देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 301–310

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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२ ९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १

विषयज्ञानवाग्रूपा प्रतिविश्वोपजीविनी ।

व्याख्यावादकरी शान्ता वीणापुस्तकधारिणी ॥

शुद्धसत्त्वस्वरूपा च सुशीला श्रीहरिप्रिया ।

हिमचन्दनकुन्देन्दुकुमुदाम्भोजसन्निभा ॥

यजन्ती परमात्मानं श्रीकृष्णं रत्नमालया ।

तपःस्वरूपा तपसां फलदात्री तपस्विनाम् ॥

सिद्धिविद्यास्वरूपा च सर्वसिद्धिप्रदा सदा ।

यया विना तु विप्रौघो मूको मृतसमः सदा ॥

देवी तृतीया गदिता श्रुत्युक्ता जगदम्बिका । यथागमं यथाकिञ्चिदपरां त्वं निबोध मे ।

माता चतुर्णां वर्णानां वेदाङ्गानां च छन्दसाम् ।

सन्ध्यावन्दनमन्त्राणां तन्त्राणां च विचक्षणा ॥

द्विजातिजातिरूपा च जपरूपा तपस्विनी ।

ब्रह्मण्यतेजोरूपा च सर्वसंस्काररूपिणी ॥

पवित्ररूपा सावित्री गायत्री ब्रह्मणः प्रिया ।

तीर्थानि यस्याः संस्पर्शं वाञ्छन्ति ह्यात्मशुद्धये ॥

शुद्धस्फटिकसंकाशा शुद्धसत्त्वस्वरूपिणी ।

परमानन्दरूपा च परमा च सनातनी ॥

परब्रह्मस्वरूपा च निर्वाणपददायिनी ।

ब्रह्मतेजोमयी शक्तिस्तदधिष्ठातृदेवता ॥

यत्पादरजसा पूतं जगत्सर्वं च नारद ।

देवी चतुर्थी कथिता पञ्चमीं वर्णयामि ते ॥

पञ्चप्राणाधिदेवी या पञ्चप्राणस्वरूपिणी ।

प्राणाधिकप्रियतमा सर्वाभ्यः सुन्दरी परा ॥

सर्वयुक्ता च सौभाग्यमानिनी गौरवान्विता ।

वामाङ्गार्धस्वरूपा च गुणेन तेजसा समा ॥

परावरा सारभूता परमाद्या सनातनी ।

परमानन्दरूपा च धन्या मान्या च पूजिता ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —10 D सत्त्वगुणमयी, सुशील तथा श्रीहरिकी प्रिया हैं । ३३ उनकी कान्ति हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद और श्वेत कमलके समान है । रत्नमाला लेकर परमात्मा श्रीकृष्णका जप करती हुई वे साक्षात् तपःस्वरूपा हैं ३४ तथा तपस्वियोंको उनकी तपस्याका फल प्रदान करनेवाली हैं । वे सिद्धिविद्यास्वरूपा और सदा सब ३५ प्रकारकी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली हैं । जिनकी कृपाके बिना विप्रसमूह सदा मूक और मृततुल्य रहता है, उन श्रुतिप्रतिपादित तथा ३६ शक्ति जगदम्बिका भगवती वर्णन मैंने किया । अब अन्य मुझसे सुनिये ॥ २ ९ – ३७ ॥ ३७ वे विचक्षण सावित्री छन्दों, सन्ध्यावन्दनके मन्त्रों आगममें वर्णित तृतीया सरस्वतीका यत्किंचित् शक्तिके विषयमें आप चारों वर्णों, वेदांगों, एवं समस्त तन्त्रोंकी ३८ जननी हैं । वे द्विजातियोंकी जातिरूपा हैं; जपरूपिणी, तपस्विनी, ब्राह्मणोंकी तेजरूपा और सर्वसंस्काररूपिणी हैं ॥३८-३९ ॥ ३ ९ वे ब्रह्मप्रिया सावित्री और गायत्री परम पवित्र रूपसे विराजमान रहती हैं, तीर्थ भी ४० अपनी शुद्धिके लिये जिनके स्पर्शकी इच्छा करते हैं ॥ ४० ॥

वे शुद्ध स्फटिककी कान्तिवाली, शुद्धसत्त्व-४१ गुणमयी, सनातनी, पराशक्ति तथा परमानन्दरूपा हैं । हे नारद! वे परब्रह्मस्वरूपा, मुक्तिप्रदायिनी, ब्रह्मतेजोमयी, शक्तिस्वरूपा तथा शक्तिकी अधिष्ठातृ-४२ देवता भी हैं, जिनके चरणरजसे समस्त संसार पवित्र हो जाता है । इस प्रकार चौथी शक्तिका वर्णन ४३ कर दिया । अब पाँचवीं शक्तिके विषयमें आपसे कहता हूँ॥४१–४३ ॥ जो पंच प्राणोंकी अधिष्ठात्री, पंच प्राणस्वरूपा, ४४ सभी शक्तियोंमें परम सुन्दरी, परमात्माके लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम, सर्वगुणसम्पन्न, सौभाग्यमानिनी, ४५ गौरवमयी, श्रीकृष्णकी वामांगार्धस्वरूपा और गुण-तेजमें परमात्माके समान ही हैं; वे परावरा, सारभूता, परमा, आदिरूपा, सनातनी, परमानन्दमयी, धन्य, ४६ | मान्य और पूज्य हैं॥४४–४६ ॥

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अ ० १ ]

