देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 561–570
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570
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५५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४२
राजराजेश्वरो दक्षः सावर्णिर्मनुरेव च ।
मङ्गलोऽनेन मन्त्रेण सप्तद्वीपेऽवनीपतिः ॥
प्रियव्रतोत्तानपादौ केदारो नृप एव च ।
एते सिद्धाश्च राजेन्द्रा मन्त्रेणानेन नारद ॥
सिद्धे मन्त्रे महालक्ष्मीः शक्राय दर्शनं ददौ ।
रत्नेन्द्रसार निर्माणविमानस्था वरप्रदा ॥
सप्तद्वीपवतीं पृथ्वीं छादयन्ती त्विषा च सा ।
श्वेतचम्पकवर्णाभा रत्नभूषणभूषिता ॥
ईषद्धास्यप्रसन्नास्या भक्तानुग्रहकातरा ।
बिभ्रती रत्नमालां च कोटिचन्द्रसमप्रभाम् ॥
दृष्ट्वा जगत्प्रसूं शान्तां तुष्टावैतां पुरन्दरः ।
पुलकाञ्चितसर्वाङ्गः साश्रुनेत्रः कृताञ्जलिः ॥
ब्रह्मणा च प्रदत्तेन स्तोत्रराजेन संयुतः ।
सर्वाभीष्टप्रदेनैव वैदिकेनैव तत्र च ॥
पुरन्दर उवाच
नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः ।
कृष्णप्रियायै सततं महालक्ष्म्यै नमो नमः ॥
पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः ।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥
सर्वसम्पत्स्वरूपिण्यै सर्वाराध्यै नमो नमः ।
हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः ॥
कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः ।
चन्द्रशोभास्वरूपायै रत्नपद्मे च शोभने ॥
सम्पत्त्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ।
नमो वृद्धिस्वरूपायै वृद्धिदायै नमो नमः ॥
रूपमें प्रसिद्ध है । कुबेरने इसी मन्त्रके द्वारा परम ४४ ऐश्वर्य प्राप्त किया था और दक्षसावर्णि नामक मनुने राजराजेश्वरका पद प्राप्त कर लिया था । मंगल इसी मन्त्रके प्रभावसे सात द्वीपोंके राजा हुए थे । हे नारद! ४५ प्रियव्रत, उत्तानपाद और केदार — ये सभी इसी मन्त्रके प्रभावसे परम सिद्ध राजाधिराज बने ॥ ४२–४५ ॥ इस मन्त्रके सिद्ध हो जानेपर भगवती महालक्ष्मीने इन्द्रको दर्शन दिया । उस समय वे वरदायिनी भगवती ४६ सर्वोत्तम रत्नसे निर्मित विमानपर विराजमान थीं, उन्होंने अपने तेजसे सात द्वीपोंवाली सम्पूर्ण पृथ्वीको व्याप्त कर रखा था, उनका श्रीविग्रह श्वेत चम्पाके ४७ पुष्पकी आभाके समान था, वे रत्नमय आभूषणोंसे सुशोभित थीं, उनका मुखमण्डल मन्द मन्द मुसकान तथा प्रसन्नतासे युक्त था, वे भक्तोंपर कृपा करनेके ४८ लिये परम आतुर थीं, उन्होंने रत्नमयी माला धारण कर रखी थी और वे करोड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिसे युक्त थीं । उन शान्त स्वभाववाली जगज्जननी ४ ९ भगवती महालक्ष्मीको देखकर इन्द्रके सभी अंग पुलकित हो उठे और वे दोनों हाथ जोड़कर अश्रुपूरित नेत्रोंसे ब्रह्माजीसे प्राप्त तथा सम्पूर्ण अभीष्ट प्रदान ५० करनेवाले इस वैदिक स्तोत्रराजके द्वारा उन महालक्ष्मीकी स्तुति करने लगे ॥ ४६–५० ॥ पुरन्दर बोले- भगवती कमलवासिनीको नमस्कार है | देवी नारायणीको नमस्कार है, कृष्णप्रिया महालक्ष्मीको ५१ निरन्तर बार - बार नमस्कार है ॥ ५१ ॥ कमलपत्रके
समान नेत्रवाली और कमलके समान मुखवालीको बार - बार नमस्कार है । पद्मासना, पद्मिनी और वैष्णवीको बार - बार नमस्कार है ॥ ५२ ॥ सर्वसम्पत्स्वरूपा तथा
५२ सबकी आराध्या देवीको बार - बार नमस्कार है । भगवान् श्रीहरिकी भक्ति प्रदान करनेवाली तथा हर्षदायिनी भगवती लक्ष्मीको बार - बार नमस्कार ५३ है ॥ ५३ ॥ हे रत्नपद्मे! हे शोभने! श्रीकृष्णके वक्ष: स्थलपर
