देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 651–660
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660
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६४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१
तयोस्तुष्टोऽभवद् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।
तत्रागतश्च भगवानारुह्य वरटापतिम् ॥
तावुभौ च जगत्स्रष्टा दृष्ट्वा ध्यानपरौ स्थितौ ।
उत्तिष्ठतं महाभागौ तुष्टोऽहं तपसा किल ॥
वाञ्छितं वां वरं कामं ददामि ब्रुवतामिह ।
कामोऽहं समायातो दृष्ट्वा वां तपसो बलम् ॥
व्यास उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य प्रबुद्धौ तौ समाहितौ ।
प्रदक्षिणक्रियां कृत्वा प्रणामं चक्रतुस्तदा ॥
दण्डवत्प्रणिपातञ्च कृत्वा तौ दुर्बलाकृती ।
ऊचतुर्मधुरां वाचं दीनौ गद्गदया गिरा ॥
देवदेव दयासिन्धो भक्तानामभयप्रद ।
अमरत्वञ्च नौ ब्रह्मन्देहि तुष्टोऽसि चेद्विभो ॥
मरणादपरं किञ्चिद्भयं नास्ति धरातले ।
तस्माद्भयाच्च सन्त्रस्तौ युष्माकं शरणं गतौ ॥
त्राहि त्वं देवदेवेश जगत्कर्तः क्षमानिधे ।
परिस्फोटय विश्वात्मन् सद्यो मरणजं भयम् ॥
ब्रह्मोवाच
किमिदं प्रार्थनीयं वो विपरीतं तु सर्वथा ।
अदेयं सर्वथा सर्वैः सर्वेभ्यो भुवनत्रये ॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
मर्यादा विहिता लोके पूर्वं विश्वकृता किल ॥
मर्तव्यं सर्वथा सर्वैः प्राणिभिर्नात्र संशयः ।
अन्यं प्रार्थयतं कामं ददामि यच्च वाञ्छितम् ॥
व्यास उवाच
तदाकर्ण्य वचस्तस्य सुविमृश्य च दानवौ ।
ऊचतुः प्रणिपत्याथ ब्रह्माणं पुरतः स्थितम् ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] 21 B अन्तमें समस्त लोकोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजी १३ उनपर प्रसन्न हो गये और हंसपर आरूढ़ होकर वहाँ आ गये ॥१३ ॥
ध्यानमग्न होकर बैठे हुए उन दोनोंको देखकर १४ जगत्के रचयिता ब्रह्माजीने कहा- हे महाभाग! तुम दोनों उठो, मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे परम प्रसन्न हूँ । तुमलोगोंका जो भी अभीष्ट वर हो उसे बताओ, मैं १५ अवश्य दूँगा । तुम दोनोंका तपोबल देखकर तुमलोगोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके विचारसे ही मैं यहाँ आया हूँ ॥ १४-१५ ॥ व्यासजी बोले – ब्रह्माजीकी यह वाणी सुनकर १६ समाहित चित्तवाले उन दोनोंका ध्यान टूट गया । तब प्रदक्षिणा करके उन्होंने दण्डकी भाँति भूमिपर गिरकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया । तत्पश्चात् तपके १७ कारण दुर्बल शरीरवाले दोनों दानवोंने ब्रह्माजीसे बड़ी दीनतापूर्वक गद्गद वाणीमें यह मधुर वचन कहा - हे देवदेव! हे दयासिन्धो! हे भक्तोंको अभय १८ देनेवाले ब्रह्मन्! हे विभो! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं, तो हमें अमरत्व प्रदान कीजिये । मृत्युसे बढ़कर १ ९ दूसरा कोई भी भय इस पृथ्वीलोकमें नहीं है, उसी भयसे सन्त्रस्त होकर हम दोनों आपकी शरणको प्राप्त हुए हैं । हे देवदेवेश! आप हमारी रक्षा कीजिये । हे जगत्कर्ता! हे क्षमानिधान! हे विश्वात्मा! आप हमारे २० मरणजन्य भयको शीघ्र ही दूर कीजिये ॥ १६–२० ॥ ब्रह्माजी बोले- तुम लोगोंने यह कैसा सर्वथा नियमविरुद्ध वरदान माँगा है, तीनों लोकोंमें किसीके २१ द्वारा किसीके भी लिये यह वरदान सर्वथा अदेय है । जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है और मरनेवालेका जन्म निश्चित है । विश्वकी रचना करनेवाले प्रभुने २२ यह नियम पहले से ही निर्धारित कर रखा है । सभी प्राणियोंको निश्चितरूपसे मरना ही पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है । अतः इसके अतिरिक्त तुमलोगोंका जो २३ भी दूसरा अभिलषित वर हो, उसे माँग लो, मैं अभी देता हूँ ॥ २१–२३ ॥ व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर उन दोनों दानवोंने परस्पर भलीभाँति विचार २४ | करनेके उपरान्त अपने सम्मुख खड़े उन ब्रह्माजीको
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अ ० २१ ] पञ्चम स्कन्ध ६४३
पुरुषैरमराद्यैश्च मानवैर्मृगपक्षिभिः ।
अवध्यत्वं कृपासिन्धो देहि नौ वाञ्छितं वरम् ॥
नारी बलवती कास्ति या नौ नाशं करिष्यति ।
न बिभीवः स्त्रियः कामं त्रैलोक्ये सचराचरे ॥
