देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 511–520
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520
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५०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४
गुरुपत्नीं राजपत्नीं सपत्नीं मातरं ध्रुवम् ।
सुतां पुत्रवधूं श्वश्रूं सगर्भां भगिनीं सतीम् ॥
सहोदरभ्रातृजायां मातुलानीं पितुः प्रसूम् ।
मातुः प्रसूं तत्स्वसारं भगिनीं भ्रातृकन्यकाम् ॥
शिष्यां शिष्यस्य पत्नीं च भागिनेयस्य कामिनीम् ।
भ्रातुः पुत्रप्रियां चैवात्यगम्या आह पद्मजः ॥
एताः कामेन कान्ता यो व्रजेद्वै मानवाधमः ।
स मातृगामी वेदेषु ब्रह्महत्याशतं व्रजेत् ॥
अकर्मार्होऽप्यसंस्पृश्यो लोके वेदे च निन्दितः ।
स याति कुम्भीपाके च महापापी सुदुष्करे ॥
करोत्यशुद्धां सन्ध्यां वा न सन्ध्यां वा करोति च ।
त्रिसन्ध्यं वर्जयेद्यो वा सन्ध्याहीनश्च स द्विजः ॥
वैष्णवं च तथा शैवं शाक्तं सौरं च गाणपम् ।
योऽहङ्कारान्न गृह्णाति मन्त्रं सोऽदीक्षितः स्मृतः ॥
प्रवाहमवधिं कृत्वा यावद्धस्तचतुष्टयम् ।
तत्र नारायणः स्वामी गङ्गागर्भान्तरे वसेत् ॥
तत्र नारायणक्षेत्रे मृतो याति हरेः पदम् ।
वाराणस्यां बदर्यां च गङ्गासागरसङ्गमे ॥
पुष्करे हरिहरक्षेत्रे प्रभासे कामरूस्थले ।
हरिद्वारे च केदारे तथा मातृपुरेऽपि च ॥
सरस्वतीनदीतीरे पुण्ये वृन्दावने वने ।
गोदावर्यां च कौशिक्यां त्रिवेण्यां च हिमाचले ॥
एषु तीर्थेषु यो दानं प्रतिगृह्णाति कामतः ।
स च तीर्थप्रतिग्राही कुम्भीपाके प्रयाति सः ॥
शूद्रसेवी शूद्रयाजी ग्रामयाजीति कीर्तितः ।
तथा देवोपजीवी च देवलः परिकीर्तितः ॥
शूद्रपाकोपजीवी यः सूपकार इति स्मृतः ।
सन्ध्यापूजनहीनश्च प्रमत्तः पतितः स्मृतः ॥
ब्रह्माजीने गुरुकी पत्नी, राजाकी पत्नी, सौतेली ७७ माँ, पुत्री, पुत्रवधू, सास, गर्भवती स्त्री, बहन, पतिव्रता स्त्री, सहोदर भाईकी पत्नी, मामी, दादी, नानी, मौसी, भतीजी, शिष्या, शिष्यकी पत्नी, भाँजेकी स्त्री और ७८ भाईके पुत्रकी पत्नीको अति अगम्या कहा है । जो नराधम काममोहित होकर इनके साथ गमन करता है, उसे वेदोंमें मातृगामी कहा गया है और उसे सौ ७ ९ ब्रह्महत्याका पाप लगता है । वह कोई भी कर्म करनेका पात्र नहीं रह जाता, वह अस्पृश्य है और ८० लोकमें तथा वेदमें सब जगह उसकी निन्दा होती है । वह महापापी अत्यन्त क्लेशदायक कुम्भीपाक नरकमें
जाता है । ७७ – ८१ ॥
८१ जो शास्त्रोक्त विधानसे सन्ध्या नहीं करता अथवा सन्ध्या करता ही नहीं और जो तीनों कालोंकी सन्ध्यासे रहित है, वह द्विज सन्ध्याहीन द्विज कहा ८२ गया है ॥ ८२ ॥
जो अहंकारके कारण विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य ८३ तथा गणेश — इन देवोंके मन्त्रकी दीक्षा ग्रहण नहीं करता, उसे ' अदीक्षित ' कहा गया है ॥ ८३ ॥
गंगाके प्रवाहके दोनों ओरकी चार हाथकी चौड़ी ८४ भूमिको गंगागर्भ कहते हैं; वहींपर भगवान् नारायण निवास करते हैं । उस नारायणक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होनेवाला व्यक्ति भगवान् श्रीहरिके धाममें पहुँच जाता है ॥ ८४ ॥
८५ वाराणसी, बदरिकाश्रम, गंगासागरसंगम, पुष्करक्षेत्र, हरिहरक्षेत्र, प्रभासक्षेत्र, कामाख्यापीठ, हरिद्वार, केदारक्षेत्र, ८६ | मातृपुर, सरस्वती नदीके तट, पवित्र वृन्दावन, गोदावरीनदी, कौशिकीनदी, त्रिवेणीसंगम और हिमालय - इन तीर्थोंमें जो मनुष्य कामनापूर्वक दान लेता है; वह तीर्थप्रतिग्राही ८७ है और इस दानग्रहणके कारण वह कुम्भीपाक नरक में जाता है ॥ ८५–८८ ॥ जो ब्राह्मण शूद्रोंकी सेवा करता है तथा उनके ८८ यहाँ यज्ञ आदि कराता है, उसे ग्रामयाजी कहा गया है । देवताकी पूजा करके अपनी आजीविका चलानेवाला ८ ९ ब्राह्मण देवल कहा गया है । शूद्रके यहाँ रसोई बनाकर आजीविका चलानेवाले विप्रको सूपकार कहा गया है । सन्ध्या तथा पूजनकर्मसे विमुख विप्रको ९ ० । प्रमत्त तथा पतित कहा गया है ॥८ ९ - ९ ० ॥
