देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 61–70
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70
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५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४
ततो विषण्णचित्तस्तु ऋतवागब्रवीदिदम् ।
अपुत्रता वरं नृणां न कदाचित् कुपुत्रता ॥
पितॄन् कुपुत्रः स्वर्यातान्निरये पातयत्यपि ।
यावज्जीवेत् सदा पित्रोः केवलं दुःखदायकः ॥
पित्रोर्दुःख
दुःखाय धिग्जन्म कुपुत्रस्य च पापिनः ।
सुहृदां नोपकाराय नापकाराय वैरिणाम् ॥
धन्यास्ते मानवा लोके सुपुत्रो यद्गृहे स्थितः ।
परोपकारशीलश्च पितुर्मातुः सुखावहः ॥
कुपुत्रेण कुलं नष्टं कुपुत्रेण हतं यशः ।
कुपुत्रेणेह चामुत्र दुःखं निरययातनाः ॥
कुपुत्रेणान्वयो नष्टो जन्म नष्टं कुभार्यया ।
कुभोजनेन दिवसः कुमित्रेण सुखं कुतः ॥
स्कन्द उवाच
एवं दुष्टस्य पुत्रस्य दुष्टैराचरणैर्मुनिः ।
तप्यमानोऽनिशं काले गत्वा गर्गमपृच्छत ॥
ऋतवागुवाच
भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छामि वद तत् प्रभो ।
ज्योतिश्शास्त्रस्य चाचार्य पुत्रदौः शील्यकारणम् ॥
गुरुशुश्रूषया वेदा अधीता विधिवन्मया ।
ब्रह्मचारिव्रतं तीर्त्वा विवाहो विधिवत् कृतः ॥
भार्यया सह गार्हस्थ्यधर्मश्चानुष्ठितोऽनिशम् ।
पञ्चयज्ञविधानं च मयाकारि यथाविधि ॥
नरकाद् बिभ्यता विप्र न तु कामसुखेच्छया ।
गर्भाधानं च विधिवत् पुत्रप्राप्त्यै मया कृतम् ॥
तदनन्तर अत्यन्त दुःखित मनवाले ऋतवाक्ने यह १२ कहा कि मनुष्योंके लिये पुत्रहीन रह जाना अच्छा है, किंतु कुपुत्रकी प्राप्ति कभी भी ठीक नहीं है ॥ १२ ॥
कुपुत्र स्वर्गमें गये हुए पितरोंको भी नरकमें गिरा देता है । वह जबतक जीवित रहता है, तबतक १३ माता - पिताको केवल कष्ट ही देता रहता है ॥१३ ॥
अतएव माता - पिताको कष्ट पहुँचानेवाले पापी कुपुत्रके जन्मको धिक्कार है । ऐसा पुत्र मित्रोंका न १४ तो उपकार कर सकता है और न शत्रुओंका अपकार ही ॥१४ ॥
संसारमें वे मानव धन्य हैं, जिनके घरमें १५ परोपकारपरायण तथा माता - पिताको सुख देनेवाला पुत्र हुआ करता ॥ १५ ॥
कुपुत्रसे कुल नष्ट हो जाता है, कुपुत्रसे यश १६ नष्ट हो जाता है और कुपुत्रसे लौकिक तथा पारलौकिक — दोनों जगत् में दुःख तथा नारकीय यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं ॥ १६ ॥
कुपुत्रसे वंश नष्ट हो जाता है, दुष्ट पत्नीसे १७ जीवन नष्ट हो जाता है, विकृत भोजनसे दिन व्यर्थ चला जाता है और दुरात्मा मित्रसे सुख कहाँसे मिल सकता है! ॥१७ ॥
कार्तिकेयजी बोले - [ हे अगस्त्यजी! ] अपने १८ दुष्ट पुत्रके दुराचरणोंसे निरन्तर सन्तप्त रहते हुए मुनि ऋतवाने किसी दिन गर्गऋषिके पास जाकर पूछा- ॥ १८ ॥
ऋतवाक् बोले – हे भगवन्! हे ज्योतिषशास्त्रके १ ९ आचार्य! मैं आपसे अपने पुत्रकी दुःशीलताका कारण
पूछना चाहता हूँ । हे प्रभो! आप उसे बतायें ॥ १ ९ ॥
गुरुकी निरन्तर सेवा करते हुए मैंने विधिपूर्वक वेदाध्ययन किया और ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके विधि-२० विधानके साथ विवाह किया ॥ २० ॥
अपनी भार्याके साथ मैंने गृहस्थधर्मका सदैव यथोचित पालन किया और विधिपूर्वक पंचयज्ञका २१ अनुष्ठान किया ॥ २१ ॥
हे विप्र! नरकप्राप्तिके भयसे बचनेके लिये पुत्र प्राप्त करनेकी कामनासे मैंने विधिवत् गर्भाधान किया २२ । था न कि वासनात्मक सुखप्राप्तिकी इच्छासे ॥ २२ ॥
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अ ० ४ ]
पुत्रोऽयं मम दोषेण मातुर्दोषेण वा मुने ।
जातो दुःखावहः पित्रोर्दुःशीलो बन्धुशोकदः ॥
एतन्निशम्य वचनं गर्गाचार्यो मुनेस्तदा ।
विचार्य सर्वं तद्धेतुं ज्योतिर्विद्वाचमब्रवीत् ॥
गर्ग उवाच
मुने नैवापराधस्ते न मातुर्न कुलस्य च ।
रेवत्यन्तं तु गण्डान्तं पुत्रदौ: शील्यकारणम् ॥
दुष्टे काले यतो जन्म पुत्रस्य तव भो मुने ।
तेनैव तव दुःखाय नान्यो हेतुर्मनागपि ॥
तद्दुःखशान्तये ब्रह्मञ्जगतां मातरं शिवाम् ।
समाराधय यत्नेन दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम् ॥