अवध्यौ भ्रातरौ स्यातां नरेभ्यः पङ्कजोद्भव ।
भयं न स्त्रीजनेभ्यश्च स्वभावादबला हि सा ॥
व्यास उवाच
इति श्रुत्वा तयोर्वाक्यं प्रददौ वाञ्छितं वरम् ।
ब्रह्मा प्रसन्नमनसा जगामाथ स्वमालयम् ॥
गतेऽथ भवने तस्मिन्दानवौ स्वगृहं गतौ ।
भृगुं पुरोहितं कृत्वा चक्रतुः पूजनं तदा ॥
शुभे दिने सुनक्षत्रे जातरूपमयं शुभम् ।
कृत्वा सिंहासनं दिव्यं राज्यार्थं प्रददौ मुनिः ॥
शुम्भाय ज्येष्ठभूताय ददौ राज्यासनं शुभम् ।
सेवनार्थं तदैवाशु सम्प्राप्ता दानवोत्तमाः ॥
चण्डमुण्डौ महावीरौ भ्रातरौ बलदर्पितौ ।
सम्प्राप्तौ सैन्यसंयुक्तौ रथवाजिगजान्वितौ ॥
धूम्रलोचननामा च तद्रूपश्चण्डविक्रमः ।
शुम्भञ्च भूपतिं श्रुत्वा तदागाद् बलसंयुतः ॥
रक्तबीजस्तथा शूरो वरदानबलाधिकः ।
अक्षौहिणीभ्यां संयुक्तस्तत्रैवागत्य सङ्गतः ॥
तस्यैकं कारणं राजन् संग्रामे युध्यतः सदा ।
देहाद्रुधिरसम्पातस्तस्य शस्त्राहतस्य च ॥
जायते च यदा भूमावुत्पद्यन्ते ह्यनेकशः ।
तादृशाः पुरुषाः क्रूरा बहवः शस्त्रपाणयः ॥
प्रणाम करके कहा - हे कृपासिन्धो! देवता, मनुष्य, २५ मृग अथवा पक्षी – इनमेंसे किसी भी पुरुषजातिके द्वारा हमारा मरण न हो - यही हमारा अभीष्ट वर है, इसे आप हमें प्रदान करें । ऐसी कौन बलवती स्त्री है, २६ जो हम दोनोंका नाश कर सके? इस चराचर त्रिलोकीमें किसी भी स्त्रीसे हम नहीं डरते । हे ब्रह्मन्! हम दोनों भाई पुरुषोंसे अवध्य होवें । हमें स्त्रियोंसे २७ कोई डर नहीं है; क्योंकि वे तो स्वभावसे ही अबला होती हैं ॥ २४-२७ ॥ व्यासजी बोले – उन दोनोंका यह वचन सुनकर ब्रह्माजीने उन्हें अभिलषित वर दे दिया और प्रसन्नमनसे अपने स्थानपर चले गये ॥ २८ ॥
२८ ब्रह्माजीके अपने लोक चले जानेपर वे दोनों दानव भी अपने घर चले गये । उन्होंने वहाँपर शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बनाकर उनका पूजन किया ॥ २ ९ ॥ २ ९ तत्पश्चात् किसी उत्तम दिन और नक्षत्रमें सोनेका दिव्य तथा सुन्दर सिंहासन बनवाकर मुनिने राज्य-स्थापनाके लिये उन्हें प्रदान किया । उन्होंने ज्येष्ठ होनेके ३० कारण शुम्भको वह सुन्दर राजसिंहासन समर्पित किया । उसी समय अनेक श्रेष्ठ दानव उसकी सेवा करनेके लिये शीघ्र वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ३०-३१ ॥ ३१ बलाभिमानी तथा महापराक्रमी चण्ड और मुण्ड-ये दोनों भाई भी अपनी सेना तथा बहुत - से रथ, घोड़े और हाथी साथमें लेकर उनके पास आ गये ॥ ३२ ॥
३२ शुम्भको राजा बना हुआ सुनकर उसीके रूपवाला धूम्रलोचन नामक प्रचण्ड पराक्रमी दैत्य भी उस समय सेनासहित वहाँ पहुँच गया ॥ ३३ ॥
३३ उसी प्रकार वरदानके प्रभावसे अत्यधिक बलशाली तथा शूरवीर रक्तबीज भी दो अक्षौहिणी सेनाके साथ वहाँ आकर सम्मिलित हो गया । हे ३४ राजन्! उसके अतिशय बलवान् होनेका एक कारण यह था कि संग्राममें युद्ध करते हुए उस रक्तबीजके शस्त्राहत होनेपर उसके शरीरसे जब भूमिपर रुधिर ३५ गिरता था, उसी समय उसके ही समान क्रूर और हाथोंमें शस्त्र धारण किये बहुत - से वीर पुरुष उत्पन्न हो जाते थे । रक्तबिन्दुओंसे उत्पन्न वे पुरुष उसी ३६ | रक्तबीजके आकार, रूप और पराक्रमवाले होते थे 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -21 C
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६४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१
सम्भवन्ति तदाकारास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ।
युद्धं पुनस्ते कुर्वन्ति पुरुषा रक्तसम्भवाः ॥
अतः सोऽपि महावीर्यः संग्रामेऽतीव दुर्जयः ।
अवध्यः सर्वभूतानां रक्तबीजो महासुरः ॥
अन्ये च बहवः शूराश्चतुरङ्गसमन्विताः ।
शुम्भञ्च नृपतिं मत्वा बभूवुस्तस्य सेवकाः ॥
असंख्याता तदा जाता सेना शुम्भनिशुम्भयोः ।
पृथिव्याः सकलं राज्यं गृहीतं बलवत्तया ॥
सेनायोगं तदा कृत्वा निशुम्भः परवीरहा ।
जगाम तरसा स्वर्गे शचीपतिजयाय च ॥
चकारासौ महायुद्धं लोकपालैः समन्ततः ।
वृत्रहा वज्रपातेन ताडयामास वक्षसि ॥
स वज्राभिहतो भूमौ पपात दानवानुजः ।
भग्नं बलं तदा तस्य निशुम्भस्य महात्मनः ॥
भ्रातरं मूर्च्छितं श्रुत्वा शुम्भः परबलार्दनः ।
तत्रागत्य सुरान्सर्वांस्ताडयामास सायकैः ॥
कृतं युद्धं महत्तेन शुम्भेनाक्लिष्टकर्मणा ।
निर्जितास्तु सुराः सर्वे सेन्द्राः पालाश्च सर्वशः ॥
