देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 31–40
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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३० श्रीमद्देवीभागवत तथा वस्त्र देकर निम्न मन्त्रसे उनकी प्रार्थना करे-बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ॥
व्यासरूपप्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय ॥
महाध्वजका पूजन तदनन्तर ईशानकोणमें आकर निम्न मन्त्रसे महाध्वजका पूजन करे-आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढा -नड्वानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ॥ ॐ महाध्वजाय नमः सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि कहकर महाध्वजका पूजन । करे तथा निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे-ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः । सबुनिया उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनि मसतश्च विवः ॥ अनया पूजया महाध्वजस्थब्रह्मा प्रीयताम् । एक आचमनी जल छोड़े । आरती सभी स्थापित देवोंकी आरती करे-इद हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीरः सर्वगण स्वस्तये । आत्मसन प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि । अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त ॥ आ रात्रि पार्थिवः रजः पितुरप्रायि धामभिः । दिवः सदा सि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥ ।
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥
गणपत्याद्यावाहितदेवताभ्यो नमः कर्पूरनीराजनम् समर्पयामि । जलेन शीतलीकरणम् । आरतीके चारों ओर घुमाकर जल छोड़े । पुष्पैर्देवताभिवन्दनम् । देवताओंको पुष्पद्वारा प्रणाम करे । आत्माभिवन्दनम् । हस्तप्रक्षालनम् । हाथ धोकर पुष्प लेकर निम्न प्रार्थना करे—
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे । स मे कामान् कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ॥ कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ॥ ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्तपर्यायी स्यात् सार्वभौमः सार्वायुषान्तादापरार्धात् । पृथिव्यै समुद्र-पर्यन्ताया एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे । आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति । ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥
ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमारि धीमहि ।
तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च ।
पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वरि ॥
प्रधानपीठस्थित भगवतीके चरणकमलोंमें पुष्पांजलि निवेदितकर प्रदक्षिणा करे तथा निम्न मन्त्रसे नमस्कार करे ।
नमः सर्वहितार्थायै जगदाधारहेतवे ।
साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रणयेन मया कृतः ॥
स्तुतिपाठ - यदि समय हो तो निम्न स्तुतिपाठ करे— न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो ० श्रीमद्देवीभागवतपाठका विनियोग ॐ अस्य श्रीमद्देवीभागवताख्यस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीकृष्णद्वैपायन ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमणिद्वीपाधि-वासिनी भगवती महाशक्तिः देवता, ब्रह्म बीजम्, गायत्री शक्तिः, भुक्तिमुक्तिके कीलकम्, पुरुषार्थ-चतुष्टयसिद्ध्यर्थं पाठे विनियोगः । फिर इस प्रकार भगवतीका ध्यान करे-बालार्कायुततेजसां त्रिनयनां रक्ताम्बरोल्लासिनीं नानालङ्कृतिराजमानवपुषां बालोडुराट्शेखराम् । हस्तैरिक्षुधनुःसृणिं सुमशरं पाशं मुदा बिभ्रतीं श्रीचक्रस्थितसुन्दरीं त्रिजगतामाधारभूतां स्मरेत् ॥ अथवा सुधाकूपारान्तस्त्रिदशतरु वाटीविलसिते
