देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 421–430
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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४१२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३
सीताविरहजं दुःखं संग्रामश्च पुनः पुनः ।
कान्तात्यागोऽप्यनेनैवमनुभूतो महात्मना ॥५७
तथा कृष्णावतारेऽपि जन्म रक्षागृहे पुनः ।
गोकुले गमनं चैव गवां चारणमित्युत ॥ ५८
कंसस्य हननं कष्टाद् द्वारकागमनं पुनः ।
नानासंसारदुःखानि भुक्तवान्भगवान् कथम् ॥ ५ ९
स्वेच्छया कः प्रतीक्षेत मुक्तो दुःखानि ज्ञानवान् ।
संशयं छिन्धि सर्वज्ञ मम चित्तप्रशान्तये ॥ ६०
तथा अनेक बार राक्षसोंसे युद्ध करना पड़ा । अन्तमें महान् आत्मावाले इन श्रीरामको पत्नी - परित्यागकी असीम वेदना भी सहनी पड़ी ॥ ५६-५७ ॥ उसी प्रकार कृष्णावतारमें भी बन्दीगृहमें जन्म, गोकुल - गमन, गोचारण, कंसका वध और पुनः कष्टपूर्वक द्वारकाके लिये प्रस्थान - इन अनेकविध सांसारिक दुःखोंको भगवान् कृष्णने क्यों भोगा? ॥ ५८-५९ ॥ ऐसा कौन ज्ञानी व्यक्ति होगा जो मुक्त होता हुआ भी स्वेच्छासे इन दुःखोंकी प्रतीक्षा करेगा? हे सर्वज्ञ! मेरे मनकी शान्तिके लिये सन्देहका निवारण | कीजिये ॥ ६० ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कर्मणो जन्मादिकारणत्वनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः वसुदेव और देवकीके पूर्वजन्मकी कथा व्यास उवाच व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] भगवान् विष्णुके कारणानि बहून्यत्राप्यवतारे हरेः किल । विभिन्न अवतार ग्रहण करने तथा इसी प्रकार सर्वेषां चैव देवानामंशावतरणेष्वपि ॥ सभी देवताओंके भी अंशावतार ग्रहण करनेके बहुतसे कारण हैं ॥ १ ॥
वसुदेवावतारस्य कारणं शृणु तत्त्वतः । अब वसुदेव, देवकी तथा रोहिणीके अवतारोंका देवक्याश्चैव रोहिण्या अवतारस्य कारणम् ॥ कारण यथार्थ रूपसे सुनिये ॥ २ ॥
एकदा कश्यपः श्रीमान्यज्ञार्थं धेनुमाहरत् याचितोऽयं बहुविधं न ददौ धेनुमुत्तमाम् ॥ वरुणस्तु ततो गत्वा ब्रह्माणं जगतः प्रभुम् । प्रणम्योवाच दीनात्मा स्वदुःखं विनयान्वितः किं करोमि महाभाग मत्तोऽसौ न ददाति गाम् । शापो मया विसृष्टोऽस्मै गोपालो भव मानुषे भार्ये द्वे अपि तत्रैव भवेतां चातिदुःखिते यतो वत्सा रुदन्त्यत्र मातृहीनाः सुदुःखिताः मृतवत्सादितिस्तस्माद्भविष्यति धरातले । कारागारनिवासा च तेनापि बहुदुःखिता एक बार महर्षि कश्यप यज्ञकार्यके लिये । वरुणदेवकी गौ ले आये । [ यज्ञ - कार्यकी समाप्तिके पश्चात् ] वरुणदेवके बहुत याचना करनेपर भी उन्होंने वह उत्तम धेनु वापस नहीं दी ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् उदास मनवाले वरुणदेवने जगत्के स्वामी ब्रह्माके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके ॥ ४ विनम्रतापूर्वक उनसे अपना दुःख कहा ॥ ४ ॥
हे महाभाग! मैं क्या करूँ? वह अभिमानी कश्यप मेरी गाय नहीं लौटा रहा है । अतएव मैंने उसे ॥ ५ शाप दे दिया कि मानवयोनिमें जन्म लेकर तुम गोपालक हो जाओ और तुम्हारी दोनों भार्याएँ भी मानवयोनिमें । उत्पन्न होकर अत्यधिक दुःखी रहें । मेरी गायके ॥ ६ बछड़े मातासे वियुक्त होकर अति दुःखित हैं और रो रहे हैं, अतएव पृथ्वीलोकमें जन्म लेनेपर यह अदिति भी मृतवत्सा होगी । इसे कारागारमें रहना पड़ेगा, उससे ॥ ७ । भी उसे महान् कष्ट भोगना होगा ॥ ५-७ ॥
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अ ० ३ ] चतुर्थ व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य यादोनाथस्य पद्मभूः ।
समाहूय मुनिं तत्र तमुवाच प्रजापतिः ॥ ८
कस्मात्त्वया महाभाग लोकपालस्य धेनवः ।
हृताः पुनर्न दत्ताश्च किमन्यायं करोषि च ॥ ९
जानन् न्यायं महाभाग परवित्तापहारणम् ।
कृतवान्कथमन्यायं सर्वज्ञोऽसि महामते ॥ १०
अहो लोभस्य महिमा महतोऽपि न मुञ्चति ।
लोभं नरकदं नूनं पापाकरमसम्मतम् ॥ ११
कश्यपोऽपि न तं त्यक्तुं समर्थः किं करोम्यहम् ।
सर्वदैवाधिकस्तस्माल्लोभो वै कलितो मया ॥ १२
धन्यास्ते मुनयः शान्ता जितो यैर्लोभ एव च ।
वैखानसैः शमपरैः प्रतिग्रहपराङ्मुखैः ॥ १३
संसारे बलवाञ्छत्रुर्लोभोऽमेध्योऽवरः सदा ।
कश्यपोऽपि दुराचारः कृतस्नेहो दुरात्मना ॥ १४
ब्रह्मापि तं शशापाथ कश्यपं मुनिसत्तमम् ।
