देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 121–130
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
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११२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० सूत उवाच
राजानं व्याकुलं दीनं चिन्तयानमधोमुखम् ।
प्रत्युवाच तदा पत्नी बाष्पगद्गदया गिरा ॥
त्यज चिन्तां महाराज स्वधर्ममनुपालय ।
प्रेतवद्वर्जनीयो हि नरः सत्यबहिष्कृतः ॥
नातः परतरं धर्मं वदन्ति पुरुषस्य च ।
यादृशं पुरुषव्याघ्र स्वसत्यस्यानुपालनम् ॥
अग्निहोत्रमधीतं च दानाद्याः सकलाः क्रियाः ।
भवन्ति तस्य वैफल्यं वाक्यं यस्यानृतं भवेत् ॥
सत्यमत्यन्तमुदितं धर्मशास्त्रेषु धीमताम् ।
तारणायानृतं तद्वत्पातनायाकृतात्मनाम् ॥
शताश्वमेधानादृत्य राजसूयं च पार्थिवः ।
कृत्वा राजा सकृत्स्वर्गादसत्यवचनाच्च्युतः ॥
राजोवाच
वंशवृद्धिकरश्चायं पुत्रस्तिष्ठति बालकः ।
उच्यतां वक्तुकामासि यद्वाक्यं गजगामिनि ॥
पल्युवाच
राजन् माभूदसत्यं ते पुंसां पुत्रफलाः स्त्रियः ।
तन्मां प्रदाय वित्तेन देहि विप्राय दक्षिणाम् ॥
व्यास उवाच
एतद्वाक्यमुपश्रुत्य ययौ मोहं महीपतिः ।
प्रतिलभ्य च संज्ञां वै विललापातिदुःखितः ॥
महद्दुःखमिदं भद्रे यत्त्वमेवं ब्रवीषि मे ।
किं तव स्मितसंल्लापा मम पापस्य विस्मृताः ॥
हा हा त्वया कथं योग्यं वक्तुमेतच्छुचिस्मिते ।
दुर्वाच्यमेतद्वचनं कथं वदसि भामिनि ॥
सूतजी बोले- उस समय व्याकुल होकर नीचेकी ओर मुख करके ऐसा सोचते हुए दयनीय दशाको २८ प्राप्त राजा हरिश्चन्द्रसे उनकी पत्नी अश्रुके कारण रुँधे कंठसे गद्गद वाणीमें कहने लगीं - ॥२८ ॥
हे महाराज! आप चिन्ता छोड़िये और अपने २ ९ धर्मका पालन कीजिये; क्योंकि सत्यसे बहिष्कृत मनुष्य प्रेतके समान त्याज्य है ॥२ ९ ॥ हे पुरुषव्याघ्र! अपने सत्य वचनका अनुपालनरूप ३० जो धर्म है, उससे बढ़कर दूसरा कोई अन्य धर्म मनुष्यके लिये नहीं कहा गया है ॥ ३० ॥
जिस व्यक्तिका वचन मिथ्या हो जाय, उसके ३१ अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, दान आदि सभी कृत्य निष्फल हो जाते हैं ॥३१ ॥
जिस प्रकार धर्मशास्त्रोंमें पुण्यात्माओंके उद्धारके लिये सत्यपालनको विशेष कारण बताया गया है, ३२ उसी प्रकार दुराचारियोंके पतनके लिये मिथ्याको परम हेतु कहा गया है ॥ ३२ ॥
३३ सैकड़ों अश्वमेध तथा राजसूययज्ञ आदरपूर्वक करके भी मात्र एक बार मिथ्या बोल देनेके कारण एक राजाको स्वर्गसे च्युत हो जाना पड़ा था ॥ ३३ ॥
राजा बोले – - हे गजगामिनि! वंशकी वृद्धि करनेवाला यह बालक पुत्र तो विद्यमान है ही, अतः ३४ तुम जो भी बात कहना चाहती हो, उसे कहो; मैं उसे माननेके लिये तैयार हूँ ॥३४ ॥
पत्नी बोली- हे राजन्! आपकी वाणी असत्य नहीं होनी चाहिये । स्त्रियाँ पुत्रप्रसव कर देनेपर सफल ३५ हो जाती हैं, अतः आप मुझे बेचकर उस धनसे विप्रकी दक्षिणा चुका दें ॥ ३५ ॥
व्यासजी बोले - [ हे राजा जनमेजय! ] पत्नीकी यह बात सुनकर राजा मूच्छित हो गये, पुनः चेतनामें ३६ | आनेके बाद वे बहुत दुःखी होकर इस प्रकार विलाप करने लगे – हे भद्रे! यह मेरे लिये महान् दुःखप्रद है, जो तुम मुझसे ऐसा बोल रही हो । क्या तुम्हारे ३७ मुसकानयुक्त वचन मुझ पापीको विस्मृत हो गये हैं? हे शुचिस्मिते! ऐसा बोलना तुम्हारे लिये भला कैसे ठीक है? हे भामिनि! इस प्रकारकी अप्रिय बात तुम ३८ | क्यों बोल रही हो? || ३६–३८ ॥
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अ ० २१ ] सप्तम
इत्युक्त्वा नृपतिश्रेष्ठो न धीरो दारविक्रये ।
निपपात महीपृष्ठे मूर्च्छयातिपरिप्लुतः ॥ ३ ९
शयानं भुवि तं दृष्ट्वा मूर्च्छयापि महीपतिम् ।
उवाचेदं सुकरुणं राजपुत्री सुदुःखिता ॥ ४०
हा महाराज कस्येदमपध्यानादुपागतम् ।
यस्त्वं निपतितो भूमौ रङ्कवच्छरणोचितः ॥ ४१
येनैव कोटिशो वित्तं विप्राणामपवर्जितम् ।
स एव पृथिवीनाथो भुवि स्वपिति मे पतिः ॥ ४२
हा कष्टं किं तवानेन कृतं दैव महीक्षिता ।
यदिन्द्रोपेन्द्रतुल्योऽयं नीतः पापामिमां दशाम् ॥ ४३
इत्युक्त्वा सापि सुश्रोणी मूच्छिता निपपात ह ।
भर्तुर्दुःखमहाभारेणासह्येनातिपीडिता ॥ ४४
शिशुर्दृष्ट्वा क्षुधाविष्टः प्राह वाक्यं सुदुःखितः ।
