देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 411–420
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420
पृष्ठ 411
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४०२ कृत्वान्तं क्षत्रियाणां तु दानं भूमेरदाद् द्विजे तथेदानीं तु काकुत्स्थ जातो दशरथात्मजः प्रार्थितस्तु सुरैः सर्वै रावणेनातिपीडितैः कपयस्ते सहाया वै देवांशा बलवत्तराः भविष्यन्ति नरव्याघ्र मच्छक्तिसंयुता ह्यमी । शेषांशोऽप्यनुजस्तेऽयं रावणात्मजनाशकः
भविष्यति न सन्देहः कर्तव्योऽत्र त्वयानघ ।
वसन्ते सेवनं कार्यं त्वया तत्रातिश्रद्धया ॥
हत्वाथ रावणं पापं कुरु राज्यं यथासुखम् ।
एकादशसहस्त्राणि वर्षाणि पृथिवीतले ॥
कृत्वा राज्यं रघुश्रेष्ठ गन्तासि त्रिदिवं पुनः । व्यास उवाच इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी रामस्तु प्रीतमानसः ॥
समाप्य तद् व्रतं चक्रे प्रयाणं दशमीदिने ।
विजयापूजनं कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥
कपिपतिबलयुक्तः सानुजः श्रीपतिश्च
प्रकटपरमशक्त्या प्रेरितः पूर्णकामः ।
उदधितटगतोऽसौ सेतुबन्धं विधाया-प्यहनदमरशत्रुं रावणं गीतकीर्तिः ॥
यः शृणोति नरो भक्त्या देव्याश्चरितमुत्तमम् ।
स भुक्त्वा विपुलान्भोगान्प्राप्नोति परमं पदम् ॥
सन्त्यन्यानि पुराणानि विस्तराणि बहूनि च ।
श्रीमद्भागवतस्यास्य न तुल्यानीति मे मतिः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३० । पुत्र परशुरामके रूपमें अवतरित होकर क्षत्रियोंका ॥ ५४ अन्त करके आपने सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दे दी थी । उसी प्रकार हे काकुत्स्थ! रावणके द्वारा अत्यधिक । सताये गये सभी देवताओंके प्रार्थना करनेपर इस ॥ ५५ समय आप ही दशरथपुत्र श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४६–५४३ ॥ हे नरोत्तम! देवताओंके अंशसे उत्पन्न ये परम ॥ ५६ बलशाली वानर मेरी शक्तिसे सम्पन्न होकर आपके सहायक होंगे । शेषनागके अंशस्वरूप आपके ये अनुज लक्ष्मण रावणके पुत्र मेघनादका वध करनेवाले होंगे । हे अनघ! इस विषयमें आपको सन्देह नहीं ५७ करना चाहिये॥५५-५६३ ॥ वसन्त ऋतुके नवरात्र में आप परम श्रद्धा साथ [ पुन: ] मेरी पूजा कीजिये । तत्पश्चात् पापी ५८ रावणका वध करके आप सुखपूर्वक राज्य कीजिये । हे रघुश्रेष्ठ! इस प्रकार ग्यारह हजार वर्षोंतक भूतलपर राज्य करके पुनः आप देवलोकके लिये प्रस्थान करेंगे ॥ ५७-५८३ ॥ ५ ९ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर भगवती दुर्गा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न मनसे उस व्रतका समापन करके दशमी तिथिको ६० | विजयापूजन करके तथा अनेकविध दान देकर वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ५ ९ -६० ॥ वानरराज सुग्रीवकी सेनाके साथ अपने अनुज-सहित विख्यात यशवाले तथा पूर्णकाम लक्ष्मीपति श्रीराम साक्षात् परमा शक्तिकी प्रेरणासे समुद्रतटपर पहुँचे । वहाँ सेतु - बन्धन करके उन्होंने देवशत्रु रावणका ६१ संहार किया ॥ ६१ ॥
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक देवीके उत्तम चरित्रका श्रवण करता है, वह अनेक सुखोंका उपभोग करके ६२ । परमपद प्राप्त कर लेता है ॥६२ ॥
यद्यपि अन्य बहुतसे विस्तृत पुराण हैं, किंतु वे इस श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणके तुल्य नहीं हैं, ऐसी ६३ । मेरी धारणा है ॥ ६३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे रामाय देवीवरदानं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
॥ तृतीयः स्कन्धः समाप्तः ॥
पृष्ठ 412
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण चतुर्थः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः वसुदेव, देवकी आदिके कष्टोंके कारणके सम्बन्धमें जनमेजयका प्रश्न जनमेजय उवाच
वासवेय मुनिश्रेष्ठ सर्वज्ञाननिधेऽनघ ।
प्रष्टुमिच्छाम्यहं स्वामिन्नस्माकं कुलवर्धन ॥ १
शूरसेनसुतः श्रीमान्वसुदेवः प्रतापवान् ।
श्रुतं मया हरिर्यस्य पुत्रभावमवाप्तवान् ॥ २
देवानामपि पूज्योऽभून्नाम्ना चानकदुन्दुभिः ।
कारागारे कथं बद्धः कंसस्य धर्मतत्परः ॥ ३
देवक्या भार्यया सार्धं किमागः कृतवानसौ ।
