देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 501–510

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

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४ ९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३

ताडितो यमदूतेन मन्थानैश्छन्नलोचनः ।

तद्विड्भोजी च तत्रैव ततश्चान्धस्त्रिजन्मनि ॥

सप्तजन्म दरिद्रश्च महाक्रूरश्च पातकी भारते स्वर्णकारश्च स च स्वर्णवणिक् ततः

यो भारते ताम्रचौरो लोहचौरश्च सुन्दरि ।

स च स्वलोममानाब्दं बीजकुण्डं प्रयाति स: ॥

तत्रैव बीजविड्भोजी बीजैश्च छन्नलोचनः ।

ताडितो यमदूतेन ततः शुद्धो भवेन्नरः ॥

भारते देवचौरश्च देवद्रव्यापहारकः ।

स दुस्तरे वज्रकुण्डे स्वलोमाब्दं वसेद् ध्रुवम् ॥

देहदग्धोऽपि तद्वज्जैरनाहारश्च शब्दकृत् ।

ताडितो यमदूतैश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः ॥

रौप्यगव्यांशुकानां च यश्चौरः सुरविप्रयोः ।

तप्तपाषाणकुण्डे च स्वलोमाब्दं वसेद् ध्रुवम् ॥

त्रिजन्मनि च कंसोऽपि श्वेतरूपस्त्रिजन्मनि ।

जन्मैकं श्वेतचिह्नश्च ततोऽन्ये श्वेतपक्षिणः ॥

ततो रक्तविकारी च शूली वै मानवो भवेत् ।

सप्तजन्मसु चाल्पायुस्ततः शुद्धो भवेन्नरः ॥

रैतं कांस्यमयं पात्रं यो हरेद्देवविप्रयोः ।

तीक्ष्णपाषाणकुण्डे च स्वलोमाब्दं वसेन्नरः ॥

स भवेदश्वजातिश्च भारते सप्तजन्मसु ।

ततोऽधिकाङ्गजातिश्च पादरोगी ततः शुचिः ॥

बाँधकर उसे डण्डोंसे पीटते हैं । उसे वहाँ उनकी ९ १ विष्ठा खानी पड़ती है । तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक अन्धा तथा सात जन्मोंतक दरिद्र रहता है । तदनन्तर वह पापी तथा अति क्रूर मनुष्य भारतमें स्वर्णकारका

जन्म लेकर स्वर्णका व्यवसाय करता है ॥ ९ ० – ९ २ ॥

॥ ९ २ हे सुन्दरि! जो मनुष्य भारतवर्षमें जन्म पाकर ताँबे तथा लोहेकी चोरी करता है, वह बीजकुण्ड नामक नरकमें जाता है और अपने शरीरके रोमोंकी ९ ३ संख्याके बराबर वर्षोंतक वहाँ निवास करता है । वहाँ कीड़ोंकी विष्ठा खाता हुआ कीड़ोंसे ढकी आँखोंवाला वह प्राणी यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है और तब कालक्रमसे वह शुद्ध होता है॥९ ३ - ९ ४ ॥ ९ ४ जो व्यक्ति भारतवर्षमें जन्म पाकर देवताओंकी मूर्ति तथा देवसम्बन्धी द्रव्योंकी चोरी करता है, वह अपने शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर ९ ५ वर्षोंतक दुस्तर वज्रकुण्ड नामक नरकमें निश्चित-रूपसे निवास करता है । उसे वहाँ भूखा रहना पड़ता है । उन वज्रोंके द्वारा यमदूतोंसे पीटे जानेपर उसका शरीर दग्ध हो जाता है और वह रोने-९ ६ चिल्लाने लगता है, तत्पश्चात् उस मनुष्यकी शुद्धि हो जाती है ॥ ९ ५ - ९ ६ ॥ जो मनुष्य ब्राह्मण और देवताके रजत, गव्य ९ ७ पदार्थ तथा वस्त्रोंको चुराता है; वह अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक तप्तपाषाणकुण्ड नामक नरकमें निश्चितरूपसे वास करता है । तत्पश्चात् तीन जन्मोंतक कच्छप, तीन जन्मोंतक श्वेतकुष्ठी, ९ ८ एक जन्ममें श्वेत दागवाला और फिर श्वेत पक्षी होता है । उसके बाद वह सात जन्मोंतक रक्तदोषसे युक्त, शूलरोगसे पीडित तथा अल्पायु मनुष्य होता है; ९९ तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है ॥ ९ ७ – ९९ ॥ जो व्यक्ति देवता और ब्राह्मणके पीतल तथा कांसे के बर्तनोंका हरण करता है, वह अपने शरीरके लोमसंख्यक वर्षोंतक तीक्ष्णपाषाणकुण्ड नामक नरकमें १०० वास करता है । फिर वह सात जन्मोंतक भारतवर्ष में घोड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है । उसके बाद वह

