवी मया दृष्टाथ विष्णुना शिवेनापि महाभाग तास्ता देव्यः पृथक्पृथक् व्यास उवाच इत्याकर्ण्य पितुर्वाक्यं नारदो मुनिसत्तमः पप्रच्छ परमप्रीतः प्रजापतिमिदं वचः नारद उवाच पुमानाद्योऽविनाशी यो निर्गुणो ऽच्युतिरव्ययः दृष्टश्चैवानुभूतश्च तद्वदस्व पितामह त्रिगुणा वीक्षिता शक्तिर्निर्गुणा कीदृशी पितः तस्याः स्वरूपं मे ब्रूहि पुरुषस्य च पद्मज यदर्थञ्च मया तप्तं श्वेतद्वीपे महातपः दृष्टाः सिद्धा महात्मानस्तापसा गतमन्यवः परमात्मा न सम्प्राप्तो मयासौ दृष्टिगोचरः पुनः पुनस्तपस्तीव्रं कृतं तत्र प्रजापते भवता सगुणा शक्तिर्दृष्टा तात मनोरमा निर्गुणा निर्गुणश्चैव कीदृशौ तौ वदस्व मे व्यास उवाच इति पृष्टः पिता तेन नारदेन प्रजापतिः उवाच वचनं तथ्यं स्मितपूर्वं पितामहः ब्रह्मोवाच निर्गुणस्य मुने रूपं न भवेद् दृष्टिगोचरम् । दृश्यञ्च नश्वरं यस्मादरूपं दृश्यते कथम् ब्रह्माजी बोले- हे महाभाग! [ नारद! ] मैंने, । विष्णु तथा शंकरने इस प्रकारके प्रभाववाली उन ॥ १ देवीको तथा अन्य सभी देवियोंको पृथक् - पृथक् देखा ॥ १ ॥
व्यासजी बोले- पिताका यह वचन सुनकर । मुनिवर नारदने परम प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्माजीसे ॥ २ यह बात पूछी ॥ २ ॥
नारदजी बोले - हे पितामह! आपने जिन आदि, अविनाशी, निर्गुण, अच्युत तथा अव्यय । परमपुरुषका दर्शन तथा अनुभव किया, उनके ॥ ३ विषयमें बताइये ॥ ३ ॥
हे पिताजी! आपने त्रिगुणसम्पन्ना देवीका दर्शन । तो कर लिया है; निर्गुणा शक्ति कैसी होती हैं? हे ॥ ४ कमलोद्भव! अब आप मुझे उन शक्तिका तथा परमपुरुषका स्वरूप बताइये ॥ ४ ॥
। जिनके लिये मैंने श्वेतद्वीपमें महान् तपश्चर्या ॥ ५ की और क्रोधशून्य सिद्धपुरुषों, महात्माओं तथा तपस्वियोंके दर्शन किये; वे परमात्मा मुझे दृष्टि-। गोचर नहीं हुए । हे प्रजापते! इसके बाद भी ॥ ६ [ उनके दर्शनार्थ ] मैंने वहाँ बार - बार घोर तपस्या की॥५-६ ॥ । हे तात! आपने मनोरमा सगुणा शक्तिका दर्शन ॥ ७ किया है । आप मुझे बताइये कि निर्गुणा शक्ति और निर्गुण परमात्मा कैसे हैं? ॥७ ॥
व्यासजी बोले – नारदजीने अपने पिता प्रजापति । ब्रह्मासे ऐसा पूछा, तब उन पितामहने मुसकराते हुए ॥ ८ रहस्यपूर्ण वचन कहा ॥८ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे मुने! निर्गुणतत्त्वका रूप दृष्टिगोचर नहीं हो सकता; क्योंकि जो दिखायी पड़ता है, वह तो नाशवान् होता है । जो रूपरहित है, ॥ ९ वह दृष्टिगोचर कैसे हो सकता है? ॥ ९ ॥
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अ ० ७ ]
निर्गुणा दुर्गमा शक्तिर्निर्गुणश्च तथा पुमान् ।
ज्ञानगम्यौ मुनीनां तु भावनीयौ तथा पुनः ॥
अनादिनिधनौ विद्धि सदा प्रकृतिपूरुषौ ।
विश्वासेनाभिगम्यौ तौ नाविश्वासेन कर्हिचित् ॥
चैतन्यं सर्वभूतेषु यत्तद्विद्धि परात्मकम् ।
तेजः सर्वत्रगं नित्यं नानाभावेषु नारद ॥
तञ्च ताञ्च महाभाग व्यापकौ विद्धि सर्वगौ ।
ताभ्यां विहीनं संसारे न किञ्चिद्वस्तु विद्यते ॥
विचिन्त्य सदा देहे मिश्रीभूतौ सदाव्ययौ ।
एकरूपौ चिदात्मानौ निर्गुणौ निर्मलावुभौ ॥
या शक्तिः परमात्मासौ योऽसौ सा परमा मता ।
अन्तरं नैतयोः कोऽपि सूक्ष्मं वेद च नारद ॥
अधीत्य सर्वशास्त्राणि वेदान्साङ्गांश्च नारद ।
न जानाति तयोः सूक्ष्ममन्तरं विरतिं विना ॥
अहङ्कारकृतं सर्वं विश्वं स्थावरजङ्गमम् ।