गर्गस्य वचनं श्रुत्वा ऋतवाक् क्रोधमूर्च्छितः ।
रेवतीं तु शशापासौ व्योम्नः पततु रेवती ॥
दत्ते शापे तु तेनाथ पूष्णो भञ्च पपात खात् ।
कुमुदाद्रौ भासमानं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥
ख्यातो रैवतकश्चाभूत्तत्पातात् कुमुदाचलः ।
अतीव रमणीयश्च ततः प्रभृति सोऽप्यभूत् ॥
दत्त्वा शापं च रेवत्यै गर्वोक्तविधिना मुनिः ।
समाराध्याम्बिकां देवीं सुखसौभाग्यभागभूत् ॥
स्कन्द उवाच
रेवत्यृक्षस्य यत् तेजस्तस्माज्जाता तु कन्यका ।
रूपेणाप्रतिमा लोके द्वितीया श्रीरिवाभवत् ॥
अथ तां प्रमुचः कन्यां रेवतीकान्तिसम्भवाम् ।
दृष्ट्वा नाम चकारास्या रेवतीति मुदा मुनिः ॥
माहात्म्य ५३ हे मुने! दुःखदायी, माता - पिताके प्रति उद्दण्ड २३ तथा बन्धु - बान्धवोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह पुत्र मेरे दोषसे अथवा अपनी माताके दोषसे उत्पन्न हुआ? ॥ २३ ॥
तब ज्योतिषशास्त्र के ज्ञाता गर्गाचार्यने मुनि २४ ऋतवाक्का यह वचन सुनकर सभी कारणोंपर सम्यक् रूपसे विचार करके कहा ॥ २४ ॥
गर्गाचार्यजी बोले- हे मुने! इसमें न तो आपका दोष है, न बालककी माताका दोष है और न तो कुलका २५ दोष है । रेवती नक्षत्रका अन्तिम भाग - - गण्डान्तयोग ही इस बालककी दुर्विनीतताका कारण है ॥ २५ ॥
मुने! अशुभ वेला आपके पुत्रका जन्म हुआ २६ है, इसी कारण यह आपको दुःख दे रहा है; इसमें लेशमात्र भी अन्य कोई कारण नहीं है ॥ २६ ॥
अतः हे ब्रह्मन्! इस दुःखके शमनके लिये आप प्रयत्नपूर्वक समस्त दुर्गतियोंका विनाश करनेवाली २७ कल्याणी जगदम्बा दुर्गाकी आराधना कीजिये ॥ २७ ॥
गर्गाचार्यजीका वचन सुनकर ऋतवाक्मुनि क्रोधमूर्च्छित हो गये और उन्होंने रेवतीको शाप दे २८ दिया कि वह आकाशसे नीचे गिर जाय ॥२८ ॥
ऋतवाक्के शाप देते ही चमकता हुआ रेवती नक्षत्र सभी लोगोंके देखते - देखते आकाशसे कुमुदपर्वत पर २ ९ जा गिरा ॥२ ९ ॥ वह कुमुदपर्वत रेवतीके गिरनेके कारण रैवतक नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसी समयसे वह अत्यन्त ३० रमणीक हो गया ॥ ३० ॥
रेवतीको शाप देकर गद्वारा बताये गये विधानके ३१ सम्यक् आराधनाकर सुख किया ॥ ३१ ॥
कार्तिकेयजी बोले- -रेवती नक्षत्रके महान् तेजसे मुनि ऋतवाक्ने महर्षि अनुसार देवी भगवतीक और सौभाग्य प्राप्त [ हे अगस्त्यजी! ] उस एक कन्या उत्पन्न हुई, जो अनुपम रूपवती होनेके कारण लोकमें दूसरी ३२ लक्ष्मीकी भाँति प्रतीत हो रही थी ॥३२ ॥
रेवती नक्षत्रकी कान्तिसे प्रादुर्भूत उस कन्याको
देखकर मुनि प्रमुचने प्रसन्न होकर उसका ' रेवती'-३३ । यह नाम रख दिया ॥ ३३ ॥
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५४
निन्येऽथ स्वाश्रमे चैनां पोषयामास धर्मतः ।
ब्रह्मर्षिः प्रमुचो नाम कुमुदाद्रौ सुतामिव ॥
अथ कालेन च प्रौढां दृष्ट्वा तां रूपशालिनीम् ।
स मुनिश्चिन्तयामास कोऽस्या योग्यो वरो भवेत् ॥
बहुधान्वेषयंस्तस्या नाससादोचितं पतिम् ।
ततोऽग्निशालां संविश्य मुनिस्तुष्टाव पावकम् ॥
कन्यावरं तदाशंसत्प्रीतस्तमपि हव्यवाट् । धर्मिष्ठो बलवान् वीरः प्रियवागपराजितः दुर्दमो भविता भर्ता मुनेऽस्याः पृथिवीपतिः । इति श्रुत्वा वचो वह्नेः प्रसन्नोऽभून्मुनिस्तदा दैवादाखेटकव्याजात् तत्क्षणादागतो नृपः दुर्दमो नाम मेधावी तस्याश्रमपदं मुनेः पुत्रो विक्रमशीलस्य बलवान् वीर्यवत्तरः । कालिन्दीजठरे जातः प्रियव्रतकुलोद्भवः मुनेराश्रममाविश्य तमदृष्ट्वा महामुनिम् । आमन्त्र्य तां प्रिये चेति रेवतीं पृष्टवान् नृपः राजोवाच महर्षिर्भगवानस्मादाश्रमात् क्व गतः प्रिये तत्पादौ द्रष्टुमिच्छामि वद कल्याणि तत्त्वतः कन्योवाच अग्निशालामुपगतो महाराज महामुनिः निश्चक्रामाश्रमात् तूर्णं राजाप्याकर्ण्य तद्वचः अथाग्निशालाद्वारस्थं राजानं दुर्दमं मुनिः राजलक्षणसंयुक्तमपश्यत् प्रश्रयानतम् प्रणनाम च तं राजा मुनिः शिष्यमुवाच ह गौतमानीयतामर्घ्यमर्घ्ययोग्योऽस्ति भूपतिः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ तदनन्तर ब्रह्मर्षि प्रमुच उसे कुमुदाचलपर स्थित ३४ अपने आश्रममें ले आये और पुत्रीकी भाँति उसका धर्मपूर्वक पालन - पोषण करने लगे ॥३४ ॥
