देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 621–630
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630
पृष्ठ 621
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६१२ निहतौ दानवौ वीक्ष्य पतितौ च रणाङ्गणे निहताः सैनिकाः सर्वे तत्र केसरिणा बलात् ॥ भक्षिताश्च तथा केचिन्निःशेषं तद्रणं कृतम् । भग्नाः केचिद् गता मन्दा महिषं प्रति दुःखिताः चुक्रुशू रुरुदुश्चैव त्राहि त्राहीति भाषणैः असिलोमबिडालाख्यौ निहतौ नृपसत्तम ॥ अन्ये ये सैनिका राजन् सिंहेन भक्षिताश्च ते एवं ब्रुवन्तो राजानं तदा चक्रुश्च वैशसम् ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां महिषो दुर्मनास्तदा । बभूव चिन्ताकुलितो विमना दुःखसंयुतः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ । मारे गये उन दोनों दैत्योंको समरांगण में गिरा ५३ हुआ देखकर शेष सम्पूर्ण सैनिकोंको सिंहने अपने पराक्रमद्वारा मार गिराया और कुछ दानवोंको खा डाला और इस प्रकार उस युद्धभूमिको दानवोंसे ॥ ५४ रहित कर दिया । कुछ अंग - भंग हुए मूर्ख दानव दुःखी होकर महिषासुरके पास पहुँचे और ‘ रक्षा । कीजिये - रक्षा कीजिये ' - ऐसा कहते हुए वे चीखने-५५ चिल्लाने तथा रोने लगे – ' हे नृपश्रेष्ठ! असिलोमा और बिडालाख्य दोनों ही मारे गये । हे राजन्! । अन्य जो भी सैनिक थे, उन्हें सिंह खा गया ' ५६ ऐसा कहते हुए उन्होंने राजाको दुःखमें डाल दिया ॥ ५३-५६ ॥ उनकी बात सुनकर महिषासुर खिन्नमनस्क, ॥ ५७ । चिन्तासे व्याकुल, उदास तथा दुःखी हो गया ॥ ५७ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे असिलोमबिडालाख्यवधवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः महिषासुरका रणभूमिमें आना तथा देवीसे प्रणय - याचना करना व्यास उवाच
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधयुक्तो नराधिपः ।
दारुकं प्राह तरसा रथमानय मेऽद्भुतम् ॥
सहस्त्रखरसंयुक्तं पताकाध्वजभूषितम् ।
आयुधैः संयुतं शुभ्रं सुचक्रं चारुकूबरम् ॥
सूतोऽपि रथमानीय तमुवाच त्वरान्वितः ।
राजन् रथोऽयमानीतो द्वारि तिष्ठति भूषितः ॥
सर्वायुधसमायुक्तो वरास्तरणसंयुतः ।
आनीतं तं रथं ज्ञात्वा दानवेन्द्रो महाबलः ॥
मानुषं देहमास्थाय संग्रामे गन्तुमुद्यतः ।
विचार्य मनसा चेति देवी मां प्रेक्ष्य दुर्मुखम् ॥
शृङ्गिणं महिषं नूनं विमना सा भविष्यति ।
नारीणां च प्रियं रूपं तथा चातुर्यमित्यपि ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] – 20 D व्यासजी बोले — उन सैनिकोंकी बात सुनकर राजा महिष क्रोधित हो उठा और उसने सारथिसे १ कहा – हजार गधोंसे जुते हुए, ध्वजा तथा पताकाओंसे सुशोभित, अनेक प्रकारके आयुधोंसे परिपूर्ण, सुन्दर चक्कों तथा जुएसे विभूषित तथा प्रकाशमान मेरा २ अद्भुत रथ तुरंत ले आओ॥१-२ ॥ सारथिने भी तत्क्षण रथ लाकर उससे कहा-हे राजन्! सुसज्जित करके रथ ला दिया गया जो ३ द्वारपर खड़ा है; यह सभी आयुधोंसे समन्वित तथा उत्तम आस्तरणोंसे युक्त है ॥ ३३ ॥
४ रथके आनेकी बात सुनकर महाबली दानवराज महिष मनुष्यका रूप धारण करके युद्धभूमिमें जानेको तैयार हुआ । उसने अपने मनमें सोचा कि यदि मैं ५ अपने महिषरूपमें जाऊँगा तो देवी मुझ श्रृंगयुक्त महिषको देखकर अवश्य उदास हो जायगी । स्त्रियोंको सुन्दर रूप और चातुर्य अत्यन्त प्रिय होता है । अतः ६ | आकर्षक रूप तथा चातुर्यसे सम्पन्न होकर मैं उसके
पृष्ठ 622
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १६ ]
तस्माद्रूपं च चातुर्यं कृत्वा यास्यामि तां प्रति ।
यथा मां वीक्ष्य सा बाला प्रेमयुक्ता भविष्यति ॥
ममापि च तदैव स्यात्सुखं नान्यस्वरूपतः ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा दानवेन्द्रो महाबलः ॥
त्यक्त्वा तन्माहिषं रूपं बभूव पुरुषः शुभः ।
सर्वायुधधरः श्रीमांश्चारुभूषणभूषितः ॥
दिव्याम्बरधरः कान्तः पुष्पबाण इवापरः ।
रथोपविष्टः केयूरस्स्रग्वी बाणधनुर्धरः ॥
सेनापरिवृतो देवीं जगाम मदगर्वितः ।
मनोज्ञं रूपमास्थाय मानिनीनां मनोहरम् ॥
तमागतं समालोक्य दैत्यानामधिपं तदा ।
बहुभिः संवृतं वीरैर्देवी शङ्खमवादयत् ॥
स शङ्खनिनदं श्रुत्वा जनविस्मयकारकम् ।
समीपमेत्य देव्यास्तु तामुवाच हसन्निव ॥