कथं तद्रहितं पुत्र भवेत्कल्पशतैरपि ॥
निर्गुणं सगुणः पुत्र कथं पश्यति चक्षुषा ।
सगुणं च महाबुद्धे चेतसा संविचारय ॥
पित्तेनाच्छादिता जिह्वा चक्षुश्च मुनिसत्तम ।
कटु पित्तं विजानाति रसं रूपं न तत्तथा ॥
गुणैः समावृतं चेतः कथं जानाति निर्गुणम् ।
अहङ्कारोद्भवं तच्च तद्विहीनं कथं भवेत् ॥
तृतीय स्कन्ध २७५ निर्गुणा शक्तिको जान पाना अत्यन्त दुरूह है १० और उसी प्रकार निर्गुण परमपुरुषका साक्षात्कार भी अति दुष्कर है । ये दोनों केवल मुनिजनोंके द्वारा ज्ञानसे प्राप्त तथा अनुभूत किये जा सकते हैं ॥ १० ॥
आप प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको आदि - अन्तसे ११ सर्वदा रहित जानिये । ये दोनों विश्वाससे जाने जा सकते हैं; अविश्वाससे कभी नहीं ॥ ११ ॥
हे नारद! सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य विद्यमान है, १२ उसे ही परमात्मस्वरूप जानो । तेज: स्वरूप वे परमात्मा सर्वत्र व्याप्त हैं तथा सदा विराजमान हैं ॥ १२ ॥
हे महाभाग! उन परमपुरुष तथा प्रकृतिको सर्वव्यापी तथा सर्वगामी समझिये । इस संसारमें कोई १३ भी पदार्थ उन दोनोंसे रहित नहीं है ॥१३ ॥
सर्वदा अव्यय, एकरूप, चिदात्मा, निर्गुण तथा निर्मल- उन दोनों ( प्रकृति - पुरुष ) - को एक ही शरीरमें १४ सम्मिश्रित मानकर सदा इनका चिन्तन करना चाहिये ॥ १४ ॥
हे नारद! जो शक्ति हैं, वे ही परमात्मा हैं और जो परमात्मा हैं, वे ही परमशक्ति मानी गयी हैं १५ इन दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको कोई भी नहीं जान सकता ॥ १५ ॥
हे नारद! कोई भी व्यक्ति समस्त शास्त्रों तथा १६ अंगों सहित वेदोंका अध्ययन करके भी विरक्तिके बिना उन दोनोंके सूक्ष्म अन्तरको नहीं जान पाता है ॥ १६ ॥
हे पुत्र! जड - चेतनरूप यह सारा जगत् अहंकारसे निर्मित है; ऐसी स्थितिमें सैकड़ों कल्पोंमें भी यह १७ अहंकारसे रहित कैसे हो सकता है? ॥ १७ ॥
हे पुत्र! सगुण मनुष्य निर्गुणको नेत्रसे कैसे देख सकता है? अतः हे महाबुद्धे! उन परमात्माके सगुण १८ रूपका मनसे सम्यक् ध्यान करते रहो ॥ १८ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! पित्तसे आच्छादित जिह्वा जिस प्रकार यथार्थ रसका अनुभव न करके केवल कटुरसका १ ९ अनुभव करती है तथा पित्ताच्छादित नेत्र यथार्थ रूप न देखकर केवल पीले रंगको ही देखता है, उसी प्रकार गुणोंसे आच्छादित मन उस निर्गुण परमात्माको कैसे जान पायेगा? क्योंकि मन भी तो अहंकारसे २० उत्पन्न हुआ है, तब वह मन अहंकारसे रहित कैसे
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२७६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
यावन्न गुणविच्छेदस्तावत्तद्दर्शनं कुतः ।
तं पश्यति तदा चित्ते यदाहङ्कारवर्जितः ॥
नारद उवाच
स्वरूपं देवदेवेश त्रयाणामेव विस्तरात् ।
गुणानां यत्स्वरूपोऽस्ति ह्यहङ्कारस्त्रिरूपकः ॥
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च तथापरः ।
विभेदेन स्वरूपाणि वदस्व पुरुषोत्तम ॥
यज्ज्ञात्वा विप्रमुच्येऽहं ज्ञानं तद्वद मे प्रभो ।
गुणानां लक्षणान्येव विततानि विभागशः ॥
ब्रह्मोवाच
त्रयाणां शक्तयस्तिस्त्रस्तद् ब्रवीमि तवानघ ।
ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिरर्थशक्तिस्तथापरा ॥
सात्त्विकस्य ज्ञानशक्ती राजसस्य क्रियात्मिका ।
