देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 111–120
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120
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१०२ गच्छन्तं तं समालोक्य राजा कोपसमन्वितः । मुमोच विशिखांस्तीक्ष्णांश्चापमाकृष्य यत्नतः
क्षणं दृष्टिपथं राज्ञः क्षणं चादर्शनं गतः ।
कुर्वन्बहुविधारावं सूकरः समुपाद्रवत् ॥
हरिश्चन्द्रोऽतिकुपितो मृगस्यानुजगाम ह ।
अश्वेन वायुवेगेन विकृष्य च शरासनम् ॥
इतस्ततस्ततः सैन्यमगमच्च वनान्तरम् ।
एकाकी नृपतिः कोलं व्रजन्तं समुपाद्रवत् ॥
मध्याह्नसमये राजा सम्प्राप्तो विजने वने ।
तृषितः क्षुधितोऽत्यर्थं बभूव श्रान्तवाहनः ॥
सूकरोऽदर्शनं प्राप्तो राजा चिन्तातुरोऽभवत् ।
मार्गभ्रष्टोऽतिविपिने दारुणे दीनवत्स्थितः ॥
किं करोमि क्व गच्छामि न सहायोऽस्ति मे वने ।
अज्ञातस्वपथः कुत्र व्रजामीति व्यचिन्तयत् ॥
एवं चिन्तयतस्तत्र विपिने जनवर्जिते ।
राजा चिन्तातुरोऽपश्यन्नदीं सुविमलोदकाम् ॥
वक्ष्यतां मुदितो राजा पाययित्वा तुरङ्गकम् ।
अश्वादुत्तीर्य विमलं पपौ पानीयमुत्तमम् ॥
जलं पीत्वा नृपस्तत्र सुखमाप महीपतिः ।
इयेष नगरं गन्तुं दिग्भ्रमेणातिमोहितः ॥
विश्वामित्रस्तु सम्प्राप्तो वृद्धब्राह्मणरूपधृक् ।
ननाम वीक्ष्य राजा तं प्रीतिपूर्वं द्विजोत्तमम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०१८ उसे भागते हुए देखकर राजा हरिश्चन्द्र क्रोधित ॥ ३ ९ होकर धनुष खींचकर सावधानीपूर्वक उसपर तीक्ष्ण बाण छोड़ने लगे ॥ ३ ९ ॥ वह सूअर किसी क्षण दिखायी पड़ता था, दूसरे क्षण आँखों से ओझल हो जाता था और क्षणभरमें ही ४० अनेक प्रकारके शब्द करता हुआ राजाके पास पहुँच जाता था ॥ ४० ॥
तब राजा हरिश्चन्द्र वायुके समान तीव्रगामी ४१ अश्वपर सवार होकर और धनुष खींचकर अत्यन्त क्रोधके साथ उस सूअरका पीछा करने लगे । तत्पश्चात् उनकी सेना इधर - उधर उनके साथ दौड़ती हुई दूसरे वनमें चली गयी और राजा उस भागते हुए सूअरका ४२ अकेले ही पीछा करते रहे ॥ ४१-४२ ॥ इस तरह राजा मध्याह्नकालमें एक निर्जन वनमें जा पहुँचे । वे अत्यधिक भूख तथा प्याससे ४३ व्याकुल हो गये तथा उनका वाहन बहुत थक गया ॥ ४३ ॥
सूअर आँखोंसे ओझल हो चुका था, अतः वे ४४ चिन्तासे व्यग्र हो गये । उस घने जंगलमें मार्गज्ञान न होनेके कारण वे रास्तेसे भटक भी गये; उनकी दशा बड़ी दयनीय हो गयी थी । वे सोचने लगे कि अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? इस वनमें मेरा कोई ४५ सहायक भी नहीं है । अब अपना मार्ग भूल जानेके कारण मैं किधर जाऊँ? ॥ ४४-४५ ॥ इस प्रकार उस निर्जन वनमें सोचते हुए चिन्तातुर राजा हरिश्चन्द्रकी दृष्टि एक स्वच्छ जलवाली नदीपर ४६ पड़ गयी ॥४६ ॥
उसे देखकर राजा बहुत हर्षित हुए । घोड़ेसे उतरकर उन्होंने उसे स्वादिष्ट जल पिलाकर स्वयं ४७ भी पीया । जल पी लेनेपर राजाको बड़ी शान्ति मिली । अब वे अपने नगर जानेकी इच्छा करने लगे, किंतु दिशाज्ञान न रहनेसे उनकी बुद्धि भ्रमित हो गयी ॥ ४७-४८ ॥ ४८ इतनेमें विश्वामित्रजी एक वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके वहाँ आ गये । उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको देखकर राजा हरिश्चन्द्रने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम ४ ९ | किया ॥ ४ ९ ॥
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अ ० १ ९ ] सप्तम
तमुवाच गाधिराजः प्रणमन्तं नृपोत्तमम् ।
स्वस्ति तेऽस्तु महाराज किमर्थमिह चागतः ॥ ५०
एकाकी विजने राजन् किं चिकीर्षितमत्र ते ।
ब्रूहि सर्वं स्थिरो भूत्वा कारणं नृपसत्तम ॥ ५१
राजोवाच
सूकरोऽतिमहाकायो बलवान्पुष्पकाननम् ।
समुपेत्य ममर्दाशु कोमलान्पुष्पपादपान् ॥ ५२
तं निवारयितुं दुष्टं करे कृत्वा च कार्मुकम् ।
ससैन्योऽहं स्वनगरान्निर्गतो मुनिसत्तम ॥ ५३
गतोऽसौ दृक्पथात्पापो मायावी क्वापि वेगवान् ।
पृष्ठतोऽहमपि प्राप्तः सैन्यं क्वापि गतं मम ॥ ५४
क्षुधितस्तृषितश्चाहं सैन्यभ्रष्टस्त्विहागतः ।
न जाने पुरमार्गं च तथा सैन्यगतिं मुने ॥ ५५
पन्थानं दर्शय विभो व्रजामि नगरं प्रति ।
ममात्र भाग्ययोगेन प्राप्तस्त्वं विजने वने ॥ ५६
अयोध्याधिपतिश्चाहं हरिश्चन्द्रोऽतिविश्रुतः ।
