देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 1–10
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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॥ श्रीहरिः ॥ 1898 श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण [ द्वितीय खण्ड ] ( सचित्र, सरल हिन्दी - व्याख्यासहित ) गीताप्रेस गोरखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR गीताप्रेस, गोरखपुर
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॥ श्रीहरिः ॥ 1898 महर्षि वेदव्यासप्रणीत श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण [ द्वितीय खण्ड ] ( सचित्र, सरल हिन्दी - व्याख्यासहित ) स्कन्ध ७ से १२ तक त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ गीताप्रेस गोरखपुर 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —1 A
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सं ० २०६७ प्रथम संस्करण १०,००० * मूल्य - १५० रु ० ( एक सौ पचास रुपये ) प्रकाशक एवं मुद्रक -गीताप्रेस, गोरखपुर – २७३००५ ( गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०: फैक्स: ( ०५५१ ) २३३६ ९९ ७ e - mail: booksales@gitapress.org website: www.gitapress.org 18 श्रीमद्वितीयखण्ड
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॥ श्रीहरिः ॥ विषय - सूची अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या अध्याय विषय पृष्ठ संख्या सप्तम स्कन्ध १ - पितामह ब्रह्माकी मानसी सृष्टिका वर्णन, नारदजीका दक्षके पुत्रोंको सन्तानोत्पत्तिसे विरत करना और दक्षका उन्हें शाप देना, दक्षकन्याओंसे देवताओं और दानवोंकी उत्पत्ति. २- सूर्यवंशके वर्णनके प्रसंगमें सुकन्याकी कथा ३ - सुकन्याका च्यवनमुनिके साथ विवाह... ४- सुकन्याकी पतिसेवा तथा वनमें अश्विनी-कुमारोंसे भेंटका वर्णन. ५- अश्विनीकुमारोंका च्यवनमुनिको नेत्र तथा नवयौवनसे सम्पन्न बनाना... ६- राजा शर्यातिके यज्ञमें च्यवनमुनिका अश्विनीकुमारोंको सोमरस देना ७ - क्रुद्ध इन्द्रका विरोध करना; परंतु च्यवनके प्रभावको देखकर शान्त हो जाना, शर्यातिके बाद सूर्यवंशी राजाओंका विवरण...... ८ - राजा रेवतकी कथा ९ - सूर्यवंशी राजाओंके वर्णनके क्रममें राजा ककुत्स्थ, युवनाश्व और मान्धाताकी कथा १० - सूर्यवंशी राजा अरुणद्वारा राजकुमार सत्यव्रतका त्याग, सत्यव्रतका वनमें भगवती जगदम्बाके मन्त्र - जपमें रत होना.......... ११ - भगवती जगदम्बाकी कृपासे सत्यव्रतका राज्याभिषेक और राजा अरुणद्वारा उन्हें नीतिशास्त्रकी शिक्षा देना. १२ - राजा सत्यव्रतको महर्षि वसिष्ठका शाप तथा युवराज हरिश्चन्द्रका राजा बनना. १३ - राजर्षि विश्वामित्रका अपने आश्रममें आना और सत्यव्रतद्वारा किये गये उपकारको जानना ७१ १४- विश्वामित्रका