अधिक अंगोंवाला तथा पैरके रोगसे ग्रस्त होता है ।

१०१ । तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है ॥ १०० - १०१ ॥

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अ ० ३३ ] नवम स्कन्ध ४ ९ ३

पुंश्चल्यन्नं च यो भुङ्क्ते पुंश्चलीजीव्यजीविनः ।

स्वलोममानवर्षं च लालाकुण्डे वसेद् ध्रुवम् ॥

ताडितो यमदूतेन तद्भोजी तत्र दुःखितः ।

ततश्चक्षुः शूलरोगी ततः शुद्धः क्रमेण सः ॥

म्लेच्छसेवी मसीजीवी यो विप्रो भारते भुवि ।

वसेत्स्वलोममानाब्दं मसीकुण्डे स दुःखभाक् ॥

ताडितो यमदूतेन तद्भोजी तत्र तिष्ठति ।

ततस्त्रिजन्मनि भवेत्कृष्णवर्णः पशुः सति ॥

त्रिजन्मनि भवेच्छागः कृष्णवर्णस्त्रिजन्मनि ।

ततः स तालवृक्षश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः ॥

धान्यादिसस्यं ताम्बूलं यो हरेत्सुरविप्रयोः ।

आसनं च तथा तल्पं चूर्णकुण्डे प्रयाति सः ॥

शताब्दं तत्र निवसेद्यमदूतेन ताडितः ।

ततो भवेन्मेषजातिः कुक्कुटश्च त्रिजन्मनि ॥

ततो भवेद्वानरश्च कासव्याधियुतो भुवि ।

वंशहीनो दरिद्रश्च स्वल्पायुश्च ततः शुचिः ॥

करोति चक्रं विप्राणां हृत्वा द्रव्यं च यो जनः ।

स वसेच्चक्रकुण्डे च शताब्दं दण्डताडितः ॥

ततो भवेन्मानवश्च तैलकारस्त्रिजन्मनि ।

व्याधियुक्तो भवेद्रोगी वंशहीनस्ततः शुचिः ॥

जो मनुष्य किसी व्यभिचारिणी स्त्रीका अन्न तथा १०२ उस स्त्रीकी जीविकापर आश्रित रहनेवाले व्यक्तिका अन्न खाता है, वह अपने शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक लालाकुण्ड नामक नरक में निश्चितरूपसे निवास करता है । वहाँपर वह यमदूतोंद्वारा पीटा जाता १०३ | है और अत्यन्त दु: खी होकर उसे वही लाला ( लार ) खानी पड़ती है । तदनन्तर वह मानवयोनिमें उत्पन्न होकर नेत्र तथा शूलके रोगसे पीड़ित होता है । इसके बाद वह क्रमसे शुद्ध हो जाता है ॥ १०२ - १०३ ॥ १०४ जो ब्राह्मण भारतवर्षमें म्लेच्छोंकी सेवा करनेवाला तथा मसिजीवी ( मसिपर आश्रित रहकर अपनी जीविका चलानेवाला ) है, वह अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक मसीकुण्ड नामक नरक में १०५ वास करता है और वहाँ बहुत दुःख पाता है । यमदूत उसे पीटते हैं और उसे वहाँपर उसी मसि ( स्याही ) -का सेवन करना पड़ता है । हे साध्वि! तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक काले रंगका पशु होता है । तदनन्तर १०६ वह तीन जन्मोंतक काले रंगका छाग बकरा होता है और उसके बाद तीन जन्मोंतक ताड़का वृक्ष होता है; तत्पश्चात् वह शुद्ध हो जाता है । १०४ -१०६ ॥ जो मनुष्य देवता अथवा ब्राह्मणके अन्न, फसल, १०७ ताम्बूल, आसन और शय्या आदिकी चोरी करता है; वह चूर्णकुण्ड नामक नरकमें जाता है और वहाँ सौ वर्षोंतक निवास करता है । वह यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है । तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक मेष और १०८ कुक्कुट होता है । उसके बाद वानर होता है । तदनन्तर भारतभूमिपर काशरोगसे पीड़ित, वंशहीन, दरिद्र तथा अल्पायु मनुष्य होता है; इसके बाद उसकी शुद्धि हो १० ९ | जाती है ॥ १०७ – १० ९ ॥ जो मनुष्य किसी ब्राह्मणके धनका हरण करके उससे चक्र ( कोल्हू ) - सम्बन्धी व्यवसाय करता है, वह चक्रकुण्ड नामक नरकमें डण्डोंसे पीटा जाता ११० हुआ सौ वर्षोंतक वास करता है । उसके बाद वह मानवयोनिमें उत्पन्न होता है और तीन जन्मोंतक अनेक प्रकारकी व्याधियोंसे युक्त रोगी तथा वंशहीन तैलकार ( तेलका व्यापार करनेवाला ) होता है; १११ । तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ११०-१११ ॥

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४ ९ ४ गोधनेषु च विप्रेषु करोति वक्रतां पुमान् । प्रयाति वक्रकुण्डं स तिष्ठेद्युगशतं सति