ऐन्द्रं पदं तदा तेन गृहीतं बलवत्तया ।
कल्पपादपसंयुक्तं कामधेनुसमन्वितम् ॥
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृतास्तेन महात्मना ।
नन्दनं च वनं प्राप्य मुदितोऽभून्महासुरः ॥
सुधायाश्चैव पानेन सुखमाप महासुरः ।
कुबेरं स च निर्जित्य तस्य राज्यं चकार ह ॥
अधिकारं तथा भानोः शशिनश्च चकार ह ।
यमञ्चैव विनिर्जित्य जग्राह तत्पदं तथा ॥
वरुणस्य तथा राज्यं चकार वह्निकर्म च ।
वायोः कार्यं निशुम्भश्च चकार स्वबलान्वितः ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] –21 D और वे सभी पुनः युद्ध करने लगते थे । इसलिये ३७ संग्राममें महापराक्रमी तथा अजेय समझा जानेवाला वह महान् असुर रक्तबीज सभी प्राणियोंसे अवध्य हो गया था॥३४–३८ ॥ ३८ इसके अतिरिक्त चतुरंगिणी सेनासे युक्त अन्य बहुत - से पराक्रमी दानव भी शुम्भको अपना राजा मानकर उसके सेवक बन गये ॥ ३ ९ ॥ ३ ९ उस समय शुम्भ और निशुम्भके पास असंख्य सेना हो गयी थी और उन्होंने अपने बलके प्रभावसे भूमण्डलका सम्पूर्ण राज्य अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ४० ॥
४० तत्पश्चात् शत्रुपक्षके वीरोंका संहार करनेवाले निशुम्भ अपनी सेना सुसज्जित करके इन्द्रको जीतनेहेतु ४१ बड़े वेगसे स्वर्गके लिये प्रस्थान किया । [ वहाँ पहुँचकर ] उसने लोकपालोंके साथ घोर युद्ध किया तब इन्द्रने उसके वक्षपर वज्रसे प्रहार किया । उस ४२ वज्राघातसे आहत होकर दानव शुम्भका छोटा भाई निशुम्भ भूमिपर गिर पड़ा । तब परम साहसी उस निशुम्भकी सेना भाग गयी॥४१–४३ ॥ ४३ अपने भाईको मूर्च्छित हुआ सुनकर शत्रुसेनाको नष्ट कर डालनेवाला शुम्भ वहाँ आकर सभी देवताओंको बाणोंसे मारने लगा ॥ ४४ ॥
४४ इस प्रकार किसी भी कार्यको कठिन न समझनेवाले उस शुम्भने भीषण युद्ध किया और इन्द्रसहित सभी ४५ देवताओं तथा लोकपालोंको पराजित कर दिया ॥ ४५ ॥
तब उस शुम्भने अपने पराक्रमके प्रभावसे कल्पवृक्ष और कामधेनुसहित इन्द्रपदको अधिकारमें ४६ कर लिया । उस दुस्साहसी शुम्भने तीनों लोकोंपर आधिपत्य जमा लिया और देवताओंको मिलनेवाले यज्ञभागोंका हरण कर लिया । नन्दनवन पा करके वह ४७ महान् असुर आनन्दित हुआ और अमृतके पानसे उसे बहुत सुख मिला ॥ ४६-४७३ || उसने कुबेरको जीतकर उनके राज्यपर अधिकार ४८ कर लिया और सूर्य तथा चन्द्रमाका भी अधिकार छीन लिया । उसने यमराजको परास्त करके उनका ४ ९ पद स्वयं ले लिया । इसी प्रकार अपने बलके प्रभावसे वरुणका राज्य अपने अधीन करके वह शुम्भ राज्य-शासन स्वयं करने लगा और अग्नि तथा वायुके कार्य ५० | स्वयं करने लगा ॥ ४८–५० ॥
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अ ० २१ ] पञ्चम स्कन्ध ६४५
ततो देवा विनिर्धूता हृतराज्या हृतश्रियः ।
सन्त्यज्य नन्दनं सर्वे निर्ययुर्गिरिगह्वरे ॥ ५१
हृताधिकारास्ते सर्वे बभ्रमुर्विजने वने ।
निरालम्बा निराधारा निस्तेजस्का निरायुधाः ॥ ५२
विचेरुरमराः सर्वे पर्वतानां गुहासु च ।
उद्यानेषु च शून्येषु नदीनां गह्वरेषु च ॥ ५३
न प्रापुस्ते सुखं क्वापि स्थानभ्रष्टा विचेतसः ।
लोकपाला महाराज दैवाधीनं सुखं किल ॥ ५४
बलवन्तो महाभागा बहुज्ञा धनसंयुताः ।
काले दुःखं तथा दैन्यमाप्नुवन्ति नराधिप ॥ ५५
चित्रमेतन्महाराज कालस्यैव विचेष्टितम् ।
यः करोति नरं तावद्राजानं भिक्षुकं ततः ॥ ५६
दातारं याचकं चैव बलवन्तं तथाबलम् ।
पण्डितं विकलं कामं शूरं चातीव कातरम् ॥ ५७
मखानाञ्च शतं कृत्वा प्राप्येन्द्रासनमुत्तमम् ।
पुनर्दुःखं परं प्राप्तं कालस्य गतिरीदृशी ॥ ५८
कालः करोति धर्मिष्ठं पुरुषं ज्ञानसंयुतम् ।
तमेवातीव पापिष्ठं ज्ञानलेशविवर्जितम् ॥ ५ ९
न विस्मयोऽत्र कर्तव्यः सर्वथा कालचेष्टिते ।
ब्रह्मविष्णुहरादीनामपीदृक्कष्टचेष्टितम् ॥६०
विष्णुर्जननमाप्नोति सूकरादिषु योनिषु ।
हरः कपाली सञ्जातः कालेनैव बलीयसा ॥ ६१
तब [ असुरोंके द्वारा ] तिरस्कृत और राज्य छिन जानेके कारण नष्ट शोभावाले सभी देवता नन्दनवन छोड़कर पर्वतोंकी गुफाओंमें चले गये ॥ ५१ ॥
अधिकारसे वंचित होकर वे सब निर्जन वनमें भटकने लगे । अब उनका कोई सहारा नहीं रहा, उनके रहनेकी जगह नहीं रही, वे तेजहीन और आयुधविहीन हो चुके थे । इस प्रकार सभी देवता पर्वतोंकी कन्दराओं, निर्जन उद्यानों और नदियोंकी घाटियों में विचरण करने लगे ॥ ५२-५३ ॥ हे महाराज! स्थानभ्रष्ट हो जानेके कारण उन बेचारे लोकपालोंको कहीं भी सुख नहीं मिल रहा था, और फिर यह सुनिश्चित भी है कि सुख सदा प्रारब्धके अधीन रहता है ॥५४ ॥