सुशोभित होनेवाली तथा चन्द्रमाकी शोभा धारण करनेवाली आप कृष्णेश्वरीको बार - बार नमस्कार ५४ । है ॥ ५४ ॥ सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवीको नमस्कार
है । महादेवीको नमस्कार है । वृद्धिस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीको नमस्कार है । वृद्धि प्रदान करनेवाली ५५ । महालक्ष्मीको बार- बार नमस्कार है ॥ ५५ ॥
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अ ० ४२ ] नवम
वैकुण्ठे या महालक्ष्मीर्या लक्ष्मीः क्षीरसागरे ।
स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ॥५६
गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता ।
सुरभिः सागरे जाता दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥ ५७
अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालया ।
स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥ ५८
त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वाधारा वसुन्धरा ।
शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायणा ॥ ५ ९
क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा शारदा शुभा ।
परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा ॥ ६०
यया विना जगत्सर्वं भस्मीभूतमसारकम् ।
जीवन्मृतं च विश्वं च शश्वत्सर्वं यया विना ॥ ६१
सर्वेषां च परा माता सर्वबान्धवरूपिणी ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरूपिणी ॥ ६२
यथा माता स्तनान्धानां शिशूनां शैशवे सदा ।
तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वरूपतः ॥ ६३
मातृहीनः स्तनान्धस्तु स च जीवति दैवतः ।
त्वया हीनो जनः कोऽपि न जीवत्येव निश्चितम् ॥ ६४
सुप्रसन्नस्वरूपा त्वं मां प्रसन्ना भवाम्बिके ।
वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि ॥ ६५
अहं यावत्त्वया हीनो बन्धुहीनश्च भिक्षुकः ।
सर्वसम्पद्विहीनश्च तावदेव हरिप्रिये ॥ ६६
ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम् ।
प्रभावञ्च प्रतापं च सर्वाधिकारमेव च ॥ ६७
जयं पराक्रमं युद्धे परमैश्वर्यमेव च । स्कन्ध ५५३ हे भगवति! आप वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, क्षीरसागरमें लक्ष्मी, इन्द्रके भवनमें स्वर्गलक्ष्मी, राजाओंके भवनमें राजलक्ष्मी, गृहस्थोंके घरमें गृहलक्ष्मी और गृहदेवता, सागरके यहाँ सुरभि तथा यज्ञके पास दक्षिणाके रूपमें विराजमान रहती हैं ॥ ५६-५७ ॥ आप अदिति, देवमाता, कमला तथा कमलालया नामसे प्रसिद्ध हैं और हवि प्रदान करते समय स्वाहा तथा कव्य प्रदान करते समय स्वधा नामसे कही गयी हैं ॥ ५८ ॥ सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली
विष्णुस्वरूपिणी पृथ्वी आप ही हैं । आप भगवान् नारायणकी आराधनामें सदा तत्पर रहनेवाली तथा विशुद्ध सत्त्वसम्पन्न हैं । आप क्रोध तथा हिंसासे रहित, वर प्रदान करनेवाली, बुद्धि प्रदान करनेवाली, मंगलमयी, श्रेष्ठ, परमार्थ तथा भगवान्का दास्य प्रदान करनेवाली हैं ॥ ५ ९ -६० ॥ आपके बिना सम्पूर्ण जगत् भस्मीभूत तथा सारहीन है । आपके बिना यह समग्र । विश्व सर्वथा जीते - जी मरे हुएके समान है ॥ ६१ ॥
आप समस्त प्राणियोंकी श्रेष्ठ माता, सबकी बान्धवस्वरूपिणी और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष ( पुरुषार्थचतुष्टय ) - की मूल कारण हैं ॥ ६२ ॥ जिस
प्रकार माता शैशवावस्थामें स्तनपायी शिशुओंकी सदा रक्षा करती है, उसी प्रकार आप सभी माताके रूपमें सब प्रकारसे उनकी हैं ॥ ६३ ॥ स्तनपायी शिशु माताके न
