देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 871–880
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–880
पृष्ठ 871
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८
वीक्ष्य मां कमला देवी गतान्तर्धानमन्तिकात् ।
सर्वलक्षणसम्पन्ना सर्वभूषणभूषिता ॥
नारीणां प्रवरा कान्ता रूपयौवनगर्विता ।
सुप्रिया वासुदेवस्य वरचामीकरप्रभा ॥
अन्तर्गृहं गतां दृष्ट्वा सिन्धुजां व्यञ्जनान्विताम् ।
मया पृष्टो देवदेवो वनमाली जगत्प्रभुः ॥
भगवन्देवदेवेश पद्मनाभ सुरारिहन् ।
कथं च मा गता दृष्ट्वा मामागच्छन्तमन्तिकात् ॥
नाहं विटो न वा धूर्तः तापसोऽहं जगद्गुरो ।
जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितमायो जनार्दन ॥
नारद उवाच
निशम्य वचनं किञ्चिद् गर्वयुक्तं जनार्दनः ।
उवाच मां स्मितं कृत्वा वीणावन्मधुरां गिरम् ॥
विष्णुरुवाच
नारदैवंविधा नीतिर्न स्थातव्यं कदाचन ।
पतिं विनान्यसान्निध्ये कस्यचिद्योषया क्वचित् ॥
माया सुदुर्जया विद्वन् योगिभिर्जितमारुतैः ।
सांख्यविद्भिर्निराहारैस्तापसैश्च जितेन्द्रियैः ॥
देवैश्च मुनिशार्दूल यत्त्वयोक्तं वचोऽधुना ।
जितमायोऽस्मि गीतज्ञ नैवं वाच्यं कदाचन ॥
नाहं शिवो न वा ब्रह्मा जेतुं तां प्रभवोऽप्यजाम् ।
मुनयः सनकाद्याश्च कस्त्वं केऽन्ये क्षमा जये ॥
देवदेहं नृदेहं वा तिर्यग्देहमथापि वा ।
बिभृयाद्यः शरीरं च स कथं तां जयेदजाम् ॥
त्रियुतस्तां कथं मायां जेतुं शक्तः पुमान्भवेत् ।
वेदविद्योगविद्वापि सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः ॥
सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त आभूषणोंसे ७ अलंकृत, कान्तियुक्त, अपने रूप - यौवनपर गर्व करनेवाली, नारियोंमें सर्वश्रेष्ठ, भगवान् विष्णुको अतिप्रिय तथा स्वर्णके समान आभावाली भगवती लक्ष्मी मुझे देखकर ८ उनके पाससे अन्तः: पुरमें चली गयीं ॥ ७-८ ॥ व्यंजित अंगोंवाली लक्ष्मीजीको भवनमें गयी देखकर मैंने वनमाला धारण करनेवाले देवाधिदेव ९ जगन्नाथ विष्णुसे पूछा - हे भगवन्! हे देवाधिदेव! हे पद्मनाभ! हे असुरविनाशन! मुझे आते हुए देखकर माता लक्ष्मीजी आपके पाससे क्यों चली गयीं? हे १० जगद्गुरो! मैं न तो कोई नीच हूँ और न धूर्त! हे जनार्दन! मैं इन्द्रियों, क्रोध तथा मायाको जीत लेनेवाला एक तपस्वी हूँ॥९ –११ ॥ ११ नारदजी बोले – मेरा कुछ - कुछ अभिमानपूर्ण वचन सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराकर वीणाके समान मधुर वाणीमें मुझसे कहने लगे ॥ १२ ॥
भगवान् विष्णु बोले- हे नारद! ऐसी नीति है १२ | कि पतिके अतिरिक्त अन्य किसी भी पुरुषके सांनिध्यमें स्त्रीको कभी नहीं रहना चाहिये ॥ १३ ॥
हे विद्वन्! वायु ( श्वास ) को जीत लेनेवाले योगियों, सांख्यशास्त्रके ज्ञाताओं, निराहार रहनेवाले १३ तपस्वियों तथा जितेन्द्रिय पुरुषों एवं देवताओंके लिये भी माया अत्यन्त दुर्जय है । हे मुनिवर! अभी आपने जो कहा है कि ' मैंने मायापर विजय प्राप्त कर ली १४ है ' तो हे गीतज्ञ! आपको ऐसा कभी नहीं बोलना चाहिये ॥ १४-१५ ॥ १५ जब मैं, शिव, ब्रह्मा तथा सनक आदि मुनि भी उस अजन्मा मायापर विजय नहीं प्राप्त कर सके तब आप तथा अन्य कौन हैं, जो उसे जीतनेमें समर्थ हो १६ सकते हैं? ॥ १६ ॥
देवता, मानव तथा पशु - पक्षी अथवा जो कोई शरीर धारण करनेवाला प्राणी हो, वह उस अजन्मा १७ मायाको कैसे जीत सकता है? ॥१७ ॥
वेदका ज्ञाता, योगी, सर्वज्ञ, जितेन्द्रिय एवं सत्त्व - रज - तमसे युक्त कोई भी पुरुष मायाको जीतनेमें १८ । कैसे समर्थ हो सकता है? ॥ १८ ॥
पृष्ठ 872
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २८ ] षष्ठ स्कन्ध ८६३
कालोऽपि तस्या रूपं हि रूपहीनः स्वरूपकृत् ।
तद्वशे वर्तते देही विद्वान्मूर्खोऽथ मध्यमः ॥
कालः करोति धर्मज्ञं कदाचिद्विकलं पुनः ।
स्वभावात्कर्मतो वापि दुर्ज्ञेयं तस्य चेष्टितम् ॥
नारद उवाच
इत्युक्त्वा विरतो विष्णुरहं विस्मयमानसः ।
तमब्रवं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम् ॥
रमापते कथंरूपा माया सा कीदृशी पुनः ।
कियद्बला क्वसंस्थाना कस्याधारा वदस्व मे ॥
द्रष्टुकामोऽस्मि तां मायां दर्शयाशु महीधर ।
ज्ञातुमिच्छामि तां सम्यक्प्रसादं कुरु मापते ॥
विष्णुरुवाच
त्रिगुणा साखिलाधारा सर्वज्ञा सर्वसम्मता ।
