देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 841–850

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850

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८३२ कथमन्यं भजे कान्तं त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् । कन्याधर्मं विहायाद्य वेत्सि शास्त्रविनिश्चयम् यस्मै दद्यात्पिता कामं कन्या तं पतिमाप्नुयात् परतन्त्रा सदा कन्या न स्वातन्त्र्यं कदाचन ॥ इत्युक्तोऽपि तया पापी विरराम न मोहितः । न मुमोच विशालाक्षीं मां च पार्श्वस्थितां तथा पातालविवरे तस्य पुरं परमसङ्कटे राक्षसै रक्षितं दुर्गं मण्डितं परिखावृतम् ॥ तत्र तिष्ठति दुःखार्ता सखी मे प्राणवल्लभा तेनाहं विरहेणात्र रारटीमि सुदुःखिता एकवीर उवाच कथं त्वमत्र सम्प्राप्ता पुरात्तस्य दुरात्मनः विस्मयो मे महानत्र तत्त्वं ब्रूहि वरानने ॥ त्वया च कथितं वाक्यं सन्दिग्धं भाति भामिनि । हैहयार्थे कल्पिता सा पित्रेति मम साम्प्रतम् हैहयो नाम राजाहं नान्योऽस्ति पृथिवीपतिः मदर्थे कथिता सा किं सखी तव सुलोचना

एतन्मे संशयं सुभ्रु छेत्तुमर्हसि भामिनि ।

अहं तामानयिष्यामि तं हत्वा राक्षसाधमम् ॥

स्थानं दर्शय मे तस्य यदि जानासि सुव्रते । राज्ञे निवेदितं किं वा तत्पित्रे चातिदुःखिता श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ सनातनधर्मका त्याग करके तथा कन्याधर्म ॥ ३२ छोड़कर मैं दूसरेको पतिरूपमें कैसे स्वीकार करूँ? आप भी तो शास्त्रीय नियमको जानते ही हैं । पिता कन्याको जिसे सौंप दे, कन्या उसीको पति बना ले ॥ कन्या इस विषयमें सदा पराधीन रहती है, उसे ३३ स्वतन्त्रता कभी नहीं रहती ॥ ३२-३३ ॥ [ हे राजकुमार! ] उस एकावलीके ऐसा कहनेपर भी वह पापात्मा कालकेतु राजकुमारीपर मोहित रहनेके कारण अपने निश्चयसे विचलित नहीं हुआ ॥ ३४ और उसने विशाल नेत्रोंवाली एकावलीको तथा उसके पासमें स्थित मुझको नहीं छोड़ा ॥ ३४ ॥

। उस कालकेतुका नगर अनेक प्रकारके संकटोंसे ३५ युक्त एक पाताल - विवरमें विद्यमान है । वहींपर चारों ओर खाइयोंसे घिरा हुआ तथा राक्षसोंसे पूर्णतया । रक्षित उसका सुन्दर दुर्ग है । मेरी प्राणप्यारी सखी एकावली वहीं पर दुःखके साथ पड़ी हुई है । इसलिये ॥ ३६ उसके विरहसे अत्यन्त व्यथित होकर मैं यहाँ विलाप कर रही हूँ॥३५-३६ ॥ एकवीरने कहा— हे वरानने! उस दुष्टात्मा । कालकेतुके नगरसे तुम यहाँ कैसे आ गयी? इस बातसे मैं बहुत ही आश्चर्यचकित हूँ; तुम मुझसे इस ३७ विषयमें बताओ ॥ ३७ ॥

हे भामिनि! अभी तुमने जो कहा है कि एकावलीके पिताने उसका विवाह हैहयके साथ ॥ ३८ करनेका निश्चय किया है, वह बात मुझे अत्यन्त सन्देहास्पद प्रतीत हो रही है । हैहय नामका राजा मैं । ही हूँ; अन्य कोई राजा नहीं है । सुन्दर नेत्रोंवाली वह तुम्हारी सखी अपने पिताके द्वारा कहीं मेरे लिये ही ॥ ३ ९ तो कल्पित नहीं की गयी है? ॥ ३८-३९ ॥ दूर उस ४० उस मुझे यह ॥ ४१ | है ॥ हे सुभ्रु! हे भामिनि! तुम मेरे इस सन्देहको करो । मैं उस अधम राक्षसका वध करके एकावलीको ले आऊँगा । हे सुव्रते! यदि तुम राक्षसका स्थान जानती हो तो वह स्थान दिखा दो । उसके पिता राजा रैभ्यको तुमने बताया अथवा नहीं कि वह अत्यन्त दुःखित ४०-४१ ॥

पृष्ठ 842

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अ ० २२ ] षष्ठ स्कन्ध ८३३ यस्यैषा वल्लभा पुत्री न किं जानाति तां हृताम् । जिसकी ऐसी प्रिय पुत्री हो, क्या वह उसके नोद्यमः किं कृतस्तेन ततो मोचनहेतवे ॥ ४२ हरणको नहीं जानता? और फिर उसने एकावलीकी मुक्ति के लिये क्या कोई प्रयास नहीं किया? ॥ ४२ ॥

बन्दीकृतां सुतां ज्ञात्वा कथं तिष्ठति सुस्थिरः । अपनी पुत्रीको बन्दी बनाया गया जाननेके बाद असमर्थो नृपः किं वा कारणं ब्रूहि सत्वरम् ॥ ४३ भी राजा स्थिरचित्त होकर कैसे चुप बैठे हैं? अथवा त्वया मेऽपहृतं चेतो गुणानुक्त्वा ह्यमानुषान् सख्याः पङ्कजपत्राक्षि कृतः कामवशो भृशम् ॥ कदा पश्यामि तां कान्तां मोचयित्वातिसङ्कटात् इति मे हृदयं चाद्य करोत्यतिमनोरथम् ॥