द्रव्यशक्तिस्तामसस्य तिस्त्रश्च कथितास्तव ॥
तेषां कार्याणि वक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः ।
तामस्या द्रव्यशक्तेश्च शब्दस्पर्शसमुद्भवः ॥
रूपं रसश्च गन्धश्च तन्मात्राणि प्रचक्षते ।
शब्दैकगुणमाकाशं वायुः स्पर्शगुणस्तथा ॥
सुरूपैकगुणोऽग्निश्च जलं रसगुणात्मकम् ।
पृथ्वी गन्धगुणा ज्ञेया सूक्ष्माण्येतानि नारद ॥
दशैतानि मिलित्वा तु द्रव्यशक्तियुतानि वै ।
तामसाहङ्कारजः स्यात्सर्गस्तदनुवृत्तिकः ॥
राजस्याश्च क्रियाशक्तेरुत्पन्नानि शृणुष्व मे ।
श्रोत्रं त्वग्रसना चक्षुर्ग्राणं चैव च पञ्चमम् ॥
ज्ञानेन्द्रियाणि चैतानि तथा कर्मेन्द्रियाणि च ।
वाक्पाणिपादपायुश्च गुह्यान्तानि च पञ्च वै ॥
प्राणोऽपानश्च व्यानश्च समानोदानवायवः ।
पञ्चदश मिलित्वैव राजसः सर्ग उच्यते ॥
साधनानि किलैतानि क्रियाशक्तिमयानि च ।
उपादानं किलैतेषां चिदनुवृत्तिरुच्यते ॥
हो सकता है? जबतक अन्त: करण गुणोंसे रहित नहीं २१ होता तबतक परमात्माका दर्शन कैसे सम्भव है? जब मनुष्य अहंकारविहीन हो जाता है, तब वह अपने हृदयमें उनका साक्षात्कार कर लेता है ॥ १ ९ –२१ ॥ नारदजी बोले – हे देवदेवेश! तीनों गुणोंका जो २२ स्वरूप है, उसका विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिये और त्रिगुणात्मक अहंकार स्वरूपका भी वर्णन कीजिये । हे पुरुषोत्तम! सात्त्विक, राजस तथा तीसरे तामस २३ अहंकारके स्वरूप - भेदको बताइये । इस प्रकार गुणोंके विस्तृत लक्षणोंको विभागपूर्वक मुझको बताइये । हे २४ प्रभो! मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिसे जानकर मैं पूर्णरूपेण मुक्त हो जाऊँ ॥ २२–२४ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे निष्पाप! इस त्रिविध अहंकारकी तीन शक्तियाँ हैं, मैं उन्हें बताता हूँ । वे हैं - ज्ञानशक्ति, २५ क्रियाशक्ति तथा तीसरी अर्थशक्ति ॥ २५ ॥
उनमें सात्त्विक अहंकारकी ज्ञानशक्ति, राजसकी क्रियाशक्ति और तामसकी द्रव्यशक्ति- ये तीन शक्तियाँ २६ आपको बता दीं ॥ २६ ॥
हे नारद! अब मैं उनके कार्योंको सम्यक् रूपसे २७ बताऊँगा, सुनिये । तामसी द्रव्यशक्ति ( अर्थशक्ति ) -से उत्पन्न शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध - ये तन्मात्राएँ कही गयी हैं । आकाशका एकमात्र गुण शब्द, वायुका २८ गुण स्पर्श, अग्निका गुण रूप, जलका गुण रस तथा पृथ्वीका गुण गन्ध है - ऐसा जानना चाहिये । हे नारद! २ ९ ये तन्मात्राएँ अत्यन्त सूक्ष्म हैं ॥ २७–२९ ॥ द्रव्यशक्तिसे युक्त इन दसों ( पाँच तन्मात्राओं तथा उनके पाँच गुणों ) - से मिलकर तामस अहंकारकी ३० अनुवृत्तिसे सृष्टिकी रचना होती है ॥३० ॥
अब राजसी क्रियाशक्तिसे उत्पन्न होनेवाली ३१ इन्द्रियोंके विषयमें मुझसे सुनिये । श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और नासिका - ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और गुह्यांग - ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ उससे ३२ उत्पन्न हैं । प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान— ये पाँच वायु होती हैं । इन पन्द्रह ( पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच ३३ कर्मेन्द्रिय, पाँच वायु ) - से मिलकर होनेवाली सृष्टि राज़सी सृष्टि कही जाती है । ये सभी साधन क्रियाशक्तिसे सदा युक्त रहते हैं और इनके उपादानकारणको चित्-३४ | अनुवृत्ति कहा जाता है | ३१ - ३४ ॥
