देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 51–60

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २

इत्युक्तो नारदेनासौ वसुदेवः प्रणम्य तम् ।

उवाच परया प्रीत्या नारदं मुनिसत्तमम् ॥ ४२

वसुदेव उवाच

भगवंस्तव वाक्येन संस्मृतं वृत्तमात्मनः ।

श्रूयतां तच्च वक्ष्यामि देवीमाहात्म्यसम्भवम् ॥ ४३

पुरा नभोगिरा कंसो देवक्यष्टमगर्भतः ।

ज्ञात्वात्ममृत्युं पापो मां सभार्यं न्यरुणद्भिया ॥ ४४

कारागारेऽहमवसं देवक्या सह भार्यया ।

जातं जातं समवधीत्पुत्रं कंसोऽपि पापकृत् ॥ ४५

षट् पुत्रा निहतास्तेन तदा शोकाकुला भृशम् ।

अतप्यद् देवकी देवी नक्तन्दिवमनिन्दिता ॥ ४६

तदाहं गर्गमाहूय मुनिं नत्वाभिपूज्य च ।

निवेद्य देवकीदुःखमवोचं पुत्रकाम्यया ॥ ४७

भगवन् करुणासिन्धो यादवानां गुरुर्भवान् ।

आयुष्मत्पुत्रसम्प्राप्तिसाधनं वद मे मुने ॥ ४८

ततो गर्गः प्रसन्नात्मा मामुवाच दयानिधिः । गर्ग उवाच वसुदेव महाभाग शृणु तत् साधनं परम् ॥ ४ ९

या सा भगवती दुर्गा भक्तदुर्गतिहारिणी ।

तामाराधय कल्याणीं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥५०

यदाराधनतः सर्वे सर्वान् कामानवाप्नुयुः ।

न किञ्चिद् दुर्लभं लोके दुर्गार्चनवतां नृणाम् ॥ ५१

इत्युक्तोऽहं मुदा युक्तः सभार्यो मुनिपुङ्गवम् ।

प्रणम्य परया भक्त्या प्रावोचं विहिताञ्जलिः ॥ ५२

वसुदेव उवाच

यद्यस्ति भगवन् प्रीतिर्मयि ते करुणानिधे ।

तदा गुरो मदर्थे त्वं समाराधय चण्डिकाम् ॥ ५३ ।

नारदजीके ऐसा कहनेपर वे वसुदेवजी मुनि -श्रेष्ठ नारदको प्रणाम करके अत्यन्त प्रेमपूर्वक कहने लगे ॥ ४२ ॥

वसुदेवजी बोले – हे भगवन्! आपके इस कथनसे देवी - माहात्म्यसे सम्बन्धित एक अपना वृत्तान्त मुझे याद आ गया; मैं उसे कह रहा हूँ, आप सुनिये ॥ ४३ ॥

पूर्वकालमें पापी कंसने आकाशवाणीके माध्यमसे देवकीके आठवें गर्भसे अपनी मृत्यु जानकर भयभीत हो भार्यासहित मुझको बन्दी बना लिया ॥ ४४ ॥

तदनन्तर मैं अपनी पत्नी देवकीके साथ कारागारमें रहने लगा और पापी कंस भी मेरे पैदा होनेवाले पुत्रों को एक - एक करके मारता रहा ॥ ४५ ॥

इस प्रकार जब कंसके द्वारा मेरे छः पुत्र मार डाले गये तब मेरी निर्दोष भार्या देवी देवकी अत्यन्त शोकाकुल हो उठीं और दिन - रात दुखी रहने लगीं ॥ ४६ ॥

तत्पश्चात् गर्गमुनिको बुलाकर उनका अभिवादन तथा पूजन करके पुत्र - प्राप्तिकी कामनासे मैंने उनसे देवकीका दुःख बताकर कहा - हे भगवन्! हे दयासिन्धो! हे मुनिवर! आप यदुकुलके गुरु हैं, अतः मुझे आयुष्मान् पुत्रकी प्राप्तिका कोई उपाय बताइये । इसके अनन्तर दयानिधान गर्गजी प्रसन्न होकर मुझसे कहने लगे ॥ ४७-४८३ ॥ गर्गजी बोले - हे महाभाग वसुदेव! अब आप उस सर्वश्रेष्ठ साधनको सुनिये । जो भगवती दुर्गा अपने भक्तोंकी दुर्गतिका विनाश कर देती हैं, आप उन कल्याणकारिणी देवीकी आराधना कीजिये । इससे शीघ्र ही आपका कल्याण होगा; क्योंकि उनकी आराधनासे सभी लोगोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं । दुर्गाकी उपासना करनेवाले मनुष्योंके लिये संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ४ ९ -५१ ॥ गर्गमुनिके ऐसा कहने पर मैं प्रसन्न हो गया और अपनी पत्नीसहित मुनिश्रेष्ठ गर्गको परम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर मैंने उनसे कहा ॥ ५२ ॥

वसुदेवजी बोले - हे भगवन्! हे करुणासागर! गुरो! यदि आप मुझपर स्नेह रखते हैं तो मेरे कल्याणके निमित्त आप ही उन भगवती चण्डिकाकी

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अ ० २ ]