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अ ० ३५ ] नवम स्कन्ध ५०३ उक्तं सर्वं मया भद्रे लक्षणं वृषलीपतेः । हे कल्याणि! वृषलीपतिके समस्त लक्षणोंका वर्णन मैंने कर दिया है । ये सब महापापी हैं और वे एते महापातकिनः कुम्भीपाकं प्रयान्ति ते । कुम्भीपाक नामक नरकमें जाते हैं । [ हे साध्वि! ] जो पापी दूसरे कुण्डोंमें जाते हैं, उनके विषयमें अब मैं कुण्डान्यन्यानि ये यान्ति निबोध कथयामि ते ॥ ९९ तुम्हें बता रहा हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो ॥९ १ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे सावित्र्युपाख्याने नानाकर्मविपाकफलवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः विभिन्न पापकर्मोंसे प्राप्त होनेवाली विभिन्न योनियोंका वर्णन धर्मराज उवाच
देवसेवां विना साध्वि न भवेत्कर्मकृन्तनम् ।
शुद्धकर्म शुद्धबीजं नरकश्च कुकर्मणा ॥
पुंश्चल्यन्नं च यो भुङ्क्ते योऽस्यां गच्छेत्पतिव्रते ।
स द्विजः कालसूत्रं च मृतो याति सुदुर्गमम् ॥
शतवर्षं कालसूत्रे स्थिरीभूतो भवेद् ध्रुवम् ।
तत्र जन्मनि रोगी च ततः शुद्धो भवेद् द्विजः ॥
पतिव्रता चैकपतौ द्वितीये कुलटा स्मृता ।
तृतीये धर्षिणी ज्ञेया चतुर्थे पुंश्चलीत्यपि ॥
वेश्या च पञ्चमे षष्ठे पुङ्गी च सप्तमे ऽष्टमे ।
तत ऊर्ध्वं महावेश्या सास्पृश्या सर्वजातिषु ॥
यो द्विजः कुलटां गच्छेद्धर्षिणीं पुंश्चलीमपि ।
पुङ्गीं वेश्यां महावेश्यां मत्स्योदे याति निश्चितम् ॥
शताब्दं कुलटागामी धृष्टागामी चतुर्गुणम् ।
षड्गुणं पुंश्चलीगामी वेश्यागामी गुणाष्टकम् ॥
पुङ्गीगामी दशगुणं वसेत्तत्र न संशयः ।
महावेश्याकामुकश्च ततो दशगुणं वसेत् ॥
धर्मराज बोले- हे साध्वि! देवताओंकी उपासनाके बिना कर्म - बन्धनसे मुक्ति नहीं होती । शुद्ध १ कर्मका बीज शुद्ध होता है और कुकर्मसे नरककी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥
हे पतिव्रते! जो ब्राह्मण पुंश्चली स्त्रीका अन्न खाता है अथवा जो इसके साथ भोग करता है, वह २ मरनेके पश्चात् अत्यन्त कष्टदायक कालसूत्र नामक नरक में जाता है और उस कालसूत्रमें सौ वर्षोंतक पड़ा रहता है । तत्पश्चात् मानवयोनिमें जन्म लेकर वह ३ सदा रोगी रहता है । उसके बाद वह द्विज शुद्ध हो
जाता है । २-३ ॥
एक पतिवाली स्त्री पतिव्रता तथा दो पतिवाली ४ स्त्री कुलटा कही गयी है । तीन पतिवाली स्त्री धर्षिणी, चार पतिवाली पुंश्चली, पाँच - छः पतिवाली वेश्या तथा सात - आठ पतिवाली स्त्रीको पुंगी जानना ५ चाहिये । इससे अधिक पुरुषोंसे सम्बन्ध रखनेवाली स्त्रीको महावेश्या कहा गया है, वह सभी जाति लोगोंके लिये अस्पृश्य है ॥ ४-५ ॥ जो द्विज कुलटा, धर्षिणी, पुंश्चली, पुंगी, वेश्या ६ तथा महावेश्याके साथ समागम करता है; वह निश्चित - रूपसे मत्स्योद नामक नरकमें जाता है । उस नरकमें कुलटागामी सौ वर्षोंतक, धर्षिणीगामी उससे ७ चार गुने अर्थात् चार सौ वर्षोंतक, पुंश्चलीगामी छः सौ वर्षोंतक, वेश्यागामी आठ सौ वर्षोंतक और पुंगीगामी एक हजार वर्षोंतक निवास करता है, ८ महावेश्याके साथ गमन करनेवाले कामुक व्यक्तिको
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५०४ तत्रैव यातनां भुङ्गे यमदूतेन ताडितः तित्तिरिः कुलटागामी धृष्टागामी च वायसः कोकिलः पुंश्चलीगामी वेश्यागामी वृकः स्मृतः पुङ्गीगामी सूकरश्च सप्तजन्मनि भारते
महावेश्याप्रगामी च जायते शाल्मलीतरुः ।
यो भुङ्क्ते ज्ञानहीनश्च ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ॥
अरुन्तुदं स यात्येवाप्यन्नमानाब्दमेव च ततो भवेन्मानवश्चाप्युदरे रोगपीडितः ॥ गुल्मयुक्तश्च काणश्च दन्तहीनस्ततः शुचिः । वाक्प्रदत्तां स्वकन्यां च योऽन्यस्मै प्रददाति च स वसेत्पांसुकुण्डे च तद्भोजी शतवत्सरम् तद्द्रव्यहारी यः साध्वि पांसुवेष्टे शताब्दकम् ॥ निवसेच्छरशय्यायां मम दूतेन ताडितः भक्त्या न पूजयेद्विप्रः शिवलिङ्गं च पार्थिवम् ॥
स याति शूलिन: पापाच्छूलप्रोतं सुदारुणम् ।
स्थित्वा शताब्दं तत्रैव श्वापदः सप्तजन्मसु ॥
