देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 641–650
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650
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६३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ तो हरिस्तु भृगुणा कुपितेन कामं मीनो बभूव कमठः खलु सूकरस्तु । पश्चान्नृसिंह इति यश्छलकृद्धरायां तान्सेवतां जननि मृत्युभयं न किं स्यात् ॥ १८ शम्भोः पपात भुवि लिङ्गमिदं प्रसिद्धं शापेन तेन च भृगोर्विपिने गतस्य । तं ये नरा भुवि भजन्ति कपालिनं तु तेषां सुखं कथमिहापि परत्र मातः ॥ १ ९ योऽभूद् गजाननगणाधिपतिर्महेशा-तं ये भजन्ति मनुजा वितथप्रपन्नाः । जानन्ति ते न सकलार्थफलप्रदात्रीं त्वां देवि विश्वजननीं सुखसेवनीयाम् ॥ २० चित्रं त्वयारिजनतापि दयार्द्रभावा-द्धत्वा रणे शितशरैर्गमिता द्युलोकम् । नोचेत्स्वकर्मनिचिते निरये नितान्तं दुःखातिदुःखगतिमापदमापतेत्सा ॥२१ ब्रह्मा हरश्च हरिरप्त गर्वभावा-जानन्ति तेऽपि विबुधा न तव प्रभावम् । ये भवन्ति मनुजा विदितुं समर्थाः सम्मोहितास्तव गुणैरमितप्रभावैः ॥ २२ क्लिश्यन्ति तेऽपि मुनयस्तव दुर्विभाव्यं पादाम्बुजं न हि भजन्ति विमूढचित्ताः । सूर्याग्निसेवनपराः परमार्थतत्त्वं ज्ञातं न तैः श्रुतिशतैरपि वेदसारम् ॥ २३ हे जननि! महर्षि भृगुने कुपित होकर भगवान् विष्णुको शाप दे दिया, जिससे उन्हें पृथ्वीपर बारम्बार मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और छली वामनका अवतार लेना पड़ा । तो फिर [ एक ऋषिके शापसे अपनी रक्षा न कर पानेवाले ऐसे विष्णु आदि ] उन देवताओंकी उपासना करनेवाले लोगोंको मृत्युका भय क्यों नहीं बना रहेगा? ॥ १८ ॥
हे माता! सम्पूर्ण संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि भृगुमुनिके काननमें गये हुए भगवान् शिवका लिंग मुनिके शापके कारण कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा था । अतः जो मनुष्य पृथ्वीपर उन कापालिक शिवको ही भजते हैं, उन्हें इस लोक तथा परलोकमें भी सुख कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ १ ९ ॥ शिवसे जो गणोंके अधिपति गणेश उत्पन्न हुए हैं- - उन गणेशको जो लोग भजते हैं, उनकी यह शरणागति व्यर्थ है । हे देवि! वे लोग सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली तथा सुखपूर्वक आराधनीय आप जगज्जननीको नहीं जानते हैं ॥ २० ॥
यह बड़ी विचित्र बात है कि आपने अपने शत्रु-दैत्योंपर भी दया करके उन्हें तीक्ष्ण बाणोंसे रणमें मारकर स्वर्गलोक भेज दिया । यदि आप ऐसा न करतीं तो वे अपने कर्मोंके परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाले घोर नरकमें बड़े - से - बड़े दु: ख और विपत्तिमें पड़ जाते ॥ २१ ॥
जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी अहंकारके कारण आपकी महिमा नहीं जानते, तब आपके अमित प्रभाववाले गुणोंसे मोहित तुच्छ मनुष्य आपकी महिमाको कैसे जान सकेंगे? ॥ २२ ॥
जो मुनिगण आपके स्वरूपको बड़ी कठिनतासे ध्यानमें आनेवाला समझकर आपके चरणकमलकी उपासना नहीं करते; अपितु सूर्य, अग्नि आदिकी उपासनामें लगे रहते हैं, वे मूढबुद्धि अनेकविध कष्ट पाते हैं । समस्त श्रुतियोंके द्वारा प्रतिपादित वेदसारस्वरूप । परमार्थतत्त्वको वे नहीं जान पाते ॥ २३ ॥
* इस पुराण में जगदम्बा पराशक्तिकी विशिष्टता प्रदर्शित करनेके लिये ही अन्य देवोंकी उपासनासे विरत रहनेकी बात कही गयी है । वैसे तो भगवती एवं ब्रह्मा - विष्णु - महेश आदि देवगण भी परमात्मप्रभुके ही स्वरूप हैं; उनमें कोई भेद नहीं है ।
