देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 851–860

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860

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८४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४

अर्घ्यपाद्यविधिं कृत्वा तस्यासनस्थितस्य च ।

उपविष्टः समीपेऽहं मुनेरमिततेजसः ॥

दृष्ट्वा विश्रमिणं शान्तं नारदं ज्ञानपारदम् ।

तमपृच्छमहं राजन् यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना ॥

असारेऽस्मिंस्तु संसारे प्राणिनां किं सुखं मुने ।

न पश्यामि विनिश्चित्य कदाचित्कुत्रचित्क्वचित् ॥

द्वीपे जातो जनन्याहं संत्यक्तस्तत्क्षणादपि ।

अनाश्रयो वने वृद्धिं प्राप्तः कर्मानुसारतः ॥

तपस्तप्तं मया चोग्रं पर्वते बहुवार्षिकम् ।

पुत्रकामेन देवर्षे शङ्करः समुपासितः ॥

ततो मया शुकः प्राप्तः पुत्रो ज्ञानवतां वरः ।

पाठितस्तु मया सम्यग्वेदानां सार आदितः ॥

स त्यक्त्वा मां गतः क्वापि रुदन्तं विरहातुरम् ।

लोकाल्लोकान्तरं साधो वचनात्तव बोधितः ॥

ततोऽहं पुत्रसन्तप्तस्त्यक्त्वा मेरुं महागिरिम् ।

मातरं मनसा कृत्वा सम्प्राप्तः कुरुजाङ्गलम् ॥

पुत्रस्नेहादतितरां कृशाङ्गः शोकसंयुतः ।

जानन्मिथ्येति संसारं मायापाशनियन्त्रितः ॥

ततो राज्ञा वृतां ज्ञात्वा मातरं वासवीं शुभाम् ।

स्थितोऽत्रैवाश्रमं कृत्वा सरस्वत्यास्तटे शुभे ॥

शन्तनुः स्वर्गतिं प्राप्तो विधुरा जननी स्थिता ।

पुत्रद्वययुता साध्वी भीष्मेण प्रतिपालिता ॥

अर्घ्य तथा पाद्य आदिसे उनका विधिपूर्वक १२ पूजन करके आदरपूर्वक आसनपर विराजमान उन अमित तेजस्वी नारदके समीप मैं बैठ गया ॥१२ ॥

हे राजन्! तत्पश्चात् ज्ञानके पार पहुँचानेमें समर्थ मुनि नारदको मार्गश्रमसे रहित तथा शान्तचित्त १३ | देखकर मैंने उनसे वही प्रश्न पूछा था, जो आपने इस समय मुझसे पूछा है ॥ १३ ॥

[ मैंने उनसे पूछा - ] हे मुने! इस सारहीन १४ जगत्में प्राणियोंको क्या सुख प्राप्त होता है? विचार करनेपर मुझे तो कभी भी, कहीं भी तथा कुछ भी सुख नहीं दिखायी देता है ॥ १४ ॥

मुझे ही देखिये, एक द्वीपमें जन्म लेते ही मेरी १५ माताने मेरा त्याग कर दिया । तभीसे आश्रयहीन रहता हुआ मैं वनमें अपने कर्मके अनुसार बढ़ने लगा ॥ १५ ॥

हे देवर्षे! तत्पश्चात् मैंने पुत्रप्राप्तिकी कामनासे १६ एक पर्वतपर बहुत वर्षोंतक शंकरजीकी उपासना करते हुए कठोर तपस्या की ॥ १६ ॥

तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ शुकदेव मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त १७ हुए । मैंने उन्हें आरम्भसे लेकर सम्यक् प्रकारसे वेदोंका सारभूत तत्त्व पढ़ा दिया ॥१७ ॥

हे साधो! आपके वचनोंसे ज्ञान प्राप्त करके मेरा वह पुत्र मुझ विरहातुरको रोता हुआ छोड़कर १८ लोकलोकान्तरमें कहीं चला गया? ॥१८ ॥

तब पुत्रविरहसे सन्तप्त मैं महापर्वत सुमेरुको छोड़कर अपनी माताको मनमें याद करते हुए कुरुजांगल १ ९ प्रदेशमें पहुँचा ॥ १ ९ ॥ संसार मिथ्या है - ऐसा जानते हुए भी मायापाशमें बँधा हुआ मैं पुत्र - स्नेहके कारण शोकाकुल रहने से २० अत्यन्त दुर्बल शरीरवाला हो गया ॥२० ॥

तत्पश्चात् जब मैंने यह जाना कि वासवराजसुता मेरी कल्याणमयी माताका राजा शन्तनुने वरण कर लिया है, तब मैं सरस्वतीके पवित्र तटपर आश्रम २१ बनाकर रहने लगा ॥ २१ ॥

इसके बाद महाराज शन्तनुके स्वर्ग प्राप्त कर नेपर मेरी माँ विधवा हो गयीं । तब भीष्मने दो २२ पुत्रोंवाली मेरी माताका पालन किया ॥ २२ ॥

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अ ० २४ ] चित्राङ्गदः कृतो राजा गङ्गापुत्रेण धीमता कालेन सोऽपि मे भ्राता मृतः कामसमद्युतिः ततः सत्यवती माता निमग्ना शोकसागरे चित्राङ्गदं मृतं पुत्रं रुरोद भृशमातुरा ॥