दैवयोगसे जी भी सकता है, किंतु आपसे कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता -है । हे अम्बिके! आप अत्यन्त प्रसन्नतापूर्ण हैं, अतः मुझपर प्रसन्न हों ॥ ६४ ॥
प्राणियोंकी रक्षा करती रहनेपर भी रहित होकर यह निश्चित स्वरूपवाली हे सनातनि! शत्रुओंके द्वारा अधिकृत किया गया मेरा राज्य मुझे पुनः प्राप्त कराइये । हे हरिप्रिये! मैं जबतक आपके दर्शनसे वंचित था; तभीतक | बन्धुहीन, भिक्षुक और सम्पूर्ण सम्पदाओंसे विहीन था । अब आप मुझे ज्ञान, धर्म, पूर्ण सौभाग्य, सम्पूर्ण अभीष्ट, प्रभाव, प्रताप, सम्पूर्ण अधिकार, परम ऐश्वर्य, पराक्रम तथा युद्धमें विजय प्रदान कीजिये ॥ ६५–६७३ ॥
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५५४ इत्युक्त्वा च महेन्द्रश्च सर्वैः सुरगणैः सह प्रणनाम साश्रुनेत्रो मूर्ध्ना चैव पुनः पुनः । ब्रह्मा च शङ्करश्चैव शेषो धर्मश्च केशवः
सर्वे चक्रुः परीहारं सुरार्थे च पुनः पुनः ।
देवेभ्यश्च वरं दत्त्वा पुष्पमालां मनोहराम् ॥
केशवाय ददौ लक्ष्मीः सन्तुष्टा सुरसंसदि ।
ययुर्देवाश्च सन्तुष्टाः स्वं स्वं स्थानं च नारद ॥
देवी ययौ हरेः स्थानं हृष्टा क्षीरोदशायिनः । ययतुश्चैव स्वगृहं ब्रह्मेशानौ च नारद दत्त्वा शुभाशिषं तौ च देवेभ्यः प्रीतिपूर्वकम् इदं स्तोत्रं महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः कुबेरतुल्यः स भवेद्राजराजेश्वरो महान् पञ्चलक्षजपेनैव स्तोत्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् सिद्धस्तोत्रं यदि पठेन्मासमेकं तु सन्ततम् । महासुखी च राजेन्द्रो भविष्यति न संशयः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४३ ॥ ६८ [ हे नारद! ] ऐसा कहकर सभी देवताओंके साथ इन्द्र अश्रुपूरित नेत्रोंसे तथा मस्तक झुकाकर भगवतीको बार - बार प्रणाम किया । ब्रह्मा, शंकर, शेषनाग, धर्म ॥ ६ ९ तथा केशव - इन सभीने देवताओंके कल्याणहेतु भगवतीसे बार - बार प्रार्थना की ॥ ६८-६९ ३ ॥ तब देवसभामें परम प्रसन्न होकर भगवती ७० महालक्ष्मीने देवताओंको वर प्रदान करके भगवान् श्रीकृष्णको मनोहर पुष्पमाला समर्पित कर दी । हे नारद! तदनन्तर सभी देवता प्रसन्न होकर अपने-७१ | अपने स्थानको चले गये और प्रसन्नचित्त महालक्ष्मी भी क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् श्रीहरिके ॥ ७२ लोकको चली गयीं । हे नारद! देवताओंको आशीर्वाद देकर ब्रह्मा और शिव भी प्रसन्नतापूर्वक अपने - अपने । लोकको चले गये ॥ ७०–७२३ ॥ ॥ ७३ [ हे नारद! ] जो मनुष्य तीनों सन्ध्याकालमें इस परम पवित्र स्तोत्रका पाठ करता है, वह कुबेरके । समान महान् राजराजेश्वर हो जाता है । पाँच लाख ॥ ७४ जप करनेपर मनुष्योंके लिये यह स्तोत्र सिद्ध हो जाता है । यदि कोई मनुष्य एक मासतक निरन्तर इस सिद्ध स्तोत्रका पाठ करे, तो वह परम सुखी तथा राजेन्द्र ॥ ७५ हो जायगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७३–७५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे महालक्ष्म्या ध्यानस्तोत्रवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः भगवती स्वाहाका उपाख्यान नारद उवाच
नारायण महाभाग नारायण महाप्रभो ।
रूपेणैव गुणेनैव यशसा तेजसा त्विषा ॥
त्वमेव ज्ञानिनां श्रेष्ठः सिद्धानां योगिनां मुने ।
तपस्विनां मुनीनां च परो वेदविदांवर ॥
महालक्ष्म्या उपाख्यानं विज्ञातं महदद्भुतम् ।
अन्यत्किञ्चिदुपाख्यानं निगूढं वद साम्प्रतम् ॥
अतीव गोपनीयं यदुपयुक्तं च सर्वतः ।
अप्रकाश्यं पुराणेषु वेदोक्तं धर्मसंयुतम् ॥
नारदजी बोले - हे नारायण! हे महाभाग! हे महाप्रभो! आप रूप, गुण, यश, तेज और कान्तिमें १ साक्षात् नारायण ही हैं ॥१ ॥