देवि संसारचक्रेऽस्मिन्वर्तमानो जनः किल ।
नरो वाथ तथा नारी सुखं वाञ्छति सर्वथा ॥
सुखं संयोगजं नॄणां नासंयोगे भवेदिह ।
संयोगो बहुधा भिन्नस्तान्ब्रवीमि शृणुष्व ह ॥
भेदान्सुप्रीतिहेतूत्थान्स्वभावोत्थाननेकशः ।
तत्र प्रीतिभवानादौ कथयामि यथामति ॥
मातापित्रोस्तु पुत्रेण संयोगस्तूत्तमः स्मृतः ।
भ्रातुर्भ्रात्रा तथा योगः कारणान्मध्यमो मतः ॥
उत्तमस्य सुखस्यैव दातृत्वादुत्तमः स्मृतः ।
तस्मादल्पसुखस्यैव प्रदातृत्वाच्च मध्यमः ॥
पञ्चम स्कन्ध ६.१३ पास जाऊँगा, जिससे मुझे देखते ही वह युवती ७ प्रेमयुक्त - – मोहित हो जायगी । मुझे भी इसी स्थितिमें सुख होगा, अन्य किसी स्वरूपसे नहीं ॥ ४ -७३ ॥ मनमें ऐसा विचार करके महाबली वह ८ दानवेन्द्र महिषरूप छोड़कर एक सुन्दर पुरुष बन गया । वह सभी प्रकारके आयुधको धारण किये हुए था, वह ऐश्वर्यसम्पन्न था, वह सुन्दर आभूषणोंसे ९ अलंकृत था, उसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे । केयूर और हार पहने तथा हाथमें धनुष - बाण धारण किये रथपर बैठा हुआ वह कान्तिमान् दैत्य दूसरे कामदेवके सदृश प्रतीत हो रहा था । १० मानिनी सुन्दरियोंका भी मन हर लेनेवाला ऐसा सुन्दर रूप बनाकर वह मदोन्मत्त दैत्य अपनी विशाल सेनाके साथ देवीकी ओर चला ॥ ८-११ ॥ ११ अनेक वीरोंसे घिरे हुए उस दैत्यराज महिषासुरको आया हुआ देखकर देवीने अपना शंख बजाया ॥ १२ ॥
लोगोंको आश्चर्यचकित कर देनेवाली उस १२ शंखध्वनिको सुनकर भगवतीके पास आकर वह दैत्य हँसता हुआ उनसे कहने लगा -॥१३ ॥
हे देवि! इस परिवर्तनशील जगत् में रहनेवाला १३ व्यक्ति वह स्त्री अथवा पुरुष चाहे कोई भी हो, सब प्रकारसे सुख ही चाहता है । इस लोकमें सुख मनुष्योंको संयोगमें ही प्राप्त होता है, वियोग में सुख १४ होता ही नहीं । संयोग भी अनेक प्रकारका होता है । मैं उन भेदोंको बताता हूँ, सुनो । कहीं उत्तम प्रीतिके कारण संयोग हो जाता है और कहीं १५ स्वभावतः संयोग हो जाता है, इनमें सर्वप्रथम मैं प्रीतिसे उत्पन्न होनेवाले संयोगके विषयमें अपनी बुद्धिके अनुसार बता रहा हूँ॥१४–१६ ॥ १६ माता - पिताका पुत्रके साथ होनेवाला संयोग उत्तम कहा गया है । भाईका भाईके साथ संयोग किसी प्रयोजनसे होता है, अतः वह मध्यम माना १७ गया है । उत्तम सुख प्रदान करनेके कारण पहले प्रकारके संयोगको उत्तम तथा उससे कम सुख प्रदान करनेके कारण [ दूसरे प्रकारके ] संयोगको १८ | मध्यम कहा गया है ॥ १७-१८ ॥
पृष्ठ 623
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६
नाविकानां तु संयोगः स्मृतः स्वाभाविको बुधैः ।
विविधावृतचित्तानां प्रसङ्गपरिवर्तिनाम् ॥
अत्यल्पसुखदातृत्वात्कनिष्ठोऽयं स्मृतो बुधैः ।
अत्युत्तमस्तु संयोगः संसारे सुखदः सदा ॥
नारीपुरुषयोः कान्ते समानवयसोः सदा । संयोगो यः समाख्यातः स एवात्युत्तमः स्मृतः अत्युत्तमसुखस्यैव दातृत्वात्स तथाविधः चातुर्यरूपवेषाद्यैः कुलशीलगुणैस्तथा परस्परसमुत्कर्षः कथ्यते हि परस्परम् तं चेत्करोषि संयोगं वीरेण च मया सह अत्युत्तमसुखस्यैव प्राप्तिः स्यात्ते न संशयः नानाविधानि रूपाणि करोमि स्वेच्छया प्रिये इन्द्रादयः सुराः सर्वे संग्रामे विजिता मया रत्नानि यानि दिव्यानि भवनेऽस्मिन्ममाधुना भुंक्ष्व त्वं तानि सर्वाणि यथेष्टं देहि वा यथा पट्टराज्ञी भवाद्य त्वं दासोऽस्मि तव सुन्दरि वैरं त्यजेऽहं देवैस्तु तव वाक्यान्न संशयः यथा त्वं सुखमाप्नोषि तथाहं करवाणि वै आज्ञापय विशालाक्षि तथाहं प्रकरोम्यथ । चित्तं मे तव रूपेण मोहितं चारुभाषिणि आतुरोऽस्मि वरारोहे प्राप्तस्ते शरणं किल प्रपन्नं पाहि रम्भोरु कामबाणैः प्रपीडितम् धर्माणामुत्तमो धर्मः शरणागतरक्षणम् त्वदीयोऽस्म्यसितापाङ्गि सेवकोऽहं कृशोदरि मरणान्तं वचः सत्यं नान्यथा प्रकरोम्यहम् पादौ नतोऽस्मि तन्वङ्गि त्यक्त्वा नानायुधानि ते विविध विचारोंसे युक्त चित्तवाले तथा प्रसंगवश १ ९ एकत्रित नौकामें बैठे हुए लोगोंके मिलनेको विद्वानोंने स्वाभाविक संयोग कहा है । बहुत कम समयके लिये सुख प्रदान करनेके कारण विद्वानोंके द्वारा इसे कनिष्ठ २० संयोग कहा गया है ॥ १ ९ ३ ॥ अत्युत्तम संयोग संसारमें सदा सुखदायक होता है । हे कान्ते! समान अवस्थावाले स्त्री- पुरुषका जो ॥ २१ संयोग है, वही अत्युत्तम कहा गया है । अत्युत्तम सुख प्रदान करनेके कारण ही उसे उस प्रकारका संयोग । कहा गया है । चातुर्य, रूप, वेष, कुल, शील, गुण ॥ २२ आदिमें समानता रहनेपर परस्पर सुखकी अभृिवद्धि । कही जाती है ॥२० - २२३ ॥ ॥ २३ यदि तुम मुझ वीरके साथ संयोग करोगी तो तुम्हें अत्युत्तम सुखकी प्राप्ति होगी, इसमें सन्देह । नहीं है । हे प्रिये! मैं अपनी रुचिके अनुसार अनेक ॥ २४ प्रकारके रूप धारण कर लेता हूँ । मैंने इन्द्र आदि सभी देवताओंको संग्राममें जीत लिया है । मेरे भवनमें । इस समय जो भी दिव्य रत्न हैं, उन सबका तुम ॥ २५ उपभोग करो; अथवा इच्छानुसार उसका दान करो । अब तुम मेरी पटरानी बन जाओ । हे सुन्दरि! मैं । तुम्हारा दास हूँ॥२३–२६ ॥ ॥ २६ तुम्हारे कहने से मैं देवताओंसे वैर करना भी छोड़ दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है । तुम्हें जैसे भी सुख । मिलेगा, मैं वही करूँगा । हे विशालनयने! अब ॥ २७ तुम मुझे आज्ञा दो और मैं उसका पालन करूँ । हे मधुरभाषिणि! मेरा मन तुम्हारे रूपपर मोहित हो ॥ २८ गया है ॥ २७-२८ ॥ हे सुन्दरि! मैं [ तुम्हें पानेके लिये ] व्याकुल । हूँ, इसलिये इस समय तुम्हारी शरणमें आया हूँ । हे ॥ २ ९ रम्भोरु! कामबाणसे आहत मुझ शरणागतकी रक्षा करो । शरणमें आये हुएकी रक्षा करना सभी धर्मोमें । उत्तम धर्म है । श्याम नेत्रोंवाली हे कृशोदरि! मैं ॥ ३० तुम्हारा सेवक हूँ । मैं मरणपर्यन्त सत्य वचनका पालन करूँगा, इसके विपरीत नहीं करूँगा । हे तन्वंगि! । नानाविध आयुधों को त्यागकर मैं तुम्हारे चरणोंमें ॥ ३१ | अवनत हूँ ॥ २ ९ –३१ ॥
पृष्ठ 624
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १६ ]
दयां कुरु विशालाक्षि तप्तोऽस्मि काममार्गणैः ।
जन्मप्रभृति चार्वङ्गि दैन्यं नाचरितं मया ॥
ब्रह्मादीनीश्वरान्प्राप्य त्वयि तद्विदधाम्यहम् ।
चरितं मम जानन्ति रणे ब्रह्मादयः सुराः ॥
सोऽप्यहं तव दासोऽस्मि मन्मुखं पश्य भामिनि । व्यास उवाच इति ब्रुवाणं तं दैत्यं देवी भगवती हि सा ॥ प्रहस्य सस्मितं वाक्यमुवाच वरवर्णिनी । देव्युवाच नाहं पुरुषमिच्छामि परमं पुरुषं विना ॥ तस्य चेच्छास्म्यहं दैत्य सृजामि सकलं जगत् । स मां पश्यति विश्वात्मा तस्याहं प्रकृतिः शिवा
तत्सान्निध्यवशादेव चैतन्यं मयि शाश्वतम् ।
जडाहं तस्य संयोगात्प्रभवामि सचेतना ॥
अयस्कान्तस्य सान्निध्यादयसश्चेतना यथा ।
न ग्राम्यसुखवाञ्छा मे कदाचिदपि जायते ॥
मूर्खस्त्वमसि मन्दात्मन् यत्स्त्रीसङ्गं चिकीर्षसि ।
नरस्य बन्धनार्थाय शृङ्खला स्त्री प्रकीर्तिता ॥
लोहबद्धोऽपि मुच्येत स्त्रीबद्धो नैव मुच्यते ।
किमिच्छसि च मन्दात्मन् मूत्रागारस्य सेवनम् ॥
शमं कुरु सुखाय त्वं शमात्सुखमवाप्स्यसि । नारीसङ्गे महद्दुःखं जानन्किं त्वं विमुह्यसि त्यज वैरं सुरैः सार्धं यथेष्टं विचरावनौ । पातालं गच्छ वा कामं जीवितेच्छा यदस्ति ते अथवा कुरु संग्रामं बलवत्यस्मि साम्प्रतम् प्रेषिताहं सुरैः सर्वैस्तव नाशाय दानव पञ्चम स्कन्ध ६१५ हे विशालाक्षि! मैं कामदेवके बाणोंद्वारा सन्तप्त ३२ हो रहा हूँ, अत: तुम मेरे ऊपर दया करो । हे सुन्दरि! जन्मसे लेकर आजतक मैंने ब्रह्मा आदि देवताओंके समक्ष भी दीनता नहीं प्रदर्शित की, किंतु तुम्हारे समक्ष ३३ आज उसे प्रकट कर रहा हूँ । ब्रह्मा आदि देवता समरांगणमें मेरे चरित्रको जानते हैं । हे भामिनि! वही मैं आज तुम्हारी दासता स्वीकार करता हूँ, मेरी ओर देखो ॥ ३२-३३३ ॥ ३४ व्यासजी बोले- ऐसा कहते हुए उस दैत्य महिषासुरसे हँसकर अनुपम सौन्दर्यमयी भगवती मुसकानके साथ यह वचन कहने लगीं ॥ ३४३ ॥
देवी बोलीं- मैं परमपुरुषके अतिरिक्त अन्य ३५ किसी पुरुषको नहीं चाहती । हे दैत्य! मैं उनकी इच्छाशक्ति हूँ, मैं ही सारे संसारकी सृष्टि करती हूँ । वे विश्वात्मा मुझे देख रहे हैं; मैं उनकी ॥ ३६ कल्याणमयी प्रकृति हूँ । निरन्तर उनके सांनिध्यके कारण ही मुझमें शाश्वत चेतना है । वैसे तो मैं जड़ हूँ, किंतु उन्हींके संयोगसे मैं चेतनायुक्त हो जाती हूँ ३७ जैसे चुम्बकके संयोगसे साधारण लोहेमें भी चेतना उत्पन्न हो जाती है ॥ ३५ – ३७३ ॥ मेरे मनमें कभी भी विषयभोगकी इच्छा नहीं ३८ होती । हे मन्दबुद्धि! तुम मूर्ख हो जो कि स्त्रीसंग करना चाहते हो; पुरुषको बाँधनेके लिये स्त्री जंजीर कही गयी है । लोहेसे बँधा हुआ मनुष्य ३ ९ बन्धनमुक्त हो भी सकता है, किंतु स्त्रीके बन्धनमें बँधा हुआ प्राणी कभी नहीं छूटता । हे मूर्ख! मूत्रागार ( गुह्य अंग ) - का सेवन क्यों करना चाहते हो? ४० सुखके लिये मनमें शान्ति धारण करो । शान्तिसे ही तुम सुख प्राप्त कर सकोगे । स्त्रीसंगसे बहुत दुःख मिलता है - इस बातको जानते हुए भी तुम अज्ञानी ॥ ४१ क्यों बनते हो? ॥ ३८–४१ ॥ तुम देवताओंके साथ वैरभाव छोड़ दो और पृथ्वीपर इच्छानुसार विचरण करो । यदि जीवित रहनेकी ॥ ४२ तुम्हारी अभिलाषा हो तो पाताललोक चले जाओ अथवा मेरे साथ युद्ध करो । इस समय मुझमें पूर्ण । शक्ति विद्यमान है । हे दानव! सभी देवताओंने तुम्हारा ॥ ४३ नाश करनेके लिये मुझे यहाँ भेजा है ॥ ४२-४३ ॥
पृष्ठ 625
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६
सत्यं ब्रवीमि येनाद्य त्वया वचनसौहृदम् ।
दर्शितं तेन तुष्टास्मि जीवन्गच्छ यथासुखम् ॥
सतां सप्तपदी मैत्री तेन मुञ्चामि जीवितम् ।
मरणेच्छास्ति चेद्युद्धं कुरु वीर यथासुखम् ॥
हनिष्यामि महाबाहो त्वामहं नात्र संशयः । व्यास उवाच इति तस्या वचः श्रुत्वा दानवः काममोहितः ॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा मधुरं वचनं ततः ।
बिभेम्यहं वरारोहे त्वां प्रहर्तुं वरानने ॥
कोमलां चारुसर्वाङ्गीं नारीं नरविमोहिनीम् ।
जित्वा हरिहरादींश्च लोकपालांश्च सर्वशः ॥
किं त्वया सह युद्धं मे युक्तं कमललोचने ।
रोचते यदि चार्वङ्गि विवाहं कुरु मां भज ॥
नोचेद् गच्छ यथेष्टं ते देशं यस्मात्समागता ।
नाहं त्वां प्रहरिष्यामि यतो मैत्री कृता त्वया ॥
हितमुक्तं शुभं वाक्यं तस्माद् गच्छ यथासुखम् ।
का शोभा मे भवेदन्ते हत्वा त्वां चारुलोचनाम् ॥
स्त्रीहत्या बालहत्या च ब्रह्महत्या दुरत्यया ।
गृहीत्वा त्वां गृहं नूनं गच्छाम्यद्य वरानने ॥
तथापि मे फलं न स्याद् बलाद्भोगसुखं कुतः ।
प्रब्रवीमि सुकेशि त्वां विनयावनतो यतः ॥
पुरुषस्य सुखं न स्यादृते कान्तामुखाम्बुजात् ।
तत्तथैव हि नारीणां न स्याच्च पुरुषं विना ॥
मैं तुमसे यह सत्य कह रही हूँ, तुमने वाणीद्वारा ४४ सौहार्दपूर्ण भाव प्रदर्शित किया है, अतः मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ । अब तुम जीवित रहते ही सुखपूर्वक यहाँसे चले जाओ । केवल सात पग साथ चलनेपर ही सज्जनोंमें मैत्री हो जाती है, इसी कारण मैं तुम्हें ४५ जीवित छोड़ दे रही हूँ । हे वीर! यदि मरनेकी ही इच्छा हो तो तुम मेरे साथ आनन्दसे युद्ध कर सकते हो । हे महाबाहो! मैं तुम्हें युद्धमें मार डालूंगी; इसमें संशय नहीं है॥४४-४५ ३ ॥ ४६ व्यासजी बोले- भगवतीका यह वचन सुनकर कामसे मोहित दानव [ पुनः ] मधुर वाणीमें मीठी बातें करने लगा - हे सुन्दरि! हे सुमुखि! कोमल, सुन्दर अंगोंवाली तथा पुरुषोंको मोह लेनेवाली ४७ तुझ युवतीके ऊपर प्रहार करनेमें मुझे भय लगता है । हे कमललोचने! विष्णु, शिव आदि बड़े - बड़े देवताओं और सब लोकपालोंपर विजय प्राप्त करके ४८ क्या अब तुम्हारे साथ मेरा युद्ध करना उचित होगा? ॥ ४६–४८३ ॥ हे सुन्दर अंगोंवाली! यदि तुम्हारी इच्छा हो ४ ९ तो मेरे साथ विवाह कर लो और मेरा सेवन करो; अन्यथा तुम जहाँसे आयी हो, उसी देशमें इच्छानुसार चली जाओ । मैं तुम्हारे साथ मित्रता कर चुका हूँ, इसलिये तुमपर प्रहार नहीं करूँगा । ५० यह मैंने तुम्हारे लिये हितकर तथा कल्याणकारी बात बतायी है; इसलिये तुम सुखपूर्वक यहाँसे चली जाओ । सुन्दर नेत्रोंवाली तुझ रमणीका ५१ वध करनेसे मेरी कौन - सी गरिमा बढ़ जायगी? स्त्रीहत्या, बालहत्या और ब्रह्महत्याका पाप बहुत ही जघन्य होता है ॥ ४ ९ –५१३ ॥ ५२ हे वरानने! वैसे तो मैं तुम्हें बलपूर्वक पकड़कर अपने घर निश्चितरूपसे ले जा सकता हूँ, किंतु बलप्रयोगसे मुझे सच्चा सुख नहीं मिलेगा, उसमें भोगसुख कैसे प्राप्त हो सकता है? अतएव हे ५३ सुकेशि! मैं बहुत विनीतभावसे तुमसे कह रहा हूँ कि जैसे पुरुषको अपनी प्रियाके मुखकमलके बिना सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार स्त्रियोंको भी पुरुषके ५४ । बिना सुख नहीं मिलता ॥ ५२-५४ ॥
पृष्ठ 626
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १६ ]
संयोगे सुखसम्भूतिर्वियोगे दुःखसम्भवः ।