ततो भवेत्स वक्राङ्गो हीनाङ्गः सप्तजन्मनि ।

दरिद्रो वंशहीनश्च भार्याहीनस्ततः शुचिः ॥

ततो भवेद् गृध्रजन्मा त्रिजन्मनि च सूकरः ।

त्रिजन्मनि बिडालश्च मयूरश्च त्रिजन्मनि ॥

निषिद्धं कूर्ममांसं च ब्राह्मणो यो हि भक्षति ।

कूर्मकुण्डे वसेत्सोऽपि शताब्दं कूर्मभक्षितः ॥

ततो भवेत्कूर्मजन्मा त्रिजन्मनि च सूकरः ।

त्रिजन्मनि बिडालश्च मयूरश्च ततः शुचिः ॥

घृतं तैलादिकं चैव यो हरेत्सुरविप्रयोः ।

स याति ज्वालाकुण्डं च भस्मकुण्डं च पातकी ॥

तत्र स्थित्वा शताब्दं च स भवेत्तैलपाचितः ।

सप्तजन्मनि मत्स्यश्च मूषकश्च ततः शुचिः ॥

सुगन्धितैलं धात्रीं वा गन्धद्रव्यान्यदेव वा ।

भारते पुण्यवर्षे च यो हरेत्सुरविप्रयोः ॥

स वसेद्दग्धकुण्डे च भवेद्दग्धो दिवानिशम् ।

स्वलोममानवर्षं च ततो दुर्गन्धिको भवेत् ॥

दुर्गन्धिकः सप्तजन्म मृगनाभिस्त्रिजन्मनि ।

सप्तजन्मसु मन्थानस्ततो हि मानवो भवेत् ॥

बलेनैव छलेनैव हिंसारूपेण वा सति ।

बलिष्ठश्च हरेद्भूमिं भारते परपैतृकीम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३ हे साध्वि! जो व्यक्ति गौओं और ब्राह्मणके ॥ ११२ साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करता है, वह सौ युगोंतक वक्रतुण्ड नामक नरकमें निवास करता है । तत्पश्चात् वह सात जन्मोंतक वक्र अंगोंवाला, हीन अंगवाला, दरिद्र, वंशहीन तथा भार्याहीन मानव होता है । उसके ११३ बाद वह तीन जन्मोंतक गीध, तीन जन्मोंतक सूअर, तीन जन्मोंतक बिल्ली और तीन जन्मोंतक मोर होता है; तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो जाती ११४ है ॥११२–११४ ॥ जो ब्राह्मण कछुएका निषिद्ध मांस खाता है, वह सौ वर्षोंतक कूर्मकुण्ड नामक नरकमें निवास करता है । वहाँपर उसे कछुए सदा नोंच - नोंचकर ११५ खाते रहते हैं । तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक कछुए, तीन जन्मोंतक सूअर, तीन जन्मोंतक बिल्ली और तीन जन्मोंतक मोरकी योनिमें जन्म लेता है । उसके बाद ११६ वह शुद्ध हो जाता है ॥ ११५-११६ ॥ जो व्यक्ति किसी देवता या ब्राह्मणका घृत, तेल आदि चुराता है, वह पापी ज्वालाकुण्ड और भस्मकुण्ड नामक नरकमें जाता है । वहाँपर वह एक ११७ सौ वर्षोंतक वास करते हुए तेलमें पकाया जाता है । इसके बाद वह सात जन्मोंतक मछली और सात जन्मोंतक चूहा होता है, तत्पश्चात् उसकी शुद्धि हो ११८ | जाती है ॥ ११७- ११८ ॥ जो मनुष्य पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें किसी देवता या ब्राह्मणके सुगन्धित तेल, इत्र, आँवलाचूर्ण तथा अन्य सुगन्धित द्रव्यकी चोरी करता है; वह दग्धकुण्ड ११ ९ नामक नरकमें वास करता है । वहाँपर वह अपने शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक निवास करता है और दिन - रात दग्ध होता रहता है । १२० इसके बाद वह सात जन्मोंतक दुर्गन्धिक होता है । पुनः तीन जन्मोंतक कस्तूरी मृग और सात जन्मोंतक मन्थान नामक कीड़ा होता है, तत्पश्चात् वह मनुष्ययोनिमें १२१ उत्पन्न होता है ॥ ११ ९ –१२१ ॥ हे साध्वि! जो बलिष्ठ पुरुष भारतवर्षमें अपने बलसे अथवा छलसे अथवा हिंसाके द्वारा किसी दूसरेकी पैतृकसम्पत्तिका हरण करता है, वह तप्तसूचीकुण्ड १२२ । नामक नरकमें वास करता है । वह उस नरकमें

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अ ० ३४ ] नवम स्कन्ध ४ ९ ५ स वसेत्तप्तसूचिं च भवेत्तापी दिवानिशम् तप्ततैले यथा जीवो दग्धो भवति सन्ततम् भस्मसान्न भवत्येव भोगे देही न नश्यति सप्तमन्वन्तरं पापी सन्तप्तस्तत्र तिष्ठति शब्दं करोत्यनाहारो यमदूतेन ताडितः षष्टिवर्षसहस्राणि विट्कृमिश्च भवेत्ततः ततो भवेद्भूमिहीन दरिद्रश्च ततः शुचिः ततः स्वयोनिं सम्प्राप्य शुभं कर्माचरेत्पुनः । दिन - रात उसी तरह संतप्त होता रहता है, जैसे कोई ॥ १२३ जीव तप्त तेलमें निरन्तर दग्ध होता रहता है । जलाये जानेपर भी कर्मभोगके कारण उसका देह न तो । भस्मसात् होता है और न तो उसका नाश ही होता ॥ १२४ है, अपितु वह पापी सात मन्वन्तरतक वहाँ सन्तप्त होता रहता है । वह सदा चिल्लाता रहता है, भूखा रहता है और यमदूत उसे पीटते रहते हैं । उसके बाद ।

वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है ।

॥ १२५

तत्पश्चात् वह मानवयोनिमें उत्पन्न होकर भूमिहीन और दरिद्र होता है । उसके बाद वह शुद्ध हो जाता । है और अपनी योनिमें जन्म प्राप्तकर पुनः शुभ ॥ १२६ | आचरण करने लगता है॥१२२—१२६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नानाकर्मविपाकफलकथनं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥

अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः विभिन्न पापकर्म तथा उनके यम उवाच

छिनत्ति जीवं खड्गेन दयाहीनः सुदारुणः ।

नरघाती हन्ति नरमर्थलोभेन भारते ॥

असिपत्रे वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।

तेषु यो ब्राह्मणान् हन्ति शतमन्वन्तरं वसेत् ॥

छिन्नाङ्गः संवसेत् सोऽपि खड्गधारेण सन्ततम् ।

अनाहारः शब्दमुच्चैर्यमदूतेन ताडितः ॥

मन्थानः शतजन्मानि शतजन्मानि सूकरः ।

कुक्कुटः सप्त जन्मानि शृगालः सप्तजन्मसु ॥

व्याघ्रश्च सप्त जन्मानि वृकश्चैव त्रिजन्मसु ।

सप्तजन्मसु मण्डूको यमदूतेन ताडितः ॥

स भवेद्भारते वर्षे महिषश्च ततः शुचिः ।

ग्रामाणां नगराणां वा दहनं यः करोति च ॥

कारण प्राप्त होनेवाले नरकोंका वर्णन यमराज बोले - [ हे सावित्रि! ] भारतवर्ष में जो कोई निर्दयी तथा क्रूर व्यक्ति खड्गसे किसी १ जीवको काटता है या कोई नरघाती धनके लोभसे किसी मनुष्यकी हत्या करता है, वह चौदहों इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त असिपत्रवन नामक नरकमें वास करता है । उनमें भी जो ब्राह्मणोंकी हत्या करता है, वह सौ २ मन्वन्तरतक वहाँ रहता है । तलवारकी धारसे उसके शरीर के अंग निरन्तर कटते रहते हैं । आहार न मिलने और यमदूतोंसे पीटे जानेके कारण वह जोर - जोरसे ३ चिल्लाता रहता है । तत्पश्चात् वह सौ जन्मोंतक मन्थान नामक कीड़ा, सौ जन्मोंतक सूअर, सात जन्मोंतक मुर्गा, सात जन्मोंतक सियार, सात जन्मोंतक ४ बाघ, तीन जन्मोंतक भेड़िया और सात जन्मोंतक मेंढक होता है, साथ ही वह यमदूतसे निरन्तर पीटा भी जाता है । इसके बाद वह भारतवर्ष में महिष होता ५ है, फिर उसकी शुद्धि हो जाती है॥१-५३ ॥ हे सति! जो मनुष्य गाँवों और नगरोंको जलाता है, वह क्षुरधार नामक नरकमें क्षत - विक्षत अंगोंवाला ६ होकर तीन युगोंतक रहता है । तत्पश्चात् वह शीघ्र