समय पाकर यौवनको प्राप्त उस रूपवती कन्याको ३५ देखकर मुनिने विचार किया कि इस कन्याके योग्य
वर कौन होगा? ॥। ३५ ॥
बहुत अन्वेषणके बाद भी जब मुनिको उसके ३६ योग्य कोई वर नहीं मिला, तब वे अग्निशालामें प्रवेश करके अग्निदेवकी स्तुति करने लगे ॥ ३६ ॥
प्रमुचऋषिके स्तुति - गानसे प्रसन्न होकर ॥ ३७ अग्निदेवने कन्याके योग्य वरका संकेत करते हुए कहा - हे मुने! इस कन्याके पति धर्मपरायण, बलशाली, वीर, प्रिय भाषण करनेवाले और अपराजेय राजा दुर्दम ॥ ३८ होंगे । तब अग्निदेवके इस वचनको सुनकर मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ ३७-३८ ॥ । संयोगसे उसी समय आखेटके बहाने दुर्दम ॥ ३ ९ नामक प्रतिभाशाली राजा मुनि प्रमुचके आश्रममें आ गये ॥ ३ ९ ॥ बलवान् तथा अप्रतिम ओजसे सम्पन्न वे ॥ ४० प्रियव्रतके वंशज राजा दुर्दम विक्रमशीलके पुत्र थे और कालिन्दीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ॥ ४० ॥
मुनिके आश्रम में प्रवेशकर और उन्हें वहाँ न ॥ ४१ देखकर राजा दुर्दमने रेवतीको ' प्रिये ' - इस शब्दसे सम्बोधित करके पूछा ॥ ४१ ॥
राजा बोले – हे प्रिये! महर्षि भगवान् प्रमुच । इस आश्रमसे कहाँ गये हुए हैं? हे कल्याणि! मुझे ॥ ४२ सच - सच बताओ; मैं उनके चरणोंका दर्शन करना चाहता हूँ ॥४२ ॥
कन्या बोली - हे महाराज! महामुनि अग्निशालामें । गये हुए हैं । राजा भी यह वचन सुनकर शीघ्रतापूर्वक ॥ ४३ आश्रम से बाहर निकल आये ॥ ४३ ॥।
इसके बाद प्रमुचमुनिने राजलक्षणसम्पन्न एवं । विनयावनत राजा दुर्दमको अग्निशालाके द्वारपर ॥ ४४ स्थित देखा ॥ ४४ ॥
मुनिको देखकर राजाने प्रणाम किया और । तदनन्तर मुनि प्रमुचने शिष्यसे कहा - हे गौतम! ये ॥ ४५ । राजा अर्घ्य पानेके योग्य हैं, अतः शीघ्र ही इनके लिये
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अ ० ४ ] माहात्म्य ५५
आगतश्चिरकालेन जामातेति विशेषतः ।
इत्युक्त्वार्घ्यं ददौ तस्मै सोऽपि जग्राह चिन्तयन् ॥
मुनिरासनमासीनं गृहीतार्घ्यं च भूपतिम् ।
आशीर्भिरभिनन्द्याथ कुशलं चाप्यपृच्छत ॥
अपि तेऽनामयं राजन् बले कोशे सुहृत्सु च ।
भृत्येऽमात्ये पुरे देशे तथात्मनि जनाधिप ॥
भार्यास्ति ते कुशलिनी यतः सात्रैव तिष्ठति ।
अतो न पृच्छाम्यस्यास्ते चान्यासां कुशलं वद ॥
राजोवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादेन सर्वत्रानामयं मम ।
एतत् कुतूहलं ब्रह्मन् मद्भार्या कात्र विद्यते ॥
ऋषिरुवाच
रेवती नाम ते भार्या रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
विद्यतेऽत्र कथं पत्नीं तां न वेत्सि महीपते ॥
राजोवाच
सुभद्राद्यास्तु या भार्या मम सन्ति गृहे विभो ।
जानामि तास्तु भगवन् नैव जानामि रेवतीम् ॥
ऋषिरुवाच
प्रियेति साम्प्रतं राजंस्त्वयोक्ता या महामते ।
सा विस्मृता क्षणादेव या ते श्लाघ्यतमा प्रिया ॥
राजोवाच
त्वयोक्तं यन्मृषा तन्नो तथैवामन्त्रिता मया ।
मुने दुष्टो न मे भावः कोपं मा कर्तुमर्हसि ॥
ऋषिरुवाच
राजन्नुक्तं त्वया सत्यं न भावो दूषितस्तव ।
वह्निना प्रेरितेनेत्थं भवता व्याहृतं वचः ॥
अद्य पृष्टो मया वह्निः कोऽस्या भर्ता भविष्यति ।
तेनोक्तं दुर्दमो राजा भवितास्याः पतिर्ध्रुवम् ॥
अर्घ्य ले आओ । बहुत दिन बाद ये पधारे हुए हैं और ४६ विशेषरूपसे ये हमारे जामाता हैं - ऐसा कहकर मुनिने राजाको अर्घ्य प्रदान किया और राजाने भी विचार करते हुए उसे ग्रहण किया ॥ ४५-४६ ॥ ४७ तत्पश्चात् राजाके अर्घ्य ग्रहण करके आसनपर बैठ जानेके उपरान्त मुनि प्रमुचने उन्हें आशीर्वचनोंसे अभिनन्दित करके उनका कुशल - क्षेम पूछा- हे राजन्! ४८ आप स्वस्थ तो हैं? आपकी सेना, कोष, बन्धु-बान्धव, सेवकगण, सचिव, नगर, देश आदिक ४ ९ सर्वविध कुशलता तो है? हे नरेश! आपकी भार्या तो यहीं विद्यमान है और वह सकुशल है । अतएव, मैं उसकी कुशलता नहीं पूछूंगा, आप अपनी अन्य स्त्रियोंका कुशल - क्षेम बताइये ॥ ४७-४९ ॥ ५० राजा बोले- हे भगवन्! आपके कृपाप्रभावसे मेरी सर्वविध कुशलता है । हे ब्रह्मन्! अब मेरी यह जिज्ञासा है कि मेरी कौन - सी भार्या यहाँ है? ॥ ५० ॥
