देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 391–400

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400

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३८२

व्रतानि यानि चान्यानि दानानि विविधानि च ।

नवरात्रव्रतस्यास्य नैव तुल्यानि भूतले ॥

धनधान्यप्रदं नित्यं सुखसन्तानवृद्धिदम् ।

आयुरारोग्यदं चैव स्वर्गदं मोक्षदं तथा ॥

विद्यार्थी वा धनार्थी वा पुत्रार्थी वा भवेन्नरः ।

तेनेदं विधिवत्कार्यं व्रतं सौभाग्यदं शिवम् ॥

विद्यार्थी सर्वविद्यां वै प्राप्नोति व्रतसाधनात् ।

राज्यभ्रष्टो नृपो राज्यं समवाप्नोति सर्वदा ॥

पूर्वजन्मनि यैर्नूनं न कृतं व्रतमुत्तमम् ।

ते व्याधिनो दरिद्राश्च भवन्ति पुत्रवर्जिताः ॥

वन्ध्या च या भवेन्नारी विधवा धनवर्जिता ।

अनुमा तत्र कर्तव्या नेयं कृतवती व्रतम् ॥

नवरात्रव्रतं प्रोक्तं न कृतं येन भूतले ।

स कथं विभवं प्राप्य मोदते च तथा दिवि ॥

रक्तचन्दनसंमिश्रैः कोमलैर्बिल्वपत्रकैः ः ।

भवानी पूजिता येन स भवेन्नृपतिः क्षितौ ॥

नाराधिता येन शिवा सनातनी दुःखार्तिहा सिद्धिकरी जगद्वरा । दुःखावृतः शत्रुयुतश्च भूत नूनं दरिद्रो भवतीह मानवः ॥ यां विष्णुरिन्द्रो हरपद्मजौ हरपद्मजौ तथा

वह्निः कुबेरो वरुणो दिवाकरः ।

ध्यायन्ति सर्वार्थसमाप्तिनन्दिता-तां किं मनुष्या न भजन्ति चण्डिकाम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २७ इस पृथ्वीलोकमें जितने भी प्रकारके व्रत १५ एवं दान हैं, वे इस नवरात्रव्रतके तुल्य नहीं हैं; क्योंकि यह व्रत सदा धन - धान्य प्रदान करनेवाला, सुख तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला, आयु तथा आरोग्य प्रदान करनेवाला और स्वर्ग तथा मोक्ष १६ देनेवाला है॥१५-१६ ॥ अतएव विद्या, धन अथवा पुत्र- इनमेंसे मनुष्य किसीकी भी कामना करता हो, उसे इस सौभाग्यदायक १७ तथा कल्याणकारी व्रतका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १७ ॥

इस व्रतका अनुष्ठान करनेसे विद्या चाहनेवाला १८ मनुष्य समस्त विद्या प्राप्त कर लेता है और अपने राज्यसे वंचित राजा फिरसे अपना राज्य प्राप्त कर लेता है ॥ १८ ॥

१ ९ पूर्वजन्ममें जिन लोगों द्वारा यह उत्तम व्रत नहीं किया गया है, वे इस जन्ममें रोगग्रस्त, दरिद्र तथा सन्तानरहित होते हैं ॥१ ९ ॥ जो स्त्री वन्ध्या, विधवा अथवा धनहीन है; २० उसके विषयमें यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उसने [ अवश्य ही पूर्वजन्ममें ] यह व्रत नहीं किया था ॥ २० ॥

२१ इस पृथ्वीलोकमें जिस प्राणीने उक्त नवरात्रव्रतका अनुष्ठान नहीं किया, वह इस लोकमें वैभव प्राप्त करके स्वर्गमें आनन्द कैसे प्राप्त कर सकता है? ॥ २१ ॥

२२ जिसने लाल चन्दनमिश्रित कोमल बिल्वपत्रोंसे भवानी जगदम्बाकी पूजा की है, वह इस पृथ्वीपर राजा होता है | २२ ॥ जिस मनुष्यने दुःख तथा सन्तापका नाश करनेवाली, सिद्धियाँ देनेवाली, जगत् में सर्वश्रेष्ठ, शाश्वत तथा कल्याणस्वरूपिणी भगवतीकी उपासना २३ नहीं की; वह इस पृथ्वीतलपर सदा ही अनेक प्रकारके कष्टोंसे ग्रस्त, दरिद्र तथा शत्रुओंसे पीड़ित रहता है ॥ २३ ॥

विष्णु, इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, अग्नि, कुबेर, वरुण तथा सूर्य समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण होकर हर्षके साथ जिन भगवतीका ध्यान करते हैं, उन देवी २४ । चण्डिकाका ध्यान मनुष्य क्यों नहीं करते? ॥ २४ ॥

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अ ० २७ ] स्वाहास्वधानाममनुप्रभावै-स्तृप्यन्ति देवाः पितरस्तथैव । यज्ञेषु सर्वेषु मुदा हरन्ति यन्नामयुग्मं श्रुतिभिर्मुनीन्द्राः ॥ यस्येच्छ्या सृजति विश्वमिदं प्रजेशो

नानावतारकलनं कुरुते हरिश्च ।

नूनं करोति जगतः किल भस्म शम्भु-स्तां शर्मदां न भजते नु कथं मनुष्यः ॥

नैकोऽस्ति सर्वभुवनेषु तया विहीनो देवो नरोऽथ विहगः किल पन्नगो वा । गन्धर्वराक्षसपिशाचनगेषु नूनं यः स्पन्दितुं भवति शक्तियुतो यथेच्छम् ॥

तां न सेवेत कश्चण्डीं सर्वकामार्थदां शिवाम् ।

व्रतं तस्या न कः कुर्याद्वाञ्छन्नर्थचतुष्टयम् ॥

महापातकसंयुक्तो नवरात्रव्रतं चरेत् ।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा ॥