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अ ० ७ ]
ज्ञानशक्तिसमायुक्ताः सात्त्विकाच्च समुद्भवाः ।
दिशो वायुश्च सूर्यश्च वरुणश्चाश्विनावपि ॥
ज्ञानेन्द्रियाणां पञ्चानां पञ्चाधिष्ठातृदेवताः ।
चन्द्रो ब्रह्मा तथा रुद्रः क्षेत्रज्ञश्च चतुर्थकः ॥
इत्यन्तःकरणाख्यस्य बुद्ध्यादेश्चाधिदैवतम् । चत्वार्येव तथा प्रोक्ताः किलाधिष्ठातृदेवताः मनसा सह चैतानि नूनं पञ्चदशैव तु । सात्त्विकस्य तु सर्वोऽयं सात्त्विकाख्यः प्रकीर्तितः स्थूलसूक्ष्मादिभेदेन द्वे रूपे परमात्मनः । ज्ञानरूपं निराकारं निदानं तत्प्रचक्षते
साधकस्य तु ध्यानादौ स्थूलरूपं प्रचक्षते ।
शरीरं सूक्ष्ममेवेदं पुरुषस्य प्रकीर्तितम् ॥
मम चैव शरीरं वै सूत्रमित्यभिधीयते ।
स्थूलं शरीरं वक्ष्यामि ब्रह्मणः परमात्मनः ॥
शृणु नारद यत्नेन यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यते ।
तन्मात्राणि पुरोक्तानि भूतसूक्ष्माणि यानि वै ॥
पञ्चीकृत्य तु तान्येव पञ्चभूतसमुद्भवः । पञ्चीकरणभेदोऽयं शृणु संवदतः किल
प्रथमं रसतन्मात्रामुपादाय मनस्यपि ।
कल्पयेच्च तथा तद्वै यथा भवति चोदकम् ॥
शिष्टानां चैव भूतानामंशान्कृत्वा पृथक्पृथक् ।
उदके मिश्रयेच्चांशान्कृते रसमये ततः ॥
तदा भूतविभागे च चैतन्ये च प्रकाशिते । तृतीय स्कन्ध २७७ दिशाएँ, वायु, सूर्य, वरुण और दोनों अश्विनीकुमार ३५ ज्ञानशक्तिसे युक्त हैं और ये सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं । पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके ये ही पाँच अधिष्ठातृदेवता हैं । इसी प्रकार बुद्धि आदि अन्तःकरणचतुष्टयके चन्द्रमा, ब्रह्मा, रुद्र तथा क्षेत्रज्ञ - ये अधिदेव हैं । ये ३६ चारों अधिष्ठातृदेवता कहे गये हैं । मनसहित ये सब पन्द्रह होते हैं । यह सात्त्विक अहंकारकी सृष्टि है और ' सात्त्विकी सृष्टि ' कही गयी है ॥ ३५-३८ ॥ ॥ ३७ स्थूल और सूक्ष्मभेदसे परमात्माके दो रूप होते हैं, उनमें ज्ञानरूप निराकारस्वरूप सबका कारण कहा गया है ॥ ३ ९ ॥ ॥ ३८ साधकके ध्यान आदि कार्योंके लिये परमात्माके स्थूल रूपकी उपासना कही गयी है । यह उस परमपुरुषका सूक्ष्म शरीर ही बताया गया है ॥ ४० ॥
॥ ३ ९ मेरा यह शरीर सूत्रसंज्ञक है । अब मैं उस परब्रह्म परमात्माके स्थूल विराट् स्वरूपका वर्णन करूँगा । हे नारद! आप उसे सुनें, जिसे सावधानीसे सुनकर मनुष्य मुक्त हो जाता है । इसके पहले मैंने ४० गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द - इन पंच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – इन सूक्ष्म पंच महाभूतोंका वर्णन विस्तारसे कर दिया ४१ है ॥ ४१-४२ ॥ उन्हीं पाँचोंको मिलाकर पंचीकरणकी क्रियासे परमात्माने पंचभूतमय देहकी सृष्टि की है । अब ४२ मैं पंचीकरणका भेद बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनिये - ॥ ४३ ॥
सबसे पहले रसरूप तन्मात्राका मनमें निश्चय ॥ ४३ करके जिस स्थूल रूपमें जल होता है, वैसी ही उसकी दो अंशोंमें भावना करे ॥ ४४ ॥
उसी प्रकार अवशिष्ट चार भूतोंके भी दो - दो भाग करके, उसमेंसे आधे भागको पृथक् कर ले । ४४ शेष आधे अंशको चार प्रकारसे अलग करके आधे भागसे रहित उन अंशोंमें मिला दे । रस तन्मात्राको आधे भाग जलमें मिलाकर अवशिष्टभूत ४५ तन्मात्राके आधेको चारों भागोंमें मिश्रित कर दे । ऐसा करनेसे जब रसमय स्थूल जल हो जाय तब अन्य चार भूतोंके पंचीकरणका विभाग करे । उन