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अ ० १ ९ ] पञ्चम स्कन्ध ६३३ मन्ये गुणास्तव भुवि प्रथितप्रभावाः कुर्वन्ति ये हि विमुखान्ननु भक्तिभावात् । लोकान्स्वबुद्धिरचितैर्विविधागमैश्च विष्ण्वीशभास्करगणेशपरान्विधाय ॥ कुर्वन्ति ये तव पदाद्विमुखान्नराग्रया-स्वोक्तागमैर्हरिहरार्चनभक्तियोगैः तेषां न कुप्यसि दयां कुरुषेऽम्बिके त्वं तान्मोहमन्त्रनिपुणान्प्रथयस्यलं च ॥ तुर्ये युगे भवति चातिबलं गुणस्य तुर्यस्य तेन मथितान्यसदागमानि । त्वां गोपयन्ति निपुणाः कवयः कलौ वै त्वत्कल्पितान्सुरगणानपि संस्तुवन्ति ॥ ध्यायन्ति मुक्तिफलदां भुवि योगसिद्धां विद्यां पराञ्च मुनयोऽतिविशुद्धसत्त्वाः । ते नाप्नुवन्ति जननीजठरे तु दुःखं धन्यास्त एव मनुजास्त्वयि ये विलीनाः ॥ चिच्छक्तिरस्ति परमात्मनि येन सोऽपि व्यक्तो जगत्सु विदितो भवकृत्यकर्ता । कोऽन्यस्त्वया विरहितः प्रभवत्यमुष्मिन् कर्तुं विहर्तुमपि सञ्चलितुं स्वशक्त्या ॥ तत्त्वानि चिद्विरहितानि जगद्विधातुं किं वा क्षमाणि जगदम्ब यतो जडानि । किं चेन्द्रियाणि गुणकर्मयुतानि सन्ति देवि त्वया विरहितानि फलं प्रदातुम् ॥ मैं तो यही समझता हूँ कि अद्भुत प्रभावोंवाले जो आपके सत्त्व, रज और तम गुण हैं, वे ही मनुष्योंको उन्हींकी अपनी ही बुद्धिद्वारा विरचित अनेक प्रकारके शास्त्रोंमें उलझाकर उन्हें विष्णु, २४ शिव, सूर्य, गणेश आदिका उपासक बनाकर आपके भक्तिभावसे सर्वथा विमुख कर देते हैं ॥ २४ ॥
हे अम्बिके! जो लोग विष्णु तथा शिवकी पूजा और भक्तिसे परिपूर्ण शास्त्रोंके उपदेशद्वारा ब्राह्मणोंको आपके चरणोंसे विमुख कर देते हैं, उनके ऊपर भी आप क्रोध नहीं करती हैं, बल्कि दया ही करती हैं और इसके अतिरिक्त मोहन आदि मन्त्रोंके ज्ञाताओंको २५ भी आप संसारमें बहुत प्रसिद्ध बना देती हैं ॥ २५ ॥
सत्ययुगमें सत्त्वगुणकी प्रबलता रहती है, अतः उस युगमें असत् - शास्त्रोंपर आस्था नहीं हो पाती । किंतु कलिमें तो कवित्वके अभिमानी लोग आपकी उपेक्षा करते हैं और आपहीके द्वारा बनाये गये देवताओंकी स्तुति करते हैं ॥ २६ ॥
२६ इस पृथ्वीतलपर अत्यन्त शुद्ध अन्तःकरणवाले जो सात्त्विक मुनिगण मुक्ति - फल प्रदान करनेवाली योगसिद्धा एवं पराविद्यास्वरूपिणी आप भगवतीका ध्यान करते हैं, वे पुनः माताके गर्भमें आकर कष्ट नहीं पाते । जो मनुष्य आपमें ध्यानमग्न हैं, वे धन्य हैं ॥ २७ ॥
२७ आप चित् - शक्ति हैं और वही चित् - शक्ति परमात्मामें विद्यमान है, जिसके कारण वे भी [ नाम और रूपसे ] अभिव्यक्त होकर इस जगत्के सृजन, पालन एवं संहाररूपी कार्योंके कर्ताके रूपमें लोकों में प्रसिद्ध होते हैं । उन परमात्माके अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो आपसे रहित होकर अपनी शक्तिसे इस जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेमें समर्थ हो २८ सकता है? ॥ २८ ॥
हे जगदम्बे! क्या चित् - शून्य तत्त्व जगत्की रचना करनेमें समर्थ हो सकते हैं? चूँकि तत्त्व जड़ हैं, अतः वे जगत्की रचनामें समर्थ नहीं हैं । हे देवि! यद्यपि इन्द्रियाँ गुण तथा कर्मसे युक्त हैं, फिर भी आपसे रहित होकर क्या वे फल प्रदान कर सकती २ ९ | हैं? ॥ २ ९ ॥
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६३४ देवा मखेष्वपि हुतं मुनिभिः स्वभागं गृह्णीयुरम्ब विधिवत्प्रतिपादितं किम् स्वाहा न चेत्त्वमसि तत्र निमित्तभूता तस्मात्त्वमेव ननु पालयसीव विश्वम् ॥ सर्वं त्वयेदमखिलं विहितं भवादौ त्वं पासि वै हरिहरप्रमुखान्दिगीशान् । कालेऽसि विश्वमपि ते चरितं भवाद्यं , जानन्ति नैव मनुजाः क्व नु मन्दभाग्याः ॥ हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम् । कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः ॥ कार्यं कृतं जगति नो यदसौ दुरात्मा
वैरी हतो भुवनकण्टकदुर्विभाव्यः ।
कीर्तिः कृता ननु जगत्सु कृपा विधेया-प्यस्मांश्च पाहि जननि प्रथितप्रभावे ॥
व्यास उवाच
एवं स्तुता सुरैर्देवी तानुवाच मृदुस्वरा ।
अन्यत्कार्यं च दुःसाध्यं ब्रुवन्तु सुरसत्तमाः ॥
यदा यदा हि देवानां कार्यं स्यादतिदुर्घटम् ।
: स्मर्तव्याहं तदा शीघ्रं नाशयिष्यामि चापदम् ॥
देवा ऊचुः
सर्वं कृतं त्वया देवि कार्यं नः खलु साम्प्रतम् ।
यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ हे माता! यदि आप यज्ञोंमें ' स्वाहा ' के रूपमें । निमित्त न बनतीं तो क्या देवगण उन यज्ञोंमें मुनियोंके द्वारा विधिवत् प्रदत्त आहुति - रूप यज्ञभाग प्राप्त करते? अतः यह निश्चय हो गया कि आप ही ३० विश्वका पालन करती हैं ॥ ३० ॥
