देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 381–390
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390
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३७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५ दासोऽस्मि तव भो मातर्यथा मम मनोरमा तथा त्वमपि धर्मज्ञे न भेदोऽस्ति मनागपि अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् तस्मान्न शोचितव्यं ते सुखे दुःखे कदाचन दुःखे दुःखाधिकान्पश्येत्सुखे पश्येत्सुखाधिकम् आत्मानं शोकहर्षाभ्यां शत्रुभ्यामिव नार्पयेत्
दैवाधीनमिदं सर्वं नात्माधीनं कदाचन ।
न शोकेन तदात्मानं शोषयेन्मतिमान्नरः ॥
यथा दारुमयी योषा नटादीनां प्रचेष्टते ।
तथा स्वकर्मवशगो देही सर्वत्र वर्तते ॥
अहं वनगतो मातर्नाभवं दुःखमानसः ।
चिन्तयन्स्वकृतं कर्म भोक्तव्यमिति वेद्मि च ॥
मृतो मातामहोऽत्रैव विधुरा जननी मम ।
भयातुरा गृहीत्वा मां निर्ययौ गहनं वनम् ॥
लुण्ठिता तस्करैर्मार्गे वस्त्रहीना तथा कृता ।
पाथेयञ्च हृतं सर्वं बालपुत्रा निराश्रया ॥
माता गृहीत्वा मां प्राप्ता भारद्वाजाश्रमं प्रति ।
विदल्लोऽयं समायातस्तथा धात्रेयिकाबला ॥
मुनिभिर्मुनिपत्नीभिर्दयायुक्तैः समन्ततः ।
पोषिताः फलनीवारैर्वयं तत्र स्थितास्त्रयः ॥
दुःखं न मे तदा ह्यासीत्सुखं नाद्य धनागमे ।
न वैरं न च मात्सर्यं मम चित्ते तु कर्हिचित् ॥
नीवारभक्षणं श्रेष्ठं राजभोगात्परन्तपे ।
तदाशी नरकं याति न नीवाराशनः क्वचित् ॥
। हे माता! मैं आपका दास हूँ । जैसे मनोरमा मेरी ॥ ५ माता हैं, वैसे ही आप भी मेरी माता हैं । हे धर्मज्ञे! आपमें और उनमें मेरे लिये कुछ भी भेद नहीं है ॥ ५ ॥
। अपने किये हुए शुभ तथा अशुभ कर्मोंका फल ॥ ६ अवश्य ही भोगना पड़ता है । अतएव सुख - दुःखके विषयमें आपको कभी भी शोक नहीं करना चाहिये ॥ ६ ॥
। मनुष्यको चाहिये कि दुःखकी स्थितिमें अधिक दुःखवालोंको तथा सुखकी स्थितिमें अधिक ॥ ७ सुखवालोंको देखे; अपने आपको हर्ष - शोकरूपी शत्रुओंके अधीन न करे । यह सब दैवके अधीन है, अपने अधीन कभी नहीं । अतएव बुद्धिमान् ८ मनुष्यको चाहिये कि शोकसे अपनी आत्माको न सुखाये ॥ ७-८ ॥ जैसे कठपुतली नट आदिके संकेतपर नाचती है, ९ उसी प्रकार जीवको भी अपने कर्मके अधीन होकर सर्वत्र रहना पड़ता है॥९॥
हे माता! अपने किये हुए कर्मका फल भोगना १० ही पड़ता है - यह सोचते हुए मैं वनमें गया था, इसलिये मेरे मनमें दुःख नहीं हुआ । इस बातको मैं अभी भी जानता हूँ ॥१० ॥
११ इसी अयोध्यामें मेरे नाना मारे गये, माता विधवा हो गयी । भयसे व्याकुल वह मुझे लेकर घोर वनमें चली गयी । रास्तेमें चोरोंने उसे लूट १२ लिया, उसके वस्त्रतक उतार लिये और समस्त राह - सामग्री छीन ली । वह बालपुत्रा निराश्रय होकर मुझे लिये हुए भारद्वाजमुनिके आश्रमपर पहुँची । ये १३ मन्त्री विदल्ल तथा अबला दासी हमारे साथ गये थे॥११–१३ ॥ आश्रमके मुनियों और मुनिपत्नियोंने दया करके नीवार तथा फलोंसे भलीभाँति हमारा पालन किया १४ और हम तीनों वहीं रहने लगे ॥१४ ॥
उस समय निर्धन होनेके कारण न मुझे दुःख था और न अब धन आ जानेपर सुख ही है । मेरे मनमें १५ कभी भी वैर तथा ईर्ष्या की भावना नहीं रहती ॥ १५ ॥
हे परन्तपे! राजसी भोजनकी अपेक्षा नीवारभक्षण श्रेष्ठ है; क्योंकि राजस अन्न खानेवाला नरकमें जा १६ सकता है, किंतु नीवार भोजी कभी नहीं ॥ १६ ॥
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अ ० २५ ]
धर्मस्याचरणं कार्यं पुरुषेण विजानता ।
सञ्जित्येन्द्रियवर्गं वै यथा न नरकं व्रजेत् ॥
मानुष्यं दुर्लभं मातः खण्डेऽस्मिन्भारते शुभे ।
आहारादिसुखं नूनं भवेत्सर्वासु योनिषु ॥
प्राप्य तं मानुषं देहं कर्तव्यं धर्मसाधनम् ।
स्वर्गमोक्षप्रदं नृणां दुर्लभं चान्ययोनिषु ॥
व्यास उवाच
इत्युक्ता सा तदा तेन लीलावत्यतिलज्जिता ।
पुत्रशोकं परित्यज्य तमाहा श्रुविलोचना ॥
सापराधास्मि पुत्राहं कृता पित्रा युधाजिता ।
हत्वा मातामहं तेऽत्र हृतं राज्यं तु येन वै ॥
न तं वारयितुं शक्ता तदाहं न सुतं मम ।
यत्कृतं कर्म तेनैव नापराधोऽस्ति मे सुत ॥
तौ मृतौ स्वकृतेनैव कारणं त्वं तयोर्न च ।
नाहं शोचामि तं पुत्रं सदा शोचामि तत्कृतम् ॥
