देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 611–620
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
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६०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ तुष्टुवुस्तां तदा देवीं दुर्मुखे निहतेऽमराः । दुर्मुखके मर जानेपर आकाशमें विद्यमान देवता पुष्पवृष्टिं तथा चक्रुर्जयशब्दं नभः स्थिताः ॥ ४ ९ भगवतीकी स्तुति करने लगे । उनपर पुष्प बरसाने लगे तथा उनकी जयकार करने लगे ॥ ४ ९ ॥ ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरकिन्नराः । रणभूमिमें उस महान् दानवको मरा हुआ देखकर ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नर
जहृषुस्तं हतं दृष्ट्वा दानवं रणमस्तके ॥ ५० । आनन्दित हो उठे ॥ ५० ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषसेनाधिप-बाष्कलदुर्मुखनिपातनवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः चिक्षुर और ताम्रका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध व्यास उवाच
दुर्मुखं निहतं श्रुत्वा महिषः क्रोधमूर्च्छितः ।
उवाच दानवान्सर्वान्किं जातमिति चासकृत् ॥ १
निहतौ दानवौ शूरौ रणे दुर्मुखबाष्कलौ ।
तन्व्या तत्परमाश्चर्यं पश्यन्तु दैवचेष्टितम् ॥ २
कालो हि बलवान्कर्ता सततं सुखदुःखयोः ।
नराणां परतन्त्राणां पुण्यपापानुयोगतः ॥ ३
निहतौ दानवश्रेष्ठौ किं कर्तव्यमतः परम् ।
ब्रुवन्तु मिलिताः सर्वे यद्युक्तं कार्यसङ्कटे ॥ ४
व्यास उवाच
एवं ब्रुवति राजेन्द्र महिषेऽतिबलान्विते ।
चिक्षुराख्यस्तु सेनानीस्तमुवाच महारथः ॥ ५
राजन्नहं हनिष्यामि का चिन्ता स्त्रीविहिंसने ।
इत्युक्त्वा स्वबलैर्युक्तः प्रययौ रथसंयुतः ॥ ६
द्वितीयं पाणिरक्षं तु कृत्वा ताम्रं महाबलम् ।
महता सैन्यघोषेण पूरयन्गगनं दिशः ॥ ७
तमागच्छन्तमालोक्य देवी भगवती शिवा ।
चकार शङ्खज्याघोषं घण्टानादं महाद्भुतम् ॥ ८
तत्रसुस्तेन शब्देन ते च सर्वे सुरारयः ।
किमेतदिति भाषन्तो दुद्रुवुर्भयकम्पिताः ॥ ९
व्यासजी बोले- हे राजन्! दुर्मुख मार दिया गया ---यह सुनकर महिषासुर क्रोधसे मूर्च्छित हो गया और दानवोंसे बार - बार कहने लगा - ' यह क्या हो गया? ' दुर्मुख और बाष्कल तो बड़े शूर - वीर दानव थे । एक सुकुमार नारीने उन्हें रणभूमिमें मार डाला, यह तो महान् आश्चर्य है! दैवका विधान तो देखो ॥ १-२ ॥ समय बड़ा बलवान् होता है, वही परतन्त्र मनुष्योंके पुण्य तथा पापके अनुसार सदा उनके सुखों - दु: खोंका निर्माण करता है ॥ ३ ॥
ये दोनों ही श्रेष्ठ दानव मार डाले गये हैं, अब इसके बाद क्या करना चाहिये? इस विषम स्थितिमें सब लोग विचार करके जो उचित हो, बतायें ॥ ४ ॥
व्यासजी बोले- हे राजेन्द्र! इस प्रकार महाशक्तिशाली महिषासुरके कहनेपर उसके महारथी सेनाध्यक्ष चिक्षुरने कहा- हे राजन्! स्त्रीको मार डालनेमें चिन्ता किस बातकी! मैं उसे मार डालूँगा ॥ ५३ ॥
ऐसा कहकर वह चिक्षुराख्य रथपर बैठकर दूसरे महाबली ताम्रको अपना अंगरक्षक बनाकर सेनाकी तुमुल ध्वनिसे आकाश एवं दिशाओंको निनादित करता हुआ युद्धके लिये चल पड़ा ॥ ६-७ ॥ उसे आता हुआ देखकर कल्याणमयी भगवतीने अद्भुत शंखध्वनि, घण्टानाद तथा धनुषकी टंकार की । उस ध्वनिसे सभी राक्षस भयभीत हो गये । ' यह क्या ' – ऐसा कहते हुए वे भयसे काँपने लगे तथा भाग खड़े हुए ॥ ॥ ८ - ९ ॥
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अ ० १४ ]
चिक्षुराख्यस्तु तान्दृष्ट्वा पलायनपरायणान् ।
उवाचातीव संक्रुद्धः किं भयं वः समागतम् ॥
अद्यैवाहं हनिष्यामि बाणैर्बालां मदोन्नताम् ।
तिष्ठन्त्वत्र भयं त्यक्त्वा दैत्याः समरमूर्धनि ॥
इत्युक्त्वा दानवश्रेष्ठश्चापपाणिर्बलान्वितः ।
आगत्य सङ्गरे देवीमित्युवाच गतव्यथः ॥
किं गर्जसि विशालाक्षि भीषयन्तीतरान्नरान् ।
नाहं बिभेमि तन्वङ्गि श्रुत्वा तेऽद्य विचेष्टितम् ॥
स्त्रीवधे दूषणं ज्ञात्वा तथैवाकीर्तिसम्भवम् ।
उपेक्षां कुरुते चित्तं मदीयं वामलोचने ॥
स्त्रीणां युद्धं कटाक्षैश्च तथा हावैश्च सुन्दरि ।
न शस्त्रैर्विहितं क्वापि त्वादृशीनां कदाचन ॥
पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः ।