निरुद्धः कंसगेहेऽहं न किञ्चित् कर्तुमुत्सहे ।

अतस्त्वमेव दुःखाब्धेर्मामुद्धर महामते ॥

इत्युक्तस्तु मया प्रीतः प्रोवाच मुनिपुङ्गवः ।

वसुदेव तव प्रीत्या करिष्यामि हितं तव ॥

अथ गर्गमुनिः प्रीत्या मया सम्प्रार्थितोऽगमत् ।

आरिराधयिषुर्दुर्गां विन्ध्याद्रिं ब्राह्मणैः सह ॥

तत्र गत्वा जगद्धात्रीं भक्ताभीष्टप्रदायिनीम् ।

आराधयामास मुनिर्जपपाठपरायणः ॥

ततः समाप्ते नियमे वागुवाचाशरीरिणी ।

प्रसन्नाहं मुने कार्यसिद्धिस्तव भविष्यति ॥

भूभारहरणार्थाय मया सम्प्रेरितो हरिः ।

वसुदेवस्य देवक्यां स्वांशेनावतरिष्यति ॥

कंसभीत्या तमादाय बालमानकदुन्दुभिः ।

प्रापयिष्यति सद्यस्तु गोकुले नन्दवेश्मनि ॥

यशोदातनयां नीत्वा स्वगृहे कंसभूभुजे ।

दास्यत्यथ च तां हन्तुं कंस आक्षेप्स्यति क्षितौ ॥

सा तद्धस्ताद् विनिर्गत्य सद्य दिव्यवपुर्धरा ।

मदंशभूता विन्ध्याद्रौ करिष्यति जगद्धितम् ॥

इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रणम्य जगदम्बिकाम् ।

गर्गो मुनिः प्रसन्नात्मा मथुरामागमत् पुरीम् ॥

वरदानं महादेव्या गर्गाचार्यमुखादहम् ।

श्रुत्वा सभार्यः सम्प्रीतः परां मुदमथागमम् ॥

माहात्म्य ४३ आराधना कर दें । मैं तो कंसके घरमें बन्दी रहनेके ५४ कारण कुछ भी कर सकनेमें समर्थ नहीं हूँ । अतः हे महामते! अब आप ही इस दुःखसागरसे मेरा उद्धार कीजिये ॥ ५३-५४ ॥ मेरे इस प्रकार कहनेपर वे मुनिश्रेष्ठ प्रसन्न ५५ होकर बोले - हे वसुदेव! आपकी प्रीतिके कारण मैं आपका कल्याण करूँगा ॥५५ ॥

मेरे द्वारा प्रीतिपूर्वक प्रार्थना किये जानेके उपरान्त ५६ गर्गमुनि देवी दुर्गाकी आराधनाकी इच्छासे ब्राह्मणोंके साथ विन्ध्यपर्वतपर चले गये ॥ ५६ ॥

वहाँ जाकर जप एवं पाठमें तत्पर रहते हुए गर्गमुनि जगत्की मातृस्वरूपा और भक्तोंकी ५७ कामनाओंको पूर्ण करनेवाली भगवतीकी आराधना करने लगे ॥५७ ॥

जप - पूजनादि अनुष्ठानोंकी समाप्तिके पश्चात् ५८ आकाशवाणी हुई कि हे मुने! मैं प्रसन्न हो गयी हूँ, अतएव तुम्हारे कार्यकी सिद्धि होगी ॥ ५८ ॥

[ समस्त प्रकारके पाप एवं अनाचारस्वरूप ] ५ ९ पृथ्वीके भारका नाश करनेके लिये मुझसे प्रेरणा प्राप्तकर स्वयं भगवान् विष्णु अपने अंशसे वसुदेवकी भार्या देवकीके गर्भसे अवतार लेंगे ॥ ५ ९ ॥ कंसके भयसे वसुदेवजी उस शिशुको लेकर ६० शीघ्र ही गोकुलमें नन्दके घर पहुँचा देंगे और वहाँसे यशोदाकी कन्याको लाकर अपने घरमें राजा कंसको दे देंगे । तब कंस उस कन्याको मारनेके लिये उसे ६१ पृथ्वीपर पटक देगा ॥ ६०-६१ ॥ तदनन्तर उसके हाथसे छूटकर मेरी अंशस्वरूपा वह कन्या तत्क्षण अलौकिक रूप धारण करके ६२ विन्ध्यपर्वतपर चली जायगी और निरन्तर जगत्का कल्याण करेगी ॥ ६२ ॥

इस प्रकार उस आकाशवाणीको सुनकर गर्गमुनि भगवती जगदम्बाको प्रणाम करके प्रसन्न मनसे ६३ मथुरापुरी आ गये ॥ ६३ ॥

आचार्य गर्गके मुखसे महादेवीके वरदानकी बात सुनकर मैं पत्नीसहित अत्यन्त प्रसन्न हुआ और ६४ । परम आनन्दविभोर हो उठा ॥ ६४ ॥

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४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २

तदारभ्य परं जाने देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ।

अधुनापि हि देवर्षे श्रुतं तव मुखाम्बुजात् ॥

अतो भागवतं देव्यास्त्वमेव श्रावय प्रभो ।

मद्भाग्यादेव देवर्षे सम्प्राप्तोऽसि दयानिधे ॥

वसुदेववचः श्रुत्वा नारदः प्रीतमानसः ।

सुदिने शुभनक्षत्रे कथारम्भमथाकरोत् ॥

कथाविघ्नविघातार्थं द्विजा जेपुर्नवाक्षरम् ।

मार्कण्डेयपुराणोक्तं पेठुर्देव्याः स्तवं तथा ॥

प्रथमस्कन्धमारभ्य श्रीनारदमुखोद्गतम् ।

शुश्राव वसुदेवश्च भक्त्या भागवतामृतम् ॥

नवमेऽह्नि कथापूर्ती पुस्तकं वाचकं तथा ।

प्रसन्नः पूजयामास वसुदेवो महामनाः ॥

अथ तत्र बिलस्यान्तः कृष्णजाम्बवतोर्मृधे ।

कृष्णमुष्टिविनिष्पातश्लथाङ्गो जाम्बवानभूत् ॥

अथागतस्मृतिः सोऽपि भगवन्तं प्रणम्य च ।

उवाच परया भक्त्या स्वापराधं क्षमापयन् ॥

ज्ञातोऽसि रघुवर्यस्त्वं यद्रोषात् सरितांपतिः ।

क्षोभं जगाम लङ्का च रावणः सानुगो हतः ॥

स एवासि भवान् कृष्ण मद्दौरात्म्यं क्षमस्व भोः ।

ब्रूहि यत् करणीयं मे भृत्योऽहं तव सर्वथा ॥

श्रुत्वा जाम्बवतो वाचमब्रवीज्जगदीश्वरः ।

मणिहेतोरिह प्राप्ता वयमृक्षपते बिलम् ॥

तभीसे मैं देवीके अत्युत्तम माहात्म्यको जान रहा हूँ और हे देवर्षे! आज भी आपके मुखारविन्दसे मैंने ६५ वही देवीमाहात्म्य सुना है ॥ ६५ ॥