पुत्रस्त्वमसि कल्याण भगिनी मे मनोरमा ।
न च क्रोधो न शोको मे त्वयि पुत्र मनागपि ॥
कुरु राज्यं महाभाग प्रजाः पालय सुव्रत ।
भगवत्याः प्रसादेन प्राप्तमेतदकण्टकम् ॥
तदाकर्ण्य वचो मातुर्नत्वा तां नृपनन्दनः ।
जगाम भवनं रम्यं यत्र पूर्वं मनोरमा ॥
न्यवसत्तत्र गत्वा तु सर्वानाहूय मन्त्रिणः ।
दैवज्ञानथ पप्रच्छ मुहूर्तं दिवसं शुभम् ॥
सिंहासनं तथा हैमं कारयित्वा मनोहरम् । सिंहासने स्थितां देवीं पूजयिष्ये सदाप्यहम्
स्थापयित्वासने देवीं धर्मार्थकाममोक्षदाम् ।
राज्यं पश्चात्करिष्यामि यथा रामादिभिः कृतम् ॥
तृतीय स्कन्ध ३७३ इन्द्रियोंपर सम्यक् नियन्त्रण करके विज्ञ पुरुषको १७ धर्मका आचरण करना चाहिये, जिससे उसे नरकमें न जाना पड़े ॥ १७ ॥
हे माता! इस पवित्र भारतवर्ष में मानवजन्म दुर्लभ १८ है । आहारादिका सुख तो निश्चय ही सभी योनियोंमें मिल सकता है । स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले इस मनुष्यतनको पाकर धर्मसाधन करना चाहिये; क्योंकि १ ९ अन्य योनियोंमें यह दुर्लभ है ॥ १८-१९ ॥ व्यासजी बोले – उस सुदर्शनके यह कहनेपर लीलावती बहुत लज्जित हुई और पुत्रशोक त्यागकर आँखोंमें आँसू भरके बोली - ॥ २० ॥
२० हे पुत्र! मेरे पिता युधाजित्ने मुझे अपराधिनी बना दिया । उन्होंने ही तुम्हारे नानाका वध करके राज्यका हरण कर लिया था ॥ २१ ॥
२१ हे तात! उस समय मैं उन्हें तथा अपने पुत्रको रोकनेमें समर्थ नहीं थी । उन्होंने जो कुछ किया, उसमें २२ मेरा अपराध नहीं था ॥ २२ ॥
वे दोनों अपने ही कर्मसे मृत्युको प्राप्त हुए हैं । उनकी मृत्युमें तुम कारण नहीं हो । अतएव मैं अपने २३ उस पुत्रके लिये शोक नहीं करती । मैं सदा उसके किये कर्मकी चिन्ता करती रहती हूँ ॥ २३ ॥
हे कल्याण! अब तुम्हीं मेरे पुत्र हो और २४ मनोरमा मेरी बहन है । हे पुत्र! तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी शोक या क्रोध नहीं है ॥ २४ ॥
हे महाभाग! अब तुम राज्य करो और प्रजाका २५ पालन करो । हे सुव्रत! भगवतीकी कृपासे ही तुम्हें यह अकंटक राज्य प्राप्त हुआ है ॥ २५ ॥
माता लीलावतीका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम २६ करके राजकुमार सुदर्शन उस भव्य भवनमें गये, जहाँ पहले उनकी माता मनोरमा रहा करती थीं । वहाँ जाकर २७ उन्होंने सब मन्त्रियों तथा ज्योतिषियोंको बुलाकर शुभ दिन और मुहूर्त पूछा और कहा कि सोनेका सुन्दर सिंहासन बनवाकर उसपर विराजमान देवीका मैं नित्य ॥ २८ पूजन करूँगा । उस सिंहासनपर धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली भगवतीकी स्थापना करनेके बाद ही मैं राज्यकार्य संचालित करूँगा, जैसा मेरे पूर्वज २ ९ । श्रीराम आदिने किया है । सभी नागरिकजनोंको चाहिये
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३७४ पूजनीया सदा देवी सर्वैर्नागरिकैर्जनैः माननीया शिवा शक्तिः सर्वकामार्थसिद्धिदा इत्युक्ता मन्त्रिणस्ते तु चक्रुर्वै राजशासनम् प्रासादं कारयामासुः शिल्पिभिः सुमनोरमम् प्रतिमां कारयित्वाथ मुहूर्तेऽथ शुभे दिने द्विजानाहूय वेदज्ञान्स्थापयामास भूपतिः हवनं विधिवत्कृत्वा पूजयित्वाथ देवताम् प्रासादे मतिमान् देव्याः स्थापयामास भूमिपः उत्सवस्तत्र संवृत्तो वादित्राणां च निःस्वनैः ब्राह्मणानां वेदघोषैर्गानैस्तु विविधैर्नृप व्यास उवाच प्रतिष्ठाप्य शिवां देवीं विधिवद्वेदवादिभिः । पूजां नानाविधां राजा चकारातिविधानतः
कृत्वा पूजाविधिं राजा राज्यं प्राप्य स्वपैतृकम् ।
विख्यातश्चाम्बिका देवी कोसलेषु बभूव ह ॥
राज्यं प्राप्य नृपः सर्वं सामन्तकनृपानथ ।
वशे चक्रेऽतिधर्मिष्ठान्सद्धर्मविजयी नृपः ॥
यथा रामः स्वराज्येऽभूद्दिलीपस्य रघुर्यथा ।
प्रजानां वै सुखं तद्वन्मर्यादापि तथाभवत् ॥
धर्मो वर्णाश्रमाणां च चतुष्पादभवत्तथा ।
नाधर्मे रमते चित्तं केषामपि महीतले ॥
ग्रामे ग्रामे च प्रासादांश्चक्रुः सर्वे जनाधिपाः ।
देव्याः पूजा तदा प्रीत्या कोसलेषु प्रवर्तिता ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५ । कि वे सभी प्रकारके काम, अर्थ और सिद्धि प्रदान ॥ ३० करनेवाली कल्याणमयी भगवती आदिशक्तिका पूजन तथा सम्मान करते रहें ॥ २६–३० ॥ । राजा सुदर्शनके ऐसा कहनेपर मन्त्रीगण राजाज्ञाके ॥ ३१ पालनमें तत्पर हो गये । उन्होंने शिल्पियोंद्वारा एक बहुत सुन्दर मन्दिर तैयार कराया ॥ ३१ ॥