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२७८ चैतन्यस्य प्रवेशात्तु तदाहमिति संशयः प्रतीयमाने तेनैव विशेषेणाभिमानतः आदिनारायणो देवो भगवानिति चोच्यते घनीभूतेऽथ भूतानां विभागे स्पष्टतां गते वृद्धिं प्राप्य गुणैश्चेत्थमेकैकगुणवृद्धितः आकाशस्य गुणश्चैकः शब्द एव न चापरः शब्दस्पर्शी च वायोश्च द्वौ गुणौ परिकीर्तितौ अग्नेः शब्दश्च स्पर्शश्च रूपमेते त्रयो गुणाः शब्दस्पर्शरूपरसाश्चत्वारो वै जलस्य च स्पर्शशब्दरसा रूपं गन्धश्च पृथिवीगुणाः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ ॥ ४६ । पंचीकृत पंचभूतोंमें अधिष्ठानताके कारण उनके प्रतिबिम्बरूपसे जब चैतन्य प्रविष्ट हो जाता है, तब । उस पंचभूतात्मक शरीरमें ' अहम् ' भावरूप संशय उत्पन्न हो जाता है । वह संशय स्पष्टरूपसे जब ॥ ४७ भासित होने लगता है, तब उस स्थूल शरीरमें देहाभिमानके साथ चैतन्य जाग्रत् होने लगता है, वही । दिव्य चैतन्य आदिनारायण भगवान्, परमात्मा आदि ॥ ४८ नामोंसे पुकारा जाता है॥४५–४७ ॥ इस प्रकार पंचीकरणसे सभी भूतोंका विभाग । स्पष्ट हो जाने पर आकाश आदि सभी पंचभूत पूर्वोक्त ॥ ४ ९ तन्मात्राओंके कारण अपने - अपने विशेष गुणोंसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं और एक - एक गुणकी वृद्धिसे एक - एक भूत उत्पन्न हो जाता है ॥ ४८ ॥
। आकाशका केवल एकमात्र गुण शब्द है, दूसरा ॥ ५० नहीं । वायुके शब्द और स्पर्श- ये दो गुण कहे गये हैं । शब्द, स्पर्श और रूप- ये तीन गुण अग्निके हैं I । शब्द, स्पर्श, रूप और रस- ये चार गुण जलके हैं । एवं मिलितयोगैश्च ब्रह्माण्डोत्पत्तिरुच्यते ॥ ५१ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध - ये पाँच गुण पृथ्वीके हैं । इस प्रकार इन पंचीकृत महाभूतोंके योगसे सर्वे जीवा मिलित्वैव ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति कही जाती है । ब्रह्माण्डके अंशसे ब्रह्माण्डांशसमुद्भवाः । उत्पन्न सभी जीवोंको मिलाकर चौरासी लाख जीव-चतुरशीतिलक्षाश्च प्रोक्ता वै जीवजातयः ॥ ५२ योनियाँ कही गयी हैं ॥ ४ ९ –५२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे तत्त्वनिरूपणवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणका वर्णन ब्रह्मोवाच सर्गोऽयं कथितस्तात यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना गुणानां रूपसंस्थां वै शृणुष्वैकाग्रमानसः सत्त्वं प्रीत्यात्मकं ज्ञेयं सुखात्प्रीतिसमुद्भवः आर्जवं च तथा सत्यं शौचं श्रद्धा क्षमा धृतिः अनुकम्पा तथा लज्जा शान्तिः सन्तोष एव च एतैः सत्त्वप्रतीतिश्च जायते निश्चला सदा ब्रह्माजी बोले- हे तात! आपने जो मुझसे । पूछा था, वह सृष्टिका वर्णन मैंने कर दिया । ॥ १ अब गुणोंका स्वरूप कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥१ ॥
। सत्त्वगुणको प्रीतिस्वरूप समझना चाहिये, ॥ २ वह प्रीति सुखसे उत्पन्न होती है । सरलता, सत्य, शौच, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, कृपा, लज्जा, शान्ति और । सन्तोष – इन लक्षणोंसे सदैव निश्चल सत्त्वगुणकी ॥ ३ । प्रतीति होती है ॥२-३ ॥