भवादृशीनां देहेषु दुनोति मालतीदलम् ॥
धिग्जन्म मानुषे लोके क्षात्रधर्मानुजीविनाम् ।
लालितोऽयं प्रियो देहः कृन्तनीयः शितैः शरैः ॥
तैलाभ्यङ्गैः पुष्पवातैस्तथा मिष्टान्न भोजनैः ।
पोषितोऽयं प्रियो देहो घातनीयः परेषुभिः ॥
देहं छित्त्वासिधाराभिर्धनभृज्जायते नरः ।
धिग्धनं दुःखदं पूर्वं पश्चात्किं सुखदं भवेत् ॥
त्वमप्यज्ञैव वामोरु युद्धमाकाङ्क्षसे यतः ।
सुखं सम्भोगजं त्यक्त्वा कं गुणं वेत्सि सङ्गरे ॥
खड्गपातं गदाघातं भेदनञ्च शिलीमुखैः ।
मरणान्ते तु संस्कारो गोमायुमुखकर्षणम् ॥
पञ्चम स्कन्ध ६०३ उन्हें भागते हुए देखकर चिक्षुराख्यने अत्यन्त क्रोधित होकर कहा- तुम्हारे सामने कौन - सा भय आ १० गया? मैं इस मदोन्मत्त नारीको आज ही बाणोंद्वारा मार डालूँगा । हे दैत्यो! तुम लोग भय छोड़कर लड़ाईके मोर्चेपर डटे रहो॥१०-११ ॥ ११ ऐसा कहकर उस पराक्रमी दैत्य श्रेष्ठ चिक्षुरने हाथमें धनुष उठा लिया और युद्धभूमिमें आकर वह निश्चिन्ततापूर्वक भगवतीसे कहने लगा – हे १२ विशालाक्षि! अन्य साधारण मनुष्योंको भयभीत करती हुई तुम क्यों गरज रही हो? तुम्हारा यह व्यर्थ गर्जन सुनकर मैं भयभीत नहीं हो सकता ॥ १२-१३ ॥ १३ हे सुलोचने! स्त्रीका वध करना पाप है तथा इससे जगत्में अपकीर्ति होती है - यह जानकर मेरा चित्त तुम्हें मारनेसे विचलित हो रहा है । हे सुन्दरि! १४ तुम जैसी स्त्रियोंके कटाक्षों तथा हाव - भावोंसे समरका कार्य सम्पन्न हो जाता है; कभी कहीं भी शस्त्रों द्वारा स्त्रीका युद्ध नहीं हुआ है ॥ १४-१५ ॥ हे सुन्दरि! तुम्हें तो पुष्पसे भी युद्ध नहीं करना १५ चाहिये, तब फिर तीक्ष्ण बाणोंसे युद्धकी बात ही क्या; क्योंकि तुम्हारी - जैसी सुन्दरियोंके शरीरमें मालतीकी पंखुड़ी भी पीड़ा उत्पन्न कर सकती है ॥ १६ ॥
१६ इस संसार में क्षात्रधर्मानुयायी लोगोंके जन्मको धिक्कार है; क्योंकि वे बड़े प्यारसे पाले गये अपने शरीरको भी तीक्ष्ण बाणोंसे छिदवाते हैं! ॥ १७ ॥
१७ तेलकी मालिशसे, फूलोंकी हवासे तथा स्वादिष्ट भोजन आदिसे पोषित इस प्रिय शरीरको शत्रुओंके बाणोंसे बंधवाते हैं । तलवारकी धारसे १८ अपना शरीर कटवाकर मनुष्य धनवान् होना चाहते हैं । ऐसे धनको धिक्कार है जो प्रारम्भमें ही दुःख देनेवाला होता है; तो बादमें क्या वह सुख देनेवाला हो सकता है? ॥ १८-१९ ॥ १ ९ हे सुन्दरि! तुम भी मूर्ख ही हो, तभी तो सम्भोगजन्य सुखको त्यागकर युद्धकी इच्छा कर रही हो । युद्धमें तुम कौन - सा लाभ समझ रही हो? ॥ २० ॥
२० युद्धमें तलवारें चलती हैं, गदाका प्रहार होता है और बाणोंसे शरीरका बेधन किया जाता है । मृत्युके अन्तमें सियार अपने मुँहसे नोच - नोचकर २१ । उस देहका संस्कार करते हैं ॥२१ ॥
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६०४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ तस्यैव कविभिर्धूर्तैः कृतं चातीव शंसनम् । धूर्त कवियोंने उसी युद्धकी अत्यन्त प्रशंसा की रणे मृतानां स्वःप्राप्तिरर्थवादोऽस्ति केवलः ॥ २२ है कि रणभूमिमें मरनेवालोंको स्वर्ग प्राप्त होता है ।
तस्माद् गच्छ वरारोहे यत्र ते रमते मनः ।
भज वा भूपतिं नाथं हयारिं सुरमर्दनम् ॥
व्यास उवाच
एवं ब्रुवाणं तं दैत्यं प्रोवाच जगदम्बिका ।
किं मृषा भाषसे मूढ बुद्धिमानिव पण्डितः ॥
नीतिशास्त्रं न जानासि विद्यां चान्वीक्षिकीं तथा ।
न सेवितास्त्वया वृद्धा न धर्मे मतिरस्ति ते ॥
मूर्खसेवापरो यस्मात्तस्मात्त्वं मूर्ख एव हि ।
राजधर्मं न जानासि किं ब्रवीषि ममाग्रतः ॥
संग्रामे महिषं हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् ।
यशः स्तम्भं स्थिरं कृत्वा गमिष्यामि यथासुखम् ॥
देवानां दुःखदातारं दानवं मदगर्वितम् ।
हनिष्येऽहं दुराचारं युद्धं कुरु स्थिरो भव ॥
जीवितेच्छास्ति चेन्मूढ महिषस्य तथा तव ।
तदा गच्छन्तु पातालं दानवाः सर्व एव ते ॥
मुमूर्षा यदि वश्चित्ते युद्धं कुर्वन्तु सत्वराः ।
सर्वानेव वधिष्यामि निश्चयोऽयं ममाधुना ॥
व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दानवो बलदर्पितः ।
मुमोच बाणवृष्टिं तां घनवृष्टिमिवापराम् ॥
चिच्छेद तस्य सा बाणान्स्वबाणैर्निशितैस्तदा ।