सृष्टिके प्रारम्भमें इस सम्पूर्ण जगत्की रचना आपने ही की है, आप ही विष्णु शिव आदि प्रमुख देवताओं तथा दिक्पालोंकी रक्षा करती हैं और प्रलयकालमें आप ही सम्पूर्ण विश्वको अपनेमें विलीन कर लेती हैं । [ हे देवि! ] जब ब्रह्मा आदि देवता भी आपके आद्य चरित्रको नहीं जान पाते, तब मन्दभाग्य ३१ हम देवता उसे कैसे जान सकते हैं? ॥ ३१ ॥
हे माता! आपने महिषका रूप धारण करनेवाले अत्यन्त उग्र असुरका वध करके इस देवसमुदायकी रक्षा की है । हे जननि! जब वेद भी यथार्थरूपसे आपकी गतिको नहीं जान पाये, तब हम मन्दबुद्धि देवता उसे कैसे जान सकते हैं, हम कैसे आपकी ३२ स्तुति करें? ॥ ३२ ॥
विख्यात प्रभाववाली हे जननि! आपने जगत्में महान् कार्य किया है जो कि आपने संसारके अचिन्त्य कण्टकस्वरूप हमारे शत्रु दुरात्मा महिषा-सुरका वध कर दिया । ऐसा करके आपने सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी कीर्ति स्थापित कर दी है, ३३ अब आप सारे संसारपर अनुग्रह करें और हमारी रक्षा करें ॥ ३३ ॥
व्यासजी बोले- इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर देवीने मधुर स्वरमें उनसे कहा— हे श्रेष्ठ देवतागण! इसके अतिरिक्त भी कोई ३४ दुःसाध्य कार्य हो तो उसे आपलोग बता दीजिये । जब - जब आप देवताओंके सामने कोई महान् दुःसाध्य कार्य उपस्थित हो, तब - तब आपलोग ३५ मेरा स्मरण कीजियेगा; मैं उस संकटको शीघ्र ही दूर कर दूँगी ॥ ३४-३५ ॥ देवता बोले- हे देवि! इस समय आपने हमारा सारा कार्य पूर्ण कर दिया है जो कि आपके द्वारा हमारा शत्रु यह महिषासुर मार डाला ३६ | गया ॥ ३६ ॥
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अ ० २० ] पञ्चम स्कन्ध ६३५
स्मरिष्यामो यथा तेऽम्ब सदैव पदपङ्कजम् ।
तथा कुरु जगन्मातर्भक्तिं त्वय्यप्यचञ्चलाम् ॥
अपराधसहस्राणि मातैव सहते सदा ।
इति ज्ञात्वा जगद्योनिं न भजन्ते कुतो जनाः ॥
सुपर्णौ तु देहेऽस्मिंस्तयोः सख्यं निरन्तरम् ।
नान्यः सखा तृतीयोऽस्ति योऽपराधं सहेत हि ॥
तस्माज्जीवः सखायं त्वां हित्वा किं नु करिष्यति ।
पापात्मा मन्दभाग्योऽसौ सुरमानुषयोनिषु ॥
प्राप्य देहं सुदुष्प्रापं न स्मरेत्त्वां नराधमः ।
मनसा कर्मणा वाचा ब्रूमः सत्यं पुनः पुनः ॥
सुखे वाप्यथवा दुःखे त्वं नः शरणमद्भुतम् ।
पाहि नः सततं देवि सर्वैस्तव वरायुधैः ॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वत्पादाम्बुजरेणुतः । व्यास उवाच
एवं स्तुता सुरैर्देवी तत्रैवान्तरधीयत ।
विस्मयं परमं जग्मुर्देवास्तां वीक्ष्य निर्गताम् ॥
हे अम्ब! हे जगज्जननि! अब आप हमारे मनमें अपने प्रति ऐसी अविचल भक्ति स्थापित ३७ कीजिये कि हम सदा आपके चरण - कमलका स्मरण करते रहें ॥ ३७ ॥
माता ही [ अपनी सन्तानके ] हजारों अपराध ३८ सह सकती है - ऐसा समझकर लोग जगत्की उत्पत्तिस्वरूपा भगवतीकी उपासना क्यों नहीं करते? ॥ ३८ ॥
इस देहरूपी वृक्षपर जीवात्मा और परमात्मारूपी ३ ९ । दो पक्षी रहते हैं । उन दोनोंमें सर्वदा मित्रता बनी रहती है, किंतु उनका तीसरा सखा ऐसा कोई भी नहीं है, जो अपराधको सह सके । अतएव यह जीव आप-४० जैसे मित्रको त्यागकर क्या करेगा? देवताओं और मानवोंकी योनिमें वह प्राणी पापी, मन्दभागी और अधम है, जो अत्यन्त दुर्लभ देह पाकर भी आपका स्मरण नहीं करता ॥ ३ ९ -४० ३ ॥ ४१ हम मन, वाणी और कर्मसे बार - बार यह सत्य कह रहे हैं कि सुख अथवा दुःख - प्रत्येक परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे लिये अद्भुत ४२ शरण हैं । हे देवि! आप अपने समस्त श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा हमारी निरन्तर रक्षा करें । आपके चरणकमलोंकी धूलिको छोड़कर हमारे लिये कोई दूसरा शरण नहीं है ॥ ४१-४२१ ॥ व्यासजी बोले – इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर भगवती जगदम्बा वहीं अन्तर्धान हो गयीं । तब उन्हें अन्तर्हित देखकर देवता बड़े विस्मयमें ४३ | पड़ गये ॥ ४३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीसान्त्वनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः देवीका मणिद्वीप पधारना तथा राजा शत्रुघ्नका भूमण्डलाधिपति बनना जनमेजय उवाच जनमेजय बोले- हे मुने! अब मैंने भगवतीके अथाद्भुतं वीक्ष्य मुने प्रभावं देव्या जगच्छान्तिकरं परञ्च । अत्यन्त अद्भुत तथा जगत्को शान्ति प्रदान करनेवाले न तृप्तिरस्ति द्विजवर्य शृण्वतः प्रभावको तो देख लिया, फिर भी हे द्विजवर! आपके कथामृतं ते मुखपद्मजातम् ॥ १ मुखारविन्दसे निकली हुई सुधामयी कथाको बार - बार