सम्प्राप्तोऽहं महाभाग ज्ञात्वा तां दुःखितां सतीम् ।

आश्वासिता मयात्यर्थं भीष्मेण च महात्मना ॥

विचित्रवीर्यस्त्वपरो वीर्यवान्पृथिवीपतिः ।

कृतो भीष्मेण भ्राता वै स्त्रीराज्यविमुखेन ह ॥

काशिराजसुते रम्ये विजित्य पृथिवीपतीन् ।

भीष्मेणानीय स्वबलात्कन्यके द्वे समर्पिते ॥

सत्यवत्यै शुभे काले विवाहः परिकल्पितः ।

भ्रातुर्विचित्रवीर्यस्य तदाहं सुखितोऽभवम् ॥

पुनः सोऽपि मृतो भ्राता यक्ष्मणा पीडितो भृशम् ।

अनपत्यो युवा धन्वी माता मे दुःखिताभवत् ॥

काशिराजसुते द्वे तु मृतं दृष्ट्वा पतिं तदा ।

पतिव्रताधर्मपरे भगिन्यौ सम्बभूवतुः ॥

ऊचतुः सतीं श्वश्रूं रुदतीं भृशदुःखिताम् ।

पतिना सहगामिन्यौ भविष्यावो हुताशने ॥

पुत्रेण सह ते श्वश्रु स्वर्गे गत्वाथ नन्दने ।

सुखेन विहरिष्यावः पतिना सह संयुते ॥

निवारिते तदा मात्रा वध्वौ तस्मान्महोद्यमात् ।

स्नेहभावं समाश्रित्य भीष्मस्य वचनात्तदा ॥

गाङ्गेयेन च मात्रा मे सम्मन्त्र्य च परस्परम् ।

कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्वं संस्मृतोऽहं गजाह्वये ॥

षष्ठ स्कन्ध ८४३ । बुद्धिमान् गंगापुत्र भीष्मने चित्रांगदको राजा ॥ २३ बनाया । किंतु कुछ ही समयमें कामदेवके सदृश कान्तिमान् मेरे भाई चित्रांगद भी मृत्युको प्राप्त हो । गये ॥ २३ ॥

२४ पुत्र चित्रांगदके मर जानेपर मेरी माता सत्यवती अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगीं और नित्य शोकके समुद्रमें निमग्न रहने लगीं ॥२४ ॥

२५ हे महाभाग! उन पतिव्रताको दुःखित जानकर मैं उनके पास गया । वहाँ मैंने तथा महात्मा भीष्मने उन्हें बहुत सान्त्वना दी ॥ २५ ॥

२६ तब स्त्री तथा राज्यसे विमुख भीष्मने अपने दूसरे भाई पराक्रमी विचित्रवीर्यको राजा बना दिया ॥ २६ ॥

तत्पश्चात् भीष्मने अपने बलसे राजाओंको २७ जीतकर काशिराजकी दो सुन्दर पुत्रियोंको लाकर माता सत्यवतीको समर्पित कर दिया । पुनः शुभ मुहूर्तमें जब भाई विचित्रवीर्यका विवाह सम्पन्न हो २८ गया तब मैं बहुत प्रसन्न हुआ ॥ २७-२८ ॥ कुछ ही समय में मेरे धनुर्धर भाई विचित्रवीर्य भी यक्ष्मा रोगसे ग्रस्त होकर युवावस्थामें ही निःसन्तान मर गये, जिससे मेरी माता दुःखित हुईं ॥ २ ९ ॥ २ ९ इधर जब काशिराजकी दोनों पुत्रियोंने अपने पतिको मृत देखा तब वे दोनों बहनें पातिव्रत्य धर्मके पालनके लिये तत्पर हुईं ॥ ३० ॥

३० वे दारुण दुःखके कारण रोती हुई अपनी साध्वी साससे कहने लगीं - हे श्वश्रु! हम दोनों चिताग्निमें अपने पतिके साथ ही जायँगी । ३१ आपके पुत्रके साथ स्वर्गमें जाकर हम दोनों अपने पतिसे युक्त होकर नन्दनवनमें सुखपूर्वक विहार करेंगी ॥ ३१-३२ ॥ ३२ तब स्नेहभावका आश्रय लेकर मेरी माताने भीष्मके परामर्शसे उन दोनों वधुओंको महान् चेष्टा करनेसे रोक दिया ॥ ३३ ॥

३३ विचित्रवीर्यकी सभी और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न करके गंगातनय भीष्म तथा मेरी माताने आपसमें मन्त्रणा करके मुझे हस्तिनापुर आनेके लिये मेरा ३४ | स्मरण किया ॥ ३४ ॥

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८४४

स्मृतमात्रस्तु मात्रा वै ज्ञात्वा भावं मनोगतम् ।

तरसैवागतश्चाहं नगरं नागसाह्वयम् ॥

प्रणम्य मातरं मूर्ध्ना संस्थितोऽथ कृताञ्जलिः ।

तामब्रवं सुतप्ताङ्गीं पुत्रशोकेन कर्शिताम् ॥

मातस्त्वया किमाहूतो मनसाहं तपस्विनि आज्ञापय महत्कार्ये दासोऽस्मि करवाणि किम् ॥ त्वं मे तीर्थं परं मातर्देवश्च प्रथितः परः आगतश्चिन्तितश्चात्र ब्रूहि कृत्यं तव प्रियम् व्यास उवाच इत्युक्त्वाहं स्थितस्तत्र मातुरग्रे यदा मुने तदा सा मामुवाचेदं पश्यन्ती भीष्ममन्तिके पुत्र तेऽद्य मृतो भ्राता पीडितो राजयक्ष्मणा तेनाहं दुःखिता जाता वंशच्छेदभयादिह तस्मात्त्वमद्य मेधाविन् मयाहूतः समाधिना गाङ्गेयस्य मतेनात्र पाराशर्यार्थसिद्धये कुलं स्थापय नष्टं त्वं शन्तनोर्नामकारणात् रक्ष मां दुःखतः कृष्ण वंशच्छेदोद्भवाद् द्रुतम् काशिराजसुते भार्ये भ्रातुस्तव यवीयसः साधोर्विचित्रवीर्यस्य रूपयौवनभूषिते ताभ्यां सङ्गम्य मेधाविन् पुत्रोत्पादनकं कुरु . रक्षस्व भारतं वंशं नात्र दोषोऽस्ति कर्हिचित् ॥ व्यास उवाच इति मातुर्वचः श्रुत्वा जातश्चिन्तातुरो ह्यहम् लज्जयाकुलचित्तस्तामब्रवं विनयानतः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ इस प्रकार माताके स्मरण करते ही उनके ३५ मनोगत भावको जानकर शीघ्र ही मैं हस्तिनापुरमें आ गया । सिर झुकाकर माताको प्रणाम करके मैं हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़ा हो गया और पुत्रशोकके कारण अत्यन्त दुर्बल तथा तप्त अंगोंवाली उन मातासे ३६ मैंने कहा — ॥३५–३६ ॥ हे माता! आपने अपने मनमें स्मरण करके । यहाँ मुझे किसलिये बुलाया है? हे तपस्विनि! बड़े-३७ से - बड़े कार्यके लिये मुझे आदेश दीजिये; मैं आपका दास हूँ, मैं क्या करूँ? ॥ ३७ ॥