जघान तं तथा घोरैराशीविषसमैः शरैः ॥
युद्धं परस्परं तत्र बभूव विस्मयप्रदम् ।
गदया घातयामास तं रथाज्जगदम्बिका ॥
उनका यह कहना केवल अर्थवादमात्र है ॥ २२ ॥
अतः हे वरारोहे! तुम्हारा मन जहाँ लगे, वहाँ २३ चली जाओ अथवा तुम देवताओंका दमन करनेवाले मेरे स्वामी महाराज महिषासुरको स्वीकार कर लो ॥ २३ ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार बोलते हुए उस दैत्यसे भगवती जगदम्बाने कहा - मूर्ख! तुम अपनेको २४ बुद्धिमान् पण्डितके समान मानकर व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? तुम न तो नीतिशास्त्र जानते हो, न आन्वीक्षिकी विद्या ही जानते हो, तुमने कभी न २५ वृद्धोंकी सेवा की है और न तो तुम्हारी बुद्धि ही
धर्मपरायण है । २४-२५ ॥
क्योंकि तुम मूर्खकी सेवामें लगे रहते हो, अतः २६ तुम भी मूर्ख हो । जब तुम्हें राजधर्म ही ज्ञात नहीं, तब मेरे सामने क्यों व्यर्थ बकवाद कर रहे हो? ॥ २६ ॥
संग्राममें महिषासुरका वध करके समरांगणको २७ रुधिरसे पंकमय बनाकर अपना यश - स्तम्भ सुदृढ़ स्थापितकर मैं सुखपूर्वक चली जाऊँगी ॥ २७ ॥
देवताओंको दुःख देनेवाले इस दुराचारी तथा २८ मदोन्मत्त दानवको मैं अवश्य मार डालूंगी । तुम सावधान होकर युद्ध करो । हे मूर्ख! यदि तुम्हें तथा महिषासुरको जीनेकी अभिलाषा हो तो सभी दानव २ ९ पाताललोकको शीघ्र ही चले जायँ; अन्यथा यदि तुमलोगोंके मनमें मरनेकी इच्छा हो तो तुरंत युद्ध करो । यह मेरा संकल्प है कि मैं सभी दानवोंको मार ३० | डालूंगी ॥ २८-३० ॥ व्यासजी बोले – देवीका वचन सुनकर बलके अभिमानसे युक्त वह दैत्य उनपर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगा, मानो दूसरे मेघ ही जलकी धारा ३१ । बरसा रहे हों ॥ ३१ ॥
तब भगवतीने अपने तीक्ष्ण बाणोंद्वारा उसके सभी बाण काट डाले और विषधर सर्पके समान ३२ विषैले बाणोंसे उसपर प्रहार किया । उन दोनोंमें परस्पर विस्मयकारी युद्ध होने लगा । जगदम्बाने अपने वाहन सिंहपरसे ही उस दैत्यपर गदासे प्रहार ३३ | किया ॥३२-३३ ॥
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अ ० १४ ]
मूर्च्छा प्राप स दुष्टात्मा गदयाभिहतो भृशम् ।
मुहूर्तद्वयमात्रं तु रथोपस्थ इवाचलः ॥
तं तथामूच्छितं दृष्ट्वा ताम्रः परबलार्दनः ।
आजगाम रणे योद्धुं चण्डिकां प्रति चापलात् ॥
आगच्छन्तं तु तं वीक्ष्य हसन्ती प्राह चण्डिका ।
एह्येहि दानवश्रेष्ठ यमलोकं नयाम्यहम् ॥
किं भवद्भिः समायातैरबलैश्च गतायुषैः ।
महिषः किं गृहे मूढः करोति जीवनोद्यमम् ॥
किं भवद्भिर्हतैर्मन्दैर्ममापि विफलः श्रमः ।
अहते महिषे पापे सुरशत्रौ दुरात्मनि ॥
तस्माद्यूयं गृहं गत्वा महिषं प्रेषयन्त्विह ।
पश्येन्मां सोऽपि मन्दात्मा यादृशीं तादृशीं स्थिताम् ॥
ताम्रस्तद्वचनं श्रुत्वा बाणवृष्टिं चकार ह ।
चण्डिकां प्रति कोपेन कर्णाकृष्टशरासनः ॥
भगवत्यपि ताम्राक्षी समाकृष्य शरासनम् ।
बाणान्मुमोच तरसा हन्तुकामा सुराहितम् ॥
चिक्षुराख्योऽपि बलवान्मूर्च्छा त्यक्त्वोत्थितः पुनः । गृहीत्वा सशरं चापं तस्थौ तत्सम्मुखः क्षणात्
चिक्षुराख्यश्च ताम्रश्च द्वावप्यतिबलोत्कटौ ।
युयुधाते महावीरौ सह देव्या रणाङ्गणे ॥
कुपिता च महामाया ववर्ष शरसन्ततिम् ।
चकार दानवान् सर्वान् बाणक्षततनुच्छदान् ॥
असुराः क्रोधसम्मूढा बभूवुः शरताडिताः । चिक्षिपुः शरजालानि देवीं प्रति रुषान्विताः पञ्चम स्कन्ध ६०५ गदासे अत्यधिक आहत होनेके कारण वह ३४ दुष्टात्मा दैत्य मूच्छित हो गया और दो मुहूर्ततक पाषाणकी भाँति रथपर ही पड़ा रहा ॥ ३४ ॥
इस प्रकार उसे मूर्च्छित देखकर शत्रुसेनाको नष्ट कर डालनेवाला ताम्र नामक दैत्य चण्डिकासे लड़नेके ३५ लिये वेगपूर्वक रणमें उपस्थित हो गया ॥ ३५ ॥
उसे आते देखकर भगवती चण्डिका उससे हँसती हुई बोलीं – अरे दानवश्रेष्ठ! आओ - आओ, ३६ अभी तुम्हें यमलोक भेज देती हूँ ॥३६ ॥
निर्बल और समाप्त आयुवाले तुमलोगोंके यहाँ आनेसे क्या लाभ? वह मूर्ख महिषासुर घरमें रहकर ३७ अपने जीनेका कौन - सा उपाय कर रहा है? देवताओंके शत्रु, दुष्टात्मा तथा पापी महिषासुरका संहार किये बिना तुम मूर्खोको मारनेसे मुझे क्या लाभ होगा? ३८ इससे तो मेरा परिश्रम भी व्यर्थ हो जायगा, अतः तुमलोग घरपर जाकर महिषासुरको यहाँ भेज दो, जिससे वह मन्दबुद्धि भी मैं जिस रूपमें स्थित हूँ, ३ ९ उसमें मुझको देख ले ॥ ३७-३९ ॥ भगवतीका वचन सुनकर वह ताम्र कुपित हो धनुषको कानतक खींचकर उनपर बाणोंकी वर्षा ४० करने लगा ॥४० ॥