अतः हे प्रभो! अब आप ही मुझे श्रीमद्देवीभागवत सुनाइये । हे दयानिधान! मेरे सौभाग्यसे ही आप यहाँ ६६ । पधारे हुए हैं ॥ ६६ ॥

वसुदेवजीका वचन सुनकर प्रसन्न मनवाले नारदजीने शुभ दिन एवं शुभ नक्षत्रमें श्रीमद्देवीभागवतकी कथा आरम्भ की ॥ ६७ ॥

६७ कथामें आनेवाली विघ्न - बाधाओंके शमनार्थ ब्राह्मण देवीके नवाक्षर ( ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ) -मन्त्रका जप तथा मार्कण्डेयपुराणमें वर्णित ६८ देवीस्तोत्रका पाठ करने लगे ॥६८ ॥

प्रथम स्कन्धके आरम्भसे ही वसुदेवजी देवर्षि नारदके मुखसे निःसृत अमृतस्वरूप श्रीमद्देवीभागवत-६ ९ पुराणका भक्तिपूर्वक श्रवण करने लगे ॥६ ९ ॥ नौवें दिन कथाकी समाप्ति होनेपर महामनस्वी वसुदेवजीने श्रीमद्देवीभागवतग्रन्थ तथा कथावाचक दोनोंकी प्रसन्नतापूर्वक पूजा की ॥ ७० ॥

७० उधर कन्दरामें श्रीकृष्ण तथा जाम्बवान् के बीच चल रहे युद्धमें श्रीकृष्णके मुष्टिकाप्रहारोंसे जाम्बवान्‌का शरीर अत्यन्त शिथिल पड़ गया था ॥ ७१ ॥

७१ उसी समय जाम्बवान्‌को भी पूर्वकालकी घटनाएँ याद आ गयीं और भगवान् श्रीकृष्णको परम भक्तिके साथ प्रणाम करके अपने अपराधके लिये क्षमा-याचना करते हुए उसने श्रीकृष्णसे कहा- अब मुझे ७२ ज्ञात हो गया कि आप रघुश्रेष्ठ श्रीराम ही हैं, जिनके भयंकर कोपसे सागर तथा लंकानगरी - दोनों क्षुब्ध हो गये थे और रावण अपने बन्धु - बान्धवोंसहित मारा ७३ | गया था॥७२-७३ ॥ हे श्रीकृष्ण! वे राम आप ही हैं, अतः मेरी धृष्टताको क्षमा करें । मैं आपका सर्वथा सेवक हूँ, अतएव मेरेयोग्य जो भी कार्य हो, उसके लिये मुझे ७४ आदेश दीजिये ॥ ७४ ॥

जाम्बवान्का वचन सुनकर जगत्पति श्रीकृष्ण बोले - हे ऋक्षराज! मणि प्राप्त करनेके लिये हमलोग ७५ । इस कन्दरामें आये हुए हैं ॥ ७५ ॥

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अ ० ३ ]

ऋक्षराजस्ततः प्रीत्या कन्यां जाम्बवतीं निजाम् ।

ददौ कृष्णाय सम्पूज्य स्यमन्तकमणिं तथा ॥

स तां पत्नीं समादाय मणिं कण्ठे तथादधत् ।

अभिमन्त्र्यर्क्षराजञ्च प्रतस्थे द्वारकां प्रति ॥

कथासमाप्तिदिवसे वसुदेव उदारधीः ।

ब्राह्मणान् भोजयामास दक्षिणाभिरतोषयत् ॥

आशीर्वाचं प्रयुञ्जाना द्विजा यत्समये हरिः ।

आजगाम क्षणे तस्मिन् पल्या सह मणिं दधत् ॥

भार्यया सहितं कृष्णं वसुदेवपुरोगमाः ।

दृष्ट्वा हर्षाश्रुपूर्णाक्षाः समवापुः परां मुदम् ॥

देवर्षिर्नारदश्चाथ कृष्णागमनहर्षितः ।

आमन्त्र्य वसुदेवं च कृष्णं ब्रह्मसभां ययौ ॥

हरिचरितमिदं यत्कीर्तितं दुर्यशोघ्नं पठति विमलभक्त्या शुद्धचित्तः शृणोति । स भवति सुखपूर्णः सर्वदा सिद्धकामो जगति च वपुषोऽन्ते मुक्तिमार्गं लभेच्च ॥ माहात्म्य ४५ तत्पश्चात् ऋक्षराज जाम्बवान्ने श्रीकृष्णकी विधिवत् ७६ पूजा करके स्यमन्तकमणि तथा अपनी पुत्री जाम्बवती उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अर्पित कर दी ॥७६ ॥

श्रीकृष्णने जाम्बवतीको पत्नीके रूपमें अंगीकार करके मणिको गलेमें धारण कर लिया और ऋक्षराज ७७ जाम्बवान्से विदा लेकर वे द्वारकापुरीके लिये प्रस्थित हुए ॥ ७७ ॥

उधर द्वारकामें उदारहृदय श्रीवसुदेवजीने ७८ श्रीमद्देवीभागवतपुराण - कथाकी समाप्तिके दिन ब्राह्मणों को भोजन कराया तथा नानाविध दक्षिणाओंसे उन्हें सन्तुष्ट किया ॥ ७८ ॥

७ ९ जिस समय वे ब्राह्मण वसुदेवको आशीर्वचन प्रदान कर रहे थे, उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण मणि धारण किये हुए पत्नी जाम्बवतीके साथ वहाँ आ पहुँचे ॥ ७ ९ ॥ भार्यासहित भगवान् श्रीकृष्णको देखकर वसुदेवजी ८० तथा उपस्थित जनसमूहकी आँखें हर्षातिरेकके अश्रुसे परिपूर्ण हो गयीं और वे परम आनन्दित हुए ॥ ८० ॥