हे नराधिप! बलशाली, बड़े भाग्यवान्, महान् ज्ञानी तथा धनसम्पन्न व्यक्ति भी विपरीत समय उपस्थित होनेपर दुःख तथा कष्ट पाते हैं ॥ ५५ ॥
हे महाराज! उस कालकी गति बड़ी ही विचित्र होती है, जो एक साधारण मनुष्यको राजा बना देता है और उसके बाद राजाको भिखारी बना देता है । वही काल दाताको याचक, बलवान्को निर्बल, पण्डितको अज्ञानी और वीरको अत्यन्त कायर बना देता है ॥ ५६-५७ ॥ सौ अश्वमेधयज्ञ करनेके बाद सर्वोत्कृष्ट इन्द्रासन प्राप्त करके भी बादमें समयके फेरसे इन्द्रको असीम कष्ट उठाना पड़ा था - कालकी ऐसी विचित्र गति होती है ॥ ५८ ॥
समय ही मनुष्यको धर्मात्मा तथा ज्ञानवान् बनाता है और फिर उसी व्यक्तिको पापी तथा अत्यल्प ज्ञानसे भी हीन बना देता है ॥ ५ ९ ॥ अतः कालकी इस अद्भुत गतिके विषयमें कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये । यही काल ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिको भी इसी प्रकार संकटमें डाल देता है । बलवान् कालके ही प्रभावसे भगवान् विष्णुको सूकर आदि योनियोंमें जन्म लेना पड़ा और शिवजीको । कपाली होना पड़ा॥६०-६१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे शुम्भनिशुम्भद्वारा स्वर्गविजयवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
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६४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ अथ द्वाविंशोऽध्यायः देवताओं द्वारा भगवतीकी व्यास उवाच
पराजिताः सुराः सर्वे राज्यं शुम्भः शशास ह ।
एवं वर्षसहस्त्रं तु जगाम नृपसत्तम ॥ १
भ्रष्टराज्यास्ततो देवाश्चिन्तामापुः सुदुस्तराम् ।
गुरुं दुःखातुरास्ते तु पप्रच्छुरिदमादृताः ॥ २
किं कर्तव्यं गुरो ब्रूहि सर्वज्ञस्त्वं महामुनिः ।
उपायोऽस्ति महाभाग दुःखस्य विनिवृत्तये ॥ ३
उपचारपरा नूनं वेदमन्त्राः सहस्रशः ।
वाञ्छितार्थकरा नूनं सूत्रैः संलक्षिताः किल ॥ ४
इष्टो विविधाः प्रोक्ताः सर्वकामफलप्रदाः ।
ताः कुरुष्व मुने नूनं त्वं जानासि च तत्क्रियाः ॥ ५
विधिः शत्रुविनाशाय यथोद्दिष्टः सदागमे ।
तं कुरुष्वाद्य विधिवद्यथा नो दुःखसंक्षयः ॥ ६
भवेदांगिरसाद्यैव तथा त्वं कर्तुमर्हसि ।
दानवानां विनाशाय अभिचारं यथामति ॥ ७
बृहस्पतिरुवाच
सर्वे मन्त्राश्च वेदोक्ता दैवाधीनफलाश्च ते ।
न स्वतन्त्राः सुराधीश तथैकान्तफलप्रदाः ॥ ८
मन्त्राणां देवता यूयं ते तु दुःखैकभाजनम् ।
जाताः स्म कालयोगेन किं करोमि प्रसाधनम् ॥ ९
इन्द्राग्निवरुणादीनां यजनं यज्ञकर्मसु ।
ते यूयं विपदं प्राप्ताः करिष्यन्ति किमिष्टयः ॥ १०
अवश्यम्भाविभावानां प्रतीकारो न विद्यते ।
उपायस्त्वथ कर्तव्य इति शिष्टानुशासनम् ॥ ११
स्तुति और उनका प्राकट्य व्यासजी बोले- हे नृपश्रेष्ठ! सभी देवता पराजित
हो गये । इसके बाद शुम्भ राज्यपर शासन करने लगा ।
इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ १ ॥
तत्पश्चात् राज्यच्युत होनेके कारण देवता महान् दुस्सह चिन्तामें पड़ गये । दुःखसे व्याकुल हुए वे देवता गुरु बृहस्पतिसे आदरपूर्वक यह पूछने लगे ॥ २ ॥
गुरो! अब हम क्या करें, आप हमें बतायें । आप सर्वज्ञ महामुनि हैं । हे महाभाग! दुःखकी निवृत्तिका उपाय भी तो होता है । हजारों ऐसे वैदिक मन्त्र हैं, जो उपचारोंसे परिपूर्ण हैं और सभी मनोरथ पूर्ण करनेवाले हैं । सूत्रोंने उनका भलीभाँति निदर्शन भी किया है । सभी वांछित फल प्रदान करनेवाले अनेक प्रकारके यज्ञ भी बताये गये हैं । हे मुने! आप उनका अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि आप उनकी क्रिया-विधिको भलीभाँति जानते हैं॥३–५ ॥ शत्रुओंके विनाशके लिये वेदमें जैसा उपाय बताया गया है, अब आप विधिपूर्वक उसका अनुष्ठान कीजिये, जिससे हमारे दुःखका पूर्णरूपसे नाश हो जाय । हे आंगिरस! दानवोंके विनाशके लिये आप अपनी बुद्धिके अनुसार आज ही अभिचारकर्म आरम्भ करनेकी कृपा कीजिये ॥६-७ ॥ बृहस्पति बोले - हे देवराज! वेदोंमें बताये गये सभी मन्त्र प्रारब्धके अनुसार ही फल प्रदान करनेवाले हैं । वे स्वतन्त्र नहीं हैं और नियमके अनुसार ही फल प्रदान करते हैं ॥ ८ ॥