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४ ९ ६ क्षुरधारे वसेत्सोऽपि छिन्नाङ्गस्त्रियुगं सति ततः प्रेतो भवेत्सद्यो वह्निवक्त्रो भ्रमन्महीम् सप्तजन्मामेध्यभोजी कपोतः सप्तजन्मसु ततो भवेन्महाशूली मानवः सप्तजन्मनि सप्तजन्म गलत्कुष्ठी ततः शुद्धो भवेन्नरः । परकर्णे मुखं दत्त्वा परनिन्दां करोति यः

परदोषे महाश्लाघी देवब्राह्मणनिन्दकः ।

सूचीमुखे वसेत्सोऽपि सूचीविद्धो युगत्रयम् ॥

ततो भवेद् वृश्चिकश्च सर्पश्च सप्तजन्मसु ।

वज्रकीटः सप्तजन्म भस्मकीटस्ततः परम् ॥

ततो भवेन्मानवश्च महाव्याधिस्ततः शुचिः ।

गृहिणां हि गृहं भित्त्वा वस्तुस्तेयं करोति यः ॥

गाश्च छागांश्च मेषांश्च याति गोकामुखे च सः ।

ताडितो यमदूतेन वसेत्तत्र युगत्रयम् ॥

ततो भवेत्सप्तजन्म गोजातिर्व्याधिसंयुतः ।

त्रिजन्मनि मेषजातिश्छागजातिस्त्रिजन्मनि ॥

ततो भवेन्मानवश्च नित्यरोगी दरिद्रकः ।

भार्याहीनो बन्धुहीनः सन्तापी च ततः शुचिः ॥

सामान्यद्रव्यचौरश्च याति नक्रमुखं च सः ।

यमदूतेन वसेत्तत्राब्दकत्रयम् ॥

ततो भवेत्सप्तजन्म गोपतिर्व्याधिसंयुतः ।

ततो भवेन्मानवश्च महारोगी ततः शुचिः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४ । ही प्रेत होता है और मुँहसे आग उगलते हुए पृथ्वीपर ॥ ७ घूमता रहता है । फिर वह सात जन्मोंतक अपवित्र मल - मूत्र आदि पदार्थोंको खाता रहता है और सात जन्मोंतक कपोत होता है । तदनन्तर सात जन्मोंतक । मानवयोनिमें उत्पन्न होता है और महान् शूलरोगसे ॥ ८ पीड़ित रहता है । पुनः वह सात जन्मोंतक गलित कुष्ठरोगसे ग्रस्त रहता है और तत्पश्चात् वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥ ६–८३ ॥ ॥ ९ जो मनुष्य दूसरेके कानमें अपना मुख लगाकर परायी निन्दा करता है, परदोष निकालकर बड़ी-बड़ी डींग हाँकता है और देवता तथा ब्राह्मणकी निन्दा करता है, वह सूचीमुख नामक नरक में १० तीन युगोंतक वास करता है । वहाँ उसके शरीरमें निरन्तर सूई चुभायी जाती है । तत्पश्चात् वह सात जन्मोंतक बिच्छू, सात जन्मोंतक सर्प, सात जन्मोंतक ११ वज्रकीट और सात जन्मोंतक भस्मकीटकी योनिमें रहता है । तदनन्तर मानवयोनिमें जन्म लेकर वह महाव्याधिसे ग्रस्त रहता है, पुनः शुद्ध हो जाता है॥९ –११३ ॥ १२ जो व्यक्ति गृहस्थोंके घरमें सेंध लगाकर वस्तुओंकी चोरी करता है और गौओं, बकरों तथा भेड़ोंको चुरा लेता है; वह गोकामुख नामक नरकमें जाता है । १३ वहाँपर यमदूतके द्वारा पीटा जाता हुआ वह तीन युगोंतक वास करता है । तत्पश्चात् वह सात जन्मोंतक रोगग्रस्त गौकी योनिमें, तीन जन्मोंतक भेड़की योनि में और तीन जन्मोंतक बकरेकी योनिमें जन्म पाता है । १४ तत्पश्चात् वह मानवयोनिमें उत्पन्न होता है, उस समय वह नित्य रोगी, दरिद्र, भार्याहीन, बन्धु-बान्धवरहित और दुःखी रहता है, उसके बाद वह १५ | शुद्ध हो जाता है ॥१२–१५ ॥ सामान्य द्रव्योंकी चोरी करनेवाला नक्रमुख नामक नरकमें जाता है । वहाँपर वह यमदूत द्वारा १६ पीटा जाता हुआ तीन वर्षोंतक निवास करता है, तदनन्तर वह सात जन्मोंतक रोगसे पीड़ित रहनेवाला बैल होता है । उसके बाद वह मानवयोनिमें जन्म लेकर महान् रोगोंसे ग्रस्त रहता है और फिर शुद्ध हो १७ | जाता है ॥ १६-१७ ॥

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अ ० ३४ ]