देवर्षि नारद भी श्रीकृष्णके आगमनसे हर्षित ८१ हुए और उन्होंने वसुदेवजी तथा श्रीकृष्णसे विदा लेकर ब्रह्मसभा के लिये प्रस्थान किया ॥ ८१ ॥

जो मनुष्य निष्कपट भक्ति एवं शुद्ध हृदयसे भगवान्‌ के इस विख्यात तथा कलंकनाशक चरित्रका पाठ एवं श्रवण करता है, वह पूर्ण सुखी हो जाता है, जगत्में उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा ८२ मृत्युके अनन्तर वह मोक्षपद प्राप्त करता है ॥८२ ॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये वसुदेवस्य देवीभागवतनवाह-श्रवणात्पुत्रप्राप्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुद्युम्नकी कथा सूत उवाच सूतजी बोले - हे मुनिवरो! अब आपलोग एक अथेतिहासमन्यच्च शृणुध्वं मुनिसत्तमाः । अन्य इतिहास सुनिये, जिसमें इस देवीभागवतके देवीभागवतस्यास्य माहात्म्यं यत्र गीयते ॥ १ माहात्म्यका वर्णन किया गया है ॥ १ ॥

एक बार कुम्भयोनि लोपामुद्रापति महर्षि अगस्त्यने एकदा कुम्भयोनिस्तु लोपामुद्रापतिर्मुनिः । कुमार कार्तिकेयके पास जाकर उनकी भलीभाँति पूजा गत्वा कुमारमभ्यर्च्य पप्रच्छ विविधाः कथाः ॥ २ करके उनसे विविध प्रकारकी बातें पूछीं ॥ २ ॥

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४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३

स तस्मै भगवान् स्कन्दः कथयामास भूरिशः ।

दानतीर्थव्रतादीनां माहात्म्योपचिताः कथाः ॥

वाराणस्याश्च माहात्म्यं मणिकर्णीभवं तथा ।

गङ्गायाश्चापि तीर्थानां वर्णितं बहुविस्तरम् ॥

श्रुत्वा स मुनिः प्रीतः कुमारं भूरिवर्चसम् ।

पुनः पप्रच्छ लोकानां हितार्थं कुम्भसम्भवः ॥

अगस्त्य उवाच

भगवंस्तारकाराते देवीभागवतस्य तु ।

माहात्म्यं श्रवणे तस्य विधिं चापि वद प्रभो ॥

देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम् ।

त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती ॥

स्कन्द उवाच

श्रीभागवतमाहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात् क्षमः ।

शृणु संक्षेपतो ब्रह्मन् कथयिष्यामि साम्प्रतम् ॥

या नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी जगदम्बिका ।

साक्षात् समाश्रिता यत्र भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥

अतस्तद्वाड्मयी मूर्तिर्देवीभागवते मुने ।

पठनाच्छ्रवणाद्यस्य न किञ्चिदिह दुर्लभम् ॥

आसीद्विवस्वतः पुत्रः श्राद्धदेव इति श्रुतः ।

सोऽनपत्योऽकरोदिष्टिं वसिष्ठानुमतो नृपः ॥

होतारं प्रार्थयामास श्रद्धाथ दयिता मनोः ।

कन्या भवतु मे ब्रह्मंस्तथोपायो विधीयताम् ॥

मनसा चिन्तयन् होता कन्यामेवाजुहोद्धविः ।

ततस्तद्व्यभिचारेण कन्येला नाम चाभवत् ॥

अथ राजा सुतां दृष्ट्वा प्रोवाच विमना गुरुम् ।

कथं सङ्कल्पवैषम्यमिह जातं प्रभो तव ॥

भगवान् कार्तिकेयने दान -तीर्थ - व्रतादिके माहात्म्यसे परिपूर्ण अनेक कथाओंका वर्णन उनसे किया । उन्होंने वाराणसी, मणिकर्णिका, गंगा तथा अनेक तीर्थोंके माहात्म्यका अत्यन्त विस्तारपूर्वक ४ वर्णन किया॥३-४ ॥ उसे सुनकर अगस्त्यमुनि परम प्रसन्न हुए और उन्होंने महातेजसम्पन्न कुमार कार्तिकेयसे लोक-५ कल्याणके लिये पुनः पूछा ॥५ ॥

अगस्त्यजी बोले- हे तारकरिपु! हे भगवन्! हे प्रभो! आप मुझे देवीभागवतके माहात्म्य तथा उसके श्रवणकी विधि भी बतायें ॥ ६ ॥

६ श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है ॥७ ॥

७ कार्तिकेय बोले – हे ब्रह्मन्! श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यको विस्तारपूर्वक कहनेमें कौन समर्थ है? मैं इस समय संक्षेपमें इसे कहूँगा, आप सुनिये ॥ ८ ॥

जो शाश्वती, सच्चिदानन्दस्वरूपा, भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली जगदम्बा हैं, वे स्वयं इस ८ पुराण में विराजमान रहती हैं॥९॥

अतएव हे मुने! यह श्रीमद्देवीभागवत उन ९ जगदम्बिकाकी वाड्मयी मूर्ति है, जिसके पठन एवं श्रवणसे इस लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ १० ॥

विवस्वान् के एक पुत्र हुए, जो श्राद्धदेव नामसे १० प्रसिद्ध थे । सन्तानरहित होनेके कारण उन राजा श्राद्धदेवने वसिष्ठमुनिकी अनुमतिसे पुत्रेष्टि यज्ञ किया ॥ ११ ॥

तत्पश्चात् मनु श्राद्धदेवकी भार्या श्रद्धाने यज्ञके ११ होतासे प्रार्थना की - हे ब्रह्मन्! आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे मुझे कन्याकी प्राप्ति हो ॥ १२ ॥

अतः होताने मनमें कन्या - प्राप्तिका संकल्प १२ करते हुए आहुति डाली और उसके विपरीत भावके फलस्वरूप एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम ' इला ' रखा गया ॥ १३ ॥