ऋषि बोले- हे पृथ्वीपते! संसारमें अप्रतिम ५१ लावण्यसे सम्पन्न रेवती नामक आपकी पत्नी यहाँ ही रहती है । क्या आप उसे नहीं जानते? ॥ ५१ ॥
राजा बोले- हे प्रभो! सुभद्रा आदि मेरी पत्नियाँ तो घरपर ही हैं । हे भगवन्! मैं तो केवल उन्हें ही ५२ जानता हूँ । मैं रेवतीको तो नहीं जानता ॥ ५२ ॥
ऋषि बोले- हे महामते! हे राजन्! इसी समय ' प्रिये ' के सम्बोधनसे आपने जिससे पूछा था, अपनी उस योग्यतम प्रियाको आपने क्षणभरमें ही भुला ५३ दिया! ॥ ५३ ॥
राजा बोले- हे मुने! आपने जो कहा, वह असत्य नहीं है; किंतु मैंने तो सामान्यरूपसे ऐसा कह दिया था । इसमें मेरा कोई दूषित भाव नहीं था, अतः ५४ आप मेरे ऊपर क्रोध न करें ॥ ५४ ॥
ऋषि बोले – हे राजन्! आपका भाव दूषित नहीं था अपितु आपने सत्य ही कहा था । अग्निदेवके द्वारा प्रेरित किये जानेपर ही आपने ऐसा कहा ५५ | था ॥ ५५ ॥
' इसका पति कौन होगा ' - ऐसा मेरे द्वारा आज अग्निदेवसे पूछे जानेपर उन्होंने कहा था कि इसके ५६ । पति निश्चितरूपसे राजा दुर्दम ही होंगे ॥ ५६ ॥
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५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४
तदादत्स्व मया दत्तामिमां कन्यां महीपते ।
प्रियेत्यामन्त्रिता पूर्वं मा विचारं कुरुष्व भोः ॥
श्रुत्वैतत् सोऽभवत् तूष्णीं चिन्तयन् मुनिभाषितम् ।
वैवाहिकं विधिं तस्य मुनिः कर्तुं समुद्यतः ॥
अथोद्यतं विवाहाय दृष्ट्वा कन्याब्रवीन्मुनिम् ।
रेवत्यृक्षे विवाहो मे तात कर्तुं त्वमर्हसि ॥
ऋषिरुवाच
वत्से विवाहयोग्यानि सन्त्यन्यर्क्षाणि भूरिशः ।
रेवत्यां कथमुद्वाहः पौष्णभं न दिवि स्थितम् ॥
कन्योवाच
रेवत्यक्षं विना कालो ममोद्वाहोचितो न हि ।
अतः संप्रार्थयाम्येतद्विवाहं पौष्णभे कुरु ॥
ऋषिरुवाच
ऋतवाङ्मुनिना पूर्वं रेवतीभं निपातितम् ।
भान्तरे चेन्न ते प्रीतिर्विवाहः स्यात् कथं तव ॥
कन्योवाच
तपः किं तप्तवानेक ऋतवागेव केवलम् ।
भवता किं तपो नेदृक् तप्तं वाक्कायमानसैः ॥
जगत्त्रष्टुं समर्थस्त्वं वेद्मयहं ते तपोबलम् । रेवत्यृक्षं दिवि स्थाप्य ममोद्वाहं पितः कुरु ऋषिरुवाच
एवं भवतु भद्रं ते यथैव त्वं ब्रवीषि माम् ।
त्वत्कृते सोममार्गेऽहं स्थापयाम्यद्य पौष्णभम् ॥
स्कन्द उवाच एवमुक्त्वा मुनिस्तूर्णं पौष्णभं स्वतपोबलात् यथापूर्वं तथा चक्रे सोममार्गे घटोद्भव हे महीपते! अतः मेरे द्वारा प्रदत्त इस कन्याको आप स्वीकार कीजिये । आप इसे ' प्रिये ' ऐसा ५७ सम्बोधित भी कर चुके हैं । अतएव अब शंकारहित होकर किसी अन्य विचारमें न पड़ें ॥ ५७ ॥
५८ मुनिका यह वचन सुनकर राजा दुर्दम चिन्तन करते हुए चुप हो गये और मुनि उनके वैवाहिक अनुष्ठानकी तैयारीमें जुट गये ॥ ५८ ॥
५ ९ इसके बाद विवाह - कार्यके लिये मुनिको तत्पर देखकर रेवतीने कहा- हे तात! आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही सम्पन्न करायें ॥ ५ ९ ॥ ऋषि बोले- वत्से! विवाहके योग्य अन्य ६० बहुत - से नक्षत्र हैं । रेवती नक्षत्रमें विवाह कैसे होगा; क्योंकि रेवती तो आकाशमें स्थित है ही नहीं ॥ ६० ॥
कन्या बोली - रेवती नक्षत्रके अतिरिक्त अन्य कोई भी नक्षत्र मेरे विवाहके लिये उचित नहीं है । अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप मेरा विवाह रेवती ६१ नक्षत्रमें ही करें ॥ ६१ ॥
ऋषि बोले- पूर्वकालमें मुनि ऋतवाक्ने रेवती नक्षत्रको पृथ्वीपर गिरा दिया था । इस प्रकार अन्य नक्षत्रमें यदि तुम्हारी श्रद्धा नहीं है, तब तुम्हारा ६२ विवाह कैसे होगा? ॥ ६२ ॥
कन्या बोली – तात! क्या केवल एक ऋतवाक्ने ही तपश्चर्या की है? क्या आपने मन - वचन - कर्मसे ऐसी तप: साधना नहीं की है? ॥ ६३ ॥
६३ हे पिताजी! मैं आपके तपोबलको जानती हूँ; आप जगत् की सृष्टि करनेमें समर्थ हैं । अतः आप अपने तपके प्रभावसे रेवतीको पुनः आकाशमें स्थापित ॥ ६४ करके उसी नक्षत्रमें मेरा विवाह कीजिये ॥६४ ॥