तात तात प्रदेह्यन्नं मातर्मे देहि भोजनम् ॥ ४५
क्षुन् बलवती जाता जिह्वाग्रे मेऽतिशुष्यति ॥ ४६
स्कन्ध ११३ स्त्रीविक्रयकी बातसे अधीरताको प्राप्त नृपतिश्रेष्ठ महाराज हरिश्चन्द्र यह कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े और मूर्च्छासे अत्यधिक व्याकुल हो गये ॥ ३ ९ ॥ राजाको मूर्च्छाके कारण भूमिपर पड़ा हुआ देखकर राजपुत्री अत्यन्त दुःखित हो गयीं और वे उनसे परम करुणामय वचन कहने लगीं - हे महाराज! किसके अनिष्टचिन्तनसे यह संकट आ पड़ा है, जिसके परिणामस्वरूप शरणदाता होते हुए भी आप दरिद्रकी भाँति पृथ्वीपर पड़े हैं । जिन्होंने करोड़ोंकी सम्पत्ति ब्राह्मणोंको दान कर दी, वे ही पृथ्वीनाथ मेरे पति आज पृथ्वीपर सो रहे हैं । हाय, महान् कष्ट है । हे दैव! इन महाराजने आपका क्या कर दिया, जिसके कारण आपने इन्द्र तथा उपेन्द्रकी तुलना करनेवाले इन नरेशको इस पापमयी दशामें पहुँचा दिया है ॥ ४०–४३ ॥ ऐसा कहकर अपने स्वामीके असहनीय महान् दुःखके भारसे अत्यधिक सन्तप्त वे सुन्दर कटिप्रदेशवाली रानी भी मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥४४ ॥
उस समय क्षुधासे पीड़ित बालक रोहित यह देखकर अत्यन्त दुःखित होकर यह वचन कहने लगा- हे तात! हे तात! मुझे अन्न दीजिये, हे माता! मुझे भोजन दीजिये । इस समय मुझे अत्यधिक भूख लगी है और मेरी जिह्वाका अग्रभाग तेजीसे सूखा जा रहा है ॥ ४५-४६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हरिश्चन्द्रोपाख्यानवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः विश्वामित्रका राजा हरिश्चन्द्रसे दक्षिणा माँगना और रानीका अपनेको विक्रयहेतु प्रस्तुत करना सूत उवाच
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो विश्वामित्रो महातपाः ।
अन्तकेन समः क्रुद्धो धनं स्वं याचितुं हृदा ॥ १
तमालोक्य हरिश्चन्द्रः पपात भुवि मूर्च्छितः ।
स वारिणा तमभ्युक्ष्य राजानमिदमब्रवीत् ॥ २
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजेन्द्र स्वां ददस्वेष्टदक्षिणाम् ।
ऋणं धारयतां दुःखमहन्यहनि वर्धते ॥ ३ ।
सूतजी बोले- इतनेमें यमराजके समान क्रोधयुक्त महान् तपस्वी विश्वामित्र मनमें संकल्पित अपना दक्षिणा - सम्बन्धी धन माँगनेके लिये वहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥
उन्हें देखते ही हरिश्चन्द्र मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । विश्वामित्रने जलके छींटे देकर राजासे यह वचन कहा — हे राजेन्द्र! उठिये, उठिये और अपनी अभीष्ट दक्षिणा दीजिये । ऋण धारण करनेवालों का दुःख दिन - प्रतिदिन बढ़ता ही रहता है॥२-३ ॥
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११४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१
आप्यायमानः स तदा हिमशीतेन वारिणा ।
अवाप्य चेतनां राजा विश्वामित्रमवेक्ष्य च ॥
पुनर्मोहं समापेदे ह्यथ क्रोधं ययौ मुनिः ।
समाश्वास्य च राजानं वाक्यमाह द्विजोत्तमः ॥
विश्वामित्र उवाच
दीयतां दक्षिणा सा मे यदि धैर्यमवेक्षसे ।
सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी ॥
सत्ये प्रोक्तः परो धर्मः स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः ।
अश्वमेधसहस्त्रं तु सत्यं च तुलया धृतम् ॥
अश्वमेधसहस्त्राद्धि सत्यमेकं विशिष्यते ।
अथवा किं ममैतेन प्रोक्तेनास्ति प्रयोजनम् ॥
मदीयां दक्षिणां राजन्न दास्यति भवान्यदि ।
अस्ताचलगते ह्यर्के शप्स्यामि त्वामतो ध्रुवम् ॥
इत्युक्त्वा स ययौ विप्रो राजा चासीद्भयातुरः ।
दुःखीभूतोऽवनौ निःस्वो नृशंसमुनिनार्दितः ॥
सूत उवाच
एतस्मिन्नन्तरे तत्र ब्राह्मणो वेदपारगः ।
ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्धं निर्ययौ स्वगृहाद् बहिः ॥
ततो राज्ञी तु तं दृष्ट्वा आयान्तं तापसं स्थितम् ।
उवाच वाक्यं राजानं धर्मार्थसहितं तदा ॥
त्रयाणामपि वर्णानां पिता ब्राह्मण उच्यते ।
पितृद्रव्यं हि पुत्रेण ग्रहीतव्यं न संशयः ॥
तस्मादयं प्रार्थनीयो धनार्थमिति मे मतिः । राजोवाच नाहं प्रतिग्रहं काङ्क्षे क्षत्रियोऽहं सुमध्यमे ॥
याचनं खलु विप्राणां क्षत्रियाणां न विद्यते ।