१३ इसके बाद पुत्रीको देखकर उदास मनवाले राजा श्राद्धदेवने गुरु वसिष्ठसे कहा- हे प्रभो! पुत्र-प्राप्तिके आपके संकल्पके विपरीत यह कन्या कैसे १४ । उत्पन्न हो गयी? ॥ १४ ॥

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अ ० ३ ] माहात्म्य ४७

तच्छ्रुत्वा स मुनिर्दध्यौ ज्ञात्वा होतुर्व्यतिक्रमम् ।

ईश्वरं शरणं यात इलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥

मुनेस्तप: प्रभावाच्च परेशानुग्रहात्तथा ।

पश्यतां सर्वलोकानामिला पुरुषतामगात् ॥

गुरुणा कृतसंस्कारः सुद्युम्नोऽथ मनोः सुतः ।

निधिर्बभूव विद्यानां सरितामिव सागरः ॥

अथ कालेन सुद्युम्नस्तारुण्यं समवाप्य च ।

मृगयार्थं वनं यातो हयमारुह्य सैन्धवम् ॥

वनाद् वनान्तरं गच्छन् बहु बभ्राम सानुगः ।

दैवादधस्ताद्धेमाद्रेः स कुमारो वनं ययौ ॥

कस्मिंश्चित् समये यत्र भार्ययापर्णया सह ।

अरमद्देवदेवस्तु शङ्करो भगवान् मुदा ॥

तदा तु मुनयस्तत्र शिवदर्शनलालसाः ।

आजग्मुरथ तान् दृष्ट्वा गिरिजा व्रीडिताभवत् ॥

रममाणौ तु तौ दृष्ट्वा गिरिशौ संशितव्रताः ।

निवृत्ता मुनयो जग्मुर्वैकुण्ठनिलयं तदा ॥

प्रियायाः प्रियमन्विच्छञ्छिवोऽरण्यं शशाप ह ।

अद्यारभ्य विशेद्यो ऽत्र पुमान् योषिद् भवेदिति ॥

तत आरभ्य तं देशं पुरुषा वर्जयन्ति हि ।

तत्र प्रविष्टः सुद्युम्नो बभूव प्रमदोत्तमा ॥

स्त्रीभूताननुगानश्वं वडवां वीक्ष्य विस्मितः ।

अथ सा सुन्दरी योषा विचचार वने वने ॥

यह सुनकर महर्षि वसिष्ठने ध्यान लगाया, इसमें १५ होताका व्यतिक्रम जानकर वे इलाको पुत्र बनानेकी कामनासे ईश्वरकी शरण में गये ॥ १५ ॥

मुनिके तपप्रभाव और भगवान्‌की कृपासे सभी लोगोंके देखते - देखते इला कन्यासे पुरुषरूपमें १६ परिवर्तित हो गयी ॥१६ ॥

इसके बाद गुरु वसिष्ठने पूर्णरूपसे संस्कार करके उसका नाम ' सुद्युम्न ' रखा । वे मनुपुत्र १७ सुद्युम्न सभी नदियोंके निधानभूत सागरकी भाँति सभी विद्याओंके निधान हो गये ॥ १७ ॥

कुछ समय बीतने पर सुद्युम्न युवा हुए और एक दिन सिन्धुदेशीय घोड़े पर चढ़कर वे आखेटके लिये १८ वनमें गये ॥१८ ॥

अपने सहचरोंके साथ वे कुमार सुद्युम्न एक वनसे दूसरे वनमें जाते हुए भटकते रहे और फिर १ ९ संयोगसे वे हिमालयकी तलहटीके उस वनमें पहुँच गये जहाँ किसी समय देवाधिदेव भगवान् शंकर अपनी भार्या अपर्णाके साथ आनन्दपूर्ण मुद्रामें रमण

२० कर रहे थे । १ ९ - २० ॥

उसी समय भगवान् शंकरके दर्शनकी अभिलाषासे मुनिगण वहाँ आ गये और उन्हें देखकर पार्वतीजी लज्जित हो गयीं ॥ २१ ॥

२१ तब शिव एवं पार्वतीको रमण करते देखकर उत्तम व्रत धारण करनेवाले वे मुनिगण वहाँसे लौटकर वैकुण्ठ - धाम की ओर चल दिये ॥ २२ ॥

२२ तदनन्तर अपनी प्रियतमाको प्रसन्न करनेके लिये भगवान्ने उस अरण्यको शाप दे दिया कि आजसे जो भी पुरुष यहाँ प्रवेश करेगा, वह स्त्री हो २३ जायगा ॥ २३ ॥

तभीसे पुरुषोंने उस वनमें जाना त्याग दिया था और संयोगवश वहाँ पहुँचते ही सुद्युम्न एक लावण्यमयी स्त्रीके रूपमें परिवर्तित हो गये ॥ २४ ॥

२४ अपने सभी अनुचरोंको पुरुषसे स्त्री तथा घोड़ोंको घोड़ियोंमें रूपान्तरित हुआ देखकर सुद्युम्न आश्चर्यचकित हो गये । अब वह रूपवती तरुणी २५ । वन वनमें विचरण करने लगी ॥२५ ॥

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४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ एकदा सा जगामाथ बुधस्याश्रमसन्निधौ दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं पीनोन्नतपयोधराम् बिम्बोष्ठीं कुन्ददशनां सुमुखीमुत्पलेक्षणाम् अनङ्गशरविद्धाङ्गश्चकमे भगवान् बुधः सापि तं चकमे सुभ्रूः कुमारं सोमनन्दनम् ततस्तस्याश्रमेऽवात्सीद्रममाणा बुधेन सा अथ कालेन कियता पुरूरवसमात्मजम् स तस्यां जनयामास मित्रावरुणसम्भव अथ वर्षेषु यातेषु कदाचित् सा बुधाश्रमे स्मृत्वा स्वं पूर्ववृत्तान्तं दुःखिता निर्जगाम ह गुरोरथाश्रमं गत्वा वसिष्ठस्य प्रणम्य तम् । निवेद्य वृत्तं शरणं ययौ पुंस्त्वमभीप्सती वसिष्ठो ज्ञातवृत्तान्तो गत्वा कैलासपर्वतम् सम्पूज्य शम्भुं तुष्टाव भक्त्या परमया युतः वसिष्ठ उवाच नमो नमः शिवायास्तु शङ्कराय कपर्दिने गिरिजार्धाङ्गदेहाय नमस्ते चन्द्रमौलये मृडाय सुखदात्रे ते नमः कैलासवासिने । नीलकण्ठाय भक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने

शिवाय शिवरूपाय प्रपन्नभयहारिणे ।

नमो वृषभवाहाय शरण्याय परात्मने ॥

ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाय सर्गस्थितिलयेषु च नमो देवाधिदेवाय वरदाय पुरारये

यज्ञरूपाय यजतां फलदात्रे नमो नमः ।

गङ्गाधराय सूर्येन्दुशिखिनेत्राय ते नमः ॥

। एक बार वह बुधके आश्रमके समीप पहुँची । ॥ २६ स्थूल तथा उन्नत स्तनोंवाली, बिम्ब - फलके समान लाल ओठोंवाली, कुन्दफूलके समान श्वेत दाँतोंवाली, । सुन्दर मुख तथा कमलके समान नयनोंवाली उस ॥ २७ सर्वांगसुन्दरी तरुणीको देखकर कामदेवके बाणोंसे बिंधे हुए अंगोंवाले भगवान् बुध उसपर मोहित हो । गये ॥ २६-२७ ॥ ॥ २८ वह सुन्दर भौंहोंवाली युवती भी चन्द्रपुत्र कुमार बुधपर आसक्त हो गयी और बुधके साथ रमण करती । हुई उनके आश्रम में रहने लगी ॥ २८ ॥

॥ २ ९ हे महर्षि अगस्त्य! कुछ समय बाद बुधने उस तरुणीसे पुरूरवा नामक पुत्रको उत्पन्न किया ॥ २ ९ ॥ । इस प्रकार बुधके आश्रममें रहते हुए कई वर्ष ॥ ३० बीत जानेपर किसी समय उसे अपने पूर्व वृत्तान्तका स्मरण हो आया और वह दुःखित होकर आश्रमसे चली गयी ॥ ३० ॥

॥ ३१ इसके बाद गुरु वसिष्ठके आश्रममें पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया और सारा वृत्तान्त कहकर पुरुषत्वकी । कामना करती हुई वह उनके शरणागत हो गयी ॥ ३१ ॥

॥ ३२ इस प्रकार सभी बातोंको जानकर वसिष्ठजी कैलास - पर्वतपर जाकर विधि - विधान से भगवान् शंकरकी पूजा करके परम भक्तिसे उनकी स्तुति । करने लगे ॥३२ ॥

॥ ३३ वसिष्ठजी बोले- शिव, शंकर, कपर्दी, गिरिजाके अर्धांग एवं चन्द्रमौलिको बार - बार नमस्कार है ॥ ३३ ॥

मृड, सुखदाता, कैलासवासी, नीलकण्ठ, भक्तोंको ॥ ३४ भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३४ ॥

शिव, शिवस्वरूप, शरणागतभयहारी, वृषभवाहन, ३५ शरणदाता परमात्माको नमस्कार है ॥ ३५ ॥

सृजन, पालन तथा संहारके समय ब्रह्मा, । विष्णु तथा महेशरूपधारी, देवाधिदेव, वरदायक तथा ॥ ३६ । त्रिपुरारिको मेरा नमस्कार है ॥३६ ॥

यज्ञरूप तथा याजकोंके फलदाताको बार - बार नमस्कार है । आप गंगाधर, सूर्य - चन्द्र- अग्निस्वरूप ३७ त्रिनेत्रको मेरा नमस्कार है ॥३७ ॥

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अ ० ३ ] माहात्म्य ४ ९

एवं स्तुतः स भगवान् प्रादुरासीज्जगत्पतिः ।

वृषारूढोऽम्बिकोपेतः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥

रजताचलसंकाशस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखरः प्रणतं परितुष्टात्मा प्रोवाच मुनिसत्तमम् ॥ श्रीभगवानुवाच

वरं वरय विप्रर्षे यत्ते मनसि वर्तते ।

इत्युक्तस्तं प्रणम्येलापुंस्त्वमभ्यर्थयन्मुनिः ॥

अथ प्रसन्नो भगवानुवाच मुनिसत्तमम् ।

मासं पुमान् स भविता मासं नारी भविष्यति ॥

इति प्राप्य वरं शम्भोर्महर्षिर्जगदम्बिकाम् ।

वरदानोन्मुखीं देवीं प्रणनाम महेश्वरीम् ॥

कोटिचन्द्रकलाकान्तिं सुस्मितां परिपूज्य च ।

तुष्टाव भक्त्या सततमिलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥

जय देवि महादेवि भक्तानुग्रहकारिणि ।

जय सर्वसुराराध्ये जयानन्तगुणालये ॥

नमो नमस्ते देवेशि शरणागतवत्सले ।

जय दुर्गे दुःखहन्त्रि दुष्टदैत्यनिषूदिनि ॥

भक्तिगम्ये महामाये नमस्ते जगदम्बिके ।

संसारसागरोत्तारपोतीभूतपदाम्बुजे ॥

ब्रह्मादयोऽपि विबुधास्त्वत्पादाम्बुजसेवया ।

विश्वसर्गस्थितिलयप्रभुत्वं समवाप्नुयुः ॥

प्रसन्ना भव देवेशि चतुर्वर्गप्रदायिनि ।

कस्त्वां स्तोतुं क्षमो देवि केवलं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥

इस प्रकार मुनि वसिष्ठके द्वारा स्तुति किये ३८ जानेपर करोड़ों सूर्यसदृश प्रभासे युक्त एवं भगवती पार्वती के साथ नन्दीपर आरूढ़ वे जगत्पति भगवान् शंकर प्रकट हो गये ॥ ३८ ॥