देवताओंके शत्रु उस दैत्यको मारनेकी इच्छावाली ताम्राक्षी भगवती भी धनुष खींचकर उसके ऊपर ४१ वेगपूर्वक बाण छोड़ने लगीं ॥४१ ॥।
इतनेमें बलवान् चिक्षुराख्य भी मूर्च्छा त्यागकर उठ खड़ा हुआ और तुरंत बाणसहित धनुष लेकर देवीके सामने आकर खड़ा हो गया ॥ ४२ ॥
॥ ४२ चिक्षुराख्य और ताम्र दोनों ही अत्यन्त उग्र बलवान् और महान् वीर थे । अब वे दोनों ही मिलकर भगवती जगदम्बासे रणमें युद्ध करने लगे ॥ ४३ ॥
४३ तब महामाया क्रोधित होकर बाणसमूहों की वर्षा करने लगीं, और उन्होंने अपने बाणोंके प्रहारसे सभी दानवोंके कवच छिन्न - भिन्न कर ४४ दिये ॥ ४४ ॥
उन बाणोंसे आहत होकर सभी असुर क्रोधसे व्याकुल हो गये तथा रोषपूर्वक देवीपर बाणसमूह ॥ ४५ । छोड़ने लगे । उस समय समस्त रणभूमिमें भगवतीके
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६०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४
बस्ते राक्षसास्तत्र किंशुका इव पुष्पिणः ।
शिलीमुखक्षताः सर्वे वसन्ते च वने रणे ॥
बभूव तुमुलं युद्धं ताम्रेण सह संयुगे ।
विस्मयं परमं जग्मुर्देवा ये प्रेक्षकाः स्थिताः ॥
ताम्रो मुसलमादाय लोहजं दारुणं दृढम् ।
जघान मस्तके सिंहं जहास च ननर्द च ॥
नर्दमानं तदा तं तु दृष्ट्वा देवी रुषान्विता ।
खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद सत्वरा ॥
छिन्ने शिरसि ताम्रस्तु विशीर्षो मुसली बली ।
बभ्राम क्षणमात्रं तु पपात रणमस्तके ॥
पतितं ताम्रमालोक्य चिक्षुराख्यो महाबलः ।
खड्गमादाय तरसा दुद्राव चण्डिकां प्रति ॥
भगवत्यपि तं दृष्ट्वा खड्गपाणिमुपागतम् ।
दानवं पञ्चभिर्बाणैर्जघान तरसा रणे ॥
एकेन पातितं खड्गं द्वितीयेन तु तत्करः ।
कण्ठाच्च मस्तकं तस्य कृन्तितं चापरैः शरैः ॥
एवं तौ निहतौ क्रूरौ राक्षसौ रणदुर्मदौ ।
भग्नं सैन्यं तयोस्तूर्णं दिक्षु सन्त्रस्तमानसम् ॥
देवाश्च मुदिताः सर्वे दृष्ट्वा तौ निहतौ रणे ।
पुष्पवृष्टिं मुदा चक्रुर्जयशब्दं नभः स्थिताः ॥
ऋषयो देवगन्धर्वा वेतालाः सिद्धचारणाः ।
ऊचुस्ते जय देवीति चाम्बिकेति पुनः पुनः ॥
बाणोंसे घायल सभी राक्षस ऐसे सुशोभित होने ४६ लगे, जैसे वसन्त ऋतुमें वनमें किंशुकके लाल पुष्प दिखायी पड़ते हों ॥ ४५-४६ ॥ उस समरभूमिमें ताम्रके साथ देवीका भीषण ४७ युद्ध होने लगा । इसे देखनेवाले जो देवता आकाशमें स्थित थे, वे आश्चर्यचकित हो गये ॥ ४७ ॥
उसी समय ताम्रने लोहेका बना हुआ एक सुदृढ़ तथा भयंकर मूसल लेकर देवीके सिंहके सिरपर प्रहार ४८ किया और वह जोरसे हँसने तथा गरजने लगा ॥ ४८ ॥
तब उसे गरजता हुआ देखकर भगवती क्रोधित हो गयीं और उन्होंने तुरंत अपनी तेज धारवाली ४ ९ तलवारसे उसका मस्तक काट डाला ॥४ ९ ॥ सिर कट जानेपर भी वह मस्तकविहीन बलशाली ताम्र मूसल लिये हुए कुछ क्षणतक घूमता रहा, इसके ५० बाद वह समरांगणमें गिर पड़ा ॥ ५० ॥
ताम्रको गिरा हुआ देखकर महाबली चिक्षुराख्य खड्ग लेकर बड़े वेगसे चण्डिकाकी ओर झपटा ॥५१ ॥
५१ हाथमें तलवार लिये उस दानवको रणमें अपनी ओर आते देखकर देवीने भी तुरंत पाँच बाणोंसे उसपर प्रहार किया ॥५२ ॥
५२ भगवतीने एक बाणसे उसका खड्ग काट दिया, दूसरेसे उसका हाथ काट दिया और अन्य बाणोंसे उसका मस्तक कण्ठसे अलग कर दिया ॥ ५३ ॥
५३ इस प्रकार युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले उन दोनों क्रूर राक्षसों का वध हो गया, तब उन दोनोंकी सेना भयभीत होकर चारों दिशाओंमें शीघ्रतापूर्वक भाग चली ॥ ५४ ॥
५४ उन दोनों दानवोंको रणमें मारा गया देखकर आकाशमें विराजमान सम्पूर्ण देवता आह्लादित हो गये और प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जयध्वनि ५५ करते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे । ऋषि, देवता, गन्धर्व, वेताल, सिद्ध और चारण- वे सब ' देवीकी जय, अम्बिकाकी जय ' ऐसा बार - बार ५६ | बोलने लगे ॥ ५५-५६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ताम्रचिक्षुराख्यवधवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