ब्रूहि मे गमनोपायं पुरे तस्यातिदुर्गमे ।

कथं त्वमागता तस्मात्सङ्कटादत्र तद्वद ॥

यशोवत्युवाच

बालभावान्मया मन्त्रो भगवत्या विशांपते ।

प्राप्तोऽस्ति ब्राह्मणात्सिद्धात्सबीजध्यानपूर्वकः ॥

तत्रावस्थितया राजन् मया चित्ते विचारितम् ।

आराधयामि सततं चण्डिकां चण्डविक्रमाम् ॥

सा देवी सेविता कामं बन्धमोक्षं करिष्यति ।

भक्तानुकम्पिनी शक्तिः समर्था सर्वसाधने ॥

या विश्वं सृजते शक्त्या पालयत्येव सा पुनः ।

कल्पान्ते संहरत्येव निराकारा निराश्रया ॥

इति सञ्चिन्त्य मनसा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम् ।

ध्यात्वा रक्ताम्बरां सौम्यां सुरक्तनयनां हृदि ॥

संस्मृत्य मनसा रूपं मन्त्रजाप्यपराभवम् । राजा कुछ कर पानेमें असमर्थ तो नहीं हैं? मुझे इसका कारण शीघ्र बताओ ॥ ४३ ॥

। हे कमलनयने! तुमने अपनी सखीके अलौकिक ४४ गुणोंको बताकर मेरे चित्तको हर लिया है तथा मैं पूर्ण - रूपसे कामके वशीभूत कर दिया गया हूँ ॥ ४४ ॥

। अब तो मेरे मनकी यही अभिलाषा है कि उस ४५ प्रियाको इस महान् संकटसे मुक्त करके मैं उसे कब देख लूँ ॥४५ ॥

अब उस दानवके अत्यन्त दुर्गम नगरमें जानेका ४६ उपाय मुझे बताओ और यह भी बताओ कि उस महान् संकटसे छूटकर तुम यहाँ कैसे आयी? ॥ ४६ ॥

यशोवती बोली- हे राजन्! मैंने बाल्यावस्थासे ही एक सिद्ध ब्राह्मणसे बीज तथा ध्यानसहित भगवतीका मन्त्र प्राप्त किया है ॥ ४७ ॥

४७ हे राजन्! जब मैं कालकेतुके यहाँ थी तभी मैंने अपने मनमें सोचा कि अब मैं प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिकाकी निरन्तर आराधना करूँ । वे ४८ भगवती पूर्णरूपसे आराधित होनेपर निश्चितरूपसे मुझे इस बन्धन से मुक्त करेंगी; क्योंकि भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाली वे शक्तिस्वरूपा चण्डिका ४ ९ । सब कुछ करनेमें समर्थ हैं । जो निराकार तथा निरालम्ब भगवती अपनी शक्तिसे जगत्का सृजन करती हैं तथा पालन करती हैं, वे ही कल्पके अन्तमें उसका संहार भी कर देती हैं । मनमें ऐसा ५० सोचकर मैं विश्वकी अधिष्ठात्री, कल्याणकारिणी , लाल वस्त्र धारण करनेवाली, सौम्य विग्रहवाली तथा सुन्दर रक्त नयनोंवाली भगवतीका ध्यान ५१ करके मन- -ही - -मन म उनके रूपका स्मरण करके मन्त्रका जप करनेमें तत्पर हो गयी । इस प्रकार मैं समाधि लगाकर एक माहतक भगवती जगदम्बाक

उपासिता मया देवी मासमेकं समाधिना । ५२ । उपासना करती रही ॥ ४८ - ५२ ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -27 A

पृष्ठ 843

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८३४ स्वप्ने मम समायाता भक्तिभावेन तोषिता । मामाहामृतया वाचा किं सुप्तासीति चण्डिका उत्तिष्ठ याहि तरसा गङ्गातीरं मनोहरम् आगमिष्यति तत्रासौ हैहयो नृपपुङ्गवः एकवीरो महाबाहुः सर्वशत्रुविमर्दनः दत्तात्रेयेण मन्मन्त्रो महाविद्याभिधः परः दत्तोऽस्मै सोऽपि सततं मामुपास्तेऽतिभक्तितः मय्यासक्तमतिर्नित्यं मम पूजापरायणः मामेव सर्वभूतेषु ध्यायन्नास्ते च मत्परः स ते दुःखविनाशं वै करिष्यति महामतिः मासुतो विहरंस्तत्र तव त्राता भविष्यति हत्वा तं राक्षसं घोरं मोचयिष्यति मानिनीम् एकावलीमेकवीरः सर्वशास्त्रविशारदः पश्चात्सैव पतिः कार्यस्त्वया राजसुतः शुभः इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी प्रबुद्धाहं तदैव हि कथितं स्वप्नवृत्तान्तं देव्याश्चाराधनं तथा प्रसन्नवदना जाता श्रुत्वा सा कमलेक्षणा विशेषेण च सन्तुष्टा मामुवाच शुचिस्मिता गच्छ तत्र त्वरायुक्ता कुरु कार्यं मम प्रिये सत्यवाक्या भगवती सावां मोक्षं विधास्यति इत्याज्ञप्ता तया चाहं सख्या वै प्रेमयुक्तया मत्वोपसरणं युक्तं तस्मात्स्थानात्तदा नृप चालिताहं ततः शीघ्रं महादेवीप्रसादतः मार्गज्ञानं शीघ्रगतिर्मया प्राप्ता नृपात्मज श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ तत्पश्चात् मेरे भक्तिभावसे प्रसन्न होकर ॥ ५३ । देवी चण्डिकाने मुझे स्वप्नमें दर्शन दिया और अमृतमयी वाणीमें मुझसे कहा - ' तुम सोयी क्यों हो? । उठो और तत्काल गंगाजीके मनोहर तटपर चली ॥ ५४ जाओ; वहींपर विशाल भुजाओंवाले तथा सभी शत्रुओं का दमन करनेवाले नृपश्रेष्ठ हैहय एकवीर । आयेंगे । दत्तात्रेयजीने महाविद्या नामक मेरा श्रेष्ठ ॥ ५५ मन्त्र उन्हें प्रदान किया है । वे भी भक्तिपूर्वक निरन्तर मेरी उपासना करते रहते हैं । उनका मन सदा । मुझमें लगा रहता है तथा वे सदा मेरी पूजामें रत ॥ ५६ रहते हैं । मेरे प्रति आसक्तिभाव रखनेवाले वे सभी प्राणियोंमें एकमात्र मुझे ही देखते हुए सदा मेरे ही । परायण रहते हैं । वे महामति एकवीर ही तुम्हारा ॥ ५७ । दुःख दूर करेंगे । वे लक्ष्मीपुत्र एकवीर घूमते हुए गंगातटपर आकर तुम्हारी रक्षा करेंगे और उस । भयानक राक्षस कालकेतुका वध करके मानिनी ॥ ५८ एकावलीको मुक्त करेंगे । इसके बाद तुम समस्त शास्त्रोंमें निष्णात उन्हीं सुन्दर राजकुमार एकवीरके । साथ एकावलीका विवाह करवा देना ' ॥ ५३–५९ ॥ ॥ ५ ९ ऐसा कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं और मैं उसी समय जग गयी । तत्पश्चात् मैंने स्वप्नका । वृत्तान्त तथा देवीकी आराधनाकी बात एकावलीको ॥ ६० | बतायी ॥ ६० ॥