। हे माता! मेरा परम तीर्थ तथा महान् परम ॥ ३८ देव आप ही हैं । आपके स्मरण करते ही मैं यहाँ उपस्थित हो गया हूँ । अब आप अपना प्रिय कार्य बताइये ॥ ३८ ॥

। व्यासजी बोले – हे मुने! ऐसा कहकर जब मैं माताके आगे खड़ा हो गया तब पास ही बैठे ॥ ३ ९ हुए भीष्मको देखती हुई वे मुझसे यह कहने लगीं ॥ ३ ९ ॥ । हे पुत्र! राजयक्ष्मा रोगसे ग्रस्त होकर तुम्हारे ॥ ४० भाई विचित्रवीर्य मृत्युको प्राप्त हो गये हैं । अतएव वंशके नष्ट होनेके भयसे मैं दुःखी हूँ ॥४० ॥

हे प्रतिभाशाली पराशरनन्दन! इसी उद्देश्यकी ॥ ४१ पूर्तिके लिये मैंने भीष्मके परामर्शसे समाधिद्वारा तुम्हें यहाँ बुलाया है ॥ ४१ ॥

। इस नष्ट होते हुए वंशको तुम स्थापित ॥ ४२ करो, जिससे महाराज शन्तनुका नाम बना रहे । हे द्वैपायन कृष्ण! वंशच्छेदजन्य दुःखसे मेरी शीघ्र । रक्षा करो ॥ ४२ ॥

॥ ४३ तुम्हारे सदाचारी लघुभ्राता विचित्रवीर्यकी रूप-यौवनसम्पन्न दो भार्याएँ हैं, जो काशिराजकी पुत्रियाँ । हैं ॥ ४३ ॥

हे मेधाविन्! उन दोनोंके साथ संसर्ग करके तुम ४४ पुत्र उत्पन्न करो, भरतवंशकी रक्षा करो; इसमें कोई दोष नहीं है ॥ ४४ ॥

व्यासजी बोले - [ हे नारद! ] माताका यह वचन । सुनकर मैं चिन्तामें पड़ गया और लज्जासे व्याकुल मनवाला ॥ ४५ । होकर मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक कहा - हे माता!

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अ ० २४ ]

मातः पापाधिकं कर्म परदाराभिमर्शनम् ।

ज्ञात्वा धर्मपथं सम्यक्करोमि कथमादरात् ॥

तथा यवीयसो भ्रातुर्वधूः कन्या प्रकीर्तिता ।

व्यभिचारं कथं कुर्यामधीत्य निगमानहम् ॥

अन्यायेन न कर्तव्यं सर्वथा कुलरक्षणम् ।

न तरन्ति हि संसारात्पितरः पापकारिणः ॥

लोकानामुपदेष्टा यः पुराणानां प्रवर्तकः ।

स कथं कुत्सितं कर्म ज्ञात्वा कुर्यान्महाद्भुतम् ॥

पुनरुक्तो ह्यहं मात्रा रुदत्या भृशमन्तिके ।

पुत्रशोकातितप्ता या वंशरक्षणकाम्यया ॥

पाराशर्य न ते दोषो वचनान्मम पुत्रक ।

गुरूणां वचनं तथ्यं सदोषमपि मानवैः ॥

कर्तव्यमविचार्यैव शिष्टाचारप्रमाणतः ।

वचनं कुरु मे पुत्र न ते दोषोऽस्ति मानद ॥

पुत्रस्य जननं कृत्वा सुखिनीं कुरु मातरम् ।

विशेषेण तु सन्तप्तां मग्नां शोकार्णवे सुत ॥

इति तां ब्रुवतीं श्रुत्वा तदा सुरनदीसुतः ।

मामुवाच विशेषज्ञः सूक्ष्मधर्मस्य निर्णये ॥

द्वैपायन विचारोऽत्र न कर्तव्यस्त्वयानघ ।

मातुर्वचनमादाय विहरस्व यथासुखम् ॥

व्यास उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा मातुश्च प्रार्थनं तथा ।

निःशङ्कोऽहं तदा जातः कार्ये तस्मिञ्जुगुप्सिते ॥

अम्बिकायां प्रवृत्तोऽहमृतुमत्यां मुदा निशि ।

विमनसायां तु तापसे कुत्सिते भृशम् ॥

शप्ता मया सा सुश्रोणी प्रसङ्गे प्रथमे तदा ।

अन्धस्ते भविता पुत्रो यतो नेत्रे निमीलिते ॥

षष्ठ स्कन्ध ८४५ परनारीसंगम महान् पापकर्म है । धर्ममार्गका सम्यक् ४६ ज्ञान रखते हुए भी मैं आसक्तिपूर्वक ऐसा कर्म कैसे कर सकता हूँ? और फिर छोटे भाईकी पत्नी कन्याके समान कही गयी है । ऐसी स्थितिमें सभी वेदोंका ४७ अध्ययन करके भी मैं ऐसा व्यभिचार कैसे करूँ? अन्यायसे कुलकी रक्षा कदापि नहीं करनी चाहिये; क्योंकि पाप करनेवालेके पितृगण संसार - सागरसे ४८ कभी नहीं पार हो सकते । जो समग्र पुराणोंका प्रवर्तक तथा लोगोंको उपदेश करनेवाला हो, वह जान-बूझकर ऐसा अद्भुत तथा निन्दनीय कार्य कैसे कर ४ ९ सकता है? ॥ ४५ –४ ९ ॥ तत्पश्चात् वंश - रक्षाकी कामनासे युक्त मेरी माता, ५० जो पुत्रशोकसे अत्यधिक सन्तप्त थीं, विलाप करती हुई समीपमें आकर मुझसे पुनः कहने लगीं - ॥५० ॥