हन्ति गाश्च गजांश्चैव तुरगांश्च नगांस्तथा ।

स याति गजदंशं च महापापी युगत्रयम् ॥

ताडितो यमदूतेन नागदन्तेन सन्ततम् ।

स भवेद्गजजातिश्च तुरगश्च त्रिजन्मनि ॥

गोजातिर्लेच्छजातिश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः ।

जलं पिबन्तीं तृषितां गां वारयति यः पुमान् ॥

नरकं गोमुखाकारं कृमितप्तोदकान्वितम् ।

तत्र तिष्ठति सन्तप्तो यावन्मन्वन्तरावधि ॥

ततो नरोऽपि गोहीनो महारोगी दरिद्रकः ।

सप्तजन्मान्त्यजातिश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः ॥

गोहत्यां ब्रह्महत्यां च करोति ह्यतिदेशिकीम् ।

यो हि गच्छत्यगम्यां च यः स्त्रीहत्यां करोति च ॥

भिक्षुहत्यां महापापी भ्रूणहत्यां च भारते ।

कुम्भीपाके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥

ताडितो यमदूतेन चूर्ण्यमानश्च सन्ततम् ।

क्षणं पतति वह्नौ च क्षणं पतति कण्टके ॥

क्षणं पतेत्तप्ततैले तप्तो येन क्षणं क्षणम् ।

क्षणं च तप्तलोहे च क्षणं च तप्तताम्रके ॥

गृध्रो जन्मसहस्त्राणि शतजन्मानि सूकरः ।

काकश्च सप्त जन्मानि सर्पश्च सप्तजन्मसु ॥

षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमि: ।

नानाजन्मसु स वृषस्ततः कुष्ठी दरिद्रकः ॥

सावित्र्युवाच

विप्रहत्या च गोहत्या किंविधा चातिदैशिकी ।

का वा नृणामगम्या च को वा संध्याविहीनकः ॥

अदीक्षितः पुमान्को वा को वा तीर्थप्रतिग्रही ।

द्विजः को वा ग्रामयाजी को वा विप्रोऽथ देवलः ॥

नवम स्कन्ध ४ ९ ७ जो मनुष्य गायों, हाथियों, घोड़ों और सर्पोंका १८ वध करता है; वह महापापी गजदंश नामक नरकमें जाता है और तीन युगोंतक वहाँ वास करता है । यमदूत उसे हाथी - दाँतसे निरन्तर पीटते रहते हैं । १ ९ तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक हाथी, तीन जन्मोंतक घोड़े, तीन जन्मोंतक गाय और तीन जन्मोंतक म्लेच्छकी योनिमें पैदा होता है, तदनन्तर वह मनुष्य २० शुद्ध हो जाता है ॥ १८-१९ ३ ॥ जो मनुष्य पानी पीती हुई प्यासी गायको वहाँसे हटा देता है, वह कीड़ोंसे भरे तथा तप्त २१ जलसे युक्त गोमुख नामक नरकमें जाता है । वहाँपर वह एक मन्वन्तरकी अवधितक सन्तप्त रहता है । तदनन्तर वह सात जन्मोंतक अन्त्य जातिमें उत्पन्न २२ होकर गोहीन, महान् रोगी तथा दरिद्र मनुष्यके रूपमें रहता है । उसके बाद वह व्यक्ति शुद्ध हो जाता २३ है॥२०–२२ ॥ जो भारतवर्षमें शास्त्र - वचनकी आड़ लेकर गोहत्या, ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या, भिक्षुहत्या तथा भ्रूणहत्या २४ करता है और जो अगम्या स्त्रीके साथ समागम करता है, वह महापापी व्यक्ति चौदह इन्द्रोंके स्थितिपर्यन्त कुम्भीपाक नरकमें वास करता है । यमदूतके द्वारा वह २५ निरन्तर पीटा जाता है, जिससे उसके शरीरके अंग चूर - चूर हो जाते हैं । उसे कभी आगमें गिराया जाता है और कभी काँटोंपर लिटाया जाता है । उसे कभी २६ तप्त तेलमें, कभी प्रतप्त लोहेमें और ताँबेमें डाला जाता है, जिससे वह प्रत्येक क्षण तपता रहता है । उसके बाद वह हजार जन्मोंतक गीध सौ जन्मोंतक २७ सूअर, सात जन्मोंतक कौवा और सात जन्मोंतक सर्प होता है । उसके बाद वह साठ हजार वर्षोंतक २८ विष्ठाका कीड़ा और अनेक जन्मोंतक बैल होता है । तत्पश्चात् मानवयोनिमें जन्म लेकर कोढ़ी तथा दरिद्र होता है ॥२३–२८ ॥ सावित्री बोली- आतिदेशिकी ब्रह्महत्या तथा २ ९ गोहत्या कितने प्रकारकी होती है? मनुष्योंके लिये कौन स्त्री अगम्य होती है और कौन मनुष्य सन्ध्यासे विहीन है, कौन अदीक्षित है, तीर्थ- प्रतिग्रही कौन है? ३० कौन ग्रामयाजी द्विज है तथा कौन देवल ब्राह्मण है?

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४ ९ ८ शूद्राणां सूपकारश्च प्रमत्तो वृषलीपतिः एतेषां लक्षणं सर्वं वद वेदविदां वर धर्मराज उवाच श्रीकृष्णे च तदर्चायामन्येषां प्रकृतौ सति शिवे च शिवलिङ्गे च सूर्ये सूर्यमणौ तथा गणेशे वाथ दुर्गायामेवं सर्वत्र सुन्दरि यः करोति भेदबुद्धिं ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः

स्वगुरौ स्वेष्टदेवे च जन्मदातरि मातरि ।

करोति भेदबुद्धिं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥

वैष्णवेषु च भक्तेषु ब्राह्मणेष्वितरेषु च ।

करोति भेदबुद्धिं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥

विप्रपादोदके चैव शालग्रामोदके तथा ।

करोति भेदबुद्धिं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥

शिवनैवेद्यके चैव हरिनैवेद्यके तथा ।

करोति भेदबुद्धिं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥

सर्वेश्वरेश्वरे कृष्णे सर्वकारणकारणे ।

सर्वाद्ये सर्वदेवानां सेव्ये सर्वान्तरात्मनि ॥

माययानेकरूपे वाप्येक एव हि निर्गुणे ।

करोतीशेन भेदं यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥

शक्तिभक्त द्वेषबुद्धिं शक्तिशास्त्रे तथैव च । द्वेषं यः कुरुते मर्त्यो श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४ । हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! जो ब्राह्मण शूद्रोंके यहाँ रसोइयाका ॥ ३१ काम करता है, प्रमत्त है और शूद्रापति है - इन सभीके समस्त लक्षणोंको आप मुझे बतलाइये ॥ २ ९ –३१ ॥ धर्मराज बोले- हे साध्वि! हे सुन्दरि! श्रीकृष्ण में । तथा उनकी मूर्तिमें, अन्य देवताओंमें तथा उनकी ॥ ३२ प्रतिमामें, शिवमें तथा शिवलिंगमें, सूर्यमें तथा सूर्यकान्तमणिमें, गणेशमें तथा उनकी मूर्तिमें और । दुर्गामें तथा उनकी प्रतिमामें जो भेदबुद्धि रखता है, ॥ ३३ उसे [ आतिदेशिक ] ब्रह्महत्या लगती है ॥ ३२-३३ ॥ जो व्यक्ति अपने गुरु, अपने इष्टदेव तथा जन्म देनेवाली मातामें भेद मानता है; वह ब्रह्महत्या पापका भागी होता है ॥ ३४ ॥

३४ जो भगवान् विष्णुके भक्तों तथा दूसरे देवताओंकी पूजा करनेवाले ब्राह्मणोंमें भेदबुद्धि करता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ३५ ॥

३५ जो मनुष्य ब्राह्मणके चरणोदक तथा शालग्रामके जलमें भेदबुद्धि करता है, वह ब्रह्महत्याके पापका भागी होता है ॥ ३६ ॥

३६ जो मनुष्य शिवके नैवेद्य तथा भगवान् विष्णुके नैवेद्य भेदबुद्धि रखता है, वह ब्रह्महत्याके पापका भागी होता है ॥ ३७ ॥

३७ जो व्यक्ति सर्वेश्वरोंके भी ईश्वर, सभी कारणोंके कारण, सबके आदिस्वरूप, सभी देवताओंके आराध्य, सबकी अन्तरात्मा, एक होते हुए भी अपनी योगमायाके ३८ प्रभावसे अनेक रूप धारण करनेमें सक्षम तथा निर्गुण श्रीकृष्णमें और ईशान शिवजीमें भेद करता है; उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ३८-३९ ॥ ३ ९ जो मनुष्य भगवती शक्तिकी उपासना करनेवालेके प्रति द्वेषभाव रखता है तथा शक्ति - शास्त्रोंकी निन्दा करता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ४० ॥

ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥ ४० जो मनुष्य वेदोंमें प्रतिपादित रीति से पितृपूजन पितृदेवार्चनं यो वा त्यजेद्वेदनिरूपितम् तथा देवार्चनका त्याग कर देता है और निषिद्ध । विधिसे कर्म सम्पन्न करता है, वह ब्रह्महत्या यः करोति निषिद्धं च ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥ ४१ पापका भागी होता है ॥ ४१ ॥

यो निन्दति हृषीकेशं तन्मन्त्रोपासकं तथा । जो भगवान् हृषीकेश और उनके मन्त्रोंकी उपासना करनेवालोंकी निन्दा करता है और जो पवित्राणां पवित्रं च ज्ञानानन्दं सनातनम् ॥ ४२ | पवित्रोंके भी पवित्र, ज्ञानानन्द, सनातन, वैष्णवोंके

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अ ० ३४ ] नवम स्कन्ध ४ ९९

प्रधानं वैष्णवानां च देवानां सेव्यमीश्वरम् ।

ये नार्चयन्ति निन्दन्ति ब्रह्महत्यां लभन्ति ते ॥

ये निन्दन्ति महादेवीं कारणब्रह्मरूपिणीम् ।

सर्वशक्तिस्वरूपां च प्रकृतिं सर्वमातरम् ॥

सर्वदेवस्वरूपां च सर्वेषां वन्दितां सदा ।

सर्वकारणरूपां च ब्रह्महत्यां लभन्ति ते ॥

कृष्णजन्माष्टमीं रामनवमीं च सुपुण्यदाम् ।

शिवरात्रिं तथा चैकादशीं वारे रवेस्तथा ॥

पञ्च पर्वाणि पुण्यानि ये न कुर्वन्ति मानवाः ।

लभन्ति ब्रह्महत्यां ते चाण्डालाधिकपापिनः ॥

अम्बुवाच्यां भूखननं जलशौचादिकं च ये ।

कुर्वन्ति भारते वर्षे ब्रह्महत्यां लभन्ति ते ॥

गुरुञ्च मातरं तातं साध्वीं भार्यां सुतं सुताम् ।

अनिन्द्यां यो न पुष्णाति ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥

विवाहो यस्य न भवेन्न पश्यति सुतं तु यः ।

हरिभक्तिविहीनो यो ब्रह्महत्यां लभेत्तु सः ॥

हरेरनैवेद्यभोजी नित्यं विष्णुं न पूजयेत् ।

पुण्यं पार्थिवलिङ्गं च ब्रह्महासौ प्रकीर्तितः ॥

गोप्रहारं प्रकुर्वन्तं दृष्ट्वा यो न निवारयेत् ।

याति गोविप्रयोर्मध्ये गोहत्यां तु लभेत्तु सः ॥

दण्डैर्गोस्ताडयेन्मूढो यो विप्रो वृषवाहनः ।

दिने दिने गोवधं च लभते नात्र संशयः ॥

ददाति गोभ्य उच्छिष्टं भोजयेद् वृषवाहकम् ।

भुनक्ति वृषवाहान्नं स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥

परम आराध्य तथा देवताओंके सेव्य परमेश्वरकी पूजा ४३ नहीं करते; अपितु निन्दा करते हैं, वे ब्रह्महत्याके पापके भागी होते हैं ॥ ४२-४३ ॥ जो कारणब्रह्मरूपिणी, सर्वशक्तिस्वरूपा, सर्वजननी, ४४ सर्वदेवस्वरूपिणी, सबके द्वारा वन्दित तथा सर्वकारण-रूपिणी मूलप्रकृति महादेवीकी सदा निन्दा करते हैं; उन्हें ब्रह्महत्याका पाप लगता है । ४४-४५ ॥ जो मनुष्य पुण्यदायिनी कृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, ४५ शिवरात्रि, एकादशी और रविवार – इन पाँच पुण्य पर्वोंके अवसरपर व्रत नहीं करते, वे चाण्डालसे भी बढ़कर पापी हैं और उन्हें ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ४६-४७ ॥ ४६ जो इस भारतवर्षमें अम्बुवाचीयोग ( आर्द्रा नक्षत्रके प्रथम चरण ) - में पृथ्वी खोदते हैं या जलमें शौच आदि करते हैं, उन्हें ब्रह्महत्याका पाप लगता है ॥ ४८ ॥