सारी बातें सुनकर उस कमलनयनीके मुख-। मण्डलपर प्रसन्नता छा गयी । अत्यन्त सन्तुष्ट होकर ॥ ६१ पवित्र मुसकानवाली एकावलीने मुझसे कहा – हे प्रिये! तुम वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ और मेरा कार्य । सिद्ध करो । जो भगवती सत्य वाणीवाली हैं, वे हम ॥ ६२ दोनोंको मुक्त करेंगी ॥ ६१-६२ ॥ हे राजन्! सखी एकावलीके इस प्रकार । प्रेमपूर्वक आदेश देनेपर उस समय प्रस्थान कर ॥ ६३ देना उचित समझकर मैं उस स्थानसे तुरंत चल पड़ी । हे राजकुमार! भगवती जगदम्बाकी कृपासे मार्गकी । जानकारी तथा द्रुतगतिसे चलनेकी क्षमता मुझे प्राप्त ॥ ६४ हो गयी थी ॥ ६३-६४ ॥ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 27 B

पृष्ठ 844

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अ ० २३ ] इत्येतत्कथितं सर्वं कारणं मम कस्त्वं कस्य सुतश्चेति वद वीर इति श्रीमद्देवीभागवते षष्ठ स्कन्ध ८३५ दुःखजम् । हे वीर! इस प्रकार मैंने अपने दुःखी होनेका समस्त कारण आपको बता दिया । अब जिस प्रकार मैंने आपको अपने विषयमें बताया, उसी प्रकार आप भी बताइये कि यथा तथा ॥ ६५ । आप कौन हैं तथा किसके पुत्र हैं? ॥ ६५ ॥

महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैकवीराय यशोवत्यैकावलीमोचनाय देवीस्वप्नवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः भगवतीके सिद्धिप्रदायक मन्त्रसे दीक्षित एकवीरद्वारा कालकेतुका वध, एकवीर और एकावलीका विवाह तथा हैहयवंशकी परम्परा व्यास उवाच

तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा रमापुत्रः प्रतापवान् ।

प्रफुल्लवदनाम्भोजस्तामुवाच विशांपते ॥

राजोवाच

रम्भोरु यस्त्वया पृष्टो वृत्तान्तो विशदाक्षरः ।

हैहयोऽहं चैकवीरनाम्ना सिन्धुसुतासुतः ॥

मनो मे यत्त्वया नूनं परतन्त्रं कृतं किल ।

किं करोमि क्व गच्छामि विरहेणातिपीडितः ॥

प्रथमं रूपमाख्यातं सर्वलोकातिगं त्वया ।

तेन मे विह्वलं जातं कामबाणहतं मनः ॥

ततस्तस्या गुणाः प्रोक्तास्तैस्तु चित्तं हृतं पुनः ।

यत्त्वयोक्तं पुनर्वाक्यं तेन मे विस्मयोऽभवत् ॥

एकावल्या वचः प्रोक्तं दानवाग्रे मया वृतः ।

हैहयस्तं विना नान्यं वृणोमीति विनिश्चयः ॥

तेन वाक्येन तन्वङ्गि भृत्योऽहमधुना कृतः ।

त्वया तस्याः सुकेशान्ते ब्रूहि किं करवाणि वाम् ॥

व्यासजी बोले- हे राजन्! उस यशोवतीकी बात सुनकर लक्ष्मीपुत्र प्रतापी एकवीरका १ मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा और वे उससे कहने लगे -॥१ ॥

राजा बोले- हे रम्भोरु! जो तुमने सुन्दर वाणीमें मेरा वृत्तान्त पूछा है, वह सुनो । एकवीर नामसे प्रसिद्ध लक्ष्मीपुत्र हैहय मैं ही हूँ ॥ २ ॥

२ [ एकावलीके विषयमें वर्णन करके ] तुमने मेरे मनको परतन्त्र बना दिया है । विरहसे अत्यन्त पीडित मैं अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? ॥ ३ ॥

३ तुमने सर्वप्रथम एकावलीके सम्पूर्ण लोकको तिरस्कृत कर देनेवाले रूपका जो वर्णन किया है, उससे मेरा मन कामबाणसे आहत होकर व्याकुल हो उठा है ॥४ ॥

४ तत्पश्चात् तुमने उसके जिन गुणोंका मुझसे वर्णन किया है, उनके द्वारा मेरा चित्त हर लिया गया है । पुनः तुमने जो बात कही, इससे मुझे बहुत ५ विस्मय हो गया है । दानव कालकेतुके सामने एकावलीने यह बात कही थी कि मैं हैहयका वरण कर चुकी हूँ, उसके अतिरिक्त मैं किसी ६ अन्यका वरण नहीं कर सकती; यह मेरा निश्चय है । हे तन्वंगि! एकावलीके इस कथन के द्वारा तुमने मुझे उसका दास बना दिया है । हे सुन्दर केशोंवाली! तुम्हीं बताओ, अब मैं तुम दोनोंके ७ लिये क्या करूँ? ॥५–७ ॥