हे पराशरनन्दन! हे पुत्र! मेरे कहनेपर ऐसा ५१ करनेसे तुम दोषभागी नहीं होओगे । शिष्टजनोंका आचार ही प्रमाण है - ऐसा मानकर मनुष्योंको गुरुजनोंके दोषपूर्ण वचनोंको भी उचित समझकर बिना कुछ ५२ सोच - विचार किये कर डालना चाहिये । हे पुत्र! मेरी बात मान लो! हे मानद! इससे तुम्हें दोष नहीं लगेगा । हे सुत! पुत्र उत्पन्न करके अत्यधिक सन्तप्त ५३ तथा शोकसागरमें निमग्न अपनी माताको सुखी करो ॥५१–५३ ॥ माताकी यह बात सुनकर सूक्ष्मधर्मके निर्णयमें ५४ विशेष ज्ञान रखनेवाले गंगातनय भीष्मने मुझसे कहा— हे कृष्ण - - ह द्वैपायन! तुम्हें इस विषयमें विचार नहीं ५५ करना चाहिये । हे पुण्यात्मन्! माताका वचन मानकर तुम सुखपूर्वक विहार करो ॥५४-५५ ॥ व्यासजी बोले - [ हे नारद! ] भीष्मका यह वचन सुनकर तथा माताकी प्रार्थनापर मैं निःशंक ५६ भावसे उस निन्द्य कर्ममें प्रवृत्त हो गया ॥५६ ॥

रात्रिमें मैं प्रसन्नतापूर्वक ऋतुमती अम्बिकाके साथ प्रवृत्त हुआ, किंतु मुझ कुरूप तपस्वीके ५७ प्रति उसके अनुरागहीन होनेके कारण मैंने उस सुश्रोणीको शाप दे दिया कि प्रथम संसर्गके समय ही तुमने अपनी दोनों आँखें बन्द कर ली थीं, अतः ५८ । तुम्हारा पुत्र अन्धा होगा ॥ ५७-५८ ॥

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८४६ द्वितीयेऽह्नि मुनिश्रेष्ठ पृष्टो मात्रा रहः पुनः भविष्यति सुतः पुत्र काशिराजसुतोदरे मयोक्ता जननी तत्र व्रीडानम्रमुखेन ह विनेत्रो भविता पुत्रो मातः शापान्ममैव हि तया निर्भत्सितस्तत्र कठोरवचसा मुने कथं पुत्र त्वया शप्ता पुत्रस्तेऽन्धो भविष्यति श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५ । हे मुनिवर! दूसरे दिन माताने एकान्तमें ॥ ५ ९ मुझसे फिर पूछा- हे पुत्र! क्या काशिराजकी पुत्री अम्बिका गर्भसे पुत्र उत्पन्न होगा? तब लज्जाके । कारण मुख नीचे किये हुए मैंने मातासे कहा – हे माता! मेरे शापके प्रभावसे नेत्रहीन पुत्र उत्पन्न ॥ ६० होगा ॥ ५ ९ -६० ॥ हे मुने! इसपर माताने कठोर वाणीमें मेरी । भर्त्सना की - ' हे पुत्र! तुमने शाप क्यों दिया कि ॥ ६१ तुम्हारा पुत्र अन्धा होगा'॥६१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे अम्बिकायां नियोगात्पुत्रोत्पादनाय गर्भधारणवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः पाण्डु और विदुरके जन्मकी कथा, पाण्डवोंका जन्म, पाण्डुकी मृत्यु, द्रौपदीस्वयंवर, राजसूययज्ञ, कपटद्यूत तथा वनवास और व्यासजीके मोहका वर्णन व्यास उवाच

वासवी चकिता जाता श्रुत्वा मे वाक्यमीदृशम् ।

दाशेयी मामुवाचेदं पुत्रार्थे भृशमातुरा ॥

अम्बालिका वधूर्धन्या काशिराजसुता सुत ।

भार्या विचित्रवीर्यस्य विधवा शोकसंयुता ॥

सर्वलक्षणसम्पन्ना रूपयौवनशालिनी ।

तस्यां जनय सङ्गं त्वं कृत्वा पुत्रं सुसम्मतम् ॥

नान्धो राजाधिकारी स्यात्तस्मात्पुत्रं मनोहरम् ।

उत्पादय राजपुत्र्यां वचनान्मम मानद ॥

इत्युक्तोऽहं तदा मात्रा स्थितस्तत्र गजाह्वये ।

यावदृतुमती जाता काशिराजसुता मुने ॥

एकान्ते शयनागारे प्राप्ता सा मम सन्निधौ ।

लज्जमाना सुकेशान्ता स्वश्वश्रूवचनात्तदा ॥

दृष्ट्वा मां जटिलं दान्तं तापसं रसवर्जितम् ।

सा स्वेदवदना जाता पाण्डुरा विमना भृशम् ॥

व्यासजी बोले- मेरी वह बात सुनकर वासवराजकुमारी सत्यवती चकित हो गयीं और १ पुत्रके लिये अत्यन्त व्यग्र होकर मुझसे कहने लगीं— हे पुत्र! काशिराजकी श्रेष्ठ पुत्री वधू अम्बालिका विचित्रवीर्यकी भार्या है, जो विधवा तथा पतिशोकसे २ सन्तप्त है । वह सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न और रूप तथा यौवनसे युक्त है । तुम उसके साथ संसर्ग करके प्रिय पुत्र उत्पन्न करो ॥१-३ ॥ ३ नेत्रहीनको राजा बननेका अधिकार नहीं हो सकता । इसलिये हे मानद! मेरी बात मानकर तुम उस राजपुत्री से एक मनोहर पुत्र उत्पन्न करो ॥ ४ ॥

४ मुने! तब मैं माताजीके ऐसा कहनेपर वहीं हस्तिनापुरमें ठहर गया और जब सुन्दर केशपाशवाली ५ काशिराजकी पुत्री अम्बालिका ऋतुमती हुई तो अपनी सासके कहनेपर वह एकान्त शयनकक्षमें लज्जित होती मेरे पास आयी ॥ ५-६ ॥ ६ वहाँ मुझ जटाधारी, इन्द्रियनिग्रही तथा शृङ्गाररससे अनभिज्ञ तपस्वीको देखकर उसके मुखपर पसीना आ गया, शरीर पीला पड़ गया और उसका मन बहुत ७ | खिन्न हो गया ॥ ७ ॥

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अ ० २५ ] कुपितोऽहं तदा दृष्ट्वा कामिनीं निशि सङ्गताम् वेपमानां स्थितां पार्श्वे ह्यब्रवं तामहं रुषा दृष्ट्वा मां यदि गर्वेण पाण्डुवर्णा समावृता । अतस्ते तनयः पाण्डुर्भविष्यति सुमध्यमे