अजेयानेकरूपा च सर्वं व्याप्य स्थिता जगत् ॥
दिदृक्षा यदि ते चित्ते नारदारोहणं कुरु ।
गरुडे मत्समेतोऽद्य गच्छावो ऽन्यत्र साम्प्रतम् ॥
दर्शयिष्यामि ते मायां दुर्जयामजितात्मभिः ।
दृष्ट्वा तां ब्रह्मपुत्र त्वं विषादे मा मनः कृथाः ॥
इत्युक्त्वा देवदेवो मां सस्मार विनतासुतम् ।
स्मृतमात्रस्तु गरुडस्तदागाद्धरिसन्निधौ ॥
आगतं गरुडं वीक्ष्य आरुरोह जनार्दनः ।
समारोप्य च मां पृष्ठे गमनाय कृतादरः ॥
चलितो विनतापुत्रो वैकुण्ठाद्वायुवेगवान् ।
प्रेरितो यत्र कृष्णेन गन्तुकामेन काननम् ॥
काल भी उसी मायाका ही रूप है । वह रूपहीन १ ९ होते हुए भी स्वरूप धारण कर लेता है । विद्वान्, मूर्ख अथवा मध्यम श्रेणीका कोई भी व्यक्ति हो, वह उसके वशमें रहता है ॥ १ ९ ॥ कभी - कभी काल धर्मज्ञ पुरुषको भी उद्विग्न २० कर देता है । स्वभाव अथवा कर्मसे उस कालकी चेष्टा नहीं जानी जा सकती ॥ २० ॥
नारदजी बोले - ऐसा कहकर विष्णुके चुप हो जानेपर मेरा मन सन्देहसे भर गया और मैंने उन २१ जगन्नाथ सनातन वासुदेवसे पूछा – हे रमाकान्त! आप मुझे यह बतायें कि उस मायाका रूप क्या है, उसकी आकृति कैसी है, उसमें कितनी शक्ति है, वह २२ कहाँ रहती है तथा उसका आधार क्या है? हे महीधर! मैं उस मायाको देखना चाहता हूँ, अतः मुझे उसका शीघ्र दर्शन कराइये । हे लक्ष्मीकान्त! मैं उसके २३ विषयमें सम्यक् जानना चाहता हूँ; मुझपर कृपा
कीजिये । २१ – २३ ॥
भगवान् विष्णु बोले- अखिल जगत्को धारण करनेवाली वह माया त्रिगुणात्मिका, सर्वज्ञा, सर्वसम्मता, अजेया, अनेकरूपा तथा सम्पूर्ण संसारको अपनेमें २४ व्याप्त करके स्थित है ॥ २४ ॥
हे नारद! यदि तुम्हारे मनमें उस मायाको देखनेकी इच्छा है तो मेरे साथ अभी गरुडपर आरूढ़ २५ हो जाओ; हम दोनों अन्य लोकमें इसी समय चलते हैं ॥ २५ ॥
हे ब्रह्मपुत्र! वहाँ मैं तुम्हें अजितात्माओंके लिये २६ अजेय मायाका दर्शन कराऊँगा, किंतु उसे देखकर तुम अपने मनको विषादग्रस्त मत होने देना ॥ २६ ॥
मुझसे ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने विनतापुत्र गरुडका स्मरण किया । स्मरण करते ही २७ गरुड भगवान् विष्णुके समक्ष उपस्थित हो गये ॥ २७ ॥
गरुडको आया हुआ देखकर भगवान् विष्णु मुझे अत्यन्त आदरपूर्वक पीछे बैठाकर प्रस्थान करनेके २८ लिये उसपर आरूढ़ हो गये ॥२८ ॥
जिस वन - प्रदेशमें भगवान् विष्णु जाना चाहते थे, वहाँके लिये प्रेरित किये गये वायुसदृश वेगवान् २ ९ । विनतापुत्र गरुडने वैकुण्ठसे प्रस्थान किया ॥ २ ९ ॥
पृष्ठ 873
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८
महावनानि दिव्यानि सरांसि सरितस्तथा ।
पुरग्रामाकरादींश्च खेटखर्वटगोव्रजान् ॥
मुनीनामाश्रमान् रम्यान् वापीश्च सुमनोहराः ।
पल्वलानि विशालानि ह्रदान् पङ्कजभूषितान् ॥
मृगाणां च वराहाणां वृन्दान्यप्यवलोक्य च ।
गतावावां कान्यकुब्जसमीपं गरुडासनौ ॥
तत्र रम्यं सरो दिव्यं दृष्टं पङ्कजमण्डितम् ।
हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम् ॥
नानावर्णै: प्रफुल्लैश्च पङ्कजैरुपरञ्जितम् ।
शुचि मिष्टजलं भृङ्गयूथनादविराजितम् ॥
मामाह भगवान् वीक्ष्य तडागं परमाद्भुतम् ।
स्पर्धकं चोदधेः क्षीरं मिष्टं वारि विशेषतः ॥
श्रीभगवानुवाच
पश्य नारद गम्भीरं सरः सारसनादितम् ।
सर्वत्र पङ्कजैश्छन्नं स्वच्छनीरप्रपूरितम् ॥
अत्र स्नात्वा गमिष्यावः कान्यकुब्जं पुरोत्तमम् ।
इत्युक्त्वा गरुडादाशु मामुत्तार्य व्यतारयत् ॥
विहस्य भगवांस्तत्र जग्राह मम तर्जनीम् ।
स्तुवन्सरोवरं भूयस्तीरे मामनयत्प्रभुः ॥
विश्रम्य तटभागे तु स्निग्धच्छाये मनोहरे ।
मामुवाच मुने स्नानं कुरु त्वं विमले जले ॥
पश्चादहं करिष्यामि तडागेऽस्मिन्सुपावने ।
साधूनामिव चेतांसि जलानि निर्मलानि च ॥
सुरभीणि परागैस्तु पङ्कजानां विशेषतः ।
इत्युक्तोऽहं भगवता मुक्त्वा वीणां मृगाजिनम् ॥
स्नानाय कृतधीस्तीरे गतः प्रेमसमन्वितः ।
पादौ प्रक्षाल्य हस्तौ च शिखां बद्ध्वा कुशग्रहम् ॥