। तदनन्तर राजाने देवीकी प्रतिमा बनवाकर शुभ दिन और शुभ मुहूर्तमें वैदिक विद्वानोंको बुलाकर ॥ ३२ उसकी स्थापना की ॥३२ ॥
। तत्पश्चात् विधिवत् हवन तथा देवपूजन करके बुद्धिमान् राजाने उस मन्दिरमें देवीकी प्रतिमा स्थापित ॥३३ की ॥ ३३ ॥
हे राजन्! उस समय ब्राह्मणोंके वेदघोष, । विविध गानों तथा वाद्योंकी ध्वनिके साथ बहुत ॥ ३४ बड़ा उत्सव मनाया गया ॥३४ ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार वेदवादी विद्वानों द्वारा कल्याणमयी देवीकी विधिवत् स्थापना कराकर राजा सुदर्शनने बड़े विधानके साथ नाना प्रकारकी पूजा ॥ ३५ सम्पन्न की ॥३५ ॥
इस प्रकार राजा सुदर्शन भगवतीकी पूजा करके अपना पैतृक राज्य प्राप्तकर विख्यात हो गये और कोसल देशमें अम्बिकादेवी भी विख्यात हो गयीं ॥ ३६ ॥
३६ सम्पूर्ण राज्य प्राप्त करनेके बाद सद्धर्मसे विजय प्राप्त करनेवाले राजा सुदर्शनने सभी धर्मात्मा सामन्त राजाओं को अपने अधीन कर लिया ॥ ३७ ॥
जिस प्रकार अपने राज्यमें राम हुए और ३७ जिस प्रकार दिलीपके पुत्र राजा रघु हुए उसी प्रकार सुदर्शन भी हुए । जैसे उनके राज्यमें प्रजाओंको सुख था और मर्यादा थी, वैसा ही राजा सुदर्शनके ३८ । राज्यमें भी था ॥३८ ॥
उनके राज्यमें वर्णाश्रमधर्म चारों चरणोंसे समृद्ध हुआ । उस समय धरतीतलपर किसीका भी मन ३ ९ अधर्ममें लिप्त नहीं होता था ॥३ ९ ॥ कोसलदेशके सभी राजाओंने प्रत्येक ग्राममें देवीके मन्दिर बनवाये । तबसे समस्त कोसलदेशमें ४० प्रेमपूर्वक देवीकी पूजा होने लगी ॥ ४० ॥
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अ ० २६ ] तृतीय स्कन्ध ३७५
सुबाहुरपि काश्यां तु दुर्गायाः प्रतिमां शुभाम् ।
कारयित्वा च प्रासादं स्थापयामास भक्तितः ॥ ४१
तत्र तस्या जनाः सर्वे प्रेमभक्तिपरायणाः ।
पूजां चक्रुर्विधानेन यथा विश्वेश्वरस्य ह ॥ ४२
विख्याता सा बभूवाथ दुर्गा देवी धरातले ।
देशे देशे महाराज तस्या भक्तिर्व्यवर्धत ॥ ४३
सर्वत्र भारते लोके सर्ववर्णेषु सर्वथा ।
भजनीया भवानी तु सर्वेषामभवत्तदा ॥ ४४
शक्तिभक्तिरताः सर्वे मानिनश्चाभवन्नृप ।
आगमोक्तैरथ स्तोत्रैर्जपध्यानपरायणाः ॥ ४५
नवरात्रेषु सर्वेषु चक्रुः सर्वे विधानतः ।
अर्चनं हवनं यागं देव्या भक्तिपरा जनाः ॥ ४६
महाराज सुबाहुने भी काशीमें मन्दिरका निर्माण कराकर भक्तिपूर्वक दुर्गादेवीकी दिव्य प्रतिमा
स्थापित की । ४१ ॥
काशीके सभी लोग प्रेम और भक्तिमें तत्पर होकर विधिवत् दुर्गादेवीकी उसी प्रकार पूजा करने लगे, जैसे भगवान् विश्वनाथजीकी करते थे ॥ ४२ ॥
हे महाराज! तबसे इस धरातलपर देश-देशमें भगवती दुर्गा विख्यात हो गयीं और लोगोंमें उनकी भक्ति बढ़ने लगी । उस समय भारतवर्षमें सब जगह सभी वर्णोंमें भवानी ही सबकी पूजनीया हो | गयीं ॥ ४३-४४ ॥ हे नृप! सभी लोग भगवती शक्तिको मानने लगे, उनकी भक्तिमें निरत रहने लगे और वेद-वर्णित स्तोत्रोंके द्वारा उनके जप तथा ध्यानमें तत्पर हो गये । इस प्रकार भक्तिपरायण लोग सभी नवरात्रोंमें विधानपूर्वक भगवतीका पूजन, हवन तथा यज्ञ करने | लगे ॥ ४५-४६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे देवस्थापनवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः नवरात्रव्रत - विधान, कुमारीपूजामें प्रशस्त कन्याओंका वर्णन जनमेजय उवाच
नवरात्रे तु सम्प्राप्ते किं कर्तव्यं द्विजोत्तम ।
विधानं विधिवद् ब्रूहि शरत्काले विशेषतः ॥
किं फलं खलु कस्तत्र विधिः कार्यो महामते ।
एतद्विस्तरतो ब्रूहि कृपया द्विजसत्तम ॥
व्यास उवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि नवरात्रव्रतं शुभम् ।
शरत्काले विशेषेण कर्तव्यं विधिपूर्वकम् ॥
वसन्ते च प्रकर्तव्यं तथैव प्रेमपूर्वकम् ।
द्वावृतू यमदंष्ट्राख्यौ नूनं सर्वजनेषु वै ॥
जनमेजय बोले- हे द्विजश्रेष्ठ! नवरात्रके आनेपर और विशेष करके शारदीय नवरात्रमें क्या १ करना चाहिये? उसका विधान आप मुझे भलीभाँति बताइये ॥ १ ॥
हे महामते! उस पूजनका क्या फल है और उसमें किस विधिका पालन करना चाहिये । हे २ द्विजवर! कृपया विस्तारके साथ मुझे यह सब बताइये ॥ २ ॥