४७ जो मनुष्य अपने गुरु, माता, पिता, साध्वी भार्या, पुत्र तथा अनिन्दनीय आचरण करनेवाली पुत्रीका भरण - पोषण नहीं करता; उसे ब्रह्महत्याका पाप ४८ लगता है ॥ ४ ९ ॥ जिसका विवाह न हुआ हो, जिसने पुत्र न देखा हो, अर्थात् पुत्रवान् न हो तथा जो भगवान् श्रीहरिकी ४ ९ भक्तिसे विमुख हो, वह ब्रह्महत्याके पापका भागी होता है ॥५० ॥

जो मनुष्य भगवान् श्रीहरिको नैवेद्य अर्पण किये ५० बिना भोजन करता है, विष्णुका नित्य पूजन नहीं करता और पवित्र पार्थिव लिंगका पूजन नहीं करता; उसे ब्रह्महत्यारा कहा गया है ॥ ५१ ॥

जो किसी मनुष्यको गायपर प्रहार करते हुए ५१ देखकर उसे नहीं रोकता और जो गाय तथा ब्राह्मणके बीचसे निकलता है, वह गोहत्याके पापका भागी होता है ॥५२ ॥

५२ जो मूर्ख ब्राह्मण गायोंको डंडोंसे पीटता है और बैल पर सवारी करता है, उसे प्रतिदिन गोहत्याका पाप लगता है ॥ ५३ ॥

५३ जो व्यक्ति गायोंको जूठा अन्न खिलाता है, बैलकी सवारी करनेवालेको भोजन कराता है और बैलकी सवारी करनेवालेका अन्न खाता है; उसे ५४ निश्चितरूपसे गोहत्याका पाप लगता है ॥ ५४ ॥

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५०० वृषलीपतिं याजयेद्यो भुङ्क्तेऽन्नं तस्य यो नरः गोहत्याशतकं सोऽपि लभते नात्र संशयः पादं ददाति वह्नौ यो गाश्च पादेन ताडयेत् गेहं विशेदधौताङ्घ्रिः स्नात्वा गोवधमाप्नुयात्

यो भुङ्गे स्निग्धपादेन शेते स्निग्धाङ्घ्रिरेव च ।

सूर्योदये च यो भुङ्क्ते स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥

अवीरान्नं च यो भुङ्गे योनिजीव्यस्य च द्विजः ।

यस्त्रिसन्ध्याविहीनश्च गोहत्यां लभते च सः ॥

स्वभर्तरि च देवे वा भेदबुद्धिं करोति या ।

कटूक्त्या ताडयेत् कान्तं सा गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥

गोमार्गवर्जनं कृत्वा ददाति सस्यमेव वा ।

तडागे वा तु दुर्गे वा स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥

प्रायश्चित्ते गोवधस्य यः करोति व्यतिक्रमम् ।

पुत्रलोभादथाज्ञानात्स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥

राजके दैवके यत्नाद् गोस्वामी गां न रक्षति ।

दुःखं ददाति यो मूढो गोहत्यां स लभेद् ध्रुवम् ॥

प्राणिनो लङ्घयेद्यो हि देवार्चामनलं जलम् ।

नैवेद्यं पुष्पमन्नं च स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥

शश्वन्नास्तीति यो वादी मिथ्यावादी प्रतारकः ।

देवद्वेषी गुरुद्वेषी स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥

देवताप्रतिमां दृष्ट्वा गुरुं वा ब्राह्मणं सति ।

सम्भ्रमान्न नमेद्यो हि स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३४ । जो ब्राह्मण शूद्रापतिके यहाँ यज्ञ कराता है और ॥ ५५ उसका अन्न ग्रहण करता है, वह एक सौ गोहत्या के पापका भागी होता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५५ ॥

। जो मनुष्य पैरसे अग्निका स्पर्श करता है, गायोंको पैरसे मारता है और स्नान करके बिना पैर ॥ ५६ धोये देवालयमें प्रवेश करता है; उसे गोहत्याका पाप लगता है ॥ ५६ ॥

जो व्यक्ति गीले पैर भोजन करता है, गीले पैर ५७ सोता है और सूर्योदयके समय भोजन करता है; उसे अवश्य ही गोहत्याका पाप लगता है ॥ ५७ ॥

जो द्विज पति - पुत्रहीन स्त्रीका तथा योनिजीवी ५८ व्यक्तिका अन्न खाता है और जो त्रिकाल सन्ध्यासे विहीन है, उसे भी गोहत्याका पाप लगता है ॥ ५८ ॥

जो स्त्री अपने पति तथा देवतामें भेदबुद्धि रखती है तथा कटु वचनोंसे अपने पतिको पीड़ित करती है, ५ ९ उसे निश्चितरूपसे गोहत्याका पाप लगता है ॥५ ९ ॥ जो मनुष्य गोचरभूमिको जोतकर उसमें अनाज बोता है या तालाब अथवा दुर्गमें फसल उगाता है, ६० उसे निश्चय ही गोहत्याका पाप लगता है ॥६० ॥

जो व्यक्ति पुत्रके मोहसे अथवा अज्ञानके कारण गोवध प्रायश्चित्तमें व्यतिक्रम करता है, उसे निश्चित -रूपसे गोहत्याका पाप लगता है ॥ ६१ ॥

६१ जो गायका स्वामी अराजकता तथा दैवोपद्रवके अवसरपर गायकी रक्षा नहीं करता तथा जो गायको पीड़ा पहुँचाता है, उस मूर्खको निश्चय ही गोहत्याका ६२ पाप लगता है ॥६२ ॥