ततो भवेद्देवलश्च सप्तजन्म ततः शुचिः । करोति कुण्ठितं विप्रं यद्भिया कम्पते द्विजः प्रकम्पने वसेत्सोऽपि विप्रलोमाब्दमेव च । प्रकोपवदना कोपात् स्वामिनं या च पश्यति श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३५ । दस हजार वर्षोंतक वहाँ रहना पड़ता है; इसमें संशय ॥ ९ नहीं है । वहाँपर यमदूतसे पीटा जाता हुआ वह तरह-तरहकी यातना भोगता है । उसके बाद कुलटागामी तीतर, धर्षिणीगामी कौवा, पुंश्चलीगामी कोयल, । वेश्यागामी भेड़िया और पुंगीगामी सूअरकी योनिमें ॥ १० भारतवर्ष में सात जन्मोंतक पैदा होते रहते हैं — ऐसा कहा गया है । महावेश्यासे समागम करनेवाला मनुष्य सेमरका वृक्ष होता है ॥ ६–१०३ ॥ जो अज्ञानी मनुष्य चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके ११ अवसरपर भोजन करता है, वह अन्नके दानोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक अरुन्तुद नामक नरककुण्डमें । जाता है । तत्पश्चात् वह मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता । उस समय वह उदररोगसे पीड़ित, प्लीहारोगसे १२ ग्रस्त, काना तथा दन्तविहीन हो जाता है; उसके बाद उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ११-१२३ ॥ जो अपनी कन्याका वाग्दान करके उसे किसी अन्य पुरुषको प्रदान कर देता है, वह पांसुकुण्ड ॥ १३ नामक नरकमें सौ वर्षोंतक वास करता है और उसी धूलराशिका भोजन करता है 1 । हे साध्वि! जो मनुष्य । अपनी कन्याके धनका हरण करता है, वह पांशुवेष्ट नामक नरककुण्डमें सौ वर्षोंतक वास करता है । वह १४ वहाँ बाणोंकी शय्यापर लेटा रहता है और मेरे दूत उसे पीटते रहते हैं ॥ १३-१४३ ॥ । जो विप्र भक्तिपूर्वक पार्थिव शिवलिंगकी पूजा १५ नहीं करता, वह त्रिशूल धारण करनेवाले भगवान् शिवके प्रति अपराधजन्य पापके कारण शूलप्रोत नामक अत्यन्त भयानक नरककुण्डमें जाता है । वहाँ सौ वर्षतक रहनेके पश्चात् वह सात जन्मोंतक वन्य १६ पशु होता है । उसके बाद सात जन्मोंतक देवल होता है, फिर उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ १५ - १६३ ॥ जो किसी विप्रको कुण्ठित कर देता है और उसके भयसे वह काँपने लगता है, वह उस द्विज ॥ १७ शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्षोंतक प्रकम्पनकुण्डमें निवास करता है ॥ १७३ ॥
कोपाविष्ट मुखवाली जो स्त्री अपने पतिको क्रोधभरी दृष्टिसे देखती है और कटु वाणीमें उससे ॥ १८ । बात करती है, वह उल्मुक नामक नरककुण्डमें जाती
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अ ० ३५ ] नवम
कटूक्तिं तं प्रवदति सोल्मुकं सम्प्रयाति हि ।
उल्कां ददाति तद्वक्त्रे सततं मम किङ्करः ॥ १ ९
दण्डेन ताडयेन्मूर्ध्नि तल्लोमाब्दप्रमाणकम् ।
ततो भवेन्मानवी च विधवा सप्तजन्मसु ॥ २०
सा भुक्त्वा चैव वैधव्यं व्याधियुक्ता ततः शुचिः ।
या ब्राह्मणी शूद्रभोग्या चान्धकूपे प्रयाति सा ॥ २१
तप्तशौचोदके ध्वान्ते तदाहारी दिवानिशम् ।
निवसेदतिसन्तप्ता मम दूतेन ताडिता ॥ २२
शौचोदके निमग्ना सा यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
काकी जन्मसहस्त्राणि शतजन्मानि सूकरी ॥ २३
शृगाली शतजन्मानि शतजन्मानि कुक्कुटी ।
पारावती सप्तजन्म वानरी सप्तजन्मसु ॥ २४
ततो भवेत्सा चाण्डाली सर्वभोग्या च भारते ।
ततो भवेच्च रजकी यक्ष्मग्रस्ता च पुंश्चली ॥ २५
ततः कुष्ठयुता तैलकारी शुद्धा भवेत्ततः ।
निवसेद्वेधने वेश्या पुङ्गी च दण्डताडने ॥ २६
जलरन्ध्रे वसेद्वेश्या कुलटा देहचूर्णके ।
स्वैरिणी दलने चैव धृष्टा च शोषणे तथा ॥ २७
निवसेद्यातनायुक्ता मम दूतेन ताडिता ।
विण्मूत्रभक्षा सततं यावन्मन्वन्तरं सति ॥ २८
ततो भवेद्विकृमिश्च लक्षवर्षं ततः शुचिः ।
ब्राह्मणो ब्राह्मणीं गच्छेत्क्षत्रियां वापि क्षत्रियः ॥ २ ९
स्कन्ध ५०५ है । वहाँपर मेरे दूत उसके मुखमें निरन्तर प्रज्वलित अंगार डालते रहते हैं और उसके सिरपर डंडेसे प्रहार करते रहते हैं । उसके पतिके शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्षोंतक उस स्त्रीको उस नरक-कुण्डमें रहना पड़ता है । उसके बाद मानवजन्म प्राप्त करके वह सात जन्मोंतक विधवा रहती है । विधवाका जीवन व्यतीत करनेके पश्चात् वह रोग ग्रस्त हो जाती है, तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो | जाती है ॥ १८-२० ३ ॥ जो ब्राह्मणी शूद्रके साथ भोग करती है, वह अन्धकूप नामक नरककुण्डमें जाती है । अन्धकारमय तथा तप्त शौचजलयुक्त उस कुण्डमें वह दिन - रात पड़ी रहती है और उसी तप्त शौचजलका भोजन करती है । मेरे दूतोंके द्वारा पीटी जाती हुई वह वहाँ अत्यन्त सन्तप्त रहती है । वह स्त्री चौदह इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त उस शौचजलमें डूबी रहती है । तत्पश्चात् वह एक हजार जन्मतक कौवी, एक सौ जन्मतक सूकरी, एक सौ जन्मतक सियारिन, एक सौ जन्मतक कुक्कुटी, सात जन्मतक कबूतरी और सात जन्मतक वानरी होती है । इसके बाद वह भारतवर्षमें सर्वभोग्या चाण्डाली होती है, उसके बाद वह व्यभिचारिणी धोबिन होती है और सदा यक्ष्मारोगसे ग्रस्त रहती है । तत्पश्चात् वह कोढ़रोगसे युक्त तैलकारी ( तेलिन ) होती है और उसके बाद शुद्ध हो जाती है ॥२१ - २५३ ॥ वेश्या वेधनकुण्डमें, पुंगी दण्डताडनकुण्डमें, महावेश्या जलरन्ध्रकुण्डमें, कुलटा देहचूर्णकुण्डमें, स्वैरिणी दलनकुण्डमें और धृष्टा शोषणकुण्डमें वास करती है । हे साध्वि! मेरे दूतसे पीटी जाती हुई वह वहाँ यातना भोगती रहती है । उसे एक मन्वन्तरतक निरन्तर विष्ठा और मूत्रका भक्षण करना पड़ता है । उसके बाद वह एक लाख वर्षतक विष्ठाके कीट रूपमें रहती है और फिर उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ २६–२८३ ॥ यदि ब्राह्मण किसी परायी ब्राह्मणीके साथ, क्षत्रिय क्षत्राणीके साथ, वैश्य किसी वैश्याके साथ | और शूद्र किसी शूद्राके साथ भोग करता है; तो अपने
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५०६ वैश्यो वैश्यां च शूद्रां वा शूद्रश्चापि व्रजेद्यदि सवर्णपरदारैश्च कषायं यान्ति ते जनाः ' भुक्त्वा कषायतप्तोदं निवसेद्वा शताब्दकम् । ततो विप्रो भवेच्छुद्धस्ततो वै क्षत्रियादयः योषितश्चापि शुद्धयन्तीत्येवमाह पितामहः । क्षत्रियो ब्राह्मणीं गच्छेद्वैश्यो वापि पतिव्रते
मातृगामी भवेत्सोऽपि शूर्पे च नरके वसेत् ।
शूर्पाकारैश्च कृमिभिर्ब्राह्मण्या सह भक्षितः ॥
प्रतप्तमूत्रभोजी च मम दूतेन ताडितः ।
तत्रैव यातनां भुङ्क्ते यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥
सप्तजन्म वराहश्च छागलश्च ततः शुचिः ।
करे धृत्वा तु तुलसीं प्रतिज्ञां यो न पालयेत् ॥
मिथ्या वा शपथं कुर्यात्स च ज्वालामुखं व्रजेत् ।
गङ्गातोयं करे कृत्वा प्रतिज्ञां यो न पालयेत् ॥
शिलां वा देवप्रतिमां स च ज्वालामुखं व्रजेत् ।
दत्त्वा दक्षिणहस्तं च प्रतिज्ञां यो न पालयेत् ॥
स्थित्वा देवगृहे वापि स च ज्वालामुखं व्रजेत् ।
आस्पृश्य ब्राह्मणं गां च ज्वालावह्निं व्रजेद् द्विजः ॥
न पालयेत्प्रतिज्ञां च स च ज्वालामुखं व्रजेत् ।
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यश्च विश्वासघातकः ॥
मिथ्यासाक्ष्यप्रदश्चैव स च ज्वालामुखं व्रजेत् ।
एते तत्र वसन्त्येव यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥
तथाङ्गारप्रदग्धाश्च मम दूतेन ताडिता: । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३५ । ही वर्णकी परायी स्त्रियोंके साथ भोग करनेवाले वे ॥ ३० पुरुष कषाय नामक नरकमें जाते हैं । वहाँ वे कषाय ( खारा ) तथा गर्म जल पीते हुए सौ वर्षतक पड़े रहते हैं । उसके बाद वे ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि पुरुष शुद्ध ॥ ३१ होते हैं । उसी प्रकार यातनाएँ भोगकर वे ब्राह्मणी आदि स्त्रियाँ भी शुद्ध होती हैं - ऐसा पितामह ब्रह्माने कहा है ॥ २ ९ –३११ ॥ ॥ ३२ हे पतिव्रते! जो क्षत्रिय अथवा वैश्य किसी ब्राह्मणीके साथ समागम करता है, वह मातृगामी होता है और वह शूर्प नामक नरकमें वास करता है । ३३ ब्राह्मणीसहित वह मनुष्य सूपके आकारके कीड़ों द्वारा नोचा जाता है । वहाँ वह अत्यन्त गर्म मूत्रका सेवन करता है और मेरे दूत उसे पीटते हैं । वहाँपर वह चौदह इन्द्रोंके आयुपर्यन्त यातना भोगता है । ३४ उसके बाद वह सात जन्मोंतक सूअर और सात जन्मोंतक बकरा होता है, तत्पश्चात् वह शुद्ध हो
जाता है । ३२-३४३ ॥