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६३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० अन्तर्हितायां च तदा भवान्यां चक्रुश्च किं देवपुरोगमास्ते देव्याश्चरित्रं परमं पवित्रं दुरापमेवाल्पपुण्यैर्नराणाम् कस्तृप्तिमाप्नोति कथामृतेन भिन्नोऽल्पभाग्यात्पटुकर्णरन्ध्रः पीतेन प्रयाति धिक्तान्नरान् ये न पिबन्ति सादरम् लीलाचरित्रं जगदम्बिकाया रक्षान्वितं देवमहामुनीनाम् संसारवार्धेस्तरणं नराणां कथं कृतज्ञा हि परित्यजेयुः मुक्ताश्च ये चैव मुमुक्षवश्च संसारिणो रोगयुताश्च केचित् तेषां सदा श्रोत्रपुटैश्च पेयं सर्वार्थदं वेदविदो वदन्ति तथा विशेषेण मुने नृपाणां धर्मार्थकामेषु सदा रतानाम् । मुक्ताश्च यस्मात्खलु तत्पिबन्ति कथं न पेयं रहितैश्च तेभ्यः ॥ यैः पूजिता पूर्वभवे भवानी सत्कुन्दपुष्पैरथ चम्पकैश्च । बैल्वैर्दलैस्ते भुवि भोगयुक्ता नृपा भवन्तीत्यनुमेयमेवम् ॥ ये भक्तिहीनाः समवाप्य देहं तं मानुषं भारतभूमिभागे । यैर्नार्चिता ते धनधान्यहीना रोगान्विताः सन्ततिवर्जिताश्च ॥ सुनते हुए भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है । [ अब आप । बतायें ] भगवतीके अन्तर्धान हो जानेपर उन प्रधान देवताओंने क्या किया? देवीका यह परम पावन चरित्र ॥२ मनुष्योंके अल्प पुण्योंसे प्राप्त हो सकना सर्वथा दुर्लभ ही है ॥ १-२ ॥ अल्पभाग्यवाले मनुष्यको छोड़कर भगवतीके कथाश्रवणमें सदा तत्पर कर्णपुटवाला ऐसा कौन होगा जो देवीके कथामृतसे तृप्ति प्राप्त कर लेता है? जिस ॥ ३ कथामृतका पान करनेसे मनुष्य अमरत्व प्राप्त कर लेता है, उसे जो आदरपूर्वक नहीं पीते, उन मनुष्योंको धिक्कार है ॥ ३ ॥
। भगवती जगदम्बाका लीलाचरित्र देवताओं और बड़े - बड़े मुनियोंके लिये भी रक्षाका परम साधन है । ॥ ४ [ यह लीलाचरित्र ] मनुष्योंको संसारसागरसे पार करनेके लिये एक नौका है । कृतज्ञजन उस चरित्रको भला कैसे त्याग सकते हैं? ॥४ ॥
। जीवन्मुक्त तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अथवा रोगग्रस्त जो कोई भी सांसारिक प्राणी हों, ॥ ५ उन सबको चाहिये कि वे अपने कर्णपुटसे भगवतीके इस सर्वार्थदायक कथामृतका पान करते रहें - ऐसा वेदवेत्ता कहते हैं । हे मुने! धर्म, अर्थ और काम में तत्पर राजाओंको तो विशेष रूपसे कथामृतका पान करना चाहिये । जब मुक्त प्राणीतक उस कथामृतका ६ पान करते हैं, तब मुक्तिसे वंचित जन इसका पान क्यों न करें! ॥ ५-६ ॥ यह अनुमान करना चाहिये कि जिन लोगोंने अपने पूर्वजन्ममें सुन्दर कुन्दपुष्पों, चम्पाके पुष्पों तथा बिल्वपत्रोंसे भगवतीका पूजन किया है, वे ही ७ इस जन्ममें भूतलपर भोग तथा ऐश्वर्यसे सम्पन्न राजा होते हैं ॥७ ॥
जो मनुष्य [ पवित्र ] भारत - भूभागमें यह मानवशरीर पाकर भी भगवतीकी भक्तिसे रहित हैं तथा जिन्होंने उनकी आराधना नहीं की, वे सदा धन-८ धान्यसे हीन, रोगग्रस्त और निःसन्तान रहते हैं; साध
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अ ० २० ] पञ्चम स्कन्ध ६३७ भ्रमन्ति नित्यं किल दासभूता आज्ञाकराः केवलभारवाहाः । दिवानिशं स्वार्थपराः कदापि नैवाप्नुवन्त्यौदरपूर्तिमात्रम् ॥ अन्धाश्च मूका बधिराश्च खञ्जाः कुष्ठान्विता ये भुवि दुःखभाजः । तत्रानुमानं कविभिर्विधेयं तैः सततं भवानी ॥ ये राजभोगान्वितऋद्धिपूर्णाः
संसेव्यमाना बहुभिर्मनुष्यैः ।
दृश्यन्ति ये वा विभवैः समेता-स्तैः पूजिताम्बेत्यनुमेयमेव ॥
तस्मात्सत्यवतीसूनो देव्याश्चरितमुत्तमम् ।
कथयस्व कृपां कृत्वा दयावानसि साम्प्रतम् ॥