इत्युक्त्वा निशि तत्रैव स्थितोऽम्बालिकया युतः ।

भुक्त्वा तां निशि निर्यातः स्थानमापृच्छ्य मातरम् ॥

ततस्ताभ्यां सुतौ काले प्रसूतावन्धपाण्डुरौ ।

धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च प्रथितौ सम्बभूवतुः ॥

माता मे विमना जाता तादृशौ वीक्ष्य तौ सुतौ ।

ततः संवत्सरस्यान्ते मामाहूय तदाब्रवीत् ॥

द्वैपायन सुतौ जातौ राज्ययोग्यौ न तादृशौ ।

अन्यं मनोहरं पुत्रं समुत्पादय मे प्रियम् ॥

तथेति सा मया प्रोक्ता मुदिता जननी तदा ।

अम्बिकां प्रार्थयामास सुतार्थे काल आगते ॥

पुत्रि व्यासं समालिङ्ग्य पुत्रमुत्पादयाद्भुतम् ।

कुरुवंशस्य कर्तारं राज्ययोग्यं वरानने ॥

वधूर्लज्जान्विता किञ्चिन्नोवाच वचनं तदा ।

गतोऽहं शयनागारे मातुस्तद्वचनान्निशि ॥

दासी विचित्रवीर्यस्य रूपयौवनसंयुता ।

प्रेषिताम्बिकया त्वत्र विचित्राभरणाम्बरा ॥

चन्दनारक्तदेहा सा पुष्पमालाविभूषिता ।

आयाता हावसंयुक्ता सुकेशी हंसगामिनी ॥

पर्यङ्के मां समावेश्य संस्थिता प्रेमसंयुता ।

प्रसन्नोऽहं तदा तस्या विलासेनाभवं मुने ॥

षष्ठ स्कन्ध ८४७ । तत्पश्चात् रात्रिमें सम्पर्कके लिये आयी हुई ॥ ८ उस सुन्दरीको अपने पासमें बैठी देखकर मैं कुपित हो गया और रोषपूर्वक बोला - सुमध्यमे! मुझे देखकर यदि तुम अभिमानसे पीली पड़ गयी हो तो तुम्हारा ॥ ९ पुत्र भी पीतवर्णका होगा ॥ ८ - ९ ॥ ऐसा कहकर मैं उस अम्बालिकाके साथ रातभर वहीं रहा और फिर मातासे आज्ञा लेकर अपने १० आश्रमके लिये प्रस्थित हो गया ॥ १० ॥

तदनन्तर समय आनेपर उन दोनोंने अन्धे तथा पाण्डुवर्णके दो पुत्र उत्पन्न किये । वे दोनों धृतराष्ट्र ११ तथा पाण्डु नामसे प्रसिद्ध हुए ॥११ ॥

उन दोनों राजकुमारोंको इस प्रकारका देखकर मेरी माता खिन्नमनस्क हो गयीं । तत्पश्चात् एक वर्षके अनन्तर मुझे बुलाकर उन्होंने कहा- हे द्वैपायन! १२ इस प्रकारके दोनों पुत्र राज्य करनेके योग्य नहीं हैं, अतएव तुम एक अन्य मनोहर पुत्र उत्पन्न करो, जो मुझे अत्यन्त प्रिय हो ॥ १२-१३ ॥ १३ ' वैसा ही होगा ' - मेरे इस प्रकार कहनेपर माता अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं । इसके बाद ऋतुकाल आनेपर माताने पुत्रहेतु अम्बिकासे प्रार्थना की - हे पुत्र! हे १४ सुमुखि! व्यासके साथ समागम करके तुम कुरुवंश चलानेवाला तथा राज्य करनेयोग्य एक अद्वितीय पुत्र उत्पन्न करो ॥ १४-१५ ॥ १५ उस समय लज्जासे युक्त वधू अम्बिकाने कुछ भी नहीं कहा और मैं माताकी वह बात मानकर रातमें शयनागारमें चला गया ॥ १६ ॥

१६ तत्पश्चात् अम्बिकाने विचित्रवीर्यकी रूप-यौवनसम्पन्न दासीको सुन्दर आभूषण तथा वस्त्र पहनाकर मेरे पास भेज दिया ॥ १७ ॥

१७ शरीरपर चन्दन लगाये, फूलकी मालाओंसे विभूषित तथा सुन्दर केशोंवाली वह सुन्दरी हंसकी भाँति मन्द - मन्द चलती हुई बड़े हाव - भाव से मेरे १८ | पास आयी ॥१८ ॥

मुझे पलंगपर बैठाकर वह भी प्रेमपूर्वक मेरे पास बैठ गयी । हे मुने! उसके इस प्रेमपूर्ण हाव - भावसे मैं १ ९ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥ १ ९ ॥

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८४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५

