देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 311–320

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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३०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २

यथाग्नौ दाहिका चन्द्रे पद्मे शोभा प्रभा रवौ ।

शश्वद्युक्ता न भिन्ना सा तथा प्रकृतिरात्मनि ॥

विना स्वर्ण स्वर्णकारः कुण्डलं कर्तुमक्षमः ।

विना मृदा घटं कर्तुं कुलालो हि नहीश्वरः ॥

न हि क्षमस्तथात्मा च सृष्टिं स्रष्टुं तया विना ।

सर्वशक्तिस्वरूपा सा यया च शक्तिमान्सदा ॥

ऐश्वर्यवचनः शश्च क्तिः पराक्रम एव च ।

तत्स्वरूपा तयोर्दात्री सा शक्तिः परिकीर्तिता ॥

ज्ञानं समृद्धिः सम्पत्तिर्यशश्चैव बलं भगः ।

तेन शक्तिर्भगवती भगरूपा च सा सदा ॥

तया युक्तः सदात्मा च भगवांस्तेन कथ्यते ।

स च स्वेच्छामयो देवः साकारश्च निराकृतिः ॥

तेजोरूपं निराकारं ध्यायन्ते योगिनः सदा ।

वदन्ति च परं ब्रह्म परमानन्दमीश्वरम् ॥

अदृश्यं सर्वद्रष्टारं सर्वज्ञं सर्वकारणम् ।

सर्वदं सर्वरूपं तं वैष्णवास्तन्न मन्वते ॥

वदन्ति चैव ते कस्य तेजस्तेजस्विना विना ।

तेजोमण्डलमध्यस्थं ब्रह्म तेजस्विनं परम् ॥

स्वेच्छामयं सर्वरूपं सर्वकारणकारणम् ।

अतीव सुन्दरं रूपं बिभ्रतं सुमनोहरम् ॥

किशोरवयसं शान्तं सर्वकान्तं परात्परम् ।

नवीननीरदाभासधामैकं श्यामविग्रहम् ॥

शरन्मध्याह्नपद्मौघशोभामोचनलोचनम् 1 मुक्ताच्छविविनिन्द्यैकदन्तपंक्तिमनोरमम् । जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति, चन्द्रमा तथा ७ कमलमें शोभा, सूर्यमें दीप्ति सदा विद्यमान रहती और उससे अलग नहीं होती है; उसी प्रकार परमात्मामें प्रकृति विद्यमान रहती है ॥ ७ ॥

जैसे बिना स्वर्णके स्वर्णकार कुण्डलादि ८ आभूषणोंका निर्माण करनेमें असमर्थ होता है और बिना मिट्टीके कुम्हार घड़ेका निर्माण करनेमें सक्षम नहीं होता, उसी प्रकार प्रकृतिके सहयोगके बिना ९ परमात्मा सृष्टिकी रचनामें समर्थ नहीं होता । वे प्रकृति ही सभी शक्तियोंकी अधिष्ठात्री हैं तथा उनसे ही परमात्मा सदा शक्तिमान् रहता है ॥ ८ - ९ ॥ १० ' श ' ऐश्वर्यका तथा ' क्ति ' पराक्रमका वाचक है । जो इनके स्वरूपवाली है तथा इन दोनोंको प्रदान करनेवाली है; उस देवीको शक्ति कहा गया है ॥ १० ॥

११ ज्ञान, समृद्धि, सम्पत्ति, यश और बलको ' भग ' कहते हैं । उन गुणोंसे सदा सम्पन्न रहनेके कारण ही शक्तिको भगवती कहते हैं तथा वे सदा भगरूपा हैं । १२ | उनसे सम्बद्ध होनेके कारण ही परमात्मा भी भगवान् कहे जाते हैं । वे परमेश्वर अपनी इच्छाशक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण साकार और निराकार दोनों रूपोंसे १३ अवस्थित रहते हैं ॥ ११-१२ ॥ उस तेजस्वरूप निराकारका योगीजन सदा ध्यान करते हैं तथा उसे परमानन्द, परब्रह्म तथा ईश्वर कहते हैं ॥ १३ ॥

१४ अदृश्य, सबको देखनेवाले, सर्वज्ञ, सबके कारणस्वरूप, सब कुछ देनेवाले, सर्वरूप उस परब्रह्मको वैष्णवजन नहीं स्वीकार करते ॥ १४ ॥

वे कहते हैं कि तेजस्वी सत्ताके बिना किसका १५ तेज प्रकाशित हो सकता है? अतः तेजोमण्डलके मध्य अवश्य ही तेजस्वी परब्रह्म विराजते हैं ॥ १५ ॥

वे स्वेच्छामय, सर्वरूप और सभी कारणोंके भी कारण १६ हैं । वे अत्यन्त सुन्दर तथा मनोहर रूप धारण करनेवाले हैं, वे किशोर अवस्थावाले, शान्तस्वभाव, सभी मनोहर अंगोंवाले तथा परात्पर हैं । वे नवीन मेघकी कान्ति १७ एकमात्र धामस्वरूप श्याम विग्रहवाले हैं, उनके नेत्र शरद् ऋतुके मध्याह्नमें खिले कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले हैं और उनकी मनोरम दन्तपंक्ति मुक्ता १८ । शोभाको भी तुच्छ कर देनेवाली है ॥ १६–१८ ॥