कृत्वाचम्य शुचिस्तोये स्नातवानस्मि तज्जले । गरुडपर आसीन हम दोनों बहुत से विशाल ३० वनों, दिव्य सरोवरों, नदियों, ग्राम - नगरों, पर्वतके आस - पासकी बस्तियों, गायोंके गोष्ठों, मुनियों के मनोहर आश्रमों, सुन्दर बावलियों, छोटे - बड़े तालाबों, ३१ कमलोंसे सुशोभित विस्तृत तथा गहरे ह्रदों एवं मृगों तथा वराहोंके बहुतसे समूहोंको देखते हुए कान्यकुब्जनगरके पास पहुँच गये॥३०–३२ ॥ ३२ वहाँ कमलोंसे मण्डित, हंस तथा सारसोंसे युक्त, चक्रवाकोंसे सुशोभित, अनेक वर्णोंवाले खिले हुए कमलोंसे शोभायमान, झुण्ड के झुण्ड भौरोंकी ध्वनिसे ३३ गुंजित एवं पवित्र तथा मधुर जलवाला एक दिव्य तथा रमणीय सरोवर दिखायी पड़ा ॥ ३३-३४ ॥ ३४ क्षीरसागरके मधुर दुग्धकी समानता करनेवाले विशिष्ट जलसे युक्त उस परम अद्भुत सरोवरको देखकर भगवान् विष्णु मुझसे कहने लगे ॥ ३५ ॥
३५ श्रीभगवान् बोले – हे नारद! सर्वत्र कमलोंसे आच्छादित, स्वच्छ जलसे परिपूर्ण तथा सारसकी ध्वनिसे निनादित हो रहे इस अगाध सरोवरको देखो ॥ ३६ ॥
३६ इसीमें स्नान करके हमलोग श्रेष्ठ नगर कान्यकुब्जमें चलेंगे - ऐसा कहकर भगवान् विष्णु मुझे शीघ्र ही गरुडसे उतारकर आगे ले गये ॥ ३७ ॥
३७ उन्होंने हँसते हुए मेरी तर्जनी अँगुली पकड़ी और बार - बार उस सरोवरकी प्रशंसा करते हुए वे मुझे तीरपर ले गये ॥ ३८ ॥
३८ वृक्षोंकी घनी छायावाले मनोहर तटभागपर कुछ समय विश्राम करनेके बाद भगवान् विष्णुने मुझसे कहा - हे मुने! आप इस स्वच्छ जलमें पहले स्नान ३ ९ कर लें, तत्पश्चात् मैं इस परम पवित्र सरोवरमें स्नान करूँगा । इस सरोवरका जल साधुजनोंके चित्तकी ४० भाँति निर्मल तथा कमलोंके परागसे विशेषरूपसे सुगन्धित है ॥ ३ ९ -४० ॥ भगवान्के ऐसा कहनेपर मैंने स्नान करनेका मन ४१ बना लिया और अपनी वीणा तथा मृगचर्म वहीं रखकर मैं प्रेमपूर्वक तटपर चला गया ॥ ४१३ ॥
हाथ - पैर धोकर और शिखा बाँधकर मैंने हाथमें ४२ कुश ले लिया । पुनः पवित्र जलसे आचमन करके मैं उस जलमें स्नान करने लगा । जब मैं उस मनोहर
पृष्ठ 874
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २८ ] षष्ठ यदा तस्मिञ्जले रम्ये स्नातोऽहं पश्यतो हरेः ॥ ४३
विहाय पौरुषं रूपं प्राप्तः स्त्रीत्वमनुत्तमम् ।
हरिर्गृहीत्वा वीणां मे तथा कृष्णाजिनं शुभम् ॥ ४४
आरुह्य गरुडं तूर्णं जगाम स्वगृहं क्षणात् ।
ततोऽहं स्त्रीत्वमापन्नश्चारुभूषणभूषितः ॥ ४५
तत्क्षणान्मनसो जाता पूर्वदेहस्य विस्मृतिः ।
विस्मृतोऽसौ जगन्नाथो महती विस्मृता पुनः ॥ ४६
सम्प्राप्य मोहिनीरूपं तडागान्निर्गतो बहिः ।
अपश्यं नलिनीजुष्टं सरस्तद्विमलोदकम् ॥ ४७
किमेतदिति मनसाकरवं विस्मयं मुहुः ।
एवं चिन्तयमानस्य नारीरूपधरस्य मे ॥ ४८
सहसा दृक्पथं प्राप्तस्तत्र तालध्वजो नृपः ।
गजाश्वरथवृन्दैश्च संवृतो रथसंस्थितः ॥ ४ ९
युवा भूषणसंवीतो देहवानिव मन्मथः ।
वीक्ष्य मां भूपतिस्तत्र दिव्यभूषणभूषिताम् ॥ ५०
राकाचन्द्रमुखीं योषां विस्मयं परमं गतः ।
पप्रच्छ कासि कल्याणि कस्य पुत्री सुरस्य वा ॥ ५१
मानुषस्य च वा कान्ते गन्धर्वस्योरगस्य च ।
एकाकिनी कथं बाला रूपयौवनभूषिता ॥ ५२
विवाहिताथ कन्या वा सत्यं वद सुलोचने ।
किं पश्यसि सुकेशान्ते तडागेऽस्मिन्सुमध्यमे ॥ ५३
चिकीर्षितं पिकालापे ब्रूहि मन्मथमोहिनि ।
भुङ्क्ष्व भोगान्मरालाक्षि मया सह कृशोदरि ।
वाञ्छितान्मनसा नूनं कृत्वा मां पतिमुत्तमम् ॥५४
स्कन्ध ८६५ | जलमें स्नान कर रहा था, उसी समय भगवान्के देखते - देखते मैं अपना पुरुषरूप छोड़कर एक सुन्दर नारीके रूपमें परिणत हो गया ॥ ४२-४३३ ॥ उसी क्षण मेरी वीणा तथा पवित्र मृगचर्म लेकर भगवान् विष्णु गरुडपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपने धाम चले गये । इधर मैं सुन्दर भूषणोंसे भूषित होकर स्त्रीके रूपमें हो गया ॥ ४४-४५ ॥ उसी समयसे मेरे मनमें पूर्वदेहकी विस्मृति हो गयी । मैं भगवान् विष्णु तथा अपनी महती वीणाको भी भूल गया ॥ ४६ ॥
मोहिनीरूप प्राप्त करके मैं सरोवरसे बाहर निकला और स्वच्छ जलवाले तथा कमलोंसे परिपूर्ण उस सरोवरको देखने लगा ॥ ४७ ॥
मैं मनमें बार - बार विस्मय कर रहा था कि ' यह क्या है! ' नारीरूपको प्राप्त मैं ऐसा सोच ही रहा था कि मुझे तालध्वज नामक राजा अचानक दिखायी पड़े । हाथीके समूहोंसे घिरे हुए वे रथपर बैठे हुए थे । युवावस्थावाले तथा आभूषणोंसे सुशोभित राजा तालध्वज शरीर धारण किये साक्षात् कामदेवके समान प्रतीत हो रहे थे ॥ ४८-४९ ३ ॥ पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मुखवाली तथा दिव्य आभूषणोंसे मण्डित मुझ रमणीको देखकर राजाको महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुझसे पूछा — हे कल्याणि! तुम कौन हो? हे कान्ते! तुम किस देवता, मनुष्य, गन्धर्व अथवा नागकी पुत्री हो? रूप तथा यौवनसे सम्पन्न युवती होते हुए भी तुम यहाँ अकेली क्यों हो? ॥ ५० - ५२ ॥ हे सुनयने! तुम सच - सच बताओ कि तुम विवाहिता हो अथवा कुमारी! हे सुकेशान्ते! हे सुमध्यमे! तुम इस सरोवरमें क्या देख रही हो? ॥ ५३ ॥
