देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 21–30
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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२० श्रीमद्देवीभागवत मनोवांछित वर प्रदान कीजिये; आपको बार- बार । प्रणाम है । तत्पश्चात् ऋष्यादिका न्यासकर पाठ आरम्भ करे । पाठ आरम्भ करनेके बाद फिर अध्यायके बीचमें नहीं रुकना चाहिये । रुक जानेपर पुन: उसी अध्यायको आरम्भसे पढ़ना चाहिये । मध्यम स्वरसे श्रद्धापूर्वक धीरे - धीरे स्पष्ट पाठ करना चाहिये । गीत गाना, जल्दी करना, सिर कँपाना, अशुद्ध या अस्पष्ट उच्चारण करना, बिना अर्थ समझे ही पाठ करना - ये पाठके दोष हैं । पाठमें यथासाध्य इन दोषोंसे बचे रहना चाहिये । क्रोध, मद, त्वरा बाधक हैं । मनकी पवित्रता, शरीरकी पवित्रता अधिक सहायक है । दोपहरके बाद एक घड़ी विश्रामकर तथा लघुशंका आदिसे निवृत्त होकर पुनः पाठ करना चाहिये । कथारम्भमें सोम, बुध, गुरु, शुक्रवार, अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, अनुराधा, मूल तथा श्रवण नक्षत्र शुभ हैं । बृहस्पति जिस नक्षत्रमें हों, वहाँसे चौथे नक्षत्रतक कथा आरम्भ करनेसे धर्मप्राप्ति, ५ से ८ वेंतक । लक्ष्मीप्राप्ति, पुनः ९ में सिद्धि, १० से १४ तक सुख प्राप्त होता है । गुर्वधिष्ठित नक्षत्रसे २० नक्षत्रोंतकमें कथारम्भ करनेसे पीड़ा, २४ वेंतक राजभय तथा २७ वेंतक ज्ञानकी प्राप्ति होती है । इस चक्रका ध्यान रखना आवश्यक है । ( किंतु नवरात्रोंमें देवीभागवत कथामें चक्र - विचार अपेक्षित नहीं है । ) अनुष्ठानके समय ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, सत्यवचन तथा इन्द्रियसंयम अत्यन्त आवश्यक है । पत्तलमें भोजन करना चाहिये । बैगन, दाल, बहेड़ा, मधु, तैल, बासी तथा दूषित अन्न नहीं खाना चाहिये । रजस्वला आदिसे स्पृष्ट तथा मसूर, मूली, हींग, प्याज, गाजर, कुम्हड़ा तथा नलिका आदिका शाक भी नहीं खाना चाहिये । प्रतिदिन कुमारीपूजन करना चाहिये या प्रतिदिन क्रमशः दुगुनी, तिगुनी पूजा बढ़ाते जाय । एक वर्षकी कन्याकी पूजा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उसे गन्धादिका कोई भी ज्ञान नहीं होता । दोसे नौ वर्षोंतककी कन्याएँ पूज्य हैं । अन्तिम दिन गायत्रीसहस्रनामका पाठ करना चाहिये और सप्तशतीके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये अथवा गायत्री या नवार्णमन्त्रसे हवन किया जाय । यह संक्षेपमें देवीभागवतकी पाठविधि है । श्रीमद्देवीभागवतकथा ( पारायण ) एवं अनुष्ठान - विधि जो लोग विधि - विधान से श्रीमद्देवीभागवतकी कथा अथवा पारायण - पाठ कराना चाहते हों, उनके लिये पूजन आदिकी विस्तृत विधि और क्रम नीचे लिखा जा । रहा है— स्नान - सन्ध्योपासनादि कृत्यसे निवृत्त होकर पवित्र आसनपर सपत्नीक पूर्वाभिमुख बैठ जाय और पत्नीको । अपने दाहिनी ओर बैठाये । चन्दन आदिसे तिलक कर लें । दोनों हाथोंकी अनामिका अँगुलीमें पवित्री धारण कर ले । आचमन, प्राणायाम कर ले, शिखामें ग्रन्थि लगा लें । तदनन्तर् ग्रन्थिबन्धन कर ले और भगवान् विष्णुका ध्यान कर लें । रक्षादीप जलाकर हाथ धो ले । अधिकारप्राप्तिके लिये गोत्रयनिष्क्रयद्रव्यका संकल्प— श्रीमद्देवीभागवतश्रवणमें अधिकारप्राप्तिके लिये प्रायश्चिनके रूपमें तीन गौओंके निष्क्रयद्रव्यका दान करे देवद्र तथा त्रिकुश, अक्षत, पुष्प, जल लेकर । निम्न संकल्प करे-ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपर्वे श्रीश्वेतवाराहनाम्नि प्रथमकल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगस्य प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भूर्लोके भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे " " क्षेत्रे बौद्धावतारे नाम्नि संवत्सरे श्रीसूर्ये ' अयने ऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे “ मासे - " पक्षे तिथौ वासरे राशिस्थिते श्रीसूर्ये शेषेषु ग्रहेषु | यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ' गोत्र: शर्मा / वर्मा / गुप्तः सपत्नीकोऽहं मम कृच्छ्रत्रयात्मक-प्रायश्चित्तानुष्ठानसिद्ध्यर्थं गोत्रयनिष्क्रयद्रव्यं रजतं चन्द्रदैवतं गोत्राय शर्मणे ब्राह्मणाय भवते सम्प्रददे । संकल्पजल तथा द्रव्य ब्राह्मणको दे दे । तदनन्तर
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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २१ गोप्रार्थना करे-गोप्रार्थना
गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश ।
यस्मात्तस्माच्छिवं मे स्यादिहलोके परत्र च ॥
प्रार्थनाके अनन्तर निम्न वाक्य बोले- अनेन गोदानेन पापापहा महाविष्णुः प्रीयताम् ।
निम्न मन्त्रसे पंचगव्यप्राशन कर ले-यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति मामके ।
प्राशनात् पञ्चगव्यस्य दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥
तदनन्तर हाथमें अक्षत - पुष्प लेकर ' आ नो भद्रा ० आदि मंगलमन्त्रों का पाठ करे । ' लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः ' आदि वाक्यों तथा ' सुमुखश्चैकदन्तश्च ' इत्यादि गणपतिमन्त्रोंका पाठ करे । हाथके अक्षतपुष्प भगवान्को अर्पित कर दे । इसके बाद देवीभागवतश्रवणका तथा पूजनका प्रधान संकल्प करे-प्रधान संकल्प हाथमें त्रिकुश, अक्षत, पुष्प, जल, फल तथा द्रव्य लेकर निम्न संकल्प करे-ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपर्वे श्रीश्वेतवाराहनाम्नि प्रथमकल्पे वैवस्वत -मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगस्य प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भूर्लोके भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे ' ' क्षेत्रे ( यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसीक्षेत्रे आनन्दवने महाश्मशाने गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते भागीरथ्याः पश्चिमे तीरे बोले ) बौद्धावतारे नाम्नि संवत्सरे श्रीसूर्ये अयने ऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे ‘ ' मासे “ पक्षे तिथौ वासरे ' ' नक्षत्रे ' ' योगे ' ' करणे ' ' राशिस्थिते श्रीसूर्ये राशिस्थिते चन्द्रे राशिस्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषण -विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ गोत्र: शर्मा / वर्मा / गुप्तः सपत्नीकोऽहं अतीतानेकजन्मसञ्चिताखिल-दुष्कृतनिवृत्तिपुरस्सरैहिकामुष्मिकाध्यात्मिकादिताप -त्रयोपशमनपूर्वककायिकादित्रिविधपापानां समूलोन्मूल-नार्थं मनोभिलषितफलप्राप्तिपूर्वक श्रीपराम्बाप्रीत्या-विर्भावकामः गोत्रोत्पन्न शर्मा ब्राह्मणवदनार-विन्दात् अनेकश्रोतृश्रावणपूर्वकं श्रीमद्देवीभागवतं नवाह्नविधिना श्रोष्यामि । तदङ्गतया विहितं स्वस्ति-पुण्याहवाचनं मातृकापूजनं वसोर्धारापूजनं आयुष्य-मन्त्रजपं साङ्कल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धमाचार्यादि-वरणानि च करिष्ये । तत्रादौ प्रारीप्सितसम्पूर्तिप्रति-बन्धकविघ्नव्यूहध्वंसकामः गणेशाम्बिकयोः यथोपचारैः पूजनमहं करिष्ये । संकल्पजल छोड़ दे । तदनन्तर संक्षेपमें स्वस्तिवाचन, गणपतिपूजन, कलशस्थापन, पुण्याहवाचन, मातृकापूजन, वसोर्धारापूजन, आयुष्यमन्त्रजप तथा नान्दीमुखश्राद्ध करे । इसके बाद आचार्य आदिका वरण करे । तदनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलपर कलश स्थापितकर पराम्बा भगवतीका षोडशोपचारपूजन करे । इसके बाद सूर्यादि नवग्रहोंका स्थापन - पूजन, असंख्यात रुद्रकलशकी स्थापना और पूजा, कुमारीपूजन, बटुकपूजन, पुस्तकपूजन आदि सम्पन्नकर कथा प्रारम्भ करनी चाहिये । कथा एवं पाठके अन्तमें अन्तिम दिन हवन करनेकी विधि है । ( यदि विस्तृत पूजा न करनी हो तो केवल गणेशाम्बिकाका पूजनकर आचार्यादि ब्राह्मणोंको वरण देकर कलशपर पराम्बा भगवतीका पूजन कर ले तथा पुस्तकपूजन एवं कथावाचकका पूजनकर पाठ अथवा कथा प्रारम्भ करनी चाहिये । ) यहाँ आचार्य आदिका वरण, पराम्बा भगवती दुर्गादेवी, कुमारी एवं बटुक आदिका पूजन संक्षेपमें दिया जा रहा है-आचार्यवरण हाथमें कुशाक्षत, जल, वरण- द्रव्य एवं वरणसामग्री लेकर सर्वप्रथम आचार्यके वरणका संकल्प करे-ॐ अद्य पूर्वोच्चारितग्रहगणगुणविशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ गोत्र: " शर्मा / वर्मा / गुप्तोऽहं मम सर्वविधपापक्षयद्वारा पूर्वोक्त-संकल्पितकार्यसिद्ध्यर्थं श्रीजगदम्बाप्रीत्यथञ्च श्रीम-| देवीभागवतनवाह्नकथा श्रवणार्थं गोत्रं ' शर्माणं