हत्वा तं महिषं पापं स्तुता सम्पूजिता सुरैः ।
क्व गता सा महालक्ष्मीः सर्वतेजः समुद्भवा ॥
कथितं ते महाभाग गतान्तर्धानमाशु सा ।
स्वर्गे वा मृत्युलोके वा संस्थिता भुवनेश्वरी ॥
लयं गता वा तत्रैव वैकुण्ठे वा समाश्रिता ।
अथवा हेमशैले सा तत्त्वतो मे वदाधुना ॥
व्यास उवाच
पूर्वं मया ते कथितं मणिद्वीपं मनोहरम् ।
क्रीडास्थानं सदा देव्या वल्लभं परमं स्मृतम् ॥
यत्र ब्रह्मा हरिः स्थाणुः स्त्रीभावं ते प्रपेदिरे ।
पुरुषत्वं पुनः प्राप्य स्वानि कार्याणि चक्रिरे ॥
यः सुधासिन्धुमध्येऽस्ति द्वीपः परमशोभनः ।
नानारूपैः सदा तत्र विहारं कुरुतेऽम्बिका ॥
ही वे लोग दूसरोंके दास बनकर निरन्तर घूमते रहते हैं और आज्ञाकारी होकर दूसरोंका भार ढोया करते हैं । वे दिन - रात स्वार्थसाधनमें लगे रहते हैं, फिर भी ९ उन्हें अपना पेट भरनेतकके लिये अन्न कभी नहीं मिलता ॥ ८ - ९ ॥ इस संसारमें जो लोग अन्धे, गूँगे, बहरे, लूले और कोढ़ीके रूपमें कष्ट भोग रहे हैं, उनके विषयमें विद्वानोंको यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उन्होंने १० भगवतीकी निरन्तर आराधना नहीं की है ॥ १० ॥
जो लोग राजोचित भोगसे युक्त, ऐश्वर्यसे सम्पन्न, अनेक मनुष्योंसे सेवित और वैभवशाली दिखायी पड़ते हैं, उनके विषयमें यह अनुमान लगाना चाहिये कि उन्होंने अवश्य ही जगदम्बाकी उपासना की है ॥ ११ ॥
११ अतएव हे सत्यवतीनन्दन! अब आप कृपा करके भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन कीजिये; आप बड़े दयालु हैं ॥ १२ ॥
१२ उस पापी महिषासुरका वध करनेके पश्चात् देवताओंसे भलीभाँति पूजित होकर सभी देवताओंके तेजसे प्रादुर्भूत वे भगवती महालक्ष्मी कहाँ चली १३ गयीं? ॥ १३ ॥
हे महाभाग! आपने अभी कहा है कि वे तुरंत अन्तर्धान हो गयीं । स्वर्गलोक अथवा मृत्युलोक किस १४ जगह वे भगवती भुवनेश्वरी प्रतिष्ठित हुईं? वे वहीँपर विलीन हो गयीं या वैकुण्ठधाममें विराजने लगीं अथवा वे सुमेरुपर्वतपर विराजमान हुईं, अब आप मुझे १५ यह सब यथार्थरूपमें बतायें ॥ १४-१५ ॥ व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] इसके पहले मैं आपसे रमणीय मणिद्वीपका वर्णन कर चुका हूँ । वह १६ भगवतीका क्रीडास्थल है तथा उनके लिये सदा परम प्रिय बतलाया गया है । जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्त्रीरूपमें परिणत हो गये थे और पुन: पुरुषत्व १७ पाकर वे अपने - अपने कार्योंमें संलग्न हो गये । वह परम सुन्दर द्वीप सुधासागरके मध्यमें विराजमान है । भगवती जगदम्बा वहाँ अनेक रूपोंमें सदा विहार १८ | करती रहती हैं ॥ १६–१८ ॥
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६३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०
स्तुता सम्पूजिता देवैः सा तत्रैव गता शिवा ।
यत्र संक्रीडते नित्यं मायाशक्तिः सनातनी ॥
देवास्तां निर्गतां वीक्ष्य देवीं सर्वेश्वरीं तथा ।
रविवंशोद्भवं चक्रुर्भूमिपालं महाबलम् ॥
अयोध्याधिपतिं वीरं शत्रुघ्नं नाम पार्थिवम् ।
सर्वलक्षणसम्पन्नं महिषस्यासने शुभे ॥
दत्त्वा राज्यं तदा तस्मै देवा इन्द्रपुरोगमाः ।
स्वकीयैर्वाहनैः सर्वे जग्मुः स्वान्यालयानि ते ॥
गतेषु तेषु देवेषु पृथिव्यां पृथिवीपते ।
धर्मराज्यं बभूवाथ प्रजाश्च सुखितास्तथा ॥
पर्जन्यः कालवर्षी च धरा धान्यगुणावृता ।
पादपाः फलपुष्पाढ्या बभूवुः सुखदाः सदा ॥
गावश्च क्षीरसम्पन्ना घटोध्न्यः कामदा नृणाम् ।
नद्यः सुमार्गगाः स्वच्छाः शीतोदाः खगसंयुताः ॥
ब्राह्मणा वेदतत्त्वाश्च यज्ञकर्मरतास्तथा ।
क्षत्रिया धर्मसंयुक्ता दानाध्ययनतत्पराः ॥
शस्त्रविद्यारता नित्यं प्रजारक्षणतत्पराः ।
न्यायदण्डधराः सर्वे राजानः शमसंयुताः ॥
अविरोधस्तु भूतानां सर्वेषां सम्बभूव ह ।
आकरा धनदा नॄणां व्रजा गोयूथसंयुताः ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम ।
देवीभक्तिपराः सर्वे सम्बभूवुर्धरातले ॥
सर्वत्र यज्ञयूपाश्च मण्डपाश्च मनोहराः ।
मखैः पूर्णा धराश्चासन् ब्राह्मणैः क्षत्रियैः कृतैः ॥