सत्यव्रत ( त्रिशंकु ) - को सशरीर स्वर्ग भेजना, वरुणदेवकी आराधनासे राजा हरिश्चन्द्रको पुत्रकी प्राप्ति... ७६ १५ - प्रतिज्ञा पूर्ण न करनेसे वरुणका क्रुद्ध होना १२ और राजा हरिश्चन्द्रको जलोदरग्रस्त होनेका १८ शाप देना.. ८१ १६ - राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको स्तम्भमें २४ बाँधकर यज्ञ प्रारम्भ करना ८७ १७ - विश्वामित्रका शुनःशेपको वरुणमन्त्र २ ९ देना और उसके जपसे वरुणका प्रकट होकर उसे बन्धनमुक्त तथा राजाको रोग-३५ मुक्त करना, राजा हरिश्चन्द्रकी प्रशंसासे विश्वामित्रका वसिष्ठपर क्रोधित होना.. ९ ३ १८ - विश्वामित्रका माया करके द्वारा ४१ हरिश्चन्द्रके उद्यानको नष्ट कराना ९ ८ ४५ | १ ९ - विश्वामित्रकी कपटपूर्ण बातोंमें आकर राजा हरिश्चन्द्रका राज्यदान करना...... १०३ ५० २० - हरिश्चन्द्रका दक्षिणा देने हेतु स्वयं, रानी और पुत्रको बेचनेके लिये काशी जाना १० ९ २१ - विश्वामित्रका राजा हरिश्चन्द्रसे दक्षिणा ५६ माँगना और रानीका अपनेको विक्रयहेतु प्रस्तुत करना ११३ २२- राजा हरिश्चन्द्रका रानी और राजकुमारका ६१ विक्रय करना और विश्वामित्रको ग्यारह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देना तथा ६५ विश्वामित्रका और अधिक धनके लिये आग्रह करना ११६ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —1 C
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[ ४ ] अध्याय विषय पृष्ठ संख्या अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या २३ - विश्वामित्रका राजा हरिश्चन्द्रको चाण्डाल हाथ बेचकर ऋणमुक्त करना. २४ - चाण्डालका राजा हरिश्चन्द्रको श्मशानघाटमें नियुक्त करना. २५- सर्पदंशसे रोहितकी मृत्यु, रानीका करुण विलाप, पहरेदारोंका रानीको राक्षसी समझकर चाण्डालको सौंपना और चाण्डालका हरिश्चन्द्रको उसके वधकी आज्ञा देना. २६ - रानीका चाण्डालवेशधारी राजा हरिश्चन्द्रसे अनुमति लेकर पुत्रके शवको लाना और करुण विलाप करना, राजाका पत्नी और पुत्रको पहचानकर मूर्च्छित होना और विलाप करना २७ - चिता बनाकर राजाका रोहितको उसपर लिटाना और राजा - रानीका भगवतीका ध्यानकर स्वयं भी पुत्रकी चितामें जल जानेको उद्यत होना, ब्रह्माजीसहित समस्त देवताओंका राजाके पास आना, इन्द्रका अमृत - वर्षा करके रोहितको जीवित करना और राजा - रानीसे स्वर्ग चलनेके लिये आग्रह करना, राजाका सम्पूर्ण अयोध्यावासियोंके साथ स्वर्ग जानेका निश्चय.. २८ - दुर्गम दैत्यकी तपस्या; वर - प्राप्ति तथा अत्याचार, देवताओंका भगवतीकी प्रार्थना करना, भगवतीका शताक्षी और शाकम्भरीरूपमें प्राकट्य, दुर्गमका वध और देवगणोंद्वारा भगवतीकी स्तुति..... २ ९ - व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना और उनसे उन्हींकी आराधना करनेको कहना, भगवान् शंकर