गुरुर्हि विप्रो वर्णानां पूजनीयोऽस्ति सर्वदा ॥।
तस्माद् गुरुर्न याच्यः स्यात्क्षत्रियाणां विशेषतः । तत्पश्चात् बर्फतुल्य शीतल जलके छींटेसे ४ आप्यायित होकर राजा चेतनामें आ गये, किंतु विश्वामित्रको देखते ही वे पुनः मूच्छित हो गये । इससे मुनि कुपित हो उठे और राजा ५ हरिश्चन्द्रको आश्वासन देते हुए द्विजश्रेष्ठ विश्वामित्र कहने लगे - ॥ ४-५ ॥ विश्वामित्र बोले- यदि आपको धैर्य अभीष्ट है तो मेरी वह दक्षिणा दे दीजिये । सत्यसे ही सूर्य ६ तपता है और सत्यपर ही पृथ्वी टिकी हुई है । परमधर्मको भी सत्यमें स्थित कहा गया है और ७ स्वर्गकी प्रतिष्ठा भी सत्यसे ही है । यदि एक हजार अश्वमेधयज्ञ और सत्य तुलापर रखे जायँ तो सत्य उन हजार अश्वमेधयज्ञोंसे बढ़ जायगा । ८ कहने से क्या प्रयोजन? हे राजन्! दक्षिणा नहीं दे देते तो सूर्यास्त होते निश्चितरूपसे शाप दे दूँगा ॥६ – ९ ऐसा कहकर वे विप्र विश्वामित्र राजा हरिश्चन्द्र भयसे व्याकुल हो उठे १० मुनिके द्वारा पीड़ित वे निर्धन राजा पृथ्वीपर बैठ गये ॥ १० ॥
मेरे यह सब यदि आप मेरी ही मैं आपको ॥ चले गये । इधर और उन नृशंस दुःखित होकर सूतजी बोले- इसी बीच एक वेदपारंगत विद्वान् ब्राह्मण अनेक ब्राह्मणोंके साथ अपने घरसे ११ बाहर निकले । तत्पश्चात् वहाँ आकर रुके हुए उन तपस्वी ब्राह्मणको देखकर रानीने राजासे धर्म और अर्थसे युक्त वचन कहा - ब्राह्मण तीनों वर्णोंका पिता १२ कहा जाता है । पुत्रके द्वारा पितासे धन लिया जा सकता है, इसमें सन्देह नहीं है । अतः मेरी तो यह १३ सम्मति है कि इस ब्राह्मणसे धनके लिये प्रार्थना की जाय ॥ ११–१३३ ॥ राजा बोले – हे सुमध्यमे! मैं क्षत्रिय हूँ, इसलिये किसीसे दान लेनेकी इच्छा नहीं कर १४ सकता । याचना करना ब्राह्मणोंका कार्य है, क्षत्रियोंका नहीं । ब्राह्मण चारों वर्णोंका गुरु है और सर्वदा पूजनीय है । इसलिये गुरुसे याचना नहीं करनी चाहिये १५ और क्षत्रियोंको विशेषरूपसे इसका पालन करना चाहिये ॥ १४-१५३ ॥
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अ ० २१ ] यजनाध्ययनं दानं क्षत्रियस्य विधीयते ॥
शरणागतानामभयं प्रजानां प्रतिपालनम् ।
न चाप्येवं तु वक्तव्यं देहीति कृपणं वचः ॥
ददामीत्येव मे देवि हृदये निहितं वचः ।
अर्जितं कुत्रचिद् द्रव्यं ब्राह्मणाय ददाम्यहम् ॥
पत्त्युवाच
कालः समविषमकरः परिभवसम्मानमानदः कालः ।
कालः करोति पुरुषं दातारं याचितारं च ॥
विप्रेण विदुषा राजा क्रुद्धेनातिबलीयसा ।
राज्यान्निरस्तः सौख्याच्च पश्य कालस्य चेष्टितम् ॥
राजोवाच
असिना तीक्ष्णधारेण वरं जिह्वा द्विधा कृता ।
न तु मानं परित्यज्य देहि देहीति भाषितम् ॥
क्षत्रियोऽहं महाभागे न याचे किञ्चिदप्यहम् ।
ददामि वाहं नित्यं हि भुजवीर्यार्जितं धनम् ॥
पत्युवाच यदि ते हि महाराज याचितुं न क्षमं मनः । अहं तु न्यायतो दत्ता देवैरपि सवासवैः अहं शास्या च पत्या च रक्ष्या चैव महाद्युते । मन्मौल्यं संगृहीत्वाथ गुर्वर्थं सम्प्रदीयताम् एतद्वाक्यमुपश्रुत्य हरिश्चन्द्रो महीपतिः । कष्टं कष्टमिति प्रोच्य विललापातिदुःखितः भार्या च भूयः प्राहेदं क्रियतां वचनं मम विप्रशापाग्निदग्धत्वान्नीचत्वमुपयास्यसि सप्तम स्कन्ध ११५ १६ यज्ञ करना, अध्ययन करना, दान देना, शरणमें आये हुए लोगोंको अभय देना और प्रजाओंका पालन करना - ये ही कर्म क्षत्रियोंके लिये विहित हैं । ' मुझे कुछ दीजिये ' - ऐसा दीन वचन क्षत्रियको १७ नहीं बोलना चाहिये । हे देवि! ' देता हूँ ' – ऐसा वचन मेरे हृदयमें सदा विद्यमान रहता है । अतः मैं कहीं से भी धन अर्जित करके उस ब्राह्मणको १८ दूँगा ॥ १६–१८ ॥ पत्नीने कहा- कालके प्रभावसे सम और विषम परिस्थितियाँ आया ही करती हैं । काल ही मनुष्यको सम्मान तथा अपमान प्रदान करता है । १ ९ यह काल ही मनुष्यको दाता तथा याचक बना देता है ॥ १ ९ ॥ एक विद्वान्, शक्तिशाली तथा कुपित ब्राह्मणने २० राजाको सौख्य तथा राज्यसे च्युत कर दिया, कालकी यह विचित्र गति तो देखिये ॥ २० ॥
राजा बोले- तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे जीभके दो टुकड़े हो जाना ठीक है, किंतु सम्मानका त्याग करके ' दीजिये - दीजिये ' - ऐसा कहना ठीक २१ नहीं है ॥ २१ ॥