राजसूयस्य कर्ता च वाञ्छितार्थप्रदः सदा ॥ ५७
धनेच्छा यदि ते ब्रह्मन् यज्ञार्थं द्विजसत्तम ।
आगन्तव्यमयोध्यायां दास्यामि विपुलं धनम् ॥ ५८
स्कन्ध १०३ प्रणाम करते हुए उन नृपश्रेष्ठ राजा हरिश्चन्द्रसे विश्वामित्र कहने लगे - हे महाराज! आपका कल्याण हो । आप यहाँ किसलिये आये हुए हैं? हे राजन्! इस निर्जन वनमें अकेले आनेका आपका क्या उद्देश्य है? हे नृपश्रेष्ठ! शान्तचित्त होकर अपने आगमनका सारा कारण बताइये ॥ ५०-५१ ॥ राजा बोले - विशाल शरीरवाला एक बलशाली सूअर मेरे पुष्पोद्यानमें पहुँचकर वहाँके कोमल पुष्पमय वृक्षोंको रौंदने लगा । हे मुनिश्रेष्ठ! उसी दुष्टको रोकनेके लिये हाथमें धनुष लेकर मैं सेनासहित अपने नगरसे निकल पड़ा ॥ ५२-५३ ॥ अब वह पापी तथा मायावी सूअर वेगपूर्वक मेरी आँखोंसे ओझल होकर न जाने कहाँ चला गया! मैं भी उसके पीछे - पीछे यहाँ आ गया तथा मेरी सेना कहीं और निकल गयी ॥ ५४ ॥
सेनाका साथ छूट जानेपर भूख तथा प्याससे व्याकुल होकर मैं यहाँ आ पहुँचा । हे मुने! मुझे अपने नगरके मार्गका ज्ञान नहीं रहा और मेरी सेना किधर गयी - यह भी मैं नहीं जानता । हे विभो! आप मुझे मार्ग दिखा दीजिये, जिससे मैं अपने नगर चला जाऊँ; मेरे सौभाग्यसे आप इस निर्जन वनमें पधारे हुए | हैं ॥५५-५६ ॥ मैं अयोध्याका राजा हूँ और हरिश्चन्द्र नामसे विख्यात हूँ । मैं राजसूययज्ञ कर चुका हूँ और याचना करनेवालोंको उनकी हर अभिलषित वस्तु सर्वदा प्रदान करता हूँ । हे ब्रह्मन्! हे द्विजश्रेष्ठ! यदि आपको भी यज्ञके निमित्त धनकी आवश्यकता हो तो अयोध्या आयें, मैं आपको प्रचुर धन प्रदान करूँगा ॥ ५७-५८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे हरिश्चन्द्रद्वारा वृद्धब्राह्मणाय धनदानप्रतिज्ञावर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः विश्वामित्रकी कपटपूर्ण बातोंमें आकर राजा हरिश्चन्द्रका राज्यदान करना व्यास उवाच व्यासजी बोले - हे नृप [ जनमेजय ]! इति तस्य वचः श्रुत्वा भूपतेः कौशिको मुनिः । हरिश्चन्द्रकी यह बात सुनकर मुनि विश्वामित्र हँस प्रहस्य प्रत्युवाचेदं हरिश्चन्द्रं तथा नृप ॥ १ करके उनसे कहने लगे- ॥ १ ॥
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१०४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९
राजंस्तीर्थमिदं पुण्यं पावनं पापनाशनम् ।
स्नानं कुरु महाभाग पितॄणां तर्पणं तथा ॥
कालः शुभतमोऽस्तीह तीर्थे स्नात्वा विशांपते ।
दानं ददस्व शक्तयात्र पुण्यतीर्थेऽतिपावने ॥
प्राप्य तीर्थं महापुण्यमस्नात्वा यस्तु गच्छति ।
स भवेदात्महा भूय इति स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
तस्मात्तीर्थवरे राजन् कुरु पुण्यं स्वशक्तितः ।
दर्शयिष्यामि मार्गं ते गन्तासि नगरं ततः ॥
आगमिष्याम्यहं मार्गदर्शनार्थं तवानघ ।
त्वया सहाद्य काकुत्स्थ तव दानेन तोषितः ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राजा मुनेः कपटमण्डितम् ।
वासांस्युत्तार्य विधिवत्स्नातुमभ्याययौ नदीम् ॥
बन्धयित्वा हयं वृक्षे मुनिवाक्येन मोहितः ।
अवश्यंभावियोगेन तद्वशस्तु तदाभवत् ॥
राजा स्नानविधिं कृत्वा सन्तर्प्य पितृदेवताः ।
विश्वामित्रमुवाचेदं स्वामिन् दानं ददामि ते ॥
यदिच्छसि महाभाग तत्ते दास्यामि साम्प्रतम् ।
गावो भूमिर्हिरण्यं च गजाश्वरथवाहनम् ॥
नादेयं मे किमप्यस्ति कृतमेतद् व्रतं पुरा ।
राजसूये मखश्रेष्ठे मुनीनां सन्निधावपि ॥
तस्मात्त्वमिह सम्प्राप्तस्तीर्थेऽस्मिन्प्रवरे मुने ।
यत्तेऽस्ति वाञ्छितं ब्रूहि ददामि तव वाञ्छितम् ॥
विश्वामित्र उवाच मया पूर्वं श्रुता राजन् कीर्तिस्ते विपुला भुवि । वसिष्ठेन च सम्प्रोक्ता दाता नास्ति महीतले ।
हरिश्चन्द्रो नृपश्रेष्ठः सूर्यवंशे महीपतिः ।
तादृशां नृपतिर्दाता न भूतो न भविष्यति ॥
हे राजन्! यह तीर्थ अत्यन्त पुण्यमय, पवित्र २ तथा पापनाशक है । हे महाभाग! इसमें स्नान करो और पितरोंका तर्पण करो ॥ २ ॥
भूपते! यह समय भी अति उत्तम है; इसलिये ३ इस पुण्यमय तथा परम पावन तीर्थमें स्नान करके आप इस समय अपनी सामर्थ्यके अनुसार दान दीजिये ॥ ३ ॥
' जो परम पवित्र तीर्थमें पहुँचकर बिना स्नान ४ । किये ही लौट जाता है, वह आत्मघाती होता है'-ऐसा स्वायम्भुव मनुने कहा है ॥ ४ ॥