पृष्ठ 845

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८३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३

स्थानं तस्य न जानामि राक्षसस्य दुरात्मनः ।

गतिर्मे नास्ति गमने पुरे तस्मिन्सुलोचने ॥

वद मां त्वं विशालाक्षि तत्र प्रापयितुं क्षमा ।

प्रापयाशु सखी ते सा यत्र तिष्ठति सुन्दरी ॥

हत्वा तं राक्षसं क्रूरं मोचयिष्यामि साम्प्रतम् ।

विवशां शोकसन्तप्तां राजपुत्रीं तव प्रियाम् ॥

विमुक्तदुःखां कृत्वाशु प्रापयिष्यामि ते पुरम् ।

पित्रे चास्याः प्रदास्यामि कन्यामेकावलीमहम् ॥

पश्चाद्विवाहं कर्तासौ राजा पुत्र्याः परन्तपः ।

एवं ते मनसः कामो मम चापि प्रियंवदे ॥

भविष्यति स सम्पूर्णः साधनेन तवाधुना ।

दर्शयाशु पुरं तस्य पश्य मे त्वं पराक्रमम् ॥

यथा हन्मि दुराचारं परदारापहारकम् ।

तथा कुरु प्रियं कर्तुं शक्तासि वरवर्णिनि ॥

मार्गं दर्शय तस्याद्य पुरस्य दुर्गमस्य च । व्यास उवाच तन्निशम्य प्रियं वाक्यं मुदिता च यशोवती ॥

तमुवाच रमापुत्रं गमनोपायमादरात् ।

मन्त्रं गृहाण राजेन्द्र भगवत्यास्तु सिद्धिदम् ॥

दर्शयिष्यामि तस्याद्य पुरं राक्षसपालितम् ।

सज्जो भव महाभाग गमनाय मया सह ॥

सैन्येन महता युक्तस्तत्र युद्धं भविष्यति ।

कालकेतुर्महावीरो राक्षसैर्बलिभिर्वृतः ॥

तस्मान्मन्त्रं गृहीत्वा त्वं व्रज तत्र मया सह ।

दर्शयिष्यामि ते मार्गं पुरस्यास्य दुरात्मनः ॥

हत्वा तं पापकर्माणं मोचयाशु च मे सखीम् । हे सुलोचने! मैं उस दुष्टात्मा राक्षस कालकेतुके स्थानको नहीं जानता । और फिर उस नगरतक पहुँच ८ सकनेकी मेरी सामर्थ्य भी नहीं है । हे विशाल नयनोंवाली! अब तुम्हीं उपाय बताओ । मुझे वहाँ ९ पहुँचानेमें तुम्हीं समर्थ हो । अतएव जहाँ तुम्हारी सुन्दर सखी एकावली विराजमान है, वहाँ मुझे शीघ्र पहुँचाओ ॥ ८ - ९ ॥ १० उस क्रूर राक्षसका वध करके मैं इसी समय विवश तथा शोक - सन्तप्त तुम्हारी प्रिय सखी राजकुमारी एकावलीको मुक्त करा लूँगा ॥१० ॥

११ राजकुमारी एकावलीको संकटसे मुक्ति दिलाकर शीघ्र ही उसे तुम्हारे पुरमें पहुँचा दूँगा और उसके पिताको सौंप दूँगा ॥ ११ ॥

१२ तत्पश्चात् शत्रुतापक राजा रैभ्य अपनी पुत्रीका विवाह कर सकेंगे । हे प्रियंवदे! इस प्रकार तुम्हारे सहयोगसे मेरे तथा तुम्हारे मनकी कामना अब पूरी १३ हो जायगी । तुम मुझे उस कालकेतुका नगर शीघ्र दिखा दो, फिर मेरा पराक्रम देखो । हे वरवर्णिनि! मैं जिस प्रकार उस दुराचारी तथा परस्त्रीका हरण १४ करनेवाले कालकेतुका वध कर सकूँ, तुम वैसा ही उपाय करो; क्योंकि तुम हित - साधन करनेमें पूर्ण सक्षम हो । उस दानवके दुर्गम नगरका मार्ग तुम मुझे आज ही दिखाओ ॥ १२–१४३ ॥ १५ व्यासजी बोले - एकवीरकी यह प्रिय वाणी सुनकर यशोवती प्रसन्न हो गयी और वह लक्ष्मीपुत्र एकवीरसे नगर पहुँचनेका उपाय आदरपूर्वक बताने लगी -हे १६ राजेन्द्र! पहले आप भगवती जगदम्बाके सिद्धिप्रदायक मन्त्रको ग्रहण कीजिये । तत्पश्चात् मैं आपको अनेक राक्षसोंद्वारा रक्षित उस कालकेतुका नगर आज ही १७ दिखाऊँगी | हे महाभाग! एक विशाल सेनासे युक्त होकर आप मेरे साथ वहाँ चलनेके लिये तैयार हो जाइये । वहाँ युद्ध होगा । कालकेतु स्वयं महापराक्रमी है तथा १८ बलवान् राक्षसोंसे युक्त रहता है । अतएव भगवतीका मन्त्र ग्रहण करके ही आप मेरे साथ वहाँ चलिये । मैं उस दुष्टात्माके नगरका मार्ग आपको दिखाऊँगी । १ ९ अब आप उस पापकर्मपरायण दानवको मारकर मेरी । सखीको शीघ्र मुक्त कीजिये ॥ १५ – १ ९ ३ ॥

पृष्ठ 846

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अ ० २३ ] श्रुत्वा तद्वचनं वीरो मन्त्रं जग्राह सत्वरः ॥