रासक्रीडाधिदेवी श्रीकृष्णस्य परमात्मनः ।

रासमण्डलसम्भूता रासमण्डलमण्डिता ॥

रासेश्वरी सुरसिका रासावासनिवासिनी ।

गोलोकवासिनी देवी गोपीवेषविधायिका ॥

परमाह्लादरूपा च सन्तोषहर्षरूपिणी ।

निर्गुणा च निराकारा निर्लिप्तात्मस्वरूपिणी ॥

निरीहा निरहङ्कारा भक्तानुग्रहविग्रहा ।

वेदानुसारिध्यानेन विज्ञाता सा विचक्षणैः ॥

दृष्टिदृष्टा न सा चेशैः सुरेन्द्रैर्मुनिपुङ्गवैः ।

वह्निशुद्धांशुक धरा नानालङ्कारभूषिता ॥

कोटिचन्द्रप्रभा पुष्ट सर्व श्रीयुक्तविग्रहा ।

श्रीकृष्णभक्तिदास्यैककरा च सर्वसम्पदाम् ॥

अवतारे च वाराहे वृषभानुसुता च या ।

यत्पादपद्मसंस्पर्शात्पवित्रा च वसुन्धरा ॥

ब्रह्मादिभिरदृष्टा या सर्वैर्दृष्टा च भारते । स्त्रीरत्नसारसम्भूता कृष्णवक्षःस्थले स्थिता यथाम्बरे नवघने लोला सौदामनी मुने । षष्टिवर्षसहस्राणि प्रतप्तं ब्रह्मणा पुरा यत्पादपद्मनखरदृष्टये चात्मशुद्धये । न च दृष्टं च स्वप्नेऽपि प्रत्यक्षस्यापि का कथा तेनैव तपसा दृष्टा भुवि वृन्दावने वने । कथिता पञ्चमीदेवी सा राधा च प्रकीर्तिता अंशरूपाः कलारूपा: कलांशांशांशसम्भवाः प्रकृतेः प्रतिविश्वेषु देव्यश्च सर्वयोषितः परिपूर्णतमाः पञ्च विद्यादेव्यः प्रकीर्तिताः या याः प्रधानांशरूपा वर्णयामि निशामय नवम स्कन्ध २ ९ ३ वे परमात्मा श्रीकृष्णके रासक्रीडाकी अधिष्ठातृदेवी ४७ हैं, रासमण्डलमें उनका आविर्भाव हुआ है, वे रासमण्डलसे सुशोभित हैं; वे देवी रासेश्वरी, सुरसिका, रासरूपी आवासमें निवास करनेवाली, गोलोकमें निवास ४८ करनेवाली, गोपीवेष धारण करनेवाली, परम आह्लाद-स्वरूपा, सन्तोष तथा हर्षरूपा, आत्मस्वरूपा, निर्गुण, निराकार और सर्वथा निर्लिप्त हैं ॥ ४७–४९ ॥ ४ ९ वे इच्छारहित, अहंकाररहित और भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाली हैं । बुद्धिमान् लोगोंने वेदविहित मार्गसे ध्यान करके उन्हें जाना है ॥ ५० ॥

५० वे ईश्वरों, देवेन्द्रों और मुनिश्रेष्ठोंके दृष्टिपथमें भी नहीं आतीं । वे अग्निके समान शुद्ध वस्त्रोंको धारण करनेवाली, विविध अलंकारोंसे विभूषित, ५१ कोटिचन्द्रप्रभासे युक्त और पुष्ट तथा समस्त ऐश्वर्योंसे समन्वित विग्रहवाली हैं । वे भगवान् श्रीकृष्णकी अद्वितीय दास्यभक्ति तथा सम्पदा प्रदान करनेवाली ५२ हैं॥५१-५२ ॥ वाराहकल्पमें उन्होंने [ व्रजमण्डलमें ] वृषभानुकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया, जिनके चरणकमलोंके ५३ स्पर्शसे पृथ्वी पवित्र हुई । ब्रह्मादि देवोंके द्वारा भी जो अदृष्ट थीं, वे भारतवर्षमें सर्वसाधारणको दृष्टिगत ॥ ५४ हुईं । हे मुने! स्त्रीरत्नोंमें सारस्वरूप वे भगवान् श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें उसी प्रकार सुशोभित हैं, जैसे आकाशमण्डलमें नवीन मेघोंके बीच विद्युत्-॥ ५५ ता सुशोभित होती है । पूर्वकालमें ब्रह्माजीने आत्मशुद्धिहेतु जिनके चरणकमलके नखके दर्शनके लिये साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की, किंतु स्वप्नमें भी नखज्योतिका ॥ ५६ दर्शन नहीं हुआ; साक्षात् दर्शनकी तो बात ही क्या? उन्हीं ब्रह्माने पृथ्वीतलके वृन्दावनमें तपस्याके द्वारा उनका दर्शन किया । मैंने पाँचवीं देवीका वर्णन कर ॥ ५७ दिया; वे ही राधा कही गयी हैं ॥ ५३–५७ ॥ प्रत्येक भुवनमें सभी देवियाँ और नारियाँ इन्हीं । प्रकृतिदेवीकी अंश, कला, कलांश अथवा अंशांशसे ॥ ५८ उत्पन्न हैं ॥ ५८ ॥

भगवतीके पूर्णावताररूपमें जो - जो प्रधान । अंशस्वरूपा पाँच विद्यादेवियाँ कही गयी हैं, उनका ॥ ५ ९ । वर्णन कर रहा हूँ; सुनिये ॥ ५ ९ ॥

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२ ९ ४ प्रधानांशस्वरूपा सा गङ्गा भुवनपावनी विष्णुविग्रहसम्भूता द्रवरूपा सनातनी पापिपापेध्मदाहाय ज्वलदग्निस्वरूपिणी सुखस्पर्शा स्नानपानैर्निर्वाणपददायिनी गोलोकस्थानप्रस्थानसुखसोपानरूपिणी पवित्ररूपा तीर्थानां सरितां च परावरा शम्भुमौलिजटामेरुमुक्तापंक्तिस्वरूपिणी तपःसम्पादिनी श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ । लोकपावनी गंगा प्रधान अंशस्वरूपा हैं, वे ॥ ६० । भगवान् विष्णुके श्रीविग्रहसे प्रकट हुई हैं तथा सनातनरूपसे ब्रह्मद्रव होकर विराजती हैं ॥ ६० ॥

। गंगा पापियोंके पापरूप ईंधनके दाहके लिये ॥ ६१ धधकती अग्निके समान हैं; किंतु [ भक्तोंके लिये ]