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अ ० १५ ] पञ्चम स्कन्ध ६०७ अथ पञ्चदशोऽध्यायः बिडालाख्य और असिलोमाका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध व्यास उवाच
तौ तया निहतौ श्रुत्वा महिषो विस्मयान्वितः ।
प्रेषयामास दैतेयांस्तद्वधार्थं महाबलान् ॥ १
असिलोमबिडालाख्यप्रमुखान् युद्धदुर्मदान् ।
सैन्येन महता युक्तान्सायुधान्सपरिच्छदान् ॥ २
ते तत्र ददृशुर्देवीं सिंहस्योपरि संस्थिताम् ।
अष्टादशभुजां दिव्यां खड्गखेटकधारिणीम् ॥ ३
असिलोमाग्रतो गत्वा तामुवाच हसन्निव ।
विनयावनतः शान्तो देवीं दैत्यवधोद्यताम् ॥ ४
असिलोमोवाच
देवि ब्रूहि वचः सत्यं किमर्थमिह सुन्दरि ।
आगतासि किमर्थं वा हंसि दैत्यान्निरागसः ॥ ५
कारणं कथयाद्य त्वं त्वया सन्धिं करोम्यहम् ।
काञ्चनं मणिरत्नानि भाजनानि वराणि च ॥ ६
यानीच्छसि वरारोहे गृहीत्वा गच्छ मा चिरम् ।
किमर्थं युद्धकामासि दुःखसन्तापवर्धनम् ॥ ७
कथयन्ति महात्मानो युद्धं सर्वसुखापहम् ।
कोमलेऽतीव ते देहे पुष्पघातासहे भृशम् ॥ ८
किमर्थं शस्त्रसम्पातान्सहसीति विसिस्मिये ।
चातुर्यस्य फलं शान्तिः सततं सुखसेवनम् ॥ ९
तत्किमर्थं दुःखहेतुं संग्रामं कर्तुमिच्छसि ।
संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः ॥ १०
व्यासजी बोले – उस देवीने चिक्षुराख्य तथा ताम्रका वध कर दिया - यह सुनकर महिषासुरको बड़ा विस्मय हुआ । अब उसने विशाल सेनासे युक्त, शस्त्रास्त्र लिये हुए तथा कवच धारण किये हुए असिलोमा, बिडालाख्य आदि प्रमुख युद्धोन्मत्त तथा महाबली दैत्योंको भगवतीका वध करनेके लिये भेजा ॥ १-२ ॥ वहाँपर उन्होंने सिंहके ऊपर विराजमान, अठारह भुजाओंसे सुशोभित, खड्ग तथा ढाल धारण की हुई दिव्यस्वरूपवाली भगवतीको देखा ॥ ३ ॥
तब असिलोमा दैत्योंके वधके लिये उद्यत देवीके पास जाकर विनयावनत होकर शान्तिपूर्वक उनसे हँसते हुए कहने लगा- ॥ ४ ॥
असिलोमा बोला- हे देवि! सच्ची बात बताइये, आप यहाँ किस प्रयोजनसे आयी हैं? हे सुन्दरि! इन निरपराध दैत्योंको आप क्यों मार रही हैं? इसका कारण बताइये । मैं अभी आपके साथ सन्धि करनेको तैयार हूँ । हे वरारोहे! सुवर्ण, मणि, रत्न और अच्छे - अच्छे पात्र जो भी आप चाहती हैं, उन्हें लेकर यहाँसे शीघ्र चली जाइये । आप युद्धकी इच्छुक क्यों हैं? महात्मा पुरुष कहते हैं कि युद्ध दुःख तथा सन्तापको बढ़ानेवाला और सम्पूर्ण सुखोंका विघातक होता है ॥५–७३ ॥ मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है कि पुष्पका भी आघात न सह सकनेवाले अपने अत्यन्त सुकोमल शरीरमें आप शस्त्रोंके आघात सहनेके लिये क्यों तैयार हैं? चातुर्यका फल तो शान्ति और निरन्तर सुख भोगना है । अतः एकमात्र दुःखके कारणस्वरूप इस संग्रामको आप क्यों करना चाहती हैं? इस संसार में सुख ग्रहण करना चाहिये और दुःखका परित्याग करना चाहिये - यही सर्वमान्य | नियम है ॥ ८ - १० ॥
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६०८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ तत्सुखं द्विविधं प्रोक्तं नित्यानित्यप्रभेदतः । वह सुख भी नित्य और अनित्यके भेदसे दो आत्मज्ञानं सुखं नित्यमनित्यं भोगजं स्मृतम् ॥ ११ प्रकारका कहा गया है । आत्मज्ञानसम्बन्धी सुखको ‘ नित्य ' और भोगजनित सुखको ' अनित्य ' माना गया नाशात्मकं तु तत्त्याज्यं वेदशास्त्रार्थचिन्तकैः । है । वेद और शास्त्रके तत्त्वका चिन्तन करनेवाले सौगतानां मतं चेत्त्वं स्वीकरोषि वरानने ॥ १२ लोगोंको चाहिये कि उस विनाशशील अनित्य सुखको तथापि यौवनं प्राप्य भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान् परलोकस्य सन्देहो यदि तेऽस्ति कृशोदरि स्वर्गभोगपरा नित्यं भव भामिनि भूतले अनित्यं यौवनं देहे ज्ञात्वेति सुकृतं चरेत् परोपतापनं कार्यं वर्जनीयं सदा बुधैः अविरोधेन कर्तव्यं धर्मार्थकामसेवनम् तस्मात्त्वमपि कल्याणि मतिं धर्मे सदा कुरु । अपराधं विना दैत्यान्कस्मान्मारयसेऽम्बिके ।
दयाधर्मोऽस्य देहोऽस्ति सत्ये प्राणाः प्रकीर्तिताः ।