रात्रौ संक्रीडितं प्रेम्णा तया सह मया भृशम् ।

वरो दत्तः पुनस्तस्यै प्रसन्नेन तु नारद ॥

सुभगे भविता पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः ।

सुरूपः सर्वधर्मज्ञः सत्यवादी शमे रतः ॥

स तदा विदुरो जातस्त्रयः पुत्रा मयाभवन् ।

माया वृद्धिं गता साधो परक्षेत्रोद्भवे मम ॥

विस्मृतः शुकसम्बन्धी विरहः शोककारणम् ।

दृष्ट्वा त्रीन्स्वसुतान्कामं बलिनो वीर्यसम्मतान् ॥

माया बलवती ब्रह्मन् दुस्त्यजा ह्यकृतात्मभिः ।

अरूपा च निरालम्बा ज्ञानिनामपि मोहिनी ॥।

मातरि स्नेहसम्बद्धं तथा पुत्रेषु संवृतम् ।

न मे चित्तं वने शान्तिमगान्मुनिवरोत्तम ॥

दोलारूढं मनो जातं कदाचिद्धस्तिनापुरे ।

पुनः सरस्वतीतीरे न चैकत्र व्यवस्थितिः ॥

कदाचिच्चिन्तयन् ज्ञानं मानसे प्रतिभाति वै ।

S पुत्राः क्व मोहोऽयं न श्राद्धार्हा मृतस्य मे ॥

व्यभिचारोद्भवाः किं मे सुखदाः स्युः सुताः किल ।

माया बलवती मोहं वितनोति हि मानसे ॥

जानन्मोहान्धकूपेऽस्मिन्पतितोऽहं मृषा मुने ।

इत्यकुर्वं रहस्तापं कदाचित्सुसमाहितः ॥

राज्यं प्राप ततः पाण्डुर्बलवान्भीष्मसम्मतः ।

तदा मम मनो जातं प्रसन्नं सुतकारणात् ॥

हे नारद! रात्रिमें मैंने उसके साथ प्रेमपूर्वक २० विहार किया और पुनः प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया - हे सुभगे! तुम्हें सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, रूपवान्, सभी धर्मोंका ज्ञाता, सत्यवादी तथा शान्त स्वभाववाला पुत्र उत्पन्न होगा ॥ २०-२१ ॥ २१ समय आनेपर उसे विदुर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । इस प्रकार मुझसे तीन पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई । हे साधो! परक्षेत्रमें मेरेद्वारा उत्पन्न किये गये इन पुत्रोंके २२ प्रति मेरी ममता बढ़ने लगी ॥ २२ ॥

उन तीनों पुत्रोंको अत्यन्त बलवान् तथा वीर्यवान् देखकर मैं अपने शोकके एकमात्र कारण शुकसम्बन्धी वियोगको भूल गया ॥ २३ ॥

२३ हे ब्रह्मन्! माया बलवती होती है, आत्मज्ञानसे रहित पुरुषोंके लिये यह अत्यन्त दुस्त्यज है । रूपहीन तथा आलम्बरहित यह माया ज्ञानियोंको भी मोहित २४ कर देती है ॥ २४ ॥

हे मुनिवर! मातामें तथा उन पुत्रोंमें स्नेहासक्तिसे आबद्ध मेरे मनको वनमें भी शान्ति नहीं मिल पाती थी ॥ २५ ॥

२५ मेरा मन दोलायमान हो गया । वह कभी हस्तिनापुरमें रहता था तो कभी सरस्वतीनदीके तटपर चला आता था; इस प्रकार मेरा मन किसी जगह २६ स्थिर नहीं रहता था ॥२६ ॥

कभी - कभी मनमें ज्ञानका उदय हो जानेपर मैं सोचने लगता था कि ये पुत्र कौन हैं, यह मोह कैसा? मेरे मर जानेपर ये मेरा श्राद्ध भी तो नहीं कर २७ सकेंगे ॥ २७ ॥

दुराचारसे उत्पन्न ये पुत्र मुझे कौन - सा सुख देंगे । माया बड़ी प्रबल होती है; यह मनमें मोह पैदा २८ कर देती है ॥ २८ ॥

मुने! कभी- कभी शान्तचित्त होकर एकान्तमें मैं यह सन्ताप करने लगता था कि मैं जान - बूझकर इस मोहरूपी अन्धकूपमें व्यर्थ ही गिर गया हूँ ॥ २ ९ ॥ २ ९ भीष्मकी सम्मतिसे जब बलवान् पाण्डुको राज्य प्राप्त हुआ, उस समय मेरा मन इस बातसे बहुत प्रसन्न हुआ कि मेरा पुत्र राजसिंहासनपर बैठा ३० | है ॥ ३० ॥

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अ ० २५ ]

कुन्ती माद्री सुरूपे द्वे भार्ये तस्य बभूवतुः ।

शूरसेनसुता कुन्ती मद्रराजसुतापरा ॥

स शापं द्विजतः प्राप्य कामिनीद्वयसंयुतः ।

पाण्डुर्निर्वेदमापन्नस्त्यक्त्वा राज्यं वनं गतः ॥

तदा मामाविशच्छोकः श्रुत्वा पुत्रं वने स्थितम् ।

गतोऽहं तत्र यत्रासौ भार्याभ्यां सह संस्थितः ॥

तमाश्वास्य वने पाण्डुं पुनः प्राप्तो गजाह्वये ।

धृतराष्ट्रं समाभाष्य ह्यगमं ब्रह्मजातटे ॥

क्षेत्रजान्पञ्चपुत्रान्स समुत्पाद्य वनाश्रमे ।

धर्मो वायुतः शक्रादश्विभ्यां पञ्च पाण्डवान् ॥

युधिष्ठिरो भीमसेनस्तथैवार्जुन इत्यपि ।

कुन्तीपुत्राः समाख्याता धर्मानिलसुरेशजाः ॥

नकुलः सहदेवश्च मद्रराजसुतासुतौ ।

कदाचित्तु रहो माद्रीं समालिङ्ग्य महीपतिः ॥

मृतः शापात्तु मुनिभिः संस्कृतो हुतभुङ्मुखे ।

माद्री तत्र सती भूत्वा प्रविष्टा पतिना सह ॥

स्थिता पुत्रयुता कुन्ती ज्वलिते जातवेदसि ।

मुनयः सुतसंयुक्तां शूरसेनसुतां तदा ॥

दुःखितां पतिहीनां तामानिन्युर्गजसाह्वये ।

समर्पिताथ भीष्माय विदुराय महात्मने ॥

श्रुत्वाहं सुखदुःखाभ्यां पीडितस्तु परात्मभिः ।

भीष्मेण पालिताः पुत्राः पाण्डोरिति विचिन्त्य ते ॥

विदुरेण तथा प्रीत्या धृतराष्ट्रेण धीमता ।

दुर्योधनादयस्तस्य पुत्रा ये क्रूरमानसाः ॥

एकत्र स्थितिमापन्ना विरोधं चक्रुरद्भुतम् ।

द्रोणाचार्यस्तु सम्प्राप्तस्तत्र भीष्मेण मानितः ॥

अध्यापनाय पुत्राणां पुरे तस्मिन्निवासितः । 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 28 A षष्ठ स्कन्ध ८४ ९ तत्पश्चात् सुन्दर रूपवाली कुन्ती तथा माद्री ३१ । उनकी दो भार्याएँ हुईं । उनमें कुन्ती महाराज शूरसेनकी पुत्री थी तथा दूसरी रानी माद्री मद्रदेशके राजाकी कन्या थी ॥३१ ॥