मर्यादारक्षणार्थं हि पौत्रं परमवल्लभम् ॥ १५
अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले ।
भार्याभ्यां संयुतस्तत्र गोपालत्वं करिष्यसि ॥ १६
व्यास उवाच
एवं शप्तः कश्यपोऽसौ वरुणेन च ब्रह्मणा ।
अंशावतरणार्थाय भूभारहरणाय च ॥ १७
तथादित्यादितिः शप्ता शोकसन्तप्तया भृशम् ।
जाता जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै ॥ १८
स्कन्ध ४१३ व्यासजी बोले- जल - जन्तुओंके स्वामी वरुणका यह वचन सुनकर प्रजापति वहाँ बुलाकर उनसे कहा लोकपाल वरुणकी गायोंका फिर आपने उन्हें लौटाया भी क्यों कर रहे हैं? ॥ ८ - ९ ॥ हे महाभाग! न्यायको दूसरेके धनका हरण किया ब्रह्माने मुनि कश्यपको - हे महाभाग! आपने हरण क्यों किया; और नहीं । आप ऐसा अन्याय जानते हुए भी आपने । हे महामते! आप तो सर्वज्ञ हैं; तो फिर आपने यह अन्याय क्यों किया? ॥ १० ॥
अहो! लोभकी ऐसी महिमा है कि वह महान्-से - महान् लोगोंको भी नहीं छोड़ता है । लोभ तो निश्चय ही पापोंकी खान, नरककी प्राप्ति करानेवाला और सर्वथा अनुचित है ॥ ११ ॥
महर्षि कश्यप भी उस लोभका परित्याग कर सकनेमें समर्थ नहीं हुए तो मैं क्या कर सकता हूँ । अन्ततः मैंने यही निष्कर्ष निकाला कि लोभ सदासे सबसे प्रबल है ॥ १२ ॥
शान्त स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, प्रतिग्रहसे पराङ्मुख तथा वानप्रस्थ - आश्रम स्वीकार किये हुए वे मुनिलोग धन्य हैं, जिन्होंने लोभपर विजय प्राप्त कर ली है ॥१३ ॥
संसारमें लोभसे बढ़कर अपवित्र तथा निन्दित अन्य कोई चीज नहीं है; यह सबसे बलवान् शत्रु है । महर्षि कश्यप भी इस नीच लोभसे स्नेह करनेके कारण दुराचारमें लिप्त हो गये ॥ १४ ॥
अतएव मर्यादाकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने भी अपने परमप्रिय पौत्र मुनिश्रेष्ठ कश्यपको शाप दे दिया कि तुम अपने अंशसे पृथ्वीपर यदुवंशमें जन्म लेकर वहाँ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ गोपालनका कार्य करोगे ॥ १५-१६ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वीका बोझ उतारनेके लिये वरुणदेव तथा ब्रह्माजीने उन महर्षि कश्यपको शाप दे दिया था ॥ १७ ॥
उधर कश्यपकी भार्या दितिने भी अत्यधिक शोकसन्तप्त होकर अदितिको शाप दे दिया कि क्रमसे तुम्हारे सातों पुत्र उत्पन्न होते ही मृत्युको । प्राप्त हो जायँ ॥ १८ ॥
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४१४ जनमेजय उवाच कस्माद्दित्या च भगिनी शप्तेन्द्रजननी मुने कारणं वद शापे च शोकस्तु मुनिसत्तम सूत उवाच पारीक्षितेन पृष्टस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः राजानं प्रत्युवाचेदं कारणं सुसमाहितः व्यास उवाच राजन् दक्षसुते द्वे तु दितिश्चादितिरुत्तमे कश्यपस्य प्रिये भार्ये बभूवतुरुरुक्रमे अदित्यां मघवा पुत्रो यदाभूदतिवीर्यवान् तदा तु तादृशं पुत्रं चकमे दितिरोजसा पतिमाहासितापाङ्गी पुत्रं मे देहि मानद । इन्द्रतुल्यबलं वीरं धर्मिष्ठं वीर्यवत्तमम् तामुवाच मुनिः कान्ते स्वस्था भव मयोदिते व्रतान्ते भविता तुभ्यं शतक्रतुसमः सुतः सा तथेति प्रतिश्रुत्य चकार व्रतमुत्तमम् निषिक्तं मुनिना गर्भं बिभ्राणा सुमनोहरम् ॥ भूमौ चकार शयनं पयोव्रतपरायणा । पवित्रा धारणायुक्ता बभूव वरवर्णिनी
एवं जातः सुसम्पूर्णो यदा गर्भोऽतिवीर्यवान् ।
शुभ्रांशुमतिदीप्ताङ्गीं दितिं दृष्ट्वा तु दुःखिता ॥
मघवत्सदृशः पुत्रो भविष्यति महाबलः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ जनमेजय बोले- हे मुने! दितिके द्वारा उसकी । अपनी बहन तथा इन्द्रकी माता अदिति क्यों शापित ॥ १ ९ की गयी? हे मुनिवर! आप दितिके शोक तथा उसके द्वारा प्रदत्त शापका कारण मुझे बताइये ॥ १ ९ ॥ सूतजी बोले- परीक्षित् - पुत्र राजा जनमेजयके । पूछने पर सत्यवती - पुत्र व्यासजी पूर्ण सावधान होकर ॥ २० राजाको शापका कारण बतलाने लगे ॥ २० ॥
व्यासजी बोले - हे राजन्! दक्षप्रजापतिकी दिति और अदिति नामक दो सुन्दर कन्याएँ थीं । दोनों ही । कश्यपमुनिकी प्रिय तथा गौरवशालिनी पत्नियाँ बनीं ॥ २१ ॥
॥ २१ जब अदिति अत्यन्त तेजस्वी पुत्र इन्द्र हुए, तब वैसे ही ओजस्वी पुत्रके लिये दितिके भी मनमें । इच्छा जाग्रत् हुई ॥ २२ ॥
॥ २२ उस समय सुन्दरी दितिने कश्यपजीसे प्रार्थना की - हे मानद! इन्द्रके ही समान बलशाली, वीर, धर्मात्मा तथा परम शक्तिसम्पन्न पुत्र मुझे भी देनेकी ॥ २३ | कृपा करें ॥ २३ ॥