दत्तात्रेयाद्दैवयोगात्प्राप्ताज्ज्ञानिवराच्छुभात् ।

योगेश्वरीमहामन्त्रं त्रिलोकीतिलकाभिधम् ॥

तेन सर्वज्ञता जाता सर्वान्तश्चारिता तथा ।

तया सह जगामाशु पुरं तस्य सुदुर्गमम् ॥

रक्षितं राक्षसैर्घोरैः पातालमिव पन्नगैः ।

यशोवत्या च सैन्येन महता संयुतो नृपः ॥

तमायान्तं समालोक्य दूतास्तस्य भयातुराः ।

क्रोशन्तोऽभिययुः पार्श्वं कालकेतोस्तरस्विनः ॥

तमूचुः सहसा मत्वा राक्षसं काममोहितम् ।

एकावलीसमीपस्थं कुर्वन्तं विनयान्बहून् ॥

दूता ऊचुः

राजन् यशोवती नारी कामिन्याः सहचारिणी ।

आयाति सह सैन्येन राजपुत्रेण संयुता ॥

जयन्तो वा महाराज कार्तिकेयोऽथवा नु किम् ।

आगच्छति बलोन्मत्तो वाहिनीसहितः किल ॥

संयत्तो भव राजेन्द्र संग्रामः समुपस्थितः ।

देवपुत्रेण युध्यस्व त्यज वा कमलेक्षणाम् ॥

इतो दूरेऽस्ति सैन्यं तद्योजनत्रयमात्रतः ।

सज्जो भव महीपाल दुन्दुभिं घोषयाशु वै ॥

व्यास उवाच

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा राक्षसः क्रोधमूर्च्छितः ।

राक्षसान्प्रेरयामास सायुधान्सबलान्बहून् ॥

गच्छध्वं राक्षसाः सर्वे सम्मुखाः शस्त्रपाणयः । षष्ठ स्कन्ध ८३७ २० उसका यह वचन सुनकर एकवीरने वहाँपर दैवयोगसे पधारे हुए पुण्यात्मा तथा ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ दत्तात्रेयजीसे त्रिलोकीका तिलक कहे जानेवाले २१ योगेश्वरीके महामन्त्रको उसी क्षण ग्रहण कर लिया ॥ २०-२१ ॥ उस मन्त्रके प्रभावसे एकवीरको सब कुछ जानने तथा सर्वत्र गमनकी क्षमता प्राप्त हो गयी । २२ इसके बाद वे यशोवतीके साथ कालकेतुके दुर्गम नगरके लिये शीघ्र प्रस्थित हुए ॥ २२ ॥

वह नगर राक्षसोंद्वारा इस प्रकार सुरक्षित था, २३ जैसे सर्पोद्वारा पातालकी निरन्तर सुरक्षा होती रहती है । कालकेतुके ऐसे नगरमें अब यशोवती तथा विशाल सेनाके साथ राजा एकवीर आ गये ॥ २३ ॥

२४ एकवीरको आते देखकर कालकेतुके दूत भयसे व्यग्र हो गये और चीखते - चिल्लाते हुए बड़ी तेजीसे भागकर उसके पास पहुँचे ॥२४ ॥

२५ उस समय एकावलीके पास बैठकर अनेकविध विनती कर रहे कालकेतुको अत्यन्त काममोहित समझकर दूत एकाएक उससे कहने लगे ॥ २५ ॥

दूतोंने कहा - हे राजन्! इस कामिनीकी सहचारिणी जो यशोवती नामकी स्त्री है, वह एक राजकुमारके २६ साथ विशाल सेना लेकर आ रही है ॥ २६ ॥

हे महाराज! पता नहीं, वह जयन्त है अथवा कार्तिकेय । बलके अभिमानसे मत्त वह राजकुमार २७ । सेनाके साथ चला आ रहा है ॥ २७ ॥

हे राजेन्द्र! अब आप सावधान हो जाइये; क्योंकि युद्धकी स्थिति सामने आ गयी है । अब आप २८ या तो इस देवपुत्रके साथ युद्ध कीजिये अथवा इस कमलनयनीको मुक्त कर दीजिये ॥२८ ॥

उसकी सेना यहाँसे मात्र तीन योजनकी दूरीपर २ ९ है । अतएव हे राजन्! अब आप तैयार हो जाइये और रण- - दुंदुभी बजानेकी तुरंत आज्ञा दीजिये ॥ २ ९ ॥। व्यासजी बोले — दूतोंके मुखसे वैसी बात सुनकर कालकेतु क्रोधमूर्च्छित हो गया । उसने अपने सभी बलवान् तथा शस्त्रधारी राक्षसोंको उत्साहित करते ३० हुए कहा - हे राक्षसो! तुम सब हाथोंमें शस्त्र लेकर शत्रुके सामने जाओ ॥ ३०३ ॥

पृष्ठ 847

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८३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ तानाज्ञाप्य कालकेतुः पप्रच्छ प्रणयान्वितः ॥

एकावलीं समीपस्थां विवशां भृशदुःखिताम् ।

कोऽयमायाति तन्वङ्गि पिता ते वापरः पुमान् ॥

त्वदर्थे सैन्यसंयुक्तो ब्रूहि सत्यं कृशोदरि ।

पिता ते यदि सम्प्राप्तो नेतुं त्वां विरहातुरः ॥

ज्ञात्वा ते पितरं सम्यक् संग्रामं न करोम्यहम् ।

आनयित्वा गृहे पूजां रत्नैर्वस्त्रैर्हयैः शुभैः ॥

करोमि तस्य चातिथ्यं गृहे प्राप्तस्य सर्वथा ।

अन्यश्चेद्यदि सम्प्राप्तस्तं हन्मि निशितैः शरैः ॥

आनीतः किल कालेन मरणाय महात्मना ।

तस्माद्वद विशालाक्षि कोऽयमायाति मन्दधीः ॥

अज्ञात्वा मां दुराधर्षं कालरूपं महाबलम् । एकावल्युवाच न जानेऽहं महाभाग कोऽयमायाति सत्वरः ॥