सुखस्पर्शिणी तथा स्नान - आचमनादिसे मुक्तिपद-। प्रदायिनी हैं ॥ ६१ ॥

गंगा गोलोकादि दिव्य लोकोंमें जानेके लिये ॥ ६२ सुखद सीढ़ीके समान, तीर्थोंको पावन करनेवाली । तथा नदियोंमें श्रेष्ठतम हैं । भगवान् शंकरके जटाजूटमें मुक्कामालकी भाँति सुशोभित होनेवाली वे गंगा सद्यो भारतेषु तपस्विनाम् ॥ ६३ भारतवर्ष में तपस्वीजनोंकी तपस्याको शीघ्र सफल चन्द्रपद्मक्षीरनिभा शुद्धसत्त्वस्वरूपिणी निर्मला निरहङ्कारा साध्वी नारायणप्रिया ॥ प्रधानांशस्वरूपा च तुलसी विष्णुकामिनी विष्णुभूषणरूपा च विष्णुपादस्थिता सती तपःसंकल्पपूजादिसङ्घसम्पादिनी मुने सारभूता च पुष्पाणां पवित्रा पुण्यदा सदा दर्शनस्पर्शनाभ्यां च सद्यो निर्वाणदायिनी कलौ कलुषशुष्केध्मदहनायाग्निरूपिणी यत्पादपद्मसंस्पर्शात्सद्यः पूता वसुन्धरा यत्स्पर्शदर्शने चैवेच्छन्ति तीर्थानि शुद्धये यया विना च विश्वेषु सर्वकर्म च निष्फलम् मोक्षदा या मुमुक्षूणां कामिनी सर्वकामदा कल्पवृक्षस्वरूपा या भारते वृक्षरूपिणी । भारतीनां प्रीणनाय जाता या परदेवता प्रधानांशस्वरूपा या मनसा कश्यपात्मजा शङ्करप्रियशिष्या च महाज्ञानविशारदा करती रहती हैं । उनका जल चन्द्रमा, दुग्ध और श्वेत । कमलके समान धवल है और वे शुद्ध सत्त्वरूपिणी ६४ हैं । वे निर्मल, निरहंकार, साध्वी और नारायणप्रिया हैं ॥ ६२–६४ ॥ । विष्णुवल्लभा तुलसी भी भगवतीकी प्रधानांशस्वरूपा ॥ ६५ हैं । वे सती सदा भगवान् विष्णुके चरणपर विराजती हैं और उनकी आभूषणरूपा हैं । हे मुने! उनसे तप, । संकल्प और पूजादिके सभी सत्कर्मोंका सम्पादन ॥ ६६ होता है, वे सभी पुष्पोंकी सारभूता हैं तथा सदैव पवित्र एवं पुण्यप्रदा हैं ॥ ६५-६६ ॥ । वे अपने दर्शन एवं स्पर्शसे शीघ्र ही मोक्षपद ॥ ६७ देनेवाली हैं । कलिके पापरूप शुष्क ईंधनको जलानेके लिये वे अग्निस्वरूपा हैं । जिनके चरणकमलके । संस्पर्शसे पृथ्वी शीघ्र पवित्र हो जाती है और तीर्थ भी ॥ ६८ जिनके दर्शन तथा स्पर्शसे स्वयंको पवित्र करनेके लिये कामना करते हैं ॥ ६७-६८ ॥ । जिनके बिना सम्पूर्ण जगत् में सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं । जो मुमुक्षुजनोंको मोक्ष देनेवाली ॥ ६ ९हैं, कामिनी हैं और सब प्रकारके भोग प्रदान करनेवाली हैं । कल्पवृक्षस्वरूपा जो परदेवता भारतीयोंको प्रसन्न करनेके लिये भारतवर्षमें वृक्षरूपमें प्रादुर्भूत ॥ ७० हुईं ॥ ६ ९ –७० ॥ कश्यपकी पुत्री मनसादेवी भी शक्तिके प्रधान । अंशसे प्रकट हुई हैं । वे भगवान् शंकरकी प्रिय शिष्या ॥ ७१ हैं तथा अत्यन्त ज्ञानविशारद हैं । नागराज अनन्तकी

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अ ० १ ] नवम

नागेश्वरस्यानन्तस्य भगिनी नागपूजिता ।

नागेश्वरी नागमाता सुन्दरी नागवाहिनी ॥ ७२

नागेन्द्रगणसंयुक्ता नागभूषणभूषिता ।

नागेन्द्रवन्दिता सिद्धा योगिनी नगशायिनी ॥ ७३

विष्णुरूपा विष्णुभक्ता विष्णुपूजापरायणा ।

तपःस्वरूपा तपसां फलदात्री तपस्विनी ॥ ७४

दिव्यं त्रिलक्षवर्षं च तपस्तप्त्वा च या हरेः ।

तपस्विनीषु पूज्या च तपस्विषु च भारते ॥ ७५

सर्वमन्त्राधिदेवी च ज्वलन्ती ब्रह्मतेजसा ।

ब्रह्मस्वरूपा परमा ब्रह्मभावनतत्परा ॥ ७६

जरत्कारुमुनेः पत्नी कृष्णांशस्य पतिव्रता ।

आस्तीकस्य मुनेर्माता प्रवरस्य तपस्विनाम् ॥ ७७

प्रधानांशस्वरूपा या देवसेना च नारद ।

मातृकासु पूज्यतमा सा षष्ठी च प्रकीर्तिता ॥ ७८

पुत्रपौत्रादिदात्री च धात्री त्रिजगतां सती ।

षष्ठांशरूपा प्रकृतेस्तेन षष्ठी प्रकीर्तिता ॥ ७ ९

स्थाने शिशूनां परमा वृद्धरूपा च योगिनी ।

पूजा द्वादशमासेषु यस्या विश्वेषु सन्ततम् ॥ ८०

पूजा च सूतिकागारे पुरा षष्ठदिने शिशोः ।

एकविंशतिमे चैव पूजा कल्याणहेतुकी ॥ ८१

मुनिभिर्नमिता चैषा नित्यकामाप्यतः परा ।

मातृका च दयारूपा शश्वद्रक्षणकारिणी ॥ ८२

जले स्थले चान्तरिक्षे शिशूनां सद्मगोचरे ।

प्रधानांशस्वरूपा च देवीमङ्गलचण्डिका ॥ ८३

प्रकृतेर्मुखसम्भूता सर्वमङ्गलदा सदा ।

सृष्टौ मङ्गलरूपा च संहारे कोपरूपिणी ॥ ८४

स्कन्ध २ ९ ५ बहन, नागोंसे पूजित नागमाता, नागोंपर शासन करनेवाली, सुन्दरी तथा नागवाहिनी हैं । वे बड़े - बड़े नागगणोंसे समन्वित, नागरूपी आभूषणसे भूषित, नागराजोंसे वन्दित, सिद्धा, योगिनी तथा नागोंपर शयन करनेवाली हैं ॥ ७१ - ७३ ॥ वे भगवान् विष्णुकी परम भक्त हैं, वे विष्णुपूजामें लगी रहती हैं और विष्णुरूपा हैं । वे तपरूपिणी हैं, तपस्वियोंको उनके तपका फल प्रदान करती हैं और तपस्विनी हैं । दिव्य तीन लाख वर्षोंतक भगवान् श्रीहरिकी तपस्यामें निरत रहकर वे भारतवर्षके तपस्वियों तथा तपस्विनियों में पूज्य हुईं॥७४-७५ ॥ सभी मन्त्रोंकी अधिष्ठात्री देवी मनसा ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान रहती हैं । ब्रह्मध्यानमें सदा निरत वे परमा ब्रह्मस्वरूपा ही हैं । वे पतिव्रता, श्रीकृष्णके अंशसे प्रकट महामुनि जरत्कारुकी पत्नी और तपस्वियोंमें श्रेष्ठ आस्तीक मुनिकी माता हैं ॥ ७६-७७ ॥ हे नारद! भगवतीकी प्रधान अंशस्वरूपा जो मातृकाओंमें पूज्यतम देवसेना हैं, वे ही षष्ठी नामसे

कही गयी हैं । ७८ ॥

वे पुत्र - पौत्र आदि प्रदान करनेवाली, तीनों लोकोंकी जननी तथा पतिव्रता हैं । वे मूल-प्रकृतिकी षष्ठांशस्वरूपा हैं, इसलिये षष्ठी कही गयी हैं ॥ ७ ९ ॥ शिशुओंके जन्मस्थानपर ये योगिनी परम वृद्धारूपमें विराजमान रहती हैं । समस्त जगत् में बारह महीने सदा इनकी पूजा होती रहती है । सूतिकागृहमें बालकके जन्मके छठे दिन तथा इक्कीसवें दिन उनकी पूजा कल्याणकारिणी होती है ॥ ८०-८१ ॥ ये षष्ठीमाता मुनियोंसे वन्दित, नित्य कामना पूर्ण करनेवाली, दयारूपा एवं सदा रक्षा करनेवाली पराशक्ति हैं । जल, थल, आकाश और गृहमें भी बालकोंके कल्याणमें सदा निरत रहती हैं ॥ ८२३ ॥