पुरा कश्चिद्वणिग्दीनो धनहीनः सुदुःखितः । कुटुम्बी चाभवत्कश्चित् कोसले नृपसत्तम अपत्यानि बहून्यस्याभवन्क्षुत्पीडितानि च भक्ष्यं किञ्चित्तु सायाह्ने प्रापुस्तस्य च बालकाः भुंक्ते स्म कार्यकर्तासौ परस्याथ बुभुक्षितः कुटुम्बभरणं तत्र चकारातिनिराकुलः सदा धर्मरतः शान्तः सदाचारश्च सत्यवाक् अक्रोधनश्च धृतिमान्निर्मदश्चानसूयकः सम्पूज्य देवता नित्यं पितॄनप्यतिथींस्तदा । भुञ्जने पोष्यवर्गेऽथ कृतवान्भोजनं वणिक् तृतीय स्कन्ध ३८३ देवगण इनके ' स्वाहा ' नाममन्त्रके प्रभावसे तथा पितृगण ' स्वधा ' नाममन्त्रके प्रभावसे तृप्त होते हैं । इसीलिये महान् मुनिजन प्रसन्नतापूर्वक सभी यज्ञों तथा श्राद्धकार्योंमें मन्त्रोंके साथ ' स्वाहा ' एवं ' स्वधा ' २५ नामोंका उच्चारण करते हैं ॥ २५ ॥

जिनकी इच्छासे ब्रह्मा इस विश्वका सृजन करते हैं, भगवान् विष्णु अनेकविध अवतार लेते हैं और शंकर जगत्को भस्मसात् करते हैं, उन कल्याणकारिणी भगवतीको मनुष्य क्यों नहीं भजता? ॥ २६ ॥

२६ सभी भुवनोंमें कोई भी ऐसा देवता, मनुष्य, पक्षी, सर्प, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच एवं पर्वत नहीं है; जो उन भगवतीकी शक्तिके बिना अपनी इच्छासे शक्तिसम्पन्न होकर स्पन्दित होनेमें समर्थ हो ॥ २७ ॥

सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन कल्याणदायिनी चण्डिकाकी सेवा भला कौन नहीं २७ करेगा? चारों प्रकारके पुरुषार्थों ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) - को चाहनेवाला कौन प्राणी उन भगवतीके नवरात्रव्रतका अनुष्ठान नहीं करेगा? ॥ २८ ॥

२८ यदि कोई महापापी भी नवरात्रव्रत करे तो वह समस्त पापों से मुक्ति पा लेता है, इसमें लेशमात्र भी विचार नहीं करना चाहिये ॥ २ ९ ॥ २ ९ नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालमें कोसलदेशमें दीन, धनहीन, अत्यन्त दुःखी एवं विशाल कुटुम्बवाला एक वैश्य रहता था ॥ ३० ॥

॥ ३० उसकी अनेक सन्तानें थीं, जो धनाभावके कारण क्षुधासे पीड़ित रहा करती थीं; सायंकालमें । उसके लड़कोंको खानेके लिये कुछ मिल जाता ॥ ३१ था तथा वह भी कुछ खा लेता था । इस प्रकार वह वणिक् भूखा रहते हुए सर्वदा दूसरोंका काम । करके धैर्यपूर्वक परिवारका पालन - पोषण कर रहा ॥ ३२ था ॥ ३१-३२ ॥ वह सर्वदा धर्मपरायण, शान्त, सदाचारी, । सत्यवादी, क्रोध न करनेवाला, धैर्यवान्, अभिमानरहित ॥ ३३ तथा ईर्ष्याहीन था ॥ ३३ ॥

प्रतिदिन देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंकी पूजा करके वह अपने परिवारजनोंके भोजन कर ॥ ३४ । लेनेके उपरान्त स्वयं भोजन करता था ॥ ३४ ॥

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३८४ एवं गच्छति काले वै सुशीलो नामतो गुणैः दारिद्र्यार्तो द्विजं शान्तं पप्रच्छातिबुभुक्षितः सुशील उवाच भो भूदेव कृपां कृत्वा वदस्वाद्य महामते कथं दारिद्र्यनाशः स्यादिति मे निश्चयेन वै धनैषणा मे नैवास्ति धनी स्यामिति मानद । कुटुम्बभरणार्थं वै पृच्छामि त्वां द्विजोत्तम

पुत्री सुतस्तु मे बालो भक्षार्थी रोदते भृशम् ।

तावन्मात्रं गृहे नान्नं मुष्टिमेकां ददाम्यहम् ॥

विसर्जितो यतो गेहाद् गतो बालो रुदन्मया ।

अतो मे दह्यतेऽत्यर्थं किं करोमि धनं विना ॥

विवाहोऽस्ति सुताया मे नास्ति वित्तं करोमि किम् ।

दशवर्षाधिकायास्तु दानकालोऽपि यात्यलम् ॥

तेन शोचामि विप्रेन्द्र सर्वज्ञोऽसि दयानिधे ।

तपो दानं व्रतं किञ्चिद् ब्रूहि मन्त्रं जपं तथा ॥

येनाहं पोष्यवर्गस्य करोमि द्विज पोषणम् ।

तावन्मे स्याद्धनप्राप्तिर्नाधिकं प्रार्थये किल ॥

त्वत्प्रसादात्कुटुम्बं मे सुखितं प्रभवेदिह ।

तत्कुरुष्व महाभाग ज्ञानेन परिचिन्त्य च ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २७ । इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गुणोंके कारण ॥ ३५ सुशील नामसे ख्यातिप्राप्त उस वणिक्ने दरिद्रता तथा क्षुधा - पीड़ासे अत्यन्त व्याकुल होकर एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणसे पूछा ॥ ३५ ॥