देवक्या बालषट्कस्य विनाशश्च कृतः पुनः ॥ ४
तेन कंसेन कस्माद्वै ययातिकुलजेन च ।
कारागारे कथं जन्म वासुदेवस्य वै हरेः ॥ ५
गोकुले च कथं नीतो भगवान्सात्वतां पतिः ।
गतो जन्मान्तरं कस्मात्पितरौ निगडे स्थितौ ॥ ६
देवकी वसुदेवौ च कृष्णस्यामिततेजसः ।
कथं न मोचितौ वृद्धौ पितरौ हरिणामुना ॥ ७
जगत्कर्तुं समर्थेन स्थितेन जनकोदरे ॥
प्राक्तनं किं तयोः कर्म दुर्विज्ञेयं महात्मभिः ॥ ८
जन्म वै वासुदेवस्य यत्रासीत्परमात्मनः ।
के ते पुत्राश्च का बाला या कंसेन विपोथिता ॥ ९
शिलायां निर्गता व्योम्नि जाता त्वष्टभुजा पुनः । जनमेजय बोले – हे वासवेय! हे मुनिवर! हे सर्वज्ञाननिधे! हे अनघ! हमारे कुलकी वृद्धि करनेवाले हे स्वामिन्! मैं [ श्रीकृष्णके विषयमें ] पूछना चाहता हूँ ॥१ ॥
मैंने सुना है कि परम प्रतापी श्रीमान् वसुदेव राजा शूरसेनके पुत्र थे, जिनके पुत्ररूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु अवतरित हुए थे ॥ २ ॥
आनकदुन्दुभि नामसे विख्यात वे वसुदेव देवताओंके भी पूज्य थे । धर्मपरायण होते हुए भी वे कंसके कारागारमें क्यों बन्द हुए? उन्होंने अपनी भार्या देवकीसहित ऐसा क्या अपराध किया था, जिससे ययातिके कुलमें उत्पन्न कंसके द्वारा देवकीके छः पुत्रोंका वध कर दिया गया? ॥ ३-४३ ॥ साक्षात् भगवान् विष्णुने वसुदेवके पुत्ररूपमें कारागारमें जन्म क्यों ग्रहण किया? देवताओंके अधिपति भगवान् श्रीकृष्ण गोकुलमें किस प्रकार ले जाये गये और वे भगवान् होते हुए भी जन्मान्तरको क्यों प्राप्त हुए? अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके माता-पिता वसुदेव और देवकीको बन्धनमें क्यों आना पड़ा? जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ उन भगवान् श्रीकृष्णने माता देवकीके गर्भमें स्थित रहते हुए ही | अपने वृद्ध माता - पिताको बन्धनसे मुक्त क्यों नहीं कर दिया? उन वसुदेव तथा देवकीने महात्माओंद्वारा भी दुःसाध्य ऐसे कौन - से कर्म पूर्वजन्ममें किये थे, जिससे उनके यहाँ परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णका जन्म हुआ? वे छः पुत्र कौन थे, वह कन्या कौन थी, जिसे कंसने पत्थरपर पटक दिया था और वह हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी तथा पुनः अष्टभुजाके रूपमें प्रकट हुई? ॥५ – ९ ३ ॥
पृष्ठ 413
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४०४ गार्हस्थ्यञ्च हरेब्रूहि बहुभार्यस्य चानघ
कार्याणि तत्र तान्येव देहत्यागं च तस्य वै ।
किंवदन्त्या श्रुतं यत्तन्मनो मोहयतीव मे ॥
चरितं वासुदेवस्य त्वमाख्याहि यथातथम् ।
नरनारायणौ देव पुराणावृषिसत्तमौ ॥
धर्मपुत्रौ महात्मानौ तपश्चेरतुरुत्तमम् ।
यौ मुनी बहुवर्षाणि पुण्ये बदरिकाश्रमे ॥
निराहारौ जितात्मानौ निःस्पृहौ जितषड्गुणौ ।
विष्णोरंशौ जगत्स्थेम्ने तपश्चेरतुरुत्तमम् ॥
तयोरंशावतारौ हि जिष्णुकृष्णौ महाबलौ ।
प्रसिद्धौ मुनिभिः प्रोक्तौ सर्वज्ञैर्नारदादिभिः ॥
विद्यमानशरीरौ तौ कथं देहान्तरं गतौ ।
नरनारायणौ देवौ पुनः कृष्णार्जुनौ कथम् ॥
यौ चक्रतुस्तपश्चग्रं मुक्त्यर्थं मुनिसत्तमौ ।
तौ कथं प्रापतुर्देहौ प्राप्तयोगौ महातपौ ॥
शूद्रः स्वधर्मनिष्ठस्तु देहान्ते क्षत्रियस्तु सः ।
शुभाचारो मृतो यो वै स शूद्रो ब्राह्मणो भवेत् ॥
ब्राह्मणो निःस्पृहः शान्तो भवरोगाद्विमुच्यते ।
विपरीतमिदं भाति नरनारायणौ च तौ ॥
तपसा शोषितात्मानौ क्षत्रियौ तौ बभूवतुः ।
केन तौ कर्मणा शान्तौ जातौ शापेन वा पुनः ॥
ब्राह्मणौ क्षत्रियौ जातौ कारणं तन्मुने वद ।
यादवानां विनाशश्च ब्रह्मशापादिति श्रुतः ॥
कृष्णस्यापि हि गान्धार्याः शापेनैव कुलक्षयः ।