उन मन्त्रोंके देवता तो आप ही लोग हैं । जब आपलोग स्वयं समयके फेरसे कष्टमें पड़े हुए हैं तो मैं कौन- - सा उपाय करूँ? ॥ ९ ॥
यज्ञ - कर्मोंमें इन्द्र, अग्नि, वरुण आदिकी पूजा की जाती है और वे आप सब देवता ही स्वयं विपत्ति भोग रहे हैं, तब यज्ञ क्या कर सकेंगे? ॥ १० ॥
अवश्यम्भावी घटनाओंका कोई प्रतीकार नहीं है; फिर भी [ संकटसे बचनेके लिये ] उपाय तो करना । ही चाहिये, यह शिष्ट पुरुषोंका उपदेश है ॥ ११ ॥
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अ ० २२ ] पञ्चम स्कन्ध ६४७
दैवं हि बलवत्केचित्प्रवदन्ति मनीषिणः ।
उपायवादिनो दैवं प्रवदन्ति निरर्थकम् ॥
दैवं चैवाप्युपायश्च द्वावेवाभिमतौ नृणाम् ।
केवलं दैवमाश्रित्य न स्थातव्यं कदाचन ॥
उपाय: सर्वथा कार्यो विचार्य स्वधिया पुनः ।
तस्माद् ब्रवीमि वः सर्वान्संविचार्य पुनः पुनः ॥
पुरा भगवती तुष्टा जघान महिषासुरम् ।
युष्माभिस्तु स्तुता देवी वरदानं ददावथ ॥
आपदं नाशयिष्यामि संस्मृता वा सदैव हि ।
यदा यदा वो देवेशा आपदो दैवसम्भवाः ॥
प्रभवन्ति तदा कामं स्मर्तव्याहं सुरैः सदा ।
स्मृताहं नाशयिष्यामि युष्माकं परमापदः ॥
तस्माद्धिमाचले गत्वा पर्वते सुमनोहरे ।
आराधनं चण्डिकायाः कुरुध्वं प्रेमपूर्वकम् ॥
मायाबीजविधानज्ञास्तत्पुरश्चरणे रताः ।
जानाम्यहं योगबलात्प्रसन्ना सा भविष्यति ॥
दुःखस्यान्तोऽद्य युष्माकं दृश्यते नात्र संशयः ।
तस्मिञ्छैले सदा देवी तिष्ठतीति मया श्रुतम् ॥
स्तुता सम्पूजिता सद्यो वाञ्छितार्थान् प्रदास्यति ।
निश्चयं परमं कृत्वा गच्छध्वं वै हिमालयम् ॥
सुराः सर्वाणि कार्याणि सा वः कामं विधास्यति । व्यास उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा देवास्ते प्रययुर्गिरिम् ॥
हिमालयं महाराज देवीध्यानपरायणाः ।
मायाबीजं हृदा नित्यं जपन्तः सर्व एव हि ॥
नमश्चकुर्महामायां भक्तानामभयप्रदाम् ।
तुष्टुवुः स्तोत्रमन्त्रैश्च भक्त्या परमया युताः ॥
कुछ विद्वान् कहते हैं कि दैव सबसे बलवान् होता १२ है और उपायवादी लोग दैवको निरर्थक बताते हैं, किंतु मनुष्योंके लिये दैव और उपाय दोनों ही आवश्यक माने गये हैं । मात्र दैवका आश्रय लेकर कभी भी बैठे १३ नहीं रहना चाहिये | अपनी बुद्धिसे विचार करके सम्यक् रूपसे प्रयत्न करनेमें तत्पर हो जाना चाहिये । इसलिये भलीभाँति बार - बार सोच - विचारकर मैं आप सभीको १४ उपाय बता रहा हूँ॥१२–१४ ॥ पूर्वकालमें जब भगवती जगदम्बाने आपलोगोंपर प्रसन्न होकर महिषासुरका वध किया था, उस समय १५ आपलोगोंके स्तुति करनेपर उन्होंने यह वरदान दिया था— ' आपलोगोंके स्मरण करनेपर मैं सदा आपलोगोंकी १६ विपत्ति दूर करूँगी । हे देवेश्वरो! जब - जब आपलोगोंपर दैव - जन्य आपदाएँ आयें, तब - तब आप देवतागण मेरा ध्यान कीजियेगा, स्मरण करते ही मैं आपलोगोंकी बड़ी-१७ से बड़ी विपत्तियोंका नाश कर दूँगी ' ॥ १५ - १७ ॥ अतः अब आपलोग परम रमणीक हिमालय-पर्वतपर जाकर प्रेमपूर्वक भगवती चण्डिकाकी १८ आराधना कीजिये । आपलोग मायाबीजके विधानके ज्ञाता हैं, उसीके पुरश्चरणमें तत्पर हो जाइये । मैं जानता हूँ कि इस अनुष्ठानके प्रभावसे वे भगवती १ ९ प्रसन्न हो जायँगी ॥ १८-१९ ॥ अब आपलोगोंके दुःखका अन्त दिखायी पड़ रहा है; इसमें सन्देह नहीं है । मैंने सुना है कि वे २० भगवती उस हिमालयपर्वतपर सदा विराजमान रहती हैं । उनकी स्तुति तथा विधिवत् पूजा करनेपर वे शीघ्र ही आपलोगोंको वांछित फल प्रदान करेंगी । २१ अतः हे देवताओ! आपलोग दृढ़ निश्चय करके हिमालयपर्वतपर जाइये; वे भगवती आपलोगोंका कार्य अवश्य सिद्ध कर देंगी ॥ २० - २१३ ॥ २२ व्यासजी बोले- हे महाराज! उनका वचन सुनकर देवता हिमालयपर्वतपर चले गये । वहाँ देवीके ध्यानमें लीन होकर एकाग्र मनसे निरन्तर मायाबीज-२३ मन्त्रका जप करते हुए उन सब देवताओंने भक्तोंके लिये अभयदायिनी महामाया भगवतीको प्रणाम किया और पूर्णभक्तिसे युक्त होकर स्तोत्र - मन्त्रोंसे वे इस २४ । प्रकार उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२ - २४ ॥
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६४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ नमो देवि विश्वेश्वरि प्राणनाथे
सदानन्दरूपे सुरानन्ददे ते ।
नमो दानवान्तप्रदे मानवाना-मनेकार्थदे भक्तिगम्यस्वरूपे ॥