व्यासजी बोले- हे राजन्! अब मैं पवित्र नवरात्रव्रतके विषयमें बता रहा हूँ, सुनिये । शरत्कालके नवरात्रमें विशेष करके यह व्रत करना चाहिये ॥ ३ ॥
उसी प्रकार प्रेमपूर्वक वसन्त ऋतुके नवरात्रमें भी इस व्रतको करे । ये दोनों ऋतुएँ सब प्राणियोंके ४ लिये यमदंष्ट्रा कही गयी हैं ॥४ ॥
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३७६ शरद्वसन्तनामानौ दुर्गमौ प्राणिनामिह । तस्माद्यत्नादिदं कार्यं सर्वत्र शुभमिच्छता द्वावेव सुमहाघोरावृतू रोगकरौ नृणाम् । वसन्तशरदावेव सर्वनाशकरावुभौ तस्मात्तत्र प्रकर्तव्यं चण्डिकापूजनं बुधैः । चैत्राश्विने शुभे मासे भक्तिपूर्वं नराधिप अमावास्यां च सम्प्राप्य सम्भारं कल्पयेच्छुभम् हविष्यं चाशनं कार्यमेकभुक्तं तु तद्दिने मण्डपस्तु प्रकर्तव्यः समे देशे शुभे स्थले हस्तषोडशमानेन स्तम्भध्वजसमन्वितः गौरमृद्गोमयाभ्याञ्च लेपनं कारयेत्ततः । तन्मध्ये वेदिका शुभ्रा कर्तव्या च समा स्थिरा चतुर्हस्ता च हस्तोच्छ्रा पीठार्थं स्थानमुत्तमम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ । शरत् तथा वसन्त नामक ये दोनों ऋतुएँ संसारमें ॥ ५ प्राणियोंके लिये दुर्गम हैं । अतएव आत्मकल्याणके इच्छुक व्यक्तिको बड़े यत्नके साथ यह नवरात्रव्रत करना चाहिये ॥ ५ ॥
ये वसन्त तथा शरद् — दोनों ही ऋतुएँ बड़ी ॥ ६ भयानक हैं और मनुष्योंके लिये रोग उत्पन्न करनेवाली हैं । ये सबका विनाश कर देनेवाली हैं । अतएव हे राजन्! बुद्धिमान् लोगोंको शुभ चैत्र तथा ॥ ७ आश्विनमासमें भक्तिपूर्वक चण्डिकादेवीका पूजन करना चाहिये ॥ ६-७ ॥ । अमावस्या आनेपर ॥ ८ एकत्रित कर ले और उस हविष्य ग्रहण करे ॥ ८ ॥
। किसी समतल तथा ॥ ९ लम्बे - चौड़े और स्तम्भ मण्डपका निर्माण करना व्रतकी सभी शुभ सामग्री दिन एकभुक्त व्रत करे और पवित्र स्थानमें सोलह हाथ तथा ध्वजाओंसे सुसज्जित चाहिये ॥ उसको सफेद मिट्टी और गोबरसे लिपवा दे । ॥ १० तत्पश्चात् उस मण्डपके बीचमें सुन्दर, चौरस और स्थिर वेदी बनाये ॥ १० ॥
। वह वेदी चार हाथ लम्बी - चौड़ी और हाथभर तोरणानि विचित्राणि वितानञ्च प्रकल्पयेत् ॥ ११ ऊँची होनी चाहिये । पीठके लिये उत्तम स्थानका रात्रौ द्विजानथामन्त्र्य देवीतत्त्वविशारदान् आचारनिरतान्दान्तान्वेदवेदाङ्गपारगान् प्रतिपद्दिवसे कार्यं प्रातः स्नानं विधानतः नद्यां नदे तडागे वा वाप्यां कूपे गृहेऽथवा प्रातर्नित्यं पुरः कृत्वा द्विजानां वरणं ततः अर्घ्यपाद्यादिकं सर्वं कर्तव्यं मधुपूर्वकम् वस्त्रालङ्करणादीनि देयानि च स्वशक्तितः वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं विभवे सति कर्हिचित् विप्रैः सन्तोषितैः कार्यं सम्पूर्णं सर्वथा भवेत् नव पञ्च त्रयश्चैको देव्याः पाठे द्विजाः स्मृताः निर्माण करे तथा विविध रंगोंके तोरण लटकाये और । ऊपर चाँदनी लगा दे ॥ ११ ॥
रात्रि देवीका तत्त्व जाननेवाले, सदाचारी, ॥ १२ संयमी और वेद - वेदांगके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको । आमन्त्रित करके प्रतिपदाके दिन प्रातः काल नदी, नद, तड़ाग, बावली, कुआँ अथवा घरपर ही विधिवत् ॥ १३ स्नान करे ॥ १२-१३ ॥ प्रातः कालके समय नित्यकर्म करके ब्राह्मणोंका । वरण - कर उन्हें मधुपर्क तथा अर्घ्य -पाद्य आदि अर्पण ॥ १४ करे ॥१४ ॥
अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें वस्त्र, अलंकार । आदि प्रदान करे । धन रहते हुए इस काममें कभी ॥ १५ कृपणता न करे ॥ १५ ॥
सन्तुष्ट ब्राह्मणोंके द्वारा किया हुआ कर्म सम्यक् । प्रकारसे परिपूर्ण होता है । देवीका पाठ करनेके लिये ॥ १६ । नौ, पाँच, तीन अथवा एक ब्राह्मण बताये गये हैं ॥ १६ ॥
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अ ० २६ ] वरयेद् ब्राह्मणं शान्तं स्वस्तिवाचनकं कार्यं वेद्यां सिंहासनं स्थाप्यं तत्र स्थाप्याम्बिका देवी रत्नभूषणसंयुक्ता दिव्याम्बरधरा सौम्या तृतीय
पारायणकृते तदा ।
वेदमन्त्रविधानतः ॥ १७
क्षौमवस्त्रसमन्वितम् ।
चतुर्हस्तायुधान्विता ॥ १८
मुक्ताहारविराजिता ।
सर्वलक्षणसंयुता ॥ १ ९
शङ्खचक्रगदापद्मधरा सिंहे स्थिता शिवा ।
अष्टादशभुजा वापि प्रतिष्ठाप्या सनातनी ॥ २०
अर्चाभावे तथा यन्त्रं नवार्णमन्त्रसंयुतम् ।