हे मुने! हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! आप ज्ञानियों, २ सिद्धों, योगियों, तपस्वियों और मुनियोंमें परम श्रेष्ठ हैं । मैंने आपसे महालक्ष्मीका अत्यन्त अद्भुत उपाख्यान जान लिया, अब आप मुझे कोई दूसरा उपाख्यान ३ बतलाइये, जो रहस्यमय, अत्यन्त गोपनीय, सबके लिये उपयोगी, पुराणोंमें अप्रकाशित, धर्मयुक्त तथा ४ । वेदप्रतिपादित हो ॥ २–४ ॥
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अ ० ४३ ] नवम श्रीनारायण उवाच
नानाप्रकारमाख्यानमप्रकाश्यं पुराणतः ।
श्रुतं कतिविधं गूढमास्ते ब्रह्मन् सुदुर्लभम् ॥ ५
तेषु यत्सारभूतं च श्रोतुं किं वा त्वमिच्छसि ।
तन्मे ब्रूहि महाभाग पश्चाद्वक्ष्यामि तत्पुनः ॥ ६
नारद उवाच
स्वाहा देवी हविर्दाने प्रशस्ता सर्वकर्मसु ।
पितृदाने स्वधा शस्ता दक्षिणा सर्वतो वरा ॥ ७
एतासां चरितं जन्मफलं प्राधान्यमेव च ।
श्रोतुमिच्छामि त्वद्वक्त्राद्वद वेदविदांवर ॥ ८
सूत उवाच
नारदस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य मुनिसत्तमः ।
कथां कथितुमारेभे पुराणोक्तां पुरातनीम् ॥ ९
श्रीनारायण उवाच
सृष्टेः प्रथमतो देवाः स्वाहारार्थं ययुः पुरा ।
ब्रह्मलोकं ब्रह्मसभामाजग्मुः सुमनोहराम् ॥ १०
गत्वा निवेदनं चक्रुराहारहेतुकं मुने ।
ब्रह्मा श्रुत्वा प्रतिज्ञाय निषेवे श्रीहरिं परम् ॥ ११
नारद उवाच
यज्ञरूपो हि भगवान् कलया च बभूव ह ।
यज्ञे यद्यद्धविर्दानं दत्तं तेभ्यश्च ब्राह्मणैः ॥ १२
श्रीनारायण उवाच
हविर्ददति विप्राश्च भक्त्या च क्षत्रियादयः ।
सुरा नैव प्राप्नुवन्ति तद्दानं मुनिपुङ्गव ॥ १३
देवा विषण्णास्ते सर्वे तत्सभां च ययुः पुनः ।
गत्वा निवेदनं चक्रुराहाराभावहेतुकम् ॥ १४
ब्रह्मा श्रुत्वा तु ध्यानेन श्रीकृष्णं शरणं ययौ ।
पूजाञ्चकार प्रकृतेर्ध्यानेनैव तदाज्ञया ॥ १५
स्कन्ध ५५५ श्रीनारायण बोले - हे ब्रह्मन्! ऐसे अनेकविध आख्यान हैं, जो पुराणोंमें वर्णित नहीं हैं । कई प्रकारके आख्यान सुने भी गये हैं, जो अत्यन्त दुर्लभ तथा गूढ़ हैं, उनमें किस सारभूत आख्यानको आप सुनना चाहते हैं? हे महाभाग! आप पहले मुझसे उसे बताइये, तब मैं उसका वर्णन करूँगा ॥५-६ ॥ नारदजी बोले - सभी धार्मिक कर्मोंमें हवि -प्रदानके समय स्वाहादेवी और श्राद्धकर्ममें स्वधादेवी प्रशस्त मानी गयी हैं । यज्ञ आदि कर्मोंमें दक्षिणादेवी सर्वश्रेष्ठ हैं । हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! मैं आपके मुखसे इन्हीं देवियोंके चरित्र, अवतारग्रहणका प्रयोजन तथा महत्त्व सुनना चाहता हूँ, उसे बताइये ॥ ७-८ ॥ सूतजी बोले – नारदजीकी बात सुनकर मुनिवर नारायणने हँसकर पुराणप्रतिपादित प्राचीन कथा कहनी आरम्भ की ॥ ९ ॥
श्रीनारायण बोले- हे मुने! प्राचीन समयमें सृष्टिके प्रारम्भिक कालमें देवतागण अपने आहारके लिये ब्रह्मलोक गये । वहाँपर वे ब्रह्माजीकी मनोहर सभामें आये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने आहारके लिये ब्रह्माजीसे प्रार्थना की । उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उनके लिये आहारकी प्रतिज्ञा करके परमेश्वर श्रीहरिकी आराधना की ॥ १०-११ ॥ नारदजी बोले – भगवान् श्रीहरि अपनी कलासे यज्ञके रूपमें प्रकट हो चुके थे । तब यज्ञमें ब्राह्मणोंके द्वारा उन देवताओंको जो - जो हव्य प्रदान किया जाता था, क्या उससे उनकी तृप्ति नहीं होती थी? ॥ १२ ॥