। तब मुनि कश्यपने उनसे कहा – प्रिये! धैर्य धारण करो, मेरे द्वारा बताये गये व्रतको पूर्ण करनेके ॥ २४ अनन्तर इन्द्रके समान पुत्र तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा ॥ २४ ॥
कश्यपमुनिकी बात स्वीकार करके दिति उस । उत्तम व्रतके पालनमें तत्पर हो गयी । उनके ओजसे २५ सुन्दर गर्भ धारण करती हुई वह सुन्दरी दिति पयोव्रतमें स्थित रहकर भूमिपर सोती थी और ॥ २६ पवित्रताका सदा ध्यान रखती थी । इस प्रकार क्रमशः जब वह महान् तेजस्वी गर्भ पूर्ण हो गया, तब शुभ्र ज्योतियुक्त तथा दीप्तिमान् अंगोंवाली दितिको देखकर २७ अदिति दुःखित हुई ॥ २५ – २७ ॥ [ उसने अपने मनमें सोचा - ] यदि दितिके गर्भसे इन्द्रतुल्य महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तो निश्चय दित्यास्तदा मम सुतस्तेजोहीनो भवेत्किल ॥ २८ ही मेरा पुत्र निस्तेज हो जायगा ॥२८ ॥
इस प्रकार चिन्ता करती हुई मानिनी अदितिने इति चिन्तापरा पुत्रमिन्द्रं चोवाच मानिनी । अपने पुत्र इन्द्रसे कहा – प्रिय पुत्र! इस समय दिति शत्रुस्तेऽद्य समुत्पन्नो दितिगर्भेऽतिवीर्यवान् ॥ २ ९ गर्भमें तुम्हारा अत्यन्त पराक्रमशाली शत्रु विद्यमान है । हे शोभन! तुम सम्यक् विचार करके उस शत्रुके उपायं कुरु नाशाय शत्रोरद्य विचिन्त्य च । नाशक प्रयत्न करो, जिससे दितिकी गर्भोत्पत्ति ही
उत्पत्तिरेव हन्तव्या दित्या गर्भस्य शोभन ॥ ३० । विनष्ट हो जाय ॥ २ ९ -३० ॥
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अ ० ३ ] चतुर्थ
वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं सपत्नीभावमास्थिताम् ।
दुनोति हृदये चिन्ता सुखमर्मविनाशिनी ॥ ३१
राजयक्ष्मेव संवृद्धो नष्टो नैव भवेद्रिपुः ।
तस्मादङ्कुरितं हन्याद् बुद्धिमानहितं किल ॥ ३२
लोहशङ्कुरिव क्षिप्तो गर्भो वै हृदये मम ।
येन केनाप्युपायेन पातयाद्य शतक्रतो ॥ ३३
सामदानबलेनापि हिंसनीयस्त्वया सुतः ।
दित्या गर्भो महाभाग मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ ३४
व्यास उवाच
श्रुत्वा मातृवचः शक्रो विचिन्त्य मनसा ततः ।
जगामापरमातुः स समीपममराधिपः ॥। ३५
ववन्दे विनयात्पादौ दित्याः पापमतिर्नृप ।
प्रोवाच विनयेनासौ मधुरं विषगर्भितम् ॥ ३६
इन्द्र उवाच
मातस्त्वं व्रतयुक्तासि क्षीणदेहातिदुर्बला ।
सेवार्थमिह सम्प्राप्तः किं कर्तव्यं वदस्व मे ॥ ३७
पादसंवाहनं तेऽहं करिष्यामि पतिव्रते ।
गुरुशुश्रूषणात्पुण्यं लभते गतिमक्षयाम् ॥ ३८
न मे किमपि भेदोऽस्ति तथादित्या शपे किल ।
इत्युक्त्वा चरणौ स्पृष्ट्वा संवाहनपरोऽभवत् ॥ ३ ९
संवाहनसुखं प्राप्य निद्रामाप सुलोचना ।
श्रान्ता व्रतकृशा सुप्ता विश्वस्ता परमा सती ॥ ४०
तां निद्रावशमापन्नां विलोक्य प्राविशत्तनुम् ।
रूपं कृत्वातिसूक्ष्मञ्च शस्त्रपाणिः समाहितः ॥ ४१
स्कन्ध ४१५ मुझसे सपत्नीभाव रखनेवाली उस सुन्दरी दितिको देखकर सुखका नाश कर देनेवाली चिन्ता मेरे मनको सताने लगती है ॥ ३१ ॥
जब शत्रु बढ़ जाता है तब राजयक्ष्मा रोगकी भाँति वह नष्ट नहीं हो पाता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यका कर्तव्य है कि वह ऐसे शत्रुको अंकुरित होते ही नष्ट कर डाले ॥ ३२ ॥
हे देवेन्द्र! दितिका वह गर्भ मेरे हृदयमें लोहेकी कीलके समान चुभ रहा है, अतः जिस किसी भी उपायसे तुम उसे नष्ट कर दो । हे महाभाग! यदि तुम मेरा हित करना चाहते हो तो साम, दान आदिके बलसे दितिके गर्भस्थ शिशुका संहार कर डालो ॥ ३३-३४ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! तब अपनी माताकी वाणी सुनकर देवराज इन्द्र मन - ही - मन उपाय सोचकर अपनी विमाता दितिके पास गये । उस पापबुद्धि इन्द्रने विनयपूर्वक दितिके चरणोंमें प्रणाम किया और ऊपरसे मधुर किंतु भीतरसे विषभरी वाणीमें विनम्रतापूर्वक उससे कहा- ॥ ३५-३६ ॥ इन्द्र बोले - हे माता! आप व्रतपरायण हैं, और अत्यन्त दुर्बल तथा कृशकाय हो गयी हैं । अतः मैं आपकी सेवा करनेके लिये आया हूँ । मुझे बताइये, मैं क्या करूँ? हे पतिव्रते! मैं आपके चरण दबाऊँगा; | क्योंकि बड़ोंकी सेवासे मनुष्य पुण्य तथा अक्षय गति प्राप्त कर लेता है ॥ ३७-३८ ॥ मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि मेरे लिये माता अदिति तथा आपमें कुछ भी भेद नहीं है । ऐसा कहकर इन्द्र उनके दोनों चरण पकड़कर दबाने लगे ॥ ३ ९ ॥ पादसंवाहनका सुख पाकर सुन्दर नेत्रोंवाली उस दितिको नींद आने लगी । वह परम सती दिति थकी हुई थी, व्रतके कारण दुर्बल हो गयी थी और उसे इन्द्रपर विश्वास था, अतः वह सो गयी ॥ ४० ॥