सुशील बोला - हे महाबुद्धिसम्पन्न ब्राह्मण-। देवता! आज मुझपर कृपा करके यह बताइये ॥ ३६ मेरी दरिद्रताका नाश निश्चितरूपसे कैसे हो सकता है? ॥ ३६ । हे मानद! मुझे धनकी अभिलाषा तो नहीं है; किंतु हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे कोई ऐसा उपाय पूछ रहा ॥ ३७ हूँ, जिससे मैं कुटुम्बके भरण - पोषणमात्रके लिये धनसम्पन्न हो जाऊँ ॥ ३७ ॥

मेरी पुत्री और पुत्र [ क्षुधासे पीड़ित होकर ] भोजनके लिये बहुत रोते हैं और मेरे घरमें इतना भी ३८ अन्न नहीं रहता कि मैं उन्हें एक मुट्ठीभर अन्न दे सकूँ ॥ ३८ ॥

रोते हुए बालकको मैंने घरसे निकाल दिया और वह चला गया । इसलिये मेरा हृदय शोकाग्निमें जल ३ ९ रहा है । धनके अभावमें मैं क्या करूँ? ॥ ३ ९ ॥ मेरी पुत्री विवाहके योग्य हो चुकी है, किंतु मेरे पास धन नहीं है । अब मैं क्या करूँ? वह दस वर्षसे अधिककी हो गयी है; इस प्रकार कन्यादानका समय ४० बीता जा रहा है ॥ ४० ॥

हे विप्रेन्द्र! इसीलिये मैं अत्यधिक चिन्तित हूँ । हे दयानिधान! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव मुझे कोई ४१ ऐसा तप, दान, व्रत, मन्त्र तथा जप बताइये, जिससे मैं अपने आश्रितजनोंका भरण - पोषण करनेमें समर्थ हो जाऊँ । हे द्विज! बस मुझे उतना ही धन मिल जाय और मैं उससे अधिक धनके लिये प्रार्थना नहीं ४२ करता ॥ ४१-४२ ॥ हे महाभाग! आपकी कृपासे मेरा परिवार अवश्य सुखी हो सकता है । अतएव आप अपने ज्ञानबलसे भलीभाँति विचार करके वह उपाय ४३ | बताइये ॥ ४३ ॥

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अ ० २७ ] व्यास उवाच इति पृष्टस्तथा तेन ब्राह्मणः संशितव्रतः उवाच परमप्रीतस्तं वैश्यं नृपसत्तम वैश्यवर्य कुरुष्वाद्य नवरात्रव्रतं शुभम् पूजनं भगवत्याश्च हवनं भोजनं तथा वेदपारायणं शक्तिजपहोमादिकं तथा कुरुष्वाद्य यथाशक्ति तव कार्यं भविष्यति एतस्मादपरं किञ्चिद् व्रतं नास्ति धरातले नवरात्राभिधं वैश्य पावनं सुखदं तथा ज्ञानदं मोक्षदं चैव सुखसन्तानवर्धनम् शत्रुनाशकरं कामं नवरात्रव्रतं सदा राज्यभ्रष्टेन रामेण सीताविरहितेन च किष्किन्धायां व्रतं चैतत्कृतं दुःखातुरेण वै प्रतप्तेनापि रामेण सीताविरहवह्निना विधिवत्पूजिता देवी नवरात्रव्रतेन वै तेन प्राप्ताथ वैदेही कृत्वा सेतुं महार्णवे हत्वा मन्दोदरीनाथं कुम्भकर्णं महाबलम् ॥ मेघनादं सुतं हत्वा कृत्वा भूपं विभीषणम् पश्चादयोध्यामागत्य प्राप्तं राज्यमकण्टकम् नवरात्रव्रतस्यास्य प्रभावेण विशांवर सुखं भूमितले प्राप्तं रामेणामिततेजसा व्यास उवाच इति विप्रवचः श्रुत्वा स वैश्यस्तं द्विजं गुरुम् कृत्वा जग्राह सन्मन्त्रं मायाबीजाभिधं नृप जजाप परया भक्त्या नवरात्रमतन्द्रितः नानाविधोपहारैश्च पूजयामास सादरम् नवसंवत्सरं चैव मायाबीजपरायणः तृतीय स्कन्ध ३८५ व्यासजी बोले – हे नृपश्रेष्ठ! उसके इस प्रकार । पूछनेपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उस ब्राह्मणने ॥ ४४ बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उस वैश्यसे कहा – ॥४४ ॥

हे वैश्यवर्य! अब तुम पवित्र नवरात्रव्रतका । अनुष्ठान करो । इसमें तुम भगवतीकी पूजा, हवन, ॥ ४५ ब्राह्मणभोजन, वेदपाठ, उनके मन्त्रका जप और होम आदि यथाशक्ति सम्पन्न करो । इससे तुम्हारा कार्य । अवश्य सिद्ध होगा ॥ ४५-४६ ॥ ॥ ४६ हे वैश्य! नवरात्र नामक इस पवित्र तथा । सुखदायक व्रतसे बढ़कर इस पृथ्वीतलपर अन्य कोई भी व्रत नहीं है ॥ ४७ ॥

॥ ४७ यह नवरात्रव्रत सर्वदा ज्ञान तथा मोक्षको देनेवाला, । सुख तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला एवं शत्रुओंका ॥ ४८ पूर्णरूपसे विनाश करनेवाला है ॥४८ ॥

राज्यसे च्युत तथा सीताके वियोगसे अत्यन्त । दुःखित श्रीरामने किष्किन्धापर्वतपर इस व्रतको ॥ ४ ९ किया था । सीताकी विरहाग्निसे अत्यधिक सन्तप्त श्रीरामने उस समय नवरात्रव्रतके विधानसे भगवती । जगदम्बाकी भलीभाँति पूजा की थी । ४ ९ -५० ॥ ॥५० इसी व्रतके प्रभावसे उन्होंने महासागरपर सेतुकी रचनाकर महाबली मन्दोदरीपति रावण, कुम्भकर्ण । तथा रावणपुत्र मेघनादका संहार करके सीताको ५१ प्राप्त किया । विभीषणको लंकाका राजा बनाकर । पुनः अयोध्या लौटकर उन्होंने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया था ॥ ५१-५२ ॥ ॥ ५२ हे वैश्यवर! इस प्रकार अमित तेजवाले | श्रीरामजीने इस नवरात्रव्रतके प्रभावसे पृथ्वीतलपर । ५३ महान् सुख प्राप्त किया ॥ ५३ ॥