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अ ० २ ] नवम स्कन्ध ३०३

मयूरपिच्छचूडं च मालतीमाल्यमण्डितम् ।

सुनसं सस्मितं कान्तं भक्तानुग्रहकारणम् ॥

ज्वलदग्निविशुद्धैकपीतांशुकसुशोभितम् ।

द्विभुजं मुरलीहस्तं रत्नभूषणभूषितम् ॥

सर्वाधारं च सर्वेशं सर्वशक्तियुतं विभुम् ।

सर्वैश्वर्यप्रदं सर्वस्वतन्त्रं सर्वमङ्गलम् ॥

परिपूर्णतमं सिद्धं सिद्धेशं सिद्धिकारकम् ।

ध्यायन्ते वैष्णवाः शश्वद्देवदेवं सनातनम् ॥

जन्ममृत्युजराव्याधिशोक भीतिहरं परम् ।

ब्रह्मणो वयसा यस्य निमेष उपचर्यते ॥

स चात्मा स परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ।

कृषिस्तद्भक्तिवचनो नश्च तद्दास्यवाचकः ॥

भक्तिदास्यप्रदाता यः स च कृष्णः प्रकीर्तितः ।

कृषिश्च सर्ववचनो नकारो बीजमेव च ॥

स कृष्णः सर्वस्रष्टादौ सिसृक्षन्नेक एव च ।

सृष्ट्युन्मुखस्तदंशेन कालेन प्रेरितः प्रभुः ॥

स्वेच्छामयः स्वेच्छया च द्विधारूपो बभूव ह ।

स्त्रीरूपो वामभागांशो दक्षिणांशः पुमान्स्मृतः ॥

तां ददर्श महाकामी कामाधारां सनातनः ।

अतीव कमनीयां च चारुपङ्कजसन्निभाम् ॥

चन्द्रबिम्बविनिन्द्यैकनितम्बयुगलां पराम् ।

सुचारुकदलीस्तम्भनिन्दित श्रोणिसुन्दरीम् ॥

श्रीयुक्त श्रीफलाकारस्तनयुग्ममनोरमाम् पुष्पजुष्टां सुवलितां मध्यक्षीणां मनोहराम् ॥ उन्होंने मयूरपिच्छका मुकुट धारण किया है, उनके १ ९ गलेमें मालतीकी माला सुशोभित हो रही है । उनकी सुन्दर नासिका है, उनका मुखमण्डल मुसकानयुक्त तथा सुन्दर है और वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं । वे प्रज्वलित अग्निके सदृश विशुद्ध तथा देदीप्यमान २० पीताम्बरसे सुशोभित हो रहे हैं । उनकी दो भुजाएँ हैं, उन्होंने मुरलीको हाथमें धारण किया है, वे रत्नोंके आभूषणोंसे अलंकृत हैं । वे सर्वाधार, सर्वेश, सर्वशक्तिसे २१ युक्त, विभु, सभी प्रकारके ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, सब प्रकारसे स्वतन्त्र तथा सर्वमंगलरूप हैं ॥ १ ९ –२१ ॥ वे परिपूर्णतम सिद्धावस्थाको प्राप्त, सिद्धोंके २२ स्वामी तथा सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले हैं । वे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक और भयको दूर करते हैं, ऐसे उन सनातन परमेश्वरका वैष्णवजन सदा ध्यान २३ करते रहते हैं ॥ २२३ ॥

ब्रह्माजीकी आयु जिनके एक निमेषकी तुलनामें है, उन परमात्मा परब्रह्मको ' कृष्ण ' नामसे पुकारा जाता २४ है । ' कृष् ' उनकी भक्ति तथा ' न ' उनके दास्यके वाचक शब्द हैं । इस प्रकार जो भक्ति और दास्य प्रदान करते हैं, उन्हें कृष्ण कहा गया है । अथवा ' कृष् ' २५ सर्वार्थका तथा ' न'- कार बीजका वाचक है, अतः श्रीकृष्ण ही आदिमें सर्वप्रपंचके स्रष्टा तथा सृष्टिके एकमात्र बीजस्वरूप हैं । उनमें जब सृष्टिकी इच्छा २६ उत्पन्न हुई, तब उनके अंशभूत कालके द्वारा प्रेरित होकर स्वेच्छामय वे प्रभु अपनी इच्छासे दो रूपोंमें विभक्त हो गये । उनका वाम भागांश स्त्रीरूप तथा दक्षिणांश पुरुषरूप कहा गया है । २३ - २७ ॥ २७ उन [ वामभागोत्पन्न ] कामकी आधारस्वरूपाको उन सनातन महाकामेश्वरने देखा । उनका रूप अतीव मनोहर था । वे सुन्दर कमलकी शोभा धारण किये २८ हुए थीं । उन परादेवीका नितम्बयुगल चन्द्रबिम्बको तिरस्कृत कर रहा था और अपने जघनप्रदेशसे सुन्दर कदलीस्तम्भको निन्दित करते हुए वे मनोहर प्रतीत हो २ ९ रही थीं । शोभामय श्रीफलके आकारवाले स्तनयुगलसे वे मनोरम प्रतीत हो रही थीं । वे मस्तकपर पुष्पों की सुन्दर माला धारण किये थीं, वे सुन्दर वलियोंसे युक्त ३० | थीं, उनका कटिप्रदेश क्षीण था, वे अति मनोहर थीं,