अतएव हे राजन्! आप इस सर्वोत्तम तीर्थमें अपनी ५ शक्तिके अनुसार पुण्यकर्म कीजिये । इससे [ प्रसन्न होकर ] मैं आपको मार्ग दिखा दूँगा और तब आप ६ अपने नगरको चले जाइयेगा । हे अनघ! हे काकुत्स्थ! आपके दानसे प्रसन्न होकर आपको मार्ग दिखाने के लिये इसी समय मैं आपके साथ चलूँगा ॥ ५-६ ॥ ७ मुनिकी यह कपटभरी वाणी सुनकर राजा हरिश्चन्द्र घोड़ेको एक वृक्षमें बाँधकर तथा अपने वस्त्र उतारकर विधिवत् स्नान करनेके लिये नदीके ८ तटपर आ गये । होनहारके प्राबल्यके कारण उस समय राजा हरिश्चन्द्र मुनिके वाक्यसे मोहित होकर उनके वशीभूत हो गये थे॥७-८ ॥ ९ विधिपूर्वक स्नान करनेके पश्चात् पितरों तथा देवताओंका तर्पण करके राजाने विश्वामित्रसे यह कहा - हे स्वामिन्! अब मैं आपको दान देता हूँ । हे १० महाभाग! इस समय आप जो चाहते हैं, उसे मैं आपको दूँगा । गाय, भूमि, सोना, हाथी, घोड़ा, रथ, ११ वाहन आदि कुछ भी मेरे लिये अदेय नहीं है - ऐसी प्रतिज्ञा मैं पूर्वकालमें सर्वोत्तम राजसूययज्ञमें मुनियोंके समक्ष कर चुका हूँ । अतः हे मुने! आपकी जो १२ आकांक्षा हो उसे बताइये; मैं आपकी वह अभिलषित वस्तु आपको दूँगा; क्योंकि आप इस सर्वोत्तम तीर्थमें पधारे हुए हैं ॥९ –१२ ॥ विश्वामित्र बोले- हे राजन्! संसारमें व्याप्त १३ आपकी विपुल कीर्तिके विषयमें मैं बहुत पहले सुन चुका हूँ । महर्षि वसिष्ठने भी कहा था कि पृथ्वीतलपर उनके समान कोई दानी नहीं है । राजाओंमें श्रेष्ठ वे १४ । राजा हरिश्चन्द्र सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए हैं । जैसे दानी
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अ ० १ ९ ] सप्तम स्कन्ध १०५
पृथिव्यां परमोदारस्त्रिशङ्कतनयो यथा ।
अतस्त्वां प्रार्थयाम्यद्य विवाहो मेऽस्ति पार्थिव ॥ १५
पुत्रस्य च महाभाग तदर्थं देहि मे धनम् । राजोवाच विवाहं कुरु विप्रेन्द्र ददामि प्रार्थितं तव ॥ १६ यदिच्छसि धनं कामं दाता तस्यास्मि निश्चितम् । व्यास उवाच इत्युक्तः कौशिकस्तेन वञ्चनातत्परो मुनिः ॥ १७
उद्भाव्य मायां गान्धर्वी पार्थिवायाप्यदर्शयत् ।
कुमारः सुकुमारश्च कन्या च दशवार्षिकी ॥ १८
एतयोः कार्यमप्यद्य कर्तव्यं नृपसत्तम ।
राजसूयाधिकं पुण्यं गृहस्थस्य विवाहतः ॥ १ ९
भविष्यति तवाद्यैव विप्रपुत्रविवाहतः ।
तच्छ्रुत्वा वचनं राजा मायया तस्य मोहितः ॥ २०
तथेति च प्रतिज्ञाय नोवाचाल्पं वचस्तथा ।
तेन दर्शितमार्गोऽसौ नगरं प्रति जग्मिवान् ॥ २१
विश्वामित्रो ऽपि राजानं वञ्चयित्वाश्रमं ययौ ।
कृतोद्वाहविधिस्तावद्विश्वामित्रो ऽब्रवीन्नृपम् ॥२२
वेदीमध्ये नृपाद्य किं तेऽभीष्टं द्विज अदेयमपि संसारे व्यर्थं हि जीवितं नोपार्जितं यशः त्वं देहि दानं यथेप्सितम् । राजोवाच ब्रूहि ददामि वाञ्छितं किल ॥ २३
यशः कामोऽस्मि साम्प्रतम् ।
तस्य विभवं प्राप्य येन वै ॥ २४
शुद्धं परलोकसुखप्रदम् । विश्वामित्र उवाच राज्यं देहि महाराज वराय सपरिच्छदम् ॥ २५ गजाश्वरथरत्नाढ्यं वेदीमध्येऽतिपावने । तथा परम उदार त्रिशंकुपुत्र महाराज हरिश्चन्द्र हैं, वैसा राजा पृथ्वीपर पहले न हुआ है और न तो आगे होगा । हे महाभाग! हे पार्थिव! आज मेरे पुत्रका विवाह होनेवाला है, अतः मैं आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि इसके लिये आप मुझे धन प्रदान करें ॥ १३ - १५३ ॥ राजा बोले- हे विप्रेन्द्र! आप विवाह कीजिये, मैं आपकी अभिलषित वस्तु दूँगा । आप अधिक से अधिक जितना धन चाहते हैं, मैं उसे अवश्य दूँगा ॥ १६३ ॥
व्यासजी बोले- हरिश्चन्द्रके ऐसा कहनेपर उन्हें ठगनेके लिये तत्पर मुनि विश्वामित्रने गान्धर्वी माया रचकर राजाके समक्ष एक सुकुमार पुत्र और दस वर्षकी कन्या उपस्थित कर दी और कहा- - हे नृपश्रेष्ठ! आज इन्हीं दोनोंका विवाह सम्पन्न करना है । किसी गृहस्थकी सन्तानका विवाह करा देनेका पुण्य राजसूययज्ञसे भी बढ़कर होता है । अतः आज ही इस विप्रपुत्रका विवाह सम्पन्न करा देनेसे आपको महान् पुण्य होगा ॥ १७–१९ ३ ॥ विश्वामित्रकी बात सुनकर उनकी मायासे मोहित हुए राजा हरिश्चन्द्र ' वैसा ही करूँगा ' - यह प्रतिज्ञा करके आगे कुछ भी नहीं बोले । इसके बाद मुनिके द्वारा मार्ग दिखा दिये जानेपर वे अपने नगरको चले गये और राजाको ठगकर विश्वामित्र भी अपने आश्रमके लिये प्रस्थान कर गये ॥ २० - २१३ ॥ विवाह - कार्य पूर्ण होनेके पूर्व विश्वामित्रने राजा हरिश्चन्द्रसे कहा- हे राजन्! अब आप हवनवेदीके मध्य मुझे अभिलषित दान दीजिये ॥ २२३ ॥