व्यासजी बोले- हे राजन्! ब्राह्मणका यह वचन सुनकर उस वैश्यने उन्हें अपना गुरु मान । लिया और उनसे मायाबीज नामक उत्तम मन्त्रकी ॥ ५४ दीक्षा प्राप्त की ॥ ५४ ॥

तत्पश्चात् आलस्यहीन होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक । पूरे नवरात्रभर उसने उस मन्त्रका जप किया और ॥ ५५ अनेकविध उपहारोंसे आदरपूर्वक भगवतीका पूजन । किया । इस प्रकार मायाबीजपरायण उस वैश्यने नौ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -13 A

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३८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८ नवमे वत्सरान्ते तु महाष्टम्यां महेश्वरी ॥ ५६ | वर्षोंतक यह अनुष्ठान किया । नौवें वर्षके अन्तमें महाष्टमी तिथिको अर्धरात्रि आनेपर महेश्वरीने उसे अर्धरात्रे तु सञ्जाते प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ । अपना प्रत्यक्ष दर्शन दिया और अनेक प्रकारके नानावरप्रदानैश्च कृतकृत्यं चकार तम् ॥ ५७ वरदानोंसे कृतकृत्य कर दिया ॥ ५५ - ५७ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवीपूजामहत्त्ववर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

~~~ अथाष्टाविंशोऽध्यायः श्रीरामचरित्रवर्णन जनमेजय उवाच

कथं रामेण तच्चीर्णं व्रतं देव्याः सुखप्रदम् ।

राज्यभ्रष्टः कथं सोऽथ कथं सीता हृता पुनः ॥ १

व्यास उवाच

राजा दशरथः श्रीमानयोध्याधिपतिः पुरा ।

सूर्यवंशधरश्चासीद्देवब्राह्मणपूजकः ॥ २

चत्वारो जज्ञिरे तस्य पुत्रा लोकेषु विश्रुताः ।

रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्चेति नामतः ॥ ३

राज्ञः प्रियकराः सर्वे सदृशा गुणरूपतः ।

कौसल्यायाः सुतो रामः कैकेय्या भरतः स्मृतः ॥ ४

सुमित्रातनयौ जातौ यमलौ द्वौ मनोहरौ ।

ते जाता वै किशोराश्च धनुर्बाणधराः किल ॥ ५

सूनवः कृतसंस्कारा भूपतेः सुखवर्धकाः ।

कौशिकेन तदागत्य प्रार्थितो रघुनन्दनः ॥ ६

राघवं मखरक्षार्थं सूनुं षोडशवार्षिकम् ।

तस्मै सोऽयं ददौ रामं कौशिकाय सलक्ष्मणम् ॥ ७

तौ समेत्य मुनिं मार्गे जग्मतुश्चारुदर्शनौ ।

ताटका निहता मार्गे राक्षसी घोरदर्शना ॥ ८

जनमेजय बोले- श्रीरामने भगवती जगदम्बाके इस सुखप्रदायक व्रतका अनुष्ठान किस प्रकार किया, वे राज्यच्युत कैसे हुए और फिर सीता - हरण किस प्रकार हुआ? ॥ १ ॥

व्यासजी बोले- पूर्वकालमें श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्यापुरीमें राज्य करते थे । वे सूर्यवंशमें श्रेष्ठ राजाके रूपमें प्रतिष्ठित थे और वे देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया करते थे ॥ २ ॥

उनके चार पुत्र उत्पन्न हुए; जो लोकमें राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न नामसे विख्यात हुए । गुण तथा रूपमें पूर्ण समानता रखनेवाले वे सभी महाराज दशरथको अत्यन्त प्रिय थे । उनमें राम महारानी कौसल्याके तथा भरत महारानी कैकेयीके पुत्र कहे गये । रानी सुमित्रा लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न नामवाले जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न हुए । वे चारों किशोरावस्थामें ही धनुष - बाणधारी हो गये॥३–५ ॥ महाराज दशरथने सुख बढ़ानेवाले अपने चारों पुत्रोंके संस्कार भी सम्पन्न कर दिये । तब एक समय महर्षि विश्वामित्र ने दशरथके यहाँ आकर उनसे रघुनन्दन रामको माँगा ॥ ६ ॥

महाराज दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये लक्ष्मण-सहित सोलहवर्षीय पुत्र रामको विश्वामित्रको समर्पित कर दिया ॥ ७ ॥

प्रियदर्शन वे दोनों भाई मुनिके साथ मार्गमें चल दिये । रामचन्द्रजीने मुनियोंको सदा पीड़ित करनेवाली तथा अत्यन्त भयानक रूपवाली ताटकाको 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 13 B

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अ ० २८ ] तृतीय

रामेणैकेन बाणेन मुनीनां दुःखदा सदा ।

यज्ञरक्षा कृता तत्र सुबाहुर्निहतः शठः ॥ ९

मारीचोऽथ मृतप्रायो निक्षिप्तो बाणवेगतः ।