दितिको नींदके वशीभूत देखकर इन्द्र अपना अत्यन्त सूक्ष्म रूप बनाकर हाथमें शस्त्र लेकर बड़ी सावधानी के साथ दितिके शरीरमें प्रवेश कर | गये ॥ ४१ ॥
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४१६ उदरं प्रविवेशाशु तस्या योगबलेन वै गर्भं चकर्त वज्रेण सप्तधा पविनायकः रुरोद च तदा बालो वज्रेणाभिहतस्तथा मा रुदेति शनैर्वाक्यमुवाच मघवानमुम् शकलानि पुनः सप्त सप्तधा कर्तितानि च तदा चैकोनपञ्चाशन्मरुतश्चाभवन्नृप ॥
तदा प्रबुद्धा सुदती ज्ञात्वा गर्भं तथाकृतम् ।
इन्द्रेण छलरूपेण चुकोप भृशदुःखिता ॥
भगिनीकृतं तु सा बुद्ध्वा शशाप कुपिता तदा ।
अदितिं मघवन्तञ्च सत्यव्रतपरायणा ॥
यथा मे कर्तितो गर्भस्तव पुत्रेण छद्मना ।
तथा तन्नाशमायातु राज्यं त्रिभुवनस्य तु ॥
यथा गुप्तेन पापेन मम गर्भो निपातितः ।
अदित्या पापचारिण्या यथा मे घातितः सुतः ॥
तस्याः पुत्रास्तु नश्यन्तु जाता जाताः पुनः पुनः ।
कारागारे वसत्वेषा पुत्रशोकातुरा भृशम् ॥
अन्यजन्मनि चाप्येव मृतापत्या भविष्यति । व्यास उवाच इत्युत्सृष्टं तदा श्रुत्वा शापं मरीचिनन्दनः ॥
उवाच प्रणयोपेतो वचनं शमयन्निव ।
मा कोपं कुरु कल्याणि पुत्रास्ते बलवत्तराः ॥
भविष्यन्ति सुराः सर्वे मरुतो मघवत्सखाः ।
शापोऽयं तव वामोरु त्वष्टाविंशेऽथ द्वापरे ॥
अंशेन मानुषं जन्म प्राप्य भोक्ष्यति भामिनी ।
वरुणेनापि दत्तोऽस्ति शापः सन्तापितेन च ॥
उभयोः शापयोगेन मानुषीयं भविष्यति । व्यास उवाच पतिनाश्वासिता देवी सन्तुष्टा साभवत्तदा ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ 1 इस प्रकार योगबलद्वारा दितिके उदरमें शीघ्र ॥ ४२ ही प्रविष्ट होकर इन्द्रने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर डाले ॥ ४२ ॥
। उस समय वज्राघातसे दुःखित हो गर्भस्थ ॥ ४३ शिशु रुदन करने लगा । तब धीरेसे इन्द्रने उससे । ' मा रुद ' ' मत रोओ ' - ऐसा कहा ॥ ४३ ॥
तत्पश्चात् इन्द्रने पुनः उन सातों टुकड़ोंके ४४ सात - सात खण्ड कर डाले । हे राजन्! वे ही टुकड़े उनचास मरुद्गणके रूपमें प्रकट हो गये ॥ ४४ ॥
४५ उस छली इन्द्रद्वारा अपने गर्भको वैसा ( विकृत ) किया गया जानकर सुन्दर दाँतोंवाली वह दिति जाग गयी और अत्यन्त दुःखी होकर क्रोध करने लगी ॥ ४५ ॥
४६ यह सब बहन अदितिद्वारा किया गया है- -ऐसा जानकर सत्यव्रतपरायण दितिने कुपित होकर अदिति और इन्द्र दोनोंको शाप दे दिया कि जिस ४७ प्रकार तुम्हारे पुत्र इन्द्रने छलपूर्वक मेरा गर्भ छिन्न-भिन्न कर डाला है, उसी प्रकार उसका त्रिभुवनका ४८ राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाय । जिस प्रकार पापिनी अदितिने गुप्त पापके द्वारा मेरा गर्भ गिराया है और मेरे गर्भको नष्ट करवा डाला है, उसी प्रकार उसके ४ ९ पुत्र भी क्रमशः उत्पन्न होते ही नष्ट हो जायँगे और वह पुत्र - शोकसे अत्यन्त चिन्तित होकर कारागारमें रहेगी । अन्य जन्ममें भी इसकी सन्तानें मर जाया करेंगी ॥ ४६–४९ ३ ॥ ५० व्यासजी बोले- इस प्रकार मरीचिपुत्र कश्यपने दितिप्रदत्त शापको सुनकर उसे सान्त्वना देते हुए प्रेमपूर्वक यह वचन कहा - हे कल्याणि! तुम क्रोध ५१ मत करो, तुम्हारे पुत्र बड़े बलवान् होंगे । वे सब उनचास मरुद् देवता होंगे, जो इन्द्रके मित्र बनेंगे । ५२ हे सुन्दरि! अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें तुम्हारा शाप सफल होगा । उस समय अदिति मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर अपने किये कर्मका फल भोगेगी । इसी प्रकार ५३ दुःखित वरुणने भी उसे शाप दिया है । इन दोनों शापोंके संयोगसे यह अदिति मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगी ॥ ५०–५३३ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार पति कश्यपके ५४ आश्वासन देनेपर दिति सन्तुष्ट हो गयी और वह
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अ ० ४ ] चतुर्थ स्कन्ध ४१७ नोवाच विप्रियं किञ्चित्ततः सा वरवर्णिनी । पुनः कोई अप्रिय वाणी नहीं बोली । हे राजन्! इस इति ते कथितं राजन् पूर्वशापस्य कारणम् ॥ ५५ प्रकार मैंने आपको अदितिके पूर्व शापका कारण बताया । हे नृपश्रेष्ठ! वही अदिति अपने अंशसे