मंगलचण्डिका भी देवी मूलप्रकृतिकी प्रधान अंशस्वरूपा हैं । वे प्रकृतिदेवीके मुखसे प्रकट हुई हैं और सदा सभी प्रकारके मंगल प्रदान करनेवाली हैं उत्पत्तिके समय वे मंगलरूपा तथा संहारके समय

पृष्ठ 305

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२ ९ ६ तेन मङ्गलचण्डी सा पण्डितैः परिकीर्तिता प्रतिमङ्गलवारेषु प्रतिविश्वेषु पूजिता पुत्रपौत्रधनैश्वर्ययशोमङ्गलदायिनी परितुष्टा सर्ववाञ्छाप्रदात्री सर्वयोषिताम् रुष्टा क्षणेन संहर्तुं शक्ता विश्वं महेश्वरी प्रधानांशस्वरूपा सा काली कमललोचना दुर्गाललाटसम्भूता रणे शुम्भनिशुम्भयोः दुर्गाशस्वरूपा सा गुणेन तेजसा समा कोटिसूर्यसमाजुष्टपुष्टजाज्वलविग्रहा प्रधाना श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ । कोपरूपिणी हैं । इसीलिये विद्वानोंने इन्हें मंगलचण्डी ॥ ८५ कहा है । प्रत्येक मंगलवारको सर्वत्र इनकी पूजा होती है । ये पुत्र, पौत्र, धन, ऐश्वर्य, यश और मंगल प्रदान करती हैं । प्रसन्न होकर ये सभी नारियोंकी सभी ॥ ८६ कामनाएँ पूर्ण करनेवाली हैं । वे महेश्वरी रुष्ट होनेपर क्षणमात्रमें समस्त सृष्टिका संहार करनेमें सक्षम । हैं ॥ ८३–८६३ ॥ ॥ ८७ पराशक्तिके प्रधान अंशरूपसे कमललोचना भगवती कालीका प्राकट्य हुआ है । वे शुभ-। निशुम्भके साथ युद्धकालमें जगदम्बा दुर्गा ललाटसे प्रकट हुई हैं एवं दुर्गाके अर्धांशसे ॥ ८८ उत्पन्न होकर उन्हींके समान गुण और तेजसे सम्पन्न हैं । वे करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान, 1 पुष्ट तथा उज्ज्वल विग्रहवाली हैं । वे बलशालिनी सर्वशक्तीनां बला बलवती परा ॥ ८ ९ पराशक्ति सभी शक्तियोंमें प्रधान रूपसे विराजमान सर्वसिद्धिप्रदा देवी परमा योगरूपिणी कृष्णभक्ता कृष्णतुल्या तेजसा विक्रमैर्गुणैः

कृष्णभावनया शश्वत्कृष्णवर्णा सनातनी ।

संहर्तुं सर्वब्रह्माण्डं शक्ता निःश्वासमात्रतः ॥

रणं दैत्यैः समं तस्याः क्रीडया लोकशिक्षया ।

धर्मार्थकाममोक्षांश्च दातुं शक्ता च पूजिता ॥

ब्रह्मादिभिः स्तूयमाना मुनिभिर्मनुभिर्नरैः ।

प्रधानांशस्वरूपा सा प्रकृतेश्च वसुन्धरा ॥

आधाररूपा सर्वेषां सर्वसस्या प्रकीर्तिता ।

रत्नाकरा रत्नगर्भा सर्वरत्नाकराश्रया ॥

प्रजाभिश्च प्रजेशैश्च पूजिता वन्दिता सदा ।

सर्वोपजीव्यरूपा च सर्वसम्पद्विधायिनी ॥

यया विना जगत्सर्वं निराधारं चराचरम् । हैं । परम योगरूपिणी वे देवी सभी प्रकारकी सिद्धियाँ । प्रदान करती हैं । वे प्रभु श्रीकृष्णकी अनुगामिनी ॥ ९ ० हैं और अपने तेज, पराक्रम तथा गुणोंमें श्रीकृष्णके

समान ही हैं । ८७ – ९ ० ॥

श्रीकृष्णके चिन्तनमें संलग्न रहनेके कारण वे ९९ सनातनी कृष्णवर्णा हो गयीं । अपने निःश्वासमात्रसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका संहार करनेमें वे समर्थ हैं । फिर भी लोकशिक्षणके लिये लीलापूर्वक उन्होंने दैत्योंसे ९ २ युद्ध किया । पूजासे प्रसन्न होकर वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- सब कुछ देनेमें समर्थ हैं; ब्रह्मा आदि देवता, मुनि, मनुगण तथा सभी मनुष्य उनकी उपासना करते हैं॥९ १ - ९ २३ ॥ ९ ३ भगवती प्रकृतिके प्रधान अंशरूपसे वे वसुन्धरादेवी प्रकट हुई हैं । वे सभी प्राणी-पदार्थोंकी आधाररूपा हैं तथा सभी प्रकारके शस्योंके ९ ४ स्वरूपवाली कही गयी हैं । वे रत्नोंकी निधि हैं रत्नगर्भा तथा समस्त समुद्रोंकी आश्रयरूपा हैं । वे राजा - प्रजा सभीसे सदा पूजित तथा वन्दित हैं, वे ९ ५ सभीकी आश्रय तथा सब प्रकारकी सम्पत्ति प्रदान करनेवाली हैं, जिनके बिना चराचर सम्पूर्ण जगत् निराधार हो जाता है ॥ ९ ३ - ९ ५३ ॥

पृष्ठ 306

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अ ० १ ] प्रकृतेश्च कला या यास्ता निबोध मुनीश्वर ॥