राजा बोले- हे द्विज! आपकी क्या अभिलाषा है, उसे बताइए; मैं आपको अभिलषित वस्तु अवश्य दूँगा । इस संसार में मेरे लिये कुछ भी अदेय नहीं है । अब मैं केवल यश प्राप्त करना चाहता हूँ; क्योंकि वैभव प्राप्त करके भी जिसने परलोकमें सुख देनेवाले पवित्र यशका उपार्जन नहीं किया, उसका जीवन
व्यर्थ है । २३ - २४३ ॥
विश्वामित्र बोले- हे राजन्! इस परम पुनीत हवनवेदीके मध्य आप हाथी, घोड़े, रथ, रत्न और अनुचरोंसे युक्त सम्पूर्ण राज्य वरको दे दीजिये ॥ २५३ ॥
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१०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ व्यास उवाच मोहितो मायया तस्य श्रुत्वा वाक्यं मुनेर्नृपः ॥
दत्तमित्युक्तवान् राज्यमविचार्य यदृच्छया ।
गृहीतमिति तं प्राह विश्वामित्रो ऽतिनिष्ठुरः ॥
दक्षिणां देहि राजेन्द्र दानयोग्यां महामते ।
दक्षिणारहितं दानं निष्फलं मनुरब्रवीत् ॥
तस्माद्दानफलाय त्वं यथोक्तां देहि दक्षिणाम् ।
इत्युक्तस्तु तदा राजा तमुवाचातिविस्मितः ॥
ब्रूहि कियद्धनं तुभ्यं देयं स्वामिन् मयाधुना ।
दक्षिणानिष्क्रयं साधो वद तावत्प्रमाणकम् ॥
दानपूर्त्यै प्रदास्यामि स्वस्थो भव तपोधन ।
विश्वामित्रस्तु तच्छ्रुत्वा तमाह मेदिनीपतिम् ॥
हेमभारद्वयं सार्धं दक्षिणां देहि साम्प्रतम् ।
दास्यामीति प्रतिश्रुत्य तस्मै राजातिविस्मितः ॥
तदैव सैनिकास्तस्य वीक्षमाणाः समागताः ।
दृष्ट्वा महीपतिं व्यग्रं तुष्टुवुस्ते मुदान्विताः ॥
व्यास उवाच
श्रुत्वा तेषां वचो राजा नोक्त्वा किञ्चिच्छुभाशुभम् ।
चिन्तयन्स्वकृतं कर्म ययावन्तः पुरे ततः ॥
किं मया स्वीकृतं दानं सर्वस्वं यत्समर्पितम् ।
वञ्चितोऽहं द्विजेनात्र वने पाटच्चरैरिव ॥
राज्यं सोपस्करं तस्मै मया सर्वं प्रतिश्रुतम् ।
भारद्वयं सुवर्णस्य सार्धं च दक्षिणा पुनः ॥
किं करोमि मतिभ्रष्टा न ज्ञातं कपटं मुनेः ।
प्रतारितोऽहं सहसा ब्राह्मणेन तपस्विना ॥
न जाने दैवकार्यं वै हा दैव किं भविष्यति ।
इति चिन्तापरो राजा गृहं प्राप्तोऽतिविह्वलः ॥
व्यासजी बोले – मुनिकी बात सुनते ही उनकी २६ मायासे मोहित होनेके कारण बिना कुछ सोचे - विचारे राजाने अकस्मात् कह दिया- ' सारा राज्य आपको दे दिया । ' तत्पश्चात् परम निष्ठुर विश्वामित्रने उनसे कहा-२७ ' मैंने पा लिया और हे राजेन्द्र! हे महामते! अब दानकी सांगता - सिद्धिके लिये उसके योग्य दक्षिणा भी दे दीजिये; क्योंकि मनुने कहा है कि दक्षिणारहित दान व्यर्थ होता २८ है । अतएव दानका पूर्ण फल प्राप्त करनेके लिये आप यथोचित दक्षिणा भी दीजिये ' ॥ २६ - २८३ ॥ मुनिके यह कहने पर राजा हरिश्चन्द्र उस समय २ ९ बड़े आश्चर्यमें पड़ गये । उन्होंने मुनिसे कहा – हे स्वामिन्! आप यह तो बताइये कि इस समय कितना धन आपको और देना है । हे साधो! दक्षिणाके रूपमें ३० निष्क्रय - द्रव्यका परिमाण बता दीजिये । हे तपोधन! आप निश्चिन्त रहिये; दानकी पूर्णताके लिये मैं वह दक्षिणा अवश्य दूँगा ॥ २ ९ -३०३ ॥ ३१ यह सुनकर विश्वामित्रने राजा हरिश्चन्द्रसे कहा कि आप दक्षिणा के रूपमें ढाई भार सोना अभी दीजिये । तत्पश्चात् ‘ आपको दूँगा ' – यह प्रतिज्ञा विश्वामित्रसे ३२ । करके राजा बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ ३१-३२ ॥ उसी समय उनके सभी सैनिक भी उन्हें खोजते हुए वहाँ आ गये । राजाको देखकर वे बहुत हर्षित ३३ हुए और उन्हें चिन्तित देखकर सान्त्वना देने लगे ॥ ३३ ॥
व्यासजी बोले - [ हे जनमेजय! ] उनकी बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र शुभाशुभ कुछ भी उत्तर न देकर अपने किये हुए कार्यपर विचार करते हुए ३४ अन्तः पुरमें चले गये ॥ ३४ ॥