एवं कृत्वा महत्कर्म यज्ञस्य परिरक्षणम् ॥ १०

गतास्ते मिथिलां सर्वे रामलक्ष्मणकौशिकाः ।

अहल्या मोचिता शापान्निष्पापा सा कृताबला ॥। ११

विदेहनगरे तौ तु जग्मतुर्मुनिना सह ।

बभञ्ज शिवचापञ्च जनकेन पणीकृतम् ॥ १२

उपयेमे ततः सीतां जानकीञ्च रमांशजाम् ।

लक्ष्मणाय ददौ राजा पुत्रीमेकां तथोर्मिलाम् ॥ १३

कुशध्वजसुते कन्ये प्रापतुर्भ्रातरावुभौ ।

तथा भरतशत्रुघ्नौ सुशीलौ शुभलक्षणौ ॥ १४

एवं दारक्रियास्तेषां भ्रातॄणां चाभवन्नृप ।

चतुर्णां मिथिलायां तु यथाविधि विधानतः ॥ १५

राज्ययोग्यं सुतं दृष्ट्वा राजा दशरथस्तदा ।

राघवाय धुरं दातुं मनश्चक्रे निजाय वै ॥ १६

सम्भारं विहितं दृष्ट्वा कैकेयी पूर्वकल्पितौ ।

वरौ संप्रार्थयामास भर्तारं वशवर्तिनम् ॥ १७

राज्यं सुताय चैकेन भरताय महात्मने ।

रामाय वनवासञ्च चतुर्दशसमास्तथा ॥ १८

रामस्तु वचनात्तस्याः सीतालक्ष्मणसंयुतः ।

जगाम दण्डकारण्यं राक्षसैरुपसेवितम् ॥ १ ९

राजा दशरथः पुत्रविरहेण प्रपीडितः ।

जहौ प्राणानमेयात्मा पूर्वशापमनुस्मरन् ॥ २०

स्कन्ध ३८७ रास्तेमें ही मात्र एक बाणसे मार डाला । उन्होंने दुष्ट सुबाहुका वध किया तथा मारीचको अपने बाणसे दूर फेंककर उसे मृतप्राय कर दिया और यज्ञ - रक्षा की । इस प्रकार यज्ञ - रक्षाका महान् कृत्य सम्पन्न करके राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्रने मिथिलापुरीके लिये प्रस्थान किया । जाते समय मार्गमें रामने अबला अहल्याको शापसे मुक्ति प्रदान करके उसे पापरहित कर दिया ॥ ८-१ -११ ॥ इसके बाद वे दोनों भाई मुनि विश्वामित्रके साथ जनकपुर पहुँच गये और वहाँ श्रीरामने जनकजीद्वारा प्रतिज्ञाके रूपमें रखे शिव - धनुषको तोड़ दिया और लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न जनकनन्दिनी सीताके साथ विवाह किया । राजा जनकने दूसरी पुत्री उर्मिलाका विवाह लक्ष्मणके साथ कर दिया ॥ १२-१३ ॥ शीलसम्पन्न तथा शुभलक्षणोंसे युक्त दोनों भाई भरत तथा शत्रुघ्नने कुशध्वजकी दो पुत्रियों [ माण्डवी तथा श्रुतकीर्ति ] - को पत्नीरूपमें प्राप्त किया ॥ १४ ॥

हे राजन्! इस प्रकार उन चारों भाइयोंका विवाह मिथिलापुरीमें ही विधि - विधान से सम्पन्न हुआ ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् महाराज दशरथने अपने बड़े पुत्र रामको राज्य करनेयोग्य देखकर उन्हें राज्य - भार सौंपनेका मनमें निश्चय किया ॥१६ ॥

राजतिलक - सम्बन्धी सामग्रियोंका प्रबन्ध हुआ देखकर रानी कैकेयीने अपने वशीभूत महाराज दशरथसे पूर्वकल्पित दो वरदान माँगे ॥१७ ॥

उसने पहले वरदानके रूपमें अपने पुत्र भरतके लिये राज्य तथा दूसरे वरदानके रूपमें महात्मा रामको चौदह वर्षोंका वनवास माँगा ॥ १८ ॥

कैकेयीका वचन मानकर श्रीरामचन्द्रजी सीता तथा लक्ष्मणके साथ दण्डकवन चले गये, जहाँ राक्षस रहते थे ॥ १ ९ ॥ तदनन्तर पुत्रके वियोगजनित शोक सन्तप्त पुण्यात्मा दशरथने पूर्वकालमें एक ऋषिद्वारा प्रदत्त शापका स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिये ॥ २० ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] –13 C

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३८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८

भरतः पितरं दृष्ट्वा मृतं मातृकृतेन वै ।

राज्यमृद्धं न जग्राह भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥

पञ्चवट्यां वसन् रामो रावणावरजां वने ।

शूर्पणखां विरूपां वै चकारातिस्मरातुराम् ॥

खरादयस्तु तां दृष्ट्वा छिन्ननासां निशाचराः । चक्रुः संग्राममतुलं रामेणामिततेजसा ।

स जघान खरादींश्च दैत्यानतिबलान्वितान् ।

मुनीनां हितमन्विच्छन् रामः सत्यपराक्रमः ॥

गत्वा शूर्पणखा लङ्कां खरदूषणघातनम् ।

दूषिता कथयामास रावणाय च राघवात् ॥

सोऽपि श्रुत्वा विनाशं तं जातः क्रोधवशः खलः ।

जगाम रथमारुह्य मारीचस्याश्रमं तदा ॥

कृत्वा हेममृगं नेतुं प्रेषयामास रावणः ।

सीताप्रलोभनार्थाय मायाविनमसम्भवम् ॥

सोऽथ हेममृगो भूत्वा सीतादृष्टिपथं गतः ।