३२ ब्राह्मणसे शाप प्राप्त करके राजा पाण्डु अत्यन्त दुःखित हुए और वे राज्यका परित्याग करके अपनी दोनों रानियोंके साथ वन चले गये ॥ ३२ ॥

३३ अपने पुत्रको वनमें स्थित सुनकर मुझे महान् शोक हुआ । मैं वहाँ पहुँच गया, जहाँ वे अपनी दोनों पत्नियोंके साथ रह रहे थे ॥ ३३ ॥

३४ वनमें उन पाण्डुको सान्त्वना देकर मैं पुनः हस्तिनापुर आ गया और वहाँ धृतराष्ट्रके साथ ३५ बातचीत करके सरस्वतीनदीके तटपर पुनः चला गया ॥ ३४ ॥

वनमें अपने आश्रममें उन्होंने धर्म, वायु, इन्द्र ३६ तथा दोनों अश्विनीकुमारोंसे पाँच क्षेत्रज पुत्रोंको पाँच पाण्डवोंके रूपमें उत्पन्न कराया । धर्म, वायु तथा इन्द्रसे उत्पन्न हुए युधिष्ठिर, भीमसेन तथा अर्जुन-३७ ये कुन्तीपुत्र कहे गये हैं । इसी तरह नकुल तथा सहदेव — ये दोनों माद्रीके पुत्र हुए ॥ ३५-३६३ ॥ एक दिन महाराज पाण्डु एकान्तमें माद्रीका ३८ आलिंगन करके पूर्वशापके कारण मृत्युको प्राप्त हो गये । तत्पश्चात् मुनियोंने उनका दाह - संस्कार किया और माद्री सती होकर पतिके साथ प्रज्वलित अग्निमें ३ ९ प्रविष्ट हो गयी और पुत्रोंसे युक्त कुन्ती वहीं स्थित रह गयी । तत्पश्चात् मुनिलोग पतिविहीन उस दुःखित शूरसेन - पुत्री कुन्तीको उसके पुत्रोंसहित हस्तिनापुर ले ४० आये और उसे भीष्म तथा महात्मा विदुरको सौंप दिया । यह सुनकर मैं उन पाण्डुपुत्रोंके कारण सुख-४१ दुःखसे पीड़ित हो गया । पाण्डुके ये पुत्र हैं - ऐसा सोचकर भीष्म, मतिमान् विदुर तथा धृतराष्ट्र प्रेमपूर्वक

उनका पालन - पोषण करने लगे । ३७ - ४१३ ॥

४२ धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि जो क्रूर हृदयवाले पुत्र थे, वे एक समूह बनाकर उनका घोर विरोध करने लगे । तत्पश्चात् द्रोणाचार्य वहाँ आये और भीष्मने उनका ४३ सम्मान किया । उन्होंने पुत्रोंको धनुर्विद्याकी शिक्षा देनेके लिये उन्हें उसी पुरमें रख लिया ॥ ४२-४३३ ॥

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८५० कर्णः कुन्त्या परित्यक्तो जातमात्रः शिशुर्यदा सूतेन पालितो नद्यां प्राप्तश्चाधिरथेन ह दुर्योधनप्रियश्चाभूत्कर्णः शूरतमस्तथा परस्परं विरोधोऽभूद्भीमदुर्योधनादिषु धृतराष्ट्रस्तु सञ्चिन्त्य क्लेशं पुत्रेषु तेषु च निवासं कल्पयामास पाण्डवानां महात्मनाम् विरोधशमनायैव नगरे वारणावते दुर्योधनेन तत्रैव द्रोहाज्जतुगृहाणि वै कारितानि च दिव्यानि प्रेष्य मित्रं पुरोचनम् श्रुत्वा जतुगृहे दग्धान्पाण्डवान्पृथया युतान् पौत्रभावान्मुनिश्रेष्ठ मग्नोऽहं व्यसनार्णवे शोकातुरो भृशं शून्ये वने पश्यन्नहर्निशम् । दृष्टा मयैकचक्रायां पाण्डवा दुःखकर्शिताः ततस्तुष्टमनाश्चाहं जातः पार्थान्विलोक्य च श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५ ॥ ४४ कुन्तीने उत्पन्न होते ही जब बालक कर्णका परित्याग कर दिया तब अधिरथ नामक । सूतने नदीमें बहते हुए उस कर्णको पाया और ॥ ४५ उसका पालन - पोषण किया । सर्वश्रेष्ठ वीर होनेके कारण कर्ण दुर्योधनका प्रिय हो गया । बादमें भीम । तथा दुर्योधन आदिमें परस्पर विरोध भाव उत्पन्न हो ॥ ४६ | गया ॥ ४४-४५३ ॥ तब धृतराष्ट्रने अपने पुत्रों तथा उन पाण्डवोंके । परस्पर संकटका विचार करके तथा उनके ॥ ४७ विरोध - भावको समाप्त करनेके उद्देश्यसे वारणावत नगरमें महात्मा पाण्डवोंको बसानेका निश्चय । किया ॥ ४६-४७ ॥ ॥ ४८ द्रोहके कारण दुर्योधनने अपने मित्र पुरोचनको वहाँ भेजकर दिव्य लाक्षागृहका निर्माण करा दिया ॥ ४८ ॥