न ते नामसंख्यां न ते रूपमीदृ-क्तथा वेदादिदेवस्वरूपे । त्वमेवासि सर्वेषु शक्तिस्वरूपा प्रजासृष्टिसंहारकाले सदैव ॥ स्मृतिस्त्वं धृतिस्त्वं त्वमेवासि बुद्धि-जरा पुष्टितुष्टी धृतिः कान्तिशान्ती । सुविद्या सुलक्ष्मीर्गतिः कीर्तिमेधे त्वमेवासि विश्वस्य बीजं पुराणम् ॥ २७ यदा यैः स्वरूपैः करोषीह कार्यं सुराणां च तेभ्यो नमामोऽद्य शान्त्यै । क्षमा योगनिद्रा दया त्वं विवक्षा स्थिता सर्वभूतेषु शस्तैः स्वरूपैः ॥ कृतं कार्यमादौ त्वया यत्सुराणां महारिर्मदान्धो हयारिः । दया ते सदा सर्वदेवेषु देवि प्रसिद्धा पुराणेषु वेदेषु गीता ॥ किमत्रास्ति चित्रं यदम्बा सुतं स्वं मुदा पालयेत्पोषयेत्सम्यगेव । यतस्त्वं जनित्री सुराणां सहाया कुरुष्वैकचित्तेन कार्यं समग्रम् ॥ न वा ते गुणानामियत्तां स्वरूपं
वयं देवि जानीमहे विश्ववन्द्ये ।
कृपापात्रमित्येव मत्वा तथास्मा-न्भयेभ्यः सदा पाहि पातुं समर्थे ॥
हे विश्वेश्वरि! हे प्राणोंकी स्वामिनि! सदा आनन्दरूपमें रहनेवाली तथा देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाली हे देवि! आपको नमस्कार है । दानवोंका अन्त करनेवाली, मनुष्योंकी समस्त २५ कामनाएँ पूर्ण करनेवाली तथा भक्तिके द्वारा अपने रूपका दर्शन देनेवाली हे देवि! आपको नमस्कार है ॥ २५ ॥
हे आदिदेवस्वरूपिणि! आपके नामोंकी निश्चित संख्या तथा आपके इस रूपको कोई भी नहीं २६ जान सकता । सबमें आप ही विराजमान हैं । जीवोंके सृजन और संहारकालमें शक्तिस्वरूपसे सदा आप ही कार्य करती हैं ॥ २६ ॥
आप ही स्मृति, धृति, बुद्धि, जरा, पुष्टि, तुष्टि, धृति, कान्ति, शान्ति, सुविद्या, सुलक्ष्मी, गति, कीर्ति, मेधा और विश्वकी पुरातन मूल प्रकृति हैं ॥ २७ ॥
आप जिस समय जिन स्वरूपोंसे देवताओंका कार्य सम्पन्न करती हैं, हम शान्तिके लिये आपके उन स्वरूपोंको नमस्कार करते हैं । आप ही क्षमा, योगनिद्रा, दया तथा विवक्षा -- इन कल्याणकारी रूपोंसे २८ सभी जीवोंमें निवास करती हैं ॥ २८ ॥
पूर्वकालमें आपने हम देवताओंका कार्य किया था जो कि महान् शत्रु मदान्ध महिषासुरका वध कर डाला था । हे देवि! सभी देवताओंपर आपकी दया सदैव रहती है, आपकी दया पूर्ण प्रसिद्ध २ ९ है और पुराणों तथा वेदोंमें भी उसका वर्णन किया गया है ॥२ ९ ॥ इसमें आश्चर्यकी क्या बात; क्योंकि माता प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे अपने पुत्रका पालन-पोषण करती ही है । क्योंकि आप देवताओंकी जननी हैं, अत: उनका सहायक बनकर एकाग्र मनसे ३० हमलोगोंका सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न करें ॥३० ॥
हे देवि! हे विश्ववन्द्ये! हमलोग न आपके गुणोंकी सीमा जानते हैं और न आपका स्वरूप ही जानते हैं । अतः रक्षा करनेमें समर्थ हे देवि! हमें केवल अपना कृपापात्र मानकर आप भयोंसे निरन्तर ३१ । हमारी रक्षा करती रहें ॥ ३१ ॥
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अ ० २२ ] पञ्चम
विना बाणपातैर्विना मुष्टिघातै-र्विना शूलखड्गैर्विना शक्तिदण्डैः ।
रिपून्हन्तुमेवासि शक्ता विनोदा-तथापीह लोकोपकाराय लीला ॥ ३२
इदं शाश्वतं नैव जानन्ति मूढा न कार्यं विना कारणं सम्भवेद्वा । वयं तर्कयामोऽनुमानं प्रमाणं त्वमेवासि कर्तास्य विश्वस्य चेति ॥ ३३ अजः सृष्टिकर्ता मुकुन्दोऽवितायं हरो नाशकृद्वै पुराणे प्रसिद्धः । न किं त्वत्प्रसूतास्त्रयस्ते युगादौ त्वमेवासि सर्वस्य तेनैव त्रिभिस्त्वं पुराराधिता देवि दत्ता त्वया शक्तिरुग्रा च तेभ्यः त्वया संयुतास्ते प्रकुर्वन्ति कामं जगत्पालनोत्पत्तिसंहारमेव ते किं न मन्दमतयो यतयो विमूढा -माता ॥ ३४
समग्रा ।
॥ ३५
स्त्वां ये न विश्वजननीं समुपाश्रयन्ति । विद्यां परां सकलकामफलप्रदां तां मुक्तिप्रदां विबुधवृन्दसुवन्दिताङ्घ्रिम् ॥ ३६ ये वैष्णवाः पाशुपताश्च सौरा दम्भास्त एव प्रतिभान्ति नूनम् । ध्यायन्ति न त्वां कमलाञ्च लज्जां कान्तिं स्थितिं कीर्तिमथापि पुष्टिम् ॥ ३७ हरिहरादिभिरप्यथ सेविता त्वमिह देववरैरसुरैस्तथा । भुवि भजन्ति न येऽल्पधियो नरा जननि ते विधिना खलु वञ्चिताः ॥ ३८ जलधिजापदपङ्कञ्जरञ्जनं
जतुरसेन करोति हरिः स्वयम् ।
त्रिनयनोऽपि धराधरजाङ्घ्रिपं-कजपरागनिषेवणतत्परः ॥ ३ ९