स्थापयेत्पीठपूजार्थं कलशं तत्र पार्श्वतः ॥ २१
पञ्चपल्लवसंयुक्तं वेदमन्त्रैः सुसंस्कृतम् ।
सुतीर्थजलसम्पूर्णं हेमरत्नैः समन्वितम् ॥ २२
पार्श्वे पूजार्थसम्भारान्परिकल्प्य समन्ततः ।
गीतवादित्रनिर्घोषान्कारयेन्मङ्गलाय वै ॥ २३
तिथौ हस्तान्वितायां च नन्दायां पूजनं वरम् ।
प्रथमे दिवसे राजन् विधिवत्कामदं नृणाम् ॥ २४
नियमं प्रथमं कृत्वा पश्चात्पूजां समाचरेत् ।
उपवासेन नक्तेन चैकभुक्तेन वा पुनः ॥ २५
व्रतं मातर्नवरात्रमनुत्तमम् ।
साहाय्यं कुरु मे देवि जगदम्ब ममाखिलम् ॥ २६
यथाशक्ति प्रकर्तव्यो नियमो व्रतहेतवे ।
पश्चात्पूजा प्रकर्तव्या विधिवन्मन्त्रपूर्वकम् ॥ २७
चन्दनागुरुकर्पूरैः कुसुमैश्च सुगन्धिभिः ।
मन्दारकरजाशोकचम्पकैः करवीरकैः 6: ॥ २८
मालतीब्रह्मकापुष्पैस्तथा बिल्वदलैः शुभैः ।
पूजयेज्जगतां धात्रीं धूपैर्दीपैर्विधानतः ॥ २ ९
स्कन्ध ३७७ देवीभागवतका पारायण करनेके कार्यमें किसी शान्त ब्राह्मणका वरण करे और वैदिक मन्त्रोंसे स्वस्तिवाचन कराये ॥ १७ ॥
वेदीपर रेशमी वस्त्रसे आच्छादित सिंहासन स्थापित करे । उसके ऊपर चार भुजाओं तथा उनमें आयुधोंसे युक्त देवीकी प्रतिमा स्थापित करे । भगवतीकी प्रतिमा रत्नमय भूषणोंसे युक्त, मोतियोंके हारसे अलंकृत, दिव्य वस्त्रोंसे सुसज्जित, शुभलक्षणसम्पन्न और सौम्य आकृतिकी हो । वे कल्याणमयी भगवती शंख - चक्र-गदा - पद्म धारण किये हुए हों और सिंहपर सवार हों; अथवा अठारह भुजाओंसे सुशोभित सनातनी देवीको प्रतिष्ठित करे ॥ १८–२० ॥ भगवतीकी प्रतिमाके अभावमें नवार्णमन्त्रयुक्त यन्त्रको पीठपर स्थापित करे और पीठपूजाके लिये पासमें कलश भी स्थापित कर ले ॥ २१ ॥
वह कलश पंचपल्लवयुक्त, वैदिक मन्त्रोंसे भलीभाँति संस्कृत, उत्तम तीर्थके जलसे पूर्ण और सुवर्ण तथा पंचरत्नमय होना चाहिये ॥ २२ ॥।
पासमें पूजाकी सब सामग्रियाँ रखकर उत्सवके निमित्त गीत तथा वाद्योंकी ध्वनि भी करानी चाहिये ॥ २३ ॥
हस्तनक्षत्रयुक्त नन्दा ( प्रतिपदा ) तिथिमें पूजन श्रेष्ठ माना जाता है । हे राजन्! पहले दिन विधिवत् किया हुआ पूजन मनुष्योंका मनोरथ पूर्ण करनेवाला होता है ॥२४ ॥
सबसे पहले उपवासव्रत, एकभुक्तव्रत अथवा नक्तव्रत – इनमें से किसी एक व्रतके द्वारा नियम करनेके पश्चात् ही पूजा करनी चाहिये ॥ २५ ॥
[ पूजनके पहले प्रार्थना करते हुए कहे - ] हे माता! मैं सर्वश्रेष्ठ नवरात्रव्रत करूँगा । हे देवि! हे जगदम्बे! [ इस पवित्र कार्यमें ] आप मेरी सम्पूर्ण सहायता करें ॥ २६ ॥
इस व्रतके लिये यथाशक्ति नियम रखे । उसके बाद मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधिवत् भगवतीका पूजन करे ॥ २७ ॥
चन्दन, अगरु, कपूर तथा मन्दार, करंज, अशोक, चम्पा, कनैल, मालती, ब्राह्मी आदि सुगन्धित पुष्पों, सुन्दर बिल्वपत्रों और धूप - दीपसे विधिवत् भगवती । जगदम्बाका पूजन करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥
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३७८ फलैर्नानाविधैरर्घ्यं प्रदातव्यं च तत्र वै नारिकेलैर्मातुलुङ्गैर्दाडिमीकदलीफलैः नारंगैः पनसैश्चैव तथा पूर्णफलैः शुभैः अन्नदानं प्रकर्तव्यं भक्तिपूर्वं नराधिप मांसाशनं ये कुर्वन्ति तैः कार्यं पशुहिंसनम् महिषाजवराहाणां बलिदानं विशिष्यते देव्यग्रे निहता यान्ति पशवः स्वर्गमव्ययम् न हिंसा पशुजा तत्र निघ्नतां तत्कृतेऽनघ अहिंसा याज्ञिकी प्रोक्ता सर्वशास्त्रविनिर्णये देवतार्थे विसृष्टानां पशूनां स्वर्गतिर्ध्रुवा होमार्थं चैव कर्तव्यं कुण्डं चैव त्रिकोणकम् स्थण्डिलं वा प्रकर्तव्यं त्रिकोणं मानतः शुभम् त्रिकालं पूजनं नित्यं नानाद्रव्यैर्मनोहरैः गीतवादित्रनृत्यैश्च कर्तव्यश्च महोत्सवः नित्यं भूमौ च शयनं कुमारीणां च पूजनम् वस्त्रालङ्करणैर्दिव्यैर्भोजनैश्च सुधामयैः एकैकां पूजयेन्नित्यमेकवृद्ध्या तथा पुनः द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्रत्येकं नवकं च वा विभवस्यानुसारेण कर्तव्यं पूजनं किल । वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं राजञ्छक्तिमखे सदा एकवर्षा न कर्तव्या कन्या पूजाविधौ नृप परमज्ञा तु भोगानां गन्धादीनां च बालिका कुमारिका तु सा प्रोक्ता द्विवर्षा या भवेदिह त्रिमूर्तिश्च त्रिवर्षा च कल्याणी चतुरब्दिका रोहिणी पञ्चवर्षा च षड्वर्षा कालिका स्मृता चण्डिका सप्तवर्षा स्यादष्टवर्षा च शाम्भवी नववर्षा भवेद् दुर्गा सुभद्रा दशवार्षिकी अत ऊर्ध्वं न कर्तव्या सर्वकार्यविगर्हिता एभिश्च नामभिः पूजा कर्तव्या विधिसंयुता । तासां फलानि वक्ष्यामि नवानां पूजने सदा श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ । उस अवसरपर अर्घ्य भी प्रदान करे । हे राजन्! ॥ ३० नारियल, बिजौरा नीबू, दाडिम, केला, नारंगी, कटहल तथा बिल्वफल आदि अनेक प्रकारके सुन्दर फलोंके । साथ भक्तिपूर्वक अन्नका नैवेद्य एवं पवित्र बलि ॥ ३१ अर्पित करे ॥ ३०–३४ ॥ । होमके लिये त्रिकोण कुण्ड बनाना चाहिये ॥ ३२ अथवा त्रिकोणके मानके अनुरूप उत्तम वेदी बनानी । चाहिये ॥ ३५ ॥
विविध प्रकारके सुन्दर द्रव्योंसे प्रतिदिन ॥ ३३ भगवतीका त्रिकाल ( प्रातः - सायं - मध्याह्न ) पूजन करना । चाहिये और गायन, वादन तथा नृत्यके द्वारा महान् ॥ ३४ उत्सव मनाना चाहिये ॥३६ ॥
[ व्रती ] नित्य भूमिपर सोये और वस्त्र, आभूषण । तथा अमृतके सदृश दिव्य भोजन आदिसे कुमारी ॥ ३५ कन्याओंका पूजन करे ॥ ३७ ॥
। नित्य एक ही कुमारीका पूजन करे अथवा ॥ ३६ प्रतिदिन एक - एक कुमारीकी संख्या वृद्धिक्रमसे पूजन करे अथवा प्रतिदिन दुगुने - तिगुनेके वृद्धिक्रमसे । और या तो प्रत्येक दिन नौ कुमारी कन्याओंका पूजन ॥ ३७ | करे ॥ ३८ ॥
। अपने धन - सामर्थ्यके अनुसार भगवतीकी पूजा ॥ ३८ करे, किंतु हे राजन्! देवीके यज्ञमें धनकी कृपणता न करे ॥ ३ ९ ॥ हे राजन्! पूजाविधिमें एक वर्षकी अवस्थावाली ॥ ३ ९ कन्या नहीं लेनी चाहिये; क्योंकि वह कन्या गन्ध । और भोग आदि पदार्थोंके स्वादसे बिलकुल अनभिज्ञ ॥ ४० रहती है । कुमारी कन्या वह कही गयी है, जो दो । वर्षकी हो चुकी हो । तीन वर्षकी कन्या त्रिमूर्ति, चार वर्षकी कन्या कल्याणी, पाँच वर्षकी रोहिणी, ॥ ४१ छः वर्षकी कालिका, सात वर्षकी चण्डिका, आठ । वर्षकी शाम्भवी, नौ वर्षकी दुर्गा और दस वर्षकी ॥ ४२ कन्या सुभद्रा कहलाती है । इससे ऊपरकी अवस्थावाली । कन्याका पूजन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह ॥ ४३ सभी कार्योंमें निन्द्य मानी जाती है । इन नामोंसे कुमारीका विधिवत् पूजन सदा करना चाहिये । अब मैं इन नौ कन्याओं के पूजनसे प्राप्त होनेवाले ॥ ४४ | फलोंको कहूँगा ॥ ४०–४४ ॥
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अ ० २६ ] तृतीय
कुमारी पूजिता कुर्याद्दुःखदारिद्र्यनाशनम् ।
शत्रुक्षयं धनायुष्यं बलवृद्धिं करोति वै ॥ ४५
त्रिमूर्तिपूजनादायुस्त्रिवर्गस्य फलं भवेत् ।
धनधान्यागमश्चैव पुत्रपौत्रादिवृद्धयः ॥ ४६
विद्यार्थी विजयार्थी च राज्यार्थी यश्च पार्थिवः ।
सुखार्थी पूजयेन्नित्यं कल्याणीं सर्वकामदाम् ॥ ४७
कालिकां शत्रुनाशार्थं पूजयेद्भक्तिपूर्वकम् ।
ऐश्वर्यधनकामश्च चण्डिकां परिपूजयेत् ॥ ४८
पूजयेच्छाम्भवीं नित्यं नृप सम्मोहनाय च ।
दुःखदारिद्र्यनाशाय संग्रामे विजयाय च ॥ ४ ९
क्रूरशत्रुविनाशार्थं तथोग्रकर्मसाधने ।
दुर्गां च पूजयेद्भक्त्या परलोकसुखाय च ॥ ५०
वाञ्छितार्थस्य सिद्ध्यर्थं सुभद्रां पूजयेत्सदा ।
रोहिणीं रोगनाशाय पूजयेद्विधिवन्नरः ॥ ५१
श्रीरस्त्विति च मन्त्रेण पूजयेद्भक्तितत्परः ।
श्रीयुक्तमन्त्रैरथवा बीजमन्त्रैरथापि वा ॥ ५२
कुमारस्य च तत्त्वानि या सृजत्यपि लीलया ।
कादीनपि च देवांस्तां कुमारीं पूजयाम्यहम् ॥ ५३
सत्त्वादिभिस्त्रिमूर्तिर्या तैर्हि नानास्वरूपिणी ।
त्रिकालव्यापिनी शक्तिस्त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम् ॥५४
कल्याणकारिणी नित्यं भक्तानां पूजितानिशम् ।
पूजयामि च तां भक्त्या कल्याणीं सर्वकामदाम् ॥ ५५
स्कन्ध ३७ ९ ' कुमारी ' नामकी कन्या पूजित होकर दुःख तथा दरिद्रताका नाश करती है; वह शत्रुओंका क्षय और धन, आयु तथा बलकी वृद्धि करती है ॥ ४५ ॥
' त्रिमूर्ति ' नामकी कन्याका पूजन करनेसे धर्म-अर्थ- कामकी पूर्ति होती है, धन - धान्यका आगम होता है और पुत्र - पौत्र आदिकी वृद्धि होती है ॥ ४६ ॥
जो राजा विद्या, विजय, राज्य तथा सुखकी कामना करता हो, उसे सभी कामनाएँ प्रदान करने-वाली ' कल्याणी ' नामक कन्याका नित्य पूजन करना चाहिये ॥ ४७ ॥