प्रद्युम्नहरणं चैव शम्बरेण कथं कृतम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ॥ १० हे अनघ! बहुत - सी पत्नियोंवाले श्रीकृष्णके गृहस्थ- जीवन, उसमें उनके द्वारा किये गये कार्यों तथा अन्तमें उनके शरीर त्यागके विषयमें बताइये । ११ किंवदन्तीके आधारपर मैंने भगवान् श्रीकृष्णका जो चरित्र सुना है, उससे मेरा मन परम विस्मयमें पड़ गया है | अतः आप उनके चरित्रका सम्यक् रूपसे वर्णन १२ | कीजिये ॥ १०-११३ ॥ पुरातन, धर्मपुत्र, महात्मा तथा देवस्वरूप ऋषिश्रेष्ठ नर - नारायणने उत्तम तप किया था । जगत्के कल्याणार्थ १३ निराहार, जितेन्द्रिय तथा स्पृहारहित रहते हुए काम-क्रोध - लोभ - मोह - मद- मात्सर्य - इन छहोंपर पूर्ण नियन्त्रण रखकर साक्षात् भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप जिन १४ नर - नारायण मुनियोंने पुण्यक्षेत्र बदरिकाश्रममें बहुत वर्षोंतक श्रेष्ठ तपस्या की थी, नारद आदि सर्वज्ञ मुनियोंने प्रसिद्ध तथा महाबलसम्पन्न अर्जुन तथा १५ श्रीकृष्णको उन्हीं दोनोंका अंशावतार बताया है । उन भगवान् नर - नारायणने एक शरीर धारण करते हुए भी दूसरा जन्म क्यों प्राप्त किया और पुनः वे कृष्ण तथा १६ अर्जुन कैसे हुए? ॥ १२–१६ ॥ जिन मुनिप्रवर नर - नारायणने मुक्तिहेतु कठोर १७ तपस्या की थी; उन महातपस्वी तथा योगसिद्धिसम्पन्न दोनों देवोंने मानव शरीर क्यों प्राप्त किया? ॥१७ ॥
अपने धर्ममें निष्ठा रखनेवाला शूद्र अगले १८ जन्ममें क्षत्रिय होता है और जो शूद्र वर्तमान जन्ममें पवित्र आचरण करता है, वह मृत्युके अनन्तर ब्राह्मण होता है । कामनाओंसे रहित शान्त - स्वभाव ब्राह्मण १ ९ पुनर्जन्मरूपी रोगसे मुक्त हो जाता है, किंतु उनके विषयमें तो सर्वथा विपरीत स्थिति दिखायी देती है । उन नर - नारायणने तपस्यासे अपना शरीरतक सुखा २० दिया, फिर भी वे ब्राह्मणसे क्षत्रिय हो गये । शान्त-स्वभाव वे दोनों अपने किस कर्मसे अथवा किस शापसे ब्राह्मणसे क्षत्रिय हुए? हे मुने! वह कारण २१ | बताइये ॥ १८ - २०३ ॥ मैंने यह भी सुना है कि यादवोंका विनाश ब्राह्मणके शापसे हुआ था और गान्धारीके शापसे ही २२ श्रीकृष्णके वंशका विनाश हुआ था । शम्बरासुरने
पृष्ठ 414
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १ ] वर्तमाने वासुदेवे देवदेवे जनार्दने पुत्रस्य सूतिकागेहाद्धरणं चातिदुर्घटम् ॥ द्वारका दुर्गमध्याद्वै हरिवेश्माद्दुरत्ययात् न ज्ञातं वासुदेवेन तत्कथं दिव्यचक्षुषा सन्देहोऽयं महान्ब्रह्मन्निःसन्देहं कुरु प्रभो यत्पल्यो वासुदेवस्य दस्युभिर्लुण्ठिता हृताः स्वर्गते देवदेवे तु तत्कथं मुनिसत्तम संशयो जायते ब्रह्मंश्चित्तान्दोलनकारकः विष्णोरंशः समुद्भूतः शौरिर्भूभारहारकृत् स कथं मथुराराज्यं भयात्त्यक्त्वा जनार्दनः द्वारवत्यां गतः साधो ससैन्यः ससुहृद्गणः अवतारो हरेः प्रोक्तो भूभारहरणाय वै पापात्मनां विनाशाय धर्मसंस्थापनाय च तत्कथं वासुदेवेन चौरास्ते न निपातिताः यैर्हृता वासुदेवस्य पल्यः संलुण्ठिताश्च ताः स्तेनास्ते किं न विज्ञाताः सर्वज्ञेन सता पुनः भीष्मद्रोणवधः कामं भूभारहरणे मतः अर्चिताश्च महात्मानः पाण्डवा धर्मतत्पराः कृष्णभक्ताः सदाचारा युधिष्ठिरपुरोगमाः ते कृत्वा राजसूयञ्च यज्ञराजं विधानतः दक्षिणा विविधा दत्त्वा ब्राह्मणेभ्योऽतिभावतः पाण्डुपुत्रास्तु देवांशा वासुदेवाश्रिता मुने घोरं दुःखं कथं प्राप्ताः क्व गतं सुकृतञ्च तत् किं तत्पापं महारौद्रं येन ते पीडिताः सदा चतुर्थ स्कन्ध ४०५ । कृष्ण - पुत्र प्रद्युम्नका अपहरण क्यों किया? देवाधिदेव २३ जनार्दन वासुदेवके रहते सूतिकागृहसे पुत्रका हरण हो जाना एक अत्यन्त अद्भुत बात है । द्वारकाके किलेमें श्रीकृष्णके दुर्गम राजमहलसे पुत्रका हरण हो गया; । किंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपनी दिव्य दृष्टिसे क्यों ॥ २४ । नहीं देख लिया? हे ब्रह्मन्! यह एक महान् शंका मेरे समक्ष उपस्थित है । हे प्रभो! आप मुझे सन्देह - मुक्त । कर दीजिये ॥ २१ - – २४३ ॥ ॥ २५ देवदेव श्रीकृष्णके स्वर्गगमनके अनन्तर उनकी पत्नियोंको लुटेरोंने लूट लिया; हे मुनिराज! वह कैसे । हुआ? हे ब्रह्मन्! मनको आन्दोलित कर देनेवाला यह ॥ २६ संदेह मुझे हो रहा है ॥ २५-२६ ॥ श्रीकृष्ण भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए । थे और उन्होंने पृथ्वीका भार उतारा था । हे साधो! ॥ २७ ऐसे वे जनार्दन जरासन्धके भयसे मथुराका राज्य छोड़कर अपनी सेना तथा बन्धु बान्धवोंके सहित । द्वारकापुरी क्यों चले गये? ऐसा कहा जाता है ॥२८ श्रीकृष्णका अवतार पृथ्वीको भारसे मुक्त करने, पापाचारियोंको विनष्ट करने तथा धर्मकी स्थापना । करनेके लिये हुआ था, फिर भी वासुदेवने उन ॥ २ ९ लुटेरोंको क्यों नहीं मार डाला, जिन लुटेरोंने श्रीकृष्णकी पत्नियोंको लूटा तथा उनका हरण किया? सर्वज्ञ । होते हुए भी श्रीकृष्ण उन चोरोंको क्यों नहीं जान ॥ ३० सके? ॥ २७–३० ॥ भीष्मपितामह तथा द्रोणाचार्यका वध पृथ्वीका । भार - हरणस्वरूप कार्य कैसे माना गया? युधिष्ठिर ॥ ३१ आदि सदाचारवान्, महात्मा, धर्मपरायण, पूज्य तथा श्रीकृष्ण - भक्त उन पाण्डवोंने यज्ञोंके राजा कहे । जानेवाले राजसूय - यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान करके ॥ ३२ उस यज्ञमें ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ दीं । हे मुने! वे पाण्डु पुत्र देवताओंके । अंशसे प्रादुर्भूत थे तथा श्रीकृष्णके आश्रित थे, फिर ॥ ३३ भी उन्हें इतने महान् कष्ट क्यों भोगने पड़े? उस समय उनके पुण्य कार्य कहाँ चले गये थे? उन्होंने । ऐसा कौन - सा महाभयानक पाप किया था, जिसके ॥ ३४ । कारण वे सदा कष्ट पाते रहे? ॥ ३१–३४ ॥
पृष्ठ 415
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४०६
द्रौपदी च महाभागा वेदीमध्यात्समुत्थिता ।
रमांशजा च साध्वी च कृष्णभक्तियुता तथा ॥
सा कथं दुःखमतुलं प्राप घोरं पुनः पुनः ।
दुःशासनेन सा केशे गृहीता पीडिता भृशम् ॥
रजस्वला सभायां तु नीता भीतैकवाससा । विराटनगरे दासी जाता मत्स्यस्य सा पुनः
धर्षिता कीचकेनाथ रुदती कुररी यथा ।
हृता जयद्रथेनाथ क्रन्दमानातिदुःखिता ॥
मोचिता पाण्डवैः पश्चाद् बलवद्भिर्महात्मभिः ।
पूर्वजन्मकृतं पापं किं तद्येन च पीडिताः ॥
दुःखान्यनेकान्याप्तास्ते कथयाद्य महामते ।
राजसूयं क्रतुवरं कृत्वा ते मम पूर्वजाः ॥
दुःखं महत्तरं प्राप्ताः पूर्वजन्मकृतेन वै ।
देवांशानां कथं तेषां संशयोऽयं महान्हि मे ॥
सदाचारैस्तु कौन्तेयैर्भीष्मद्रोणादयो हताः ।
छलेन धनलाभार्थं जानानैर्नश्वरं जगत् ॥
प्रेरिता वासुदेवेन पापे घोरे महात्मना ।
कुलं क्षयितवन्तस्ते हरिणा परमात्मना ॥
वरं भिक्षाटनं साधोर्नीवारैर्जीवनं वरम् ।
योधान्न हत्वा लोभेन शिल्पेन जीवनं वरम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ पुण्यात्मा द्रौपदी यज्ञकी वेदीके मध्यसे प्रकट ३५ हुई थी । वह लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थी, साध्वी थी तथा सदा श्रीकृष्णकी भक्तिमें लीन रहती थी । उस द्रौपदीने भी बार - बार महाभीषण संकट क्यों प्राप्त किया? दुःशासनके द्वारा उसे बाल पकड़कर घसीटा ३६ गया तथा अत्यधिक प्रताड़ित किया गया । केवल एक वस्त्र धारण की हुई वह भयाकुल द्रौपदी रजस्वलावस्थामें ही कौरवोंकी सभामें ले जायी गयी । पुनः उसे विराटनगरमें मत्स्यनरेशकी दासी ॥ ३७ बनना पड़ा । कीचकके द्वारा अपमानित होनेपर वह कुररी पक्षीकी भाँति बहुत रोयी थी । पुनः जयद्रथने उसका अपहरण कर लिया, जिसपर वह करुणक्रन्दन ३८ करती हुई अत्यधिक दुःखित हुई थी । बादमें बलवान् महात्मा पाण्डवोंने उसे मुक्त कराया था । क्या यह उन सबके पूर्वजन्ममें किये गये पापकृत्यका फल था, जो वे इतने पीड़ित हुए? ॥ ३५–३९ ॥ ३ ९ हे महामते! उन्हें नानाविध कष्ट प्राप्त हुए, मुझे इसका कारण बताइये । यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूययज्ञ करनेपर भी मेरे उन पूर्वजोंने महान् कष्ट प्राप्त किया 1 । लगता है पूर्वजन्ममें कृत कर्मोंका ही यह फल है । ४० देवताओंके अंश होनेपर भी उन्हें कष्ट प्राप्त हुआ; मुझे यह महान् सन्देह है! ॥ ४०-४१ ॥ महान् सदाचारपरायण पाण्डवोंने जगत्को ४१ नाशवान् जाननेके बावजूद भी धनके लोभसे छद्मका आश्रय लेकर भीष्मपितामह तथा द्रोणाचार्य आदिका संहार किया ॥ ४२ ॥
महात्मा वासुदेवने उन्हें इस घोर पापकृत्यके ४२ लिये प्रेरित किया और उन्हीं परमात्मा श्रीकृष्णके द्वारा प्रेरित किये जानेपर उन पाण्डवोंने अपने कुलका विनाश कर डाला ॥ ४३ ॥
४३ सज्जन पुरुषोंके लिये भिक्षा माँगकर अथवा नीवार आदि खाकर जीवन बिता लेना श्रेयस्कर होता है । लोभके वशीभूत होकर वीर पुरुषोंका वध न करके शिल्पकार्य आदिके माध्यमसे जीवन - यापन ४४ । करना उत्तम होता है ॥ ४४ ॥
पृष्ठ 416
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २ ] चतुर्थ
विच्छिन्नस्तु त्वया वंशो रक्षितो मुनिसत्तम ।