हे महाभागे! मैं क्षत्रिय हूँ, अतः किसीसे कुछ भी माँग नहीं सकता, अपितु अपने बाहुबलसे अर्जित २२ धनका नित्य दान करता हूँ ॥ २२ ॥
पत्नीने कहा- हे महाराज! यदि आपका मन याचना करनेमें समर्थ नहीं है तो इन्द्रसहित सभी देवताओंने न्यायपूर्वक मुझे आपको सौंपा है ॥ २३ और आपने स्वामी बनकर मुझ आज्ञाकारिणी पत्नीकी सदा रक्षा की है । अतएव हे महाद्युते! आप मेरा मूल्य लेकर गुरु विश्वामित्रकी दक्षिणा चुका दीजिये ॥ २३-२४ ॥ ॥ २४ पत्नीकी यह बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र ' महान् कष्ट है, महान् कष्ट है ' – ऐसा कहकर अत्यन्त दुःखित हो विलाप करने लगे ॥ २५ ॥
॥ २५ तब उनकी धर्मपत्नीने पुनः कहा- ' आप मेरी यह बात मान लीजिये । अन्यथा विप्रके । शापरूपी अग्निसे दग्ध हो जानेपर आपको नीचयोनिमें ॥ २६ पहुँचना पड़ेगा । न तो द्यूतक्रीडाके लिये, न मदिरापानके
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११६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ न द्यूतहेतोर्न च मद्यहेतो- लिये, न राज्यके निमित्त और न तो भोग - विलासके र्न राज्यहेतोर्न च भोगहेतोः । लिये ही आप ऐसा करेंगे । अतः मेरे मूल्यसे गुरुकी ददस्व मया त्वं दक्षिणा चुका दीजिये और अपने सत्यरूपी व्रतको
सत्यव्रतत्त्वं सफलं कुरुष्व ॥ २७ । सफल बनाइये ॥ २६-२७ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हरिश्चन्द्रोपाख्यानवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
अथ द्वाविंशोऽध्यायः राजा हरिश्चन्द्रका रानी और राजकुमारका विक्रय करना और विश्वामित्रको ग्यारह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देना तथा विश्वामित्रका और अधिक धनके लिये आग्रह करना व्यास उवाच
स तया नोद्यमानस्तु राजा पल्या पुनः पुनः ।
प्राह भद्रे करोम्येष विक्रयं ते सुनिर्घृणः ॥
नृशंसैरपि यत्कर्तुं न शक्यं तत्करोम्यहम् ।
यदि ते भ्राजते वाणी वक्तुमीदृक्सुनिष्ठुरम् ॥
एवमुक्त्वा ततो राजा गत्वा नगरमातुरः ।
अवतार्य तदा रङ्गे तां भार्यां नृपसत्तमः ॥
बाष्पगद्गदकण्ठस्तु ततो वचनमब्रवीत् ।
भो भो नागरिकाः सर्वे शृणुध्वं वचनं मम ॥
कस्यचिद्यदि कार्यं स्याद्दास्या प्राणेष्टया मम ।
स ब्रवीतु त्वरायुक्तो यावत्स्वं धारयाम्यहम् ॥
तेऽब्रुवन्पण्डिताः कस्त्वं पत्नीं विक्रेतुमागतः । राजोवाच किं मां पृच्छथ कस्त्वं भो नृशंसोऽहममानुषः ॥ राक्षसो वास्मि कठिनस्ततः पापं करोम्यहम् । व्यास उवाच तं शब्दं सहसा श्रुत्वा कौशिको विप्ररूपधृक् ॥
वृद्धरूपं समास्थाय हरिश्चन्द्रमभाषत ।
समर्पयस्व मे दासीमहं क्रेता धनप्रदः ॥
व्यासजी बोले - हे राजन्! अपनी धर्मपत्नीके द्वारा बार - बार प्रेरित किये जानेपर राजा हरिश्चन्द्रने १ कहा - हे भद्रे! मैं अत्यन्त निष्ठुर होकर तुम्हारे विक्रयकी बात स्वीकार करता हूँ । यदि तुम्हारी वाणी ऐसा निष्ठुर वचन बोलनेके लिये तत्पर है तो जिस कामको महान् - से - महान् क्रूर भी नहीं कर सकते, उसे मैं करूँगा॥१-२ ॥ ऐसा कहकर नृपश्रेष्ठ राजा हरिश्चन्द्र शीघ्रतापूर्वक नगरमें गये और वहाँ नाटक आदि दिखाये जानेवाले ३ स्थानपर अपनी भार्याको प्रस्तुत करके आँसुओंसे रुँधे हुए कण्ठसे उन्होंने कहा - हे नगरवासियो! आपलोग ४ ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनिये | आपलोगोंमेंसे किसीको भी यदि मेरी इस प्राणप्रिया भार्यासे दासीका काम लेने की आवश्यकता हो तो वह शीघ्र बोले । मैं जितना धन चाहता हूँ, उतनेमें कोई भी इसे खरीद ले । इसपर ५ वहाँ उपस्थित बहुतसे विद्वान् पुरुषोंने पूछा- ' अपनी पत्नीका विक्रय करनेके लिये यहाँ आये हुए तुम कौन हो? ' ॥ ३–५३ ॥ राजा बोले- आपलोग मुझसे यह क्यों पूछते ६ हैं – ' तुम कौन हो? ' मैं मनुष्य नहीं; बल्कि महान् क्रूर हूँ, अथवा यह समझिये कि एक भयानक राक्षस हूँ, तभी तो ऐसा पाप कर रहा हूँ ॥ ६३ ॥
व्यासजी बोले- उस शब्दको सुनकर विश्वामित्र ७ एक वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके राजा हरिश्चन्द्रके सामने अचानक आ गये और बोले- मैं धन देकर इस दासीको खरीदनेके लिये तत्पर हूँ, अतः इसे मुझे दे ८ दीजिये ॥ ७-८ ॥