ऋषि बोले- तुम्हारा कल्याण हो । तुम जैसा मुझसे कह रही हो, वैसा ही होगा, तुम्हारे हितार्थ मैं आज ही रेवती नक्षत्रको सोममार्ग ( नक्षत्र - मण्डल ) -६५ में स्थापित करूँगा ॥ ६५ ॥
कार्तिकेयजी बोले- हे अगस्त्यजी! ऐसा कहकर मुनिने अपने तपोबलसे शीघ्र ही पूर्वकी । भाँति रेवती नक्षत्रको फिरसे नक्षत्र - मण्डलमें स्थापित ॥ ६६ | कर दिया ॥ ६६ ॥
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अ ० ४ ]
रेवतीनाम्नि नक्षत्रे विवाहविधिना मुनिः ।
रेवतीं प्रददौ राज्ञे दुर्दमाय महात्मने ॥
कृत्वा विवाहं कन्याया मुनी राजानमब्रवीत् ।
किं तेऽभिलषितं वीर वद तत्पूरयाम्यहम् ॥
राजोवाच
मनोः स्वायम्भुवस्याहं वंशे जातोऽस्मि हे मुने ।
मन्वन्तराधिपं पुत्रं त्वत्प्रसादाच्च कामये ॥
मुनिरुवाच
यद्येषा कामना तेऽस्ति देव्या आराधनं कुरु ।
भविष्यत्येव ते पुत्रो मनुर्मन्वन्तराधिपः ॥
देवीभागवतं नाम पुराणं यत्तु पञ्चमम् ।
पञ्चकृत्वस्तु तच्छ्रुत्वा ' लप्स्यसेऽभिमतं सुतम् ॥
रेवत्यां रैवतो नाम पञ्चमो भविता मनुः ।
वेदविच्छास्त्रतत्त्वज्ञो धर्मवानपराजितः ॥
इत्युक्तो मुनिना राजा प्रणम्य मुदितो मुनिम् ।
भार्यया सह मेधावी जगाम नगरं निजम् ॥
पितृपैतामहं राज्यं चकार स महामतिः ।
पालयामास धर्मात्मा प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ॥
एकदा लोमशो नाम महात्मा मुनिरागतः ।
प्रणिपत्य तमभ्यर्च्य प्राञ्जलिश्चाब्रवीन्नृपः ॥
राजोवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादेन श्रोतुमिच्छामि भो मुने ।
देवीभागवतं नाम पुराणं पुत्रलिप्सया ॥
श्रुत्वा वाचं प्रजाभर्तुः प्रीतः प्रोवाच लोमशः ।
धन्योऽसि राजंस्ते भक्तिर्जाता त्रैलोक्यमातरि ॥
सुरासुरनराराध्या या परा जगदम्बिका । तस्यां चेद्भक्तिरुत्पन्ना कार्यसिद्धिर्भविष्यति माहात्म्य ५७ तदनन्तर मुनि प्रमुचने रेवती नक्षत्रमें वैवाहिक ६७ विधिके अनुसार महात्मा राजा दुर्दमको वह रेवती कन्या सौंप दी ॥ ६७ ॥
इस प्रकार कन्याका विवाह कर देनेके उपरान्त ६८ मुनिने राजासे कहा- हे वीर! तुम्हारी क्या अभिलाषा है? मुझे बताओ, मैं उसे पूरी करूँगा ॥६८ ॥
राजा बोले- हे मुने! मैं स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न हुआ हूँ, अत: मैं यही कामना करता हूँ कि आपकी ६ ९ कृपासे मुझे मन्वन्तराधिपति पुत्रकी प्राप्ति हो ॥ ६ ९ ॥ मुनि बोले- यदि आपकी यह अभिलाषा है तो आप देवी भगवतीकी आराधना कीजिये । ऐसा करनेपर आपका पुत्र मनु अवश्य ही मन्वन्तराधिपति होगा ॥ ७० ॥
७० श्रीमद्देवीभागवत जो पंचम पुराणके रूपमें विख्यात है, उसका पाँच बार श्रवण करनेके उपरान्त आपको मनोवांछित पुत्र प्राप्त होगा ॥ ७१ ॥
७१ रेवतीके गर्भसे उत्पन्न रैवत नामवाला पाँचवाँ मनु वेदवेत्ता, शास्त्रोंके तत्त्वोंको जाननेवाला, धर्मपरायण तथा अपराजेय होगा ॥ ७२ ॥
७२ मुनि प्रमुचके इस प्रकार कहनेपर प्रसन्न होकर प्रतिभासम्पन्न राजा दुर्दमने मुनिको प्रणाम किया और वे भार्या रेवती साथ अपने नगर चले गये ॥ ७३ ॥
७३ महामति राजा दुर्दमने अपने पिता - पितामहसे प्राप्त राज्यपर शासन किया और उस धर्मात्माने औरस पुत्रोंकी भाँति अपनी प्रजाओंका पालन किया ॥ ७४ ॥
७४ एक बार उनके यहाँ महात्मा लोमशऋषि पधारे । राजा दुर्दमने उन्हें प्रणाम किया और उनका ७५ विधिवत् पूजनकर दोनों हाथ जोड़कर कहा ॥७५ ॥
राजा बोले- हे भगवन्! हे मुने! यदि आप कृपा करें तो मैं पुत्र - प्राप्तिकी कामनासे आपसे देवीभागवत नामक पुराण सुनना चाहता हूँ ॥ ७६ ॥
७६ राजाका यह वचन सुनकर लोमशमुनि प्रसन्न हो गये और बोले - हे राजन्! आप धन्य हैं; क्योंकि तीनों लोकोंकी जननी देवी भगवतीमें ७७ आपकी ऐसी भक्ति हो गयी है । देव, दानव तथा मानवकी आराध्या परा भगवती जगदम्बामें यदि आपकी भक्ति उत्पन्न हुई है तो आपकी कार्य - सिद्धि ॥ ७८ अवश्य होगी ॥ ७७-७८ ॥
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५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४