३५ जो मनुष्य हाथमें तुलसीदल लेकर की गयी प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता अथवा मिथ्या शपथ लेता है, वह ज्वालामुख नामक नरकमें जाता है । उसी ३६ प्रकार जो मनुष्य अपने हाथमें गंगाजल, शालग्रामशिला अथवा किसी देवताकी प्रतिमा लेकर की गयी प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, वह भी ज्वालामुख ३७ नरकमें जाता है । जो मनुष्य किसी दूसरे व्यक्तिके दाहिने हाथमें अपना दायाँ हाथ रखकर अथवा किसी देवालयमें स्थित होकर की गयी प्रतिज्ञाको पूर्ण नहीं ३८ करता, वह भी ज्वालामुख नरकमें जाता है । जो द्विज किसी ब्राह्मण अथवा गायका स्पर्श करके की गयी प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, वह ज्वालामुख नामक ३ ९ नरकमें जाता है । उसी तरह जो मनुष्य अपने मित्रके साथ द्रोह करता है, कृतघ्न है, विश्वासघात करता है और झूठी गवाही देता है, वह भी ज्वालामुख ४० नरकमें जाता है । ये लोग उस नरकमें चौदह इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त निवास करते हैं । मेरे दूत अंगारोंसे उन्हें दागते हैं और बहुत पीटते हैं ॥ ३५ - ४०३ ॥
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अ ० ३५ ] चाण्डालस्तुलसीं स्पृष्ट्वा सप्तजन्म ततः शुचिः ॥
म्लेच्छो गङ्गाजलस्पर्शी पञ्चजन्म ततः शुचिः ।
शिलास्पर्शी विट्कृमिश्च सप्तजन्मसु सुन्दरि ॥
अर्चास्पर्शी ब्रह्मकृमिः सप्तजन्म ततः शुचिः दक्षहस्तप्रदाता च सर्पश्च सप्तजन्मसु ॥
ततो भवेद् ब्रह्महीनो मानवश्च ततः शुचिः ।
मिथ्यावादी देवगृहे देवलः सप्तजन्मसु ॥
विप्रादिस्पर्शकारी च व्याघ्रजातिर्भवेद् ध्रुवम् ।
ततो भवेच्च मूकः स बधिरश्च त्रिजन्मनि ॥
भार्याहीनो बन्धुहीनो वंशहीनस्ततः शुचिः । मित्रद्रोही च नकुलः कृतघ्नश्चापि गण्डकः विश्वासघाती व्याघ्रश्च सप्तजन्मसु भारते । मिथ्यासाक्षी च वक्तव्ये मण्डूकः सप्तजन्मसु पूर्वान्सप्तापरान्सप्त पुरुषान्हन्ति चात्मनः । नित्यक्रियाविहीनश्च जडत्वेन युतो द्विजः यस्यानास्था वेदवाक्ये मन्दं हसति संततम् । व्रतोपवासहीनश्च सद्वाक्यपरनिन्दकः धूम्रान्धे च वसेत्सोऽपि शताब्दं धूम्रभक्षकः जलजन्तुर्भवेत्सोऽपि शतजन्मक्रमेण च ततो नानाप्रकारश्च मत्स्यजातिस्ततः शुचिः नवम स्कन्ध ५०७ ४१ तुलसीका स्पर्श करके मिथ्या शपथ लेनेवाला सात जन्मतक चाण्डाल होता है, उसके बाद उसकी शुद्धि होती है । गंगाजलका स्पर्श करके की गयी प्रतिज्ञाका पालन न करनेवाला पाँच जन्मतक म्लेच्छ. ४२ होता है, उसके बाद वह शुद्ध होता है । हे सुन्दरि! शालग्रामशिलाका स्पर्श करके की गयी प्रतिज्ञाका पालन न करनेवाला सात जन्मतक विष्ठाका कीड़ा होता है । किसी देवप्रतिमाका स्पर्श करके जो मिथ्या ४३ प्रतिज्ञा करता है, वह सात जन्मतक ब्राह्मण - गृहस्थके घर कीड़ा होता है, इसके बाद उसकी शुद्धि हो जाती है । किसीके दाहिने हाथपर अपना दाहिना हाथ रखकर मिथ्या शपथ लेनेवाला सात जन्मतक सर्प ४४ होता है । उसके बाद ब्रह्मज्ञानविहीन मानव होता है, पुनः शुद्ध हो जाता है । जो देवमन्दिरमें मिथ्या वचन बोलता है, वह सात जन्मतक देवल होता है । ४५ ब्राह्मण आदिको स्पर्श करके झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला निश्चितरूपसे बाघयोनिमें जन्म लेता है । उसके बाद वह तीन जन्मतक गूँगा और फिर तीन जन्मतक बहरा होता है । वह भार्यारहित, बन्धु - बान्धवोंसे विहीन ॥ ४६ तथा नि: सन्तान रहता है, तत्पश्चात् शुद्ध हो जाता है । जो मित्रके साथ द्रोह करता है, वह नेवला होता है; जो दूसरोंका उपकार नहीं मानता, वह गैंडा होता है; जो विश्वासघाती होता है, वह सात जन्मतक ॥ ४७ भारतवर्ष में बाघ होता है और जो झूठी गवाही देता है, वह सात जन्मतक मेढक होता है । वह अपनी सात पीढ़ी पहले तथा सात पीढ़ी बादके पुरुषोंका अध: पतन करा देता है॥४१–४७३ ॥ ॥ ४८ जो द्विज नित्यक्रियासे विहीन तथा जड़तासे युक्त है, वेदवाक्योंमें जिसकी आस्था नहीं है, जो कपटपूर्वक उनका सदा उपहास करता है, जो व्रत तथा उपवास नहीं करता और दूसरोंके उत्तम विचारोंकी ॥ ४ ९ निन्दा करता है, वह धूम्रान्ध नामक नरकमें धूमका ही भक्षण करते हुए एक सौ वर्षतक निवास करता । है । उसके बाद वह क्रमसे सौ जन्मोंतक अनेक प्रकारका जलजन्तु होता है । तत्पश्चात् वह अनेक ॥ ५० प्रकारकी मत्स्ययोनिमें जन्म लेता है, उसके बाद । उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ४८ - – ५० ३ ॥
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५०८ यः करोत्युपहासं च देवब्राह्मणयोर्धने
पातयित्वा स पुरुषान्दशपूर्वान्दशापरान् ।
सोऽयं याति च धूम्रान्धं धूम्रध्वान्तसमन्वितम् ॥
धूम्रक्लिष्टो धूम्रभोजी वसेत्तत्र चतुर्गुणम् ।
ततो मूषकजातिश्च सप्तजन्मसु भारते ॥
ततो नानाविधाः पक्षिजातयः कृमिजातिभिः ।