तस्माद्दया तथा सत्यं रक्षणीयं सदा बुधैः ॥
कारणं वद सुश्रोणि दानवानां वधे तव । देव्युवाच त्वया पृष्टं महाबाहो किमर्थमिह चागता ॥
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि हनने च प्रयोजनम् ।
विचरामि सदा दैत्य सर्वलोकेषु सर्वदा ॥
न्यायान्यायौ च भूतानां पश्यन्ती साक्षिरूपिणी ।
न मे कदापि भोगेच्छा न लोभो न च वैरिता ॥
धर्मार्थं विचराम्यत्र संसारे साधुरक्षणम् ।
व्रतमेतत्तु नियतं पालयामि निजं सदा ॥
साधूनां रक्षणं कार्यं हन्तव्या येऽप्यसाधवः ।
वेदसंरक्षणं कार्यमवतारैरनेकशः ॥
युगे युगे तानेवाहमवतारान्बिभर्मि च । त्याग दें । हे वरानने! यदि आप नास्तिकका मत । स्वीकार करती हों तो भी इस यौवनको पाकर उत्तमसे ॥ १३ उत्तम सुखोंका भोग करें । हे कृशोदरि! हे भामिनि! यदि परलोकके विषयमें आपको सन्देह हो तो इस । पृथ्वीपर ही सदाचारपूर्वक रहती हुई स्वर्गीय सुख ॥ १४ प्राप्त करनेमें सदा तत्पर रहें, नहीं तो शरीरमें यह यौवन अनित्य है - ऐसा समझकर आपको सदा । सत्कर्म करते रहना चाहिये ॥ ११ - १४ ॥ ॥ १५ बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे दूसरोंको पीड़ित करनेके कार्यका त्याग कर दें । अतः बिना विरोधके धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना १६ चाहिये | इसलिये हे कल्याणि! आप अपनी बुद्धि धर्मकृत्यमें लगाइये । हे अम्बिके! आप हम दैत्योंको बिना अपराधके क्यों मार रही हैं? दयाभाव पुरुषमात्रका १७ शरीर है और सत्यमें ही उसका प्राण प्रतिष्ठित कहा गया है । अत: बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि दया और सत्यकी सदा रक्षा करें । हे देवि! आप दानवोंके संहारमें अपना प्रयोजन बतायें? ॥ १५ - १७३ ॥ १८ देवी बोलीं – हे महाबाहो! तुमने - जो यह पूछा है कि मैं यहाँ क्यों आयी हूँ - उसे बताती हूँ और दानववधका प्रयोजन भी बताती हूँ । हे दैत्य! मैं सदा १ ९ साक्षी बनकर सभी प्राणियोंके न्याय तथा अन्यायको देखती हुई सब लोकोंमें निरन्तर विचरती रहती हूँ । मुझे न तो कभी भोगविलासकी इच्छा है, न लोभ है २० और न किसीके प्रति द्वेषभाव ही है॥१८–२० ॥ धर्मकी मर्यादा रखनेके लिये मैं इस संसारमें विचरण करती रहती हूँ । साधुपुरुषोंकी रक्षा करना— २१ । अपने इस व्रतका मैं सदा पालन करती हूँ । अनेक अवतार धारण करके मैं सज्जनोंकी रक्षा करती हूँ, जो असाधु हैं उनका संहार करती हूँ और वेदोंका संरक्षण २२ करती हूँ । मैं प्रत्येक युगमें उन अवतारोंको धारण करती रहती हूँ॥२१-२२३ ॥
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अ ० १५ ] महिषस्तु दुराचारो देवान्वै हन्तुमुद्यतः ॥
ज्ञात्वाहं तद्वधार्थं भोः प्राप्तास्मि राक्षसाधुना ।
तं हनिष्ये दुराचारं सुरशत्रुं महाबलम् ॥
गच्छ वा तिष्ठ कामं त्वं सत्यमेतदुदाहृतम् ।
ब्रूहि वा तं दुरात्मानं राजानं महिषीसुतम् ॥
किमन्यान् प्रेषयस्यत्र स्वयं युद्धं कुरुष्व ह ।
सन्धिञ्चेत्कर्तुमिच्छास्ति राज्ञस्तव मया सह ॥
सर्वे गच्छन्तु पातालं वैरं त्यक्त्वा यथासुखम् ।
देवद्रव्यं तु यत्किञ्चिद्धृतं जित्वा रणे सुरान् ।
तद्दत्त्वा यान्तु पातालं प्रह्लादो यत्र तिष्ठति ॥
व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं देव्या असिलोमा पुरः स्थितः ।
बिडालाख्यं महावीरं पप्रच्छ प्रीतिपूर्वकम् ॥
असिलोमोवाच
श्रुतं तेऽद्य बिडालाख्य भवान्या कथितं च यत् ।
एवं गते किं कर्तव्यो विग्रहः सन्धिरेव वा ॥
बिडालाख्य उवाच न सन्धिकामोऽस्ति नृपोऽभिमानी
युद्धे च मृत्युं नियतं हि जानन् ।
दृष्ट्वा हतान् प्रेरयते तथास्मा-न्दैवं हि कोऽतिक्रमितुं समर्थः ॥