समुत्पाद्य सुतानाशु गोलकाञ्छत्रुनाशनान् ॥ ४५
सोऽल्पेनैव तु कालेन विराटतनयासुतः ।
तापसस्य गले सर्पं न्यस्तवान्कथमद्भुतम् ॥ ४६
न कोऽपि ब्राह्मणं द्वेष्टि क्षत्रियस्य कुलोद्भवः ।
तापसं मौनसंयुक्तं पित्रा किं तत्कृतं मुने ॥ ४७
एतैरन्यैश्च सन्देहैर्विकलं मे मनोऽधुना ।
स्थिरं कुरु पितः साधो सर्वज्ञो ऽसि दयानिधे ॥ ४८
स्कन्ध ४०७ हे मुनिसत्तम! आपने वंशके समाप्त हो जानेपर शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ गोलक पुत्रोंको [ नियोगद्वारा ] उत्पन्न करके शीघ्र ही वंशकी रक्षा की थी ॥ ४५ ॥
कुछ ही समयके पश्चात् विराटपुत्री उत्तराके पुत्र महाराज परीक्षित्ने एक तपस्वीके गलेमें मृत सर्प डाल दिया । यह अद्भुत घटना कैसे घटित हो गयी? ॥ ४६ ॥
क्षत्रिय - कुलमें उत्पन्न कोई भी व्यक्ति ब्राह्मणसे द्वेष नहीं करता है । है मुने! मेरे पिताने मौनव्रत धारण किये हुए उन तपस्वीके साथ ऐसा क्यों किया? ॥ ४७ ॥।
इन तथा अन्य कई प्रकारकी शंकाओंसे मेरा मन इस समय आकुलित हो रहा है । हे तात! हे साधो! हे दयानिधे! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव [ सन्देहोंको । दूर करके ] मेरे मनको शान्त कीजिये ॥ ४८ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे जनमेजयप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
III O अथ द्वितीयोऽध्यायः व्यासजीका जनमेजयको सूत उवाच
एवं पृष्टः पुराणज्ञो व्यासः सत्यवतीसुतः ।
परीक्षितसुतं शान्तं ततो वै जनमेजयम् ॥ १
उवाच संशयच्छेत्तृ वाक्यं वाक्यविशारदः । व्यास उवाच राजन् किमेतद्वक्तव्यं कर्मणां गहना गतिः ॥ २
दुर्ज्ञेया किल देवानां मानवानां च का कथा ।
यदा समुत्थितं चैतद् ब्रह्माण्डं त्रिगुणात्मकम् ॥ ३
कर्मणैव समुत्पत्तिः सर्वेषां नात्र संशयः ।
अनादिनिधना जीवाः कर्मबीजसमुद्भवाः ॥ ४
नानायोनिषु जायन्ते म्रियन्ते च पुनः पुनः ।
कर्मणा रहितो देहसंयोगो न कदाचन ॥ ५
कर्मकी प्रधानता समझाना सूतजी बोले - हे मुनियो! ऐसा पूछे जानेपर पुराणवेत्ता, वाणीविशारद सत्यवती - पुत्र महर्षि व्यासने शान्त स्वभाववाले परीक्षित् - पुत्र जनमेजयसे उनके सन्देहोंको दूर करनेवाले वचन कहे – ॥ १३ ॥
व्यासजी बोले – हे राजन्! इस विषयमें क्या कहा जाय । कर्मोंकी बड़ी गहन गति होती है । कर्मकी गति जाननेमें देवता भी समर्थ नहीं हैं, मानवोंकी क्या बात! जब इस त्रिगुणात्मक ब्रह्माण्डका आविर्भाव हुआ, उसी समयसे कर्मके द्वारा सभीकी उत्पत्ति होती आ रही है, इस विषयमें सन्देह नहीं है । आदि तथा अन्तसे रहित होते हुए भी समस्त जीव कर्मरूपी बीजसे उत्पन्न होते हैं वे जीव नानाविध योनियोंमें बार - बार पैदा होते हैं और मरते हैं । कर्मसे रहित जीवका देह - संयोग कदापि सम्भव नहीं है ॥२-५ ॥
पृष्ठ 417
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४०८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ शुभाशुभैस्तथा मिश्रैः कर्मभिर्वेष्टितं त्विदम् । त्रिविधानि हि तान्याहुर्बुधास्तत्त्वविदश्च ये ।
सञ्चितानि भविष्यन्ति प्रारब्धानि तथा पुनः ।
वर्तमानानि देहेऽस्मिंस्त्रैविध्यं कर्मणां किल ॥
ब्रह्मादीनां च सर्वेषां तद्वशत्वं नराधिप ।
सुखं दुःखं जरामृत्युहर्षशोकादयस्तथा ॥
कामक्रोधौ च लोभश्च सर्वे देहगता गुणाः ।
दैवाधीनाश्च सर्वेषां प्रभवन्ति नराधिप ॥
रागद्वेषादयो भावाः स्वर्गेऽपि प्रभवन्ति हि ।
देवानां मानवानाञ्च तिरश्चां च तथा पुनः ॥
विकाराः सर्व एवैते देहेन सह सङ्गताः ।
पूर्ववैरानुयोगेन स्नेहयोगेन वै पुनः ॥
उत्पत्तिः सर्वजन्तूनां विना कर्म न विद्यते ।
कर्मणा भ्रमते सूर्यः शशाङ्कः क्षयरोगवान् ॥
कपाली च तथा रुद्रः कर्मणैव न संशयः ।
अनादिनिधनं चैतत्कारणं कर्म विद्यते ॥
तेनेह शाश्वतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
नित्यानित्यविचारेऽत्र निमग्ना मुनयः सदा ॥
न जानन्ति किमेतद्वै नित्यं वानित्यमेव च ।
मायायां विद्यमानायां जगन्नित्यं प्रतीयते ॥
कार्याभावः कथं वाच्यः कारणे सति सर्वथा ।
माया नित्या कारणञ्च सर्वेषां सर्वदा किल ॥
कर्मबीजं ततोऽनित्यं चिन्तनीयं सदा बुधैः ।
भ्रमत्येव जगत्सर्वं राजन्कर्मनियन्त्रितम् ॥