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अ ० २२ ] सप्तम
अस्ति मे वित्तमतुलं सुकुमारी च मे प्रिया ।
गृहकर्म न शक्नोति कर्तुमस्मात्प्रयच्छ मे ॥ ९
अहं गृह्णामि दासीं तु कति दास्यामि ते धनम् ।
एवमुक्ते तु विप्रेण हरिश्चन्द्रस्य भूपतेः ॥ १०
विदीर्णं तु मनो दुःखान्न चैनं किञ्चिदब्रवीत् । विप्र उवाच कर्मणश्च वयोरूपशीलानां तव योषितः ॥ ११
अनुरूपमिदं वित्तं गृहाणार्पय मेऽबलाम् ।
धर्मशास्त्रेषु यद् दृष्टं स्त्रियो मौल्यं नरस्य च ॥ १२
द्वात्रिंशल्लक्षणोपेता दक्षा शीलगुणान्विता ।
कोटिमौल्यं सुवर्णस्य स्त्रियः पुंसस्तथार्बुदम् ॥ १३
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य हरिश्चन्द्रो महीपतिः ।
दुःखेन महताविष्टो न चैनं किञ्चिदब्रवीत् ॥ १४
ततः स विप्रो नृपतेः पुरतो वल्कलोपरि ।
धनं निधाय केशेषु धृत्वा राज्ञीमकर्षयत् ॥ १५
राज्ञ्युवाच
मुञ्च मुञ्चार्य मां सद्यो यावत्पश्याम्यहं सुतम् ।
दुर्लभं दर्शनं विप्र पुनरस्य भविष्यति ॥ १६
पश्येह पुत्र मामेवं मातरं दास्यतां गताम् ।
मां मास्प्राक्षी राजपुत्र न स्पृश्याहं त्वयाधुना ॥ १७
ततः स बालः सहसा दृष्ट्वाकृष्टां तु मातरम् ।
समभ्यधावदम्बेति वदन्साश्रुविलोचनः ॥ १८
हस्ते वस्त्रं समाकर्षन् काकपक्षधरः स्खलन् ।
तमागतं द्विजः क्रोधाद् बालमप्याहनत्तदा ॥ १ ९
वदंस्तथापि सोऽम्बेति नैव मुञ्चति मातरम् । स्कन्ध ११७ मेरे पास बहुत धन है । मेरी पत्नी बहुत ही सुकुमार है, इसलिये वह गृहकार्य नहीं कर पाती, अतः इसे आप मुझे दे दीजिये । मैं इस दासीको स्वीकार तो कर लूँगा, किंतु मुझे इसके बदले आपको धन कितना देना होगा? ॥ ९ १ ॥ ब्राह्मणके इस प्रकार कहनेपर राजा हरिश्चन्द्रका हृदय दुःखसे विदीर्ण हो गया और वे कुछ भी नहीं बोले ॥ १०३ ॥
विप्रने कहा- आपकी भार्याके कर्म, आयु, रूप और स्वभावके अनुसार यह धन दे रहा हूँ, इसे स्वीकार कीजिये और स्त्री मुझे सौंप दें । धर्मशास्त्रोंमें स्त्री तथा पुरुषका जो मूल्य निर्दिष्ट है, वह इस प्रकार है - यदि स्त्री बत्तीसों लक्षणोंसे सम्पन्न, दक्ष, शीलवती और गुणोंसे युक्त हो तो उसका मूल्य एक करोड़ स्वर्णमुद्रा है और उसी प्रकारके पुरुषका मूल्य दस करोड़ स्वर्णमुद्रा होता है ॥ ११ – १३ ॥ उस ब्राह्मणकी यह बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र महान् दुःखसे व्याकुल हो उठे और उनसे कुछ भी नहीं कह सके ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् उस ब्राह्मणने राजाके सामने वल्कलके ऊपर धन रखकर रानीके बालोंको पकड़कर उन्हें खींचना आरम्भ कर दिया ॥ १५ ॥
रानीने कहा- हे आर्य! जबतक मैं अपने पुत्रको भलीभाँति देख न लूँ तबतकके लिये आप मुझे छोड़ दीजिये, छोड़ दीजिये; क्योंकि हे विप्र! फिरसे इस पुत्रका दर्शन तो दुर्लभ ही हो जायगा ॥१६ ॥
[ तत्पश्चात् रानीने कहा- ] हे पुत्र! अब दासी बनी हुई अपनी इस माँकी ओर देखो । हे राजपुत्र! तुम मेरा स्पर्श मत करो; क्योंकि अब मैं तुम्हारे स्पर्शके योग्य नहीं रह गयी हूँ ॥ १७ ॥
तदनन्तर [ ब्राह्मणके द्वारा ] खींची जाती हुई माताको सहसा देखकर उस बालकके नेत्रोंमें अश्रु भर आये और वह ' माँ - माँ ' कहता हुआ उनकी ओर दौड़ा ॥ १८ ॥
कौवेके पंखके समान केशवाला वह राजकुमार जब हाथसे माताका वस्त्र पकड़कर गिरते हुए साथ चलने लगा, तब वह ब्राह्मण उस आये हुए बालकको क्रोधपूर्वक मारने लगा, फिर भी उस बालकने ‘ माँ-माँ ' कहते हुए अपनी माताको नहीं छोड़ा ॥ १ ९ ३ ॥
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११८ राज्ञ्युवाच प्रसादं कुरु मे नाथ क्रीणीष्वेमं हि बालकम् ॥ क्रीतापि नाहं भविता विनैनं कार्यसाधिका । इत्थं ममाल्पभाग्यायाः प्रसादं कुरु मे प्रभो ब्राह्मण उवाच
गृह्यतां वित्तमेतत्ते दीयतां मम बालकः ।
स्त्रीपुंसोर्धर्मशास्त्रज्ञैः कृतमेव हि वेतनम् ॥
शतं सहस्त्रं लक्षं च कोटिमौल्यं तथापरैः ।
द्वात्रिंशल्लक्षणोपेता दक्षा शीलगुणान्विता ॥
कोटिमौल्यं स्त्रियः प्रोक्तं पुरुषस्य तथार्बुदम् । सूत उवाच तथैव तस्य तद्वित्तं पुरः क्षिप्तं पटे पुनः ॥
प्रगृह्य बालकं मात्रा सहैकस्थमबन्धयत् ।
प्रतस्थे स गृहं क्षिप्रं तया सह मुदान्वितः ॥