शत्रुओंका नाश करनेके लिये भक्तिपूर्वक ' कालिका ' कन्याका पूजन करना चाहिये । धन तथा ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखनेवालेको‘चण्डिका ’ कन्याकी सम्यक् अर्चना करनी चाहिये ॥ ४८ ॥
हे राजन्! सम्मोहन, दुःख - दारिद्र्यके नाश तथा संग्राममें विजयके लिये ' शाम्भवी ' कन्याकी नित्य पूजा करनी चाहिये ॥ ४ ९ ॥ क्रूर शत्रुके विनाश एवं उग्र कर्मकी साधनाके निमित्त और परलोकमें सुख पानेके लिये ' दुर्गा ' नामक कन्याकी भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिये ॥५० ॥
मनुष्य अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये ' सुभद्रा ' की सदा पूजा करे और रोगनाशके निमित्त ' रोहिणी ' की विधिवत् आराधना करे ॥ ५१ ॥
' श्रीरस्तु ' इस मन्त्रसे अथवा किन्हीं भी श्रीयुक्त देवीमन्त्रसे अथवा बीजमन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवतीकी पूजा करनी चाहिये ॥ ५२ ॥
जो भगवती कुमारके रहस्यमय तत्त्वों और ब्रह्मादि देवताओंकी भी लीलापूर्वक रचना करती हैं, उन ' कुमारी ' का मैं पूजन करता हूँ ॥ ५३ ॥
जो सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे तीन रूप धारण करती हैं, जिनके अनेक रूप हैं तथा जो तीनों कालोंमें सर्वत्र व्याप्त रहती हैं, उन भगवती ' त्रिमूर्ति ' की मैं पूजा करता हूँ ॥ ५४ ॥
निरन्तर पूजित होनेपर जो भक्तोंका नित्य कल्याण करती हैं, सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उन भगवती ‘ कल्याणी ' का मैं भक्तिपूर्वक पूजन | करता हूँ ॥ ५५ ॥
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३८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २७
रोहयन्ती च बीजानि प्राग्जन्मसञ्चितानि वै ।
या देवी सर्वभूतानां रोहिणीं पूजयाम्यहम् ॥
काली कालयते सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम् ।
कल्पान्तसमये या तां कालिकां पूजयाम्यहम् ॥
चण्डिकां चण्डरूपाञ्च चण्डमुण्डविनाशिनीम् । तां चण्डपापहरिणीं चण्डिकां पूजयाम्यहम् ।
अकारणात्समुत्पत्तिर्यन्मयैः परिकीर्तिता ।
यस्यास्तां सुखदां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम् ॥
दुर्गायति भक्तं या सदा दुर्गार्तिनाशिनी ।
दुर्ज्ञेया सर्वदेवानां तां दुर्गां पूजयाम्यहम् ॥
सुभद्राणि च भक्तानां कुरुते पूजिता सदा ।
अभद्रनाशिनीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम् ॥
एभिर्मन्त्रैः पूजनीयाः कन्यकाः सर्वदा बुधैः ।
वस्त्रालङ्करणैर्माल्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ॥
जो देवी सम्पूर्ण जीवोंके पूर्वजन्मके संचित ५६ कर्मरूपी बीजोंका रोपण करती हैं, उन भगवती रोहिणीकी मैं उपासना करता हूँ ॥५६ ॥
जो देवी काली कल्पान्तमें चराचरसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपनेमें विलीन कर लेती हैं, उन भगवती ५७ ‘ कालिका ' की मैं पूजा करता हूँ ॥ ५७ ॥
अत्यन्त उग्र स्वभाववाली, उग्ररूप धारण करनेवाली, चण्ड - मुण्डका संहार करनेवाली तथा ५८ घोर पापोंका नाश करनेवाली उन भगवती ‘ चण्डिका ' की मैं पूजा करता हूँ ॥ ५८ ॥
वेद जिनके स्वरूप हैं, उन्हीं वेदोंके द्वारा जिनकी उत्पत्ति अकारण बतायी गयी है, उन सुखदायिनी ५ ९ भगवती ' शाम्भवी ' का मैं पूजन करता हूँ ॥ ५ ९ ॥ जो अपने भक्तको सर्वदा बड़े - बड़े विघ्नों तथा दुःखोंका ६० | सभी देवताओंके लिये दुर्ज्ञेय हैं, की मैं पूजा करता हूँ ॥ ६० ॥
जो पूजित होनेपर भक्तोंका हैं, उन अमंगलनाशिनी भगवती ' ६१ करता हूँ ॥६१ ॥
संकटसे बचाती हैं, नाश करती हैं और उन भगवती ' दुर्गा ' सदा कल्याण करती सुभद्रा ' की मैं पूजा विद्वानोंको चाहिये कि वस्त्र, भूषण, माला, गन्ध आदि श्रेष्ठ उपचारोंसे इन मन्त्रोंके द्वारा सर्वदा ६२ । कन्याओंका पूजन करें ॥ ६२ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कुमारीपूजावर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः कुमारीपूजामें निषिद्ध कन्याओंका वर्णन, नवरात्रव्रतके माहात्म्यके प्रसंगमें सुशील व्यास उवाच
हीनाङ्गीं वर्जयेत्कन्यां कुष्ठयुक्तां व्रणाङ्किताम् ।