हे पिकभाषिणि! मन्मथमोहिनि! तुम अपनी अभिलाषा व्यक्त करो । हे मरालाक्षि! हे कृशोदरि! मुझ उत्तम राजाको अपना पति बनाकर मेरे साथ तुम । निःसन्देह मनोवांछित सुखोंका उपभोग करो ॥५४ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदेन स्वस्त्रीत्वप्राप्तिवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
पृष्ठ 875
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९ अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः राजा तालध्वजसे स्त्रीरूपधारी नारदजीका विवाह, अनेक पुत्र - पौत्रोंकी उत्पत्ति और युद्ध में उन सबकी मृत्यु, नारदजीका शोक और नारद उवाच
इत्युक्तोऽहं तदा तेन राज्ञा तालध्वजेन च ।
विमृश्य मनसात्यर्थं तमुवाच विशांपते ॥
राजन्नाहं विजानामि पुत्री कस्येति निश्चयम् ।
पितरौ क्व च मे केन स्थापिता च सरोवरे ॥
किं करोमि क्व गच्छामि कथं मे सुकृतं भवेत् ।
निराधारास्मि राजेन्द्र चिन्तयामि चिकीर्षितम् ॥ ३
दैवमेव परं राजन्नास्त्यत्र पौरुषं मम ।
धर्मज्ञोऽसि महीपाल यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ४
तवाधीनास्म्यहं भूप न मे कोऽप्यस्ति पालकः ।
न पिता न च माता च न स्थानं न च बान्धवाः ॥ ५
इत्युक्तोऽसौ मया राजा बभूव मदनातुरः ।
मां निरीक्ष्य विशालाक्षीं सेवकानित्युवाच ह ॥ ६
नरयानमानयध्वं चतुर्वाह्यं मनोहरम् ।
आरोहणार्थमस्यास्तु कौशेयाम्बरवेष्टितम् ॥ ७
मृद्वास्तरणसंयुक्तं मुक्ताजालविभूषितम् ।
चतुरस्त्रं विशालं च सुवर्णरचितं शुभम् ॥ ८
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भृत्याः सत्वरगामिनः ।
आनिन्युः शिबिकां दिव्यां मदर्थे वस्त्रवेष्टिताम् ॥ ९
आरूढाऽहं तदा तस्यां तस्य प्रियचिकीर्षया ।
मुदितोऽसौ गृहे नीत्वा मां तदा पृथिवीपतिः ॥ १०
विवाहविधिना राजा शुभे लग्ने शुभे दिने ।
उपयेमे च मां तत्र हुतभुक्सन्निधौ ततः ॥ ११
तस्याहं वल्लभा जाता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।
सौभाग्यसुन्दरीत्येवं नाम तत्र कृतं मम ॥ १२
भगवान् विष्णुकी कृपासे पुनः स्वरूपबोध नारदजी बोले - हे विशाम्पते! राजा तालध्वजके यह पूछनेपर मैंने अपने मनमें सम्यक् प्रकारसे विचार करके उनसे कहा- - हे राजन्! मैं निश्चितरूपसे नहीं जानती कि मैं किसकी कन्या हूँ, मेरे माता - पिता कौन हैं और मुझे इस सरोवरपर कौन लाया है ॥ १-२ ॥ अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मेरा कल्याण कैसे हो सकेगा, मैं आश्रयहीन हूँ । हे राजेन्द्र! यही बात सोचती रहती हूँ ॥ ३ ॥
हे राजन्! दैव ही सर्वोपरि है; इसमें मेरा पौरुष व्यर्थ ही है । हे भूपाल! आप धर्मज्ञ हैं; आप जैसा चाहते हों, वैसा करें ॥४ ॥
हे राजन्! मैं आपके अधीन हूँ; क्योंकि मेरा यहाँ कोई भी रक्षक नहीं है । मेरे न पिता हैं, न माता हैं, न बन्धु - बान्धव हैं और न तो मेरा कोई स्थान ही है ॥ ५ ॥
मेरे ऐसा कहनेपर वे राजा तालध्वज कामासक्त हो उठे और मुझ विशाल नयनोंवालीकी ओर दृष्टि डालकर उन्होंने अपने सेवकोंसे कहा— ॥६ ॥
तुमलोग इस सुन्दर स्त्रीके आरोहणके लिये रेशमी वस्त्रसे आवेष्टित एक मनोहर पालकी ले आओ, जिसे ढोनेवाले चार पुरुष हों, उसमें कोमल आस्तरण बिछा हो तथा वह मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित हो, वह सोनेकी बनी हुई हो, चौकोर हो तथा पर्याप्त विशाल हो ॥ ७-८ ॥ राजाकी बात सुनकर शीघ्रगामी सेवकोंने मेरे लिये वस्त्रसे ढकी हुई दिव्य पालकी लाकर उपस्थित कर दी ॥९ ॥
उन राजा तालध्वजका प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे मैं उस पालकीपर आरूढ़ हो गया । मुझे अपने भवन ले जाकर राजा तालध्वज अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ १० ॥
किसी शुभ लग्न तथा उत्तम दिनमें राजाने वैवाहिक विधि - विधान से अग्निके साक्ष्यमें मेरे साथ विवाह कर लिया ॥ ११ ॥