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अ ० ८ ] तृतीय
श्वेतवर्णं तथा सत्त्वं धर्मे प्रीतिकरं सदा ।
सच्छ्रद्धोत्पादकं नित्यमसच्छ्रद्धानिवारकम् ॥४
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च तथापरा ।
श्रद्धा तु त्रिविधा प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५
रक्तवर्णं रजः प्रोक्तमप्रीतिकरमद्भुतम् ।
अप्रीतिर्दुःखयोगत्वाद्भवत्येव सुनिश्चिता ॥ ६
प्रद्वेषोऽथ तथा द्रोहो मत्सरः स्तम्भ एव च ।
उत्कण्ठा च तथा निद्रा श्रद्धा तत्र च राजसी ॥ ७
मानो मदस्तथा गर्वो रजसा किल जायते ।
प्रत्येतव्यं रजस्त्वेतैर्लक्षणैश्च विचक्षणैः ॥ ८
कृष्णवर्णं तमः प्रोक्तं मोहनं च विषादकृत् ।
आलस्यं च तथाज्ञानं निद्रा दैन्यं भयं तथा ॥ ९
विवादश्चैव कार्पण्यं कौटिल्यं रोष एव च ।
वैषम्यं वातिनास्तिक्यं परदोषानुदर्शनम् ॥ १०
प्रत्येतव्यं तमस्त्वेतैर्लक्षणैः सर्वथा बुधैः ।
तामस्या श्रद्धया युक्तं परतापोपपादकम् ॥ ११
सत्त्वं प्रकाशयितव्यं नियन्तव्यं रजः सदा ।
संहर्तव्यं तमः कामं जनेन शुभमिच्छता ॥ १२
अन्योन्याभिभवाच्चैते विरुध्यन्ति परस्परम् ।
तथान्योन्याश्रयाः सर्वे न तिष्ठन्ति निराश्रयाः ॥ १३
सत्त्वं न केवलं क्वापि न रजो न तमस्तथा ।
मिलिताश्च सदा सर्वे तेनान्योन्याश्रयाः स्मृताः ॥ १४
अन्योन्यमिथुनाच्चैव विस्तारं कथयाम्यहम् ।
शृणु नारद यज्ज्ञात्वा मुच्यते भवबन्धनात् ॥ १५
स्कन्ध २७ ९ सत्त्वगुणका वर्ण श्वेत है, यह सर्वदा धर्मके प्रति प्रीति उत्पन्न करता है, सत् - श्रद्धाका आविर्भाव करता है तथा असत् - श्रद्धाको समाप्त करता है ॥ ४ ॥
तत्त्वदर्शी मुनियोंने तीन प्रकारकी श्रद्धा बतलायी है - सात्त्विकी, राजसी एवं तीसरी तामसी ॥ ५ ॥
रजोगुण रक्तवर्णवाला कहा गया है । यह आश्चर्य एवं अप्रीतिको उत्पन्न करता है । दुःखसे योगके कारण ही निश्चितरूपसे अप्रीति उत्पन्न होती है ॥ ६ ॥
जहाँ ईर्ष्या, द्रोह, मत्सर, स्तम्भन, उत्कण्ठा एवं निद्रा होती है, वहाँ राजसी श्रद्धा रहती है ॥७ ॥
अभिमान, मद और गर्व – ये सब भी राजसी श्रद्धासे ही उत्पन्न होते हैं । अतः विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि वे इन लक्षणोंद्वारा राजसी श्रद्धा समझ लें ॥ ८ ॥
तमोगुणका वर्ण कृष्ण होता है । यह मोह और विषाद उत्पन्न करता है । आलस्य, अज्ञान, निद्रा, दीनता, भय, विवाद, कायरता, कुटिलता, क्रोध, विषमता, अत्यन्त नास्तिकता और दूसरोंके दोषको देखनेका स्वभाव – ये तामसिक श्रद्धाके लक्षण हैं । पण्डितजन इन लक्षणोंसे तामसी श्रद्धा जान लें; तामसी श्रद्धासे युक्त ये सभी लक्षण परपीड़ादायक हैं ॥९ -११ ॥ आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवालेको अपनेमें निरन्तर सत्त्वगुणका विकास करना चाहिये, रजोगुणपर नियन्त्रण रखना चाहिये तथा तमोगुणका नाश कर डालना चाहिये ॥ १२ ॥
ये तीनों गुण एक - दूसरेका उत्कर्ष होनेकी दशामें परस्पर विरोध करने लगते हैं । ये सब एक-दूसरेके आश्रित हैं, निराश्रय होकर नहीं रहते ॥ १३ ॥
सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुणमेंसे कोई एक अकेला कभी नहीं रह सकता; ये सभी सदैव मिलकर रहते हैं, इसीलिये ये अन्योन्याश्रय सम्बन्धवाले कहे गये हैं ॥ १४ ॥