यह मैंने कैसा दान देना स्वीकार कर लिया, जो कि मैंने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया । इस ब्राह्मणने ३५ तो ठगोंकी भाँति वनमें मुझे बड़ा धोखा दिया । सामग्रियों-सहित सम्पूर्ण राज्य उस ब्राह्मणको देनेके लिये मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी और फिर साथमें ढाई भार स्वर्णकी ३६ भी प्रतिज्ञा कर ली है । अब मैं क्या करूँ? मेरी तो बुद्धि ही भ्रष्ट हो गयी है । मुनिके कपटको मैं नहीं जान पाया और उस तपस्वी ब्राह्मणने मुझे अकस्मात् ३७ ही ठग लिया । विधिका विधान मैं बिलकुल नहीं समझ पा रहा हूँ । हा दैव! पता नहीं भविष्यमें क्या होनेवाला है - इसी चिन्तामें पड़े हुए अत्यन्त क्षुब्धचित्त ३८ । राजा हरिश्चन्द्र अपने महलमें पहुँचे ॥ ३५-३८ ॥
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अ ० १ ९ ]
पतिं चिन्तापरं दृष्ट्वा राज्ञी पप्रच्छ कारणम् ।
किं प्रभो विमना भासि का चिन्ता ब्रूहि साम्प्रतम् ॥
वनात्पुत्रः समायातो राजसूयः कृतः पुरा ।
कस्माच्छोचसि राजेन्द्र शोकस्य कारणं वद ॥
नारातिर्विद्यते क्वापि बलवान्दुर्बलोऽपि वा ।
वरुणोऽपि ' सुसन्तुष्टः कृतकृत्योऽसि भूतले ॥
चिन्तया क्षीयते देहो नास्ति चिन्तासमा मृतिः ।
त्यज्यतां नृपशार्दूल स्वस्थो भव विचक्षण ॥
तन्निशम्य प्रियावाक्यं प्रीतिपूर्वं नराधिपः ।
प्रोवाच किञ्चिच्चिन्तायाः कारणं च शुभाशुभम् ॥
भोजनं न चकाराऽसौ चिन्ताविष्टस्तथा नृपः ।
सुप्त्वापि शयने शुभ्रे लेभे निद्रां न भूमिपः ॥
प्रातरुत्थाय चिन्तार्तो यावत्सन्ध्यादिकाः क्रियाः ।
करोति नृपतिस्तावद्विश्वामित्रः समागतः ॥
क्षत्रा निवेदितो राज्ञे मुनिः सर्वस्वहारकः ।
आगत्योवाच राजानं प्रणमन्तं पुनः पुनः ॥
विश्वामित्र उवाच
राजंस्त्यज स्वराज्यं मे देहि वाचा प्रतिश्रुतम् ।
सुवर्णं स्पृश राजेन्द्र सत्यवाग्भव साम्प्रतम् ॥
हरिश्चन्द्र उवाच
स्वामिन् राज्यं तवेदं मे मया दत्तं किलाधुना ।
त्यक्त्वान्यत्र गमिष्यामि मा चिन्तां कुरु कौशिक ॥
सप्तम स्कन्ध १०७ अपने पति राजा हरिश्चन्द्रको चिन्ताग्रस्त देखकर ३ ९ रानीने इसका कारण पूछा- हे प्रभो! इस समय आप उदास क्यों दिखायी दे रहे हैं, आपको कौन - सी चिन्ता है? मुझे बताइये ॥ ३ ९ ॥ अब तो आपका पुत्र भी वनसे लौट आया है । ४० और आपने बहुत पहले ही राजसूययज्ञ भी सम्पन्न कर लिया है, तो फिर आप किसलिये शोक कर रहे हैं? हे राजेन्द्र! अपनी चिन्ताका कारण बताइये ॥ ४० ॥
४१ इस समय बलशाली अथवा बलहीन आपका कोई शत्रु भी कहीं नहीं है । वरुणदेव भी आपसे परम सन्तुष्ट हैं । आपने संसारमें अपने सारे मनोरथ सफल कर लिये हैं । हे बुद्धिमान् नृपश्रेष्ठ! चिन्तासे ४२ शरीर क्षीण हो जाता है, चिन्ताके समान तो मृत्यु भी नहीं है; इसलिये आप चिन्ता छोड़िये और स्वस्थ रहिये ॥ ४१-४२ ॥ [ हे जनमेजय! ] अपनी पत्नीकी बात सुनकर ४३ राजाने प्रेमपूर्वक उन्हें चिन्ताका शुभाशुभ थोड़ा - बहुत कारण बतला दिया ॥ ४३ ॥
उस समय चिन्तासे आकुल राजा हरिश्चन्द्रने ४४ भोजनतक नहीं किया । सुन्दर शय्यापर लेटे रहनेपर भी राजाको निद्रा नहीं आयी ॥ ४४ ॥
चिन्ताग्रस्त राजा हरिश्चन्द्र प्रातः काल उठकर जब सन्ध्या - वन्दन आदि क्रियाएँ कर रहे थे, उसी ४५ समय मुनि विश्वामित्र वहाँ आ पहुँचे ॥ ४५ ॥
राजाका सर्वस्व हरण कर लेनेवाले मुनिके आनेकी सूचना द्वारपालने राजाको दी । तब मुनि ४६ | विश्वामित्र उनके पास गये और बार - बार प्रणाम करते हुए राजासे कहने लगे - ॥ ४६ ॥
विश्वामित्र बोले - हे राजन्! अपना राज्य छोड़िये और अपने वचनसे संकल्पित इस राज्यको मुझे दे दीजिये | हे राजेन्द्र! अब प्रतिज्ञा की ४७ हुई सुवर्णकी दक्षिणा भी दीजिये और सत्यवादी बनिये ॥ ४७ ॥
हरिश्चन्द्र बोले - हे स्वामिन्! मेरा यह राज्य अब आपका है; क्योंकि मैंने इसे आपको दे दिया है । हे कौशिक! इसे छोड़कर अब मैं अन्यत्र चला ४८ । जाऊँगा, आप चिन्ता न करें ॥ ४८ ॥
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१०८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ सर्वस्वं मम ते ब्रह्मन् गृहीतं विधिवद्विभो । सुवर्णदक्षिणां दातुमशक्तोऽस्म्यधुना द्विज दानं ददामि ते तावद्यावन्मे स्याद्धनागमः पुनश्चेत्कालयोगेन तदा दास्यामि दक्षिणाम् ॥
इत्युक्त्वा नृपतिः प्राह पुत्रं भार्यां च माधवीम् ।
राज्यमस्मै प्रदत्तं वै मया वेद्यां सुविस्तरम् ॥