अतस्त्वां श्रावयिष्यामि श्रीमद्भागवतं नृप ।
यस्य श्रवणमात्रेण न किञ्चिदपि दुर्लभम् ॥
इत्युक्त्वा सुदिने ब्रह्मन् कथारम्भमथाकरोत् ।
पञ्चकृत्वः स शुश्राव विधिवद्भार्यया सह ॥
समाप्तिदिवसे राजा पुराणञ्च मुनिं तथा ।
पूजयामास धर्मात्मा मुदा परमया युतः ॥
हुत्वा नवार्णमन्त्रेण भोजयित्वा कुमारिकाः ।
वाडवांश्च सपत्नीकान्दक्षिणाभिरतोषयत् ॥
अथ कालेन कियता भगवत्याः प्रसादतः ।
गर्भं दधार सा राज्ञी लोककल्याणकारकम् ॥
पुण्येऽथ समये प्राप्ते ग्रहैः सुस्थानसङ्गतैः ।
सर्वमङ्गलसम्पन्ने रेवती सुषुवे सुतम् ॥
श्रुत्वा पुत्रस्य जननं स्नात्वा राजा मुदान्वितः ।
स सुवर्णाम्भसा चक्रे जातकर्मादिकाः क्रियाः ॥
यथाविधि च दानानि दत्त्वा विप्रानतोषयत् ।
कृतोपनयनं राजा साङ्गान्वेदानपाठयत् ॥
सर्वविद्यानिधिर्जातो धर्मिष्ठोऽस्त्रविदां वरः ।
धर्मस्य वक्ता कर्ता च रैवतो नाम वीर्यवान् ॥
नियुक्तवानथ ब्रह्मा रैवतं मानवे पदे ।
मन्वन्तराधिपः श्रीमान् गां शशास स धर्मतः ॥
इत्थं देव्याः प्रभावोऽयं संक्षेपेणोपवर्णितः ।
पुराणस्य च माहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात्क्षमः ॥
अतएव हे राजन्! मैं आपको श्रीमद्देवीभागवत सुनाऊँगा, जिसके सुननेमात्रसे कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं ७ ९ रह जाता ॥ ७ ९ ॥ हे ब्रह्मन्! ऐसा कहकर मुनिने किसी शुभ दिनमें कथाका आरम्भ किया । अपनी पत्नीके साथ राजाने ८० पाँच बार श्रीमद्देवीभागवतपुराणका विधिवत् श्रवण किया ॥ ८० ॥
कथा - समाप्तिके दिन धर्मनिष्ठ राजा दुर्दमने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतपुराण तथा ८१ लोमशमुनिकी पूजा की ॥ ८१ ॥
राजाने नवार्णमन्त्रसे हवन करके कुमारी कन्याओं को भोजन कराया और सपत्नीक ब्राह्मणोंको ८२ प्रभूत दक्षिणादानद्वारा संतुष्ट किया ॥ ८२ ॥
कुछ समय बीत जानेपर भगवतीकी कृपासे उस रानी रेवतीने लोककल्याणकारी गर्भ धारण किया ॥ ८३ ॥
इसके बाद जब समस्त ग्रह - नक्षत्र अपने - अपने ८३ अनुकूल स्थानोंपर थे और सभी मांगलिक कृत्य सम्पन्न हो गये थे - ऐसे शुभ समयमें रेवतीने पुत्रको जन्म दिया ॥ ८४ ॥
८४ पुत्रके जन्मका समाचार सुनकर राजा दुर्दम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने स्नान करके स्वर्ण-कलशके जलसे पुत्रका जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न किया ॥ ८५ ॥
८५ तदनन्तर राजाने विधिपूर्वक दान देकर ब्राह्मणों को संतुष्ट किया । समयपर पुत्रका उपनयन– संस्कार करके राजाने अपने पुत्रको अंगोंसहित वेदोंका ८६ अध्ययन कराया ॥ ८६ ॥
इस प्रकार राजाका वह रैवत नामक तेजस्वी पुत्र समग्र विद्याओं का निधान, धर्मपरायण, अस्त्र-विशारदोंमें श्रेष्ठ, धर्मका वक्ता तथा धर्मका पालनकर्ता ८७ हो गया ॥ ८७ ॥
इसके बाद ब्रह्माजीने रैवतको मनुके पदपर नियुक्त किया और वे श्रीमान् मन्वन्तराधिपके रूपमें ८८ धर्मपूर्वक पृथ्वीपर शासन करने लगे ॥८८ ॥
इस प्रकार मैंने देवी भगवतीके इस प्रभावका संक्षिप्तरूपसे वर्णन कर दिया । इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कौन ८ ९ | समर्थ है? ॥ ८ ९ ॥
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अ ० ५ ] सूत उवाच
कुम्भयोनिस्तु माहात्म्यं विधिं भागवतस्य च ।
श्रुत्वा कुमारं चाभ्यर्च्य स्वाश्रमं पुनराययौ ॥
इदं मया भागवतस्य विप्रा माहात्म्यमुक्तं भवतां समक्षम् । शृणोति भक्त्या पठतीह भोगान् भुक्त्वाखिलान्मुक्तिमुपैति चान्ते ॥ माहात्म्य ५ ९ सूतजी बोले - [ हे ब्राह्मणो! ] इस प्रकार श्रीमद्देवीभागवतका माहात्म्य तथा उसकी विधि ९ ० सुनकर और कुमार कार्तिकेयकी पूजाकर अगस्त्यजी अपने आश्रम चले आये ॥ ९ ० ॥ हे विप्रो! मैंने आपलोगोंके समक्ष श्रीमद्देवी-भागवतका यह माहात्म्य कह दिया । जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण तथा पाठ करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका सुख प्राप्त करके अन्तमें मोक्ष ९९ । प्राप्त करता है॥९ १ ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये रैवतनामक-मनुपुत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी श्रवण - विधि, श्रवणकर्ताके लिये पालनीय नियम, श्रवणके ऋषय ऊचुः