ततो नानाविधा वृक्षाः पशवश्च ततो नरः ॥
विप्रो दैवज्ञजीवी च वैद्यजीवी चिकित्सकः ।
लाक्षालोहादिव्यापारी रसादिविक्रयी च यः ॥
स याति नागवेष्टं च नागैर्वेष्टितमेव च ।
वसेत्स लोममानाब्दं तत्रैव नागपाशितः ॥
ततो नानाविधाः पक्षिजातयश्च ततो नरः ।
ततो भवेत्स गणको वैद्यश्च सप्तजन्मसु ॥
गोपश्च कर्मकारश्च रङ्गकारस्ततः शुचिः ।
प्रसिद्धानि च कुण्डानि कथितानि पतिव्रते ॥
अन्यानि चाप्रसिद्धानि क्षुद्राणि सन्ति तत्र वै I
सन्ति पातकिनस्तेषु स्वकर्मफलभोगिनः ।
भ्रमन्ति नानायोनिं च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३६ ॥ ५१ जो मनुष्य देवता तथा ब्राह्मणकी सम्पत्तिका उपहास करता है, वह अपनी दस पीढ़ी पहले तथा दस पीढ़ी बादके पुरुषोंका पतन कराकर स्वयं धूम्र ५२ तथा अन्धकारसे युक्त धूम्रान्ध नामक नरकमें जाता है । वहाँपर धुएँसे कष्ट सहते हुए तथा धुएँका ही भोजन करते हुए वह चार सौ वर्षतक रहता है । ५३ उसके बाद वह भारतवर्षमें सात जन्मतक चूहेकी योनि जन्म पाता है । तदनन्तर वह अनेक प्रकारके पक्षियों तथा कीड़ोंकी योनिमें जाता है, उसके बाद अनेकविध वृक्ष तथा पशु होनेके अनन्तर वह मनुष्ययोनिमें ५४ जन्म ग्रहण करता है ॥ ५१-५४ ॥ जो विप्र ज्योतिषविद्यासे अपनी आजीविका चलाता है, वैद्य होकर चिकित्सावृत्तिसे आजीविका ५५ चलाता है, लाख - लोहा आदिका व्यापार करता और रस आदिका विक्रय करता है; वह नागोंसे व्याप्त नागवेष्टन नामक नरकमें जाता है और नागोंसे आबद्ध ५६ होकर अपने शरीरके रोमप्रमाण वर्षोंतक वहाँ निवास करता है, तत्पश्चात् उसे नानाविध पक्षी - योनियाँ मिलती हैं और उसके बाद वह मनुष्य होता है, ५७ | तत्पश्चात् वह सात जन्मतक गणक और सात जन्मतक वैद्य होता है । पुनः गोप, कर्मकार और रंगकार होकर शुद्ध होता है ॥ ५५-५७३ ॥ ५८ हे पतिव्रते! मैंने प्रसिद्ध नरककुण्डोंका वर्णन कर दिया । इनके अतिरिक्त और भी छोटे - छोटे कुण्ड हैं, जो प्रसिद्ध नहीं हैं, अपने कर्मोंका फल भोगने के लिये पापी लोग वहाँ जाते हैं और विविध योनियों में भ्रमण करते रहते हैं, अब तुम और क्या सुनना चाहती ५ ९ | हो? ॥ ५८-५९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नानाकर्मविपाकफलकथनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः धर्मराजद्वारा सावित्रीसे देवोपासनासे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलोंको कहना सावित्र्युवाच सावित्री बोली- हे वेद - वेदांगमें पारंगत धर्मराज महाभाग वेदवेदाङ्गपारग । महाभाग धर्मराज! नानाविध पुराणों तथा इतिहासों में नानापुराणेतिहासे यत्सारं तत्प्रदर्शय ॥ १ जो सारस्वरूप है, उसे प्रदर्शित कीजिये | अब आप
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अ ० ३६ ] नवम
सर्वेषु सारभूतं यत्सर्वेष्टं सर्वसम्मतम् ।
कर्मच्छेदबीजरूपं प्रशस्तं सुखदं नृणाम् ॥ २
सर्वप्रदं च सर्वेषां सर्वमङ्गलकारणम् ।
भयं दुःखं न पश्यन्ति येन वै सर्वमानवाः ॥ ३
कुण्डानि ते न पश्यन्ति तेषु नैव पतन्ति च ।
न भवेद्येन जन्मादि तत्कर्म वद साम्प्रतम् ॥ ४
किमाकाराणि कुण्डानि तानि वा निर्मितानि च ।
के च केनैव रूपेण तत्र तिष्ठन्ति पापिनः ॥ ५
स्वदेहे भस्मसाद्भूते याति लोकान्तरं नरः ।
केन देहेन वा भोगं करोति च शुभाशुभम् ॥ ६
सुचिरं क्लेशभोगेन कथं देहो न नश्यति ।
देहो वा किंविधो ब्रह्मंस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ७
श्रीनारायण उवाच
सावित्रीवचनं श्रुत्वा धर्मराजो हरिं स्मरन् ।
कथां कथितुमारेभे कर्मबन्धनिकृन्तनीम् ॥ ८
धर्मराज उवाच
वत्से चतुर्षु वेदेषु धर्मेषु संहितासु च ।
पुराणेष्वितिहासेषु पाञ्चरात्रादिकेषु च ॥ ९
अन्येषु धर्मशास्त्रेषु वेदाङ्गेषु च सुव्रते ।
सर्वेष्टं सारभूतं च पञ्चदेवानुसेवनम् ॥ १०
जन्ममृत्युजराव्याधिशोकसन्तापनाशनम् सर्वमङ्गलरूपं च परमानन्दकारणम् ॥ ११
कारणं सर्वसिद्धीनां नरकार्णवतारणम् ।
भक्तिवृक्षाङ्कुरकरं कर्मवृक्षनिकृन्तनम् ॥१२
विमोक्षसोपानमिदमविनाशपदं स्मृतम् ।
सालोक्यसाष्टिसारूप्यसामीप्यादिप्रदं शुभम् ॥ १३