स्कन्ध ६४ ९ यद्यपि बिना बाण चलाये; बिना मुष्टिप्रहार किये और बिना त्रिशूल, तलवार, बछ, दण्ड आदिका प्रयोग किये भी आप विनोदपूर्वक शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं, फिर भी जगत्के उपकारके लिये ही आपकी यह लीला दृष्टिगोचर होती है ॥ ३२ ॥
आपका यह रूप सनातन है - इस रहस्यको अविवेकी लोग नहीं जानते हैं । [ हे माता! ] बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता । अतः अनुमान और प्रमाणके आधारपर हम यही जानते हैं कि इस विश्वकी रचना करनेवाली आप ही हैं ॥ ३३ ॥
ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालनकर्ता और शंकर संहारकर्ताके रूपमें पुराणमें प्रसिद्ध हैं, किंतु क्या वे तीनों देव आपसे उत्पन्न नहीं हुए हैं? युगके प्रारम्भमें केवल आप ही रहती हैं, अतः आप ही सबकी माता हैं ॥ ३४ ॥
हे देवि! पूर्वकालमें इन तीनोंने आपकी आराधना की थी, तब आपने उन्हें अपनी समस्त प्रबल शक्ति प्रदान की थी । वास्तवमें उसी शक्तिसे सम्पन्न होकर वे जगत्का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं ॥ ३५ ॥
जो संन्यासी लोग विश्वकी जननी, परम विद्या-स्वरूपिणी, समस्त वांछित फल प्रदान करनेवाली, मुक्तिदायिनी तथा सभी देवताओंसे वन्दित चरणोंवाली आप भगवतीकी उपासना नहीं करते, क्या वे मन्दबुद्धि तथा अज्ञानी नहीं हैं? ॥ ३६ ॥
विष्णु, शिव तथा सूर्यकी आराधना करनेवाले जो लोग कमला, लज्जा, कान्ति, स्थिति, कीर्ति और पुष्टि नामोंसे विख्यात आप भगवतीका ध्यान नहीं करते हैं, वे निश्चितरूपसे दम्भी प्रतीत होते हैं ॥ ३७ ॥
विष्णु और शंकर आदि श्रेष्ठ देवता तथा असुर भी आपकी पूजा करते हैं । अतः हे माता! इस जगत्में जो मन्दबुद्धि मनुष्य आपकी आराधना नहीं करते, निश्चय ही विधाताने उन्हें ठग लिया है ॥ ३८ ॥
भगवान् विष्णु अपने पास लक्ष्मीरूपमें विराजमान आप भगवतीके चरणकमलोंमें स्वयं महावर लगाते हैं । इसी प्रकार त्रिनेत्र भगवान् शिव भी अपने पास पार्वती - रूपमें विराजमान आप भगवतीके चरणकमलकी रजके सेवनमें निरन्तर तत्पर रहते हैं; तब अन्य
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६५० किमपरस्य नरस्य कथानकै-स्तव पदाब्जयुगं न भजन्ति के विगतरागगृहाश्च दयां क्षमां कृतधियो मुनयोऽपि भजन्ति ते देवि त्वदङ्घ्रिभजने न जना रता ये संसारकूपपतिताः पतिताः किलामी ते कुष्ठगुल्मशिरआधियुता भवन्ति दारिद्र्यदैन्यसहिता रहिताः सुखौघैः ये काष्ठभारवहने यवसावहारे कार्ये भवन्ति निपुणा धनदारहीनाः जानीमहेऽल्पमतिभिर्भवदङ्घ्रिसेवा पूर्वे भवे जननि तैर्न कृता कदापि व्यास उवाच
एवं स्तुता सुरैः सर्वैरम्बिका करुणान्विता ।
प्रादुर्बभूव तरसा रूपयौवनसंयुता ॥
दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता ।
दिव्यमाल्यसमायुक्ता दिव्यचन्दनचर्चिता ॥
जगन्मोहनलावण्या सर्वलक्षणलक्षिता ।
अद्वितीयस्वरूपा सा देवानां दर्शनं गता ॥
जाह्नव्या स्नातुकामा सा निर्गता गिरिगह्वरात् ।
दिव्यरूपधरा देवी विश्वमोहनमोहिनी ॥
देवान्स्तुतिपरानाह मेघगम्भीरया गिरा ।
प्रेमपूर्वं स्मितं कृत्वा कोकिलामञ्जुवादिनी ॥
देव्युवाच
भो भोः सुरवराः कात्र भवद्भिः स्तूयते भृशम् ।
किमर्थं ब्रूत वः कार्यं चिन्ताविष्टाः कुतः पुनः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ मनुष्यकी बात ही क्या! आपके चरणकमलोंकी । आराधना कौन नहीं करते? घर - गृहस्थीसे विरक्त बुद्धिमान् मुनिगण भी दया और क्षमारूपमें प्रतिष्ठित आप भगवतीकी उपासना करते हैं ॥ ३ ९ -४० ॥ ॥ ४० हे देवि! जो लोग आपके चरणोंकी उपासनामें संलग्न नहीं रहते, उन्हें निश्चय ही इस संसाररूप अगाध कूपमें गिरना पड़ता है । वे पतित लोग कुष्ठ, । गुल्म और शिरोरोग से ग्रस्त रहते हैं, दरिद्रता तथा दीनतासे युक्त रहते हैं और सुखोंसे सदा वंचित रहते हैं ॥ ४१ ॥
॥ ४१ हे माता! धन और स्त्रीसे रहित जो मनुष्य लकड़ीका बोझ ढोने और तृण आदिका वहन करनेमें लगे हैं, [ उनके विषयमें ] हम तो यही समझते हैं कि । उन मन्दबुद्धि मनुष्योंने पूर्वजन्ममें आपके चरणोंकी उपासना कभी नहीं की ॥ ४२ ॥