प्रदक्षिणां तु सा कृत्वा जानुभ्यां प्रणता स्थिता ।
बाष्पपर्याकुला दीना त्विदं वचनमब्रवीत् ॥
यदि दत्तं यदि हुतं ब्राह्मणास्तर्पिता यदि ।
तेन पुण्येन मे भर्ता हरिश्चन्द्रोऽस्तु वै पुनः ॥
पादयोः पतितां दृष्ट्वा प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम् ।
हाहेति च वदन् राजा विललापाकुलेन्द्रियः ॥
वियुक्तेयं कथं जाता सत्यशीलगुणान्विता ।
वृक्षच्छायापि वृक्षं तं न जहाति कदाचन ॥
एवं भार्यां वदित्वाथ सुसम्बद्धं परस्परम् ।
पुत्रं च तमुवाचेदं मां त्वं हित्वा क्व यास्यसि ॥
कां दिशं प्रति यास्यामि को मे दुःखं निवारयेत् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ रानी बोलीं- हे नाथ! मुझपर कृपा कीजिये २० और इस बालकको भी खरीद लीजिये; क्योंकि आपके द्वारा खरीदी गयी भी मैं इसके बिना आपका कार्य सिद्ध करनेमें समर्थ नहीं रहूँगी । हे प्रभो! मुझ मन्दभागिनीपर इस प्रकारकी कृपा आप अवश्य ॥ २१ कीजिये ॥ २० - २१ ॥ ब्राह्मणने कहा- - यह धन लीजिये और अपना पुत्र मुझे दे दीजिये । धर्मशास्त्रज्ञोंने स्त्री- पुरुषका मूल्य निर्धारित कर दिया है - जैसे सौ, हजार, लाख २२ और करोड़ । उसी प्रकार अन्य विद्वानोंने शुभ लक्षणोंसे युक्त, कुशल तथा सुन्दर स्वभाववाली स्त्रीका मूल्य एक करोड़ तथा वैसे ही गुणोंवाले पुरुषका मूल्य दस २३ करोड़ बताया है ॥ २२-२३३ ॥ सूतजी बोले- तब ब्राह्मणने उसी प्रकार बालकका मूल्य भी सामने रखे हुए वस्त्रपर फेंक दिया और फिर बालकको पकड़कर उसे माताके साथ २४ ही बन्धनमें बाँध दिया । इसके बाद वह ब्राह्मण उन्हें साथ लेकर हर्षपूर्वक शीघ्र ही अपने घरकी ओर चल दिया ॥ २४-२५ ॥ २५ उस समय अत्यन्त दयनीय अवस्थाको प्राप्त रानी राजा हरिश्चन्द्रकी प्रदक्षिणा करके दोनों घुटनों के सहारे झुककर उन्हें प्रणामकर स्थित हो गयी और २६ नेत्रोंमें आँसू भरकर यह वचन बोली - यदि मैंने दान दिया हो, हवन किया हो तथा ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट किया हो तो उस पुण्यके प्रभावसे राजा हरिश्चन्द्र पुनः मुझे पतिरूपमें प्राप्त हो जायँ ॥ २६-२७ ॥ २७ अपने प्राणसे भी बढ़कर प्रिय रानीको चरणोंपर पड़ी हुई देखकर ' हाय, हाय ' - ऐसा कहते हुए व्याकुल इन्द्रियोंवाले राजा हरिश्चन्द्र विलाप करने २८ लगे । सत्य, शील और गुणोंसे सम्पन्न मेरी यह भार्या मुझसे अलग कैसे हो गयी? वृक्षकी छाया भी उस वृक्षको कभी नहीं छोड़ती ॥ २८-२९ ॥ २ ९ इस प्रकार परस्पर घनिष्ठता प्रकट करनेवाला यह वचन भार्यासे कहकर राजाने उस पुत्रसे ऐसा कहा - - मुझे छोड़कर तुम कहाँ जाओगे, फिर मैं ३० किस दिशामें जाऊँगा और मेरा दुःख कौन दूर करेगा? ॥ ३०३ ॥
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अ ० २२ ] राज्यत्यागे न मे दुःखं वनवासे न मे द्विज ॥
यत्पुत्रेण वियोगो मे एवमाह स भूपतिः ।
सद्भर्तृभोग्या हि सदा लोके भार्या भवन्ति हि ॥
मया त्यक्तासि कल्याणि दुःखेन विनियोजिता ।
इक्ष्वाकुवंशसम्भूतं सर्वराज्यसुखोचितम् ॥
मामीदृशं पतिं प्राप्य दासीभावं गता ह्यसि ।
ईदृशे मज्जमानं मां सुमहच्छोकसागरे ॥
को मामुद्धरते देवि पौराणाख्यानविस्तरैः । सूत उवाच पश्यतस्तस्य राजर्षेः कशाघातैः सुदारुणैः
घातयित्वा तु विप्रेशो नेतुं समुपचक्रमे ।
नीयमानौ तु तौ दृष्ट्वा भार्यापुत्रौ स पार्थिवः ॥
विललापातिदुःखार्तो निःश्वस्योष्णं पुनः पुनः ।
यां न वायुर्न वादित्यो न चन्द्रो न पृथग्जनाः ॥
दृष्टवन्तः पुरा पत्नीं सेयं दासीत्वमागता । सूर्यवंशप्रसूतोऽयं सुकुमारकराङ्गुलिः सम्प्राप्तो विक्रयं बालो धिङ्मामस्तु सुदुर्मतिम् । हा प्रिये हा शिशो वत्स ममानार्यस्य दुर्नयः दैवाधीनदशां प्राप्तो न मृतोऽस्मि तथापि धिक् । व्यास उवाच एवं विलपतो राज्ञोऽग्रे विप्रोऽन्तरधीयत वृक्षगेहादिभिस्तुङ्गैस्तावादाय त्वरान्वितः । अत्रान्तरे मुनिश्रेष्ठस्त्वाजगाम महातपाः सशिष्यः कौशिकेन्द्रोऽसौ निष्ठुरः क्रूरदर्शनः विश्वामित्र उवाच या त्वयोक्ता पुरा राजन् राजसूयस्य दक्षिणा ॥ तां ददस्व महाबाहो यदि सत्यं पुरस्कृतम् । सप्तम स्कन्ध ११ ९ ३१ हे द्विज! राज्यका परित्याग करने और वनवास करनेमें मुझे वह दुःख नहीं होगा, जो पुत्रके वियोगसे हो रहा है - ऐसा उस राजाने कहा । [ तत्पश्चात् ३२ रानीको लक्ष्य करके राजा कहने लगे- ] इस लोकमें पत्नियाँ सदा अपने उत्तम पतिके सहयोगहेतु होती हैं, फिर भी हे कल्याणि! मैंने तुम्हारा परित्याग कर दिया ३३ है और तुम्हें दुःखी बना दिया है ॥ ३१-३२३ ॥ इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न तथा राज्यके सम्पूर्ण सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न मुझ जैसे पतिको पाकर भी तुम ३४ दासी बन गयी हो । हे देवि! विस्तृत पौराणिक आख्यानोंके द्वारा इस महान् शोकरूपी सागरमें डूब रहे मुझ दीनका उद्धार अब कौन करेगा? ॥ ३३-३४३ ॥ सूतजी बोले- तदनन्तर राजर्षि हरिश्चन्द्रके ॥ ३५ सामने ही कोड़ेसे निष्ठुरतापूर्वक पीटते हुए वह विप्रश्रेष्ठ उन्हें ले जानेका प्रयत्न करने लगा ॥ ३५३ ॥
अपनी भार्या तथा पुत्रको ब्राह्मणके द्वारा ले जाते ३६ हुए देखकर वे राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त दुःखसे व्याकुल होकर बार - बार उष्ण श्वास लेकर विलाप करने ३७ लगे - अबतक जिसे वायु, सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वीके लोग देख नहीं सके थे, वही मेरी यह भार्या आज दासी बन गयी! हाथोंकी कोमल अँगुलियोंवाला यह ॥ ३८ । बालक, जो सूर्य - वंशमें उत्पन्न है, आज बिक गया । मुझ दुर्बुद्धिको धिक्कार है । हा प्रिये! हा बालक! हा वत्स! मुझ अधमकी दुर्नीतिके कारण ही तुम सब इस ॥ ३ ९ दैवाधीन दशाको प्राप्त हुए हो, फिर भी मेरी मृत्यु नहीं हुई, अतः मुझे धिक्कार है ॥ ३६–३९ ३ ॥ व्यासजी बोले- उन दोनोंको लेकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, घर आदिको पार करते हुए वे ब्राह्मण इस ॥ ४० तरह विलाप कर रहे राजाके सामनेसे शीघ्रतापूर्वक अन्तर्धान हो गये । इसी समय महान् तपस्वी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र अपने शिष्यके साथ वहाँ आ पहुँचे; उस ॥ ४१ समय वे कौशिकेन्द्र अत्यन्त निष्ठुर तथा क्रूर दृष्टिगत हो रहे थे ॥ ४० - ४१३ ॥ । विश्वामित्र बोले- हे राजन्! हे महाबाहो! यदि आपने सत्यको सदा स्वीकार किया है तो ४२ राजसूययज्ञकी जिस दक्षिणाका वचन आपने पहले दे रखा है, उसे अब दे दीजिये ॥ ४२ ॥
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१२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ हरिश्चन्द्र उवाच नमस्करोमि राजर्षे गृहाणेमां स्वदक्षिणाम् ॥ राजसूयस्य यागस्य या मयोक्ता पुरानघ । विश्वामित्र उवाच कुतो लब्धमिदं द्रव्यं दक्षिणार्थे प्रदीयते ॥ एतदाचक्ष्व राजेन्द्र यथा द्रव्यं त्वयार्जितम् । राजोवाच किमनेन महाभाग कथितेन तवानघ ॥ शोकस्तु वर्धते विप्र श्रुतेनानेन सुव्रत । ऋषिरुवाच अशस्तं नैव गृह्णामि शस्तमेव प्रयच्छ मे ॥ द्रव्यस्यागमनं राजन् कथयस्व यथातथम् । राजोवाच या देवी तु सा भार्या विक्रीता कोटिसम्मितैः ॥
निष्कैः पुत्रो रोहिताख्यो विक्रीतोऽर्बुदसंख्यया ।
विप्रैकादशकोट्यस्त्वं सुवर्णस्य गृहाण मे ॥
सूत उवाच
तद्वित्तं स्वल्पमालक्ष्य दारविक्रयसम्भवम् ।
शोकाभिभूतं राजानं कुपितः कौशिकोऽब्रवीत् ॥
ऋषिरुवाच
राजसूयस्य यज्ञस्य नैषा भवति दक्षिणा ।
अन्यदुत्पादय क्षिप्रं सम्पूर्णा येन सा भवेत् ॥
क्षत्रबन्धो ममेमां त्वं सदृशीं यदि दक्षिणाम् ।
मन्यसे तर्हि तत्क्षिप्रं पश्य त्वं मे परं बलम् ॥
तपसोऽस्य सुतप्तस्य ब्राह्मणस्यामलस्य च ।
मत्प्रभावस्य चोग्रस्य शुद्धस्याध्ययनस्य च ॥
राजोवाच
अन्यद्दास्यामि भगवन् कालः कश्चित्प्रतीक्ष्यताम् ।
अधुनैवास्ति विक्रीता पत्नी पुत्रश्च बालकः ॥
हरिश्चन्द्र बोले - हे राजर्षे! मैं आपको प्रणाम ४३ करता हूँ । हे अनघ! राजसूययज्ञके अवसरपर पहले मैंने जिस दक्षिणाकी प्रतिज्ञा की थी, यह अपनी दक्षिणा आप ग्रहण कीजिये ॥ ४३३ ॥
विश्वामित्र बोले- हे राजन्! दक्षिणाके निमित्त ४४ जो यह धन आप दे रहे हैं, उसे आपने कहाँसे प्राप्त किया है? आपने जिस तरहसे यह धन अर्जित किया है, उसे मुझे साफ - साफ बताइये ॥ ४४३ ॥
राजा बोले- हे महाभाग! हे अनघ! अब यह ४५ सब बतानेसे क्या प्रयोजन; क्योंकि उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हे विप्र! इसे सुननेसे आपका शोक ही बढ़ेगा ॥ ४५३ ॥