सूत सूत महाभाग श्रुतं माहात्म्यमुत्तमम् ।
अधुना श्रोतुमिच्छामः पुराणश्रवणे विधिम् ॥
सूत उवाच श्रूयतां मुनयः सर्वे पुराणश्रवणे विधिम् । नराणां शृण्वतां येन सिद्धिः स्यात्सार्वकामिकी आदौ दैवज्ञमाहूय मुहूर्तं कल्पयेत्सुधीः आरभ्य शुचिमासं तु मासषट्कं शुभावहम् ॥ हस्ताश्विमूलपुष्यर्क्षे ब्रह्ममैत्रेन्दुवैष्णवे सत्तिथौ शुभवारे च पुराणश्रवणं शुभम् गुरुभाद्वेदवेदाब्जशराङ्गाब्धिगुणैः क्रमात् धर्माप्तिरिन्दिराप्राप्तिः कथासिद्धिः परं सुखम् फल तथा माहात्म्यका वर्णन ऋषियोंने कहा - हे महाभाग सूतजी! हमलोगोंने श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य सुन लिया और अब इस १ पुराणके श्रवणकी विधि सुनना चाहते हैं ॥१ ॥
सूतजी बोले – हे मुनियो! अब आपलोग इस पुराणके श्रवणका विधान सुनें, जिसे सुननेवाले मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं ॥ २ ॥
पुराणश्रवणके इच्छुक विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि वह सर्वप्रथम ज्योतिषीको बुलाकर शुभ मुहूर्त ॥ २ निर्धारित कर ले | इसके लिये ज्येष्ठमाससे लेकर छ: महीने शुभकारक होते हैं ॥ ३ ॥
। हस्त, अश्विनी, मूल, पुष्य, रोहिणी, अनुराधा, ३ मृगशिरा तथा श्रवण नक्षत्र, पुण्य तिथि तथा शुभ दिनमें श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण कल्याणकारी होता है ॥४ ॥
। जिस नक्षत्रमें बृहस्पति हों, उससे चन्द्रमातक ॥ ४ गिननेपर क्रमशः इस प्रकार फल होते हैं - चार नक्षत्रतक धर्म - प्राप्ति, पुनः चारतक लक्ष्मीकी प्राप्ति, इसके बाद एक नक्षत्र कथामें सिद्धि प्रदान । करनेवाला, फिर पाँच नक्षत्र परम सुखकी प्राप्ति ॥ ५ । करानेवाले, बादमें छः नक्षत्र पीड़ा करनेवाले, इसके
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६० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५ पीडाथ भूपतिभयं ज्ञानप्राप्तिः क्रमात्फलम् । बाद चार नक्षत्र राज - भय उत्पन्न करनेवाले और पुराणश्रवणे चक्रं शोधयेच्छिवभाषितम् ॥ तत्पश्चात् तीन नक्षत्र ज्ञान - प्राप्तिमें सहायक होते अथवा प्रीतये देव्या नवरात्रचतुष्टये । शृणुयादन्यमासेऽपि तिथिवारर्क्षशोधिते
सम्भारं तादृशं कार्यं विवाहादौ च यादृशम् ।
नवाहयज्ञे चाप्यस्मिन्विधेयं यत्नतो बुधैः ॥
सहाया बहवः कार्या दम्भलोभविवर्जिताः ।
चतुराश्च वदान्याश्च देवीभक्तिपरा नराः ॥
प्रेष्या यत्नेन वार्तेयं देशे देशे जने जने ।
आगन्तव्यमिहावश्यं कथा देव्या भविष्यति ॥
सौराश्च गाणपत्याश्च शैवाः शाक्ताश्च वैष्णवाः ।
सर्वेषामपि सेव्येयं यतो देवाः सशक्तयः ॥
श्रीमद्देवीभागवतपीयूषरसलोलुपैः आगन्तव्यं विशेषेण कथार्थं प्रेमतत्परैः ॥
ब्राह्मणाद्याश्च ये वर्णाः स्त्रियश्चाश्रमिणस्तथा ।
सकामाश्चापि निष्कामाः पातव्यं तैः कथामृतम् ॥
हैं । पुराणश्रवणके आरम्भमें शिवोक्त चक्रका शोधन कर लेना चाहिये ॥५-६ ॥ देवीकी प्रसन्नता के लिये इसे चारों नवरात्रोंमें * सुनना चाहिये अथवा तिथि, वार और नक्षत्रपर ॥ ७ सम्यक् विचार करके यह पुराण अन्य मासोंमें भी सुना जा सकता है ॥७ ॥
विवाह आदिमें जिस प्रकार [ उत्साहपूर्वक ] तैयारी की जाती है, उसी प्रकार नवाह - यज्ञके ८ अवसरपर भी बुद्धिमान् मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक सामग्री आदिकी तैयारी करनी चाहिये ॥ ८ ॥
पाखण्ड तथा लोभसे रहित, चतुर, उदार एवं देवीभक्त सज्जनोंको भी सहायकके रूपमें लेना ९ चाहिये ॥ ९ ॥
देश - देशमें भी यत्नपूर्वक यह सन्देश भेजना चाहिये - [ हे कथानुरागी सज्जनो! ] यहाँ श्रीमद्देवी-भागवतकी कथा होने जा रही है, आप अवश्य १० पधारें ॥ १० ॥
चाहे सूर्यकी उपासना करनेवाले हों, चाहे गणेशभक्त हों, चाहे शैव हों, चाहे वैष्णव अथवा शक्तिके उपासक हों, सभी इस कथाके श्रवण अधिकारी हैं; क्योंकि सभी देवता शक्तिके साथ ही ११ रहते हैं ॥११ ॥