मायावी चातिचित्राङ्गश्चरन्प्रबलमन्तिके ॥

तं दृष्ट्वा जानकी प्राह राघवं दैवनोदिता ।

चर्मानयस्व कान्तेति स्वाधीनपतिका यथा ॥

अविचार्याथ रामोऽपि तत्र संस्थाप्य लक्ष्मणम् ।

सशरं धनुरादाय ययौ मृगपदानुगः ॥

सारङ्गोऽपि हरिं दृष्ट्वा मायाकोटिविशारदः ।

दृश्यादृश्यो बभूवाथ जगाम च वनान्तरम् ॥

मत्वा हस्तगतं रामः क्रोधाकृष्टधनुः पुनः ।

जघान चातितीक्ष्णेन शरेण कृत्रिमं मृगम् ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —13 D माता कैकेयीके कृत्यके कारण पिताजीकी मृत्यु २१ देखकर भरतजीने भाई श्रीरामका हित करनेकी इच्छासे अयोध्याका समृद्ध राज्य स्वीकार नहीं किया ॥ २१ ॥

उधर पंचवटीमें निवास करते हुए श्रीरामने रावणकी छोटी बहन अतिशय कामातुर शूर्पणखाको २२ कुरूप बना दिया ॥ २२ ॥

तब खर - दूषण आदि राक्षसोंने उसे कटी हुई नासिकावाली देखकर अमित तेजस्वी रामके साथ २३ घोर संग्राम किया ॥२३ ॥

उस संग्राममें सत्यपराक्रमी श्रीरामने मुनियोंका कल्याण करनेकी इच्छासे अत्यन्त बलशाली खर २४ आदि राक्षसोंका संहार कर दिया ॥२४ ॥

तत्पश्चात् लंका जाकर उस दुष्ट शूर्पणखाने रामके द्वारा खर - दूषणके संहारका समाचार रावणसे बताया ॥ २५ ॥

२५ वह दुष्ट रावण भी संहारके विषयमें सुनकर अत्यन्त क्रोधित हो उठा और तब रथपर सवार होकर वह मारीचके आश्रममें पहुँच गया ॥ २६ ॥

२६ सीता - हरणके उद्देश्यसे रावणने मायावी मारीचको असम्भव स्वर्ण मृग बनाकर सीताको प्रलोभित करनेके लिये भेजा ॥ २७ ॥

२७ तत्पश्चात् वह मायावी मारीच अत्यन्त अद्भुत अंगोंवाला स्वर्ण - मृग बनकर चरते - चरते सीताजी सन्निकट पहुँच गया और उन्होंने उसे देख लिया ॥ २८ ॥

२८ उसे देखकर दैवी प्रेरणासे स्वाधीनपतिका स्त्रीकी भाँति सीताने श्रीरामसे कहा- हे कान्त! आप इस मृगका चर्म ले आइये ॥ २ ९ ॥ २ ९ राम भी बिना कुछ सोचे - समझे लक्ष्मणको सीताके रक्षार्थ वहीं छोड़कर धनुष तथा बाण लेकर उस मृगके पीछे - पीछे दौड़ पड़े ॥ ३० ॥

करोड़ों प्रकारकी माया रचनेका ज्ञान रखनेवाला ३० मृगरूपधारी वह मारीच भी रामको अपने पीछे दौड़ता देखकर कभी दिखायी पड़ते हुए तथा कभी आँखोंसे ओझल होते हुए एक वनसे दूसरे वनमें बहुत दूर ३१ | चला गया ॥ ३१ ॥

रामने अब उसे हस्तगत समझकर क्रोधपूर्वक धनुष खींचकर अत्यन्त तीक्ष्ण बाणसे उस कृत्रिम ३२ । मृगको मार डाला ॥ ३२ ॥

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अ ० २८ ]

स हतोऽतिबलात्तेन चुक्रोश भृशदुःखितः ।

हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति मायावी नश्वरः खलः ॥

स शब्दस्तुमुलस्तावज्जानक्या संश्रुतस्तदा ।

राघवस्येति सा मत्वा दीना देवरमब्रवीत् ॥

गच्छ लक्ष्मण तूर्णं त्वं हतोऽसौ रघुनन्दनः ।

त्वामाह्वयति सौमित्रे साहाय्यं कुरु सत्वरम् ॥

तत्राह लक्ष्मणः सीतामम्ब रामवधादपि ।

नाहं गच्छेऽद्य मुक्त्वा त्वामसहायामिहाश्रमे ॥

आज्ञा मे राघवस्यात्र तिष्ठेति जनकात्मजे ।

तदतिक्रमभीतोऽहं न त्यजामि तवान्तिकम् ॥

दूरं वै राघवं दृष्ट्वा वने मायाविना किल ।

त्यक्त्वा त्वां नाधिगच्छामि पदमेकं शुचिस्मिते ॥

कुरु धैर्यं न मन्येऽद्य रामं हन्तुं क्षमं क्षितौ ।

नाहं त्यक्त्वा गमिष्यामि विलंघ्य रामभाषितम् ॥

व्यास उवाच

रुदती सुदती प्राह तं तदा विधिनोदिता ।

अक्रूरा वचनं क्रूरं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥

अहं जानामि सौमित्रे सानुरागं च मां प्रति ।

प्रेरितं भरतेनैव मदर्थमिह सङ्गतम् ॥

नाहं तथाविधा नारी स्वैरिणी कुहकाधम ।

मृते रामे पतिं त्वां न कर्तुमिच्छामि कामतः ॥

नागमिष्यति चेद्रामो जीवितं सन्त्यजाम्यहम् ।

विना तेन न जीवामि विधुरा दुःखिता भृशम् ॥

तृतीय स्कन्ध ३८ ९ रामके प्रबल प्रहारसे आहत होकर वह मरणोन्मुख ३३ मायावी तथा नीच मृग चीख - चीखकर चिल्लाने लगा— हा लक्ष्मण! अब मैं मारा गया ॥ ३३ ॥