न मेऽस्ति विदितः कोऽपि स्थितायास्तव बन्धने ।

नायं पिता मे न भ्राता कोऽप्यन्योऽस्ति महाबलः ॥

किमर्थमिह चायाति नाहं वेद विनिश्चयम् । दैत्य उवाच एवं वदन्त्यमी दूता वयस्या ते यशोवती ॥

समानीय च तं वीरमागतेति कृतोद्यमा ।

क्व गता सा सखी कान्ते विदग्धा कार्यनिश्चये ॥

नान्यः कोऽपि ममारातिर्यो मे प्रतिबलो भवेत् । व्यास उवाच एतस्मिन्नन्तरे दूतास्तत्रान्ये वै समागताः ॥

ते होचुस्त्वरिता भीताः कालकेतुं गृहे स्थितम् ।

किं स्वस्थोऽसि महाराज समीपे सैन्यमागतम् ॥

निर्गच्छ नगरात्तूर्णं सैन्येन महतावृतः ।

इति तेषां वचः श्रुत्वा कालकेतुर्महाबलः ॥

रथमारुह्य त्वरितो निर्ययौ स्वपुराद् बहिः । ३१ उन्हें आज्ञा देकर कालकेतुने अपने निकट बैठी हुई अत्यन्त विवश तथा दुःखित एकावलीसे विनम्रता-पूर्वक पूछा - ' हे तन्वंगि! तुम्हें लेनेके लिये सेनासहित ३२ यह कौन आ रहा है? ये तुम्हारे पिता हैं अथवा कोई अन्य पुरुष? हे कृशोदरि! सच - सच बताओ । यदि ३३ विरहसे व्यथित होकर तुम्हारे पिता तुम्हें लेनेके लिये आ रहे हों, तो यह जानकर कि ये तुम्हारे पिता हैं, मैं इनके साथ युद्ध नहीं करूँगा, अपितु उन्हें घर ३४ लाकर उनकी पूजा करूँगा तथा बहुमूल्य रत्न, वस्त्र तथा अश्व भेंट करके घरमें आये हुए उनका विधिवत् ३५ आतिथ्य करूँगा । यदि कोई अन्य व्यक्ति आया होगा तो मैं अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसे मार डालूँगा । निश्चित ही महान् कालने उसे मरनेके लिये यहाँ ला दिया है । ३६ अतएव हे विशाल नयनोंवाली! मुझ अपराजेय, कालरूप तथा अपार बलसम्पन्नके विषयमें न जानकर यह कौन मन्दमति चला आ रहा है? यह तुम मुझे बताओ ' ॥ ३१- ३६३ ॥ ३७ एकावली बोली - हे महाभाग! मैं यह नहीं जानती कि इतनी तेजीसे यह कौन आ रहा है? ३८ आपके बन्धनमें पड़ी हुई मैं नहीं जानती कि यह कौन है? ये न तो मेरे पिता हैं और न मेरे भाई ही । यह दूसरा ही कोई महान् पराक्रमी पुरुष है, यह किसलिये यहाँ आ रहा है, यह भी मैं निश्चितरूपसे नहीं ३ ९ जानती ॥ ३७-३८३ ॥ दैत्य बोला- ये दूत तो कह रहे हैं कि तुम्हारी सखी यशोवती ही प्रयत्नपूर्वक उस वीरको साथमें ४० लेकर आयी है । हे कान्ते! कार्य सिद्ध करनेमें अत्यन्त चतुर तुम्हारी वह सखी कहाँ गयी? कोई अन्य मेरा शत्रु भी नहीं है, जो मेरा विरोधी हो । ३ ९ -४० ॥ व्यासजी बोले- इसी बीच दूसरे दूत वहाँ ४१ आ गये । भयभीत उन दूतोंने महलमें बैठे कालकेतुसे तुरंत कहा - हे महाराज! आप निश्चिन्त क्यों हैं? ४२ शत्रुसेना समीप आ पहुँची है । आप एक विशाल सेनाके साथ शीघ्र ही नगरसे बाहर निकलिये । उनकी यह बात सुनकर महान् बलशाली कालकेतु ४३ शीघ्र ही रथपर चढ़कर अपने नगरसे बाहर निकल गया ॥ ४१–४३३ ॥

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अ ० २३ ] एकवीरोऽपि सहसा हयारूढः प्रतापवान् ॥