उस समय मैं उनके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो गया । उन्होंने वहाँ मेरा नाम सौभाग्यसुन्दरी-। ऐसा रख दिया ॥ १२ ॥
पृष्ठ 876
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २ ९ ]
रममाणो मया सार्धं सुखमाप महीपतिः ।
नानाभोगविलासैश्च कामशास्त्रोदितैस्तथा ॥
राजकार्याणि सन्त्यज्य क्रीडासक्तो दिवानिशम् ।
नासौ विवेद गच्छन्तं कालं कामकलारतः ॥
उद्यानेषु च रम्येषु वापीषु च गृहेषु च ।
हर्म्येषु वरशैलेषु दीर्घिकासु वरासु च ॥
वारुणीमदमत्तोऽसौ विहरन्कानने शुभे ।
विसृज्य सर्वकार्याणि मदधीनो बभूव ह ॥
व्यासाहं तेन संसक्ता क्रीडारसवशीकृता ।
स्मृतवान्पूर्वदेहं न पुंभावं मुनिजन्म च ॥
ममैवायं पतिर्योषाहं पत्नीषु प्रिया सती ।
पट्टराज्ञी विलासज्ञा सफलं जीवितं मम ॥
इति चिन्तयती तस्मिन्प्रेमबद्धा दिवानिशम् ।
क्रीडासक्ता सुखे लुब्धा तं स्थिता वशवर्तिनी ॥
विस्मृतं ब्रह्मविज्ञानं ब्रह्मज्ञानं च शाश्वतम् ।
धर्मशास्त्रपरिज्ञानं तदासक्तमनाः स्थिता ॥
एवं विहरतस्तत्र वर्षाणि द्वादशैव तु ।
गतानि क्षणवत्कामक्रीडासक्तस्य मे मुने ॥
जाता गर्भवती चाहं मुदं प्राप नृपस्तदा ।
कारयामास विधिवद् गर्भसंस्कारकर्म च ॥
अपृच्छद्दोहदं राजा प्रीणयन्मां पुनः पुनः ।
नाब्रवं लज्जमानाहं नृपं प्रीतमना भृशम् ॥
सम्पूर्णे दशमे मासि पुत्रो जातस्ततो मम ।
शुभे ग्रहनक्षत्रलग्नताराबलान्विते ॥
बभूव नृपतेर्गेहे पुत्रजन्ममहोत्सवः ।
राजा परमसन्तुष्टो बभूव सुतजन्मतः ॥
षष्ठ स्कन्ध ८६७ कामशास्त्रानुकूल अनेक प्रकारके भोग-१३ विलासोंके द्वारा मेरे साथ रमण करते हुए राजाको आनन्द मिलता था ॥ १३ ॥
राज्यके कार्योंको छोड़कर वे दिन - रात मेरे साथ क्रीडारत रहते थे । कामकलामें आसक्त उन राजाको १४ समय बीतनेका भी बोध नहीं रहता था ॥ १४ ॥
मनोहर उद्यानों, बावलियों, सुन्दर महलों, १५ अट्टालिकाओं, श्रेष्ठ पर्वतों, उत्तम जलाशयों तथा रमणीक काननमें विहार करते हुए मधुपानसे उन्मत्त वे राजा समस्त कार्य छोड़कर मेरे अधीन हो गये ॥ १५-१६ ॥ १६ हे व्यासजी! उनमें मेरी भी पूर्ण आसक्ति हो गयी और मैं क्रीडारसके वशीभूत हो गया । मुझे अपने पूर्व पुरुष - शरीर तथा मुनि - जन्मका भी स्मरण नहीं १७ रहा ॥ १७ ॥
ये ही मेरे पति हैं तथा इनकी अनेक पत्नियोंमें मैं ही इनकी प्रिय पतिव्रता भार्या हूँ, सम्पूर्ण विलासोंको १८ जाननेवाली मैं इनकी पटरानी हूँ; इस प्रकार मेरा जीवन सफल है - ऐसा सोचती हुई मैं दिन - रात उन्हींके प्रेममें आबद्ध रहती थी तथा उनके साथ १ ९ क्रीडारत रहती थी । इस तरह उनके सुखके लोभमें मैं सदा उन्हींके अधीन हो गयी । मेरा ब्रह्मविज्ञान, सनातन ब्रह्मज्ञान तथा धर्मशास्त्रका रहस्य पूर्णरूपसे २० विस्मृत हो गया और मैं उन्हींमें आसक्त - मन होकर रहने लगी ॥ १८–२० ॥ हे मुने! इस प्रकार कामक्रीडामें आसक्त मेरे २१ वहाँ विहार करते हुए बारह वर्ष एक क्षणकी भाँति व्यतीत हो गये ॥ २१ ॥
मेरे गर्भवती होनेपर राजाको परम प्रसन्नता २२ हुई । राजाने विधिपूर्वक गर्भसम्बन्धी संस्कारकर्म सम्पन्न कराया ॥ २२ ॥
गर्भके समय मेरी मनोवांछित वस्तुओंके २३ विषयमें राजा मुझे प्रसन्न करते हुए बार - बार पूछा करते थे । तब अत्यन्त प्रसन्नचित्त मैं लज्जाके कारण कुछ भी नहीं कह पाती थी ॥ २३ ॥
२४ दस माह पूर्ण होनेपर ग्रह, नक्षत्र, लग्न तथा तारा-बलयुक्त शुभ दिनमें मुझे एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥२४ ॥
राजाके भवनमें पुत्र जन्मका उत्सव मनाया २५ । गया । पुत्र - जन्मसे राजा परम प्रसन्न हो गये ॥ २५ ॥
पृष्ठ 877
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९
सूतकान्ते सुतं वीक्ष्य राजा मुदमवाप ह ।
अहं भूमिपतेश्चासं प्रिया भार्या परन्तप ॥
ततो वर्षद्वयान्ते वै पुनर्गर्भो मया धृतः ।
द्वितीयस्तु सुतो जातः सर्वलक्षणसंयुतः ॥
सुधन्वेति सुतस्याथ नाम चक्रे नृपस्तदा ।
वीरवर्मेति ज्येष्ठस्य ब्राह्मणैः प्रेरितस्त्वयम् ॥
एवं द्वादश पुत्राश्च प्रसूता भूपसम्मताः ।
मोहितोऽहं तदा तेषां प्रीत्या पालनलालने ॥
पुनरष्ट सुताः काले काले जाताः स्वरूपिणः ।
गार्हस्थ्यं मे ततः पूर्णं सम्पन्नं सुखसाधनम् ॥
तेषां दारक्रियाः काले कृता राज्ञा यथोचिताः ।
स्नुषाभिश्च तथा पुत्रैः परिवारो महानभूत् ॥
ततः पौत्रादिसम्भूतास्तेऽपि क्रीडारसान्विताः ।