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२२ श्रीमद्देवीभागवत नवाहकथाश्रावयितारं ब्राह्मणं एभिर्वरणद्रव्यैः । भवन्तमहं वृणे । संकल्पजल छोड़ दे और वरणसामग्री । आचार्यको प्रदान करे । आचार्य बोले - ॐ वृतोऽस्मि । उपवाचकका वरण इसके बाद उपवाचकके वरणका निम्न संकल्प करे – ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुण-विशिष्टतिथ्यादौ गोत्र: शर्मा / वर्मा / गुप्तोऽहं मम सकलपापक्षयद्वारा पूर्वोक्तसङ्कल्पितकार्यसिद्ध्यर्थं ' ' गोत्रं “ शर्माणं उपवाचयितारं ब्राह्मणं एभिर्वरणद्रव्यैः भवन्तमहं वृणे । संकल्पजल छोड़ दे तथा वरणसामग्री दे दे । मन्त्रजप तथा दुर्गापाठके लिये ब्राह्मणोंका वरण तदनन्तर गायत्री, गणेश आदिके मन्त्रजप तथा सप्तशतीपाठके लिये निम्न संकल्पसे ब्राह्मणोंका वरण करे-ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुणविशिष्ट-' ' गोत्र: " शर्मा / वर्मा / गुप्तोऽहं मम सर्वविधपातकनिवृत्तिद्वारा श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं । करिष्यमाण श्रीमद्देवी भागवतनवाहक थायज्ञकर्मणि एभिर्वरणद्रव्यैः नानागोत्रान् नानाशर्मणो ब्राह्मणान् गायत्रीगणेशादिमन्त्रजापकान् श्रीसूक्तसप्तशत्यादि-पाठकांश्च तत्तत्कर्मकर्तृत्वेन भवतोऽहं वृणे । संकल्पजल छोड़ दे । वरण - सामग्री ब्राह्मणोंको दे दे । ऋत्विज बोलें - वृताः स्मः ।
ब्राह्मण निम्न मन्त्रका पाठ करे-व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥
प्रार्थना - निम्न मन्त्रसे ब्राह्मणोंकी प्रार्थना करे-अक्रोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः । देवध्यानरता नित्यं प्रसन्नमनसः सदा ॥
अदुष्टभाषणाः सन्तु मा सन्तु परनिन्दकाः ।
ममापि नियमा ह्ये भवन्तु भवतामपि ॥
ऋत्विजश्च यथा पूर्वं शक्रादीनां मखेऽभवन् ।
यूयं तथा मे भवत ऋत्विजो द्विजसत्तमाः ॥
अस्मिन् कर्मणि ये विप्राः वृता गुरुमुखादयः ।
सावधानाः प्रकुर्वन्तु स्वं स्वं कर्म यथोदितम् ॥
अस्य यागस्य निष्पत्तौ भवन्तोऽभ्यर्थिता मया ।
सुप्रसन्नैः प्रकर्तव्यं कर्मेदं विधिपूर्वकम् ॥
तदनन्तर दिग्रक्षण, पंचगव्यप्रोक्षण करके सर्वतोभद्रमण्डलमें देवताओंका आवाहन - पूजन करे । कलशके ऊपर देवीकी प्रतिमाका स्थापन सर्वतोभद्रमण्डलके मध्यमें प्रधान कलशकी स्थापना करे । कलशके ऊपर अग्न्युत्तारणपूर्वक स्वर्णनिर्मित देवीकी प्रतिमा स्थापित करे । प्रतिमाकी प्रतिष्ठा कर ले और श्रीसूक्तसे षोडशोपचारपूजन करे । प्रतिमाके ऊपर पंचरंगा वितान बाँधे । सपत्नीक यजमान श्रीभगवतीदुर्गादेवीके समीपमें बैठकर अपने दक्षिण भागमें पूजनकी सामग्री स्थापित करे । तत्त्वशुद्धिके लिये निम्न रीतिसे आचमन करे -ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा । प्राणायाम पूरक - कुम्भक- रेचकके क्रमसे प्राणायाम करे । पवित्रीकरण निम्न मन्त्रसे अपने ऊपर तथा पूजन - सामग्रीपर
जल छिड़के-अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु । आसन - पवित्रीकरण पहले निम्न रीतिसे विनियोग करे-पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसनपवित्रकरणे विनियोगः ।
तदनन्तर निम्न मन्त्र बोले-ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।
। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥
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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २३ शिखाबन्धन
निम्न मन्त्रसे शिखाका स्पर्श करे-ॐ ऊर्ध्वकेशि विरूपाक्ष मांसशोणितभोजने ।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये चामुण्डे चापराजिते ॥
निम्न ॐ भैरवाय हाथमें ॐ भैरवनमस्कार
मन्त्र से भैरवजीको नमस्कार करे-महाकाय कल्पान्तदहनोपम ।
नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुमर्हसि ॥
दुर्गापूजनका संकल्प जल, अक्षत, पुष्प लेकर बोले-विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुण-विशिष्टतिथ्यादौ गोत्र: शर्मा / वर्मा / गुप्तोऽहम् अस्मिन् श्रीमद्देवीभागवतनवाहकथायज्ञकर्मणि मम आत्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीभगवत्या जगदम्बिकायाः त्रिगुणात्मिकाया: श्रीदुर्गादेव्याः पूजनं करिष्ये । पूजनकर्मणि आत्मनोऽधिकारपूर्वकयोग्यता-सम्पादनार्थं नवार्णेन न्यासान् करिष्ये । संकल्पजल छोड़ दे । नवार्णमन्त्रके न्यासका संकल्प अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः । गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि श्रीमहाकालीमहालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवता: ऐं बीजं ह्रीं शक्तिः क्लीं कीलकम् श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे न्यासे पूजायां च विनियोगः । विनियोग पढ़कर जल गिराये । नीचे लिखे न्यासवाक्योंमेंसे एक - एकका उच्चारण करके दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे क्रमश: सिर, मुख, हृदय, गुदा, दोनों चरण और नाभि -- इन अंगोंका स्पर्श करे । ऋष्यादिन्यास ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि ( सिरका स्पर्श करे ) । गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः मुखे ( मुखका स्पर्श करे ) । महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः हृदि ( हृदयका स्पर्श करे ) । ऐं बीजाय नमः गुह्ये ( गुह्यस्थानका स्पर्श करे ) । ह्रीं शक्तये नमः पादयो: ( दोनों पैरोंको छुए ) । क्लीं कीलकाय नमः नाभौ ( नाभिका स्पर्श करे ) । ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे- इस मूल मन्त्रसे हाथोंकी शुद्धि करके करन्यास करे । करन्यास ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ( दोनों हाथोंकी तर्जनी अँगुलियोंसे दोनों अँगूठोंका स्पर्श करे ) । ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ( दोनों हाथोंके अँगूठोंसे दोनों तर्जनी अँगुलियोंका स्पर्श करे ) । ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः । ( दोनों अँगूठोंसे मध्यमा अँगुलियोंका स्पर्श करे ) । ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः । ( दोनों अँगूठोंसे अनामिका अँगुलियोंका स्पर्श करे ) । ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ( कनिष्ठिका अँगुलियोंका स्पर्श करे ) । ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः । ( हथेलियों और उनके पृष्ठभागोंका परस्पर स्पर्श करे ) । हृदयादिन्यास ॐ ऐं हृदयाय नमः ( दाहिने हाथकी पाँचों अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे ) । ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा ( सिरका स्पर्श करे ) । ॐ क्लीं शिखायै वषट् ( शिखाका स्पर्श करे ) । ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम् ( दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अँगुलियोंसे दाहिने कंधेका एक साथ स्पर्श करे ) । ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् ( दाहिने हाथकी अँगुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रों और ललाटके मध्यभागका स्पर्श करे ) । ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् ( दाहिने हाथकी तर्जनी तथा मध्यमा अँगुलियोंसे बायें । हाथकी हथेलीपर ताली बजाये ) ।
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२४ श्रीमद्देवीभागवत दीपप्रज्वालन तथा प्रार्थना न्यासके अनन्तर देवीके दक्षिणभागमें घीका दीपक तथा बायें भागमें तिलके तेलका दीपक जलाकर निम्न
मन्त्रसे दीपककी प्रार्थना करे-भो दीप देवीरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत् ।
यावत्कर्मसमाप्तिः स्यात् तावत्त्वं सुस्थिरो भव ॥
तदनन्तर अपने वामभागमें स्थापित पूजा - कलशमें गन्धाक्षत, पुष्प आदिसे वरुणकी पूजा करे । प्रोक्षण कलशके जलसे अपना तथा सभी सामग्रियोंका प्रोक्षण करे । शंखपूजन कलशके जलसे शंखको पूरित करके देवीके । वामभागमें त्रिपादुकाधारमें स्थापितकर निम्न मन्त्रसे
गन्धाक्षतसे उसका पूजन करे-ॐ अग्निऋषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः ।
तमीमहे महागयम् ॥
तदनन्तर निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे-त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे । निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते ॥ घण्टापूजन घण्टा प्रक्षालितकर उसे अपने वामभागमें स्थापित करके निम्न मन्त्रसे गन्धाक्षतसे उसका पूजन करे-ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रं चक्षु-बृहद्रथन्तरे पक्षौ । स्तोम आत्मा छन्दाः स्यङ्गानि यजूंषि नाम । साम ते तनूर्वामदेव्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः । सुपर्णोऽसि गरुत्मान्दिवं गच्छ स्वः पत ॥ तदनन्तर निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे-ॐ आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम् । घण्टानादं प्रकुर्वीत सर्वकामार्थसिद्धये ॥
घण्टाध्वनि करके उसे यथास्थान रख दे ।
॥ श्रीदुर्गादेवी - पूजनविधि ॥