[ महिषासुरके वधके पश्चात् ] देवताओंसे स्तुत १ ९ तथा भलीभाँति पूजित होकर वे सनातनी मायाशक्ति भगवती शिवा उसी मणिद्वीपमें चली गयीं, जहाँ वे निरन्तर विहार करती रहती हैं ॥ १ ९ ॥ उन सर्वेश्वरी भगवतीको अन्तर्हित देखकर २० देवताओंने सूर्यवंशमें उत्पन्न, महाबली एवं सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न अयोध्याधिपति शत्रुघ्न नामक पराक्रमी राजाको महिषासुरके सुन्दर आसनपर अभिषिक्त २१ किया । इस प्रकार इन्द्र आदि सभी प्रधान देवता शत्रुघ्नको राज्य प्रदान करके अपने - अपने वाहनोंसे अपने - अपने स्थानोंको चले गये ॥ २० - २२ ॥ २२ हे भूपते! उन देवताओंके चले जानेपर पृथ्वीपर धर्मराज्य स्थापित हो गया और प्रजाएँ सुखी हो गयीं । मेघ उचित समयपर जल बरसाते थे और पृथ्वीपर २३ उत्तम धान्य उत्पन्न होते थे । वृक्ष फलों तथा फूलोंसे सदा लदे रहते थे और वे लोगोंके लिये बड़े सुखदायक हो गये ॥ २३-२४ ॥ २४ घड़े के समान थनवाली दुधारू गौएँ मनुष्योंको उनकी इच्छाके अनुसार दूध दिया करती थीं ॥ स्वच्छ एवं शीतल जलवाली नदियाँ सुगमतापूर्वक बहती थीं २५ और पक्षियोंसे सुशोभित रहती थीं ॥ २५ ॥
ब्राह्मण वेदतत्त्वोंके ज्ञाता हो गये और यज्ञकर्ममें प्रवृत्त रहने लगे । क्षत्रिय धर्मभावनासे ओतप्रोत हो गये और सदा दान तथा अध्ययनमें तत्पर रहने लगे । सभी २६ राजा शस्त्रविद्या प्राप्त करनेमें संलग्न हो गये, वे सदा प्रजाओंकी रक्षा करने लगे, उनका दण्ड- विधान न्यायके अनुसार चलने लगा और वे शान्तिगुणसे २७ सम्पन्न हो गये ॥ २६-२७ ॥ सभी प्राणियोंमें परस्पर मेल - जोल रहने लगा, खानोंसे मनुष्योंको अपार धन प्राप्त होने लगा और २८ गोशालाएँ गोसमुदायसे सम्पन्न हो गयीं ॥२८ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! उस समय धरातलपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – ये सब - के - सब देवीकी २ ९ भक्तिमें संलग्न हो गये ॥२ ९ ॥ सर्वत्र मनोहर यज्ञमण्डप तथा यज्ञयूप दृष्टिगोचर होते थे । ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंद्वारा सम्पन्न किये गये ३० । यज्ञोंसे सारी पृथ्वी सुशोभित होने लगी ॥ ३० ॥
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अ ० २० ] पञ्चम स्कन्ध ६३ ९
पतिव्रतधरा नार्यः सुशीलाः सत्यसंयुताः ।
पितृभक्तिपराः पुत्रा आसन्धर्मपरायणाः ॥
न पाखण्डं न वाधर्मः कुत्रापि पृथिवीतले ।
वेदवादाः शास्त्रवादा नान्ये वादास्तथाभवन् ॥
कलहो नैव केषाञ्चिन्न दैन्यं नाशुभा मतिः ।
सर्वत्र सुखिनो लोकाः काले च मरणं तथा ॥
सुहृदां न वियोगश्च नापदश्च कदाचन ।
नानावृष्टिर्न दुर्भिक्षं न मारी दुःखदा नृणाम् ॥
न रोगो न च मात्सर्यं न विरोधः परस्परम् । सर्वत्र सुखसम्पन्ना नरा नार्यः सुखान्विताः ।
क्रीडन्ति मानवाः सर्वे स्वर्गे देवगणा इव ।
न चौरा न च पाखण्डा वञ्चका दम्भकास्तथा ॥
पिशुना लम्पटाः स्तब्धा न बभूवुस्तदा नृप ।
न वेदद्वेषिणः पापा मानवाः पृथिवीपते ॥
सर्वधर्मरता नित्यं द्विजसेवापरायणाः ।
त्रिधात्वात्सृष्टिधर्मस्य त्रिविधा ब्राह्मणास्ततः ॥
सात्त्विका राजसाश्चैव तामसाश्च तथापरे ।
सर्वे वेदविदो दक्षाः सात्त्विकाः सत्त्ववृत्तयः ॥
प्रतिग्रहविहीनाश्च दयादमपरायणाः ।
यज्ञांस्ते सात्त्विकैरन्नैः कुर्वाणा धर्मतत्पराः ॥
पुरोडाशविधानैश्च पशुभिर्न कदाचन ।
दानमध्ययनञ्चैव यजनं तु तृतीयकम् ॥
त्रिकर्मरसिकास्ते वै सात्त्विका ब्राह्मणा नृप । उस समय स्त्रियाँ पातिव्रतधर्मपरायण, सुशील ३१ तथा सत्यनिष्ठ थीं और पुत्र पिताके प्रति श्रद्धा रखनेवाले तथा धर्मशील होते थे ॥ ३१ ॥
पृथ्वीतलपर पाखण्ड तथा अधर्म कहीं भी नहीं रह गया । उस समय वेदवाद और शास्त्रवादके ३२ अतिरिक्त अन्य कोई वाद प्रचलित नहीं थे ॥ ३२ ॥
उस समय किसीमें भी परस्पर कलह नहीं होता था, दीनता नहीं थी और किसीकी अशुभ बुद्धि नहीं ३३ रह गयी थी । सभी जगह लोग सुखी थे और आयु पूर्ण होनेपर ही उनकी मृत्यु होती थी, किसीकी अकालमृत्यु नहीं होती थी ॥ ३३ ॥