उसके गगन भेदी चीत्कारकी ध्वनिको सीताने सुन लिया । ' यह तो रामकी पुकार है ' - ऐसा मानकर ३४ उन्होंने दुःखी होकर देवर लक्ष्मणसे कहा — हे लक्ष्मण! ऐसा प्रतीत होता है कि वे रघुनन्दन राम आहत हो गये हैं । अत: तुम शीघ्र जाओ । हे सुमित्रानन्दन! वे ३५ तुम्हें पुकार रहे हैं; वहाँ शीघ्र ही पहुँचकर उनकी सहायता करो ॥ ३४-३५ ॥ तब लक्ष्मणजीने सीतासे कहा - हे माता! रामका ३६ वध ही क्यों न हो; मैं आपको इस आश्रम में इस समय असहाय छोड़कर वहाँ नहीं जा सकता । हे जनकनन्दिनि! मुझे रामकी आज्ञा है कि तुम इसी आश्रममें रहना । ३७ उनकी आज्ञाका उल्लंघन करनेमें मैं डरता हूँ । अत: आपका सामीप्य नहीं छोड़ सकता । हे शुचिस्मिते! वह मायावी भगवान् श्रीरामको बहुत दूर दौड़ा ले गया है — यह जान करके मैं आपको छोड़कर यहाँसे ३८ एक पग भी नहीं जा सकता । आप धैर्य धारण कीजिये । मैं तो ऐसा मानता हूँ कि इस समय सम्पूर्ण पृथ्वीलोक में श्रीरामको मारनेमें कोई समर्थ नहीं है । ३ ९ | रामके आदेशका उल्लंघन करके तथा आपको यहाँ

छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा । ३६–३९ ॥

व्यासजी बोले — तत्पश्चात् सुन्दर दाँतोंवाली तथा सौम्य स्वभाववाली सीताने दैवसे प्रेरित होकर ४० शुभ लक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे रोते हुए यह कठोर वचन कहा— ॥ ४० ॥

हे सुमित्रातनय! अब मैं जान गयी कि तुम मेरे प्रति अनुरागयुक्त हो और भरतकी प्रेरणासे मेरे ४ ९ प्रयोजनसे यहाँ आये हो ॥ ४१ ॥

हे कुहकाधम! मैं उस तरहकी स्वच्छन्द स्त्री नहीं हूँ । मैं रामके मृत हो जानेपर भी सुखके लिये ४२ तुम्हें अपना पति कभी नहीं बना सकती ॥४२ ॥

यदि राम नहीं लौटेंगे तो मैं अपना प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि उनके बिना मैं विधवा होकर अत्यधिक ४३ । दुःखी जीवन नहीं जी सकती ॥ ४३ ॥

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३ ९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८

गच्छ वा तिष्ठ सौमित्रे न जानेऽहं तवेप्सितम् ।

क्व गतं तेऽत्र सौहार्दं ज्येष्ठे धर्मरते किल ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या लक्ष्मणो दीनमानसः ।

प्रोवाच रुद्धकण्ठस्तु तां तदा जनकात्मजाम् ॥

किमात्थ क्षितिजे वाक्यं मयि क्रूरतरं किल ।

किं वदस्यत्यनिष्टं ते भावि जाने धिया ह्यहम् ॥

इत्युक्त्वा निर्ययौ वीरस्तां त्यक्त्वा प्ररुदन्भृशम् ।

अग्रजस्य ययौ पश्यञ्छोकार्तः पृथिवीपते ॥

गतेऽथ लक्ष्मणे तत्र रावणः कपटाकृतिः ।

भिक्षुवेषं ततः कृत्वा प्रविवेश तदाश्रमे ॥

जानकी तं यतिं मत्वा दत्त्वार्घ्यं वन्यमादरात् ।

भैक्ष्यं समर्पयामास रावणाय दुरात्मने ॥

तां पप्रच्छ स दुष्टात्मा नम्रपूर्वं मृदुस्वरम् ।

कासि पद्मपलाशाक्षि वने चैकाकिनी प्रिये ॥

पिता कस्तेऽथ वामोरु भ्राता कः कः पतिस्तव ।

मूढेवैकाकिनी चात्र स्थितासि वरवर्णिनि ॥

निर्जने विपिने किं त्वं सौधार्हा त्वमसि प्रिये ।

उजे मुनिपत्नीवद्देवकन्यासमप्रभा ॥

व्यास उवाच

इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच विदेहजा ।

दिव्यं दिष्ट्या यतिं ज्ञात्वा मन्दोदर्याः पतिं तदा ॥

हे लक्ष्मण! तुम जाओ या रहो । मुझे तुम्हारी ४४ वास्तविक इच्छाका पता नहीं है । धर्मपरायण ज्येष्ठ भाईके प्रति आपका प्रेम अब कहाँ चला गया? ॥ ४४ ॥

सीताका वह वचन सुनकर लक्ष्मणके मनमें अत्यधिक कष्ट हुआ । रुदनके कारण रुँधे कण्ठसे ४५ उन्होंने जनकनन्दिनी सीतासे कहा - ॥४५ ॥

हे भूमिकन्ये! आप इस प्रकारके अति कठोर वचन मेरे लिये क्यों कह रही हैं? मेरा मन तो यह कह रहा है कि आपके समक्ष कोई अनिष्टकर ४६ परिस्थिति उत्पन्न होनेवाली है ॥४६ ॥

[ व्यासजीने कहा- ] हे महाराज जनमेजय! ऐसा कहकर अत्यधिक विलाप करते हुए वीर ४७ लक्ष्मण सीताको वहीं छोड़कर चल दिये और अत्यधिक शोकाकुल होकर बड़े भाई रामको चारों ओर देखते हुए आगेकी ओर बढ़ते गये ॥ ४७ ॥

इस प्रकार लक्ष्मणके वहाँसे चले जानेपर कपट ४८ स्वभाववाले रावणने साधु - वेष धारणकर उस आश्रममें प्रवेश किया ॥ ४८ ॥