शुभ, अशुभ तथा मिश्र - इन कर्मोंसे यह जगत् ६ सदा व्याप्त रहता है । तत्त्वोंके ज्ञाता जो विद्वान् हैं; उन्होंने संचित, प्रारब्ध तथा वर्तमान - — ये तीन प्रकारके कर्म बताये हैं । कर्मोंका त्रैविध्य इस शरीरमें अवश्य विद्यमान रहता है ॥ ६-७ ॥ ७ हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी उस कर्मके वशवर्ती होते हैं । सुख, दुःख, वृद्धावस्था, मृत्यु, हर्ष, शोक, काम, क्रोध, लोभ आदि - ये सभी ८ देहगत गुण हैं । हे राजेन्द्र! ये दैवके अधीन होकर सभी जीवोंको प्राप्त होते हैं ॥ ८ - ९ ॥ राग, द्वेष आदि भाव स्वर्गमें भी होते हैं और ९ इस प्रकार ये भाव देवताओं, मनुष्यों तथा पशु– पक्षियोंमें भी विद्यमान रहते हैं ॥ १० ॥
पूर्वजन्मके किये हुए वैर तथा स्नेहके कारण १० ये समस्त विकार शरीरके साथ सदा ही संलग्न रहते हैं ॥११ ॥
समस्त जीवोंकी उत्पत्ति कर्मके बिना हो ही ११ नहीं सकती है । कर्मसे ही सूर्य नियमित रूपसे परिभ्रमण करता है और चन्द्रमा क्षयरोगसे ग्रस्त रहता है ॥ १२ ॥
१२ अपने कर्मके प्रभावसे ही रुद्रको मुण्डोंकी माला
धारण करनी पड़ती है; इसमें कोई सन्देह नहीं है ।
आदि - अन्तरहित यह कर्म ही जगत्का कारण है ॥ १३ ॥
१३ स्थावर - जंगमात्मक यह समग्र शाश्वत विश्व उसी कर्मके प्रभावसे नियन्त्रित है । सभी मुनिगण इस कर्ममय जगत्की नित्यता तथा अनित्यताके विचारमें सदा डूबे रहते हैं । फिर भी वे नहीं जान पाते कि यह १४ जगत् नित्य है अथवा अनित्य । जबतक माया विद्यमान रहती है, तबतक यह जगत् नित्य प्रतीत होता है ॥ १४-१५ ॥ १५ कारणकी सर्वथा सत्ता रहनेपर कार्यका अभाव कैसे कहा जा सकता है? माया नित्य है और वही सर्वदा सबका कारण है ॥ १६ ॥
१६ अतएव कर्मबीजकी अनित्यतापर बुद्धिमान् पुरुषोंको सदा चिन्तन करना चाहिये । हे राजन्! सम्पूर्ण जगत् कर्मके द्वारा नियन्त्रित होकर सदा १७ । परिवर्तित होता रहता है ॥१७ ॥
पृष्ठ 418
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २ ]
नानायोनिषु राजेन्द्र नानाधर्ममयेषु च ।
इच्छया च भवेज्जन्म विष्णोरमिततेजसः ॥
युगे युगेष्वनेकासु नीचयोनिषु तत्कथम् ।
त्यक्त्वा वैकुण्ठसंवासं सुखभोगाननेकशः ॥
विण्मूत्रमन्दिरे वासं संत्रस्तः कोऽभिवाञ्छति ।
पुष्पावचयलीलां च जलकेलिं सुखासनम् ॥
त्यक्त्वा गर्भगृहे वासं कोऽभिवाञ्छति बुद्धिमान् ।
तूलिकां मृदुसंयुक्तां दिव्यां शय्यां विनिर्मिताम् ॥
त्यक्त्वाधोमुखवासं च कोऽभिवाञ्छति पण्डितः ।
गीतं नृत्यञ्च वाद्यञ्च नानाभावसमन्वितम् ॥
मुक्त्वा को नरके वासं मनसापि विचिन्तयेत् ।
सिन्धुजाद्भुतभावानां रसं त्यक्त्वा सुदुस्त्यजम् ॥
विण्मूत्ररसपानञ्च क इच्छेन्मतिमान्नरः ।
गर्भवासात्परो नास्ति नरको भुवनत्रये ॥
तद्भीताश्च प्रकुर्वन्ति मुनयो दुस्तरं तपः ।
हित्वा भोगञ्च राज्यञ्च वने यान्ति मनस्विनः ॥
यद्भीतास्तु विमूढात्मा कस्तं सेवितुमिच्छति । गर्भे तुदन्ति कृमयो जठराग्निस्तपत्यधः
वपासंवेष्टनं क्रूरं किं सुखं तत्र भूपते ।
वरं कारागृहे वासो बन्धनं निगडैर्वरम् ॥
अल्पमात्रं क्षणं नैव गर्भवासः क्वचिच्छुभः । गर्भवासे महद्दुःखं दशमासनिवासनम् चतुर्थ ४० ९ हे राजेन्द्र! यदि अमित तेजवाले भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे जन्म लेनेके लिये स्वतन्त्र होते तो वे १८ नानाविध योनियोंमें, नानाविध धर्म - कर्मानुरूप युगोंमें तथा अनेक प्रकारकी निम्न योनियोंमें जन्म क्यों लेते? अनेक प्रकारके सुखभोगों और वैकुण्ठपुरीका १ ९ निवास छोड़कर मल - मूत्रवाले स्थान ( उदर ) -में भयभीत होकर भला कौन रहना चाहेगा? फूल चुनने की क्रीड़ा, जल - विहार तथा सुखदायक आसनका परित्यागकर कौन बुद्धिमान् गर्भगृहमें वास करना २० चाहेगा? कोमल रूईसे निर्मित गद्दे तथा दिव्य शय्याको छोड़कर गर्भमें औंधे मुँह पड़े रहना भला कौन विद्वान् पुरुष पसन्द कर सकता है? अनेक २ ९ प्रकारके भावोंसे युक्त गीत, वाद्य तथा नृत्यका परित्याग करके गर्भरूपी नरकमें रहनेका मनमें विचारतक भला कौन कर सकता है? ऐसा कौन बुद्धिमान् व्यक्ति होगा जो लक्ष्मीके अद्भुत भावोंके अत्यन्त कठिनाईसे २२ त्याग करनेयोग्य रसको छोड़कर मल - मूत्रका रस पीनेकी इच्छा करेगा? अतएव तीनों लोकोंमें गर्भवाससे बढ़कर नरकस्वरूप अन्य कोई स्थल नहीं है । २३ गर्भवाससे भयभीत होकर मुनिलोग कठिन तपस्या करते हैं । बड़े - बड़े मनस्वी पुरुष जिस गर्भवाससे डरकर राज्य तथा सुखका परित्याग करके वनमें चले जाते हैं, ऐसा कौन मूर्ख होगा, जो उसके सेवनकी २४ | इच्छा करेगा? ॥ १८–२५३ ॥ गर्भमें कीड़े काटते हैं और नीचेसे जठराग्नि तपाती रहती है । हे राजन्! उस समय शरीरमें २५ अतिशय दुर्गन्धयुक्त मज्जा लगी रहती है; तो फिर वहाँ कौन- - सा सुख है? कारागारमें रहना और बेड़ियोंमें बँधे रहना अच्छा है, किंतु एक क्षणके अल्पांश कालतक भी गर्भमें रहना कदापि शुभ नहीं होता । ॥ २६ गर्भवासमें जीवको अत्यधिक पीड़ा होती है; वहाँ दस महीनेतक रहना पड़ता है । इसके अतिरिक्त अत्यन्त दारुण योनि - यन्त्रसे बाहर आनेमें महान् कष्ट प्राप्त २७ होता है । बाल्यावस्थामें भी अज्ञानता तथा न बोल पानेके कारण बहुत कष्ट मिलता है । परतन्त्र तथा अत्यन्त भयभीत बालक भूख तथा प्यासकी पीड़ाके कारण अशक्त रहता है । भूखे बालकको रोता ॥ २८ । हुआ देखकर माता [ रोनेका कारण जाननेके लिये ]
पृष्ठ 419
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २
तथा निःसरणे दुःखं योनियन्त्रेऽतिदारुणे ।
बालभावे तदा दुःखं मूकाज्ञभावसंयुतम् ॥
क्षुत्तृष्णावेदनाशक्तः परतन्त्रोऽतिकातरः ।
क्षुधिते रुदिते बाले माता चिन्तातुरा तदा ॥
भेषजं पातुमिच्छन्ती ज्ञात्वा व्याधिव्यथां दृढाम् ।
नानाविधानि दुःखानि बालभावे भवन्ति वै ॥
किं सुखं विबुधा दृष्ट्वा जन्म वाञ्छन्ति चेच्छया ।
संग्रामममरैः सार्धं सुखं त्यक्त्वा निरन्तरम् ॥
कर्तुमिच्छेच्च को मूढः श्रमदं सुखनाशनम् ।
सर्वथैव नृपश्रेष्ठ सर्वे ब्रह्मादयः सुराः ॥
कृतकर्मविपाकेन प्राप्नुवन्ति सुखासुखे ।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।
देहवद्भिर्नृभिर्देवैस्तिर्यग्भिश्च नृपोत्तम ॥
तपसा दानयज्ञैश्च मानवश्चेन्द्रतां व्रजेत् ।
क्षीणे पुण्येऽथ शक्रोऽपि पतत्येव न संशयः ॥
रामावतारयोगेन देवा वानरतां गताः ।
तथा कृष्णसहायार्थं देवा यादवतां गताः ॥
एवं युगे युगे विष्णुरवताराननेकशः ।
करोति धर्मरक्षार्थं ब्रह्मणा प्रेरितो भृशम् ॥
पुनः पुनर्हरेरेवं नानायोनिषु पार्थिव ।
अवतारा भवन्त्यन्ये रथचक्रवदद्भुताः ॥
दैत्यानां हननं कर्म कर्तव्यं हरिणा स्वयम् ।
अंशांशेन पृथिव्यां वै कृत्वा जन्म महात्मना ॥
तदहं संप्रवक्ष्यामि कृष्णजन्मकथां शुभाम् ।
स एव भगवान्विष्णुरवतीर्णो यदोः कुले ॥
कश्यपस्य मुनेरंशो वसुदेवः प्रतापवान् ।
गोवृत्तिरभवद्राजन् पूर्वशापानुभावतः ॥
कश्यपस्य च द्वे पल्यौ शापादत्र महीपते ।
अदितिः सुरसा चैवमासतुः पृथिवीपते ॥
चिन्ताग्रस्त हो उठती है और पुनः किसी बड़े २ ९ रोगजनित कष्टका अनुमान करके उसे दवा पिलानेकी इच्छा करने लगती है । इस प्रकार बाल्यावस्था में अनेक प्रकारके कष्ट होते हैं, तब विवेकी पुरुष किस ३० सुखको देखकर स्वयं जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं! ॥ २६–३१३ ॥ ३१ कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो देवताओंके साथ रहते हुए निरन्तर सुख - भोगका त्याग करके श्रमपूर्ण तथा सुखनाशक युद्ध करनेकी इच्छा रखेगा; हे ३२ नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मादि सभी देवता भी अपने किये कर्मोंके फलस्वरूप सुख - दुःख प्राप्त करते हैं । हे नृपोत्तम! सभी देहधारी जीव चाहे मनुष्य, देवता ३३ या पशु - पक्षी हों, अपने - अपने किये कर्मका शुभाशुभ फल पाते हैं ॥ ३२- – ३४ ॥ मनुष्य तप, यज्ञ तथा दानके द्वारा इन्द्रत्वको ३४ प्राप्त हो जाता है और पुण्य क्षीण होनेपर इन्द्र भी च्युत हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं ॥ ३५ ॥
रामावतार के समय देवता कर्मबन्धनके कारण ३५ वानर बने थे और कृष्णावतारमें भी कृष्णकी सहायताके लिये देवता यादव बने थे ॥३६ ॥
३६ इस प्रकार प्रत्येक युगमें धर्मकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णु ब्रह्माजीसे अत्यन्त प्रेरित होकर अनेक अवतार धारण करते हैं ॥ ३७ ॥
३७ हे राजन्! इस प्रकार रथचक्रकी भाँति विविध प्रकारकी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अद्भुत अवतार बार - बार होते रहते हैं ॥ ३८ ॥