अदितिर्देवकी जाता स्वांशेन नृपसत्तम ॥ ५६ । देवकीके रूपमें उत्पन्न हुई ॥ ५४-५६ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे दित्या अदित्यै शापदानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः व्यासजीद्वारा जनमेजयको राजोवाच
विस्मितोऽस्मि महाभाग श्रुत्वाख्यानं महामते ।
संसारोऽयं पापरूपः कथं मुच्येत बन्धनात् ॥ १
कश्यपस्यापि दायादस्त्रिलोकीविभवे सति ।
कृतवानीदृशं कर्म को न कुर्याज्जुगुप्सितम् ॥ २
गर्भे प्रविश्य बालस्य हननं दारुणं किल ।
सेवामिषेण मातुश्च कृत्वा शपथमद्भुतम् ॥ ३
शास्ता धर्मस्य गोप्ता च त्रिलोक्याः पतिरप्युत ।
कृतवानीदृशं कर्म को न कुर्यादसाम्प्रतम् ॥ ४
पितामहा मे संग्रामे कुरुक्षेत्रेऽतिदारुणम् ।
कृतवन्तस्तथाश्चर्यं दुष्टं कर्म जगद्गुरो ॥ ५
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णो धर्मांशोऽपि युधिष्ठिरः ।
सर्वे विरुद्धधर्मेण वासुदेवेन नोदिताः ॥ ६
असारतां विजानन्तः संसारस्य सुमेधसः ।
देवांशाश्च कथं चक्रुर्निन्दितं धर्मतत्पराः ॥ ७
स्था धर्मस्य विप्रेन्द्र प्रमाणं किं विनिश्चितम् ।
चलचित्तोऽस्मि सञ्जातः श्रुत्वा चैतत्कथानकम् ॥ ८
मायाकी प्रबलता समझाना राजा बोले- हे महाभाग! इस आख्यानको सुनकर मैं बड़े आश्चर्यमें पड़ गया हूँ । हे महामते! यह संसार पापका मूर्तरूप है । इसके बन्धनसे मनुष्य किस प्रकार मुक्त हो सकता है? ॥ १ ॥
जब तीनों लोकोंका वैभव पास रखते हुए भी कश्यपमुनिकी संतान इन्द्रने ऐसा पापकर्म कर डाला, तब कौन मनुष्य पाप नहीं कर सकता? ॥ २ ॥
अद्भुत शपथ लेकर सेवाके बहाने माताके गर्भमें प्रविष्ट होकर बालककी हत्या करना तो बड़ा भयानक पाप है! ॥३ ॥
सबके शासक, धर्मके रक्षक और तीनों लोकोंके स्वामी इन्द्रने जब ऐसा निन्दित कर्म कर डाला, तब फिर दूसरा कौन नहीं करेगा? ॥४ ॥
हे जगद्गुरो! मेरे पितामह लोगोंने भी कुरुक्षेत्र के संग्राममें ऐसा ही विस्मयकारी दारुण और निन्दित कर्म किया था । भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा धर्मके अंशरूप युधिष्ठिर—– इन सभीने भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेरणासे धर्मविरुद्ध कर्म किया था ॥ ५-६ ॥ संसारकी असारता जानते हुए भी उन प्रतिभाशाली तथा देवांशसे उत्पन्न धर्मपरायण पाण्डवोंने भी ऐसा गर्हित कर्म क्यों किया? ॥ ७ ॥
द्विजेन्द्र! यदि ऐसी बात है तो धर्मपर किसकी आस्था होगी और धर्मके विषयमें सैद्धान्तिक प्रमाण ही क्या रह जायगा? यह वृत्तान्त सुनकर तो मेरा मन | चंचल हो उठा है ॥ ८ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 14 A
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आप्तवाक्यं प्रमाणं चेदाप्तः कः परदेहवान् ।
पुरुषो विषयासक्तो रागी भवति सर्वथा ॥
रागो द्वेषो भवेन्नूनमर्थनाशादसंशयम् । द्वेषादसत्यवचनं वक्तव्यं स्वार्थसिद्धये
जरासन्धविघातार्थं हरिणा सत्त्वमूर्तिना ।
छलेन रचितं रूपं ब्राह्मणस्य विजानता ॥
तदाप्तः कः प्रमाणं किं सत्त्वमूर्तिरपीदृशः ।
अर्जुनोऽपि तथैवात्र कार्ये यज्ञविनिर्मिते ॥
कीदृशोऽयं कृतो यज्ञः किमर्थं शमवर्जितः ।
परलोकपदार्थं वा यशसे वान्यथा किल ॥
धर्मस्य प्रथमः पादः सत्यमेतच्छ्रुतेर्वचः ।
द्वितीयस्तु तथा शौचं दया पादस्तृतीयकः ॥
दानं पादश्चतुर्थश्च पुराणज्ञा वदन्ति वै ।
तैर्विहीनः कथं धर्मस्तिष्ठेदिह सुसम्मतः ॥
धर्महीनं कृतं कर्म कथं तत्फलदं भवेत् ।
धर्मे स्थिरा मतिः क्वापि न कस्यापि प्रतीयते ॥
छलार्थञ्च यदा विष्णुर्वामनोऽभूज्जगत्प्रभुः ।
येन वामनरूपेण वञ्चितोऽसौ बलिर्नृपः ॥
विहर्ता शतयज्ञस्य वेदाज्ञापरिपालकः ।
धर्मिष्ठो दानशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥
स्थानात्प्रभ्रंशितोऽकस्माद्विष्णुना प्रभविष्णुना ।
जितं केन तयोः कृष्ण बलिना वामनेन वा ॥
छलकर्मविदा चायं सन्देहोऽत्र महान्मम ।
वञ्चयित्वा वञ्चितेन सत्यं वद द्विजोत्तम ॥