श्रीनारायण बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि वर्ण देवताओंके निमित्त भक्तिपूर्वक जो हविदान करते थे, उस प्रदत्त हविको देवगण नहीं प्राप्त कर पाते थे । उसीसे वे सभी देवता दुःखी होकर ब्रह्मसभामें गये और वहाँ जाकर उन्होंने आहारके अभावकी बात बतायी ॥ १३-१४ ॥ देवताओंकी यह प्रार्थना सुनकर ब्रह्माजीने ध्यान करके श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण की । तब उन श्रीकृष्णके आदेशानुसार ब्रह्माजी ध्यानके साथ मूलप्रकृति भगवतीकी आराधना करने लगे । इसके फलस्वरूप सर्वशक्ति-| स्वरूपिणी स्वाहादेवी भगवती मूलप्रकृतिकी कलासे
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५५६ प्रकृतेः कलया चैव सर्वशक्तिस्वरूपिणी । अतीव सुन्दरी श्यामा रमणीया मनोहरा
ईषद्धास्यप्रसन्नास्या भक्तानुग्रहकातरा ।
उवाचेति विधेरग्रे पद्मयोने वरं वृणु ॥
विधिस्तद्वचनं श्रुत्वा सम्भ्रमात्समुवाच ताम् । प्रजापतिरुवाच त्वमग्नेर्दाहिका शक्तिर्भव यातीव सुन्दरी ॥
दग्धुं न शक्तः प्रकृतीर्हुताशश्च त्वया विना ।
त्वन्नामोच्चार्य मन्त्रान्ते यो दास्यति हविर्नरः ॥
सुरेभ्यस्तत्प्राप्नुवन्ति सुराः सानन्दपूर्वकम् ।
अग्नेः सम्पत्स्वरूपा च श्रीरूपा सा गृहेश्वरी ॥
देवानां पूजिता शश्वन्नरादीनां भवाम्बिके ।
ब्रह्मणश्च वचः श्रुत्वा सा विषण्णा बभूव ह ॥
तमुवाच ततो देवी स्वाभिप्रायं स्वयम्भुवम् । स्वाहोवाच अहं कृष्णं भजिष्यामि तपसा सुचिरेण च ॥
ब्रह्मंस्तदन्यं यत्किञ्चित्स्वप्नवद् भ्रममेव च ।
विधाता जगतस्त्वं च शम्भुर्मृत्युञ्जयो विभुः ॥
बिभर्ति शेषो विश्वं च धर्मः साक्षी च धर्मिणाम् ।
सर्वाद्यपूज्यो देवानां गणेषु च गणेश्वरः ॥
प्रकृतिः सर्वसम्पूज्या यत्प्रसादात्पुराभवत् ।
ऋषयो मुनयश्चैव पूजिता यन्निषेवया ॥
तत्पादपद्मं नियतं भावेन चिन्तयाम्यहम् ।
पद्मास्या पाद्ममित्युक्त्वा पद्मनाभानुसारतः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४३ प्रकट हो गयीं । उनका श्रीविग्रह अत्यन्त सुन्दर, ॥ १६ लावण्यमय, रमणीय तथा मनोहर था, उनका मुखमण्डल मन्द - मन्द मुसकान तथा प्रसन्नतासे युक्त था, वे अपने भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये आतुर - सी प्रतीत हो रही थीं, ऐसे स्वरूपवाली उन भगवती स्वाहाने १७ ब्रह्माके सम्मुख उपस्थित होकर कहा – हे पद्मयोने! वर माँगो । उनका वचन सुनकर ब्रह्माजी आदरपूर्वक उन भगवतीसे कहने लगे - ॥ १५ – १७३ ॥ प्रजापति बोले - [ हे देवि! ] आप अग्निकी १८ परम सुन्दर दाहिकाशक्ति हो जाइये; क्योंकि आपके बिना अग्निदेव आहुतियोंको भस्म करनेमें समर्थ नहीं हैं । जो मनुष्य मन्त्र अन्तमें आपके नामका उच्चारण १ ९ करके देवताओंको हवि प्रदान करेगा, उसे देवगण प्रेमपूर्वक ग्रहण करेंगे । हे अम्बिके! सम्पत्स्वरूपिणी तथा श्रीरूपिणी २० जाइये, देवता तथा मनुष्य आदिके पूजनीय होवें ॥ १८ - २०३ ॥ ब्रह्माजीकी बात सुनकर वे उदास हो गयीं । उसके बाद उन्होंने २१ अभिप्राय व्यक्त कर दिया ॥ २१३ स्वाहा बोलीं- हे ब्रह्मन्! आप अग्निदेवकी गृहस्वामिनी बन लिये आप नित्य भगवती स्वाहा ब्रह्माजीसे अपना ॥ मैं दीर्घकालतक तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करूँगी; क्योंकि उनके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब २२ स्वप्नकी भाँति केवल भ्रम है ॥ २२३ ॥