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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि ३१ मणिद्वीपे चिन्तामणिमयगृहे चित्ररुचिरे । विराजन्तीमम्बां परशिवहृदि स्मेरवदनां नरो ध्यात्वा भोगं भजति खलु मोक्षञ्च लभते ॥ ब्रह्मेशाच्युतशक्राद्यैर्महर्षिभिरुपासिता 1 जगतां श्रेयसे सास्तु मणिद्वीपाधिदेवता ॥ ( श्रीमद्देवीभा ० माहात्म्य ५ । १०१-१०२ ) अमृतसागरके तटपर कल्पवृक्षकी वाटिकासे सुशोभित मणिद्वीपमें स्थित बहुवर्णचित्रित चिन्तामणिमय भवनमें तथा परम शिवके हृदयमें विराजमान रहनेवाली और मन्द -मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली जगदम्बाका ध्यान करके मनुष्य सांसारिक सुखोंका उपभोग करता है और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है । इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र – आदि देवताओं एवं समस्त महर्षियोंद्वारा पूजित मणिद्वीपनिवासिनी वे भगवती संसारका कल्याण करती रहें । ध्यानके अनन्तर पाठ आरम्भ करे । नवाह्न पारायणके विश्रामस्थल प्रतिदिन क्रमशः निम्नलिखित स्थलोंपर विश्राम करना चाहिये— | प्रथम दिन तृतीयस्कन्धके तृतीय अध्यायकी समाप्तिपर ( ३५ ) | द्वितीय " चतुर्थ | तृतीय " " पंचम | चतुर्थ " षष्ठ पंचम " " सप्तम षष्ठ " अष्टम सप्तम " नवम अष्टम " दशम नवम " द्वादश " " अष्टम " " ( ३५ ) | अष्टादश " " ( ३५ ) 11 अष्टादश " " " " ( ३५ ) 11 अष्टादश " 1 " ( ३१ ) " " सप्तदश 11 11 ( ३ ९ ) " " अट्ठाईसवें " 11 ( ३५ ) " " त्रयोदश " 1 12 ( ३५ ) स्कन्धकी समाप्तिपर " " ( ३८ हवनविधान श्रीमद्देवीभागवतके कथा - श्रवणके अनन्तर हवनका भी विधान है । सपत्नीक यजमान हवनकुण्ड या स्थण्डिलके समीप पूर्वाभिमुख बैठ जाय । कुशोदकके द्वारा अपना तथा हवन सामग्रीका प्रोक्षण करके स्वस्तिवाचनपूर्वक श्रीगणपति आदि आवाहित देवोंका संक्षेपमें पूजन करके हवनका निम्न संकल्प करे-संकल्प – हाथमें त्रिकुश, अक्षत, जल लेकर बोले- ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य पूर्वोच्चारित ग्रहगणगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ गोत्र: शर्मा / वर्मा / गुप्तोऽहं कृतस्य श्रीमद्देवीभागवत-कथाश्रवणस्य फलप्राप्त्यर्थं यज्ञाङ्गहोमकर्मणि नवग्रह-होमपूर्वकं प्रधानभूत श्रीदुर्गादेवतानिमित्तं पायसाज्येन तथा श्रीदेव्याः वैदिकमन्त्रेण नवार्णेन सप्तशतीमन्त्रैश्च यथासम्भवं सम्पादितैराज्यादिहवनद्रव्यैः यथासंख्येन होमं करिष्ये । इस प्रकार संकल्पकर जल छोड़ दे, हवनके लिये ब्राह्मणोंका वरण कर ले । तदनन्तर पंचभूसंस्कार करके अपने सम्मुख अग्नि स्थापित करके संक्षेपमें ग्रहोंका पूजन करे । तदनन्तर असंख्यातरुद्रका पूजन करके कुशकण्डिका करे । कुण्डस्थ देवताओं तथा अग्निका पूजन करके
अग्निकी प्रार्थना करे-अग्ने त्वमैश्वरं तेजः पावनं परमं हितम् ।
तस्मात्त्वदीयहृपद्मे श्रीदुर्गां तर्पयाम्यहम् ॥
अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम् ।
हिरण्यवर्णममलं समृद्धं विश्वतोमुखम् ॥
तदनन्तर आघाराज्यहोम करते समय प्रत्येक आहुतिके अनन्तर स्रुवामें स्थित हुतशेष घृतको प्रोक्षणीपात्रमें डालता जाय । फिर हाथमें त्रिकुश, अक्षत, जल लेकर द्रव्य समर्पणके लिये बोले - इमानि सम्पादितहवनीयद्रव्याणि या या यक्ष्यमाणदेवतास्ताभ्यस्ताभ्यो मया परित्यक्तानि न ममेति - — कहकर जल भूमिपर छोड़ दे और बोले-यथा दैवतानि सन्तु । तदनन्तर गणेशाम्बिकाके लिये आहुति देकर नवग्रहोंका हवन करे । प्रधान देवके लिये आहुति दे ।
ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः ।
। पितरं च प्रयन्त्स्वः ॥
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३२ श्रीमद्देवीभागवत तथा नवार्णमन्त्र ( ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ) - से १००८ या १०८ बार हवन करके सप्तशती -मन्त्रोंसे आहुतियाँ दे । तदनन्तर आवाहित देवताओंका हवन करे, फिर अग्निका पूजनकर स्विष्टकृत् होम करके भूरादि नवाहुति प्रदान करे । तदनन्तर दशदिक्पाल, नवग्रहों और क्षेत्रपालके लिये बलि निवेदित करे । अन्तमें पूर्णाहुति करे । वसोर्धाराके मन्त्रोंसे घृतसे आहुति दे । तदनन्तर अग्निकी प्रदक्षिणा करे, हवनीय कुण्डसे भस्म धारण करे, फिर संस्रवप्राशन करके प्रणीतोदकसे मार्जन कर ले और ब्रह्माको पूर्णपात्र प्रदान करे । आचार्यादिको दक्षिणा प्रदान करे । आचार्य यजमानको श्रेयोदान प्रदान करे । इसके बाद उत्तर पूजन करके कर्पूरनीराजन करे और मन्त्र- पुष्पांजलि चढ़ाये । तदनन्तर आचार्य यजमानके वामभागमें पत्नीको बैठाकर रुद्रकलशके जल तथा प्रधान कलशके जलसे अभिषेक करके भूयसी दक्षिणा तथा ब्राह्मण– भोजनका संकल्प करे और यजमानको तिलकाशीर्वाद दे । अन्तमें क्षमा - प्रार्थना करे तथा आवाहित देवोंका विसर्जन करे और निम्न मन्त्रोंको पढ़ते हुए समस्त कर्म भगवान्को समर्पित कर दे—
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् ।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥
यत्पादपङ्कजस्मरणाद् यस्य नामजपादपि ।
न्यूनं कर्म भवेत् पूर्णं तं वन्दे साम्बमीश्वरम् ॥
श्रीदेवीभागवतकी आरती आरति जग - पावन पुरानकी । मातृ- - चरित्र - विचित्र - खानकी 11 देवि - भागवत परमहंस विमल कलि- कल्मष -युगपत् परमानन्द - सुधा संतत सन्मति नूतन अतिशय सुन्दर ।
मुनि - जन- मन- सुखकर ।
ज्ञान- रवि मोह - तिमिर - हर ॥
परम मधुर सुषमा - वितानकी ॥ १ ॥
विष - विषम - निवारिणि 1 भोग - सुयोग सुमहौषध सकल सद्गति नित्य परमप्रभा
प्रसारिणि ।
विस्तारिणि ॥
अज्ञान -हानकी ॥ २ ॥
सुमङ्गलदायिनि ।
मुक्ति- प्रदायिनि ।
विभूति - विधायिनि ॥
परतत्त्व - ज्ञानकी ॥ ३ ॥
आर्ति- अशान्ति, भ्रान्ति- -भय- : -भंजनि ।
पाप - ताप माया - मद - गंजनि ।
शुचि सेवक - - मन - मानस - रंजनि ॥
लीला - रस मधुमय निधानकी ॥ ४ ॥
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000 J.M.Prasa गीताप्रेस गोरखपुर राजराजेश्वरी श्रीललिताम्बा
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देवताओं द्वारा सिंहवाहिनी श्रीदुर्गाकी स्तुति गीताप्रेस ,गोरखपुर C
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GAN 0 - O - G! गीताप्रेस, गोरखपुर विदेहराज जनक तथा परम विरक्त श्रीशुकदेवजी
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परीक्षित् - पुत्र महाराज जनमेजयके सर्पयज्ञमें आस्तीकका प्रवेश गीताप्रेस गोरखपुर
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गीताप्रेस, गोरखपुर भगवान् हयग्रीवद्वारा वेदोंका उद्धारकर ब्रह्माजीको प्रदान करना
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श्रीजगदम्बाका देवताओंको दर्शन देना इन्द्र रामा गीताप्रेस, गोरखपुर नमः शिवायै कल्याण्यै शान्त्यै पुष्ट्यै नमो नमः । भगवत्यै नमो देव्यै रुद्राण्यै सततं नमः ॥ कालरात्र्यै तथाम्बायै इन्द्राण्यै ते नमो नमः । सिद्ध्यै बुद्धयै तथा वृद्ध्यै वैष्णव्यै ते नमो नमः ॥
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गोरखपुर , गीताप्रेस पहुँचना पास कौशिकीके भगवती सुग्रीवका दूत शुम्भासुरके Deolaliker