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३०४

अतीव सुन्दरीं शान्तां सस्मितां वक्रलोचनाम् ।

वह्निशुद्धांशुकाधारां रत्नभूषणभूषिताम् ॥

शश्वच्चक्षुश्चकोराभ्यां पिबन्तीं सततं मुदा ।

कृष्णस्य मुखचन्द्रं च चन्द्रकोटिविनिन्दितम् ॥

कस्तूरीबिन्दुना सार्धमधश्चन्दनबिन्दुना ।

समं सिन्दूरबिन्दुं च भालमध्ये च बिभ्रतीम् ॥

वक्रिमं कबरीभारं मालतीमाल्यभूषितम् ।

रत्नेन्द्रसारहारं च दधतीं कान्तकामुकीम् ॥

कोटिचन्द्रप्रभामृष्टपुष्टशोभासमन्विताम् ।

गमनेन राजहंसगजगर्वविनाशिनीम् ॥

दृष्ट्वा तां तु तया सार्धं रासेशो रासमण्डले ।

रासोल्लासे सुरसिको रासक्रीडाञ्चकार ह ॥

नानाप्रकार शृङ्गारं शृङ्गारो मूर्तिमानिव ।

चकार सुखसम्भोगं यावद्वै ब्रह्मणो दिनम् ॥

ततः स च परिश्रान्तस्तस्या योनौ जगत्पिता ।

चकार वीर्याधानं च नित्यानन्दे शुभक्षणे ॥

गात्रतो योषितस्तस्याः सुरतान्ते च सुव्रत ।

निःससार श्रमजलं श्रान्तायास्तेजसा हरेः ॥

महाक्रमणक्लिष्टाया नि: श्वासश्च बभूव ह ।

तदा वव्रे श्रमजलं तत्सर्वं विश्वगोलकम् ॥

स च निःश्वासवायुश्च सर्वाधारो बभूव ह ।

निःश्वासवायुः सर्वेषां जीविनां च भवेषु च ॥

बभूव मूर्तिमद्वायोर्वामाङ्गात्प्राणवल्लभा ।

तत्पत्नी सा च तत्पुत्राः प्राणाः पञ्च च जीविनाम् ॥

प्राणोऽपानः समानश्चोदानव्यानौ च वायवः ।

बभूवुरेव तत्पुत्रा अधः प्राणाश्च पञ्च च ॥

घर्मतोयाधिदेवश्च बभूव वरुणो महान् ।

तद्वामाङ्गाच्च तत्पत्नी वरुणानी बभूव सा ॥

अथ सा कृष्णचिच्छक्तिः कृष्णगर्भं दधार ह ।

शतमन्वन्तरं यावज्वलन्ती ब्रह्मतेजसा ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ वे अत्यन्त सुन्दर, शान्त मुसकान और कटाक्षसे ३१ सुशोभित थीं । उन्होंने अग्निके समान पवित्र वस्त्र धारण कर रखा था और वे रत्नोंके आभूषणोंसे सुशोभित थीं ॥ २८ - ३१ ॥ ३२ वे अपने चक्षुरूपी चकोरोंसे करोड़ों चन्द्रमाओंको तिरस्कृत करनेवाले श्रीकृष्णके मुखमण्डलका प्रसन्नतापूर्वक ३३ निरन्तर पान कर रही थीं । वे देवी ललाटके ऊपरी भागमें कस्तूरीकी बिन्दीके साथ - साथ नीचे चन्दनकी बिन्दी तथा ललाटके मध्यमें सिन्दूरकी बिन्दी धारण ३४ किये थीं । अपने प्रियतममें अनुरक्त चित्तवाली वे देवी मालतीकी मालासे भूषित घुँघराले केशसे शोभा पा ३५ रही थीं तथा श्रेष्ठ रत्नोंकी माला धारण किये हुए थीं । कोटि चन्द्रकी प्रभाको लज्जित करनेवाली शोभा धारण किये वे अपनी चालसे राजहंस और गजके ३६ गर्वको तिरस्कृत कर रही थीं ॥ ३२ – ३५ ॥ उन्हें देखकर रासेश्वर तथा परम रसिक श्रीकृष्णने ३७ उनके साथ रासमण्डलमें उल्लासपूर्वक रासलीला की । ब्रह्मा दिव्य दिवसकी अवधितक नाना प्रकारकी ३८ शृंगारचेष्टाओंसे युक्त उन्होंने मूर्तिमान् श्रृंगाररसके समान सुखपूर्वक क्रीड़ा की । तत्पश्चात् थके हुए उन जगत्पिताने नित्यानन्दमय शुभ मुहूर्तमें देवीके क्षेत्रमें ३ ९ तेजका आधान किया । हे सुव्रत! क्रीडाके अन्तमें हरिके तेजसे परिश्रान्त उन देवीके शरीरसे स्वेद निकलने ४० लगा और महान् परिश्रमसे खिन्न उनका श्वास भी वेगसे चलने लगा । तब वह सम्पूर्ण स्वेद विश्वगोलक बन गया और वह निःश्वास वायु जगत्में सब ४१ प्राणियोंके जीवनका आधार बन गया ॥ ३६–४१ ॥ उस मूर्तिमान् वायुके वामांगसे उसकी प्राणप्रिय पत्नी प्रकट हुईं, पुनः उनके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए जो ४२ जीवोंके प्राणके रूपमें प्रतिष्ठित हैं । प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान - ये पाँच वायु और उनके पाँच ४३ अधोगामी प्राणरूप पुत्र भी उत्पन्न हुए ॥ ४२-४३ ॥ स्वेदके रूपमें निकले जलके अधिष्ठाता महान् वरुणदेव हुए । उनके वामांगसे उनकी पत्नी वरुणानी ४४ प्रकट हुईं । श्रीकृष्णकी उन चिन्मयी शक्तिने उनके गर्भको धारण किया । वे सौ मन्वन्तरोंतक ब्रह्मतेजसे ४५ । देदीप्यमान बनी रहीं । वे श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठातृदेवी

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अ ० २ ]

कृष्णप्राणाधिदेवी सा कृष्णप्राणाधिकप्रिया ।

कृष्णस्य सङ्गिनी शश्वत्कृष्णवक्षःस्थलस्थिता ॥

शतमन्वन्तरान्ते च कालेऽतीते तु सुन्दरी ।

सुषाव डिम्भं स्वर्णाभं विश्वाधारालयं परम् ॥

दृष्ट्वा डिम्भं च सा देवी हृदयेन व्यदूयत ।

उत्ससर्ज च कोपेन ब्रह्माण्डगोलके जले ॥

दृष्ट्वा कृष्णश्च तत्त्यागं हाहाकारं चकार ह ।

शशाप देवीं देवेशस्तत्क्षणं च यथोचितम् ॥

यतोऽपत्यं त्वया त्यक्तं कोपशीले च निष्ठुरे ।

भव त्वमनपत्यापि चाद्यप्रभृति निश्चितम् ॥

या यास्त्वदंशरूपाश्च भविष्यन्ति सुरस्त्रियः । नवम स्कन्ध ३०५ हैं, कृष्णको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं । वे कृष्णकी ४६ सहचरी हैं और सदा उनके वक्षःस्थलपर विराजमान रहती हैं । सौ मन्वन्तर बीतनेपर उन सुन्दरीने स्वर्णकी कान्तिवाले, विश्वके आधार तथा निधानस्वरूप श्रेष्ठ ४७ | बालकको जन्म दिया ॥ ४४–४७ ॥ उस बालकको देखकर उन देवीका हृदय अत्यन्त दुःखित हो गया और उन्होंने उस बालकको ४८ कोपपूर्वक उस ब्रह्माण्डगोलकमें छोड़ दिया । बालकके उस त्यागको देखकर देवेश्वर श्रीकृष्ण हाहाकार करने लगे और उन्होंने उसी क्षण उन देवीको ४ ९ समयानुसार शाप दे दिया - हे कोपशीले! हे निष्ठुरे! तुमने पुत्रको त्याग दिया है, इस कारण आजसे तुम ५० निश्चित ही सन्तानहीन रहोगी । तुम्हारे अंशसे जो-जो देवपत्नियाँ प्रकट होंगी, वे भी तुम्हारी तरह सन्तानरहित तथा नित्ययौवना रहेंगी ॥ ४८–५१ ॥ अनपत्याश्च ताः सर्वास्त्वत्समा नित्ययौवनाः ॥ ५१ इसके बाद देवीके जिह्वाग्रसे सहसा ही एक