और विष्णुके अभिमानको देखकर गौरी न्छ लक्ष्यांक अन्नधान होना और शिव तथा विष्णुक्त शक्तिहीन होना. ३० - शक्तिपीठोंकी उत्पत्तिकी कथा तथा उनके १२१ नाम एवं उनका माहात्म्य. १५७ ३१ - तारकासुरसे पीड़ित देवताओं द्वारा भगवतीकी १२५ स्तुति तथा भगवतीका हिमालयकी पुत्रीके रूपमें प्रकट होनेका आश्वासन देना.... १६५ ३२- देवीगीताके प्रसंग में भगवतीका हिमालयसे माया तथा अपने स्वरूपका वर्णन...... १७२ ३३- भगवतीका अपनी सर्वव्यापकता बताते १२७ हुए विराट्रूप प्रकट करना, भयभीत ३४ -१३५ | ३५-३६ -३७-३८ -१४२ | ३ ९ -देवताओंकी स्तुतिसे प्रसन्न भगवतीका पुनः सौम्यरूप धारण करना. १७७ भगवतीका हिमालय तथा देवताओंसे परमपदकी प्राप्तिका उपाय बताना....... १८२ भगवतीद्वारा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा तथा कुण्डलीजागरणकी विधि बताना..... १८७ भगवतीके द्वारा हिमालयको ज्ञानोपदेश-ब्रह्मस्वरूपका वर्णन. १ ९ २ भगवतीद्वारा अपनी श्रेष्ठ भक्तिका वर्णन. १ ९ ६ भगवतीके द्वारा देवीतीर्थों, व्रतों तथा उत्सवों का वर्णन. २०० देवी - पूजनके विविध प्रकारोंका वर्णन.. २०४ ४०- 2 - देवीकी पूजा - - 1 विधि तथा फलश्रुति २० ९ अष्टम स्कन्ध १ - प्रजाकी सृष्टिके लिये ब्रह्माजीकी प्रेरणासे मनुका देवीकी आराधना करना तथा १४६ देवीका उन्हें वरदान देना.. २१३ २- ब्रह्माजीकी नासिकासे वराहके रूपमें भगवान् श्रीहरिका प्रकट होना और पृथ्वीका उद्धार करना, ब्रह्माजीका उनकी स्तुति करना. २१७ ३ - महाराज मनुकी वंश - परम्पराका वर्णन. २२१ ४- महाराज प्रियव्रतका आख्यान तथा समुद्र १५३ और द्वीपोंकी उत्पत्तिका प्रसंग....... २२३ उसध्या श्रीबटुक महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] - 1 D
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[ ५ ] अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या अध्याय विषय पृष्ठ संख्या ५- भूमण्डलपर स्थित विभिन्न द्वीपों और वर्षों का संक्षिप्त परिचय... ६ - भूमण्डलके विभिन्न पर्वतोंसे निकलने-वाली विभिन्न नदियोंका वर्णन ७ - सुमेरुपर्वतका वर्णन तथा गंगावतरणका आख्यान. ८- इलावृतवर्षमें भगवान् शंकरद्वारा भगवान् श्रीहरिके संकर्षणरूपकी आराधना तथा भद्राश्ववर्षमें भद्रश्रवाद्वारा हयग्रीवरूपकी उपासना ९- हरिवर्षमें प्रह्लादके द्वारा नृसिंहरूपकी आराधना, केतुमालवर्षमें श्रीलक्ष्मीजीके द्वारा कामदेवरूपकी तथा रम्यकवर्षमें मनुजीके द्वारा मत्स्यरूपकी स्तुति-उपासना १० - हिरण्मयवर्षमें अर्यमाके द्वारा कच्छप-रूपकी आराधना, उत्तरकुरुवर्षमें पृथ्वी-द्वारा वाराहरूपकी एवं किम्पुरुषवर्षमें श्रीहनुमान्जीके द्वारा श्रीरामचन्द्ररूपकी स्तुति - उपासना ११ - जम्बूद्वीपस्थित भारतवर्षमें श्रीनारदजीके द्वारा नारायणरूपकी स्तुति - उपासना तथा भारतवर्षकी