मित्रोंमें वियोग नहीं होता था, किसीपर कभी ३४ विपत्तियाँ नहीं आती थीं, अनावृष्टि नहीं होती थी, न अकाल पड़ता था और न तो दुःखदायिनी महामारी ही मनुष्योंको ग्रसित करती थी ॥ ३४ ॥
न किसीको रोग था और न तो लोगोंका आपस में ३५ डाह तथा विरोध ही था । सर्वत्र नर तथा नारी सब प्रकारसे सुखी थे । सभी मनुष्य स्वर्गमें रहनेवाले देवताओंकी भाँति आनन्द भोगते थे । हे राजन्! उस समय चोर, ३६ पाखण्डी, धोखेबाज, दम्भी, चुगलखोर, लम्पट तथा जड़ प्रकृतिवाले मनुष्य नहीं रह गये थे । हे भूपते! वेदोंसे द्वेष करनेवाले तथा पापी मनुष्य उस समय नहीं ३७ थे, अपितु सभी लोग धर्मनिष्ठ थे और नित्य ब्राह्मणोंकी सेवामें लगे रहते थे ॥ ३५ – ३७३ ॥ ३८ सृष्टिधर्मके तीन प्रकार होनेके कारण ब्राह्मण भी तीन प्रकारके थे - सात्त्विक, राजस तथा तामस । उनमें सत्त्व - वृत्तिवाले सभी सात्त्विक ब्राह्मण ३ ९ वेदोंके ज्ञाता तथा [ यज्ञकार्योंमें ] दक्ष, दान लेनेकी प्रवृत्तिसे रहित, दयालु तथा संयम रखनेवाले थे । वे धर्मपरायण रहकर सात्त्विक अन्नोंसे यज्ञ करते ४० हुए सदा पुरोडाशके द्वारा विधिविधानसे हवन करते थे और पशुबलिके द्वारा कभी भी यज्ञ सम्पन्न नहीं करते थे । हे राजन्! वे सात्त्विक ब्राह्मण ४ ९ दान, अध्ययन और यज्ञ - इन्हीं तीनों कार्योंमें सदा अभिरुचि रखते थे * ॥ ३८–४१३ ॥ * सात्त्विक ब्राह्मणोंद्वारा किये जानेवाले निरामिष यज्ञकी प्रशंसा करनेसे यह स्पष्ट है कि मांस भक्षणादि तथा काम-क्रोधादि विकार रजोगुण तथा तमोगुणसे उत्पन्न हो जाते हैं, अतः सर्वथा त्याज्य हैं; इन्हें भ्रमवश विधि नहीं समझना चाहिये ।
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६४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ राजसा वेदविद्वांसः क्षत्रियाणां पुरोहिताः ॥ ४२ राजस ब्राह्मण वेदके विद्वान् थे और वे क्षत्रियोंके पुरोहित होते थे । वे यथाविधि मांसभक्षी थे । वे सदा षट्कर्मनिरताः सर्वे विधिवन्मांसभक्षकाः । छः कर्मोंमें ही संलग्न रहते थे । यज्ञ करना, यज्ञ यजनं याजनं दानं तथैव च प्रतिग्रहः ॥ ४३ कराना, दान देना, दान लेना, वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना - ये ही उनके छः कर्म थे ॥ ४२-४३३ ॥ अध्ययनं तु वेदानां तथैवाध्यापनं तु षट् । तामस प्रकृतिवाले ब्राह्मण क्रोधी और राग-तामसाः क्रोधसंयुक्ता रागद्वेषपराः पुनः राज्ञां कर्मकरा नित्यं किञ्चिदध्ययने रताः महिषे निहते सर्वे सुखिनो वेदतत्पराः बभूवुर्व्रतनिष्णाता दानधर्मपरास्तथा क्षत्रियाः पालने युक्ता वैश्या वणिजवृत्तयः कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदवृत्तयः परे एवं प्रमुदितो लोको महिषे विनिपातिते अनुद्वेगः प्रजानां वै सम्बभूव धनागमः बहुक्षीराः शुभा गावो नद्यश्चैव बहूदकाः वृक्षा बहुफलाश्चासन्मानवा रोगवर्जिताः नाधयो नेतयः क्वापि प्रजानां दुःखदायकाः न निधनमुपयान्ति प्राणिनस्तेऽप्यकाले सकलविभवयुक्ता रोगहीनाः सदैव निगमविहितधर्मे तत्पराश्चण्डिकाया-श्चरणसरसिजानां सेवने दत्तचित्ताः ॥ ४४ द्वेषपरायण रहते थे । वे सदा राजाओंके यहाँ कर्मचारीके रूपमें कार्य करते थे । वे कुछ - कुछ अध्ययनमें भी । संलग्न रहते थे ॥ ४४३ ॥
॥ ४५ इस प्रकार महिषासुर का वध हो जानेपर सभी ब्राह्मण सुखी, वेदपरायण, व्रतनिष्ठ तथा दान - धर्ममें । संलग्न हो गये; क्षत्रिय प्रजापालनमें लग गये; वैश्य ॥ ४६ व्यवसायमें तत्पर हो गये और कुछ अन्य वैश्य कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा तथा सूदपर धन देनेके कर्ममें प्रवृत्त । हो गये । इस प्रकार महिषासुरके संहारके पश्चात् सारा ॥ ४७ जनसमुदाय आनन्दसे परिपूर्ण हो गया ॥ ४५ 1-8011 प्रजाओंकी व्याकुलता दूर हो गयी, उन्हें पर्याप्त । धन प्राप्त होने लगा, गौएँ परम सुन्दर तथा बहुत ॥ ४८ दूध देनेवाली हो गयीं, नदियाँ प्रचुर जलसे भर गयीं, वृक्ष बहुत अधिक फलोंसे लद गये और सभी । मनुष्य रोगरहित हो गये । कहीं भी किसी प्राणीको मानसिक व्याधियाँ तथा प्राकृतिक आपदाएँ व्यथित ॥ ४ ९ नहीं करती थीं ॥ ४८-४९ ॥ उस समय सभी प्राणी अकालमृत्युको प्राप्त नहीं होते थे, वे सब प्रकारके वैभवसे सम्पन्न तथा नीरोग । रहते थे । वेदप्रतिपादित धर्ममें तत्पर रहते हुए सभी लोगोंने भगवती चण्डिकाके चरणकमलोंकी सेवामें ॥ ५० । ही अपना चित्त लगा दिया था ॥ ५० ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषवधानन्तरं पृथिवीसुखवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः शुम्भ और निशुम्भको ब्रह्माजीके द्वारा वरदान, देवताओंके साथ उनका युद्ध और देवताओंकी पराजय व्यास उवाच व्यासजी बोले – हे राजन्! सुनिये, मैं देवीका शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् । उत्तम चरित्र कहता हूँ; यह सम्पूर्ण प्राणियोंको सुख सुखदं सर्वजन्तूनां सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १ देनेवाला तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाला है ॥ १ ॥
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अ ० २१ ] पञ्चम स्कन्ध ६४१
यथा शुम्भ निशुम्भश्च भ्रातरौ बलवत्तरौ ।
बभूवतुर्महावीरौ अवध्यौ पुरुषैः किल ॥
बहुसेनावृतौ शूरौ देवानां दुःखदौ सदा ।
दुराचारौ मदोत्सिक्तौ बहुदानवसंयुतौ ॥
हतावम्बिकया तौ तु संग्रामेऽतीव दारुणे ।
देवानाञ्च हितार्थाय सर्वैः परिचरैः सह ॥
चण्डमुण्डौ महाबाहू रक्तबीजोऽतिदारुणः ।
धूम्रलोचननामा च निहतास्ते रणाङ्गणे ॥
तान्निहत्य सुराणां सा जहार भयमुत्तमम् ।
स्तुता सम्पूजिता देवैर्गिरौ हेमाचले शुभे ॥
राजोवाच
कावेतावसुरावादौ कथं तौ बलिनां वरौ ।
केन संस्थापितौ चेह स्त्रीवध्यत्वं कुतो गतौ ॥
तपसा वरदानेन कस्य जातौ महाबलौ ।
कथञ्च निहतौ सर्वं कथयस्व सविस्तरम् ॥
व्यास उवाच
शृणु राजन् कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् ।
देव्याश्चरितसंयुक्तां सर्वार्थफलदां शुभाम् ॥
पुरा शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ भूमिमण्डले ।
पातालतश्च सम्प्राप्तौ भ्रातरौ शुभदर्शनौ ॥
तौ प्राप्तयौवनौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम् ।
अन्नोदकं परित्यज्य पुष्करे लोकपावने ॥
वर्षाणामयुतं यावद्योगविद्यापरायणौ ।
एकत्रैवासनं कृत्वा तेपाते परमं तपः ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -21 A [ पूर्वकालमें ] शुम्भ और निशुम्भ नामक दो २ [ असुर ] भाई थे । वे बड़े बलवान्, महापराक्रमी तथा पुरुषोंसे अवध्य थे ॥ २ ॥
उनके पास बहुत - से सैनिक थे । वे दोनों वीर देवताओंको सदा दुःख देते रहते थे I । वे बड़े ३ दुराचारी तथा मदमत्त थे । उनके पास बहुत अधिक दानव थे ॥३ ॥
अम्बिकाने देवताओंके हितके लिये उन ४ दोनों दानवोंको उनके परिचरोंसमेत अत्यन्त भीषण संग्राममें मार डाला ॥ ४ ॥
महाबाहु चण्ड - मुण्ड, महाभयंकर रक्तबीज ५ और धूम्रलोचन नामक असुर - वे सब भी भगवतीके द्वारा रणभूमिमें मारे गये थे ॥५ ॥
उन सबका वध करके भगवती अम्बिकाने ६ देवताओंका बहुत बड़ा भय दूर कर दिया । तदनन्तर देवताओंने पवित्र सुमेरुपर्वतपर उन देवीका स्तवन तथा विधिवत् पूजन किया ॥ ६ ॥
राजा बोले- पूर्वकालमें ये दोनों दानव कौन थे, वे बड़े - बड़े बलशालियोंसे भी श्रेष्ठ कैसे ७ हुए, उन्हें राजसिंहासनपर किसने प्रतिष्ठित किया, स्त्रीके द्वारा वे कैसे मारे गये, किस देवता की तपस्याके परिणामस्वरूप प्राप्त वरदानसे वे महाबली ८ हुए? और किस प्रकार वे मारे गये? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ७-८ ॥ व्यासजी बोले - हे राजन्! अब आप समस्त पापोंका नाश करनेवाली, सभी प्रकारके अभीष्ट फल ९ प्रदान करनेवाली, मंगलमयी तथा भगवतीके चरित्रसे ओत - प्रोत दिव्य कथा सुनिये ॥ ९ ॥
पूर्वकालमें शुम्भ - निशुम्भ नामक दो दैत्य पातालसे भूमण्डलपर आ गये । वे दोनों भाई देखनेमें १० बड़े सुन्दर थे ॥ १० ॥
पूर्ण वयस्क होनेपर उन दोनोंने जगत्पावन पुष्कर तीर्थमें अन्न तथा जलका परित्याग करके ११ कठोर तप आरम्भ कर दिया ॥११ ॥
योगसाधनामें तत्पर रहनेवाले शुम्भ और निशुम्भ एक ही स्थानपर आसन लगाकर दस हजार वर्षोंतक १२ । घोर तपस्या करते रहे ॥१२ ॥