एतस्मिन्नन्तरे देवी जिह्वाग्रात्सहसा ततः ।

आविर्बभूव कन्यैका शुक्लवर्णा मनोहरा ॥

श्वेतवस्त्रपरीधाना वीणापुस्तकधारिणी ।

रत्नभूषणभूषाढ्या सर्वशास्त्राधिदेवता ॥

अथ कालान्तरे सा च द्विधारूपो बभूव ह । वामार्धाङ्गाच्च कमला दक्षिणार्धाच्च राधिका एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो द्विधारूपो बभूव सः । दक्षिणार्धश्च द्विभुजो वामार्धश्च चतुर्भुजः उवाच वाणीं कृष्णस्तां त्वमस्य कामिनी भव अत्रैव मानिनी राधा तव भद्रं भविष्यति एवं लक्ष्मीं च प्रददौ तुष्टो नारायणाय च स जगाम च वैकुण्ठं ताभ्यां सार्धं जगत्पतिः अनपत्ये च ते द्वे च जाते राधांशसम्भवे भूता नारायणाङ्गाच्च पार्षदाश्च चतुर्भुजाः तेजसा वयसा रूपगुणाभ्यां च समा हरेः बभूवुः कमलाङ्गाच्च दासीकोट्यश्च तत्समाः सुन्दर गौरवर्ण कन्या प्रकट हुई । उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण कर रखा था तथा वे हाथमें वीणा - - पुस्तक लिये ५२ हुए थीं । सभी शास्त्रोंकी अधिष्ठात्री वे देवी रत्नोंके आभूषणसे सुशोभित थीं । कालान्तरमें वे भी द्विधारूपसे ५३ विभक्त हो गयीं । उनके वाम अर्धांगसे कमला तथा दक्षिण अर्धांगसे राधिका प्रकट हुईं ॥ ५२ - ५४ ॥ इसी बीच श्रीकृष्ण भी द्विधारूपसे प्रकट हो ॥ ५४ गये । उनके दक्षिणार्धसे द्विभुज रूप प्रकट हुआ तथा वामार्धसे चतुर्भुज रूप प्रकट हुआ । तब श्रीकृष्णने उन ॥ ५५ सरस्वती - देवीसे कहा कि तुम इस ( चतुर्भुज ) विष्णुकी कामिनी बनो । ये मानिनी राधा इस द्विभुजके साथ । यहीं रहेंगी । तुम्हारा कल्याण होगा । इस प्रकार प्रसन्न ॥ ५६ होकर उन्होंने लक्ष्मीको नारायणको समर्पित कर दिया । तत्पश्चात् वे जगत्पति उन दोनोंके साथ वैकुण्ठको

चले गये ॥ ५५-५७ ॥

॥ ५७ राधाके अंशसे प्रकट वे दोनों लक्ष्मी तथा । सरस्वती निःसन्तान ही रहीं । भगवान् नारायणके ॥ ५८ । अंगसे चतुर्भुज पार्षद प्रकट हुए । वे तेज, वय, रूप और गुणोंमें नारायणके समान ही थे । उसी प्रकार । लक्ष्मीके अंगसे उनके ही समान करोड़ों दासियाँ ॥ ५ ९ | प्रकट हो गयीं ॥ ५८-५९ ॥

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३०६ अथ गोलोकनाथस्य लोम्नां विवरतो मुने भूताश्चासंख्यगोपाश्च वयसा तेजसा समाः रूपेण च गुणेनैव बलेन विक्रमेण च प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे बभूवुः पार्षदा विभोः राधाङ्गलोमकूपेभ्यो बभूवुर्गोपकन्यकाः राधातुल्याश्च ताः सर्वा राधादास्यः प्रियंवदाः रत्नभूषणभूषाढ्याः शश्वत्सुस्थिरयौवनाः अनपत्याश्च ताः सर्वाः पुंसः शापेन सन्ततम् एतस्मिन्नन्तरे विप्र सहसा कृष्णदेवता आविर्बभूव दुर्गा सा विष्णुमाया सनातनी देवी नारायणीशाना सर्वशक्तिस्वरूपिणी । बुद्ध्यधिष्ठात्री देवी सा कृष्णस्य परमात्मनः

देवीनां बीजरूपा च मूलप्रकृतिरीश्वरी ।

परिपूर्णतमा तेज: स्वरूपा त्रिगुणात्मिका ॥

तप्तकाञ्चनवर्णाभा कोटिसूर्यसमप्रभा । ईषद्धास्यप्रसन्नास्या सहस्त्रभुजसंयुता

नानाशस्त्रास्त्रनिकरं बिभ्रती सा त्रिलोचना ।

वह्निशुद्धां शुकाधाना रत्नभूषणभूषिता ॥

यस्याश्चांशांशकलया बभूवुः सर्वयोषितः ।

सर्वे विश्वस्थिता लोका मोहिताः स्युश्च मायया ॥

सर्वैश्वर्यप्रदात्री च कामिनां गृहवासिनाम् ।

कृष्णभक्तिप्रदा या च वैष्णवानां च वैष्णवी ॥

मुमुक्षूणां मोक्षदात्री सुखिनां सुखदायिनी ।

स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीश्च गृहलक्ष्मीर्गृहेषु च ॥

तपस्विषु तपस्या च श्रीरूपा तु नृपेषु च ।

या वह्नौ दाहिकारूपा प्रभारूपा च भास्करे ॥

शोभारूपा च चन्द्रे च सा पद्मेषु च शोभना ।

सर्वशक्तिस्वरूपा या श्रीकृष्णे परमात्मनि ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ । हे मुने! गोलोकनाथ श्रीकृष्णके रोमकूपोंसे ॥ ६० असंख्य गोपगण प्रकट हुए; जो वय, तेज, रूप, गुण, बल तथा पराक्रममें उन्हींके समान थे । वे सभी । परमेश्वर श्रीकृष्णके प्राणोंके समान प्रिय पार्षद बन ॥ ६१ गये ॥६०-६१ ॥ । श्रीराधाके अंगोंके रोमकूपोंसे अनेक गोपकन्याएँ प्रकट हुईं । वे सब राधाके ही समान थीं तथा उनकी ॥ ६२ प्रियवादिनी दासियोंके रूपमें रहती थीं । वे सभी । रत्नाभरणोंसे भूषित और सदा स्थिरयौवना थीं, किंतु ॥ ६३ परमात्माके शापके कारण वे सभी सदा सन्तानहीन रहीं । हे विप्र! इसी बीच श्रीकृष्णकी उपासना । करनेवाली सनातनी विष्णुमाया दुर्गा सहसा प्रकट ॥ ६४ हुईं । वे देवी सर्वशक्तिमती, नारायणी तथा ईशाना हैं और परमात्मा श्रीकृष्णकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं ॥ ६२—६५ ॥ ॥ ६५ सभी शक्तियोंकी बीजरूपा वे मूलप्रकृति ही ईश्वरी, परिपूर्णतमा तथा तेजपूर्ण त्रिगुणात्मिका ६६ हैं । वे तपाये हुए स्वर्णकी कान्तिवाली, कोटि सूर्योकी आभा धारण करनेवाली, किंचित् हास्यसे युक्त प्रसन्नवदनवाली तथा सहस्र भुजाओंसे ॥ ६७ शोभायमान हैं । वे त्रिलोचना भगवती नाना प्रकार के शस्त्रास्त्र - समूहोंको धारण करती हैं, अग्निसदृश ६८ विशुद्ध वस्त्र धारण किये हुए हैं और रत्नाभरणसे भूषित हैं ॥ ६६-६८ ॥ उन्हींकी अंशांशकलासे सभी नारियाँ प्रकट ६ ९ हुई हैं । उनकी मायासे विश्वके सभी प्राणी मोहित हो जाते हैं । वे गृहस्थ सकामजनोंको सब प्रकार ७० ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली, वैष्णवजनोंको वैष्णवी कृष्णभक्ति देनेवाली, मोक्षार्थी - जनोंको मोक्ष देनेवाली तथा सुख चाहनेवालोंको सुख प्रदान करनेवाली ७१ हैं ॥ ६ ९ -७०३ ॥ वे देवी स्वर्गमें स्वर्गलक्ष्मी, गृहोंमें गृहलक्ष्मी, तपस्वियोंमें तप तथा राजाओंमें राज्यलक्ष्मीके रूपमें ७२ स्थित हैं । वे अग्निमें दाहिका शक्ति, सूर्यमें प्रभारूप, चन्द्रमा तथा कमलोंमें शोभारूपसे और परमात्मा ७३ श्रीकृष्णमें सर्वशक्तिरूपसे विद्यमान हैं ॥ ७१–७३ ॥