पुराणकर्ता त्वमसि धर्मज्ञश्च महामतिः । 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -14B श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ यदि आप्त वचनको प्रमाण मानें, तो फिर कौन ९ पुरुष आप्त है? विषयासक्त मनुष्यमें राग आ ही जाता है और अपना स्वार्थ भंग होनेपर उसमें निःसन्देह राग - द्वेषकी बहुलता हो जाती है । द्वेषके ॥ १० कारण अपनी स्वार्थसिद्धिके लिये असत्य भाषण करना पड़ता है॥९ -१० ॥ परम ज्ञानी और सत्त्वगुणके मूर्तस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने भी जरासन्धके वधके लिये छलसे ब्राह्मणका ११ वेष धारण किया था । जब सत्त्वमूर्ति भी इस प्रकारके होते हैं, तब किस आप्त पुरुषको प्रमाण माना जाय? उसी प्रकार [ राजसूय ] यज्ञके अवसरपर अर्जुनने भी १२ वैसा ही कर्म किया था ॥ ११ - १२ ॥ जिस यज्ञमें अशान्तिका वातावरण रहा, उस यज्ञको किस श्रेणीका यज्ञ कहा जाय? वह यज्ञ १३ परलोकमें परमपदकी प्राप्तिके लिये किया गया था अथवा सुयश पानेके लिये किया गया था या अन्य किसी कार्यकी सिद्धिके लिये किया गया था? ॥ १३ ॥
१४ श्रुतिका यह वचन है कि धर्मका प्रथम चरण सत्य. दूसरा चरण पवित्रता, तीसरा चरण दया तथा चतुर्थ चरण दान है । पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं । इन चारोंके बिना १५ परम आदृत धर्म कैसे टिक सकता है? ॥ १४-१५ ॥ तब मेरे पूर्वजोंके द्वारा किया गया वह धर्मविहीन यज्ञ - कर्म [ उत्तम ] फल देनेवाला कैसे हो सकता था? १६ इससे तो यही प्रतीत होता है कि उस समय किसीका भी कहीं भी धर्ममें अटल विश्वास नहीं था ॥ १६ ॥
जगत्प्रभु भगवान् विष्णुने भी छलनेहेतु वामनका १७ रूप धारण किया था, जिन्होंने वामनरूपसे राजा बलिको ठग लिया था ॥ १७ ॥
महाराज बलि सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले. वेदोंकी आज्ञाका पालन करनेवाले, धर्मात्मा, दानी, १८ सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय थे । ऐसे महापुरुषको परम प्रभावशाली भगवान् विष्णुने अकस्मात् पदच्युत कर दिया । अतः हे कृष्णद्वैपायन! उन दोनोंमें कौन जीता? १ ९ वंचना करके छलकर्ममें निपुण भगवान् वामनकी विजय हुई या छले गये राजा बलिकी; इस विषय में मुझे महान् सन्देह है । हे द्विजश्रेष्ठ! मुझे सत्य बात २० बताइये; क्योंकि आप पुराणोंके रचयिता, धर्मज्ञ तथा महान् बुद्धिसम्पन्न हैं ॥ १८ - २०३ ॥
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अ ० ४ ] व्यास उवाच जितं वै बलिना राजन् दत्ता येन च मेदिनी ॥
त्रिविक्रमोऽपि नाम्ना यः प्रथितो वामनोऽभवत् ।
छलनार्थमिदं राजन्वामनत्वं नराधिप ॥
सम्प्राप्तं हरिणा भूयो द्वारपालत्वमेव च ।
सत्यादन्यतरन्नास्ति मूलं धर्मस्य पार्थिव ॥
दुःसाध्यं देहिनां राजन्सत्यं सर्वात्मना किल ।
माया बलवती भूप त्रिगुणा बहुरूपिणी ॥
ययेदं निर्मितं विश्वं गुणैः शबलितं त्रिभिः ।
तस्माच्छलवता सत्यं कुतोऽविद्धं भवेन्नृप ॥
मिश्रेण जनिता चैव स्थितिरेषा सनातनी ।
वैखानसाश्च मुनयो निःसङ्गा निष्प्रतिग्रहाः ॥
सत्ययुक्ता भवन्त्यत्र वीतरागा गतस्पृहाः ।
दृष्टान्तदर्शनार्थाय निर्मितास्ते च तादृशाः ॥
अन्यत्सर्वं शबलितं गुणैरेभिस्त्रिभिर्नृप ।
नैकं वाक्यं पुराणेषु वेदेषु नृपसत्तम ॥
धर्मशास्त्रेषु चाङ्गेषु सगुणै रचितेष्विह ।
सगुणः सगुणं कुर्यान्निर्गुणो न करोति वै ॥
गुणास्ते मिश्रिताः सर्वे न पृथग्भावसङ्गताः ।
निर्व्यलीके स्थिरे धर्मे मतिः कस्यापि न स्थिरा ॥
भवोद्भवे महाराज मायया मोहितस्य वै ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि तदासक्तं मनस्तथा ॥
करोति विविधान्भावान्गुणैस्तैः प्रेरितो भृशम् ।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनः स्थिरजङ्गमाः ॥
सर्वे मायावशा राजन् सानुक्रीडति तैरिह ।
सर्वान्वै मोहयत्येषा विकुर्वत्यनिशं जगत् ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 14 C चतुर्थ स्कन्ध ४१ ९ व्यासजी बोले - हे राजन्! उस राजा बलिकी २१ ही विजय हुई, जिसने समस्त भूमण्डलका दान कर दिया था । हे राजन्! जो त्रिविक्रम नामसे विख्यात थे, वे भगवान् विष्णु वामन बने । हे नरेन्द्र! उन्होंने छल २२ करनेके लिये यह वामनरूप धारण किया था और इसी छलके परिणामस्वरूप उन श्रीहरिको राजा बलिका द्वारपाल बनना पड़ा । अतः हे राजन्! सत्यसे २३ बढ़कर धर्मका मूल और कुछ नहीं है ॥ २१–२३ ॥ हे राजन्! सम्यक् प्रकारसे सत्यका पालन करना प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है । अनेक रूप धारण २४ करनेवाली त्रिगुणात्मिका माया बड़ी बलवती है, जिसने तीनों गुणोंसे सम्मिश्रित इस विश्वकी रचना की है । अतः हे राजन्! छल - कपट करनेवालेसे बिना प्रभावित २५ हुए यह सत्य कैसे रह सकता है? ॥ २४-२५ ॥ सत्त्व, रज और तम — इन्हीं तीनों गुणोंके मेलसे संसारका प्रादुर्भाव हुआ, यही सृष्टिका सनातन नियम २६ है । केवल अनासक्त, प्रतिग्रहशून्य, रागरहित और तृष्णाविहीन वानप्रस्थ तथा मुनिजन अवश्य सत्यपरायण होते हैं, किंतु वैसे लोग केवल दृष्टान्त २७ दिखानेके लिये ही बनाये गये हैं॥२६-२७ ॥ हे राजन्! उनके अतिरिक्त सब कुछ सत्त्व, रज एवं तम- इन तीनों गुणोंसे ओत - प्रोत है । हे नृपश्रेष्ठ! २८ पुराणों, वेदों, धर्मशास्त्रों, वेदांगों और सगुण प्राणियोंद्वारा रचित ग्रन्थोंमें भी कहीं एकवाक्यता नहीं मिलती; सगुण प्राणी ही सगुण कार्य करता है, २ ९ निर्गुणसे सगुण कार्य नहीं हो सकता; क्योंकि वे सभी मिश्रित हैं, वे पृथक् पृथक् नहीं रहते । इसी कारण किसीकी भी बुद्धि सत्य तथा सनातनधर्ममें ३० टिक नहीं पाती ॥ २८ - ३० ॥ हे महाराज! संसारकी सृष्टिके समय मायासे मोहित मनुष्यकी इन्द्रियाँ अत्यन्त चंचल हो जाती हैं ३१ और उनमें आसक्त मन उन गुणोंसे प्रेरित होकर विविध प्रकारके भाव प्रकट करने लगता है । है राजन्! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त स्थावर - जंगम सभी ३२ प्राणी मायाके वशीभूत रहते हैं और वह माया उनके साथ क्रीडा करती रहती है । यह माया सभीको मोहमें डाल देती है और जगत् में निरन्तर विकार उत्पन्न ३३ | किया करती है ॥ ३१–३३ ॥
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४२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४
असत्यो जायते राजन्कार्यवान्प्रथमं नरः ।
इन्द्रियार्थांश्चिन्तयानो न प्राप्नोति यदा नरः ॥
तदर्थं छलमादत्ते छलात्पापे प्रवर्तते ।
कामः क्रोधश्च लोभश्च वैरिणो बलवत्तराः ॥
कृताकृतं न जानन्ति प्राणिनस्तद्वशं गताः ।
विभवे सत्यहङ्कारः प्रबलः प्रभवत्यपि ॥
अहङ्काराद्भवेन्मोहो मोहान्मरणमेव च ।
सङ्कल्पा बहवस्तत्र विकल्पाः प्रभवन्ति च ॥
ईर्ष्यासूया तथा द्वेषः प्रादुर्भवति चेतसि ।
आशा तृष्णा तथा दैन्यं दम्भोऽधर्ममतिस्तथा ॥
प्राणिनां प्रभवन्त्येते भावा मोहसमुद्भवाः ।
यज्ञदानानि तीर्थानि व्रतानि नियमास्तथा ॥
अहङ्काराभिभूतस्तु करोति पुरुषोऽन्वहम् ।
अहंभावकृतं सर्वं प्रभवेद्वै न शौचवत् ॥
रागलोभात्कृतं कर्म सर्वाङ्गं शुद्धिवर्जितम् ।
प्रथमं द्रव्यशुद्धिश्च द्रष्टव्या विबुधैः किल ॥।
अद्रोहेणार्जितं द्रव्यं प्रशस्तं धर्मकर्मणि ।
द्रोहार्जितेन द्रव्येण यत्करोति शुभं नरः ॥
विपरीतं भवेत्तत्तु फलकाले नृपोत्तम ।
मनोऽतिनिर्मलं यस्य स सम्यक्फलभाग्भवेत् ॥
तस्मिन्विकारयुक्ते तु न यथार्थफलं लभेत् ।
कर्तारः कर्मणां सर्वे आचार्यऋत्विजादयः ॥
स्युस्ते विशुद्धमनसस्तदा पूर्णं भवेत्फलम् ।
देशकालक्रियाद्रव्यकर्तॄणां शुद्धता यदि ॥
मन्त्राणां च तदा पूर्णं कर्मणां फलमश्नुते ।
शत्रूणां नाशमुद्दिश्य स्ववृद्धिं परमां तथा ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -14 D हे राजन्! सर्वप्रथम अपना कार्य सिद्ध करनेके ३४ लिये मनुष्य असत्यका सहारा लेता है । उस समय इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करते हुए जब मनुष्य अपना अभीष्ट नहीं पाता, तो वह उसके लिये छल् ३५ करने लगता है । इस प्रकार छलके कारण वह पापमें प्रवृत्त हो जाता है । काम, क्रोध और लोभ मनुष्योंके सबसे बड़े शत्रु हैं । इनके वशमें होनेके कारण प्राणी ३६ कर्तव्य - अकर्तव्यको नहीं जान पाते । ऐश्वर्य बढ़ जानेपर अहंकार और भी बढ़ जाता है । अहंकारसे मोह उत्पन्न होता है और मोहसे विनाश हो जाता है । ३७ मोहके कारण मनुष्यके मनमें अनेक प्रकारके संकल्प-विकल्प होने लगते हैं । उस समय मनमें ईर्ष्या, असूया तथा द्वेष उत्पन्न हो जाते हैं । प्राणियोंके हृदयमें ३८ आशा, तृष्णा, दीनता, दम्भ और अधार्मिक बुद्धि-ये सब उत्पन्न हो जाते हैं । ये भावनाएँ प्राणियों में मोहसे ही उत्पन्न होती हैं । यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत और ३ ९ नियम जो कुछ भी सत्कर्म हैं, उन्हें भी मनुष्य अहंकारके ही वशीभूत होकर निरन्तर करता है. उनका अहंभावसे किया गया सारा कार्य वैसा नहीं ४० होता, जैसा कि शुद्ध अन्तःकरणसे किया जाता है । आसक्ति एवं लोभसे किया हुआ कोई भी कर्म सर्वथा अशुद्ध होता है ॥ ३४–४०३ ॥ ४१ बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे सर्वप्रथम द्रव्य - शुद्धिपर विचार कर लें । द्रोहरहित कर्म करके ४२ अर्जित किया हुआ धन धर्मकार्यमें प्रशस्त माना गया है । हे नृपश्रेष्ठ! द्रोहपूर्वक उपार्जित किये हुए द्रव्यके द्वारा मनुष्य जो उत्तम कार्य करता है, समय आनेपर ४३ उसका विपरीत फल प्राप्त होता है । जिसका मन परम पवित्र है, वही पूर्ण फलका अधिकारी होता है और मनके विकारपूर्ण रहनेपर उसे यथार्थ फल नहीं ४४ मिलता ॥ ४१–४३३ ॥ जब कर्म करानेवाले ऋत्विक्, आचार्य आदि लोगोंका चित्त शुद्ध रहता है, तभी पूर्ण फल प्राप्त होता ४५ है । यदि देश, काल, क्रिया, द्रव्य, कर्ता और मन्त्र– इन सबकी शुद्धता रहती है, तभी कर्मोंका पूरा फल प्राप्त होता है । जो मनुष्य शत्रुनाश तथा अपनी अभिवृद्धिके ४६ | उद्देश्यसे पुण्यकर्म करता है तो उसे भी वैसा ही
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अ ० ५ ] चतुर्थ
करोति सुकृतं तद्वद्विपरीतं भवेत्किल ।
स्वार्थासक्तः पुमान्नित्यं न जानाति शुभाशुभम् ॥ ४७
दैवाधीनः सदा कुर्यात्पापमेव न सत्कृतम् ।
प्राजापत्याः सुराः सर्वे ह्यसुराश्च तदुद्भवाः ॥ ४८
सर्वे ते स्वार्थनिरताः परस्परविरोधिनः ।
सत्त्वोद्भवाः सुराः सर्वेऽप्युक्ता वेदेषु मानुषाः ॥ ४ ९
रजोद्भवास्तामसास्तु तिर्यंचः परिकीर्तिताः ।
सत्त्वोद्भवानां तैर्वैरं परस्परमनारतम् ॥५० ।
तिरश्चामत्र किं चित्रं जातिवैरसमुद्भवे ।
सदा द्रोहपरा देवास्तपोविघ्नकरास्तथा ॥ ५१
असन्तुष्टा द्वेषपराः परस्परविरोधिनः ।
अहङ्कारसमुद्भूतः संसारोऽयं यतो नृप ॥५२
रागद्वेषविहीनस्तु स कथं जायते नृप ॥ ५३
स्कन्ध ४२१ विपरीत फल मिलता है । स्वार्थमें लिप्त मनुष्य शुभाशुभका ज्ञान नहीं रख पाता और दैवाधीन होकर सदा पाप ही किया करता है, पुण्य नहीं ॥ ४४ - - ४७ ४७३ ॥ प्रजापति ब्रह्मासे ही देवता उत्पन्न हुए हैं और उन्हींसे असुरोंकी भी उत्पत्ति हुई है । वे सब - के - सब स्वार्थमें लिप्त होकर एक - दूसरेके विरुद्ध काम करते हैं । वेदोंमें कहा गया है कि सत्त्वगुणसे सभी देवता, रजोगुणसे मनुष्य तथा तमोगुणसे पशु - पक्षी आदि तिर्यक्योनिके जीव उत्पन्न होते हैं । अतएव जब सत्त्वगुणसे उत्पन्न देवताओंमें भी निरन्तर आपसमें वैरभाव रहता है तब पशु - पक्षियोंमें परस्पर जातिवैर उत्पन्न होनेमें क्या आश्चर्य! देवता भी सदैव द्रोहमें तत्पर रहते हैं और तपस्यामें विघ्न डाला करते हैं । हे नृप! वे सदा असन्तुष्ट रहते हुए द्वेषपरायण होकर आपसमें विरोधभाव रखते हैं । अतः हे राजन्! जब यह संसार ही अहंकारसे उत्पन्न हुआ है, तब वह । राग - द्वेषसे हीन हो ही कैसे सकता है? ॥ ४८–५३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे अधमजगतः स्थितिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः नर - नारायणकी तपस्यासे चिन्तित होकर इन्द्रका उनके पास जाना और मोहिनी माया प्रकट करना तथा उससे भी अप्रभावित रहनेपर कामदेव, वसन्त व्यास उवाच अथ किं बहुनोक्तेन संसारेऽस्मिन्नृपोत्तम धर्मात्माद्रोहबुद्धिस्तु कश्चिद्भवति कर्हिचित् रागद्वेषावृतं विश्वं सर्वं स्थावरजङ्गमम् । आद्ये युगेऽपि राजेन्द्र किमद्य कलिदूषिते देवाः सेर्ष्याश्च सद्रोहाश्छलकर्मरताः सदा मानुषाणां तिरश्चां च का वार्ता नृप गण्यते ॥ द्रोहपरे द्रोहपरो भवेदिति समानता अद्रोहिणि तथा शान्ते विद्वेषः खलता स्मृता और अप्सराओंको भेजना व्यासजी बोले- हे नृपोत्तम! अब अधिक । कहने से क्या लाभ? इस संसारमें कहीं बिरला ही ॥ ऐसा कोई धर्मात्मा पुरुष होगा जो द्रोहभावसे रहित हो । यह चर - अचर सम्पूर्ण संसार राग - द्वेषसे ओत-प्रोत है । हे राजेन्द्र! सत्ययुगमें भी यह संसार ऐसा ही था, तब कलिसे दूषित इसके विषयमें क्या कहा ॥ २ जाय? ॥ १-२ ॥ हे राजन्! जब देवता भी सदा ईर्ष्यायुक्त, द्रोहसे । भरे हुए और छल - परायण रहते हैं, तब मनुष्य तथा ३ पशु - पक्षियोंकी बात ही क्या है? यदि कोई मनुष्य ह करनेवाले प्रति द्रोह भाव रखे तो यह समानताकी । बात है, किंतु द्रोह न करनेवाले तथा शान्त स्वभाववाले के ॥ ४ प्रति विद्वेष रखनेको नीचता कहा गया है॥३-४ ॥