आगतस्तत्र कामिन्या विरहेण समाकुलः ।

युद्धं तयोरभूत्तत्र वृत्रवासवयोरिव ॥

शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् ।

वर्तमाने तदा युद्धे कातराणां भयावहे ॥

गदया ताडयामास दैत्यं सिन्धुसुतासुतः ।

स गतासुः पपातोर्व्यां वज्राहत इवाचलः ॥

पलायित्वा गताः सर्वे राक्षसा भयपीडिताः ।

यशोवती ततो गत्वा वेगादेकावलीं तदा ॥

उवाच मधुरां वाणीं विस्मितां मुदिता भृशम् ।

एह्यालि नृपपुत्रेण दानवोऽसौ निपातितः ॥

एकवीरेण धीरेण युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ।

स्कन्धावारेऽप्यसौ राजा तिष्ठत्यद्य श्रमातुरः ॥

दर्शनं काङ्क्षमाणस्ते श्रुतरूपगुणस्तव ।

पश्य तं कुटिलापाङ्गि मनोभवसमं नृपम् ॥

कथिता त्वं मया पूर्वं तस्याग्रे जाह्नवीतटे ।

पूर्णानुरागः सञ्जातस्तेनासौ विरहातुरः ॥

वाञ्छति त्वां चारुरूपां द्रष्टुं नृपतिनन्दनः ।

सा तस्या वचनं श्रुत्वा गमनाय मनो दधे ॥

लज्जमाना भृशं भीत्या कौमारं प्राप्तया तया ।

कथं तस्य मुखं द्रक्ष्ये कुमारी ह्यवशा भृशम् ॥

समां गृह्णाति कामार्त इति चिन्ताकुला सती ।

यशोवत्या युता तत्र नरयानस्थिता ययौ ॥

स्कन्धावारेऽतिमलिना मलिनाम्बरधारिणी ।

तामागतां विशालाक्षीं दृष्ट्वा राजसुतोऽब्रवीत् ॥

दर्शनं देहि तन्वङ्गि तृषिते नयने मम । षष्ठ स्कन्ध ८३ ९ ४४ कामिनी एकावलीके विरहसे व्याकुल प्रतापी एकवीर भी घोड़े पर आरूढ़ होकर अचानक वहीं पर आ गया । उन दोनोंका वृत्रासुर तथा इन्द्रकी भाँति युद्ध ४५ होने लगा । उस युद्धमें छोड़े गये विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं ॥ ४४-४ ४-४५ १३ ॥ भीरुजनोंको भयभीत कर देनेवाले उस ४६ युद्धमें लक्ष्मीपुत्र एकवीरने दानव कालकेतुपर अपनी गदासे प्रहार किया । गदाप्रहारसे वह कालकेतु वज्रसे आहत पर्वतकी भाँति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर ४७ पड़ा । तब भयभीत होकर अन्य सभी राक्षस भाग गये ॥ ४६-४७३ ॥ तत्पश्चात् यशोवतीने विस्मयमें पड़ी एकावलीके ४८ पास जाकर प्रसन्नतापूर्वक मधुर वाणीमें उससे कहा-हे सखि! इधर आओ । कालकेतुके साथ भीषण युद्ध करके धीरतासम्पन्न राजकुमार एकवीरने उस राक्षसको ४ ९ मार गिराया है । इस समय वे राजकुमार एकवीर थक जानेके कारण अपने शिविरमें विद्यमान हैं । तुम्हारे ५० रूप तथा गुणोंके विषयमें सुनकर वे तुम्हारा दर्शन करना चाहते हैं । हे कुटिलापांगि! कामदेवसदृश उन राजकुमारको तुम देखो । मैं उनसे तुम्हारे विषयमें ५१ गंगातटपर पहले ही बता चुकी हूँ । इससे तुम्हारे प्रति उनका पूर्ण अनुराग हो जानेके कारण वे विरहातुर राजकुमार अब तुझ सुन्दर रूपवालीका दर्शन करना ५२ चाहते हैं ॥ ४८–५२३ ॥ यशोवतीकी बात सुनकर उसने वहाँ जानेका मन बना लिया । कुमारी अवस्थामें होनेके कारण वह ५३ भयवश लज्जित हो रही थी । [ वह सोचने लगी ] मैं एक अत्यन्त विवश कुमारी कन्या उनका मुख कैसे देखूँगी? वह साध्वी एकावली इस बातसे चिन्तित हो ५४ उठी कि वे कामासक्त राजकुमार मुझे ग्रहण कर लेंगे । तब वह एकावली मलिन वस्त्र धारण करके अत्यन्त उदास होकर पालकीमें बैठकर यशोवतीके साथ ५५ उनके शिविरमें पहुँच गयी ॥५३–५५३ ॥ उस विशाल नयनोंवाली एकावलीको वहाँ आयी हुई देखकर राजकुमारने उससे कहा – हे ५६ तन्वंगि! मुझे दर्शन दो । मेरे नेत्र तुम्हारे दर्शनके लिये तृष्णाकुल हैं ॥ ५६३ ॥

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८४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ कामातुरं च तं वीक्ष्य तां च लज्जाभरावृताम् ॥ ५७

नीतिज्ञा शिष्टमार्गज्ञा तमुवाच यशोवती ।

राजपुत्र पिताप्यस्यास्त्वामेनां दातुमिच्छति ॥ ५८

एषापि त्वद्वशा नूनं भविता सङ्गमस्तव ।

कालं प्रतीक्ष्य राजेन्द्र नयैनां पितुरन्तिकम् ॥ ५ ९

स विवाहविधिं कृत्वा दास्यतीति विनिश्चयः ।

स तस्या वचनं तथ्यं मत्वा सैन्यसमन्वितः ॥ ६०

समेतः कामिनीभ्यां तु ययौ तत्पितुराश्रमम् ।

राजपुत्रीं तथायातां श्रुत्वा प्रेमसमन्वितः ॥ ६१

प्रययौ सम्मुखस्तूर्णं सचिवैः परिवेष्टितः ।

बहुभिर्दिवसैर्दृष्टा पुत्री सा मलिनाम्बरा ॥ ६२

यशोवत्या तु वृत्तान्तः कथितो विस्तरात्पुनः ।

एकवीरं मिलित्वासौ गृहमानीय चादरात् ॥ ६३

पुण्येऽह्नि कारयामास विवाहं विधिपूर्वकम् ।

पारिबर्हं ततो दत्त्वा सम्पूज्य विधिवत्तदा ॥ ६४

पुत्रीं विसर्जयामास यशोवत्या समन्विताम् ।

एवं विवाहे संवृत्ते रमापुत्रो मुदान्वितः ॥ ६५

गृहं प्राप्य बहून्भोगान्बुभुजे प्रियया समम् ।

बभूव तस्यां पुत्रस्तु कृतवीर्याभिधः किल ।

तत्सुतः कार्तवीर्यस्तु वंशोऽयं कथितो मया ॥ ६६

एकवीरको कामातुर तथा एकावलीको लज्जासे युक्त देखकर नीतिका ज्ञान रखनेवाली तथा श्रेष्ठजनोंके मार्गका अनुसरण करनेवाली यशोवतीने उस एकवीरसे कहा- हे राजकुमार! इसके पिता भी इसे आपको ही देना चाहते हैं । यह एकावली भी आपके वशीभूत है; इसलिये इसके साथ आपका मिलन अवश्य होगा, किंतु हे राजेन्द्र! कुछ समय प्रतीक्षा करके पहले इसे इसके पिताके पास पहुँचा दीजिये । वे विधिपूर्वक विवाह करके इसे आपको निश्चितरूपसे सौंप देंगे ॥ ५७–५९ ३ ॥ यशोवतीकी बातको उचित मानकर उन दोनों कन्याओं — एकावली तथा यशोवतीको साथमें लेकर सेनासहित वे राजकुमार एकवीर उसके पिताके स्थानपर पहुँचे ॥ ६० ॥