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अ ० २ ]

यया च शक्तिमानात्मा यया च शक्तिमज्जगत् ।

यया विना जगत्सर्वं जीवन्मृतमिव स्थितम् ॥

या च संसारवृक्षस्य बीजरूपा सनातनी । स्थितिरूपा वृद्धिरूपा फलरूपा च नारद ।

क्षुत्पिपासादयारूपा निद्रा तन्द्रा क्षमा मतिः ।

शान्तिलज्जातुष्टिपुष्टिभ्रान्तिकान्त्यादिरूपिणी ॥

सा च संस्तूय सर्वेशं तत्पुरः समुवास ह ।

रत्नसिंहासनं तस्यै प्रददौ राधिकेश्वरः ॥

एतस्मिन्नन्तरे तत्र सस्त्रीकश्च चतुर्मुखः ।

पद्मनाभेर्नाभिपद्मान्निः ससार महामुने ॥

कमण्डलुधरः श्रीमांस्तपस्वी ज्ञानिनां वरः ।

चतुर्मुखैस्तं तुष्टाव प्रज्वलन्ब्रह्मतेजसा ॥

सा तदा सुन्दरी सृष्टा शतचन्द्रसमप्रभा ।

वह्निशुद्धां शुकाधाना रत्नभूषणभूषणा ॥

रत्नसिंहासने रम्ये संस्तूय सर्वकारणम् ।

उवास स्वामिना सार्धं कृष्णस्य पुरतो मुदा ॥

एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो द्विधारूपो बभूव सः ।

वामार्धाङ्गो महादेवो दक्षिणे गोपिकापतिः ॥

शुद्धस्फटिकसंकाशः शतकोटिरविप्रभः ।

त्रिशूलपट्टिशधरो व्याघ्रचर्माम्बरो हरः ॥

तप्तकाञ्चनवर्णाभो जटाभारधरः परः ।

भस्मभूषितगात्रश्च सस्मितश्चन्द्रशेखरः ॥

दिगम्बरो नीलकण्ठः सर्पभूषणभूषितः ।

बिभ्रद्दक्षिणहस्तेन रत्नमालां सुसंस्कृताम् ॥

नवम स्कन्ध ३०७ हे नारद! जिनसे परमात्मा शक्तिसम्पन्न होता है ७४ तथा जगत् भी शक्ति प्राप्त करता है और जिनके बिना सारा चराचर विश्व जीते हुए भी मृतकतुल्य हो जाता है, जो सनातनी संसाररूपी बीजरूपसे वर्तमान हैं, वे ७५ ही समस्त सृष्टिकी स्थिति, वृद्धि और फलरूपसे स्थित हैं ॥ ७४-७५ ॥ वे ही भूख - प्यास, दया, निद्रा, तन्द्रा, क्षमा, ७६ मति, शान्ति, लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, भ्रान्ति तथा कान्तिरूपसे सर्वत्र विराजती हैं । सर्वेश्वर प्रभुकी स्तुति करके वे उनके समक्ष स्थित हो गयीं । ७७ राधिकाके ईश्वर श्रीकृष्णने उन्हें रत्नसिंहासन प्रदान

किया । ७६-७७ ॥

हे महामुने! इसी समय वहाँ सपत्नीक ब्रह्माजी पद्मनाभ भगवान्‌के नाभिकमलसे प्रकट हुए । ज्ञानियोंमें ७८ श्रेष्ठ तथा परम तपस्वी वे ब्रह्मा कमण्डलु धारण किये हुए थे । देदीप्यमान वे ब्रह्मा चारों मुखोंसे श्रीकृष्णकी ७ ९ स्तुति करने लगे ॥ ७८-७९ ॥ सैकड़ों चन्द्रमाके समान कान्तिवाली, अग्निके समान चमकीले वस्त्रोंको धारण किये और रत्नाभरणोंसे भूषित प्रकट हुईं वे सुन्दरी सबके कारणभूत परमात्माकी ८० स्तुति करके अपने स्वामी श्रीकृष्णके साथ रमणीय रत्नसिंहासनपर उनके समक्ष प्रसन्नतापूर्वक बैठ गयीं ॥ ८०-८१ ॥ ८१ उसी समय वे श्रीकृष्ण दो रूपोंमें विभक्त हो गये । उनका वाम अर्धांग महादेवके रूपमें परिणत हो गया और दक्षिण अर्धांग गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण ही ८२ बना रह गया । वे महादेव शुद्ध स्फटिकके समान प्रभायुक्त थे, शतकोटि सूर्यकी प्रभासे सम्पन्न थे, त्रिशूल तथा पट्टिश धारण किये हुए थे तथा बाघम्बर ८३ पहने हुए थे । वे परमेश्वर तप्त स्वर्णके समान कान्तिवाले थे, वे जटाजूट धारण किये हुए थे, उनका शरीर भस्मसे विभूषित था, वे मन्द मन्द मुसकरा रहे ८४ थे । उन्होंने मस्तकपर चन्द्रमाको धारण कर रखा था । वे दिगम्बर नीलकण्ठ सर्पोंके आभूषणसे अलंकृत थे । उन्होंने दाहिने हाथमें सुसंस्कृत रत्नमाला धारण कर ८५ | रखी थी ॥ ८२ – ८५ ॥

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३०८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३

प्रजपन्पञ्चवक्त्रेण ब्रह्मज्योतिः सनातनम् ।

सत्यस्वरूपं श्रीकृष्णं परमात्मानमीश्वरम् ॥ ८६

कारणं कारणानां च सर्वमङ्गलमङ्गलम् ।

जन्ममृत्युजराव्याधिशोक भीतिहरं परम् ॥ ८७

संस्तूय मृत्योर्मृत्युं तं यतो मृत्युञ्जयाभिधः ।

रत्नसिंहासने रम्ये समुवास हरेः पुरः ॥ ८८

वे पाँचों मुखोंसे सनातन ब्रह्मज्योतिका जप कर रहे थे । उन सत्यस्वरूप, परमात्मा, ईश्वर, सभी कारणोंके कारण, सभी मंगलोंके भी मंगल, जन्म-मृत्यु, जरा- व्याधि - शोक और भयको दूर करनेवाले, कालके काल, श्रेष्ठ श्रीकृष्णकी स्तुति करके मृत्युंजय नामसे विख्यात हुए वे शिव विष्णुके समक्ष रमणीय । रत्नसिंहासनपर बैठ गये॥८६–८८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे पञ्चप्रकृतितद्भर्तृगणोत्पत्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