यस्य यस्य च या पत्नी तत्सर्वं वर्णयामि ते ।

स्वाहादेवी वह्निपत्नी प्रतिविश्वेषु पूजिता ॥

यया विना हविर्दानं न ग्रहीतुं सुराः क्षमाः ।

दक्षिणा यज्ञपत्नी च दीक्षा सर्वत्र पूजिता ॥

यया विना हि विश्वेषु सर्वकर्म हि निष्फलम् ।

स्वधा पितॄणां पत्नी च मुनिभिर्मनुभिर्नरैः ॥

पूजिता पितृदानं हि निष्फलं च यया विना ।

स्वस्तिदेवी वायुपत्नी प्रतिविश्वेषु पूजिता ॥

आदानं च प्रदानं च निष्फलं च यया विना ।

पुष्टिर्गणपतेः पत्नी पूजिता जगतीतले ॥

यया विना परिक्षीणाः पुमांसो योषितोऽपि च ।

अनन्तपत्नी तुष्टिश्च पूजिता वन्दिता भवेत् ॥

यया विना न सन्तुष्टाः सर्वलोकाश्च सर्वतः ।

ईशानपत्नी सम्पत्तिः पूजिता च सुरैर्नरैः ॥

सर्वे लोका दरिद्राश्च विश्वेषु च यया विना ।

धृतिः कपिलपत्नी च सर्वैः सर्वत्र पूजिता ॥

सर्वे लोका अधैर्याश्च जगत्सु च यया विना ।

सत्यपत्नी सती मुक्तैः पूजिता च जगत्प्रिया ॥

यया विना भवेल्लोको बन्धुतारहितः सदा ।

मोहपत्नी दया साध्वी पूजिता च जगत्प्रिया ॥

सर्वे लोकाश्च सर्वत्र निष्फलाश्च यया विना ।

पुण्यपत्नी प्रतिष्ठा सा पूजिता पुण्यदा सदा ॥

यया विना जगत्सर्वं जीवन्मृतसमं मुने ।

सुकर्मपत्नी संसिद्धा कीर्तिर्धन्यैश्च पूजिता ॥

यया विना जगत्सर्वं यशोहीनं मृतं यथा ।

क्रिया तूद्योगपत्नी च पूजिता सर्वसम्मता ॥

नवम स्कन्ध २ ९ ७ ९ ६ हे मुनीश्वर! अब आप देवी प्रकृतिकी जो - जो कलाएँ हैं, उन्हें सुनिये । जिस - जिस देवताकी जो भार्या हैं, उन सबका मैं वर्णन करता हूँ । सभी लोकोंमें ९ ७ पूज्या स्वाहा- देवी अग्निदेवकी भार्या हैं, जिनके बिना देवगण यज्ञभाग प्राप्त करनेमें समर्थ नहीं हो पाते । यज्ञदेवकी पत्नी दीक्षा तथा दक्षिणा हैं, जो सर्वत्र ९ ८ पूजित हैं तथा जिनके बिना लोकोंमें किये गये सभी कर्म निष्फल रहते हैं । पितृदेवोंकी पत्नी स्वधादेवी हैं । ये मुनियों, मनुओं तथा मनुष्योंसे पूजित हैं; जिनके ९९ बिना किया गया कोई भी पितृकर्म निष्फल रहता है । वायुदेवकी पत्नी स्वस्तिदेवी हैं, प्रत्येक लोकमें उनकी १०० पूजा होती है । उनके बिना किया गया आदान - प्रदान निष्फल रहता है ॥ ९६–१००३ ॥ भगवान् गणपतिकी पत्नी पुष्टिदेवी हैं, जो १०१ समस्त संसारमें पूजित हैं और जिनके बिना नर- र- नारी क्षीण शरीरवाले रहते हैं । भगवान् अनन्तकी पत्नी तुष्टि हैं, वे सभीसे वन्दित तथा पूजित हैं, जिनके १०२ बिना संसारमें सभी लोग सन्तुष्ट नहीं रहते । ईशानदेवकी पत्नी सम्पत्तिदेवी हैं, जिनकी सभी देव - मानव पूजा करते हैं तथा जिनके बिना संसारमें सभी लोग दरिद्र १०३ रहते हैं ॥ १०१ - १०३३ ॥ धृतिदेवी भगवान् कपिलकी पत्नी हैं, वे सभीके १०४ द्वारा सर्वत्र पूजित हैं, संसारमें जिनके बिना सभी लोग धैर्यहीन रहते हैं । सतीदेवी सत्यदेवकी पत्नी हैं जिन्हें सभी चाहते हैं; वे मुक्तलोगोंके द्वारा पूजित हैं और १०५ जगत्प्रिय हैं । इनके बिना लोग बन्धुत्वविहीन हो जाते हैं । दयादेवी मोहकी पत्नी हैं, वे साध्वी सबसे पूजित और जगत्प्रिय हैं । जिनके बिना सभी लोग सर्वत्र १०६ निष्फल हो जाते हैं । प्रतिष्ठादेवी पुण्यदेवकी पत्नी हैं । वे पुण्यदायिनी तथा सर्वत्र पूजित हैं, जिनके अभावमें सभी प्राणी जीवित रहते भी मृतकतुल्य हो जाते हैं । १०७ कीर्तिदेवी सुकर्मदेवकी पत्नी कही गयी हैं, जिनकी पूजा सौभाग्यशाली लोग करते हैं और जिनके बिना १०८ सम्पूर्ण संसार यशहीन होकर मृतकतुल्य हो जाता है ॥ १०४–१०८३ ॥ उद्योगदेवकी पत्नी क्रियादेवी हैं, जो सभीके १० ९ | द्वारा पूजित तथा मान्य हैं, हे नारद! इनके बिना