३८ महात्मा भगवान् विष्णु अपने अंशांशसे पृथ्वीपर अवतार लेकर दैत्योंका वधरूपी कार्य सम्पन्न करते ३ ९ हैं । इसलिये अब मैं यहाँ श्रीकृष्णके जन्मकी पवित्र कथा कह रहा हूँ । वे साक्षात् भगवान् विष्णु ही यदुवंशमें अवतरित हुए थे ॥ ३ ९ -४० ॥ ४० हे राजन्! कश्यपमुनिके अंशसे प्रतापी वसुदेवजी उत्पन्न हुए थे, जो पूर्वजन्मके शापवश इस ४१ जन्ममें गोपालनका काम करते थे ॥ ४१ ॥
हे महाराज! हे पृथ्वीपते! उन्हीं कश्यपमुनिकी दो पत्नियाँ — अदिति और सुरसाने भी शापवश ४२ । पृथ्वीपर अवतार ग्रहण किया था । हे भरतश्रेष्ठ! उन
पृष्ठ 420
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २ ]
देवकी रोहिणी चोभे भगिन्यौ भरतर्षभ ।
वरुणेन महाञ्छापो दत्तः कोपादिति श्रुतम् ॥
राजोवाच
किं कृतं कश्यपेनागो येन शप्तो महानृषिः ।
सभार्यः स कथं जातस्तद्वदस्व महामते ॥
कथञ्च भगवान्विष्णुस्तत्र जातोऽस्ति गोकुले ।
वासी वैकुण्ठनिलये रमापतिरखण्डितः ॥
निदेशात्कस्य भगवान्वर्तते प्रभुरव्ययः ।
नारायणः सुरश्रेष्ठो युगादिः सर्वधारकः ॥
स कथं सदनं त्यक्त्वा कर्मवानिव मानुषे ।
करोति जननं कस्मादत्र मे संशयो महान् ॥
प्राप्य मानुषदेहं तु करोति च विडम्बनम् ।
भावान्नानाविधांस्तत्र मानुषे दुष्टजन्मनि ॥
कामः क्रोधोऽमर्षशोकौ वैरं प्रीतिश्च कर्हिचित् ।
सुखं दुःखं भयं नॄणां दैन्यमार्जवमेव च ॥
दुष्कृतं सुकृतं चैव वचनं हननं तथा ।
पोषणं चलनं तापो विमर्शश्च विकत्थनम् ॥
लोभो दम्भस्तथा मोहः कपटः शोचनं तथा ।
एते चान्ये तथा भावा मानुष्ये सम्भवन्ति हि ॥
स कथं भगवान्विष्णुस्त्यक्त्वा सुखमनश्वरम् ।
करोति मानुषं जन्म भावैस्तैस्तैरभिद्रुतम् ॥
किं सुखं मानुषं प्राप्य भुवि जन्म मुनीश्वर ।
किं निमित्तं हरिः साक्षाद् गर्भवासं करोति वै ॥
गर्भदुःखं जन्मदुःखं बालभावे तथा पुनः ।
यौवने कामजं दुःखं गार्हस्थ्येऽतिमहत्तरम् ॥
दुःखान्येतान्यवाप्नोति मानुषे द्विजसत्तम । कथं स भगवान्विष्णुरवतारान्पुनः पुनः प्राप्य रामावतारं हि हरिणा ब्रह्मयोनिना । दुःखं महत्तरं प्राप्तं वनवासेऽतिदारुणे चतुर्थ स्कन्ध ४११ दोनोंने देवकी और रोहिणी नामक बहनोंके रूपमें ४३ जन्म लिया था । मैंने यह सुना है कि क्रुद्ध होकर वरुणने उन्हें महान् शाप दिया था ॥ ४२-४३ ॥ राजा बोले- हे महामते! महर्षि कश्यपने कौन - सा ऐसा अपराध किया था, जिसके कारण ४४ उन्हें स्त्रियोंसहित शाप मिला; इसे मुझे बताइये ॥ ४४ ॥
वैकुण्ठवासी, अविनाशी, रमापति भगवान् विष्णुको गोकुलमें जन्म क्यों लेना पड़ा? ॥ ४५ ॥
४५ सबके स्वामी, अविनाशी, देवश्रेष्ठ, युगके आदि तथा सबको धारण करनेवाले साक्षात् भगवान् ४६ नारायण किसके आदेशसे व्यवहार करते हैं और वे अपने स्थानको छोड़कर मानव - योनिमें जन्म लेकर मनुष्योंकी भाँति सब काम क्यों करते हैं; इस ४७ विषयमें मुझे महान् सन्देह है ॥ ४६-४७ ॥ भगवान् विष्णु स्वयं मानव - शरीर धारण करके हीन मनुष्य - जन्ममें अनेकविध लीलाएँ दिखाते हुए ४८ प्रपंच क्यों करते हैं? ॥ ४८ ॥
काम, क्रोध, अमर्ष, शोक, वैर, प्रेम, सुख, ४ ९ दुःख, भय, दीनता, सरलता, पाप, पुण्य, वचन, मारण, पोषण, चलन, ताप, विमर्श, आत्मश्लाघा, लोभ, दम्भ, मोह, कपट और चिन्ता - ये तथा अन्य ५० भी नाना प्रकारके भाव मनुष्य - जन्ममें विद्यमान रहते हैं ॥ ४ ९ –५१ ॥ ५१ वे भगवान् विष्णु शाश्वत सुखका त्याग करके इन भावोंसे ग्रस्त मनुष्य - जन्म किसलिये धारण करते हैं? हे मुनीश्वर! इस पृथ्वीपर मानव - जन्म पाकर ५२ कौन - सा सुख मिल जाता है? वे साक्षात् भगवान् विष्णु किस कारणसे गर्भवास करते हैं? ॥ ५२-५३ ॥ ५३ गर्भवासमें दुःख, जन्मग्रहणमें दुःख, बाल्यावस्थामें दुःख, यौवनावस्थामें कामजनित दुःख एवं गार्हस्थ्य जीवनमें तो बहुत बड़ा दुःख होता है ॥ ५४ ॥
५४ हे विप्रवर! ये अनेक कष्ट मानव - जीवनमें प्राप्त होते हैं, तो फिर वे भगवान् विष्णु अवतार क्यों लेते हैं? ॥ ५५ ॥
॥ ५५ ब्रह्मयोनि भगवान् विष्णुको रामावतार ग्रहण करके अत्यन्त दारुण वनवासकालमें घोर कष्ट प्राप्त हुआ था । ॥ ५६ । उन्हें सीता - वियोगसे उत्पन्न महान् दुःख प्राप्त हुआ