इसलिये श्रीमद्देवीभागवतकी कथारूपी सुधाके रसिक प्रेमीजनोंको कथाश्रवणके लिये विशेषरूपसे आना चाहिये ॥ १२ ॥
१२ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र – चारों वर्णके स्त्री, पुरुष एवं ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास – इन चारों आश्रमोंमें निरत मनुष्योंको चाहे सकामभावसे अथवा निष्कामभावसे- अवश्य ही इस कथा - सुधाका १३ । पान करना चाहिये ॥ १३ ॥
* सामान्यतः नवरात्र चार हैं - १ - चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक, २ - आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक ( इसी नवरात्रके बाद हरिशयनी एकादशी ), ३ आश्विन शुक्ल प्रतिपदासे विजयादशमीतक ( इसके बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी देवोत्थानी - प्रबोधिनी एकादशी ) तथा ४ - माघ शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक सारस्वत - नवरात्र ।
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अ ० ५ ]
नावकाशः कदाचित्स्यान्नवाहश्रवणेऽपि तैः ।
आगन्तव्यं यथाकालं यज्ञे पुण्या क्षणस्थितिः ॥
विनयेनैव कर्तव्यमेवमाकारणं नृणाम् ।
आगतानाञ्च कर्तव्यं वासस्थानं यथोचितम् ॥
कथास्थानं प्रकर्तव्यं भूमौ मार्जनपूर्वकम् ।
लेपनं गोमयेनाथ विशालायां मनोरमम् ॥
कार्यस्तु मण्डपो रम्यो रम्भास्तम्भोपशोभितः ।
वितानमुपरिष्ठात्तु पताकाध्वजराजितः ॥
वक्तुश्चैवासनं दिव्यं सुखास्तरणसंयुतम् ।
रचितव्यं प्रयत्नेन प्राङ्मुखं वाप्युदङ्मुखम् ॥
यथोचितानि कुर्वीत श्रोतॄणामासनानि च ।
नृणां चैवाथ नारीणां कथाश्रवणहेतवे ॥
वाग्मी दान्तश्च शास्त्रज्ञो देव्याराधनतत्परः ।
दयालुर्निस्पृहो दक्षो धीरो वक्तोत्तमो मतः ॥
ब्रह्मण्यो देवताभक्तः कथारसपरायणः ।
उदारो लोलुपो नम्रः श्रोता हिंसादिवर्जितः ॥
पाखण्डनिरतो लुब्धः स्त्रैणो धर्मध्वजस्तथा ।
निष्ठुरः क्रोधनो वक्ता देवीयज्ञे न शस्यते ॥
संशयच्छेदनायैकः पण्डितश्च तथागुणः ।
श्रोतृबोधकृदव्यग्रः कार्यों वक्तुः सहायकृत् ॥
मुहूर्तदिवसादर्वाग्वक्तृश्रोत्रादिभिर्जनैः कर्तव्यं क्षौरकर्मादि ततो नियमकल्पनम् ॥ माहात्म्य ६१ जिन लोगोंको पूरे नौ दिनतक कथा सुननेका अवकाश न मिल सके, वे जब भी समय मिले तभी १४ आ जायँ; क्योंकि यज्ञमें क्षणभर भी पहुँच जाना विशेष पुण्यदायक होता है ॥१४ ॥
बड़ी नम्रताके साथ मनुष्योंको निमन्त्रण देना १५ | चाहिये और आये हुए श्रोताओंके बैठनेका भी समुचित प्रबन्ध करना चाहिये ॥ १५ ॥
विस्तृत भूमिमें कथा - प्रवचनका सुन्दर स्थान १६ बनाना चाहिये । उस स्थानकी सफाई कराकर गोबरसे लिपवा देना चाहिये । केलेके स्तम्भोंसे सुशोभित और ध्वज - पताकाओंसे अलंकृत एक सुरम्य मण्डपका निर्माण करना चाहिये और उसके ऊपर सुन्दर चाँदनी १७ लगा देनी चाहिये ॥ १६-१७ ॥ कथावाचकका आसन दिव्य तथा सुखकर आस्तरणसे युक्त होना चाहिये । उसे प्रयत्नपूर्वक पूर्वा-१८ भिमुख अथवा उत्तराभिमुख रखना चाहिये ॥१८ ॥
कथाश्रवणके लिये आनेवाले पुरुष तथा स्त्री श्रोताओंके लिये भी यथायोग्य पृथक् - पृथक् आसनोंकी व्यवस्था करनी चाहिये ॥ १ ९ ॥ १ ९ वक्तृत्वसम्पन्न, संयमी, शास्त्रज्ञ, देवीकी आराधनामें तत्पर, दयालु, लोभहीन, दक्ष तथा धैर्यशाली कथावाचक उत्तम माना गया है ॥ २० ॥
२० इसी प्रकार श्रोता भी ऐसा होना चाहिये जो ब्राह्मणसेवी, देवभक्त, कथा - रसका पान करनेवाला, उदार, लोभरहित, विनम्र और हिंसा आदिसे रहित हो ॥२१ ॥
२१ पाखण्डी, लोभी, स्त्रीस्वभाव, कामी, धर्मका दिखावामात्र करनेवाला, निष्ठुर तथा क्रोधी वक्ता देवीभागवतके नवाहयज्ञमें श्रेष्ठ नहीं माना जाता २२ | है ॥ २२ ॥
श्रोताओंकी शंकाओंके निवारणहेतु कथावाचकके साथ एक ऐसा सहायक भी लगा देना चाहिये, जो पण्डित, गुणवान्, शान्त तथा श्रोताओंको समझानेमें २३ कुशल हो ॥ २३ ॥
कथा प्रारम्भ होनेके एक दिन पूर्व ही वक्ता एवं श्रोतागणोंको क्षौरकर्म करा लेना चाहिये । तत्पश्चात् २४ । अन्यान्य नियमोंका पालन करना चाहिये ॥ २४ ॥