॥ ४२ व्यासजी बोले- इस प्रकार समस्त देवताओंके स्तुति करनेपर अम्बिका करुणासे ओत - प्रोत होकर तुरंत प्रकट हो गयीं । [ उस समय ] वे भगवती रूप तथा यौवनसे सम्पन्न थीं, उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा था, वे अलौकिक आभूषणोंसे अलंकृत थीं. ४३ दिव्य मालाओंसे सुशोभित हो रही थीं, दिव्य चन्दनसे अनुलिप्त थीं, जगत्को मोहित कर देनेवाले सौन्दर्यसे सम्पन्न थीं और समस्त शुभ लक्षणोंसे समन्वित थीं । ४४ इस प्रकार अद्वितीय स्वरूपवाली वे भगवती देवताओंके समक्ष प्रकट हुईं ॥ ४३ – ४५ ॥ दिव्य रूप धारण करनेवाली तथा विश्वको मोह ४५ लेनेमें समर्थ कामदेवको भी मोहित करनेवाली वे भगवती गंगा में स्नान करनेकी अभिलाषासे पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकली थीं ॥ ४६ ॥
४६ कोकिलके समान मधुर बोलनेवाली भगवती प्रेमपूर्ण भावसे मुसकराकर स्तुति करनेमें संलग्न देवताओंसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहने ४७ लगीं ॥ ४७ ॥
देवी बोलीं- हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग यहाँपर इतनी बड़ी स्तुति किसलिये कर रहे हैं? आपलोग इस प्रकार चिन्तासे व्याकुल क्यों हैं? मुझे ४८ अपना कार्य बताइये ॥ ४८ ॥
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अ ० २२ ] पञ्चम व्यास उवाच
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या मोहिता रूपसम्पदा ।
प्रेमपूर्वं हृदुत्साहास्तामूचुः सुरसत्तमाः ॥ ४ ९
देवा ऊचुः
देवि स्तुमस्त्वां विश्वेशि प्रणताः स्म कृपार्णवे ।
पाहि नः सर्वदुःखेभ्यः संविग्नान्दैत्यतापितान् ॥५०
पुरा त्वया महादेवि निहत्यासुरकण्टकम् ।
महिषं नो वरो दत्तः स्मर्तव्याहं सदापदि ॥ ५१
स्मरणाद्दैत्यजां पीडां नाशयिष्याम्यसंशयम् ।
तेन त्वं संस्मृता देवि नूनमस्माभिरित्यपि ॥ ५२
अद्य शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ घोरदर्शनौ ।
उत्पन्नौ विघ्नकर्तारावहन्यौ पुरुषैः किल ॥ ५३
रक्तबीजश्च बलवांश्चण्डमुण्डौ तथासुरौ ।
एतैरन्यैश्च देवानां हृतं राज्यं महाबलैः ॥ ५४
गतिरन्या न चास्माकं त्वमेवासि महाबले ।
कुरु कार्यं सुराणां वै दुःखितानां सुमध्यमे ॥ ५५
देवास्त्वदङ्घ्रिभजने निरताः सदैव
दानवैरतिबलैर्विपदं सुनीताः ।
तान्देवि दुःखरहितान् कुरु भक्तियुक्ता-न्मातस्त्वमेव शरणं भव दुःखितानाम् ॥ ५६
सकलभुवनरक्षा देवि कार्या त्वयाद्य स्वकृतमिति विदित्वा विश्वमेतद् युगादौ । जननि जगति पीडां दानवा दर्पयुक्ताः स्वबलमदसमेतास्ते प्रकुर्वन्ति मातः ॥ ५७ स्कन्ध ६५१ व्यासजी बोले- भगवतीका यह वचन सुनकर उनके रूप - वैभवसे मोहित श्रेष्ठ देवताओंका हृदय उत्साहसे परिपूर्ण हो गया, जिससे वे प्रेमपूर्वक उनसे कहने लगे ॥४ ९ ॥ देवता बोले- जगत्को नियन्त्रणमें रखनेवाली हे देवि! हम आपकी स्तुति कर रहे हैं, हम आपके शरणागत हैं । हे कृपासिन्धो! दैत्योंसे सताये गये हम देवताओंकी सम्पूर्ण दुःखोंसे रक्षा कीजिये ॥५० ॥
हे महादेवि! पूर्वकालमें देवताओंके लिये कंटक बने महिषासुरका वध करके आपने हमें वर प्रदान किया था - ' आपलोग संकटमें मुझे सदा याद कीजियेगा, स्मरण करते ही मैं दैत्योंके द्वारा आपलोगोंको पहुँचायी गयी पीड़ाका निःसन्देह नाश कर दूँगी । ' हे देवि! इसीलिये हमलोगोंने आपका स्मरण किया है ॥ ५१-५२ ॥ इस समय शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दानव उत्पन्न हुए हैं, जो देखनेमें महाभयंकर हैं । वे [ हमारे कार्योंमें ] विघ्न डाला करते हैं । वे पुरुषोंसे सर्वथा अवध्य हैं । ऐसे ही बलशाली दानव रक्तबीज तथा चण्ड और मुण्ड भी हैं । इन सभी तथा अन्य महाबली दानवोंने हम देवताओंका राज्य छीन लिया है । हे महाबले! हमलोगोंका दूसरा कोई अवलम्ब नहीं, एकमात्र आप ही हमारी शरण हैं । हे सुमध्यमे! आप दुःखित देवताओंका कार्य सिद्ध करें ॥५३–५५ ॥ देवता आपके चरणोंकी उपासनामें सदैव संलग्न रहते हैं । [ इस समय ] वे सब महान् बलशाली दैत्योंके द्वारा विपत्तिमें डाल दिये गये हैं । अतः हे देवि! आप उन भक्तिपरायण देवताओंको दुःखरहित कर दीजिये । हे माता! आप दुःखित देवताओंका आश्रय बन जाइये ॥ ५६ ॥
हे देवि! युगके आरम्भमें इस विश्वकी रचना आप भगवतीने स्वयं की थी- यह जानकर आप इस समय सम्पूर्ण भूमण्डलकी रक्षा करें । हे जननि! हे माता! अपने बलसे मदान्वित तथा अभिमानमें चूर । दानव जगत्में लोगोंको पीड़ित कर रहे हैं ॥ ५७ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवकृतदेव्याराधनवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