पृष्ठ 307

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२ ९ ८

यया विना जगत्सर्वं विधिहीनं च नारद ।

अधर्मपत्नी मिथ्या सा सर्वधूर्तेश्च पूजिता ॥

यया विना जगत्सर्वमुच्छिन्नं विधिनिर्मितम् ।

सत्ये अदर्शना या च त्रेतायां सूक्ष्मरूपिणी ॥।

अर्धावयवरूपा च द्वापरे चैव संवृता ।

कलौ महाप्रगल्भा च सर्वत्र व्यापिका बलात् ॥

कपटेन समं भ्रात्रा भ्रमते च गृहे गृहे ।

शान्तिर्लज्जा च भार्ये द्वे सुशीलस्य च पूजिते ॥

याभ्यां विना जगत्सर्वमुन्मत्तमिव नारद ।

ज्ञानस्य तित्रो भार्याश्च बुद्धिर्मेधाधृतिस्तथा ॥

याभिर्विना जगत्सर्वं मूढं मत्तसमं सदा ।

मूर्तिश्च धर्मपत्नी सा कान्तिरूपा मनोहरा ॥

परमात्मा च विश्वौघो निराधारो यया विना ।

सर्वत्र शोभारूपा च लक्ष्मीर्मूर्तिमती सती ॥

श्रीरूपा मूर्तिरूपा च मान्या धन्यातिपूजिता ।

कालाग्नी रुद्रपत्नी च निद्रा सा सिद्धयोगिनी ॥।

सर्वे लोकाः समाच्छन्ना यया योगेन रात्रिषु ।

कालस्य तिस्रो भार्याश्च संध्या रात्रिर्दिनानि च ॥

याभिर्विना विधाता च संख्यां कर्तुं न शक्यते ।

क्षुत्पिपासे लोभभार्ये धन्ये मान्ये च पूजिते ॥

याभ्यां व्याप्तं जगत्सर्वं नित्यं चिन्तातुरं भवेत् ।

प्रभा च दाहिका चैव द्वे भार्ये तेजसस्तथा ॥

याभ्यां विना जगत्स्रष्टा विधातुं च न हीश्वरः ।

कालकन्ये मृत्युजरे प्रज्वारस्य प्रियाप्रिये ॥

याभ्यां जगत्समुच्छिन्नं विधात्रा निर्मितं विधौ ।

निद्राकन्या च तन्द्रा सा प्रीतिरन्या सुखप्रिये ॥।

याभ्यां व्याप्तं जगत्सर्वं विधिपुत्र विधेर्विधौ ।

वैराग्यस्य च द्वे भार्ये श्रद्धा भक्तिश्च पूजिते ॥

याभ्यां शश्वज्जगत्सर्वं यज्जीवन्मुक्तिमन्मुने । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ सम्पूर्ण जगत् विधिहीन हो जाता है । अधर्मकी पत्नी ११० मिथ्यादेवी हैं, जिन्हें सभी धूर्तजन पूजते हैं तथा जिनके बिना विधिनिर्मित धूर्त - समुदायरूप जगत् नष्ट हो जाता है । सत्ययुगमें ये मिथ्यादेवी १११ तिरोहित रहती हैं, त्रेतायुगमें सूक्ष्मरूपमें रहती हैं, द्वापरमें आधे शरीरवाली होकर रहती हैं; किंतु कलियुगमें महाप्रगल्भ होकर ये बलपूर्वक सर्वत्र ११२ व्याप्त रहती हैं और अपने भाई कपटके साथ घर-घर घूमती - फिरती हैं ॥ १० ९ –११२३ ॥ ११३ हे नारद! सुशीलकी शान्ति और लज्जा नामक दो सर्वपूजित भार्याएँ हैं, जिनके बिना यह समस्त जगत् उन्मत्तकी भाँति हो जाता है । ज्ञानकी तीन १ ९ ४ पत्नियाँ हैं - बुद्धि, मेधा और धृति; जिनके बिना सारा संसार मूर्ख तथा मत्त बना रहता है । धर्मकी पत्नी मूर्ति अत्यन्त मनोहर कान्तिवाली हैं, जिनके बिना परमात्मा ११५ तथा विश्वसमूह भी निराधार रहते हैं । ये सर्वत्र शोभारूपा, लक्ष्मीरूपिणी, मूर्तिमयी, साध्वी, श्रीरूपा, ११६ मूर्तिरूपा, सभीकी मान्य, धन्य और अतिपूज्य हैं ॥ ११३ – ११६३ ॥ रुद्रकी पत्नी कालाग्नि हैं । वे ही सिद्धयोगिनी ११७ तथा निद्रारूपा हैं, जिनके संयोगसे रात्रिमें सभी लोग निद्रासे व्याप्त हो जाते हैं । कालकी तीन पत्नियाँ हैं— ११८ सन्ध्या, रात्रि और दिवा । जिनके बिना विधाता भी कालकी गणना नहीं कर सकते । लोभकी दो पत्नियाँ क्षुधा और पिपासा हैं, ये धन्य, मान्य और पूजित हैं । ११ ९ जिनसे व्याप्त यह सम्पूर्ण जगत् नित्य ही चिन्ताग्रस्त रहता है । तेजकी दो पत्नियाँ प्रभा और दाहिका हैं, जिनके बिना जगत्की रचना करनेवाले ब्रह्मा सृष्टि १२० करनेमें समर्थ नहीं होते ॥ ११७–१२०३ ॥ कालकी दो पुत्रियाँ मृत्यु और जरा हैं, जो ज्वरकी प्रिय पत्नियाँ हैं । जिनके द्वारा सृष्टि - विधानके १२१ अन्तर्गत ब्रह्माका बनाया यह संसार नष्ट होता रहता है । निद्राकी एक पुत्री तन्द्रा और दूसरी प्रीति — ये १२२ दोनों सुखकी पत्नियाँ हैं । जिनसे हे नारद! ब्रह्माके द्वारा निर्मित यह सारा जगत् व्याप्त है । वैराग्यकी दो पत्नियाँ श्रद्धा और भक्ति सभीकी पूज्या हैं, जिनसे हे १२३ | मुने! यह जगत् निरन्तर जीवन्मुक्तके समान हो जाता है ॥ १२१–१२३३ ॥

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अ ० १ ] नवम स्कन्ध २ ९९ अदितिर्देवमाता च सुरभी च गवां प्रसूः ॥ १२४