राजपुत्रीको आयी हुई सुनकर राजा रैभ्य प्रेमपूर्वक मन्त्रियोंके साथ उसके सम्मुख शीघ्रतासे पहुँच गये । मलिन वस्त्र धारण की हुई उस पुत्रीको राजाने बहुत दिनोंके बाद देखा, पुनः यशोवतीने रैभ्यको सारा वृत्तान्त विस्तारके साथ बताया । तत्पश्चात् एकवीरसे मिलकर राजा रैभ्य उन्हें आदरपूर्वक घर ले आये । पुनः उन्होंने शुभ दिनमें विधिविधानसे दोनोंका विवाह सम्पन्न कराया । तदुपरान्त राजाने पर्याप्त वैवाहिक उपहार देकर एकवीरको भलीभाँति सम्मानित करके पुत्रीको यशोवतीसहित विदा कर दिया ॥ ६१–६४३ ॥ इस प्रकार विवाह हो जानेपर लक्ष्मीपुत्र एकवीर हर्षित हो गये और घर पहुँचकर अपनी भार्या एकावलीके साथ नानाविध सुखोपभोग करने लगे । यथासमय उस एकावलीसे कृतवीर्य नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ । उस कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्य हुए । इस प्रकार मैंने आपसे इस । हैहयवंशका वर्णन कर दिया॥६५-६६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीरैकावल्योर्विवाहवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

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अ ० २४ ] षष्ठ स्कन्ध ८४१ अथ चतुर्विंशोऽध्यायः धृतराष्ट्रके राजोवाच

भगवंस्त्वन्मुखाम्भोजाच्च्युतं दिव्यकथारसम् ।

न तृप्तिमधिगच्छामि पिबंस्तु सुधया समम् ॥ १

विचित्रमिदमाख्यानं कथितं भवता मम ।

हैहयानां समुत्पत्तिर्विस्तराद्विस्मयप्रदा ॥ २

परं कौतूहलं मेऽत्र यद्विष्णुः कमलापतिः ।

देवदेवो जगन्नाथः सृष्टिस्थित्यन्तकारकः ॥ ३

सोऽप्यश्वभावमापन्नो भगवान्हरिरच्युतः ।

परतन्त्रः कथं जातः स्वतन्त्रः पुरुषोत्तमः ॥ ४

एतन्मे संशयं ब्रह्मञ्छेत्तुमर्हसि साम्प्रतम् ।

सर्वज्ञस्त्वं मुनिश्रेष्ठ ब्रूहि वृत्तान्तमद्भुतम् ॥ ५

व्यास उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि सन्देहस्यास्य निर्णयम् ।

यथा श्रुतं मया पूर्वं नारदान्मुनिसत्तमात् ॥ ६

ब्रह्मणो मानसः पुत्रो नारदो नाम तापसः ।

सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सर्वलोकप्रियः कविः ॥ ७

स चैकदा मुनिश्रेष्ठो विचरन्पृथिवीमिमाम् ।

वादयन्महतीं वीणां स्वरतानसमन्विताम् ॥ ८

बृहद्रथन्तरादीनां साम्नां भेदाननेकशः ।

गायन्गायत्रममृतं सम्प्राप्तोऽथ ममाश्रमम् ॥ ९

शम्याप्रासं महातीर्थं सरस्वत्याः सुपावनम् ।

निवासं मुनिमुख्यानां शर्मदं ज्ञानदं तथा ॥ १०

तमागतमहं प्रेक्ष्य ब्रह्मपुत्रं महाद्युतिम् ।

अभ्युत्थानादिकं सर्वं कृतवानर्चनादिकम् ॥ ११ ।

जन्मकी कथा राजा बोले- हे भगवन्! आपके मुखार-विन्दसे निर्गत इस अमृततुल्य दिव्य कथारसका निरन्तर पान करते रहनेपर भी मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥१ ॥

आपके द्वारा मुझसे यह विचित्र आख्यान विस्तारपूर्वक कहा गया; हैहयवंशी राजाओंकी उत्पत्ति तो अत्यन्त आश्चर्यजनक है ॥ २ ॥

मुझे इस विषयमें महान् कौतूहल हो रहा है कि देवाधिदेव जगत्पति लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णु स्वयं जगत्के उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता तथा संहर्ता हैं; उन्हें भी अश्वरूप धारण करना पड़ गया? सर्वथा स्वतन्त्र रहनेवाले वे अच्युत पुरुषोत्तम भगवान् हरि परतन्त्र कैसे हो गये? हे ब्रह्मन्! इस समय मेरे इस सन्देहका निवारण करनेमें आप पूर्ण समर्थ हैं । हे मुनिवर! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव इस अद्भुत वृत्तान्तका वर्णन कीजिये ॥ ३–५ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! सुनिये, इस सन्देहका निर्णय पूर्व समयमें मैंने मुनिश्रेष्ठ नारदजीसे जैसा सुना है, वैसा ही आपको बता रहा हूँ ॥६ ॥

नारदजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । वे तपस्वी, सर्वज्ञानी, सर्वत्र गमन करनेवाले, शान्त, समस्त लोकोंके प्रिय एवं मनीषी हैं ॥७ ॥

एक बार वे मुनिवर नारद स्वर तथा तानसे युक्त अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए तथा सामगान बृहद्रथन्तर आदि अनेक भेदों और अमृतमय गायत्र-सामका गान करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करते हुए मेरे आश्रमपर पहुँचे । वह शम्याप्रास महातीर्थ सरस्वतीके पावन तटपर विराजमान है । कल्याण और ज्ञान प्रदान करनेवाला वह तीर्थ प्रधान ऋषियोंका निवासस्थान है ॥८–१० ॥ ब्रह्माजीके पुत्र महान् तेजस्वी नारदजीको अपने आश्रममें आया देखकर मैं उठकर खड़ा हो गया और मैंने भलीभाँति उनकी पूजा आदि की ॥ ११ ॥