हस्त्यश्वरथसंयुक्तं रत्नहेमसमन्वितम् त्यक्त्वा त्रीणि शरीराणि सर्वं चास्मै समर्पितम्
त्यक्त्वायोध्यां गमिष्यामि कुत्रचिद्वनगह्वरे ।
गृह्णात्विदं मुनिः सम्यग्राज्यं सर्वसमृद्धिमत् ॥
इत्याभाष्य सुतं भार्यां हरिश्चन्द्रः स्वमन्दिरात् ।
विनिर्गतः सुधर्मात्मा मानयंस्तं द्विजोत्तमम् ॥
व्रजन्तं भूपतिं वीक्ष्य भार्यापुत्रावुभावपि चिन्तारौ सुदीनास्यौ जग्मतुः पृष्ठतस्तदा हाहाकारो महानासीन्नगरे वीक्ष्य तांस्तथा चुकुशुः प्राणिनः सर्वे साकेतपुरवासिनः हा राजन् किं कृतं कर्म कुतः क्लेशः समागतः वञ्चितोऽसि महाराज विधिनापण्डितेन ह सर्वे वर्णास्तदा दुःखमाप्नुयुस्तं महीपतिम् विलोक्य भार्यया सार्धं पुत्रेण च महात्मना निनिन्दुर्ब्राह्मणं तं तु दुराचारं पुरौकसः धूर्तोऽयमिति भाषन्तो दुःखार्ता ब्राह्मणादयः हे ब्रह्मन्! मेरा सर्वस्व तो विधिपूर्वक आपने ग्रहण ॥ ४ ९ कर लिया है, अतः हे विभो! इस समय मैं आपको स्वर्ण - दक्षिणा देनेमें असमर्थ हूँ । हे द्विज! जब मेरे पास धन हो जायगा, तब मैं आपको दक्षिणा दे दूँगा । और यदि दैवयोगसे धन उपलब्ध हो गया, तो उसी ५० समय मैं आपकी दक्षिणा चुका दूँगा ॥ ४ ९ -५० ॥ विश्वामित्रसे यह कहकर राजा हरिश्चन्द्रने अपने पुत्र रोहित तथा पत्नी माधवीसे कहा – हाथी, ५१ घोड़े, रथ, स्वर्ण तथा रत्न आदिसहित अपना सारा विस्तृत राज्य मैं विवाहवेदीपर इन ब्राह्मणदेवको दान । कर चुका हूँ; केवल हमलोगोंके इन तीन शरीरों को छोड़कर और सब कुछ इन्हें समर्पित कर दिया है । ॥ ५२ अतः अब मैं अयोध्या छोड़कर किसी वनकी गुफा में चला जाऊँगा । अब ये मुनि राज्यको भलीभाँति ग्रहण करें ५३ [ हे जनमेजय! ] अपने कहकर परम धार्मिक राजा विश्वामित्रको सम्मान देते निकल पड़े ॥५४ ॥
५४ राजाको जाते देखकर इस सर्वसमृद्धिशाली ॥ ५१-५३ ॥ पुत्र तथा पत्नीसे यह हरिश्चन्द्र द्विजश्रेष्ठ हुए अपने भवनसे उनकी पत्नी माधवी तथा पुत्र रोहित चिन्तित हो गये तथा उनके मुखपर । उदासी छा गयी । वे दोनों भी उनके पीछे - पीछे ॥ ५५ चल दिये ॥ ५५ ॥
उन सभीको इस स्थितिमें देखकर नगरमें । बड़ा हाहाकार मच गया । अयोध्यामें रहनेवाले सभी प्राणी चीख - चीखकर रोने लगे - हा राजन्! ॥ ५६ आपने यह कैसा कर्म कर डाला! आपके ऊपर यह संकट कहाँसे आ पड़ा । हे महाराज! यह निश्चय । है कि आप विवेकहीन विधाताद्वारा ठग लिये ॥ ५७ गये हैं ॥ ५६-५७ ॥ महात्मा पुत्र रोहित तथा भार्या माधवीके सहित । उन राजा हरिश्चन्द्रको इस दशामें देखकर सभी वर्णके लोग बहुत दुःखी हुए ॥ ५८ ॥
॥ ५८ ' यह महान् धूर्त है ' – ऐसा कहते हुए नगरवासी ब्राह्मण आदि लोग दुःखसे व्याकुल होकर उस । दुराचारी ब्राह्मण ( विश्वामित्र ) - की निन्दा करने ॥ ५ ९ | लगे ॥ ५ ९ ॥
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अ ० २० ] सप्तम स्कन्ध १० ९
निर्गत्य नगरात्तस्माद्विश्वामित्रः क्षितीश्वरम् ।
गच्छन्तं तमुवाचेदं समेत्य निष्ठुरं वचः ॥
दक्षिणायाः सुवर्णं मे दत्त्वा गच्छ नराधिप ।
नाहं दास्यामि वा ब्रूहि मया त्यक्तं सुवर्णकम् ॥
राज्यं गृहाण वा सर्वं लोभश्चेद्धृदि वर्तते ।
दत्तं चेन्मन्यसे राजन् देहि यत्तत्प्रतिश्रुतम् ॥
एवं ब्रुवन्तं गाधेयं हरिश्चन्द्रो महीपतिः ।
प्रणिपत्य सुदीनात्मा कृताञ्जलिपुटोऽब्रवीत् ॥
महाराज हरिश्चन्द्र अभी नगरसे निकलकर जा ६० ही रहे थे कि इतनेमें विश्वामित्र पुनः उनके सम्मुख आकर उनसे यह निष्ठुर वचन कहने लगे - हे राजन्! मेरी सुवर्ण दक्षिणा देकर आप जाइये अथवा यह कह दीजिये कि मैं नहीं दूँगा तो मैं वह सुवर्ण छोड़ दूँगा । ६१ हे राजन्! यदि आपके हृदयमें लोभ हो तो आप अपना सारा राज्य वापस ले लीजिये और यदि आप यह मानते हैं कि ‘ मैं वस्तुतः दान दे चुका हूँ ' तो ६२ जिस सुवर्णकी आप प्रतिज्ञा कर चुके हैं, उसे मुझको दे दीजिये ॥ ६० - ६२ ॥ विश्वामित्र यह कहनेपर अत्यन्त उदास मनवाले राजा हरिश्चन्द्र उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके दोनों हाथ ६३ जोड़कर कहने लगे ॥ ६३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे कौशिकाय सर्वस्वसमर्पणं तद्दक्षिणादानवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः हरिश्चन्द्रका दक्षिणा देनेहेतु स्वयं, हरिश्चन्द्र उवाच अदत्त्वा ते हिरण्यं वै न करिष्यामि भोजनम् प्रतिज्ञा मे मुनिश्रेष्ठ विषादं त्यज सुव्रत सूर्यवंशसमुद्भूतः क्षत्रियोऽहं महीपतिः राजसूयस्य यज्ञस्य कर्ता वाञ्छितदो नृषु कथं करोमि नाकारं स्वामिन्दत्त्वा यदृच्छया अवश्यमेव दातव्यमृणं ते द्विजसत्तम स्वस्थो भव प्रदास्यामि सुवर्णं मनसेप्सितम् कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व यावत्प्राप्स्याम्यहं धनम् विश्वामित्र उवाच कुतस्ते भविता राजन् धनप्राप्तिरतः परम् गतं राज्यं तथा कोशो बलं चैवार्थसाधनम् रानी और पुत्रको बेचनेके लिये काशी जाना हरिश्चन्द्र बोले - उत्तम व्रतका पालन करनेवाले । हे मुनिवर! आप विषाद छोड़िये, मेरी प्रतिज्ञा है कि ॥ १ आपको बिना स्वर्ण दिये मैं भोजन नहीं करूँगा ॥१ ॥
मैं सूर्यवंशमें उत्पन्न एक क्षत्रिय राजा हूँ ॥ मनुष्योंकी सारी अभिलाषा पूर्ण करनेवाला मैं ॥ २ राजसूययज्ञ सम्पन्न कर चुका हूँ ॥२ ॥
हे स्वामिन्! इच्छानुसार दान दे करके मैं ' नहीं ' ऐसा शब्द किस प्रकार उच्चारित कर सकता ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपका ऋण अवश्य चुका ॥ ३ दूँगा । आप निश्चिन्त रहें, मैं आपका मनोवांछित स्वर्ण आपको अवश्य दूँगा, किंतु जबतक मुझे धन । उपलब्ध नहीं हो जाता, तबतक कुछ समयके लिये ॥ ४ आप प्रतीक्षा करें ॥ ३-४ ॥ विश्वामित्र बोले- हे राजन्! अब आपको धनप्राप्ति कहाँसे होगी? आपका राज्य, कोष, सेना । तथा अर्थोपार्जनका समस्त साधन - यह सब [ आपके ॥ ५ । अधिकारसे ] चला गया । अतः हे राजन्! धनके लिये
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११० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०
वृथाशा ते महीपाल धनार्थे किं करोम्यहम् ।
निर्धनं त्वां च लोभेन पीडयामि कथं नृप ॥
तस्मात्कथय भूपाल न दास्यामीति साम्प्रतम् ।
त्यक्त्वाशां महतीं कामं गच्छाम्यहमतः परम् ॥
यथेष्टं व्रज राजेन्द्र भार्यापुत्रसमन्वितः ।
सुवर्णं नास्ति किं तुभ्यं ददामीति वदाधुना ॥
व्यास उवाच
गच्छन्वाक्यमिदं श्रुत्वा ब्राह्मणस्य च भूपतिः ।
प्रत्युवाच मुनिं ब्रह्मन् धैर्यं कुरु ददाम्यहम् ॥
मम देहोऽस्ति भार्यायाः पुत्रस्य च ह्यनामयः ।
क्रीत्वा देहं तु तं नूनमृणं दास्यामि ते द्विज ॥
ग्राहकं पश्य विप्रेन्द्र वाराणस्यां पुरि प्रभो ।
दासभावं गमिष्यामि सदारोऽहं सपुत्रकः ॥
गृहाण काञ्चनं पूर्णं सार्धं भारद्वयं मुने ।
मौल्येन दत्त्वा सर्वान्नः सन्तुष्टो भव भूधर ॥
इति ब्रुवञ्जगामाथ सह पल्या सुतान्वितः ।
उमया कान्तया सार्धं यत्रास्ते शङ्करः स्वयम् ॥
तां दृष्ट्वा च पुरीं रम्यां मनसो ह्लादकारिणीम् ।
उवाच स कृतार्थोऽस्मि पुरीं पश्यन्सुवर्चसम् ॥
ततो भागीरथीं प्राप्य स्नात्वा देवादितर्पणम् ।
देवार्चनं च निर्वर्त्य कृतवान् दिग्विलोकनम् ॥
प्रविश्य वसुधापालो दिव्यां वाराणसीं पुरीम् ।
नैषा मनुष्यभुक्तेति शूलपाणेः परिग्रहः ॥
जगाम पद्भ्यां दुःखार्तः सह पत्न्या समाकुलः ।
पुरीं प्रविश्य स नृपो विश्वासमकरोत्तदा ॥
आपको आशा करना व्यर्थ है । हे नृप! इस स्थितिमें मैं ६ क्या करूँ? मैं धनके लोभसे आप - जैसे निर्धन व्यक्तिको पीड़ित भी कैसे करूँ? इसलिये हे राजन्! आप कह दीजिये –'अब मैं नहीं दे सकूँगा । ' तब मैं धनप्राप्तिकी ७ आशा त्यागकर यहाँसे इच्छानुसार चला जाऊँगा । हे राजेन्द्र! ' अब मेरे पास स्वर्ण नहीं है, तो आपको क्या दूँ ' – ऐसा बोल दीजिये और पत्नी तथा पुत्रके साथ ८ अपने इच्छानुसार चले जाइये ॥ ५–८ ॥ व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] ब्राह्मणकी यह बात सुनकर उस समय जा रहे राजा हरिश्चन्द्रने मुनिको उत्तर दिया - हे ब्रह्मन्! आप धैर्य रखिये, मैं आपको धन अवश्य दूँगा । हे द्विज! अभी भी मेरा, मेरी पत्नी तथा मेरे पुत्रका शरीर स्वस्थ है; मैं उस शरीरको बेचकर आपका ऋण अवश्य चुका दूँगा । हे विप्रवर! हे प्रभो! आप वाराणसी पुरीमें किसी १० ग्राहकका अन्वेषण कीजिये, मैं अपनी पत्नी तथा पुत्रसहित उसका दास बन जाऊँगा । हे मुने! हे भूधर! उसके हाथों हमें बेचकर आप हमारे मूल्यसे ढाई भार ११ सोना ले लीजिये और सन्तुष्ट हो जाइये ॥ ९ –१२ ॥ ऐसा कहकर राजा हरिश्चन्द्र अपनी भार्या तथा पुत्रके साथ उस काशीपुरीमें गये, जहाँ साक्षात् १२ भगवान् शिव अपनी प्रिया उमाके साथ विराजमान रहते हैं ॥१३ ॥