ऋषि बोले - हे राजन्! मैं दूषित धन कदापि ४६ ग्रहण नहीं करता, मुझे पवित्र धन दीजिये और जिस उपायसे द्रव्य प्राप्त हुआ हो, उसे यथार्थरूपसे बता दीजिये ॥ ४६३ ॥
राजा बोले- हे विप्र! मैंने अपनी उस साध्वी ४७ भार्याको एक करोड़ स्वर्णमुद्रामें और अपने रोहित नामक पुत्रको दस करोड़ स्वर्णमुद्रामें बेच दिया है । ४८ हे विप्र! इस प्रकार मेरे पास एकत्र इन ग्यारह करोड़ स्वर्णमुद्राओंको आप स्वीकार करें ॥ ४७-४८ ॥। सूतजी बोले- स्त्री और पुत्रको बेचनेपर प्राप्त हुए धनको अल्प समझकर विश्वामित्रने क्रोधित ४ ९ होकर शोकग्रस्त राजा हरिश्चन्द्रसे कहा - ॥४ ९ ॥ ऋषि बोले- राजसूययज्ञकी इतनी ही दक्षिणा नहीं होती, अतः शीघ्र ही और धनका उपार्जन कीजिये, जिससे वह दक्षिणा पूर्ण हो सके । क्षत्रियधर्मका ५० पालन करनेसे विमुख हे राजन्! यदि आप मेरी दक्षिणाको इतने द्रव्यके ही तुल्य मानते हैं तो फिर मेरे परम तेजको शीघ्र ही देख लीजिये । अत्यन्त ५१ पवित्र अन्तःकरणवाले मुझ ब्राह्मणकी कठोर तपस्या तथा मेरे विशुद्ध अध्ययनके प्रभावको आप अभी देख ५२ | लें ॥५०-५२ ॥ राजा बोले — हे भगवन्! मैं इसके अतिरिक्त और भी दक्षिणा दूँगा, किंतु कुछ समयतक प्रतीक्षा कीजिये । अभी - अभी मैंने अपनी पत्नी तथा अबोध ५३ । पुत्रको बेचा है ॥ ५३ ॥
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अ ० २३ ] सप्तम स्कन्ध १२१ विश्वामित्र उवाच विश्वामित्र बोले- हे नराधिप! दिनका चतुर्भागः स्थितो योऽयं दिवसस्य नराधिप । चौथा प्रहर उपस्थित है; यही प्रतीक्षाका अन्तिम समय है । इसके बाद फिर आप मुझसे कुछ न एष एव प्रतीक्ष्यो मे वक्तव्यं नोत्तरं त्वया ॥ ५४ । कहियेगा ॥ ५४ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हरिश्चन्द्रस्य पत्नीपुत्रविक्रयवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
O अथ त्रयोविंशोऽध्यायः विश्वामित्रका राजा हरिश्चन्द्रको व्यास उवाच
तमेवमुक्त्वा राजानं निर्घृणं निष्ठुरं वचः ।
तदादाय धनं पूर्णं कुपितः कौशिको ययौ ॥
विश्वामित्रे गते राजा ततः शोकमुपागतः ।
श्वासोच्छ्वासं मुहुः कृत्वा प्रोवाचोच्चैरधोमुखः ॥
वित्तक्रीतेन यस्यार्तिर्मया प्रेतेन गच्छति ।
स ब्रवीतु त्वरायुक्तो यामे तिष्ठति भास्करः ॥
अथाजगाम त्वरितो धर्मश्चाण्डालरूपधृक् ।
दुर्गन्धो विकृतोरस्कः श्मश्रुलो दन्तुरोऽघृणी ॥
कृष्णो लम्बोदरः स्निग्धः करालः पुरुषाधमः ।
हस्तजर्जरयष्टिश्च शवमाल्यैरलङ्कृतः ॥
चाण्डाल उवाच
अहं गृह्णामि दासत्वे भृत्यार्थः सुमहान्मम ।
क्षिप्रमाचक्ष्व मौल्यं किमेतत्ते सम्प्रदीयते ॥
व्यास उवाच
तं तादृशमथालक्ष्य क्रूरदृष्टिं सुनिर्घृणम् ।
वदन्तमतिदुःशीलं कस्त्वमित्याह पार्थिवः ॥
चाण्डालके हाथ बेचकर ऋणमुक्त करना व्यासजी बोले - – राजा हरिश्चन्द्रसे इस प्रकारका दयाहीन एवं निष्ठुर वचन कहकर और १ वह सम्पूर्ण धन लेकर कुपित विश्वामित्र वहाँसे चले गये ॥१ ॥
विश्वामित्रके चले जानेपर राजा शोकसन्तप्त हो उठे । वे बार - बार दीर्घ साँसें लेते हुए तथा नीचेकी २ ओर मुख करके उच्च स्वरसे बोलने लगे- धनसे बिक जानेके लिये उद्यत प्रेतरूप मुझसे जिसका दुःख दूर हो सके, वह अभी शीघ्रता करके सूर्यके चौथे ३ प्रहरमें रहते - रहते मुझसे बात कर ले ॥ २-३ ॥ इतनेमें शीघ्र ही वहाँ चाण्डालका रूप धारण करके धर्मदेव आ पहुँचे । उस चाण्डालके शरीरसे दुर्गन्ध आ रही थी । उसका वक्ष भयानक था, उसकी ४ विशाल दाढ़ी थी, उसके दाँत बड़े थे और वह बड़ा निर्दयी लग रहा था । उस नराधम तथा भयावने चाण्डालके शरीरका वर्ण काला था, उसका उदर ५ लम्बा था, वह बहुत मोटा था, उसने अपने हाथमें एक जर्जर लाठी ले रखी थी और वह शवोंकी मालाओंसे अलंकृत था॥४-५ ॥ चाण्डाल बोला- मैं तुम्हें दासके रूपमें रखना चाहता हूँ; क्योंकि मुझे सेवककी अत्यन्त आवश्यकता ६ है । शीघ्र बताओ कि इसके लिये तुम्हें कितना मूल्य देना होगा? ॥ ६ ॥
व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] अत्यन्त क्रूर दृष्टिवाले उस निष्ठुर तथा अविनीत चाण्डालको इस प्रकार बोलते हुए देखकर महाराज हरिश्चन्द्रने यह ७ पूछा - ' तुम कौन हो? ' ॥ ७ ॥