चाँदीके पर्वतके समान प्रभावाले, त्रिनेत्रधारी ३ ९ भगवान् चन्द्रशेखर शरणमें आये हुए मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले ॥ ३ ९ ॥ श्रीभगवान्ने कहा – - हे विप्रर्षे! आपके मनमें जो भी इच्छा हो, वह वर माँगिये । उनके इस प्रकार कहने पर गुरु वसिष्ठने प्रणाम करके इलाकी पुरुषत्वप्राप्तिके ४० लिये उनसे प्रार्थना की ॥ ४० ॥

इसके बाद प्रसन्न होकर शंकरजीने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे कहा कि एक मासतक वह पुरुषरूपमें तथा ४१ एक मासतक नारीरूपमें रहेगी ॥४१ ॥

इस प्रकार शिवजीसे वर प्राप्त करके महर्षि वसिष्ठने वर प्रदान करनेके लिये सदा उत्सुक रहनेवाली जगदम्बिका पार्वतीको प्रणाम किया ॥ ४२ ॥

४२ करोड़ों चन्द्रमाकी कला - कान्तिसे युक्त तथा सुन्दर मुसकानवाली भगवतीकी सम्यक् पूजा करके सदाके लिये इलाकी पुरुषत्वप्राप्तिकी कामनासे ४३ वसिष्ठजी श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४३ ॥

हे देवि! हे महादेवि! हे भक्तोंपर कृपा करनेवाली भगवति! आपकी जय हो । हे समस्त ४४ देवोंकी आराध्यस्वरूपा और अनन्त गुणोंकी आगार! आपकी जय हो ॥ ४४ ॥

हे देवेश्वरि! हे शरणागतवत्सले! आपको बार-बार नमस्कार है । हे दुःखहारिणि! हे दुष्ट दानवोंका ४५ नाश करनेवाली भगवति! आपकी जय हो ॥४५ ॥

हे भक्तिसे प्राप्त होनेवाली भगवति! हे महामाये! हे जगदम्बिके! हे भवसागरसे पार उतारनेके लिये नौका-४६ स्वरूप चरणकमलवाली! आपको नमस्कार है ॥ ४६ ॥

आपके चरणकमलोंकी सेवासे ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि देवता विश्वके सृजन, पालन तथा संहारहेतु सामर्थ्य प्राप्त करते हैं ॥४७ ॥

४७ पुरुषार्थचतुष्टय ( धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष ) प्रदान करनेवाली हे देवेश्वरि! आप प्रसन्न हों । हे देवि! आपकी स्तुति करनेमें भला कौन समर्थ है, ४८ अतः मैं आपको केवल प्रणाम कर रहा हूँ ॥ ४८ ॥

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५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३

एवं स्तुता भगवती दुर्गा नारायणी परा ।

भक्त्या वसिष्ठमुनिना प्रसन्ना तत्क्षणादभूत् ॥

तदोवाच महादेवी प्रणतार्तिहरी मुनिम् ।

सुद्युम्नभवनं गत्वा कुरु भक्त्या मदर्चनम् ॥

सुद्युम्नं श्रावय प्रीत्या पुराणं मत्प्रियङ्करम् ।

देवीभागवतं नाम नवाहोभिर्द्विजोत्तम ॥

श्रवणादेव सततं पुंस्त्वमस्य भविष्यति ।

इत्युक्त्वा च तिरोधानं गच्छतः स्म शिवेश्वरौ ॥

वसिष्ठस्तां दिशं नत्वा समागत्याश्रमं निजम् ।

समाहूय च सुद्युम्नं देव्याराधनमादिशत् ॥

आश्विनस्य सिते पक्षे सम्पूज्य जगदम्बिकाम् ।

नवरात्रविधानेन श्रावयामास भूपतिम् ॥

श्रुत्वा भक्त्यापि सुद्युम्नः श्रीमद्भागवतामृतम् ।

प्रणम्याभ्यर्च्य च गुरुं लेभे पुंस्त्वं निरन्तरम् ॥

राज्यासनेऽभिषिक्तस्तु वसिष्ठेन महर्षिणा ।

भुवं शशास धर्मेण प्रजाश्चैवानुरञ्जयन् ॥

ईजे च विविधैर्यज्ञैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः ।

पुत्रेषु राज्यं सन्दिश्य प्राप देव्याः सलोकताम् ॥

इति कथितमशेषं सेतिहासं च विप्रा यदि पठति सुभक्त्या मानवो वा शृणोति । स इह सकलकामान् प्राप्य देव्याः प्रसादात् परममृतमथान्ते याति देव्या: सलोकम् महर्षि वसिष्ठजीद्वारा इस प्रकार भक्ति - भावसे ४ ९ स्तुति किये जानेपर नारायणी पराम्बा दुर्गा भगवती तत्काल प्रसन्न हो गयीं ॥ ४ ९ ॥ तदनन्तर भक्तजनोंका दुःख दूर करनेवाली महादेवीने मुनि वसिष्ठसे कहा - हे मुनिश्रेष्ठ! आप सुद्युम्नके ५० घर जाकर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करें ॥५० ॥

द्विजश्रेष्ठ! सुद्युम्नको नौ दिनोंमें मुझे प्रसन्नता प्रदान करनेवाले श्रीमद्देवीभागवतपुराणका प्रेमपूर्वक ५१ श्रवण कराइये ॥ ५१ ॥

उसके श्रवणमात्रसे उसे सर्वदाके लिये पुरुषत्वकी प्राप्ति हो जायगी । ऐसा कहकर भगवती पार्वती तथा ५२ भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये ॥५२ ॥

इसके पश्चात् वसिष्ठजी उस दिशाको नमस्कारकर अपने आश्रमको लौट आये और सुद्युम्नको बुलाकर उन्होंने देवीकी आराधना करनेके लिये उन्हें आदेश ५३ दिया ॥ ५३ ॥

आश्विनमासके शुक्लपक्षमें जगदम्बाकी विधिवत् पूजा करके वसिष्ठजीने राजाको नवरात्र - विधानके ५४ अनुसार श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनाया ॥५४ ॥