जिनके अनुग्रहसे आप जगत्का विधान करते हैं, भगवान् शिवने मृत्युपर विजय प्राप्त की है, २३ शेषनाग सम्पूर्ण विश्वको धारण करते हैं, धर्मराज सभी धर्मनिष्ठ प्राणियोंके साक्षी बने हैं, गणेश्वर सभी देवगणोंमें सबसे पहले पूजे जाते हैं, पूर्वकालमें भगवती मूलप्रकृति सबके द्वारा पूजित हुईं और २४ जिनकी उपासनाके प्रभावसे ऋषि तथा मुनिगण पूजित हुए हैं, मैं उन परमेश्वर श्रीकृष्णके चरण-कमलका संयत होकर प्रेमपूर्वक निरन्तर ध्यान २५ करती हूँ ॥ २३–२५३ ॥ ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर कमलके समान मुखवाली स्वाहादेवी भगवान् विष्णुकी आज्ञाके अनुसार तपस्या २६ | करनेके लिये चली गयीं और उन पद्मजा स्वाहाने
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अ ० ४३ ] नवम स्कन्ध ५५७
जगाम तपसे देवी ध्यात्वा कृष्णं निरामयम् ।
तपस्तेपे वर्षलक्षमेकपादेन पद्मजा ॥
तदा ददर्श श्रीकृष्णं निर्गुणं प्रकृतेः परम् ।
अतीव कमनीयं च रूपं दृष्ट्वा च रूपिणी ॥
मूर्च्छा सम्प्राप कालेन कामेशस्य च कामुकी ।
विज्ञाय तदभिप्रायं सर्वज्ञस्तामुवाच ह ॥
समुत्थाप्य च तां क्रोडे क्षीणाङ्गीं तपसा चिरम् । श्रीभगवानुवाच वाराहे वै त्वमंशेन मम पत्नी भविष्यसि ॥
नाम्ना नाग्नजिती कन्या कान्ते नग्नजितस्य च ।
अधुनाग्नेर्दाहिका त्वं भव पत्नी च भामिनी ॥
मन्त्राङ्गरूपा पूज्या च मत्प्रसादाद् भविष्यसि ।
वह्निस्त्वां भक्तिभावेन सम्पूज्य च गृहेश्वरीम् ॥
रमिष्यति त्वया सार्धं रामया रमणीयया ।
इत्युक्त्वान्तर्दधे देवो देवीं सम्भाष्य नारद ॥
तत्राजगाम सन्त्रस्तो वह्निर्ब्रह्मनिदेशतः ।
सामवेदोक्तध्यानेन ध्यात्वा तां जगदम्बिकाम् ॥
सम्पूज्य परितुष्टाव पाणिं जग्राह मन्त्रतः ।
तदा दिव्यं वर्षशतं स रेमे रामया सह ॥
अतीव निर्जने देशे सम्भोगसुखदे सदा ।
बभूव गर्भस्तस्यां च हुताशस्य च तेजसा ॥
तं दधार च सा देवी दिव्यं द्वादशवत्सरम् ।
ततः सुषाव पुत्रांश्च रमणीयान्मनोहरान् ॥
दक्षिणाग्निगार्हपत्याहवनीयान् क्रमेण च । निर्विकार श्रीकृष्णका ध्यान करके एक पैरपर खड़े २७ होकर एक लाख वर्षतक तप किया । तत्पश्चात् उन्हें अप्राकृत निर्गुण भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन हुए । भगवान् श्रीकृष्णका अत्यन्त मनोहर रूप देखकर ही २८ वे रूपवती भगवती स्वाहा मूर्च्छित हो गयीं; क्योंकि उन कामुकी देवीने दीर्घकालके अनन्तर उन कामेश्वर श्रीकृष्णको देखा था ॥ २६–२८३ ॥ भगवती स्वाहाका अभिप्राय समझकर सर्वज्ञ २ ९ भगवान् श्रीकृष्ण दीर्घकालतक तपस्याके कारण अत्यन्त क्षीण देहवाली उन देवीको गोदमें बैठाकर उनसे कहने लगे ॥२ ९ ३ ॥ श्रीभगवान् बोले - हे कान्ते! तुम अंशरूपसे ३० वाराहकल्पमें मेरी भार्या बनोगी, उस समय तुम नग्नजितकी पुत्रीके रूपमें उत्पन्न होकर नाग्नजिती नामसे विख्यात होओगी । इस समय तुम दाहिका-३१ शक्तिके रूपमें अग्निदेवकी मनोहर पत्नी बनो । मेरे अनुग्रहसे तुम मन्त्रोंकी अंगस्वरूपिणी बनकर सबसे पूजित होओगी । अग्निदेव तुम्हें गृहस्वामिनी ३२ बनाकर भक्तिभावके साथ तुम्हारी पूजा करेंगे और वे परम रमणीया भार्याके रूपमें तुम्हारे साथ रमण करेंगे ॥ ३० -३२३ -0 ॥ ३३ हे नारद! देवी स्वाहासे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये । इसके बाद ब्रह्माज्ञासे अत्यन्त भयभीत अग्निदेव वहाँ आये । उन्होंने सामवेदमें ३४ कही गयी ध्यानविधिसे उन भगवती जगदम्बिकाका ध्यान करके तथा विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें परम प्रसन्न किया तथा मन्त्रोच्चारपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया ॥ ३३-३४३ ॥ ३५ तत्पश्चात् वे विहारके लिये सुखप्रद तथा अत्यन्त निर्जन स्थानमें भगवती स्वाहाके साथ दिव्य एक सौ वर्षोंतक रमण करते रहे और अग्निके तेजसे ३६ उन्होंने गर्भधारण कर लिया । देवी स्वाहा उस गर्भको दिव्य बारह वर्षोंतक धारण किये रहीं । तत्पश्चात् उन भगवती स्वाहाने क्रमसे दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि तथा ३७ आहवनीयाग्नि - इन सुन्दर तथा मनोहर पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ३५–३७३ ॥