हे नारद! ध्यानसे सुनिये, अब मैं इनके अन्योन्याश्रय - सम्बन्धसे होनेवाले विस्तारका वर्णन करता हूँ, जिसे जानकर मनुष्य भव - बन्धनसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है । इसमें आपको किसी प्रकारका
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२८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८
सन्देहोऽत्र न कर्तव्यो ज्ञात्वेत्युक्तं मया वचः ।
ज्ञातं तदनुभूतं यत्परिज्ञातं फले सति ॥
श्रवणाद्दर्शनाच्चैव सपद्येव महामते ।
संस्कारानुभवाच्चैव परिज्ञातं न जायते ॥
श्रुतं तीर्थं पवित्रञ्च श्रद्धोत्पन्ना च राजसी ।
निर्गतस्तत्र तीर्थे वै दृष्टं चैव यथाश्रुतम् ॥
स्नातस्तत्र कृतं कृत्यं दत्तं दानं च राजसम् ।
स्थितस्तत्र कियत्कालं रजोगुणसमावृतः ॥
रागद्वेषान्न निर्मुक्तः कामक्रोधसमावृतः ।
पुनरेव गृहं प्राप्तो यथापूर्वं तथास्थितः ॥
श्रुतं च नानुभूतं वै तेन तीर्थं मुनीश्वर ।
न प्राप्तं च फलं यस्मादश्रुतं विद्धि नारद ॥
निष्पापत्वं फलं विद्धि तीर्थस्य मुनिसत्तम ।
कृषेः फलं यथा लोके निष्पन्नान्नस्य भक्षणम् ॥
पापदेहविकारा ये कामक्रोधादयः परे ।
लोभ मोहस्तथा तृष्णा द्वेषो रागस्तथा मदः ॥
असूयेर्ष्या क्षमाशान्तिः पापान्येतानि नारद ।
न निर्गतानि देहात्तु तावत्पापयुतो नरः ॥
कृते तीर्थे यदैतानि देहान्न निर्गतानि चेत् ।
निष्फलः श्रम एवैकः कर्षकस्य यथा तथा ॥
श्रमेणापीडितं क्षेत्रं कृष्टा भूमिः सुदुर्घटा ।
उप्तं बीजं महार्घं च हिता वृत्तिरुदाहृता ॥
सन्देह नहीं करना चाहिये । सम्यक् प्रकारसे जानकर १६ ही मैंने यह बात कही है । मैंने पहले इसे जाना, तत्पश्चात् इसका अनुभव किया और पुनः परिणाम देखकर इसका परिज्ञान प्राप्त किया है ॥ १५-१६ ॥ हे महामते! मात्र देख लेने, सुन लेने अथवा १७ संस्कारजनित अपने अनुभवसे ही किसी भी वस्तुका तत्काल परिज्ञान नहीं हो जाता ॥ १७ ॥
जैसे किसी पवित्र तीर्थके विषयमें सुनकर किसी व्यक्तिके हृदयमें राजसी श्रद्धा उत्पन्न हो १८ गयी और वह उस तीर्थमें चला गया । वहाँ पहुँचकर उसने वही देखा जैसा पहले सुना था । उस तीर्थमें उसने स्नान करके तीर्थकृत्य किया और १ ९ राजसी दान भी किया । रजोगुणसे युक्त रहकर उस व्यक्तिने कुछ समयतक वहाँ तीर्थवास भी किया । किंतु ऐसा करके भी वह राग - द्वेषसे मुक्त नहीं हो पाया और काम - क्रोध आदि विकारोंसे २० आच्छादित ही रहा । पुनः अपने घर लौट आया और वह पूर्वकी भाँति वैसे ही रहने लगा ॥ १८ - २० ॥ हे मुनीश्वर! उस व्यक्तिने तीर्थकी महिमा तो २१ सुनी थी, किंतु उसका सम्यक् अनुभव नहीं किया । इसी कारण उसे तीर्थयात्राका कोई फल नहीं प्राप्त हुआ । अतः हे नारद! उसका सुनना न सुननेके बराबर समझें ॥२१ ॥
२२ मुनिश्रेष्ठ! आप यह जान लें कि तीर्थयात्राका फल पापसे छुटकारा प्राप्त करना है; यह वैसे ही है जैसे संसारमें कृषिका फल उत्पादित अन्नका २३ भक्षण है ॥ २२ ॥
जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णा, द्वेष, राग, मद, परदोषदर्शन, ईर्ष्या, सहनशीलताका अभाव और अशान्ति आदि हैं, वे पापमय शरीरके विकार हैं । २४ हे नारद! जबतक ये पाप शरीरसे नहीं निकलते, तबतक मनुष्य पापी ही रहता है ॥ २३-२४ ॥ तीर्थयात्रा करनेपर भी यदि ये पाप देहसे नहीं निकले तो तीर्थाटन करनेका वह परिश्रम उसी प्रकार २५ व्यर्थ है, जैसे किसी किसानका । उस किसानने परिश्रमपूर्वक खेतको खोदा, अत्यन्त कठोर भूमिको जोता, उसमें महँगा बीज बोया और अन्य आवश्यक २६ | कार्य किये तथा फलप्राप्तिकी इच्छासे उसकी रक्षाके