महिमाका कथन. १२- प्लक्ष, शाल्मलि और कुशद्वीपका वर्णन १३- क्रौंच, शाक और पुष्करद्वीपका वर्णन.. १४ - लोकालोकपर्वतका वर्णन १५ - सूर्यकी गतिका वर्णन.. १६- चन्द्रमा तथा ग्रहोंकी गतिका वर्णन..... १७- शिशुमारचक्र तथा ध्रुवमण्डलका वर्णन १८ - राहुमण्डलका वर्णन १ ९ - अतल, वितल तथा सुतललोकका वर्णन २०- तलातल, महातल, रसातल और पाताल तथा भगवान् अनन्तका वर्णन............. २१ - देवर्षि नारदद्वारा भगवान् अनन्तकी महिमाका २२५ गान तथा नरकोंकी नामावली २७३ २२ - विभिन्न नरकोंका वर्णन २७६ २२८ २३ - नरक प्रदान करनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन. २८० २३० | २४ - देवीकी उपासनाके विविध प्रसंगोंका वर्णन २८३ नवम स्कन्ध १- प्रकृतितत्त्वविमर्श; प्रकृतिके अंश, कला एवं कलांशसे उत्पन्न देवियोंका वर्णन. २८ ९ २३३ २ - परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट चिन्मय देवताओं एवं देवियोंका वर्णन. ३०१ ३ - परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी राधासे प्रकट विराट्रूप बालकका वर्णन......... ३०८ ४ - सरस्वतीकी पूजाका विधान तथा कवच ३१३ २३६ ५ - याज्ञवल्क्यद्वारा भगवती सरस्वतीकी स्तुति ३२१ ६ - लक्ष्मी, सरस्वती तथा गंगाका परस्पर शापवश भारतवर्ष में पधारना ३२४ ७ - भगवान् नारायणका गंगा, लक्ष्मी और सरस्वतीसे उनके शापकी अवधि २४० बताना तथा अपने भक्तोंके महत्त्वका वर्णन करना ३३० ८- कलियुगका वर्णन, परब्रह्म परमात्मा २४३ एवं शक्तिस्वरूपा मूलप्रकृतिकी कृपा से २४७ त्रिदेवों तथा देवियोंके प्रभावका वर्णन २५० और गोलोकमें राधा - कृष्णका दर्शन.... ३३५ २५३ ९ - पृथ्वीकी उत्पत्तिका प्रसंग, ध्यान और २५५ पूजनका प्रकार तथा उनकी स्तुति.. ३४५ २५ ९ | १० - पृथ्वीके प्रति शास्त्र - विपरीत व्यवहार २६२ करनेपर नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन...... ३५१ २६४ | ११ - गंगाकी उत्पत्ति एवं उनका माहात्म्य... ३५४ २६७ १२ - गंगाके ध्यान एवं स्तवनका वर्णन, गोलोक श्रीराधा - कृष्णके अंशसे २७० गंगाके प्रादुर्भावकी कथा ३६०
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[ ६ ] अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या | अध्याय विषय पृष्ठ संख्या १३ - श्रीराधाजीके रोषसे भयभीत गंगाका श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी शरण लेना, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, ब्रह्माजीकी स्तुति से राधाका प्रसन्न होना तथा गंगाका प्रकट होना १४ - गंगा विष्णुपत्नी होनेका प्रसंग. १५- तुलसीके कथा - प्रसंगमें राजा वृषध्वजका चरित्र - वर्णन... १६ - वेदवतीकी कथा, इसी प्रसंगमें भगवान् श्रीरामके चरित्रके एक अंशका कथन, भगवती सीता तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त. १७ - भगवती तुलसीके प्रादुर्भावका प्रसंग..... १८ - तुलसीको स्वप्नमें शंखचूड़का दर्शन, ब्रह्माजीका शंखचूड़ तथा तुलसीको विवाह के लिये आदेश देना.... १ ९ - तुलसीके साथ शंखचूड़का गान्धर्व - विवाह, शंखचूड़से पराजित और निर्वासित देवताओंका ब्रह्मा तथा शंकरजीके साथ वैकुण्ठधाम जाना, श्रीहरिका शंखचूड़के पूर्वजन्मका वृत्तान्त बताना. २०- पुष्पदन्तका शंखचूड़के पास जाकर भगवान् शंकरका सन्देश सुनाना, युद्धकी बात सुनकर तुलसीका सन्तप्त होना और शंखचूड़का उसे ज्ञानोपदेश देना........... २१- शंखचूड़ और भगवान् शंकरका विशद वार्तालाप २२- कुमार कार्तिकेय और भगवती भद्रकालीसे शंखचूड़का भयंकर युद्ध और आकाशवाणीका पाशुपतास्त्रसे शंखचूड़की अवध्यताका कारण बताना २३- भगवान् शंकर और शंखचूड़का युद्ध, भगवान् श्रीहरिका वृद्ध ब्राह्मणके वेशमें उचडने क्रञ्च सौर लेना तथा शंखचुड़का रूप धारणकर तुलसीसे हास - विलास करना, शंखचूड़का भस्म होना और सुदामागोपके रूपमें गोलोक पहुँचना. ४३३ २४ - शंखचूड़रूपधारी श्रीहरिका तुलसीके ३६७ भवनमें जाना, तुलसीका श्रीहरिको पाषाण ३७ ९ होनेका शाप देना, तुलसी- महिमा, शालग्रामके विभिन्न लक्षण एवं माहात्म्यका वर्णन. ४३६ ३८२ | २५- तुलसी - पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसीस्तवनका वर्णन.. ४४५ २६ - सावित्रीदेवीकी पूजा - स्तुतिका विधान... ४४ ९ २७- भगवती सावित्रीकी उपासनासे राजा ३८६ अश्वपतिको सावित्री नामक कन्याकी ३ ९ २ ३ ९ ६ | २८ -२ ९ -३० -४०५ | ३१ -३२ -४१३ | ३३ -प्राप्ति, सत्यवान् के साथ सावित्रीका विवाह, सत्यवान्की मृत्यु, सावित्री और यमराजका संवाद. ४५७ सावित्री - यमराज - संवाद. ४५ ९ सावित्री - धर्मराजके प्रश्नोत्तर और धर्मराजद्वारा सावित्रीको वरदान........... ४६२ दिव्य लोकोंकी प्राप्ति करानेवाले पुण्यकर्मोंका वर्णन ४६८ सावित्रीका यमाष्टकद्वारा धर्मराजका स्तवन. ४७ ९ धर्मराजका सावित्रीको अशुभ कर्मोंके फल बताना. ४८१ विभिन्न नरककुण्डोंमें जानेवाले पापियों तथा उनके पापोंका वर्णन. ४८३ ४१ ९ | ३४ - विभिन्न पापकर्म तथा उनके कारण प्राप्त होनेवाले नरकोंका वर्णन. ४ ९ ५ ३५ - विभिन्न पापकर्मोंसे प्राप्त होनेवाली विभिन्न योनियों का वर्णन. ५०३ ४२७ ३६ - धर्मराजद्वारा सावित्रीसे देवोपासनासे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलोंको कहना ५०८ ३७ - विभिन्न नरककुण्ड तथा वहाँ दी जानेवाली यातनाका वर्णन ५११