IIIIII IIIIIII अथ तृतीयोऽध्यायः परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी राधासे प्रकट विराट्रूप बालकका वर्णन श्रीनारायण उवाच

अथ डिम्भो जले तिष्ठन्यावद्वै ब्रह्मणो वयः ।

ततः स काले सहसा द्विधाभूतो बभूव ह ॥ १

तन्मध्ये शिशुरेकश्च शतकोटिरविप्रभः ।

क्षणं रोरूयमाणश्च स्तनान्धः पीडितः क्षुधा ॥ २

पित्रा मात्रा परित्यक्तो जलमध्ये निराश्रयः ।

ब्रह्माण्डासंख्यनाथो यो ददर्शोर्ध्वमनाथवत् ॥ ३

स्थूलात्स्थूलतमः सोऽपि नाम्ना देवो महाविराट् ।

परमाणुर्यथा सूक्ष्मात्परः स्थूलात्तथाप्यसौ ॥ ४

तेजसा षोडशांशोऽयं कृष्णस्य परमात्मनः ।

आधारः सर्वविश्वानां महाविष्णुश्च प्राकृतः ॥ ५

प्रत्येकं लोमकूपेषु विश्वानि निखिलानि च ।

अस्यापि तेषां संख्यां च कृष्णो वक्तुं न हि क्षमः ॥ ६

संख्या चेद्रजसामस्ति विश्वानां न कदाचन ।

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां तथा संख्या न विद्यते ॥ ७

प्रतिविश्वेषु सन्त्येवं ब्रह्मविष्णुशिवादयः । श्रीनारायण बोले- वह बालक जो पहले जलमें छोड़ दिया गया था, ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त जलमें ही पड़ा रहा । उसके बाद वह समय आनेपर अचानक ही दो रूपोंमें विभक्त हो गया ॥ १ ॥

उनमेंसे एक बालक शतकोटि सूर्योंकी आभासे युक्त था; माताके स्तनपानसे रहित वह भूखसे व्याकुल होकर बार - बार रो रहा था ॥ २ ॥

माता - पितासे परित्यक्त होकर आश्रयहीन उस बालकने जलमें रहते हुए अनन्त ब्रह्माण्डनायक होते हुए भी अनाथकी भाँति ऊपरकी ओर दृष्टि डाली ॥ ३ ॥

जैसे परमाणु सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म होता है, वैसे ही वह स्थूलसे भी स्थूल था । स्थूलसे भी स्थूलतम होनेसे वे देव महाविराट् नामसे प्रसिद्ध हुए । परमात्मा श्रीकृष्णके तेजसे सोलहवें अंशके रूपमें तथा प्रकृतिस्वरूपा राधासे उत्पन्न होनेके कारण यह सभी लोकोंका आधार तथा महाविष्णु कहा गया ॥ ४-५ ॥ उसके प्रत्येक रोमकूपमें अखिल ब्रह्माण्ड स्थित थे, उनकी संख्या श्रीकृष्ण भी बता पानेमें समर्थ नहीं हैं । जैसे पृथिवी आदि लोकोंमें व्याप्त रजकणोंकी संख्या कोई निर्धारित नहीं कर सकता, उसी प्रकार उसके रोमकूपस्थित ब्रह्मा, विष्णु, शिवादिकी संख्या भी निश्चित नहीं है । प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि विद्यमान हैं ॥ ६-७३ ॥

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अ ० ३ ] नवम पातालाद् ब्रह्मलोकान्तं ब्रह्माण्डं परिकीर्तितम् ॥ ८

तत ऊर्ध्वं च वैकुण्ठो ब्रह्माण्डाद् बहिरेव सः ।

तत ऊर्ध्वं च गोलोकः पञ्चाशत्कोटियोजनः ॥ ९

नित्यः सत्यस्वरूपश्च यथा कृष्णस्तथाप्ययम् ।

सप्तद्वीपमिता पृथ्वी सप्तसागरसंयुता ॥ १०

ऊनपञ्चाशदुपद्वीपासंख्यशैलवनान्विता I ऊर्ध्वं सप्त स्वर्गलोका ब्रह्मलोकसमन्विताः ॥ ११