आसन्नानारसोपेता मोहवृद्धिकरा भृशम् ॥
कदाचित्सुखमैश्वर्यं कदाचिद्दुःखमद्भुतम् ।
पुत्रेषु रोगजनितं देहसन्तापकारकम् ॥
परस्परं कदाचित्तु विरोधोऽभूत्सुदारुणः ।
पुत्राणां वा वधूनां च तेन सन्तापसम्भवः ॥
सुखदुःखात्मके घोरे मिथ्याचारकरे भृशम् ।
सङ्कल्पजनिते क्षुद्रे मग्नोऽहं मुनिसत्तम ॥
विस्मृतं पूर्वविज्ञानं शास्त्रज्ञानं तथा गतम् ।
योषाभावे विलीनोऽहं गृहकार्येषु सर्वथा ॥
अहङ्कारस्तु सञ्जातो भृशं मोहविवर्धकः ।
एते मे बलिनः पुत्राः स्नुषाः सुकुलसम्भवाः ॥
जननाशौच समाप्त होनेपर पुत्रका दर्शन करके २६ राजाको असीम प्रसन्नता हुई । हे परन्तप! अब मैं राजा तालध्वजकी अत्यन्त प्रिय भार्या हो गयी ॥ २६ ॥
दो वर्षके अनन्तर मैंने पुनः गर्भ धारण किया । [ यथासमय ] सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न दूसरा पुत्र २७ उत्पन्न हुआ ॥ २७ ॥
तदनन्तर ब्राह्मणोंका आदेश पाकर राजाने इस पुत्रका नाम ' सुधन्वा ' तथा बड़े पुत्रका नाम ' वीरवर्मा ' २८ रखा ॥ २८ ॥
इस प्रकार मैंने राजाके मनोनुकूल बारह पुत्र उत्पन्न किये । मैं मोहके वशीभूत होकर उनके २ ९ लालन - पालनमें प्रेमपूर्वक लगा रहा ॥ २ ९ ॥ इसके बाद समय - समयपर मेरे परम रूपवान् आठ पुत्र और उत्पन्न हुए । इससे सुखका साधनभूत ३० । मेरा गार्हस्थ्य - जीवन सर्वथा पूर्ण हो गया ॥ ३० ॥
राजाने समयानुसार उचित रूपसे उनका विवाह कर दिया । इस प्रकार वधुओं तथा पुत्रोंसे युक्त मेरा ३१ परिवार बहुत बड़ा हो गया ॥३१ ॥
फिर मेरे पौत्र उत्पन्न हुए, जो खेलकूदमें मग्न रहते थे तथा अनेक प्रकारकी बालक्रीडाओंसे मेरे ३२ मोहको बढ़ाते रहते थे । कभी सुख - समृद्धि मेरे सामने आती थी और कभी पुत्रोंके रोगग्रस्त होनेके कारण चित्तको अशान्त कर देनेवाला महान् दुःख भोगना
३३ पड़ता था । ३२-३३ ॥
कभी - कभी पुत्रों अथवा वधुओंमें परस्पर अत्यन्त भीषण विरोध हो जाता था, उससे मुझे सन्ताप होने लगता था ॥ ३४ ॥
३४ हे मुनिश्रेष्ठ! संकल्पसे उत्पन्न इस सुख-दुःखात्मक, तुच्छ, भयानक तथा मिथ्या व्यवहारवाले मोहमें मैं निमग्न रहता था ॥ ३५ ॥
३५ मेरा पूर्वकालिक विज्ञान विस्मृत हो गया तथा शास्त्र - ज्ञान भी समाप्त हो गया । स्त्रीभावमें होकर मैं घरके कार्योंमें ही सदा व्यस्त रहता था ॥ ३६ ॥
३६ मेरे ये पुत्र महान् पराक्रमी हैं तथा मेरी ये बहुएँ उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हैं - ऐसा सोचकर मेरे मनमें अति मोह बढ़ानेवाला अहंकार उत्पन्न हो जाया ३७ | करता था ॥ ३७ ॥
पृष्ठ 878
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २ ९ ] षष्ठ स्कन्ध ८६ ९ एते पुत्राः सुसन्नद्धाः क्रीडन्ति मम वेश्मसु धन्याहं खलु नारीणां संसारेऽस्मिन्नहो भृशम् नारदोऽहं भगवता वञ्चितो मायया किल न कदाचिन्मयाप्येवं चिन्तितं मनसा किल राजपत्नी शुभाचारा बहुपुत्रा पतिव्रता धन्याहं किल संसारे कृष्णैवं मोहितस्त्वहम् अथ कश्चिन्नृपः कामं दूरदेशाधिपो महान् अरातिभावमापन्नः पतिना सह मानद कृत्वा सैन्यसमायोगं रथैश्च वारणैर्युतम् आजगाम कान्यकुब्जे पुरे युद्धमचिन्तयत् वेष्टितं नगरं तेन राज्ञा सैन्ययुतेन च मम पुत्राश्च पौत्राश्च निर्गता नगरात्तदा संग्रामस्तुमुलस्तत्र कृतस्तैस्तेन पुत्रकैः हता रणे सुताः सर्वे वैरिणा कालयोगतः राजा भग्नस्तु संग्रामादागतः स्वगृहं पुनः श्रुतं मया मृताः पुत्राः संग्रामे भृशदारुणे स हत्वा मे सुतान्पौत्रान्गतो राजा बलान्वितः क्रन्दमाना ह्यहं तत्र गता समरमण्डले दृष्ट्वा तान्पतितान्पुत्रान्पौत्रांश्च दुःखपीडिता विललापाहमायुष्मञ्छोकसागरसंप्लवे हा पुत्राः क्व गता मेऽद्य हा हतास्मि दुरात्मना दैवेनातिबलिष्ठेन दुर्वारेणातिपापिना एतस्मिन्नन्तरे तत्र भगवान्मधुसूदनः कृत्वा रूपं द्विजस्यागाद् वृद्धः परमशोभनः सुवासा वेदवित्कामं मत्समीपं समागतः मामुवाचातिदीनां स क्रन्दमानां रणाजिरे । मेरे ये बालक पूर्ण तत्पर होकर घरमें खेल रहे ॥ ३८ हैं । अहो, इस संसारमें सभी नारियोंमें मैं अवश्य ही धन्य हूँ ॥३८ ॥
। ' मैं नारद हूँ तथा भगवान्ने अपनी मायाके ॥ ३ ९ प्रभावसे मुझे वंचित कर रखा है ' - ऐसा मैं अपने मनमें कभी सोच भी नहीं पाता था ॥ ३ ९ ॥ । हे व्यासजी! इस प्रकार मायासे मोहित हुआ मैं ॥ ४० केवल यही सोचा करता था कि मैं उत्तम आचरणवाली एक पतिव्रता राजमहिषी हूँ, मेरे बहुतसे पुत्र हैं तथा । इस संसारमें मैं बड़ी धन्य हूँ ॥ ४० ॥