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[ ७ ] अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या ३८ - धर्मराजका सावित्रीसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना और उसके पतिको जीवनदान देना. ३ ९- भगवती लक्ष्मीका प्राकट्य, समस्त देवताओंद्वारा उनका पूजन. ४० - दुर्वासाके शापसे इन्द्रका श्रीहीन हो जाना ४१ - ब्रह्माजीका इन्द्र तथा देवताओंको साथ लेकर श्रीहरिके पास जाना, श्रीहरिका उनसे लक्ष्मीके रुष्ट होनेके कारणोंको बताना, समुद्रमन्थन तथा उससे लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव. ४२ - इन्द्रद्वारा भगवती लक्ष्मीका षोडशोपचार-पूजन एवं स्तवन ४३ - भगवती स्वाहाका उपाख्यान. ४४ - भगवती स्वधाका उपाख्यान ४५- भगवती दक्षिणाका उपाख्यान ४६ - भगवती षष्ठीकी महिमाके प्रसंग में राजा प्रियव्रतकी कथा... ४७ - भगवती मंगलचण्डी तथा भगवती मनसाका आख्यान ४८ - भगवती मनसाका पूजन - विधान, मनसापुत्र आस्तीकका जनमेजयके सर्पसत्रमें नागोंकी रक्षा करना, इन्द्रद्वारा मनसादेवीका स्तवन करना ४ ९ - आदि गौ सुरभिदेवीका आख्यान. ५० - भगवती श्रीराधा तथा श्रीदुर्गाके मन्त्र, ध्यान, पूजा - विधान तथा स्तवनका वर्णन दशम स्कन्ध १ - स्वायम्भुव मनुकी उत्पत्ति, उनके द्वारा भगवतीकी आराधना.... २ - देवीद्वारा मनुको वरदान, नारदजीका विन्ध्यपर्वतसे सुमेरुपर्वतकी श्रेष्ठता कहना. ३ - विन्ध्यपर्वतका आकाशतक बढ़कर सूर्यके मार्गको अवरुद्ध कर लेना......... ६११ ५२३ ४- देवताओंका भगवान् शंकरसे विन्ध्य-पर्वतकी वृद्धि रोकनेकी प्रार्थना करना ५३१ और शिवजीका उन्हें भगवान् विष्णुके पास भेजना. ६१४ ५३४ ५ -६ -५४२ ७ -देवताओंका वैकुण्ठलोकमें जाकर भगवान् विष्णुकी स्तुति करना ६१६ भगवान् विष्णुका देवताओंको काशीमें अगस्त्यजीके पास भेजना, देवताओंकी अगस्त्यजीसे प्रार्थना ६१८ अगस्त्यजीकी कृपासे सूर्यका मार्ग खुलना. ६२१ ५४८ ८- स्वारोचिष, उत्तम, तामस और रैवत नामक ५५४ मनुओंका वर्णन. ६२३ ५५ ९ ९ - चाक्षुष मनुकी कथा, उनके द्वारा देवीकी ५६३ आराधनाका वर्णन ६२५ १० - वैवस्वत मनुका भगवतीकी कृपासे ५७१ मन्वन्तराधिप होना, सावर्णि मनुके पूर्वजन्मकी कथा ६२८ ५७८ ११ - सावर्णि मनुके पूर्वजन्मकी कथाके प्रसंगमें मधु - कैटभकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुद्वारा उनके वधका वर्णन. ६३० १२- समस्त देवताओंके तेजसे भगवती ५८२ महिषमर्दिनीका प्राकट्य और उनके द्वारा ५ ९ ५ महिषासुरका वध, शुम्भ - निशुम्भका अत्याचार और देवीद्वारा चण्ड- - मुण्डसहित ५ ९ ८ शुम्भ - निशुम्भका वध ६३४ १३ - मनुपुत्रोंकी तपस्या, भगवतीका उन्हें मन्वन्तराधिपति होनेका वरदान देना, ६०७ दैत्यराज अरुणकी तपस्या और ब्रह्माजीका वरदान, देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति और भगवतीका भ्रामरीके रूपमें अवतार ६० ९ लेकर अरुणका वध करना ६४१