कान्तासि रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता ॥
चातुर्यं त्वयि किं नास्ति यतो मां न भजस्यहो ।
तवोपदिष्टं केनेदं भोगानां परिवर्जनम् ॥
वञ्चितासि प्रियालापे वैरिणा केनचित्त्विह ।
मुञ्चाग्रहमिमं कान्ते कुरु कार्यं सुशोभनम् ॥
सुखं तव ममापि स्याद्विवाहे विहिते किल ।
विष्णुर्लक्ष्म्या सहाभाति सावित्र्या च सहात्मभूः ॥
रुद्रो भाति च पार्वत्या शच्या शतमखस्तथा ।
का नारी पतिहीना च सुखं प्राप्नोति शाश्वतम् ॥
येन त्वमसितापाङ्गि न करोषि पतिं शुभम् । कामः क्वाद्य गतः कान्ते यस्त्वां बाणैः सुकोमलैः
मादनैः पञ्चभिः कामं न ताडयति मन्दधीः ।
मन्येऽहमिव कामोऽपि दयावांस्त्वयि सुन्दरि ॥
अबलेति च मन्वानो न प्रेरयति मार्गणान् ।
मनोभवस्य वैरं वा किमप्यस्ति मया सह ॥
तेन च त्वय्यरालाक्षि न मुञ्चति शिलीमुखान् ।
अथवा मेऽहितैर्देवैर्वारितोऽसौ झषध्वजः ॥
सुखविध्वंसिभिस्तेन त्वयि न प्रहरत्यपि ।
त्यक्त्वा मां मृगशावाक्षि पश्चात्तापं करिष्यसि ॥
मन्दोदरीव तन्वङ्गि परित्यज्य शुभं नृपम् अनुकूलं पतिं पश्चात्सा चकार शठं पतिम् कामार्ता च यदा जाता मोहेन व्याकुलान्तरा पञ्चम स्कन्ध ६१७ संयोगमें सुख उत्पन्न होता है और वियोगमें ५५ दुःख । तुम सुन्दर, रूपवती और सभी आभूषणोंसे अलंकृत हो । [ यह सब होते हुये भी ] तुझमें चतुरता क्यों नहीं है, जिससे तुम मुझे स्वीकार नहीं कर रही ५६ हो? इस तरह भोगोंको छोड़ देनेका परामर्श तुम्हें किसने दिया है? हे मधुरभाषिणि! [ ऐसा करके ] किसी शत्रुने तुम्हें धोखा दिया है॥५५-५६३ ॥ ५७ हे कान्ते! अब तुम यह आग्रह छोड़ दो और अत्यन्त सुन्दर कार्य करनेमें तत्पर हो जाओ । विवाह सम्पन्न हो जानेपर तुम्हें और मुझे दोनोंको सुख प्राप्त होगा | विष्णु लक्ष्मी साथ, ब्रह्मा सावित्रीके साथ, ५८ शंकर पार्वती के साथ तथा इन्द्र शचीके साथ रहकर ही सुशोभित होते हैं । पतिके बिना कौन स्त्री चिरस्थायी ५ ९ सुख प्राप्त कर सकती है? हे सुन्दरि! [ कौन - सा ऐसा कारण है ] जिससे तुम मुझ जैसे उत्तम पुरुषको अपना पति नहीं बना रही हो? ॥ ५७ - ५ ९ ३ ॥ हे कान्ते! न जाने मन्दबुद्धि कामदेव इस समय ॥ ६० कहाँ चला गया जो अपने अत्यन्त कोमल तथा मादक पंचबाणोंसे तुम्हें आहत नहीं कर रहा है । हे सुन्दरि! मुझे तो लगता है कि कामदेव भी तुम्हारे ऊपर दयालु ६१ हो गया है और तुम्हें अबला समझते हुए वह अपने बाण नहीं छोड़ रहा है । हे तिरछी चितवनवाली सुन्दरि! सम्भव है उस कामदेवको भी मेरे साथ कुछ ६२ शत्रुता हो, इसीलिये वह तुम्हारे ऊपर बाण न चलाता हो । अथवा यह भी हो सकता है कि मेरे सुखका नाश करनेवाले मेरे शत्रु देवताओंने उस कामदेवको ६३ मना कर दिया हो, इसीलिये वह तुम्हारे ऊपर [ अपने बाणोंसे ] प्रहार नहीं कर रहा है । ६० - ६३३ ॥ हे मृगशावकके समान नेत्रोंवाली! मुझे त्यागकर ६४ तुम मन्दोदरीकी भाँति पश्चात्ताप करोगी, हे तन्वंगि! पतिरूपमें प्राप्त सुन्दर तथा अनुकूल राजाका त्याग । करके बाद वह मन्दोदरी जब कामार्त तथा मोहसे । व्याकुल अन्तःकरणवाली हो गयी, तब उसने एक ॥ ६५ । धूर्तको अपना पति बना लिया था ॥ ६४-६५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषद्वारा देवीप्रबोधनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
पृष्ठ 627
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ अथ सप्तदशोऽध्यायः महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना व्यास उवाच इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवी पप्रच्छ दानवम् । का सा मन्दोदरी नारी को ऽसौ त्यक्तो नृपस्तया । १
शठः को वा नृपः पश्चात्तन्मे ब्रूहि कथानकम् ।
विस्तरेण यथा प्राप्तं दुःखं वनितया पुनः ॥ २
महिष उवाच
सिंहलो नाम देशोऽस्ति विख्यातः पृथिवीतले ।
घनपादपसंयुक्तो धनधान्यसमृद्धिमान् ॥३
चन्द्रसेनाभिधस्तत्र राजा धर्मपरायणः ।
न्यायदण्डधरः शान्तः प्रजापालनतत्परः ॥ ४
सत्यवादी मृदुः शूरस्तितिक्षुर्नीतिसागरः ।
शास्त्रवित्सर्वधर्मज्ञो धनुर्वेदेऽतिनिष्ठितः ॥ ५
तस्य भार्या वरारोहा सुन्दरी सुभगा शुभा ।
सदाचारातिसुमुखी पतिभक्तिपरायणा ॥ ६
नाम्ना गुणवती कान्ता सर्वलक्षणसंयुता ।
सुषुवे प्रथमे गर्भे पुत्रीं सा चातिसुन्दरीम् ॥ ७