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५५८ ऋषयो मुनयश्चैव ब्राह्मणाः क्षत्रियादयः स्वाहान्तं मन्त्रमुच्चार्य हविर्दानं च चक्रिरे स्वाहायुक्तं च मन्त्रं च यो गृह्णाति प्रशस्तकम् सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य मन्त्रग्रहणमात्रतः विषहीनो यथा सर्पों वेदहीनो यथा द्विजः पतिसेवाविहीना स्त्री विद्याहीनो यथा पुमान् फलशाखाविहीनश्च यथा वृक्षो हि निन्दितः स्वाहाहीनस्तथा मन्त्रो न हुतः फलदायकः परितुष्टा द्विजाः सर्वे देवा: सम्प्रापुराहुतीः स्वाहान्तेनैव मन्त्रेण सफलं सर्वमेव च श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४३ ॥ ३८ तभीसे ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मन्त्रके अन्तमें स्वाहा शब्द जोड़कर मन्त्रोच्चारण करके । अग्निमें हवन करने लगे । जो मनुष्य स्वाहायुक्त ॥ ३ ९ प्रशस्त मन्त्रका उच्चारण करता है; मन्त्रके उच्चारणमात्रसे उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ ३८-३९ ३ ॥ । जिस प्रकार विषरहित सर्प, वेदविहीन ब्राह्मण, ॥ ४० । पतिसेवाविहीन स्त्री, विद्यासे शून्य मनुष्य और फल तथा शाखासे रहित वृक्ष निन्दनीय होता है, उसी । प्रकार स्वाहारहित मन्त्र निन्द्य होता है; ऐसे मन्त्रसे ॥ ४ ९ किया गया हवन फलप्रद नहीं होता ॥ ४० -४११३ - ॥ तब समस्त ब्राह्मण सन्तुष्ट हो गये और । देवताओंको आहुतियाँ मिलने लगीं । अन्तमें स्वाहायुक्त ॥ ४२ मन्त्रसे सब कुछ सफल हो जाता है । [ हे मुने! ] इस प्रकार मैंने भगवती स्वाहासे सम्बन्धित सम्पूर्ण उत्तम । आख्यानका वर्णन कर दिया । यह आख्यान सुखदायक, इत्येवं कथितं सर्वं स्वाहोपाख्यानमुत्तमम् ॥ ४३ सारभूत तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है । अब आप सुखदं मोक्षदं सारं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि नारद उवाच स्वाहापूजाविधानं च ध्यानं स्तोत्रं मुनीश्वर सम्पूज्य वह्निस्तुष्टाव येन तद्वद मे प्रभो । श्रीनारायण उवाच ध्यानं च सामवेदोक्तं स्तोत्रपूजाविधानकम् वदामि श्रूयतां ब्रह्मन् सावधानो मुनीश्वर । सर्वयज्ञारम्भकाले शालग्रामे घटेऽथवा
स्वाहां सम्पूज्य यत्नेन यज्ञं कुर्यात्फलाप्तये ।
स्वाहां मन्त्राङ्गयुक्तां च मन्त्रसिद्धिस्वरूपिणीम् ॥
सिद्धां च सिद्धिदां नृणां कर्मणां फलदां शुभाम् । इति ध्यात्वा च मूलेन दत्त्वा पाद्यादिकं नरः
सर्वसिद्धिं लभेत्स्तुत्वा मूलमन्त्रं मुने शृणु ।
ॐ ह्रीं श्रीं वह्निजायायै देव्यै स्वाहेत्यनेन च ॥
यः पूजयेच्च तां भक्त्या सर्वेष्टं सम्भवेद् ध्रुवम् ।
और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ४२-४३३ ॥
। नारदजी बोले – हे मुनीश्वर! हे प्रभो! अग्निने जिस पूजा - विधान, ध्यान तथा स्तोत्रद्वारा स्वाहाको ॥ ४४ प्रसन्न किया था, उसे आप मुझे बताइये ॥ ४४३ ॥
श्रीनारायण बोले – हे ब्रह्मन्! हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं भगवतीके सामवेदोक्त ध्यान, स्तोत्र तथा पूजा- - विधानको बता रहा हूँ, आप सावधान होकर सुनिये ॥ ४५३ ॥
॥ ४५ फलप्राप्तिके निमित्त सम्पूर्ण यज्ञोंके आरम्भिक कालमें शालग्राम अथवा कलशपर यत्नपूर्वक भगवती स्वाहाका विधिवत् पूजन करके यज्ञ करना ॥ ४६ चाहिये ॥ ४६३ ॥