दितिश्च दैत्यजननी कद्रूश्च विनता दनुः ।

उपयुक्ताः सृष्टिविधावेतास्तु कीर्तिताः कलाः ॥ १२५

कला अन्याः सन्ति बह्व्यस्तासु काश्चिन्निबोध मे ।

रोहिणी चन्द्रपत्नी च संज्ञा सूर्यस्य कामिनी ॥ १२६

शतरूपा मनोर्भार्या शचीन्द्रस्य च गेहिनी ।

तारा बृहस्पतेर्भार्या वसिष्ठस्याप्यरुन्धती ॥ १२७

अहल्या गौतमस्त्री साप्यनसूयात्रिकामिनी ।

देवहूतिः कर्दमस्य प्रसूतिर्दक्षकामिनी ॥ १२८

पितॄणां मानसी कन्या मेनका साम्बिकाप्रसूः ।

लोपामुद्रा तथा कुन्ती कुबेरकामिनी तथा ॥ १२ ९

वरुणानी प्रसिद्धा च बलेर्विन्ध्यावलिस्तथा ।

कान्ता च दमयन्ती च यशोदा देवकी तथा ॥ १३०

गान्धारी द्रौपदी शैव्या सा च सत्यवती प्रिया ।

वृषभानुप्रिया साध्वी राधामाता कुलोद्वहा ॥ १३१

मन्दोदरी च कौसल्या सुभद्रा कौरवी तथा ।

रेवती सत्यभामा च कालिन्दी लक्ष्मणा तथा ॥ १३२

जाम्बवती नाग्नजितिर्मित्रविन्दा तथापरा ।

लक्ष्मणा रुक्मिणी सीता स्वयं लक्ष्मीः प्रकीर्तिता ॥ १३३

काली योजनगन्धा च व्यासमाता महासती ।

बाणपुत्री तथोषा च चित्रलेखा च तत्सखी ॥ १३४

प्रभावती भानुमती तथा मायावती सती ।

रेणुका च भृगोर्माता राममाता च रोहिणी ॥ १३५

एकनन्दा च दुर्गा सा श्रीकृष्णभगिनी सती ।

बह्वयः सत्यः कलाश्चैव प्रकृतेरेव भारते ॥ १३६

या याश्च ग्रामदेव्यः स्युस्ताः सर्वाः प्रकृतेः कलाः ।

कलांशांशसमुद्भूताः प्रतिविश्वेषु योषितः ॥ १३७

योषितामवमानेन प्रकृतेश्च पराभवः ।

ब्राह्मणी पूजिता येन पतिपुत्रवती सती ॥ १३८

प्रकृतिः पूजिता तेन वस्त्रालङ्कारचन्दनैः ।

कुमारी चाष्टवर्षीया वस्त्रालङ्कारचन्दनैः ॥१३ ९

पूजिता येन विप्रस्य प्रकृतिस्तेन पूजिता । सर्वाः प्रकृतिसम्भूता उत्तमाधममध्यमाः । १४० । देवताओंकी माता अदिति हैं और गायोंकी उत्पत्ति सुरभिसे हुई है । दैत्योंकी माता दिति, कद्रू, विनता और दनु- सृष्टिनिर्माणमें इनका उपयोग हुआ है । ये सभी प्रकृतिदेवीकी कलाएँ कही गयी हैं ॥ १२४ - १२५ ॥ प्रकृतिदेवीकी अन्य बहुत - सी कलाएँ हैं, उनमेंसे कुछके विषयमें मुझसे सुनिये । चन्द्रमाकी पत्नी रोहिणी, सूर्यकी पत्नी संज्ञा, मनुकी पत्नी शतरूपा, इन्द्रकी पत्नी शची, बृहस्पतिकी पत्नी तारा, वसिष्ठकी पत्नी अरुन्धती, गौतमऋषिकी पत्नी अहल्या और अत्रिकी भार्या अनसूया, कर्दमकी पत्नी देवहूति तथा दक्षकी भार्या प्रसूति हैं ॥ १२६-१२८ ॥ पितरोंकी मानसी कन्या मेनका हैं, जो अम्बिकाकी माता हैं । लोपामुद्रा, कुन्ती, कुबेरपत्नी, वरुणपत्नी, बलिकी पत्नी विन्ध्यावली, कान्ता, दमयन्ती, यशोदा, देवकी, गान्धारी, द्रौपदी, हरिश्चन्द्रकी सत्यवादिनी तथा प्रिय भार्या शैव्या, वृषभानुप्रिया राधाकी माता तथा कुलका उद्वहन करनेवाली पतिव्रता वृषभानुभार्या, मन्दोदरी, कौसल्या, सुभद्रा, कौरवी, रेवती, सत्यभामा, कालिन्दी, लक्ष्मणा, जाम्बवती, नाग्नजिती, मित्रविन्दा, रुक्मिणी, साक्षात् लक्ष्मी कही जानेवाली सीता, काली, व्यासमाता महासती योजनगन्धा, बाणपुत्री उषा, उसकी सखी चित्रलेखा, प्रभावती, भानुमती, साध्वी मायावती, परशुरामकी माता रेणुका, बलरामकी माता रोहिणी और श्रीकृष्णकी बहन दुर्गारूपी एकनन्दा – ये सब प्रकृतिदेवीकी कलारूपा अनेक शक्तियाँ भारतवर्ष में विख्यात हैं ॥१२ ९ –१३६ ॥ जो - जो ग्रामदेवियाँ हैं, वे सभी प्रकृतिकी कलाएँ हैं । देवीके कलांशका अंश लेकर ही प्रत्येक लोकमें स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं । इसलिये किसी नारीके अपमानसे प्रकृतिका ही अपमान माना जाता है । जिसने वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे पति - पुत्रवती साध्वी ब्राह्मणीका पूजन किया; उसने मानो प्रकृतिदेवीका ही पूजन किया है । इसी प्रकार जिसने आठ वर्षकी विप्रकन्याका वस्त्र, अलंकार तथा चन्दनसे पूजन सम्पन्न कर लिया, उसने स्वयं प्रकृतिदेवीकी पूजा कर ली । उत्तम, मध्यम अथवा अधम- सभी स्त्रियाँ प्रकृतिसे ही उत्पन्न होती हैं ॥ १३७ – १४० ॥

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३००

सत्त्वांशाश्चोत्तमा ज्ञेयाः सुशीलाश्च पतिव्रताः ।

मध्यमा रजसश्चांशास्ताश्च भोग्याः प्रकीर्तिताः ॥

सुखसम्भोगवश्याश्च स्वकार्ये तत्पराः सदा ।

अधमास्तमसश्चांशा अज्ञातकुलसम्भवाः ॥

दुर्मुखाः कुलहा धूर्ता: स्वतन्त्राः कलहप्रियाः ।

पृथिव्यां कुलटा याश्च स्वर्गे चाप्सरसां गणाः ॥

प्रकृतेस्तमसश्चांशाः पुंश्चल्यः परिकीर्तिताः ।

एवं निगदितं सर्वं प्रकृते रूपवर्णनम् ॥

ताः सर्वाः पूजिताः पृथ्व्यां पुण्यक्षेत्रे च भारते ।

पूजिता सुरथेनादौ दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी ॥

ततः श्रीरामचन्द्रेण रावणस्य वधार्थिना ।

तत्पश्चाज्जगतां माता त्रिषु लोकेषु पूजिता ॥

जातादौ दक्षकन्या या निहत्य दैत्यदानवान् ।

ततो देहं परित्यज्य यज्ञे भर्तुश्च निन्दया ॥

जज्ञे हिमवतः पत्न्यां लेभे पशुपतिं पतिम् ।

गणेशश्च स्वयं कृष्णः स्कन्दो विष्णुकलोद्भवः ॥

बभूवतुस्तौ तनयौ पश्चात्तस्याश्च नारद ।

लक्ष्मीर्मङ्गलभूपेन प्रथमं परिपूजिता ॥

त्रिषु लोकेषु तत्पश्चाद्देवतामुनिमानवैः ।

सावित्री चाश्वपतिना प्रथमं परिपूजिता ॥

तत्पश्चात्त्रिषु लोकेषु देवतामुनिपुङ्गवैः ।

आदौ सरस्वती देवी ब्रह्मणा परिपूजिता ॥

तत्पश्चात्रिषु लोकेषु देवतामुनिपुङ्गवैः ।

प्रथमं पूजिता राधा गोलोके रासमण्डले ॥

पौर्णमास्यां कार्तिकस्य कृष्णेन परमात्मना ।

गोपिकाभिश्च गोपैश्च बालिकाभिश्च बालकैः ॥

गवां गणैः सुरभ्या च तत्पश्चादाज्ञया हरेः ।

तदा ब्रह्मादिभिर्देवैर्मुनिभिः परया मुदा ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ प्रकृतिदेवीके सत्त्वांशसे उत्पन्न स्त्रियोंको उत्तम १४१ जानना चाहिये । वे सुशील एवं पतिव्रता होती हैं उनके राजस अंशसे उत्पन्न स्त्रियाँ मध्यम कही गयी हैं, वे प्रायः भोगप्रिय होती हैं । वे सुख - भोगादिके १४२ वशीभूत होती हैं तथा अपने ही कार्यमें सदा तत्पर रहती हैं । अधम स्त्रियाँ प्रकृतिके तामस अंशसे उत्पन्न १४३ हैं, उनका कुल अज्ञात रहता है । वे कलहप्रिय, कटुभाषिणी, धूर्त, स्वच्छन्द विचरण करनेवाली तथा कुलका नाश करनेवाली होती हैं । जो पृथ्वीपर १४४ कुलटा, स्वर्गमें अप्सराएँ तथा अन्य पुंश्चली नारियाँ हैं; वे प्रकृतिके तामसांशसे प्रकट कही गयी हैं । इस प्रकार मैंने प्रकृतिदेवीके सभी रूपोंका वर्णन कर १४५ दिया ॥ १४१–१४४ ॥ भगवती प्रकृतिके वे सभी रूप पृथ्वीपर पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें पूजित हैं, सर्वप्रथम राजा सुरथने दुर्गतिका १४६ नाश करनेवाली दुर्गादेवीका पूजन किया था । तत्पश्चात् रावणका वध करनेकी इच्छासे श्रीरामचन्द्रने उनका १४७ पूजन किया था । तभीसे जगज्जननी दुर्गा तीनों लोकोंमें