जो मनुष्य प्राणियों, देवमूर्ति, अग्नि, जल, नैवेद्य, पुष्प तथा अन्नको लाँघता है; वह निश्चितरूपसे ६३ गोहत्याके पापका भागी होता है ॥ ६३ ॥

मेरे पास कुछ नहीं है - ऐसा जो सदा कहता है, झूठ बोलता है, दूसरोंको ठगता है और देवता तथा ६४ गुरुसे द्वेष करता है, उसे गोहत्याका पाप अवश्य लगता है ॥६४ ॥

हे साध्वि! जो मनुष्य देवप्रतिमा, गुरु तथा ब्राह्मणको देखकर आदरपूर्वक प्रणाम नहीं करता, ६५ । उसे निश्चित रूपसे गोहत्याका पाप लगता है ॥ ६५ ॥

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अ ० ३४ ] न ददात्याशिषं कोपात्प्रणताय च यो द्विजः विद्यार्थिने च विद्यां च स गोहत्यां लभेद् ध्रुवम् ॥ गोहत्या विप्रहत्या च कथिता चातिदेशिकी गम्यां स्त्रियं नृणामेव निबोध कथयामि ते स्वस्त्री गम्या च सर्वेषामिति वेदानुशासनम् अगम्या च तदन्या या चेति वेदविदो विदुः सामान्यं कथितं सर्वं विशेषं शृणु सुन्दरि । अत्यगम्या हि या याश्च निबोध कथयामि ताः शूद्राणां विप्रपत्नी च विप्राणां शूद्रकामिनी अत्यगम्या च निन्द्या च लोके वेदे पतिव्रते शूद्रश्च ब्राह्मणीं गत्वा ब्रह्महत्याशतं लभेत् तत्समं ब्राह्मणी चापि कुम्भीपाकं लभेद् ध्रुवम् शूद्राणां विप्रपत्नी च विप्राणां शूद्रकामिनी यदि शूद्रां व्रजेद्विप्रो वृषलीपतिरेव सः स भ्रष्टो विप्रजातेश्च चाण्डालात्सोऽधमः स्मृतः विष्ठासमश्च तत्पिण्डो मूत्रं तस्य च तर्पणम् न पितॄणां सुराणां च तद्दत्तमुपतिष्ठति कोटिजन्मार्जितं पुण्यं तस्यार्चात्तपसार्जितम् द्विजस्य वृषलीलोभान्नश्यत्येव न संशयः ब्राह्मणश्च सुरापीतिर्विड्भोजी वृषलीपतिः तप्तमुद्रादग्धदेहस्तप्तशूलाङ्कितस्तथा हरिवासरभोजी च कुम्भीपाकं व्रजेद् द्विजः नवम स्कन्ध ५०१ । जो ब्राह्मण प्रणाम करनेवालेको क्रोधवश आशीर्वाद ६६ नहीं देता और विद्यार्थीको विद्या प्रदान नहीं करता, उसे अवश्य ही गोहत्याका पाप लगता है ॥ ६६ ॥

। [ हे साध्वि! ] यह मैंने आतिदेशिकी ब्रह्महत्या और गोहत्याका वर्णन कर दिया, अब मैं मनुष्यों के ॥ ६७ लिये गम्य स्त्रीके विषयमें तुमसे कह रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६७ ॥

। सभी मनुष्योंको केवल अपनी भार्याके साथ गमन ॥ ६८ । करना चाहिये - यह वेदोंका आदेश है । उसके अतिरिक्त अन्य स्त्री अगम्य है - ऐसा वेदवेत्ताओंने कहा है ॥ ६८ ॥

हे सुन्दरि! यह सब सामान्य नियम कहा गया, अब कुछ विशेष नियमोंको सुनो । जो स्त्रियाँ विशेषरूपसे ॥ ६ ९ गमन करनेयोग्य नहीं हैं, उनके विषयमें बता रहा हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो ॥ ६ ९ ॥ । हे पतिव्रते! शूद्रोंके लिये ब्राह्मणकी पत्नी और ॥ ७० ब्राह्मणोंके लिये शूद्रकी पत्नी अति अगम्य तथा निन्द्य है – ऐसा लोक और वेदमें प्रसिद्ध है ॥ ७० ॥

। ब्राह्मणीके साथ समागम करनेसे शूद्र एक सौ गोहत्या पापका भागी होता है और वह निश्चितरूपसे ॥ ७१ कुम्भीपाक नरक प्राप्त करता है तथा उस शूद्रके साथ ब्राह्मणी भी कुम्भीपाक नरकमें जाती है । अतः शूद्रोंके । लिये ब्राह्मणकी स्त्री तथा ब्राह्मणोंके लिये शूद्रकी स्त्री ॥ ७२ सर्वथा अगम्य है ॥ ७१३ ॥

यदि कोई विप्र शूद्रा नारीका सेवन करता है तो । वह वृषलीपति कहा जाता है । वह विप्रजातिसे च्युत हो जाता है और वह चाण्डालसे भी बढ़कर अधम ॥ ७३ कहा गया है । उसके द्वारा दिया गया पिण्ड विष्ठातुल्य तथा तर्पण मूत्रके समान हो जाता है । उसके द्वारा । प्रदत्त पिण्ड आदि पितरों तथा देवताओंको प्राप्त नहीं ॥ ७४ होता । करोड़ों जन्मोंमें पूजन तथा तप करके उस ब्राह्मणके द्वारा अर्जित किया गया पुण्य शूद्रा नारीके । साथ गमन करनेसे नष्ट हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है । सुरापान करनेवाला, वेश्याओंका अन्न खानेवाला, ॥ ७५ शूद्रा नारीका सेवन करनेवाला, तप्त मुद्रा तथा तप्त त्रिशूल आदिसे दागे गये शरीरवाला तथा एकादशीको I अन्न ग्रहण करनेवाला ब्राह्मण कुम्भीपाक नरकमें ॥ ७६ | जाता है ॥ ७२ - ७६ ॥