स्कन्ध ५० ९ मुझसे उस कर्मका वर्णन कीजिये; जो सबका सारभूत, सबका अभीष्ट, सर्वसम्मत, कर्मोंका उच्छेद करनेके लिये बीजरूप, परम श्रेष्ठ, मनुष्योंको सुख देनेवाला, सब कुछ प्रदान करनेवाला तथा सभीका सब प्रकारका कल्याण करनेवाला है और जिसके प्रभावसे सभी मनुष्य भय तथा दुःखका अनुभव नहीं करते, नरककुण्डोंको उन्हें देखना नहीं पड़ता, वे उनमें नहीं गिरते तथा जिससे उनका जन्म आदि नहीं होता है॥१-४ ॥ उन नरककुण्डोंके आकार कैसे हैं और वे किस प्रकार बने हैं? कौन - कौन पापी किस रूपसे वहाँ निवास करते हैं? अपने देहके भस्मसात् हो जानेपर मनुष्य किस देहसे परलोकमें जाता है और अपने द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्मोंके फल भोगता है? दीर्घकालतक महान् क्लेशका भोग करनेपर भी उस देहका नाश क्यों नहीं होता और वह देह किस प्रकारका होता है? हे ब्रह्मन्! यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ॥५- ७ ॥ श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] सावित्रीकी बात सुनकर धर्मराजने भगवान् श्रीहरिका स्मरण करते हुए कर्मबन्धनको काटनेवाली कथा कहनी आरम्भ की ॥८ ॥
धर्मराज बोले- हे वत्से! हे सुव्रते! चारों वेदों, धर्मशास्त्रों, संहिताओं, पुराणों, इतिहासों, पांचरात्र आदि धर्मग्रन्थों तथा अन्य धर्मशास्त्रों और वेदांगों में पाँच देवताओंकी उपासनाको सर्वेष्ट तथा सारभूत बताया गया है ॥९ -१० ॥ यह देवोपासना जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक तथा संतापका नाश करनेवाली; सर्वमंगलरूप; परम आनन्दका कारण; सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली; नरकरूपी समुद्रसे उद्धार करनेवाली; भक्तिरूपी वृक्षको अंकुरित करनेवाली; कर्मबन्धनरूपी वृक्षको काटनेवाली; मोक्षके लिये सोपानस्वरूप; शाश्वतपदस्वरूप; सालोक्य, साष्टि, सारूप्य तथा सामीप्य आदि मुक्तियोंको प्रदान करनेवाली तथा मंगलकारी बतायी गयी है॥११–१३ ॥
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५१० कुण्डानि यमदूतैश्च रक्षितानि सदा शुभे न हि पश्यन्ति स्वप्ने च पञ्चदेवार्चका नराः देवीभक्तिविहीना ये ते पश्यन्ति ममालयम् यान्ति ये हरितीर्थं वा श्रयन्ति हरिवासरम् प्रणमन्ति हरिं नित्यं हर्यर्चां कल्पयन्ति च । न यान्ति तेऽपि घोरां च मम संयमिनीं पुरीम् त्रिसन्धिपूता विप्राश्च शुद्धाचारसमन्विताः । निवृत्तिं नैव लप्स्यन्ति देवीसेवां विना नराः
स्वधर्मनिरताचाराः स्वधर्मनिरतास्तथा ।
गच्छन्तो मृत्युलोकं च दुर्दृशा मम किङ्कराः ॥
भीताः शिवोपासकेभ्यो वैनतेयादिवोरगाः ।
स्वदूतं पाशहस्तं च गच्छन्तं वारयाम्यहम् ॥
यास्यन्ति ते च सर्वत्र हरिदासाश्रमं विना ।
कृष्णमन्त्रोपासकाच्च वैनतेयादिवोरगाः ॥
देवीमन्त्रोपासकानां नाम्नाञ्चैव निकृन्तनम् ।
करोति नखलेखन्या चित्रगुप्तश्च भीतवत् ॥
मधुपर्कादिकं तेषां कुरुते च पुनः पुनः ।
विलङ्घ्य ब्रह्मलोकं च लोकं गच्छन्ति ते सति ॥
दुरितानि च नश्यन्ति येषां संस्पर्शमात्रतः ।
ते महाभाग्यवन्तो हि सहस्त्रकुलपावनाः ॥
यथा च प्रज्वलद्वह्रौ शुष्कानि च तृणानि च ।
प्राप्नोति मोहः सम्मोहं तांश्च दृष्ट्वा च भीतवत् ॥
कामश्च कामिनं याति लोभक्रोधौ ततः सति ।
मृत्युः प्रलीयते रोगो जरा शोको भयं तथा ॥
कालः शुभाशुभं कर्म हर्षो भोगस्तथैव च । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३६ । हे शुभे! यमदूत इन नरककुण्डोंकी सदा रखवाली ॥ १४ किया करते हैं । पंचदेवोंकी आराधना करनेवाले मनुष्यों को स्वप्नमें भी इन कुण्डोंका दर्शन नहीं होता ॥ जो भगवतीकी भक्तिसे रहित हैं, वे ही मेरी पुरीको ॥ १५ देखते हैं ॥१४१ / २ ॥ जो भगवान्के तीर्थोंमें जाते हैं, एकादशीका व्रत करते हैं, भगवान् श्रीहरिको नित्य प्रणाम करते हैं और उनकी प्रतिमाकी पूजा करते हैं, उन्हें भी मेरी भयंकर ॥ १६ संयमिनी पुरीमें नहीं जाना पड़ता ॥ १५-१६ ॥ त्रिकाल सन्ध्यासे पवित्र तथा विशुद्ध सदाचारसे युक्त ब्राह्मण भी बिना भगवतीकी उपासनाके मोक्ष ॥ १७ । नहीं प्राप्त कर सकते ॥ १७ ॥
अपने धार्मिक आचार - विचारसे सम्पन्न तथा अपने धर्ममें संलग्न रहनेवालोंको मृत्युलोक गये हुए १८ मेरे दूत दिखायी नहीं पड़ते । मेरे दूत शिवके उपासकोंसे उसी तरह भयभीत होते हैं, जैसे गरुड़से सर्प | हाथमें पाश लिये हुए अपने दूतको शिवोपासककी ओर जाते १ ९ । देखकर मैं उसे रोक देता हूँ ॥ १८ - १ ९ ॥ मेरे दूत भगवान् श्रीहरिके भक्तोंके आश्रमको छोड़कर सभी जगह जा सकते हैं । श्रीकृष्णके २० मन्त्रोंकी उपासना करनेवालोंसे मेरे दूत गरुड़से सर्पकी भाँति डरते हैं ॥ २० ॥