पिता चातीव सन्तुष्टः पुत्रीं प्राप्य मनोरमाम् ।
मन्दोदरीति नामास्याः पिता चक्रे मुदान्वितः ॥ ८
इन्दोः कलेव चात्यर्थं ववृधे सा दिने दिने ।
दशवर्षा यदा जाता कन्या चातिमनोहरा ॥ ९
वरार्थं नृपतिश्चिन्तामवाप च दिने दिने ।
मद्रदेशाधिपः शूरः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १०
तस्य पुत्रोऽतिमेधावी कम्बुग्रीवोऽतिविश्रुतः ।
ब्राह्मणैः कथितो राज्ञे स युक्तोऽस्या वरः शुभः ॥ ११
सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वविद्यार्थपारगः । व्यासजी बोले - [ हे महाराज! ] उसका यह वचन सुनकर भगवतीने उस दानवसे पूछा- वह स्त्री मन्दोदरी कौन थी और वह राजा कौन था, जिसे उसने त्याग दिया था? ॥१ ॥
बादमें उसने जिसे पति बनाया, वह धूर्त राजा कौन था? उस स्त्रीको पुनः जिस प्रकार दुःख मिला हो, वह कथानक विस्तारपूर्वक बताओ ॥ २ ॥
महिषासुर बोला - पृथ्वीतलपर विख्यात सिंहल नामक एक देश है । उसमें बहुत ही घने - घने वृक्ष हैं और वह धन - धान्यसे समृद्ध है ॥ ३ ॥
वहाँ चन्द्रसेन नामका राजा राज्य करता था, जो बड़ा धर्मात्मा, शान्तस्वभाव, प्रजापालनमें तत्पर, | न्यायपूर्वक शासन - कार्य करनेवाला, सत्यवादी, मृदु स्वभाववाला, वीर, सहिष्णु, नीतिशास्त्रका सागर, शास्त्रवेत्ता, सब धर्मोंका ज्ञाता और धनुर्वेदमें अत्यन्त प्रवीण था ॥ ४-५ ॥ उसकी भार्या भी रूपवती, सुन्दरी, सौभाग्य-शालिनी, सद्गुणी, सदाचारिणी, अत्यन्त सुन्दर मुखवाली, पतिभक्तिमें लीन रहनेवाली, मनोहर और सभी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थी । उसका नाम गुणवती था । उसने प्रथम गर्भसे एक अति सुन्दर कन्याको जन्म दिया॥६-७ ॥ उस मनोरम कन्याको पाकर पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका नाम मन्दोदरी रखा ॥८ ॥
वह कन्या चन्द्रमाकी कलाके समान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी । अत्यन्त मनोहारिणी वह कन्या जब दस वर्षकी हुई, तब उसके वरके लिये राजा चन्द्रसेन प्रतिदिन चिन्तित रहने लगे ॥ ९ ३ ॥ उस समय मद्रदेशके अधिपति सुधन्वा नामवाले एक पराक्रमी नरेश थे । कम्बुग्रीव नामसे अति विख्यात उनका एक पुत्र था, जो बहुत मेधावी था । ब्राह्मणोंने राजा चन्द्रसेनसे कहा कि कम्बुग्रीव उस कन्याके योग्य वर है । वह सुन्दर, सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा समस्त विद्याओंमें पारंगत है ॥ १० - ११३ ॥
पृष्ठ 628
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ] पञ्चम राज्ञा पृष्टा तदा राज्ञी नाम्ना गुणवती प्रिया ॥ १२
कम्बुग्रीवाय कन्यां स्वां दास्यामि वरवर्णिनीम् ।
सा तु पत्युर्वचः श्रुत्वा पुत्रीं पप्रच्छ सादरम् ॥ १३
विवाहं ते पिता कर्तुं कम्बुग्रीवेण वाञ्छति ।
तच्छ्रुत्वा मातरं प्राह वाक्यं मन्दोदरी तदा ॥ १४
नाहं पतिं करिष्यामि नेच्छा मेऽस्ति परिग्रहे ।
कौमारं व्रतमास्थाय कालं नेष्यामि सर्वथा ॥ १५
स्वातन्त्र्येण चरिष्यामि तपस्तीव्रं सदैव हि ।
पारतन्त्र्यं परं दुःखं मातः संसारसागरे ॥ १६
स्वातन्त्र्यान्मोक्षमित्याहुः पण्डिताः शास्त्रकोविदाः ।
तस्मान्मुक्ता भविष्यामि पत्या मे न प्रयोजनम् ॥ १७
विवाहे वर्तमाने तु पावकस्य च सन्निधौ ।
वक्तव्यं वचनं सम्यक्त्वदधीनास्मि सर्वदा ॥ १८
श्वश्रूदेवरवर्गाणां दासीत्वं श्वशुरालये ।
पतिचित्तानुवर्तित्वं दुःखाद्दुःखतरं स्मृतम् ॥ १ ९
कदाचित्पतिरन्यां वा कामिनीं च भजेद्यदि ।
तदा महत्तरं दुःखं सपत्नीसम्भवं भवेत् ॥ २०
तदेर्ष्या जायते पत्यौ क्लेशश्चापि भवेदथ ।
संसारे क्व सुखं मातर्नारीणां च विशेषतः ॥ २१
स्वभावात्परतन्त्राणां संसारे स्वप्नधर्मिणि ।
श्रुतं मया पुरा मातरुत्तानचरणात्मज: ॥ २२
उत्तमः सर्वधर्मज्ञो ध्रुवादवरजो नृपः ।
पत्नीं धर्मपरां साध्वीं पतिभक्तिपरायणाम् ॥ २३
अपराधं विना कान्तां त्यक्तवान्विपिने प्रियाम् । स्कन्ध ६१ ९ तब राजाने गुणवती नामवाली अपनी प्रिय रानीसे पूछा– [ मेरा विचार है कि ] मैं अपनी सुन्दर पुत्री मन्दोदरीको कम्बुग्रीवको सौंप दूँ ॥ १२३ ॥
पतिकी यह बात सुनकर उस रानीने अपनी पुत्रीसे आदरपूर्वक पूछा- तुम्हारे पिता कम्बुग्रीवके साथ तुम्हारा विवाह करना चाहते हैं ॥ १३३ ॥