इस प्रकार अमृतस्वरूप श्रीमद्देवीभागवतपुराणको भक्तिपूर्वक सुनकर और गुरु वसिष्ठका पूजन - वन्दन ५५ करके सुद्युम्नने सदाके लिये पुरुषत्व प्राप्त कर लिया ॥ ५५ ॥

महर्षि वसिष्ठने सुद्युम्नका राज्याभिषेक किया और वे प्रजाओंको प्रसन्न रखते हुए धर्मपूर्वक ५६ भूमण्डलपर शासन करने लगे ॥५६ ॥

सुद्युम्नने अत्यन्त श्रेष्ठ दक्षिणावाले भाँति-भाँतिके यज्ञ किये और अन्तमें पुत्रोंको राज्यका शासन ५७ सौंपकर वे देवीलोकको प्राप्त हुए ॥ ५७ ॥

हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंको इतिहाससहित देवीमाहात्म्य बता दिया । यदि कोई मनुष्य सद्भक्तिके साथ इसे पढ़ता अथवा सुनता है तो वह देवीकी कृपासे इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करके अन्तमें देवीके परम सत्यस्वरूप सालोक्यको ॥ ५८ । प्राप्त कर लेता है ॥५८ ॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवतनवाहश्रवणादिलायाः पुंस्त्वप्राप्तिवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

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अ ० ४ ] माहात्म्य ५१ अथ चतुर्थोऽध्यायः श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें तथा श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे सूत उवाच

इति श्रुत्वा कथां दिव्यां विचित्रां कुम्भसम्भवः ।

शुश्रूषुः पुनराहेदं विशाखं विनयान्वितः ॥

अगस्त्य उवाच

देवसेनापते देव विचित्रेयं श्रुता कथा ।

पुनरन्यच्च माहात्म्यं वद भागवतस्य मे ॥

स्कन्द उवाच

मित्रावरुणसम्भूत मुने शृणु कथामिमाम् ।

यत्रैकदेशमहिमा प्रोक्तो भागवतस्य तु ॥

वर्ण्यते धर्मविस्तारो गायत्रीमधिकृत्य च ।

गायत्र्या महिमा यत्र तद् भागवतमिष्यते ॥

भगवत्या इदं यस्मात्तस्माद् भागवतं विदुः ।

ब्रह्मविष्णुशिवाराध्या परा भगवती हि सा ॥

ऋतवागिति विख्यातो मुनिरासीन्महामतिः ।

तस्य पुत्रोऽभवत्काले गण्डान्ते पौष्णभान्तिमे ॥

स तस्य जातकर्मादिक्रियाश्चक्रे यथाविधि ।

चूडोपनयनादींश्च संस्कारानपि सोऽकरोत् ॥

यत आरभ्य जातोऽसौ पुत्रस्तस्य महात्मनः ।

तत एवाथ स मुनिः शोकरोगाकुलोऽभवत् ॥

रोषलोभपरीतात्मा तथा मातापि तस्य च ।

बहुरोगार्दिता नित्यं शुचा दुःखीकृता भृशम् ॥

ऋतवाक् स मुनिश्चिन्तामवाप भृशदुःखितः ।

किमेतत् कारणं जातं पुत्रो मेऽत्यन्तदुर्मतिः ॥

कस्यचिन्मुनिपुत्रस्य बलात् पत्नीं जहार च ।

मेने शिक्षां पितुर्नासौ न च मातुर्विमूढधीः ॥

रेवती नक्षत्रके पतन और पुनः स्थापनकी कथा राजा दुर्दमको मन्वन्तराधिप - पुत्रकी प्राप्ति सूतजी बोले- इस अलौकिक एवं विचित्र कथाको सुनकर पुनः सुननेकी इच्छावाले अगस्त्यजीने बड़ी १ विनम्रतापूर्वक भगवान् कार्तिकेयसे कहा- ॥१ ॥

अगस्त्यजी बोले - – हे देवसेनापते! हे देव! मैंने यह विचित्र कथा सुन ली, अब आप श्रीमद्देवीभागवतका दूसरा माहात्म्य मुझे बतायें ॥ २ ॥

कार्तिकेयजी बोले – हे मित्रावरुणसे प्रकट २ होनेवाले मुने! अब आप यह कथा सुनें, जिसके एक अंशमें भागवतकी महिमा कही गयी हो, धर्मका विशद वर्णन किया गया हो और गायत्रीका प्रसंग आरम्भ करके उसकी महिमा दर्शायी गयी हो, उसे ३ भागवतके रूपमें जाना जाता है ॥ ३-४ ॥ यह पुराण देवी भगवतीके माहात्म्यसे परिपूर्ण ४ होनेके कारण देवीभागवत कहा जाता है । वे परा भगवती ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी आराध्या हैं ॥ ५ ॥

ऋतवाक् नामसे विख्यात एक महान् बुद्धिसम्पन्न ५ मुनि थे । रेवती नक्षत्रके अन्तिम भाग गण्डान्तयोगमें उनके यहाँ समयानुसार एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥

उन्होंने उस पुत्रकी जातकर्म आदि क्रियाएँ ६ तथा चूडाकरण एवं उपनयन आदि संस्कार भी विधिपूर्वक सम्पन्न किये ॥७ ॥

७ महात्मा ऋतवाक्के यहाँ जबसे वह पुत्र उत्पन्न हुआ, उसी समयसे वे शोक तथा रोगसे ग्रस्त रहने लगे और क्रोध एवं लोभने उन्हें घेर लिया । उस ८ बालककी माता भी अनेक रोगोंसे ग्रसित होकर नित्य शोकाकुल और अति दुःखी रहने लगीं ॥ ८ - ९ ॥ मुनि ऋतवाक् अत्यन्त दु: खी और चिन्तित ९ होकर सोचने लगे कि ऐसा क्या कारण है कि मेरे यह अत्यन्त दुर्मति पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥

१० [ तरुणावस्थाको प्राप्त होनेपर ] उसने किसी मुनिपुत्रकी पत्नीका बलपूर्वक हरण कर लिया । वह दुर्बुद्धि अपने माता- पिताकी शिक्षाओंपर कभी भी ११ । ध्यान नहीं देता था ॥११ ॥