ध्यान हाथमें पुष्प लेकर निम्न मन्त्रोंसे दुर्गादेवीका ध्यान करे-खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् । नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥ अक्षस्त्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुः कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् । शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ॥ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् । गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ॥
ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ।
ससस्त्यश्वकः सुभद्र काम्पीलवासिनीम् ॥
ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पल्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् । इष्णन्निषाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण ॥
ॐ पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती ।
यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः श्रीदुर्गां ध्यायामि । ध्यानार्थे पुष्पाणि समर्पयामि । हाथके फूल चढ़ा दे । आवाहन हाथमें पुष्प लेकर श्रीदुर्गादेवीका आवाहन करे -ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥ श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः श्रीदुर्गां आवाहयामि । आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि । पुष्प चढ़ाये । आसन हाथमें पुष्प लेकर श्रीदुर्गादेवीको आसन प्रदान
करे-तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि । पुष्प चढ़ाये ।
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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २५ पाद्य
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् ।
श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि । जल चढ़ाये । अर्घ्य
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि । अर्घ्यका जल चढ़ाये । आचमनीय
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि । जल चढ़ाये । स्नान आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा ।
याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, स्नानीयं जलं समर्पयामि । जल चढ़ाये । पञ्चामृतस्नान
पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्त्रोतसः ।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, पंचामृतस्नानं समर्पयामि । पंचामृत से स्नान कराये । शुद्धोदकस्नान शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त आश्विनाः श्येतः श्येताक्षोऽरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णा यामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः ॥ श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । जलसे स्नान कराये । महाभिषेकस्नान श्रीसूक्तके मन्त्रोंद्वारा जलसे स्नान कराये । श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणा-त्मिकायै दुर्गायै नमः, महाभिषेकस्नानं समर्पयामि । वस्त्रोपवस्त्र
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि । तदन्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । वस्त्र तथा उपवस्त्र चढ़ाये । एक आचमनी जल छोड़े । यज्ञोपवीत
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः यज्ञोपवीते समर्पयामि । तदन्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । यज्ञोपवीत चढ़ाये । एक आचमनी जल छोड़े । चन्दन
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः विलेपनार्थे चन्दनं समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको चन्दन लगाये । अक्षत अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ॥ श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः चन्दनोपरि अक्षतान् समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको चन्दनके ऊपर अक्षत लगाये । पुष्प तथा पुष्पमाला
मनसः वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै । त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पुष्पमालां समर्पयामि ।
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२६ श्रीमद्देवीभागवत भगवती दुर्गादेवीको पुष्पमाला चढ़ाये । सौभाग्यद्रव्य अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमासं परि पातु विश्वतः ॥ श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः सौभाग्यद्रव्याणि समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको हल्दी- रोरी आदि सौभाग्यद्रव्य चढ़ाये । सिन्दूर
सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वात प्रमियः पतयन्ति यह्वाः ।
घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः सिन्दूरं समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको सिन्दूर चढ़ाये । धूप
कर्दमे प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः धूपमाघ्रापयामि । भगवती दुर्गादेवीको धूप निवेदित करे । दीप
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः दीपं दर्शयामि । भगवती दुर्गादेवीको दीप निवेदित करे । नैवेद्य
आर्द्रा पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः नैवेद्यं निवेदयामि | भगवती दुर्गादेवीको नैवेद्य निवेदित करे । करोद्वर्तन
अशुनाते अशुः पृच्यतां परुषा परुः ।
गन्धस्ते सोमव मदाय रसो अच्युतः ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै । त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः करोद्वर्तनकं समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको इत्र निवेदित करे । ऋतुफल
याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः ।
बृहस्पति प्रसूतास्तान मुञ्चन्त्वहसः ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः ऋतुफलानि समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको ऋतुफल निवेदित करे । पूगीफल - ताम्बूल
आर्द्रा यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पूगीफलताम्बूलं समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको सुपारी तथा ताम्बूल निवेदित करे । दक्षिण
। हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः दक्षिणां समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको दक्षिणा चढ़ाये । नीराजन इदं हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीरः सर्वगणः स्वस्तये । आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि । अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त ॥ श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः नीराजनं दर्शयामि । भगवती दुर्गादेवीकी आरती करे । प्रदक्षिणा
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः प्रदक्षिणां समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीकी प्रदक्षिणा करे । पुष्पाञ्जलि
। यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥
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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २७ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे । स मे कामान् कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ॥ कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ॥ ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमारि धीमहि । तन्नो दुर्गा प्रचोदयात् ॥ श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । भगवती दुर्गादेवीको निम्न स्तोत्रसे नमस्ते शरण्ये नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते पुष्पांजलि समर्पित करे । स्तुतिपाठ प्रार्थना करे-शिवे सानुकम् जगद्व्यापि विश्वरूपे । जगद्वन्द्यपादारविन्दे जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे महायोगिनि ज्ञानरूपे । नमस्ते नमस्ते सदानन्दरूपे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ अनाथस्य तृष्णातुरस्य भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः । त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्ये-उनले सागरे प्रान्तरे राजगे । त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे
विपत्सागरे मज्जतां देहभाजाम् ।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारहेतु-नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥
नमश्चण्डिके चण्डदुर्दण्डलीला-मुख fusa खण्डिताशेषशत्रो । गतिर्देवि निस्तारबीजं नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ त्वमेवाघभावाधृता सत्यवादी-र्न जाता जितक्रोधनात् क्रोधनिष्ठा । इडा पिङ्गला त्वं सुषुम्णा च नाडी नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे सरस्वत्यरुन्धत्यमोघस्वरूपे विभूतिः शची कालरात्रिः सती त्वं नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ॥ शरणमसि सुराणां सिद्धविद्याधराणां मुनिमनुजपशूनां दस्युभिस्त्रासितानाम् । नृपतिगृहगतानां व्याधिभिः पीडितानां त्वमसि शरणमेका देवि दुर्गे प्रसीद ॥ श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः स्तुतिपाठं निवेदयामि । अनया पूजया त्रिगुणात्मिका दुर्गा प्रीयताम् न मम । एक आचमनी जल छोड़े । ॥ सूर्यादि ग्रहोंका स्थापन एवं पूजन ॥ तदनन्तर ग्रहपीठके समीप बैठकर नवग्रहोंका स्थापन एवं पूजन करे । अपने दाहिने हाथमें जल, अक्षत तथा पुष्प लेकर पूजनका संकल्प करे— ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुण-विशिष्टतिथ्यादौ शुभपुण्यतिथौ गोत्र: शर्मा / वर्मा / गुप्तोऽहं कर्मणि निर्विघ्नतासंसिद्ध्यर्थं तथा च सूर्यादिग्रहाणां प्रीतये आदित्यादिनवग्रहाणां स्थापनं पूजनञ्च करिष्ये । हाथका जल आदि तष्टामें छोड़ दे तथा गन्धाक्षत - पुष्प लेकर निम्न मन्त्रोंसे नवग्रहोंका आवाहन तथा स्थापन करे— सूर्य
ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च ।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सूर्याय नमः सूर्यमावाहयामि स्थापयामि । चन्द्रमा ॐ इमं देवा असपत्नः सुवध्वं महते क्षत्राय महते
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२८ श्रीमद्देवीभागवत ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय । इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमो ऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रमसे नमः चन्द्रमसमावाहयामि स्थापयामि । भौम ( मंगल ) ॐ अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपा रेतासि जिन्वति ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः भौमाय नमः भौममावाहयामि स्थापयामि । बुध
ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते ससृजेथा मयं च ।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बुधाय नमः बुधमावाहयामि स्थापयामि । बृहस्पति
ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु ।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बृहस्पतये नमः बृहस्पतिमावाहयामि स्थापयामि । शुक्र ॐ अन्नात्परिस्स्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत्क्षत्रं पयः सोमं प्रजापतिः । ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानः शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः शुक्राय नमः शुक्रमावाहयामि स्थापयामि । शनि
ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये ।
शं योरभि स्त्रवन्तु नः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शनैश्चराय नमः शनैश्चर-मावाहयामि स्थापयामि । राहु
ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा ।
कया शचिष्ठया वृता ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः राहवे नमः राहुमावाहयामि स्थापयामि । केतु
ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे ।
समुषद्भिरजायथाः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः केतवे नमः केतुमावाहयामि स्थापयामि । निम्न मन्त्रसे सभीपर अक्षत चढ़ाकर ग्रहोंकी प्रतिष्ठा करे । ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञः समिमं दधातु । विश्वे देवास इह मादयन्तामो ३ म्प्रतिष्ठ ॥ सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः कहकर गन्धाक्षतपुष्प आदि उपचारोंसे पूजन करे । तदनन्तर निम्न प्रार्थना करे-ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च । गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु ॥ सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । मन्त्रपुष्पांजलि अर्पित करे । अनया पूजया सूर्यादिनवग्रहाः प्रीयन्तां न मम । कहकर एक आचमनी जल छोड़े । ॥ असंख्यात रुद्रकलशकी स्थापना ॥ तदनन्तर ग्रहपीठके ईशानकोणमें निम्न मन्त्रसे
रुद्रकलशकी स्थापना करे-ॐ असंख्याता सहस्त्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम् ।
तेषा ँ सहस्त्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि ॥
निम्न मन्त्रसे कलशपर अक्षत छोड़कर प्रतिष्ठा करे-ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञः समिमं दधातु । विश्वे देवास इह मादयन्तामो ३ म्प्रतिष्ठ ॥ प्रतिष्ठाके अनन्तर गन्धादि उपचारोंसे कलश एवं वरुणका पूजन करे । प्रार्थना - निम्न मन्त्रसे भगवान् रुद्रकी प्रार्थना करे-करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् । विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥ अनेन पूजनाख्येन कर्मणा रुद्रवरुणौ प्रीयेताम् ।