पूजित हैं । १४५ - १४६ ॥

जो प्रारम्भमें दक्षकन्या सतीके रूपमें प्रकट १४८ हुईं और दैत्य - दानवोंका संहार करनेके उपरान्त यज्ञमें पतिनिन्दाके कारण देहत्याग करके हिमवान्‌की भार्यासे उत्पन्न हुईं और उन्होंने पुनः पशुपति भगवान् शंकरको १४ ९ पतिरूपमें प्राप्त किया । हे नारद! बादमें स्वयं श्रीकृष्णरूप गणेश तथा विष्णुकी कलाओंसे युक्त स्कन्द – ये उनके १५० दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १४७ -१४८३ ॥ राजा मंगलने सर्वप्रथम लक्ष्मीजीकी पूजा की थी । उसके बाद तीनों लोकोंमें देवता, मुनि और १५१ मनुष्योंने उनकी पूजा की । राजा अश्वपतिने सावित्रीदेवीकी सर्वप्रथम पूजा की, तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें देवता तथा श्रेष्ठ मुनियोंसे वे पूजित हुईं । ब्रह्माने सर्वप्रथम १५२ भगवती सरस्वतीकी पूजा की थी । तत्पश्चात् वे तीनों लोकोंमें देवताओं तथा श्रेष्ठ मुनियोंद्वारा पूजित हुईं । १५३ कार्तिकपूर्णिमाको गोलोकके रासमण्डलमें सर्वप्रथम परमात्मा श्रीकृष्णने गोप - गोपियों, बालक - बालिकाओं, सुरभि तथा गायोंके साथ राधारानीका पूजन किया १५४ । था । तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें परमात्माकी आज्ञासे

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अ ० २ ]

पुष्पधूपादिभिर्भक्त्या पूजिता वन्दिता सदा ।

पृथिव्यां प्रथमं देवी सुयज्ञेनैव पूजिता ॥

शङ्करेणोपदिष्टेन पुण्यक्षेत्रे च भारते ।

त्रिषु लोकेषु तत्पश्चादाज्ञया परमात्मनः ॥

पुष्पधूपादिभिर्भक्त्या पूजिता मुनिभिः सदा ।

कला या याः समुद्भूताः पूजितास्ताश्च भारते ॥

पूजिता ग्रामदेव्यश्च ग्रामे च नगरे मुने ।

एवं ते कथितं सर्वं प्रकृतेश्चरितं शुभम् ॥

यथागमं लक्षणं च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

नवम स्कन्ध ३०१ ब्रह्मादि देवों तथा मुनियोंद्वारा पुष्प, धूपादिसे भक्तिपूर्वक १५५ | परम प्रसन्नताके साथ वे निरन्तर पूजित तथा वन्दित होने लगीं ॥१४ ९ – १५४३ ॥ भगवान् शंकरके उपदेशसे पृथ्वीपर पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें राजा सुयज्ञके द्वारा सर्वप्रथम इन भगवतीका १५६ पूजन किया गया । तदनन्तर परमात्माकी आज्ञासे तीनों लोकोंमें पुष्प, धूप आदि मुनियोंके द्वारा ये निरन्तर

भक्तिपूर्वक पूजित होने लगीं ॥। १५५ - १५६३ ॥

१५७ भारतवर्षमें प्रकृतिदेवीकी जो - जो कलाएँ प्रकट हुईं, वे सभी पूजित हैं । हे मुने! प्रत्येक ग्राम और नगरमें वे ग्रामदेवियाँ पूजित हैं । इस प्रकार मैंने १५८ आगमोंके अनुसार प्रकृतिदेवीका सम्पूर्ण शुभ चरित्र तथा स्वरूप आपको बता दिया; अब आप और क्या १५ ९ | सुनना चाहते हैं? || १५७–१५९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे प्रकृतिचरित्रवर्णनं नाम प्रथमोध्यायः ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट नारद उवाच

समासेन श्रुतं सर्वं देवीनां चरितं प्रभो ।

विबोधनाय बोधस्य व्यासेन वक्तुमर्हसि ॥ १

सृष्टेराद्या सृष्टिविधौ कथमाविर्बभूव ह ।

कथं वा पञ्चधा भूता वद वेदविदांवर ॥ २

भूता ययांशकलया तया त्रिगुणया भवे ।

व्यासेन तासां चरितं श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥ ३

तासां जन्मानुकथनं पूजाध्यानविधिं बुध ।

स्तोत्रं कवचमैश्वर्यं शौर्यं वर्णय मङ्गलम् ॥ ४

श्रीनारायण उवाच

नित्य आत्मा नभो नित्यं कालो नित्यो दिशो यथा ।

विश्वानां गोलकं नित्यं नित्यो गोलोक एव च ॥ ५

तदेकदेशो वैकुण्ठो नम्रभागानुसारकः ।

तथैव प्रकृतिर्नित्या ब्रह्मलीला सनातनी ॥ ६

चिन्मय देवताओं एवं देवियोंका वर्णन नारदजी बोले - हे प्रभो! देवियोंका सम्पूर्ण चरित्र मैंने संक्षेपमें सुन लिया, अब सम्यक् प्रकारसे बोध प्राप्त करनेके लिये विस्तार से वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

सृष्टिप्रक्रियामें सृष्टिकी आद्यादेवीका प्राकट्य कैसे हुआ? हे वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ! वे प्रकृति पुनः पाँच रूपोंमें कैसे आविर्भूत हुईं; यह बतायें । इस संसारमें उन त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके कलांशोंसे जो देवियाँ उत्पन्न हुईं, उनका चरित्र मैं अब विस्तारसे सुनना चाहता हूँ॥२-३ ॥ हे विज्ञ! उनके जन्मकी कथा, उनके पूजा-| ध्यानकी विधि, स्तोत्र, कवच, ऐश्वर्य और मंगलमय शौर्यका वर्णन कीजिये ॥ ४ ॥

श्रीनारायण बोले- जैसे आत्मा नित्य है, आकाश नित्य है, काल नित्य है, दिशाएँ नित्य हैं, ब्रह्माण्डगोलक नित्य है, गोलोक नित्य है तथा उससे थोड़ा नीचे स्थित वैकुण्ठ नित्य है; उसी प्रकार ब्रह्मकी सनातनी । लीलाशक्ति प्रकृति भी नित्य है॥५-६ ॥