( दुःसाध्य एवास्त्विह सेवकानां धर्मः सदा मानविवर्जितानाम् । आज्ञापराणां वशवर्तिकानां पाञ्चालिकानामिव सूत्रभेदात् ॥ ) गत्वा कथं तस्य पुरस्त्वया च मयापि वक्तव्यमिदं कठोरम् । गच्छन्तु पातालमितश्च सर्वे दत्त्वाथ रत्नानि धनं सुराणाम् ॥ पञ्चम स्कन्ध ६० ९ २३ दुराचारी महिषासुर देवताओंको मार डालनेके लिये उद्यत है - यह जानकर मैं उसके वधके लिये इस समय यहाँ उपस्थित हुई हूँ । हे दानव! मैं उस २४ दुराचारी तथा सुरद्रोही महाबली महिषको मार डालूँगी ॥ २३-२४ ॥ २५ अब तुम इच्छानुसार जाओ या रुके रहो, मैंने तुमसे यह सब सच - सच बतला दिया । अतः जाकर अपने उस दुराचारी राजा महिषसे कह दो — ' आप २६ अन्य दैत्योंको क्यों भेजते हैं? स्वयं युद्ध कीजिये । ' | यदि तुम्हारे राजाकी इच्छा मेरे साथ सन्धि करनेकी हो, तो सभी दैत्य शत्रुता छोड़कर सुखपूर्वक पाताल चले जायँ । देवताओंको जीतकर जो भी देवद्रव्य २७ असुरोंने छीन लिया है, वह सब वापस करके वे उस पातालपुरीमें चले जायँ, जहाँ इस समय प्रह्लाद विराजमान हैं ॥ २५–२७ ॥ २८ व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] इस प्रकार देवीका वचन सुनकर असिलोमा भगवतीके सामने ही महान् शूरवीर बिडालाख्यसे प्रीतिपूर्वक पूछने लगा- ॥ २८ ॥
असिलोमा बोला - बिडालाख्य! देवीने अभी-२ ९ अभी जो कहा है, वह तो तुमने सुन लिया, इस स्थितिमें हमें सन्धि या विग्रह – क्या करना चाहिये? ॥ २ ९ ॥ बिडालाख्य बोला - युद्धमें मृत्युको निश्चित जानते हुए भी हमारे अभिमानी महाराज सन्धि नहीं करना चाहते । समरमें बहुत - से योद्धा मारे जा चुके ३० हैं - यह देखकर भी वे हमें भेज रहे हैं । दैवको टाल सकने में भला कौन समर्थ है! ॥ ३० ॥
( सम्मानकी भावनासे रहित, स्वामीकी आज्ञाका पालन करनेवाले तथा सदा उनके अधीन रहनेवाले सेवकोंका सेवाधर्म अत्यन्त कठिन है । सूतके संकेतपर नर्तन करनेवाली कठपुतलीकी भाँति वे सदा परतन्त्र रहते हैं । ) अतः उन महिषासुरके सामने जाकर मेरे अथवा तुम्हारे द्वारा ऐसा अप्रिय वचन कैसे कहा जा सकता है कि देवताओंके धन एवं रत्न वापस करके सभी ३१ । दानव यहाँसे पातालको लौट चलें? ॥३१ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 20 A
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६१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ ( प्रियं हि वक्तव्यमसत्यमेव न च प्रियं स्याद्धितकृत्तु भाषितम् । सत्यं प्रियं नो भवतीह कामं मौनं ततो बुद्धिमतां प्रतिष्ठितम् ॥ ) न फल्गुवाक्यैः प्रतिबोधनीयो राजा तु वीरैरिति नीतिशास्त्रम् ॥
न नूनं तत्र गन्तव्यं हितं वा वक्तुमादरात् ।
प्रष्टुं वापि गते राजा कोपयुक्तो भविष्यति ॥
इति सञ्चिन्त्य कर्तव्यं युद्धं प्राणस्य संशये ।
स्वामिकार्यं परं मत्वा मरणं तृणवत्तथा ॥
व्यास उवाच
इति सञ्चिन्त्य तौ वीरौ संस्थितौ युद्धतत्परौ ।
धनुर्बाणधरौ तत्र सन्नद्धौ रथसङ्गतौ ॥
प्रथमं तु बिडालाख्यः सप्तबाणान्मुमोच ह ।
असिलोमा स्थितो दूरे प्रेक्षकः परमास्त्रवित् ॥
चिच्छेद तांस्तथाप्राप्तानम्बिका स्वशरैः शरान् ।
बिडालाख्यं त्रिभिर्बाणैर्जघान च शिलाशितैः ॥
प्राप्य बाणव्यथां दैत्यः पपात समराङ्गणे ।
मूर्च्छितोऽथ ममाराशु दानवो दैवयोगतः ॥
बिडालाख्यं हतं दृष्ट्वा रणे शक्तिशरोत्करैः ।
असिलोमा धनुष्पाणिः संस्थितो युद्धतत्परः ॥
ऊर्ध्वं सव्यं करं कृत्वा तामुवाच मितं वचः ।
देवि जानामि मरणं दानवानां दुरात्मनाम् ॥
तथापि युद्धं कर्तव्यं पराधीनेन वै मया ।
महिषो मन्दबुद्धिश्च न जानाति प्रियाप्रिये ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] – 20 B ( सदा प्रिय वचन बोलना चाहिये, किंतु वह असत्य न हो । वचन हितकारक तथा प्रिय होना चाहिये । यदि वचन सत्य होनेपर तो ऐसी दशामें बुद्धिमान् मनुष्योंके श्रेष्ठ होता है । ) नीतिशास्त्रका कथन है कि चाहिये कि वे मिथ्या वचनोंद्वारा ३२ न डालें ॥३२ ॥
[ सत्य बात तो यह है कि ] भी प्रिय न हो लिये मौन ही वीर पुरुषोंको राजाको धोखे में आदरके साथ हितकी बात कहने अथवा पूछनेके लिये हमलोगोंको ३३ वहाँ नहीं चलना चाहिये । वहाँ जानेपर राजा महिषासुर कोपाविष्ट हो जायँगे । यह विचारकर अब हमलोगोंको यहाँ युद्ध ही करना चाहिये । जहाँ प्राणका संशय हो ३४ वहाँ स्वामीके कार्यको मुख्य मानकर मृत्युको तृणसदृश समझना चाहिये ॥ ३३-३४ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार विचार करके वे दोनों वीर युद्धके लिये तत्पर हो गये और कवच ३५ धारण करके हाथोंमें धनुष - बाण लेकर रथपर आरूढ हो देवीके सामने आ डटे ॥ ३५ ॥
सर्वप्रथम बिडालाख्यने देवीके ऊपर सात बाण चलाये । अस्त्र चलानेमें अत्यन्त निपुण असिलोमा दूर ३६ जाकर दर्शक के रूपमें खड़ा हो गया ॥ ३६ ॥