पातालानि च सप्ताधश्चैवं ब्रह्माण्डमेव च ।

ऊर्ध्वं धराया भूर्लोको भुवर्लोकस्ततः परम् ॥ १२

ततः परश्च स्वर्लोको जनलोकस्तथा परः ।

तत: परस्तपोलोकः सत्यलोकस्ततः परः ॥ १३

ततः परं ब्रह्मलोकस्तप्तकाञ्चनसन्निभः ।

एवं सर्वं कृत्रिमं च बाह्याभ्यन्तरमेव च ॥ १४

तद्विनाशे विनाशश्च सर्वेषामेव नारद ।

जलबुद्बुदवत्सर्वं विश्वसंघमनित्यकम् ॥ १५

नित्यौ गोलोकवैकुण्ठौ प्रोक्तौ शश्वदकृत्रिमौ ।

प्रत्येकं लोमकूपेषु ब्रह्माण्डं परिनिश्चितम् ॥ १६

एषां संख्यां न जानाति कृष्णोऽन्यस्यापि का कथा ।

प्रत्येकं प्रतिब्रह्माण्डं ब्रह्मविष्णुशिवादयः ॥ १७

तिस्रः कोट्यः सुराणां च संख्या सर्वत्र पुत्रक ।

दिगीशाश्चैव दिक्पाला नक्षत्राणि ग्रहादयः ॥ १८

भुवि वर्णाश्च चत्वारोऽप्यधो नागाश्चराचराः ।

अथ कालेऽत्र स विराडूर्ध्वं दृष्ट्वा पुनः पुनः ॥ १ ९

डिम्भान्तरे च शून्यं च न द्वितीयं च किञ्चन ।

चिन्तामवाप क्षुद्युक्तो रुरोद च पुनः पुनः ॥ २०

ज्ञानं प्राप्य तदा दध्यौ कृष्णं परमपूरुषम् ।

ततो ददर्श तत्रैव ब्रह्मज्योतिः सनातनम् ॥ २१

स्कन्ध ३० ९ पातालसे ब्रह्मलोकपर्यन्त ब्रह्माण्ड कहा गया है । उसके ऊपर वैकुण्ठलोक है; वह ब्रह्माण्ड से बाहर है । उसके ऊपर पचास करोड़ योजन विस्तारवाला गोलोक है । जैसे श्रीकृष्ण नित्य और सत्यस्वरूप हैं, वैसे ही यह गोलोक भी है ॥ ८ - ९ ३ ॥ यह पृथ्वी सात द्वीपोंवाली तथा सात महासागरोंसे समन्वित है । इसमें उनचास उपद्वीप हैं और असंख्य वन तथा पर्वत हैं । इसके ऊपर सात स्वर्गलोक हैं, जिनमें ब्रह्मलोक भी सम्मिलित है । इसके नीचे सात पाताल - लोक भी हैं; यह सब मिलाकर ब्रह्माण्ड कहा जाता है॥१०-११३ ॥ पृथ्वीसे ऊपर भूर्लोक, उसके बाद भुवर्लोक, उसके ऊपर स्वर्लोक, तत्पश्चात् जनलोक, फिर तपोलोक और उसके आगे सत्यलोक है । उसके भी ऊपर तप्त स्वर्णकी आभावाला ब्रह्मलोक है । ब्रह्माण्डके बाहर - भीतर स्थित रहनेवाले ये सब कृत्रिम हैं । हे नारद! उस ब्रह्माण्डके नष्ट होनेपर उन सबका विनाश हो जाता है; क्योंकि जलके बुलबुलेकी तरह यह सब लोक- - समूह अनित्य है ॥ १२–१५ ॥ गोलोक और वैकुण्ठ सनातन, अकृत्रिम और नित्य बताये गये हैं । महाविष्णुके प्रत्येक रोमकूपमें ब्रह्माण्ड स्थित रहते हैं । इनकी संख्या श्रीकृष्ण भी नहीं जानते, फिर दूसरेकी क्या बात? प्रत्येक ब्रह्माण्डमें अलग - अलग ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि विराजमान रहते हैं । हे पुत्र! देवताओंकी संख्या वहाँ तीस करोड़ है । दिगीश्वर, दिक्पाल, ग्रह, नक्षत्र आदि भी ब्रह्माण्डमें विद्यमान रहते हैं । पृथ्वीपर चार वर्णके लोग और उसके नीचे पाताललोकमें नाग रहते हैं; इस प्रकार ब्रह्माण्डमें चराचर प्राणी विद्यमान हैं ॥ १६–१८३ ॥ तदनन्तर उस विराट्स्वरूप बालकने बार - बार ऊपरकी ओर देखा; किंतु उस गोलाकार पिण्डमें शून्यके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं था । तब वह चिन्तित हो उठा और भूखसे व्याकुल होकर बार-बार रोने लगा ॥ १ ९ -२० ॥ चेतनामें आकर जब उसने परमात्मा श्रीकृष्णका । ध्यान किया तब उसे सनातन ब्रह्मज्योतिके दर्शन हुए ।

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३१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३

नवीनजलदश्यामं द्विभुजं पीतवाससम् ।

सस्मितं मुरलीहस्तं भक्तानुग्रहकातरम् ॥ २२

जहास बालकस्तुष्टो दृष्ट्वा जनकमीश्वरम् ।

वरं तदा ददौ तस्मै वरेशः समयोचितम् ॥ २३

मत्समो ज्ञानयुक्तश्च क्षुत्पिपासादिवर्जितः ।

ब्रह्माण्डासंख्यनिलयो भव वत्स लयावधि ॥ २४

निष्कामो निर्भयश्चैव सर्वेषां वरदो भव ।

जरामृत्युरोगशोकपीडादिवर्जितो भव ॥२५

इत्युक्त्वा तस्य कर्णे स महामन्त्रं षडक्षरम् ।

त्रिःकृत्वश्च प्रजजाप वेदाङ्गप्रवरं परम् ॥ २६

प्रणवादिचतुर्थ्यन्तं कृष्ण इत्यक्षरद्वयम् ।

वह्निजायान्तमिष्टं च सर्वविघ्नहरं परम् ॥ २७

मन्त्रं दत्त्वा तदाहारं कल्पयामास वै विभुः ।

श्रूयतां तद् ब्रह्मपुत्र निबोध कथयामि ते ॥ २८

प्रतिविश्वं यन्नैवेद्यं ददाति वैष्णवो जनः ।

तत्षोडशांशो विषयिणो विष्णोः पञ्चदशास्य वै ॥ २ ९

निर्गुणस्यात्मनश्चैव परिपूर्णतमस्य च ।

नैवेद्ये चैव कृष्णस्य न हि किञ्चित्प्रयोजनम् ॥ ३०

यद्यद्ददाति नैवेद्यं तस्मै देवाय यो जनः ।

स च खादति तत्सर्वं लक्ष्मीनाथो विराट् तथा ॥ ३१

तं च मन्त्रवरं दत्त्वा तमुवाच पुनर्विभुः ।

वरमन्यं किमिष्टं ते तन्मे ब्रूहि ददामि च ॥ ३२

कृष्णस्य वचनं श्रुत्वा तमुवाच विराड् विभुः ।

कृष्णं तं बालकस्तावद्वचनं समयोचितम् ॥ ३३

बालक उवाच

वरो मे त्वत्पदाम्भोजे भक्तिर्भवतु निश्चला ।

सततं यावदायुर्मे क्षणं वा सुचिरं च वा ॥ ३४

त्वद्भक्तियुक्तलोकेऽस्मिञ्जीवन्मुक्तश्च सन्ततम् ।

त्वद्भक्तिहीनो मूर्खश्च जीवन्नपि मृतो हि सः ॥ ३५

नवीन मेघके समान श्याम वर्ण, दो भुजाओंवाले, पीताम्बर धारण किये, मुसकानयुक्त, हाथमें मुरली धारण किये, भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल पिता परमेश्वरको देखकर वह बालक प्रसन्न होकर हँस पड़ा ॥ २१-२२३ ॥ तब वरके अधिदेव प्रभुने उसे यह समयोचित वर प्रदान किया - हे वत्स! तुम मेरे समान ही ज्ञानसम्पन्न, भूख - प्यास से रहित तथा प्रलयपर्यन्त असंख्य ब्रह्माण्डके आश्रय रहो । तुम निष्काम, निर्भय तथा सभीको वर प्रदान करनेवाले हो जाओ; जरा, मृत्यु, रोग, शोक, पीडा आदिसे रहित हो जाओ ॥ २३ - २५ ॥ ऐसा कहकर उसके कानमें उन्होंने वेदोंके प्रधान अंगस्वरूप श्रेष्ठ षडक्षर महामन्त्रका तीन बार उच्चारण किया । आदिमें प्रणव तथा इसके बाद दो अक्षरोंवाले कृष्ण शब्दमें चतुर्थी विभक्ति लगाकर अन्तमें स्वाहासे संयुक्त यह परम अभीष्ट मन्त्र ( ॐ कृष्णाय स्वाहा ) सभी विघ्नोंका नाश करनेवाला है॥२६-२७ ॥ मन्त्र देकर प्रभुने उसके आहारकी भी व्यवस्था की । हे ब्रह्मपुत्र! उसे सुनिये, मैं आपको बताता हूँ । प्रत्येक लोकमें वैष्णवभक्त जो नैवेद्य अर्पित करता है, उसका सोलहवाँ भाग तो भगवान् विष्णुका होता है तथा पन्द्रह भाग इस विराट् पुरुषके होते हैं ॥ २८-२९ ॥ उन परिपूर्णतम तथा निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णको तो नैवेद्यसे कोई प्रयोजन नहीं है । भक्त उन प्रभुको जो कुछ भी नैवेद्य अर्पित करता है, उसे वे लक्ष्मीनाथ विराट् पुरुष ग्रहण करते हैं ॥ ३०-३१ ॥ उस बालकको श्रेष्ठ मन्त्र प्रदान करके प्रभुने उससे पुन: पूछा कि तुम्हें दूसरा कौन - सा वर अभीष्ट है, उसे मुझे बताओ; मैं देता हूँ । श्रीकृष्णकी बात सुनकर बालकरूप उन विराट् प्रभुने कृष्णसे समयोचित बात कही ॥ ३२-३३ ॥ बालक बोला- मेरा वर है आपके चरणकमलमें मेरी अविचल भक्ति आयुपर्यन्त निरन्तर बनी रहे । मेरी आयु चाहे क्षणभरकी ही हो या अत्यन्त दीर्घ । इस लोकमें आपकी भक्तिसे युक्त प्राणी जीवन्मुक्त ही है और जो आपकी भक्तिसे रहित है, वह मूर्ख जीते हुए भी मरेके समान है ॥ ३४-३५ ॥