जानकी उस दुष्टात्मा रावणको संन्यासी ४ ९ समझकर आदरपूर्वक वन्य सामग्रियोंका अर्घ्य प्रदान करके भिक्षा देने लगीं ॥ ४ ९ ॥ तब उस दुरात्माने अत्यन्त विनम्र भावसे मधुर वाणीमें सीताजीसे पूछा- हे पद्मपत्रके समान ५० नेत्रोंवाली प्रिये! तुम कौन हो और इस वनमें अकेली क्यों रह रही हो? ॥ ५० ॥

हे वामोरु! तुम्हारे पिता कौन हैं और तुम्हारे भाई तथा पति कौन हैं? हे सुन्दरि! तुम एक मूढ़ ५१ स्त्रीकी भाँति यहाँ अकेली क्यों रह रही हो? ॥ ५१ ॥

हे प्रिये! इस निर्जन वनमें क्यों रह रही हो? तुम तो महलोंमें निवास करनेयोग्य हो । देवकन्याके ५२ समान कान्तिवाली तुम एक मुनिपत्नीकी भाँति इस कुटियामें क्यों रह रही हो? ॥ ५२ ॥

व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] उसका यह वचन सुनकर विदेहतनया सीताजीने मन्दोदरीके पति रावणको दैववश एक दिव्य संन्यासी समझकर ५३ उत्तर दिया ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 400

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अ ० २८ ]

राजा दशरथः श्रीमांश्चत्वारस्तस्य वै सुताः ।

तेषु ज्येष्ठः पतिर्मेऽस्ति रामनामेति विश्रुतः ॥

विवासितोऽथ कैकेय्या कृते भूपतिना वरे ।

चतुर्दश समा रामो वसतेऽत्र सलक्ष्मणः ॥

जनकस्य सुता चाहं सीतानाम्नीति विश्रुता ।

भङ्क्त्वा शैवं धनुः कामं रामेणाहं विवाहिता ॥

रामबाहुबलेनात्र वसामो निर्भया वने ।

काञ्चनं मृगमालोक्य हन्तुं मे निर्गतः पतिः ॥

लक्ष्मणोऽपि पुनः श्रुत्वा रवं भ्रातुर्गतोऽधुना ।

तयोर्बाहुबलादत्र निर्भयाहं वसामि वै ॥

मयेदं कथितं सर्वं वृत्तान्तं वनवासके ।

तेऽत्रागत्यार्हणां ते वै करिष्यन्ति यथाविधि ॥

यतिर्विष्णुस्वरूपोऽसि तस्मात्त्वं पूजितो मया ।

आश्रमो विपिने घोरे कृतोऽस्ति रक्षसां कुले ॥

तस्मात्त्वां परिपृच्छामि सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः ।

को s सि त्रिदण्डरूपेण विपिने त्वं समागतः ॥

रावण उवाच

लङ्केशोऽहं मरालाक्षि श्रीमान्मन्दोदरीपतिः ।

त्वत्कृते तु कृतं रूपं मयेत्थं शोभनाकृते ॥

आगतोऽहं वरारोहे भगिन्या प्रेरितोऽत्र वै ।

जनस्थाने हतौ श्रुत्वा भ्रातरौ खरदूषणौ ॥

अङ्गीकुरु नृपं मां त्वं त्यक्त्वा तं मानुषं पतिम् ।

हृतराज्यं गतश्रीकं निर्बलं वनवासिनम् ॥

तृतीय स्कन्ध ३ ९ १ दशरथ नामक लक्ष्मीसम्पन्न एक राजा हैं, ५४ उनके चार पुत्र हैं । उनमें सबसे बड़े पुत्र जो ' राम ' नामसे विख्यात हैं, वे ही मेरे पति हैं ॥ ५४ ॥

कैकेयीने महाराज दशरथसे वरदान माँगकर रामको चौदह वर्ष के लिये वनवास दिला दिया । वे ५५ अपने भाई लक्ष्मणके साथ अब यहींपर रह रहे हैं ॥ ५५ ॥

मैं राजा जनककी पुत्री हूँ तथा ' सीता ' नामसे ५६ विख्यात हूँ । शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामने मेरा पाणिग्रहण किया है ॥ ५६ ॥

उन्हीं रामके बाहुबलका आश्रय लेकर मैं ५७ निर्भीक होकर इस वनमें रहती हूँ । एक स्वर्ण - मृग देखकर उसे मारनेके लिये मेरे पति गये हुए हैं ॥ ५७ ॥

अपने भाईका शब्द सुनकर लक्ष्मण भी इस ५८ समय उधर ही गये हुए हैं । उन्हीं दोनोंके बाहुबलसे मैं यहाँ निडर होकर रहती हूँ ॥ ५८ ॥

मैंने आपको वनवास - सम्बन्धी अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त बता दिया | अब वे लोग यहाँ आकर आपका ५ ९ विधिपूर्वक सत्कार करेंगे ॥ ५ ९ ॥ संन्यासी विष्णुस्वरूप होता है, इसीलिये मैंने आपकी पूजा की है । राक्षसोंके समुदायद्वारा सेवित ६० इस भयंकर जंगलमें यह आश्रम बना हुआ है I इसलिये मैं आपसे यह पूछती हूँ कि त्रिदण्डीके रूपमें इस वनमें पधारे हुए आप कौन हैं? आप मेरे समक्ष ६१ सत्य कहिये ॥ ६०-६१ ॥ रावण बोला- हे हंसनयने! मैं मन्दोदरीका पति तथा लंकाका नरेश श्रीमान् रावण हूँ । हे सुन्दर आकृतिवाली! तुम्हारे लिये ही मैंने इस प्रकारका वेष बनाया है ॥ ६२ ॥

६२ हे सुन्दरि! जनस्थानमें अपने भाई खर - दूषणके मारे जानेका समाचार सुनकर तथा अपनी बहन शूर्पणखाद्वारा प्रेरित किये जानेपर मैं यहाँ आया ६३ हूँ ॥ ६३ ॥

अब तुम उस राज्यच्युत, लक्ष्मीहीन, निर्बल, वनवासी तथा मानवयोनिवाले पतिको छोड़कर मुझ ६४ । राजाको स्वीकार कर लो ॥ ६४ ॥