भगवती जगदम्बाने अपने बाणोंसे बिडालाख्यके द्वारा चलाये गये उन बाणोंको काट डाला और ३७ पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये तीन बाणोंसे बिडालाख्यपर आघात किया ॥ ३७ ॥
उन बाणोंकी असह्य वेदनासे पीड़ित होकर वह ३८ दैत्य समरभूमिमें गिर पड़ा, उसे मूर्च्छा आ गयी और कालयोगसे वह मर गया ॥ ३८ ॥
इस प्रकार भगवतीके बाणसमूहोंसे रणमें ३ ९ बिडालाख्यको मारा गया देखकर असिलोमा भी हाथमें धनुष लेकरके युद्ध करनेके लिये तैयार होकर सामने आ गया और दाहिना हाथ ऊपर उठाकर अभिमानपूर्वक ४० बोला - हे देवि! मैं जानता हूँ कि सभी दुराचारी दानव मारे जायँगे, फिर भी पराधीन होनेके कारण मुझे युद्ध करना ही होगा । वह मन्दबुद्धि महिषासुर अपने प्रिय ४१ । तथा अप्रियके विषयमें नहीं जानता ॥ ३ ९ –४१ ॥
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अ ० १५ ] तदग्रे नैव वक्तव्यं हितं चैवाप्रियं मया मर्तव्यं वीरधर्मेण शुभं वाप्यशुभं भवेत् दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् पतन्ति दानवास्तूर्णं तव बाणहता भुवि इत्युक्त्वा शरवृष्टिं स चकार दानवोत्तमः देवी चिच्छेद तान्बाणैरप्राप्तांस्तु निजान्तिके अन्यैर्विव्याध तं तूर्णमसिलोमानमाशुगैः वीक्षितामरसङ्घैश्च कोपपूर्णानना तदा तदा शुशुभे दानवः कामं बाणैर्विद्धतनुः किल स्स्रवद्रुधिरधारः स प्रफुल्लः किंशुको यथा असिलोमा गदां गुर्वी लौहीमुद्यम्य वेगतः दुद्राव चण्डिकां कोपात्सिंहं मूर्धिन जघान ह सिंहोऽपि नखराघातैस्तं ददार भुजान्तरे अगणय्य गदाघातं कृतं तेन बलीयसा उत्पत्य तरसा दैत्यो गदापाणिः सुदारुणः सिंहमूर्ध्नि समारुह्य जघान गदयाम्बिकाम् कृतं तेन प्रहारं तु वञ्चयित्वा विशांपते खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद कण्ठतः छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रः पपात तरसा क्षितौ हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य दुरात्मनः जय देवीति देवास्तां तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम् देवदुन्दुभयो नेदुर्जगुश्च नृप किन्नराः पञ्चम स्कन्ध ६११ । उसके सामने हितकर वचन भी यदि अप्रिय है तो मुझे नहीं बोलना चाहिये | अब वीरधर्मके अनुसार ॥ ४२ मर जाना ही मेरे लिये उचित है - वह चाहे शुभ हो अथवा अशुभ । तो दैवको ही बलवान् मानता हूँ, । अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है, तभी तो आपके ॥ ४३ बाणोंसे हत होकर दानव पृथ्वीपर गिरते जा रहे
हैं ॥। ४२-४३ ॥
। ऐसा कहकर दानवश्रेष्ठ असिलोमा बाणवृष्टि ॥ ४४ करने लगा । देवीने अपने पासतक न पहुँचे हुए उन बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला और अपने । अन्य शीघ्रगामी बाणोंसे असिलोमाको शीघ्रतापूर्वक बींध डाला । उस समय आकाशमें स्थित देवताओंने ॥ ॥ ४५ ४५ | देखा कि भगवतीका मुखमण्डल क्रोधसे भर उठा है ॥ हुई ॥ ४६ हो हो ॥ । गदा ॥ ४७ और कर । द्वारा देवीके बाणोंसे बिंधे शरीरवाला तथा बहती रुधिरकी धारासे युक्त वह दैत्य ऐसा सुशोभित रहा था मानो पुष्पित हुआ पलाशका वृक्ष ४४–४६ ॥ अब असिलोमा लोहेकी बनी एक विशाल लेकर बड़ी तेजीसे चण्डिकाकी ओर दौड़ा क्रोधपूर्वक सिंहके सिरपर उसने गदासे प्रहार दिया । परंतु देवीके सिंहने उस बलवान् दानवके किये गये गदा - प्रहारकी कुछ भी परवाह न ॥ ४८ करके अपने नखोंद्वारा उसके वक्षःस्थलको फाड़ डाला ॥ ४७-४८ ॥ । तब उस महाविकराल दैत्यने हाथमें गदा लिये ही बड़े वेग से उछलकर सिंहके मस्तकपर सवार हो ॥ ४ ९ भगवतीके ऊपर गदासे प्रहार किया ॥४ ९ ॥ हे राजन्! उसके द्वारा किये गये प्रहारको । रोककर देवीने तेज धारवाली तलवारसे उसका ॥ ५० मस्तक गर्दनसे अलग कर दिया । इस प्रकार मस्तक कट जानेपर वह दानवराज तुरंत गिर । पड़ा । अब उस दुरात्माकी सेनामें हाहाकार मच गया ॥ ५०-५१ ॥ ॥ ५१ हे राजन्! देवीकी जय हो - ऐसा कहकर देवतागण भगवतीकी स्तुति करने लगे । देवताओंकी । दुन्दुभियाँ बज उठीं और किन्नरगण देवीका ॥ ५२ । यशोगान करने लगे ॥ ५२ ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] – 20 C