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अ ० ३ ] नवम स्कन्ध ३११ किं तज्जपेन तपसा यज्ञेन पूजनेन च व्रतेन चोपवासेन पुण्येन तीर्थसेवया कृष्णभक्तिविहीनस्य मूर्खस्य जीवनं वृथा येनात्मना जीवितश्च तमेव न हि मन्यते यावदात्मा शरीरेऽस्ति तावत्स शक्तिसंयुतः पश्चाद्यान्ति गते तस्मिन्स्वतन्त्राः सर्वशक्तयः स च त्वं च महाभाग सर्वात्मा प्रकृतेः परः स्वेच्छामयश्च सर्वाद्यो ब्रह्मज्योतिः सनातनः इत्युक्त्वा बालकस्तत्र विरराम च नारद उवाच कृष्णः प्रत्युक्तिं मधुरां श्रुतिसुन्दरीम् ॥ श्रीकृष्ण उवाच सुचिरं सुस्थिरं तिष्ठ यथाहं त्वं तथा भव ब्रह्मणोऽसंख्यपाते च पातस्ते न भविष्यति अंशेन प्रतिब्रह्माण्डे त्वं च क्षुद्रविराड् भव त्वन्नाभिपद्माद् ब्रह्मा च विश्वस्स्रष्टा भविष्यति ललाटे ब्रह्मणश्चैव रुद्राश्चैकादशैव ते शिवांशेन भविष्यन्ति सृष्टिसंहरणाय वै कालाग्निरुद्रस्तेष्वेको विश्वसंहारकारकः पाता विष्णुश्च विषयी रुद्रांशेन भविष्यति मद्भक्तियुक्तः सततं भविष्यसि वरेण मे ध्यानेन कमनीयं मां नित्यं द्रक्ष्यसि निश्चितम् मातरं कमनीयां च मम वक्षःस्थलस्थिताम् यामि लोकं तिष्ठ वत्सेत्युक्त्वा सोऽन्तरधीयत गत्वा स्वलोकं ब्रह्माणं शङ्करं समुवाच ह स्रष्टारं स्रष्टुमीशं च संहर्तुं चैव तत्क्षणम् श्रीभगवानुवाच सृष्टिं स्रष्टुं गच्छ वत्स नाभिपद्मोद्भवो भव महाविराड् लोमकूपे क्षुद्रस्य च विधे शृणु । उस जप, तप, यज्ञ, पूजन, व्रत, उपवास, पुण्य ॥ ३६ तथा तीर्थसेवनसे क्या लाभ है; जो आपकी भक्तिसे रहित है । कृष्णभक्तिसे रहित मूर्खका जीवन ही व्यर्थ । है जो कि वह उस परमात्माको ही नहीं भजता, ॥ ३७ जिसके कारण वह जीवित है ॥ ३६-३७ ॥ । जबतक आत्मा शरीरमें है, तभीतक प्राणी शक्ति-सम्पन्न रहता है । उस आत्माके निकल जानेके बाद ॥ ३८ वे सारी शक्तियाँ स्वतन्त्र होकर चली जाती हैं ॥ ३८ ॥

। हे महाभाग! वे आप सबकी आत्मारूप हैं तथा ॥ ३ ९ प्रकृतिसे परे हैं । आप स्वेच्छामय, सबके आदि, सनातन तथा ब्रह्मज्योतिस्वरूप हैं ॥ ३ ९ ॥ । हे नारदजी! यह कहकर वह बालक चुप हो ४० गया । तब श्रीकृष्णने मधुर और कानोंको प्रिय लगनेवाली वाणीमें उसे प्रत्युत्तर दिया ॥ ४० ॥

श्रीकृष्ण बोले- तुम बहुत कालतक स्थिर । भावसे रहो, जैसे मैं हूँ वैसे ही तुम भी हो जाओ । ॥ ४१ असंख्य ब्रह्माके नष्ट होनेपर भी तुम्हारा नाश नहीं । होगा । प्रत्येक ब्रह्माण्डमें तुम अपने अंशसे क्षुद्रविराट्रूपमें ॥ ४२ स्थित रहोगे । तुम्हारे नाभिकमलसे उत्पन्न होकर ब्रह्मा विश्वका सृजन करनेवाले होंगे । सृष्टिके संहारकार्यके । लिये ब्रह्माके ललाटमें शिवांशसे वे ग्यारह रुद्र प्रकट ॥ ४३ होंगे । उनमेंसे एक कालाग्नि नामक रुद्र विश्वका । संहार करनेवाले होंगे । तत्पश्चात् विश्वका पालन करनेवाले भोक्ता विष्णु भी रुद्रांशसे प्रकट होंगे । मेरे ॥ ४४ वरके प्रभावसे तुम सदा ही मेरी भक्तिसे युक्त रहोगे ॥ तुम मुझ परम सुन्दर [ जगत्पिता ] तथा मेरे वक्ष: स्थलमें ॥ ४५ निवास करनेवाली मनोहर जगन्माताको ध्यानके द्वारा निश्चितरूपसे निरन्तर देख सकोगे । हे वत्स! अब तुम । यहाँ रहो, मैं अपने लोकको जा रहा हूँ- ऐसा ॥ ४६ कहकर वे प्रभु श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये । अपने । लोकमें जाकर उन्होंने सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीको सृष्टि ॥ ४७ करनेके लिये तथा [ संहारकर्ता ] शंकरजीको संहार करनेके लिये आदेश दिया ॥ ४१ - ४७ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे वत्स! सृष्टिकी रचना । करनेके लिये जाओ । हे विधे! सुनो, महाविराट्के ॥ ४८ एक रोमकूपमें स्थित क्षुद्रविराट्के नाभिकमलसे प्रकट