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अ ० ८ ] तृतीय स्कन्ध २८१
अहोरात्रं परिक्लिष्टो रक्षणार्थं फलोत्सुकः ।
काले सुप्तस्तु हेमन्ते वने व्याघ्रादिभिर्भृशम् ॥
भक्षितं शलभैः सर्वं निराशश्च कृतः पुनः ।
तद्वत्तीर्थ श्रमः पुत्र कष्टदो न फलप्रदः ॥
सत्त्वं समुत्कटं जातं प्रवृद्धं शास्त्रदर्शनात् ।
वैराग्यं तत्फलं जातं तामसार्थेषु नारद ॥
प्रसह्याभिभवत्येव तद्रजस्तमसी उभे ।
रजः समुत्कटं जातं प्रवृत्तं लोभयोगतः ॥
तत्तथाभिभवत्येव तमःसत्त्वे तथा उभे ।
तमस्तथोत्कटं भूत्वा प्रवृद्धं मोहयोगतः ॥
तत्सत्त्वरजसी चोभे सङ्गम्याभिभवत्यपि ।
विस्तरं कथयाम्यद्य यथाभिभवतीति वै ॥
यदा सत्त्वं प्रवृद्धं वै मतिर्धर्मे स्थिता तदा ।
न चिन्तयति बाह्यार्थं रजस्तमः समुद्भवम् ॥
अर्थं सत्त्वसमुद्भूतं गृह्णाति च न चान्यथा ।
अनायासकृतं चार्थं धर्मं यज्ञं च वाञ्छति ॥
सात्त्विकेष्वेव भोगेषु कामं वै कुरुते तदा ।
राजसेषु न मोक्षार्थं तामसेषु पुनः कुतः ॥
एवं जित्वा रजः पूर्वं ततश्च तमसो जयः ।
सत्त्वं च केवलं पुत्र तदा भवति निर्मलम् ॥
यदा रजः प्रवृद्धं वै त्यक्त्वा धर्मान् सनातनान् ।
अन्यथाकुरुते धर्माच्छ्रद्धां प्राप्य तु राजसीम् ॥
लिये दिन - रात अनेक कष्ट सहे, किंतु फल लगनेका २७ | समय हेमन्त - काल आनेपर वह सो गया, जिससे व्याघ्र आदि वन्य जन्तुओं तथा टिड्डियोंने उस फसलको खा लिया और अन्तमें वह किसान सर्वथा निराश हो गया । उसी प्रकार हे पुत्र! तीर्थमें किया २८ गया वह श्रम भी कष्टदायक ही सिद्ध होता है, उसका कोई फल नहीं मिलता ॥ २५ - २८ ॥ हे नारद! शास्त्रके अवलोकनसे सत्त्वगुण २ ९ समुन्नत होता है तथा बड़ी तेजीसे बढ़ता है । उसका फल यह होता है कि तामस पदार्थोंके प्रति वैराग्य हो जाता है ॥२ ९ ॥ ३० वह सत्त्वगुण रज और तम — इन दोनोंको बलपूर्वक दबा देता है, लोभके कारण रजोगुण अत्यन्त तीव्र हो जाता है, वह बढ़ा हुआ रजोगुण सत्त्व तथा तम — इन दोनोंको दबा देता है । उसी प्रकार ३१ तमोगुण मोहके कारण तीव्रताको प्राप्त होकर सत्त्वगुण तथा रजोगुण – इन दोनोंको दबा देता है । ये गुण जिस प्रकार एक- दूसरेको दबाते हैं? उसे मैं यहाँपर ३२ विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ ॥ ३० - ३२ ॥ जब सत्त्वगुण बढ़ता है, उस समय बुद्धि धर्ममें स्थित रहती है । उस समय वह रजोगुण या तमोगुणसे ३३ उत्पन्न बाह्य विषयोंका चिन्तन नहीं करती है ॥ ३३ ॥
उस समय बुद्धि सत्त्वगुणसे उत्पन्न होनेवाले कार्यको अपनाती है; इसके अतिरिक्त वह अन्य ३४ । कार्योंमें नहीं फँसती । बुद्धि बिना प्रयासके ही धर्म तथा यज्ञादि कर्ममें प्रवृत्त हो जाती है । मोक्षकी अभिलाषासे मनुष्य उस समय सात्त्विक पदार्थोंके भोगमें प्रवृत्त रहता है; वह राजसी भोगोंमें लिप्त नहीं होता, तब भला वह तमोगुणी कार्योंमें क्यों ३५ लगेगा? ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकार पहले रजोगुणको जीत करके वह तमोगुणको पराजित करता है । हे तात! उस समय ३६ एकमात्र विशुद्ध सत्त्वगुण ही स्थित रहता है ॥ ३६ ॥
जब मनुष्य मनमें रजोगुणकी वृद्धि होती है, तब वह सनातन धर्मोंको त्यागकर राजसी श्रद्धा ३७ वशीभूत हो विपरीत धर्माचरण करने लगता है ॥ ३७ ॥