मनको आह्लादित करनेवाली उस दिव्य पुरीको १३ देखकर उन्होंने कहा कि इस परम तेजोमयी काशीपुरीका दर्शन पाकर मैं कृतार्थ हो गया ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् गंगातटपर आकर स्नान करके १४ उन्होंने देवता आदिका तर्पण किया । इसके बाद देवताओंकी पूजासे निवृत्त होकर वे चारों ओर घूमकर देखने लगे ॥ १५ ॥
१५ राजा हरिश्चन्द्र उस दिव्य वाराणसीपुरीमें प्रविष्ट होकर सोचने लगे कि यह पुरी मानवोंके भोगकी वस्तु नहीं है; क्योंकि यह भगवान् शिवकी १६ सम्पदा है । दुःखसे अधीर होकर घबराये हुए राजा हरिश्चन्द्र अपनी भार्याके साथ पैदल ही चलते रहे । पुरीमें प्रवेश हो जानेपर राजा आश्वस्त हो १७ | गये ॥ १६-१७ ॥
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अ ० २० ] सप्तम स्कन्ध १११
ददृशेऽथ मुनिश्रेष्ठं ब्राह्मणं दक्षिणार्थिनम् ।
तं दृष्ट्वा समनुप्राप्तं विनयावनतोऽ ऽभवत् ॥
प्राह चैवाञ्जलिं कृत्वा हरिश्चन्द्रो महामुनिम् ।
इमे प्राणाः सुतश्चायं प्रिया पत्नी मुने मम ॥
येन ते कृत्यमस्त्याशु गृहाणाद्य द्विजोत्तम ।
यच्चान्यत्कार्यमस्माभिस्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥
विश्वामित्र उवाच
पूर्णः समासो भद्रं ते दीयतां मम दक्षिणा ।
पूर्वं तस्य निमित्तं हि स्मर्यते स्ववचो यदि ॥
राजोवाच
ब्रह्मन्नाद्यापि सम्पूर्णो मासो ज्ञानतपोबल ।
तिष्ठत्येकदिनार्थं यत्तत्प्रतीक्षस्व नापरम् ॥
विश्वामित्र उवाच
एवमस्तु महाराज आगमिष्याम्यहं पुनः ।
शापं तव प्रदास्यामि न चेदद्य प्रयच्छसि ॥
इत्युक्त्वाथ ययौ विप्रो राजा चाचिन्तयत्तदा ।
कथमस्मै प्रयच्छामि दक्षिणा या प्रतिश्रुता ॥
कुतः पुष्टानि मित्राणि कुत्रार्थः साम्प्रतं मम ।
प्रतिग्रहः प्रदुष्टो मे तत्र याच्या कथं भवेत् ॥
राज्ञां वृत्तित्रयं प्रोक्तं धर्मशास्त्रेषु निश्चितम् ।
यदि प्राणान्विमुञ्चामि ह्यप्रदाय च दक्षिणाम् ॥
ब्रह्मस्वहा कृमि: पापो भविष्याम्यधमाधमः ।
अथवा प्रेततां यास्ये वर एवात्मविक्रयः ॥
उसी समय उन्होंने दक्षिणाकी अभिलाषा १८ रखनेवाले ब्राह्मणवेशधारी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रको देखा । उन महामुनिको सामने उपस्थित देखकर महाराज हरिश्चन्द्र विनयावनत हो गये और दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहने लगे - हे मुने! मेरे प्राण, १ ९ पुत्र तथा प्रिय पत्नी - सब उपस्थित हैं । इनमेंसे जिससे भी आपकी कार्यसिद्धि हो सके, उसे आप शीघ्रतापूर्वक अभी ले लीजिये । साथ ही हे द्विजश्रेष्ठ! २० हमसे आपका अन्य जो भी कार्य बन सकता हो, उसे भी आप बतानेकी कृपा करें ॥ १८-२० ॥ विश्वामित्र बोले- [ हे राजन्! ] आपका कल्याण हो । वह महीना पूर्ण हो गया, इसलिये यदि आपको अपने वचनका स्मरण हो तो पूर्वमें की गयी २१ । प्रतिज्ञाकी दक्षिणा चुका दीजिये ॥२१ ॥
राजा बोले- - ज्ञान और तपके बलसे सम्पन्न हे ब्रह्मन्! आज अवश्य ही महीना पूर्ण हो गया, किंतु अभी दिनका आधा भाग अवशिष्ट है । अतः आप तबतक प्रतीक्षा करें, इसके बाद नहीं ॥ २२ ॥
२२ विश्वामित्र बोले- हे महाराज! ऐसा ही हो, मैं पुनः आऊँगा । किंतु यदि आपने आज दक्षिणा नहीं दी, तो मैं आपको शाप दे दूँगा ॥ २३ ॥
ऐसा कहकर जब विप्ररूप विश्वामित्र चले गये, तब राजा हरिश्चन्द्र सोचने लगे कि इन विप्रदेवके २३ लिये जिस दक्षिणाकी प्रतिज्ञा मैं कर चुका हूँ, उसे अब इन्हें कैसे दूँ? ॥ २४ ॥
इस समय कहाँसे मेरे धनसम्पन्न मित्र मिल २४ जायँगे अथवा इतनी सम्पत्ति ही कहाँसे मिल जायगी । साथ ही किसीसे धन लेना मेरे लिये दोषकारक है, अतः धनकी याचना भी कैसे की जा सकती है? २५ धर्मशास्त्रोंमें राजाओंके लिये तीन प्रकारकी ही सुनिश्चित वृत्तियाँ ( दान देना, विद्याध्ययन करना तथा यज्ञ करना ) बतायी गयी हैं । यदि दक्षिणा दिये बिना ही प्राणत्याग कर देता हूँ तो ब्राह्मणका धन अपहरण २६ करनेके कारण मुझ अधमसे भी अधम पापीको दूसरे जन्ममें कीड़ा होना पड़ेगा अथवा मैं प्रेतयोनिमें चला जाऊँगा । अतः अपनेको बेच डालना ही मेरे लिये २७ | श्रेयस्कर है ॥२५–२७ ॥