। हे मुनिश्रेष्ठ! तत्पश्चात् कुन्तीसहित उन पाण्डवोंके ॥ ४ ९ उस लाक्षागृहमें दग्ध हो जानेका समाचार सुनकर उनके प्रति पौत्र - भाव होनेके कारण मैं दुःखके सागरमें डूब गया और उस निर्जन वनमें उन्हें दिन-॥ ५० रात खोजता हुआ अति शोकसन्तप्त रहता था । तभी मैंने दुःखके कारण अत्यन्त दुर्बल उन पाण्डवोंको । एकचक्रा नगरीमें देखा । उन पाण्डवोंको देखकर मेरे प्रेरितास्ते मया तूर्णं द्रुपदस्य पुरं प्रति ॥ ५१ मनमें अत्यधिक प्रसन्नता हुई और मैंने उन्हें तुरंत ते गतास्तत्र दुःखार्ता विप्रवेषधराः कृशाः मृगचर्मपरीधानाः सभायां संस्थितास्तदा कृत्वा पराक्रमं जिष्णुः स जित्वा द्रुपदात्मजाम् चक्रुर्विवाहं मानिन्या पञ्चैव मातृवाक्यतः दृष्ट्वा विवाहं तेषां तु मुदितोऽहं भृशं तदा ततो नागाह्वये प्राप्ताः पाञ्चालीसहिता मुने निवासं खाण्डवप्रस्थं धृतराष्ट्रेण कल्पितम् पाण्डवानां द्विजश्रेष्ठ वसुदेवसुतेन वै तर्पितः पावकस्तत्र विष्णुना सह जिष्णुना राजसूयः कृतो यज्ञस्तदाहं मुदितोऽभवम् महाराज द्रुपदके नगरमें भेज दिया ॥ ४ ९ -५१ ॥ । कृश शरीरवाले वे दुःखित पाण्डव मृगचर्म पहनकर ॥ ५२ ब्राह्मणका वेश धारण करके वहाँ गये और द्रुपदकी स्वयंवर - सभामें जा पहुँचे । वहाँपर अर्जुन अपने । पराक्रमका प्रदर्शन करके द्रुपद - पुत्री द्रौपदीको जीतकर ॥ ५३ ले आये । पुनः माता कुन्तीके आदेशसे पाँचों भाइयोंने मानिनी द्रौपदीके साथ विवाह किया ॥ ५२-५३ ॥ । उनका विवाह देखकर मैं परम प्रसन्न हुआ । ॥ ५४ हे मुने! तत्पश्चात् वे सभी द्रौपदीसहित हस्तिनापुर चले आये ॥ ५४ ॥

। धृतराष्ट्रने उन पाण्डवोंके रहनेके लिये खाण्डवप्रस्थ ॥ ५५ देनेका निश्चय किया । हे द्विजश्रेष्ठ नारद! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके साथ अग्निदेवको सन्तुष्ट । किया । पाण्डवोंने जब राजसूय यज्ञ किया तब मैं ॥ ५६ | बहुत प्रसन्न हुआ ॥ ५५-५६ ॥ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -28 B

पृष्ठ 860

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अ ० २६ ]

दृष्ट्वाथ विभवं तेषां तथा मयकृतां सभाम् ।

दुर्योधनोऽतिसन्तप्तो दुरोदरमथाकरोत् ॥

दुर्घृतवेदी शकुनिरनक्षज्ञश्च धर्मजः ।

हृतं राज्यं धनं सर्वं याज्ञसेनी च क्लेशिता ॥

वने द्वादश वर्षाणि पाण्डवास्ते विवासिताः ।

पाञ्चालीसहितास्तेन दुःखं मे जनितं भृशम् ॥

एवं नारद संसारे सुखदुःखात्मके भृशम् ।

निमग्नोऽहं भ्रमेणैव जानन् धर्मं सनातनम् ॥

को s हं कस्य सुतास्तेऽमी का माता किं सुखं पुनः ।

येन मे हृदयं मोहाद् भ्रमतीति दिवानिशम् ॥

किं करोमि क्व गच्छामि सन्तोषो नाधिगच्छति ।

दोलारूढं मनो मेऽत्र चञ्चलं न स्थिरं भवेत् ॥

सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ सन्देहं मे निवर्तय ।

तथा कुरु यथाहं स्यां सुखितो विगतज्वरः ॥

षष्ठ स्कन्ध ८५१ उन पाण्डवोंका वैभव तथा मय दानवद्वारा ५७ निर्मित की गयी सभाको देखकर दुर्योधन अत्यन्त दुःखित हुआ और उसने द्यूतक्रीडाकी योजना बनायी । शकुनि कपटपूर्ण द्यूतमें अति निपुण था तथा धर्मराज युधिष्ठिर पासेके खेलसे अनभिज्ञ थे । अतएव दुर्योधनने ५८ [ द्यूतक्रीडाके माध्यमसे ] पाण्डवोंका सम्पूर्ण राज्य तथा धन छीन लिया तथा द्रौपदीको भी अपमानित किया । दुर्योधनने द्रौपदीसहित पाँचों पाण्डवोंको बारह ५ ९ वर्षकी अवधितक वनमें निवास करनेके लिये निर्वासित कर दिया; इससे मुझे बहुत दुःख हुआ ॥ ५७–५९ ॥ हे नारद! इस प्रकार सनातन धर्मको जानते हुए भी मैं सुख तथा दुःखसे पूर्ण इस संसारमें भ्रमसे ६० ही बन्धनमें पड़ा हूँ । मैं कौन हूँ, ये किसके पुत्र हैं, यह किसकी माता है और सुख क्या है? जिससे मेरा मन मोहित होकर दिन - रात इन्हींमें भ्रमण ६१ करता रहता है ॥ ६०-६१ ॥ मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? किसी प्रकारसे भी मुझे सन्तोष नहीं मिलता । दोलायमान मेरा चंचल मन स्थिर नहीं हो पा रहा है ॥ ६२ ॥

६२ हे मुनिश्रेष्ठ! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव मेरे सन्देहका निवारण कीजिये । आप कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मैं सन्तापरहित होकर सुखी हो ६३ | जाऊँ ॥ ६३ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे व्यासस्वकीयमोहवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

अथ षड्विंशोऽध्यायः देवर्षि नारद और पर्वतमुनिका दमयन्तीका नारदसे व्यास उवाच

इति मे वचनं श्रुत्वा नारदः परमार्थवित् ।

मामाह च स्मितं कृत्वा पृच्छन्तं मोहकारणम् ॥

नारद उवाच

पाराशर्य पुराणज्ञ किं पृच्छसि सुनिश्चयम् ।

संसारेऽस्मिन् विना मोहं कोऽपि नास्ति शरीरवान् ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 28 C एक - दूसरेको शाप देना, राजकुमारी विवाह करनेका निश्चय व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] तब परमार्थवेत्ता नारदजी मेरी बात सुननेके पश्चात् मोहका कारण १ पूछनेवाले मुझसे मुसकराकर कहने लगे ॥ १ ॥

नारदजी बोले - – हे पुराणवेत्ता व्यासजी! आप क्या पूछ रहे हैं? यह पूर्णरूपसे निश्चित है कि इस संसारमें रहनेवाला कोई भी प्राणी मोहसे २ । परे हो ही नहीं सकता ॥२ ॥