तब यह सुनकर मन्दोदरीने मातासे यह वचन कहा- मैं पति नहीं बनाऊँगी, विवाह करनेमें मेरी अभिरुचि नहीं है । मैं सदा कौमार्यव्रतका आश्रय लेकर अपना जीवन व्यतीत करूँगी । मैं स्वतन्त्रतापूर्वक सदा कठोर तप करूँगी । हे माता! संसारसागरमें परतन्त्रता परम दुःख है । स्वतन्त्रतासे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है - ऐसा शास्त्रोंके ज्ञाता पण्डितजनोंने कहा है, अतएव मैं बन्धन से मुक्त रहूँगी, मुझे पतिसे कोई भी प्रयोजन नहीं है ॥ १४–१७ ॥ विवाह होते समय अग्निके साक्ष्यमें [ प्रतिज्ञा-रूपमें ] यह वचन कहना पड़ता है -- ' [ हे पतिदेव! ] अब मैं सदाके लिये पूर्णरूपसे आपके अधीन हो चुकी हूँ । ' इसके अतिरिक्त ससुरालमें सास तथा देवर आदि लोगोंकी दासी बनकर रहना तथा सदा पतिके अनुकूल रहना अत्यन्त दुःखदायक बताया गया है ॥ १८-१९ ॥ कहीं यदि पतिने अन्य स्त्रीके साथ विवाह कर लिया तब तो सौतसे मिलनेवाला महान् दुःख उपस्थित हो जाता है । उस समय पतिके प्रति ईर्ष्याभाव उत्पन्न हो जाता है, कलह भी होने लगता है । हे माता! संसारमें सुख कहाँ है? और विशेष करके स्वभावसे ही परतन्त्र नारियोंके लिये इस स्वप्नधर्मा संसारमें सुख है ही नहीं ॥ २०-२१३ ॥ हे माता! मैंने सुना है कि प्राचीनकालमें राजा उत्तानपादके एक ' उत्तम ' नामक पुत्र थे, जो समस्त धर्मोंके ज्ञाता एवं ध्रुवके कनिष्ठ भ्राता थे । उन्होंने अपनी धर्मनिष्ठ, पतिव्रता, पतिके प्रति भक्तिभाव रखनेवाली, प्रिय तथा सुन्दर पत्नीको बिना किसी अपराधके ही वनमें छोड़ दिया था ॥ २२ - २३३ ॥
पृष्ठ 629
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६२० एवंविधानि दुःखानि विद्यमाने तु भर्तरि कालयोगान्मृते तस्मिन्नारी स्याद्दुःखभाजनम् वैधव्यं परमं दुःखं शोकसन्तापकारकम् ॥
परोषितपतित्वेऽपि दुःखं स्यादधिकं गृहे ।
मदनाग्निविदग्धायाः किं सुखं पतिसङ्गजम् ॥
तस्मात्पतिर्न कर्तव्यः सर्वथेति मतिर्मम एवं प्रोक्ता तदा माता पतिं प्राह नृपात्मजा न च वाञ्छति भर्तारं कौमारव्रतधारिणी व्रतजाप्यपरा नित्यं संसाराद्विमुखी सदा न काङ्क्षति पतिं कर्तुं बहुदोषविचक्षणा भार्याया भाषितं श्रुत्वा तथैव संस्थितो नृपः विवाहो न कृतः पुत्र्या ज्ञात्वा भावविवर्जिताम् वर्तमाना गृहेष्वेव पित्रा मात्रा च रक्षिता यौवनस्याङ्करा जाता नारीणां कामदीपकाः । तथापि सा वयस्याभिः प्रेरितापि पुनः पुनः
चकमे न पतिं कर्तुं ज्ञानार्थपदभाषिणी ।
एकदोद्यानदेशे सा विहर्तुं बहुपादपे ॥
जगाम सुमुखी प्रेम्णा सैरन्ध्रीगणसेविता ।
रेमे कृशोदरी तत्रापश्यत्कुसुमिता लता: ॥
पुष्पाणि चिन्वती रम्या वयस्याभिः समावृता ।
कोसलाधिपतिस्तत्र मार्गे दैववशात्तदा ॥
आजगाम महावीरो वीरसेनोऽतिविश्रुतः ।
एकाकी रथमारूढः कतिचित्सेवकैर्वृतः ॥
सैन्यं च पृष्ठतस्तस्य समायाति शनैः शनैः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ ॥ २४ पतिके रहते हुए भी इस प्रकारके अनेक दुःख स्त्रीको सहने पड़ते हैं । दैवयोगसे उसकी मृत्यु हो । जानेपर स्त्रीको [ विधवा बनकर ] दुःख उठाना २५ पड़ता है; क्योंकि वैधव्य परम दुःखमय होता है तथा नानाविध शोक एवं संताप उत्पन्न करता रहता है । पतिके परदेश चले जानेपर कामदेवकी अग्निमें जलती २६ हुई स्त्रीको घरमें अत्यधिक दुःख सहना पड़ता है, तो फिर उसे पतिसंगजनित क्या सुख प्राप्त हुआ? | अतएव मेरा तो यही मत है कि स्त्रियोंको विवाह कभी नहीं करना चाहिये ॥ २४ - २६३ ॥ ॥ २७ [ पुत्रीके ] ऐसा कहनेपर उसकी माताने अपने । पति से कहा- कौमारव्रत धारण करनेकी इच्छावाली वह राजकुमारी पतिकी कामना नहीं करती है । संसारसे ॥ २८ विरक्त रहकर वह सदा व्रत और जपमें तत्पर रहना । चाहती है । [ पतिसंगजनित ] अनेक दोषोंको जाननेवाली वह कन्या विवाह नहीं करना चाहती ॥ २७-२८३ ॥ ॥ २ ९ अपनी भार्याकी बात सुनकर राजा चन्द्रसेन भी चुप रह गये | अपनी पुत्रीको विवाहकी इच्छासे रहित । भाववाली जानकर राजाने भी उसका विवाह नहीं ॥ ३० किया । वह मन्दोदरी भी माता - पिताके द्वारा भलीभाँति रक्षित होती हुई घरपर ही रहने लगी । कुछ समय पश्चात् नारियोंमें कामोत्तेजना उत्पन्न करनेवाले यौवन-॥ ३१ सम्बन्धी लक्षण उसमें विकसित होने लगे । उस समय उसकी सखियोंने विवाहके लिये उसे बार - बार प्रेरित किया, फिर भी ज्ञान - तत्त्वकी बातें कहकर वह मन्दोदरी ३२ पति बनानेके लिये तैयार न हुई ॥ २ ९ –३१३ ॥ एक दिन सुन्दर मुखवाली वह कन्या अपनी दासियोंके साथ बहुत - से वृक्षोंसे सुशोभित उद्यानमें ३३ आनन्दपूर्वक विहार करनेके लिये गयी । उस कृशोदरीने वहाँ पुष्पित लताओंको देखा और अपनी सखियोंके साथ पुष्प चुनती हुई वह वहींपर क्रीडाविहार करने लगी ॥ ३२-३३३ ॥ ३४ उसी समय उस मार्ग से संयोगवश कोसलनरेश वीरसेन आ गये । वे महान् शूरवीर तथा बहुत विख्यात थे । वे रथपर अकेले ही आरूढ़ थे तथा उनके साथ ३५ कुछ सेवक भी थे और सेना उनके पीछे धीरे - धीरे चली आ रही थी ॥ ३४-३५३ ॥
पृष्ठ 630
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १७ ] पञ्चम दृष्टस्तस्या वयस्याभिर्दूरतः पार्थिवस्तदा ॥ ३६
मन्दोदर्यै तथा प्रोक्तं समायाति नरः पथि ।
रथारूढो महाबाहू रूपवान्मदनोऽपरः ॥ ३७
मन्येऽहं नृपतिः कश्चित्प्राप्तो भाग्यवशादिह ।
एवं ब्रुवत्यां तत्रासौ कोसलेन्द्रः समागतः ॥ ३८
दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मयं प्राप भूपतिः ।
उत्तीर्य स रथात्तूर्णं पप्रच्छ परिचारिकाम् ॥ ३ ९
केयं बाला विशालाक्षी कस्य पुत्री वदाशु मे ।
एवं पृष्टा तु सैरन्ध्री तमुवाच शुचिस्मिता ॥ ४०
प्रथमं ब्रूहि मे वीर पृच्छामि त्वां सुलोचन ।
कोऽसि त्वं किमिहायातः किं कार्यं वद साम्प्रतम् ॥ ४१
इति पृष्टस्तु सैरन्ध्रया तामुवाच महीपतिः ।
कोसलो नाम देशोऽस्ति पृथिव्यां परमाद्भुतः ॥ ४२
तस्य पालयिता चाहं वीरसेनाभिधः प्रिये ।
वाहिनी पृष्ठतः कामं समायाति चतुर्विधा ॥ ४३
मार्गभ्रमादिह प्राप्तं विद्धि मां कोसलाधिपम् । सैरन्ध्रयुवाच चन्द्रसेनसुता राजन्नाम्ना मन्दोदरी किल ॥४४
उद्याने रन्तुकामेयं प्राप्ता कमललोचना ।
श्रुत्वा तद्भाषितं राजा प्रत्युवाच प्रसाधिकाम् ॥ ४५
सैरन्ध्रि चतुरासि त्वं राजपुत्रीं प्रबोधय ।
ककुत्स्थवंशजश्चाहं राजास्मि चारुलोचने ॥ ४६
गान्धर्वेण विवाहेन पतिं मां कुरु कामिनि ।
न मे भार्यास्ति सुश्रोणि वयसोऽद्भुतयौवनाम् ॥ ४७
वाञ्छामि रूपसम्पन्नां सुकुलां कामिनीं किल ।
अथवा ते पिता मह्यं विधिना दातुमर्हति ॥ ४८
अनुकूलः पतिश्चाहं भविष्यामि न संशयः । स्कन्ध ६२१ तभी उसकी सखियोंने दूरसे ही राजाको देख लिया और [ उनमेंसे किसी युवतीने ] मन्दोदरीसे कहा - विशाल भुजाओंवाला, रूपवान् तथा दूसरे | कामदेवके समान एक पुरुष रथपर सवार होकर इस मार्गसे चला आ रहा है । मैं तो यह मानती हूँ कि यहाँ भाग्यवश कोई राजा ही आ गया है ॥ ३६-३७३ ॥ वह युवती ऐसा कह रही थी कि इतनेमें कोसल - नरेश वीरसेन वहाँ आ गये । उस श्याम कटाक्षोंवाली मन्दोदरीको देखकर राजा विस्मयमें पड़ गये । रथसे तुरंत उतरकर उन्होंने दासीसे पूछा— विशाल नेत्रोंवाली यह युवती कौन है और किसकी पुत्री है? मुझे शीघ्र बताओ ॥ ३८-३९ ३ ॥ इस प्रकार पूछे जानेपर मधुर मुसकानवाली दासीने उनसे कहा - सुन्दर नेत्रोंवाले हे वीर! पहले आप मुझे बतायें, मैं आपसे पूछ रही हूँ कि आप कौन हैं? यहाँ किसलिये आये हैं और यहाँ आपका कौन-सा कार्य है? [ यह सब ] अभी बतानेकी कृपा
करें । ४०-४१ ॥
दासीके यह पूछनेपर राजाने उससे कहा— पृथ्वीपर अत्यन्त अद्भुत कोसल नामक एक देश है । हे प्रिये! वीरसेन नामवाला मैं उसी देशका शासक हूँ । मेरी विशाल चतुरंगिणी सेना पीछे - पीछे आ रही है । मार्ग भूल जानेके कारण यहाँ आये हुए मुझको तुम कोसलदेशका राजा समझो ॥ ४२-४३३ ॥ सैरन्ध्री बोली - हे राजन्! यह महाराज चन्द्रसेनकी पुत्री है और इसका नाम मन्दोदरी है । कमलसदृश नेत्रोंवाली यह राजकुमारी विहार करनेकी इच्छासे इस उपवनमें आयी है ॥ ४४३ ॥
उसकी बात सुनकर राजाने उस सैरन्ध्रीसे कहा-सैरन्ध्रि! तुम चतुर हो, अतः राजकुमारीको समझा दो । ' हे सुनयने! मैं ककुत्स्थवंशमें उत्पन्न एक राजा हूँ । अतः हे कामिनि! तुम गान्धर्व - विवाहके द्वारा मुझे पति बना लो । हे सुश्रोणि! मेरी कोई भार्या नहीं है । मैं भी अद्भुत यौवनावस्थासे सम्पन्न, रूपवती और कुलीन युवतीकी आकांक्षा रखता हूँ । अथवा [ यदि गान्धर्व-विवाह पसन्द न हो तो ] तुम्हारे पिता विधि - विधानसे तुमको मुझे सौंप दें । मैं सर्वथा तुम्हारे अनुकूल पति होऊँगा; इसमें सन्देह नहीं है ' ॥ ४५ – ४८३ ॥