॥ ४१ हे मानद! इसके बाद दूर देशमें रहनेवाले किसी महान् राजाने मेरे पतिके साथ शत्रुता ठान ली । वह । हाथियों तथा रथोंसे अपनी सेना सुसज्जित करके ॥ ४२ कान्यकुब्जनगरमें आ गया और युद्धके विषयमें सोचने लगा ॥ ४१-४२ ॥ । उस राजाने अपनी सेनाके साथ मेरा नगर घेर ॥ ४३ लिया; तब मेरे पुत्र तथा पौत्र भी नगरसे बाहर निकल पड़े ॥४३ ॥
। मेरे उन पुत्र - पौत्रोंने उस राजाके साथ भयंकर ॥ ४४ युद्ध किया । कालयोगसे मेरे सभी पुत्र संग्राममें शत्रुके द्वारा मार डाले गये ॥४४ ॥
। तत्पश्चात् राजा तालध्वज हताश होकर युद्धस्थलसे ॥ ४५ अपने घर आ गये । मैंने सुना कि मेरे सभी पुत्र उस अत्यन्त भीषण संग्राममें मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ ४५ ॥
। मेरे पुत्रों तथा पौत्रोंका संहार करके वह राजा ॥ ४६ सेनासहित चला गया । इसके बाद मैं विलाप करता हुआ युद्ध - भूमिमें जा पहुँचा ॥ ४६ ॥
। हे आयुष्मन्! वहाँ अपने पुत्रों तथा पौत्रोंको ॥ ४७ भूमिपर गिरा हुआ देखकर मैं दुःखसे अत्यन्त पीडित होकर शोक - सागरमें डूब गया तथा इस प्रकार । विलाप करने लगा - हाय, मेरे पुत्र इस समय कहाँ ॥ ४८ चले गये? हाय, मुझे तो इस दुष्टात्मा, अति बलवान्, महापापी तथा दुर्लंघ्य दैवने मार डाला ॥ ४७-४८ ॥ । इसी बीच एक परम सुन्दर वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण ॥ ४ ९ करके मधुसूदन भगवान् विष्णु वहाँ पहुँच गये ॥ ४ ९ ॥। हे वेदज्ञ! सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित वे मेरे पास । आये और युद्धभूमिमें अति विलाप करती हुई मुझ ॥ ५० । अबलासे बोले ॥ ५० ॥
पृष्ठ 879
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८७० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९ ब्राह्मण उवाच
किं विषीदसि तन्वङ्गि भ्रमोऽयं प्रकटीकृतः ।
मोहेन कोकिलालापे पतिपुत्रगृहात्मके ॥ ५१
का त्वं कस्याः सुताः केऽमी चिन्तयात्मगतिं पराम् ।
उत्तिष्ठ रोदनं त्यक्त्वा स्वस्था भव सुलोचने ॥ ५२
स्नानं च तिलदानं च पुत्राणां कुरु कामिनि ।
परलोकगतानां च मर्यादारक्षणाय वै ॥५३
कर्तव्यं सर्वथा तीर्थे स्नानं तु न गृहे क्वचित् ।
मृतानां किल बन्धूनां धर्मशास्त्रविनिर्णयः ॥ ५४
नारद उवाच
इत्युक्त्वा तेन विप्रेण वृद्धेन प्रतिबोधिता ।
उत्थिताहं नृपेणाथ युक्ता बन्धुभिरावृता ॥ ५५
अग्रतो द्विजरूपेण भगवान्भूतभावनः ।
चलिताहं ततस्तूर्णं तीर्थं परमपावनम् ॥ ५६
हरिर्मां कृपया तत्र पुंतीर्थे सरसि प्रभुः ।
नीत्वाह भगवान्विष्णुर्द्विजरूपी जनार्दनः ॥ ५७
स्नानं कुरु तडागेऽस्मिन्पावने गजगामिनि ।
त्यज शोकं क्रियाकालः पुत्राणां च निरर्थकम् ॥ ५८
कोटिशस्ते मृताः पुत्रा जन्मजन्मसमुद्भवाः ।
पितरः पतयश्चैव भ्रातरो जामयस्तथा ॥ ५ ९
केषां दुःखं त्वया कार्यं भ्रमेऽस्मिन्मानसोद्भवे ।
वितथे स्वप्नसदृशे तापदे देहिनामिह ॥ ६०
नारद उवाच
इति तस्य वचः श्रुत्वा तीर्थे पुरुषसंज्ञके ।
प्रविष्टा स्नातुकामाहं प्रेरिता तत्र विष्णुना ॥ ६१
मज्जनादेव तीर्थेषु पुमाञ्जातः क्षणादपि ।
हरिर्वीणां करे कृत्वा स्थितस्तीरे स्वदेहवान् ॥ ६२
उन्मज्ज्य च मया तीरे दृष्टः कमललोचनः ।
प्रत्यभिज्ञा तदा जाता मम चित्ते द्विजोत्तम ॥ ६३
ब्राह्मण बोले- हे तन्वङ्गि! हे पिकालापे! तुम क्यों विषाद कर रही हो? पति - पुत्रादिसे सम्पन्न गृहस्थीमें मोहके कारण ही यह भ्रम उत्पन्न हुआ है । तुम कौन हो, ये किसके पुत्र हैं तथा ये कौन हैं? तुम परम आत्मगतिपर विचार करो । हे सुलोचने! अब उठो और विलाप करना छोड़कर स्वस्थ हो जाओ ॥ ५१-५२ ॥ हे कामिनि! मर्यादाके रक्षणार्थ अब अपने परलोक गये हुए पुत्रोंके निमित्त स्नान तथा तिलदान करो । धर्मशास्त्रका निर्णय है कि मृत बन्धुओंके निमित्त तीर्थमें ही स्नान करना चाहिये; घरमें कभी नहीं ॥ ५३-५४ ॥ नारदजी बोले - – उस वृद्ध ब्राह्मणने इस प्रकार कहकर मुझे समझाया । तत्पश्चात् मैं उठा और बन्धु-बान्धवों तथा राजाको साथ लेकर द्विजरूपधारी भगवान् विष्णुको आगे करके तत्काल परम पवित्र तीर्थके लिये चल पड़ा ॥५५-५६ ॥ ब्राह्मणरूपधारी जनार्दन जगन्नाथ श्रीहरि भगवान् विष्णु मेरे ऊपर कृपा करके पुंतीर्थ सरोवरपर मुझको ले जाकर बोले - हे गजगामिनि! इस पवित्र सरोवरमें स्नान करो और निरर्थक शोकका परित्याग करो । अब पुत्रोंकी [ तिलांजलि आदि ] क्रियाका समय उपस्थित है ॥ ५७-५८ ॥ जन्म - जन्मान्तरमें तुम्हारे करोड़ों पुत्र, पिता, पति, भाई तथा बहन हुए तथा वे मृत्युको भी प्राप्त हो गये । उनमेंसे तुम किस - किसका दुःख मनाओगी? यह तो मनमें उत्पन्न भ्रममात्र है, जो शरीरधारियोंको व्यर्थ ही स्वप्नके समान होकर भी दुःख पहुँचाता