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श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २ ९ कहकर एक आचमनी जल छोड़े । कुमारीपूजन ( नवकन्यापूजन )
जगत्पूज्यां जगद्वन्द्यां सर्वशक्तिस्वरूपिणीम् ।
नवदुर्गात्मिकां देवीं कुमारीं पूजयाम्यहम् ॥१ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कुमार्यै नमः कुमारीमावाहयामि पूजयामि । कुमारीरूप कन्याका पूजन करे ।
त्रिपुरां त्रिपुराधारां त्रिवर्गज्ञानरूपिणीम् ।
त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्ति पूजयाम्यहम् ॥ २ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः त्रिमूर्त्यै नमः त्रिमूर्तिमावाहयामि पूजयामि । त्रिमूर्तिरूप कन्याका पूजन करे ।
कलात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम् ।
कल्याणजननीं देवीं कल्याणीं पूजयाम्यहम् ॥ ३ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कल्याण्यै नमः कल्याणीमावाहयामि पूजयामि । कल्याणीरूप कन्याका पूजन करे । अणिमादिगुणोपेतामकाराद्यक्षरात्मिकाम् अनन्तां शक्तिसम्पन्नां रोहिणीं पूजयाम्यहम् ॥४ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः रोहिण्यै नमः रोहिणीमावाहयामि पूजयामि । रोहिणीरूप कन्याका पूजन करे ।
कामचारां शुभां कान्तां कालचक्रस्वरूपिणीम् ।
कामदां करुणोपेतां कालिकां पूजयाम्यहम् ॥ ५ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कालिकायै नमः कालिकामावाहयामि पूजयामि । कालिकारूप कन्याका पूजन करे ।
चण्डवीरां चण्डमायां चण्डमुण्डप्रभञ्जिनीम् ।
पूजयामि सदा देवीं चण्डिकां चण्डविक्रमाम् ॥ ६ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चण्डिकायै नमः चण्डिकामावाहयामि पूजयामि । चण्डिकारूप कन्याका पूजन करे ।
सदानन्दकरीं शान्तां सर्वदेवनमस्कृताम् ।
सर्वभूतात्मिकां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम् ॥ ७ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शाम्भव्यै नमः शाम्भवीमावाहयामि पूजयामि । शाम्भवीरूप कन्याका पूजन करे ।
दुर्गदु भवदुःखविनाशिनीम् ।
पूजयामि सदा भक्त्या दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम् ॥ ८ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दुर्गायै नमः दुर्गामावाहयामि पूजयामि । दुर्गारूप कन्याका पूजन करे ।
सुन्दरीं स्वर्णवर्णाभां सुखसौभाग्यदायिनीम् ।
सुभद्रजननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्॥९ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सुभद्रायै नमः सुभद्रामावाहयामि पूजयामि । सुभद्रारूप कन्याका पूजन करे । इस प्रकार पाद्य, अर्घ्य, आचमन, वस्त्र, अलंकार, गन्ध, अक्षत, माला आदिसे नौ कुमारियोंका पूजन करे, भोजन कराये तथा दक्षिणा प्रदानकर निम्न मन्त्रसे प्रार्थनापूर्वक प्रणाम करे-नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो: स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ बटुकपूजन निम्न मन्त्रसे बटुकका ध्यान करे- —
ॐ करकलितकपालः कुण्डली दण्डपाणि-स्तरुणतिमिरनीलव्यालयज्ञोपवीती ।
क्रतुसमयसपर्याविघ्नविच्छेदहेतु-र्जयति बटुकनाथः सिद्धिदः साधकानाम् ॥
‘ ॐ बं बटुकाय नमः ' इस मन्त्रसे पाद्य, अर्घ्य, आचमन, वस्त्र, अलंकार, गन्ध, अक्षत, माला आदिसे पूजन करे, भोजन कराये तथा दक्षिणा प्रदानकर प्रणाम करे । पायसबलि नर्वाणमन्त्रका उच्चारण करके ' ॐ महालक्ष्म्यै नमः ' पायसबलिं समर्पयामि । कहकर जल छोड़ दे । पुस्तकपूजन निम्न मन्त्रसे गन्धाक्षतपुष्पसे श्रीमद्देवीभागवत-पुस्तकका ध्यान एवं पूजन करे-या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
ॐ यदाकूतात्समुसुस्रोधृदो वा मनसो वा सम्भृतं चक्षुषो वा ।
तदनु प्रेत सुकृतामु लोक यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः ॥
कथावाचकका पूजन कथावाचकका पैर धोकर गन्ध, अक्षत, पुष्पमाला * ( क ) कुमार्यश्च प्रतिदिनं अष्टोत्तरशतं नव एका वा यथासम्भवं पूज्याः । ( ख ) कुमारीपूजने द्विवर्षादारभ्य दशवर्षपर्यन्ता कन्या ग्राह्या । वर्षाद्या दशाब्दाद्या: कुमारी: परिपूजयेत् । एकाब्दायाः प्रीत्यभावो रुद्राब्दा तु विवर्जिता ॥