[ पाप करनेवालोंकी सूचीसे ] देवीके मन्त्रोपासकोंके २१ लिखे नामोंको चित्रगुप्त भयभीत होकर अपनी नखरूपी लेखनीसे काट देते हैं; साथ ही मधुपर्क आदिसे बार-बार उनका सत्कार करते हैं । हे सति! वे भक्त
ब्रह्मलोक पार करके भगवतीके लोक ( मणिद्वीप ) -२२ । को चले जाते हैं ॥ २१-२२ ॥
जिनके स्पर्शमात्र से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं, वे [ भक्त ] महान् सौभाग्यशाली हैं । वे हजारों २३ कुलोंको पवित्र कर देते हैं । जलती हुई अग्निमें पड़े सूखे पत्तोंकी भाँति उनके पाप जल जाते हैं । उन भक्तोंको देखकर मोह भी भयभीत होकर मोहित २४ हो जाता है, हे साध्वि! काम निर्मूल हो जाता है, लोभ तथा क्रोध नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु विलीन हो जाती है; इसी प्रकार रोग, जरा, शोक, भय, काल, २५ शुभाशुभ कर्म, हर्ष तथा भोग – ये सब प्रभावहीन हो जाते हैं॥२३–२५३ ॥
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अ ० ३७ ] ये ये न यान्ति तां पीडां कथितास्ते मया सति ॥
शृणु देहविवरणं कथयामि यथागमम् ।
पृथिवी वायुराकाशस्तेजस्तोयमिति स्फुटम् ॥
देहिनां देहबीजं च स्त्रष्टृसृष्टिविधौ परम् ।
पृथिव्यादिपञ्चभूतैर्यो देहो निर्मितो भवेत् ॥
स कृत्रिम नश्वरश्च भस्माच्च भवेदिह ।
बद्धोऽङ्गुष्ठप्रमाणश्च यो जीवः पुरुषः कृतः ॥
बिभर्ति सूक्ष्मं देहं तं तद्रूपं भोगहेतवे ।
स देहो न भवेद्भस्म ज्वलदग्नौ ममालये ॥
जलेन नष्टो देही वा प्रहारे सुचिरं कृते ।
न शस्त्रेण न वास्त्रेण सुतीक्ष्णकण्टके तथा ॥
तप्तद्रवे तप्तलोहे तप्तपाषाण एव च ।
प्रतप्तप्रतिमाश्लेषे यत्पूर्वपतनेऽपि च ॥
न दग्धो न च भग्नः स भुङ्क्ते सन्तापमेव च ।
कथितो देहवृत्तान्तः कारणं च यथागमम् ।
कुण्डानां लक्षणं सर्वं बोधाय कथयामि ते ॥
नवम स्कन्ध ५११ २६ हे साध्वि! जो - जो लोग उस नारकीय पीड़ाको प्राप्त नहीं करते, उनके विषयमें मैंने बता दिया । अब आगम - शास्त्र के अनुसार देहका विवरण बताता हूँ, उसे सुनो । पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश-२७ ये पाँच तत्त्व स्पष्ट ही हैं । स्रष्टाके सृष्टिविधानमें प्राणियोंके लिये एक देहबीज निर्मित होता है । पृथ्वी आदि पाँच भूतोंसे जो देह निर्मित होता है, वह कृत्रिम २८ | तथा नश्वर है और इस लोकमें ही वह भस्मसात् हो जाता है | २६–२८३ ॥ उस शरीरमें जो जीव आबद्ध रहता है, वह उस समय अँगूठेके आकारवाले पुरुषके रूपमें हो जाता २ ९ है । अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये वह जीव सूक्ष्मरूपसे उस देहको धारण करता है । मेरी पुरीमें प्रज्वलित अग्निमें डाले जानेपर भी वह देह भस्म नहीं ३० होता ॥ २ ९ -३० ॥ वह सूक्ष्म यातनाशरीर न तो जलमें नष्ट होता है और न दीर्घकालतक प्रहार करनेपर ही नष्ट होता है । उस शरीरको अस्त्र अथवा शस्त्रसे नष्ट नहीं ३१ किया जा सकता । अत्यन्त तीक्ष्ण धारवाले काँटे, तपते हुए तेल, तप्त लोहे और तप्त पाषाणपर पड़नेपर तथा अत्यन्त तप्त प्रतिमासे सटानेपर और पूर्वकथित ३२ नरककुण्डोंमें गिरानेपर भी वह यातनाशरीर न तो दग्ध होता है और न भग्न ही होता है; अपितु कष्ट ही भोगता रहता है । [ हे साध्वि! ] आगमशास्त्र के अनुसार देहवृत्तान्त तथा कारण आदि मैंने बता दिये, अब तुम्हारी जानकारीके लिये नरककुण्डोंका लक्षण ३३ | बताता हूँ ॥ ३१-३३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे देवपूजनात् सर्वारिष्टनिवृत्तिवर्णनं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः विभिन्न नरककुण्ड तथा वहाँ दी जानेवाली यातनाका वर्णन धर्मराज उवाच धर्मराज बोले- हे साध्वि! वे सभी नरककुण्ड पूर्णेन्दुमण्डलाकारं सर्वं कुण्डं च वर्तुलम् । पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति गोलाकार तथा बहुत गहरे हैं । वे अनेक प्रकारके पत्थरोंसे बनाये गये हैं । वे कुण्ड निम्नं पाषाणभेदैश्च पाचितं बहुभिः सति ॥ १ | नाशवान् नहीं हैं और प्रलयकालतक बने रहते हैं ।