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[ 6 ] अध्याय विषय पृष्ठ- संख्या अध्याय विषय पृष्ठ - संख्या - एकादश स्कन्ध १ - भगवान् नारायणका नारदजीसे देवीको प्रसन्न करनेवाले सदाचारका वर्णन २ - शौचाचारका वर्णन.. ३ - सदाचार - वर्णन और रुद्राक्ष धारणका माहात्म्य. ४- रुद्राक्षकी उत्पत्ति तथा उसके विभिन्न स्वरूपों का वर्णन ५ - जपमालाका स्वरूप तथा रुद्राक्ष-धारणका विधान.. ६- रुद्राक्षधारणकी महिमाके सन्दर्भमें गुणनिधिका उपाख्यान. ७- विभिन्न प्रकारके रुद्राक्ष और उनके अधिदेवता. ८-: - भूतशुद्धि. ९ - भस्म - धारण ( शिरोव्रत ) १०- भस्म - धारणकी विधि ११ - भस्मके प्रकार. १२- भस्म न धारण करनेपर दोष. १३ - भस्म तथा त्रिपुण्ड्र - धारणका माहात्म्य १४ - भस्मस्नानका महत्त्व १५ - भस्म - माहात्म्यके सम्बन्धमें दुर्वासामुनि और कुम्भीपाकस्थ जीवोंका आख्यान, ऊर्ध्वपुण्ड्रका माहात्म्य १६ - सन्ध्योपासना तथा उसका माहात्म्य. १७- गायत्री - महिमा १८- भगवतीकी पूजा - विधिका वर्णन, अन्नपूर्णा-देवीके माहात्म्यमें राजा बृहद्रथका आख्यान. १ ९ - मध्याह्नसन्ध्या तथा गायत्रीजपका फल. + २० - तर्पण तथा सायंसन्ध्याका वर्णन २१ - गायत्रीपुरश्चरण और उसका फल....... २२ - बलिवैश्वदेव और प्राणाग्निहोत्रकी विधि २३- कृच्छ्रचान्द्रायण, प्राजापत्य आदि व्रतोंका वर्णन. २४ - कामना - सिद्धि और उपद्रव - शान्तिके लिये गायत्रीके विविध प्रयोग. ७५७ ६५३ द्वादश स्कन्ध ६५८ १ - गायत्री जपका माहात्म्य तथा गायत्रीके चौबीस वर्णोंके ऋषि, छन्द आदिका ६६२ वर्णन. ७६७ २ - गायत्रीके चौबीस वर्णोंकी शक्तियों, ६६६ रंगों एवं मुद्राओंका वर्णन. ७६ ९ ३ - श्रीगायत्रीका ध्यान और गायत्रीकवचका ६६ ९ वर्णन. ७७० ४ - गायत्रीहृदय तथा उसका अंगन्यास. ७७२ ६७३ ५- गायत्रीस्तोत्र तथा उसके पाठका फल.. ७७४ ६ - गायत्रीसहस्रनामस्तोत्र तथा उसके ६७७ पाठका फल. ७७६ ६८१ ७- दीक्षाविधि. ८०० ६८३ ८ - देवताओंका विजयगर्व तथा भगवती ६८७ उमाद्वारा उसका भंजन, भगवती उमाका ६ ९ ० इन्द्रको दर्शन देकर ज्ञानोपदेश देना... ८१३ ६ ९ ३ ९ - भगवती गायत्रीकी कृपासे गौतमके द्वारा ६ ९ ७ अनेक ब्राह्मण - परिवारोंकी रक्षा, ब्राह्मणोंकी ७०० कृतघ्नता और गौतमके द्वारा ब्राह्मणोंको घोर शाप - प्रदान ८२० १० - मणिद्वीपका वर्णन ८२ ९ ७०६ ११ - मणिद्वीप रत्नमय नौ प्राकारोंका वर्णन ८३७ ७१६ | १२ -७२६ १३-७३० | १४ -७३६ | १५ -७३८ | १६ -७४२ १७ -७४७ १८ -१ ९ -७५१ | २० -भगवती जगदम्बाके मण्डपका वर्णन तथा मणिद्वीपकी महिमा.. ८४५ राजा जनमेजयद्वारा अम्बायज्ञ और श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणका माहात्म्य.. ८५१ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणकी महिमा...... ८५४ श्रीदुर्गायन्त्रम् [ रेखाचित्र ] ८५७ श्रीगायत्रीयन्त्रम् ( क ) [ रेखाचित्र ]. ८५८ श्रीगायत्रीयन्त्रम् ( ख ) [ रेखाचित्र ] ८५ ९ सप्तश्लोकी दुर्गा. ८६० देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्. ८६१ श्रीदुर्गाजीकी आरती ८६४