रहता है । ५ ९ -६० ॥
नारदजी बोले - – उनका यह वचन सुनकर भगवान् विष्णुकी प्रेरणा अनुसार स्नान करनेकी इच्छासे मैं उस पुरुषसंज्ञक तीर्थ ( सरोवर ) - में प्रविष्ट हुआ ॥ ६१ ॥
उस तीर्थमें डुबकी लगाते ही मैं तत्क्षण पुरुषरूपमें हो गया तथा भगवान् विष्णु अपने हाथमें मेरी वीणा लिये हुए अपने स्वाभाविक स्वरूपमें सरोवरके तटपर विराजमान थे ॥ ६२ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ! स्नान करनेके पश्चात् मुझे तटपर कमललोचन भगवान्का दर्शन प्राप्त हुआ; तब मेरे । चित्तमें सभी बातोंका स्मरण हो गया ॥६३ ॥
पृष्ठ 880
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३० ]
सञ्चिन्तितं मया तत्र नारदोऽहमिहागतः ।
हरिणा सह स्त्रीभावं प्राप्तो मायाविमोहितः ॥
इति चिन्तापरश्चाहं यदा जातस्तदा हरिः ।
मामाह नारदागच्छ किं करोषि जले स्थितः ॥
विस्मितोऽहं तदा स्मृत्वा स्त्रीभावं दारुणं भृशम् ।
पुनः पुरुषभावश्च सम्पन्नः केन हेतुना ॥
षष्ठ स्कन्ध ८७१ मैं सोचने लगा कि मैं नारद हूँ और भगवान् ६४ विष्णुके साथ यहाँ आया था; मायासे विमोहित होनेके कारण मैं स्त्रीभावको प्राप्त हो गया ॥ ६४ ॥
जब मैं इस तरहकी बातें सोच रहा था, उसी समय भगवान् विष्णुने मुझसे कहा - हे नारद! यहाँ आओ, ६५ वहाँ जल में खड़े होकर क्या कर रहे हो? ॥ ६५ ॥
अपने अत्यन्त दारुण स्त्रीभावका स्मरण करके तथा किस कारणसे मैं पुनः पुरुषभावको प्राप्त हुआ— ६६ । यह सोचकर मैं आश्चर्यचकित हो गया ॥ ६६ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदस्य पुनः स्वरूपप्राप्तिवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ अथ त्रिंशोऽध्यायः राजा तालध्वजका विलाप और ब्राह्मणवेशधारी भगवान् विष्णुके प्रबोधनसे उन्हें वैराग्य होना, भगवान् विष्णुका नारदसे मायाके प्रभावका वर्णन करना नारद उवाच
मां दृष्ट्वा नारदं विप्रं विस्मितोऽसौ महीपतिः ।
क्व गता मम भार्या सा कुतोऽयं मुनिसत्तमः ॥
विललाप नृपस्तत्र हा प्रियेति मुहुर्मुहुः ।
क्व गता मां परित्यज्य विलपन्तं वियोगिनम् ॥
विना त्वां विपुलश्रोणि वृथा मे जीवितं गृहम् ।
राज्यं कमलपत्राक्षि किं करोमि शुचिस्मिते ॥
न प्राणा मे बहिर्यान्ति विरहेण तवाधुना ।
गतो वै प्रीतिधर्मस्तु त्वामृते प्राणधारणात् ॥
विलपामि विशालाक्षि देहि प्रत्युत्तरं प्रियम् ।
क्व गता सा मयि प्रीतिर्याभूत्प्रथमसङ्गमे ॥
निमग्ना किं जले सुभ्रूर्भक्षिता मत्स्यकच्छपैः ।
गृहीता वरुणेनाशु मम दौर्भाग्ययोगतः ॥
धन्या सुचारुसर्वाङ्गि या त्वं पुत्रैः समागता ।
अकृत्रिमस्तु पुत्रेषु स्नेहस्तेऽमृतभाषिणि ॥
नारदजी बोले – मुझ विप्ररूप नारदको देखकर वे राजा तालध्वज इस आश्चर्यमें पड़ गये कि मेरी १ वह पत्नी कहाँ चली गयी और ये मुनिश्रेष्ठ कहाँसे आ गये? ॥१ ॥
राजा तालध्वज बार - बार यह कहकर विलाप २ करने लगे - ' हा प्रिये! मुझ वियोगीको विलाप करता हुआ छोड़कर तुम कहाँ चली गयी? ' ॥ २ ॥
हे विपुलश्रोणि! हे कमलसदृश नेत्रवाली! हे पवित्र मुसकानवाली! तुम्हारे विना मेरा जीवन, घर
३ तथा राज्य- ये सभी व्यर्थ हैं । अब मैं क्या करूँ? ॥३ ॥
तुम्हारे वियोगमें इस समय मेरे प्राण भी नहीं निकल रहे हैं । तुम्हारे विना प्राण धारण करनेसे प्रेम-४ धर्म भी सर्वथा विनष्ट हो गया ॥ ४ ॥
हे विशाल नयनोंवाली! मैं विलाप कर रहा हूँ; तुम मुझे प्रिय उत्तर प्रदान करो । प्रथम - मिलनमें मेरे ५ प्रति जो प्रीति थी, वह कहाँ चली गयी? ॥ ५ ॥
हे सुभ्रु! क्या तुम जलमें डूब गयी? अथवा मछली या कछुए तुम्हें खा गये? या फिर मेरे दुर्भाग्यवश वरुणने तुम्हें शीघ्र ही अपने अधिकारमें कर लिया? ॥६ ॥
हे सर्वांगसुन्दरि! हे अमृतभाषिणि! तुम धन्य हो, जो अपने पुत्रोंके साथ चली गयी; उन पुत्रोंके प्रति ७ तुम्हारा वास्तविक प्रेम था ॥ ७ ॥