गन्धस्फुरितहीनाङ्गीं विशालकुलसम्भवाम् ॥
जात्यन्धां केकरां कार्णी कुरूपां बहुरोमशाम् ।
सन्त्यजेद्रोगिणीं कन्यां रक्तपुष्पादिनाङ्किताम् ॥
नामक वणिक्की कथा व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] जो कन्या किसी अंगसे हीन हो, कोढ़ तथा घावयुक्त हो, जिसके १ शरीरके किसी अंगसे दुर्गन्ध आती हो और जो विशाल कुलमें उत्पन्न हुई हो --ऐसी कन्याका पूजामें परित्याग कर देना चाहिये ॥ १ ॥
जन्मसे अन्धी, तिरछी नजरसे देखनेवाली, कानी, कुरूप, बहुत रोमवाली, रोगी तथा रजस्वला कन्याका २ । पूजामें परित्याग कर देना चाहिये ॥२ ॥
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अ ० २७ ]
क्षामां गर्भसमुद्भूतां गोलकां कन्यकोद्भवाम् ।
वर्जनीयाः सदा चैताः सर्वपूजादिकर्मसु ॥
अरोगिणीं सुरूपाङ्गीं सुन्दरीं व्रणवर्जिताम् ।
एकवंशसमुद्भूतां कन्यां सम्यक्प्रपूजयेत् ॥
ब्राह्मणी सर्वकार्येषु जयार्थे नृपवंशजा ।
लाभार्थे वैश्यवंशोत्था मता वा शूद्रवंशजा ॥
ब्राह्मणैर्ब्रह्मजाः पूज्या राजन्यैर्ब्रह्मवंशजाः ।
वैश्यैस्त्रिवर्गजाः पूज्याश्चतस्रः पादसम्भवैः ॥
कारुभिश्चैव वंशोत्था यथायोग्यं प्रपूजयेत् ।
नवरात्रविधानेन भक्तिपूर्वं सदैव हि ॥
अशक्तो नियतं पूजां कर्तुं चेन्नवरात्रके ।
अष्टम्यां च विशेषेण कर्तव्यं पूजनं सदा ॥
पुराष्टम्यां भद्रकाली दक्षयज्ञविनाशिनी ।
प्रादुर्भूता महाघोरा योगिनीकोटिभिः सह ॥
अतोऽष्टम्यां विशेषेण कर्तव्यं पूजनं सदा ।
नानाविधोपहारैश्च गन्धमाल्यानुलेपनैः ॥
पायसैरामिषैर्होमैर्ब्राह्मणानां च भोजनैः ।
फलपुष्पोपहारैश्च तोषयेज्जगदम्बिकाम् ॥
उपवासे ह्यशक्तानां नवरात्रव्रते पुनः ।
उपोषणत्रयं प्रोक्तं यथोक्तफलदं नृप ॥
सप्तम्यां च तथाष्टम्यां नवम्यां भक्तिभावतः ।
त्रिरात्रकरणात्सर्वं फलं भवति पूजनात् ॥
पूजाभिश्चैव होमैश्च कुमारीपूजनैस्तथा । सम्पूर्णं तद् व्रतं प्रोक्तं विप्राणां चैव भोजनैः तृतीय स्कन्ध ३८१ अत्यन्त दुर्बल, समयसे पूर्व ही गर्भसे उत्पन्न, ३ विधवा स्त्रीसे उत्पन्न तथा कन्यासे उत्पन्न — ये सभी कन्याएँ पूजा आदि सभी कार्योंमें सर्वथा त्याज्य हैं ॥ ३ ॥
रोगसे रहित, रूपवान् अंगोंवाली, सौन्दर्यमयी, ४ व्रणरहित तथा एक वंशमें ( अपने माता - पितासे ) उत्पन्न कन्याकी ही विधिवत् पूजा करनी चाहिये ॥४ ॥
समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणकी कन्या, विजय- प्राप्ति के लिये राजवंशमें उत्पन्न कन्या तथा ५ धन - लाभके लिये वैश्यवंश अथवा शूद्रवंशमें उत्पन्न कन्या पूजनके योग्य मानी गयी है ॥ ५ ॥
ब्राह्मणको ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न कन्याकी; क्षत्रियोंको ६ भी ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न कन्याकी; वैश्योंको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य - तीनों वर्णोंमें उत्पन्न कन्याकी तथा शूद्रको चारों वर्णोंमें उत्पन्न कन्याकी पूजा करनी ७ चाहिये । शिल्पकर्ममें लगे हुए मनुष्योंको यथायोग्य अपने - अपने वंशमें उत्पन्न कन्याओंकी पूजा करनी चाहिये । नवरात्र - विधिसे भक्तिपूर्वक निरन्तर पूजाकी ८ जानी चाहिये । यदि कोई व्यक्ति नवरात्रपर्यन्त प्रतिदिन पूजा करनेमें असमर्थ है, तो उसे अष्टमी तिथिको विशेषरूपसे अवश्य पूजन करना चाहिये ॥ ६–८ ॥ ९ प्राचीन कालमें दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाली महाभयानक भगवती भद्रकाली करोड़ों योगिनियोंसहित अष्टमी तिथिको ही प्रकट हुई थीं ॥ ९ ॥
१० अतः अष्टमीको विशेष विधानसे सदा भगवतीकी पूजा करनी चाहिये । उस दिन विविध प्रकारके उपहारों, गन्ध, माला, चन्दनके अनुलेप, पायस आदिके हवन, ब्राह्मण - भोजन तथा फल - पुष्पादि उपहारोंसे भगवतीको ११ प्रसन्न करना चाहिये॥१०-११ ॥ हे राजन्! पूरे नवरात्रभर उपवास करनेमें असमर्थ लोगोंके लिये तीन दिनका उपवास भी यथोक्त फल १२ प्रदान करनेवाला बताया गया है ॥ १२ ॥
भक्तिभावसे केवल सप्तमी, अष्टमी और नवमी — इन तीन रात्रियोंमें देवीकी पूजा करनेसे सभी १३ फल सुलभ हो जाते हैं ॥ १३ ॥
पूजन, हवन, कुमारी - पूजन तथा ब्राह्मण - भोजन— इनको सम्पन्न करनेसे वह नवरात्र व्रत पूरा हो जाता ॥ १४ । है - ऐसा कहा गया है ॥१४ ॥