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॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण [ उत्तरार्ध सप्तमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः पितामह ब्रह्माकी मानसी सृष्टिका वर्णन, नारदजीका दक्षके पुत्रोंको सन्तानोत्पत्तिसे विरत करना और दक्षका उन्हें शाप देना, दक्षकन्याओंसे देवताओं और दानवोंकी उत्पत्ति सूत उवाच
श्रुत्वैतां तापसाद्दिव्यां कथां राजा मुदान्वितः ।
व्यासं पप्रच्छ धर्मात्मा परीक्षितसुतः पुनः ॥ १
जनमेजय उवाच
स्वामिन् सूर्यान्वयानां च राज्ञां वंशस्य विस्तरम् ।
तथा सोमान्वयानां च श्रोतुकामोऽस्मि सर्वथा ॥ २
कथयानघ सर्वज्ञ कथां पापप्रणाशिनीम् ।
चरितं भूपतीनां च विस्तराद्वंशयोर्द्वयोः ॥ ३
ते हि सर्वे पराशक्तिभक्ता इति मया श्रुतम् ।
देवीभक्तस्य चरितं शृण्वन्कोऽस्ति विरक्तिभाक् ॥ ४
इति राजर्षिणा पृष्टो व्यासः सत्यवतीसुतः ।
तमुवाच मुनिश्रेष्ठः प्रसन्नवदनो मुनिः ॥ ५
व्यास उवाच
निशामय महाराज विस्तराद् गदतो मम ।
सोमसूर्यान्वयानां च तथान्येषां समुद्भवम् ॥ ६
विष्णोर्नाभिसरोजाद्वै ब्रह्माभूच्चतुराननः ।
तपस्तप्त्वा समाराध्य महादेवीं सुदुर्गमाम् ॥ ७
तया दत्तवरो धाता जगत्कर्तुं समुद्यतः ।
नाशकन्मानुषीं सृष्टिं कर्तुं लोकपितामहः ॥ ८
सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] तपस्वी व्यासजीसे यह दिव्य कथा सुनकर परीक्षित्के पुत्र धर्मात्मा राजा । जनमेजयने प्रसन्नतापूर्वक पुनः व्यासजीसे पूछा ॥ १ ॥
जनमेजय बोले- हे स्वामिन्! मैं सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी राजाओंके वंशका विस्तृत वर्णन सम्यक् प्रकारसे सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
हे पुण्यात्मन्! हे सर्वज्ञ! आप उन राजाओंके चरित्र तथा उनके दोनों वंशोंसे सम्बन्धित उस पापनाशिनी कथाका विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
मैंने ऐसा सुना है कि वे सभी पराशक्ति जगदम्बाके महान् भक्त थे; अतः देवीभक्तका चरित्र सुननेसे भला कौन विमुख होना चाहेगा? ॥ ४ ॥
राजर्षि जनमेजयके ऐसा पूछनेपर प्रसन्न मुखमण्डलवाले सत्यवतीनन्दन मुनि व्यासने उनसे कहा ॥ ५ ॥
व्यासजी बोले – हे महाराज! अब मैं सूर्यवंश, चन्द्रवंश तथा अन्य वंशोंकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित कथाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ, आप सुनिये ॥६ ॥
भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे चार मुखवाले ब्रह्माजी उत्पन्न हुए । उन्होंने घोर तपस्या करके अत्यन्त कठिनतापूर्वक प्राप्त होनेवाली महादेवीकी आराधना की ॥ ७ ॥
उन भगवतीसे वरदान प्राप्त करके ब्रह्माजी जगत्की रचना करनेमें प्रवृत्त हुए, किंतु लोकपितामह । ब्रह्माजी मानवी सृष्टि कर पाने में सफल नहीं हुए ॥ ८ ॥