भगवती स्वाहा वेदांगमय मन्त्रोंसे सम्पन्न, मन्त्रसिद्धिस्वरूपा, सिद्धस्वरूपिणी, मनुष्योंको सिद्धि तथा ४७ उनके कर्मोंके फल प्रदान करनेवाली तथा कल्याणमयी हैं — इस प्रकार ध्यान करके मूलमन्त्रसे पाद्य आदि अर्पण करके भगवतीका स्तवन करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धि ॥ ४८ प्राप्त कर लेता है । हे मुने! अब मूलमन्त्र सुनिये -' ॐ ह्रीं श्रीं वह्निजायायै देव्यै स्वाहा ' - इस मन्त्रसे जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक उन भगवती स्वाहाकी पूजा ४ ९ करता है, उसका समस्त अभीष्ट निश्चितरूपसे पूर्ण हो जाता है ॥ ४७- -४ ९ ३ ॥
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अ ० ४४ ] नवम स्कन्ध ५५ ९ वह्निरुवाच स्वाहा वह्निप्रिया वह्निजाया सन्तोषकारिणी ॥
शक्तिः क्रिया कालदात्री परिपाककरी ध्रुवा ।
गतिः सदा नराणां च दाहिका दहनक्षमा ॥
संसारसाररूपा च घोरसंसारतारिणी ।
देवजीवनरूपा च देवपोषणकारिणी ॥
षोडशैतानि नामानि यः पठेद्भक्तिसंयुतः ।
सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य इह लोके परत्र च ॥
नाङ्गहीनं भवेत्तस्य सर्वं कर्म सुशोभनम् ।
अपुत्रो लभते पुत्रं भार्याहीनो लभेत्प्रियाम् ॥
रम्भोपमां स्वकान्तां च सम्प्राप्य सुखमाप्नुयात् ॥
वह्नि बोले- स्वाहा, वह्निप्रिया, वह्निजाया, ५० | सन्तोषकारिणी, शक्ति, क्रिया, कालदात्री, परिपाककरी, ध्रुवा, मनुष्योंकी गति, दाहिका, दहनक्षमा, संसारसाररूपा, ५१ घोरसंसारतारिणी, देवजीवनरूपा और देवपोषणकारिणी— ये सोलह नाम भगवती स्वाहाके हैं । जो मनुष्य इनका ५२ भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह इस लोक तथा परलोकमें सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है । उसका कोई कर्म अपूर्ण नहीं रहता, समस्त कर्म उत्तम ५३ फलदायी होते हैं, पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् हो जाता है तथा भार्याहीन व्यक्ति पत्नीको प्राप्त कर लेता है ५४ और रम्भातुल्य अपनी उस भार्याको प्राप्त करके वह ५५ | सुख भोगता है ॥ ५०–५५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे स्वाहोपाख्यानवर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः भगवती श्रीनारायण उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि स्वधोपाख्यानमुत्तमम् ।
पितॄणां च तृप्तिकरं श्राद्धान्नफलवर्धनम् ॥
सृष्टेरादौ पितृगणान्ससर्ज जगतां विधिः ।
चतुरश्च मूर्तिमतस्त्रींश्च तेजः स्वरूपिणः ॥
दृष्ट्वा सप्तपितृगणान् सुखरूपान्मनोहरान् ।
आहारं ससृजे तेषां श्राद्धं तर्पणपूर्वकम् ॥
स्नानं तर्पणपर्यन्तं श्राद्धं तु देवपूजनम् ।
आह्निकं च त्रिसन्ध्यान्तं विप्राणां च श्रुतौ श्रुतम् ॥
नित्यं न कुर्याद्यो विप्रस्त्रिसन्ध्यं श्राद्धतर्पणम् । बलिं वेदध्वनिं सोऽपि विषहीनो यथोरगः देवीसेवाविहीनश्च श्रीहरेरनिवेद्यभुक् । भस्मान्तं सूतकं तस्य न कर्मार्हश्च नारद स्वधाका उपाख्यान श्रीनारायण बोले- हे नारद! सुनिये, अब मैं स्वधाका उत्तम आख्यान कहूँगा, जो पितरोंके लिये तृप्ति-१ कारक तथा श्राद्धान्नके फलकी वृद्धि करनेवाला है ॥ १ ॥
जगत्का विधान करनेवाले ब्रह्माने सृष्टिके आरम्भमें चार मूर्तिमान् तथा तीन तेज: स्वरूप पितरोंका २ सृजन किया । उन सातों सुखस्वरूप तथा मनोहर पितरोंको देखकर उन्होंने श्राद्ध - तर्पणपूर्वक उनका आहार भी सृजित किया ॥ २-३ ॥ स्नान, तर्पण, श्राद्ध, देवपूजन तथा त्रिकाल ३ सन्ध्या - ये ब्राह्मणोंके आह्निक कर्म श्रुतिमें प्रसिद्ध हैं ॥४ ॥
जो ब्राह्मण प्रतिदिन त्रिकाल सन्ध्या, श्राद्ध, ४ तर्पण, बलिवैश्वदेव और वेदध्वनि नहीं करता, वह विषहीन सर्पके समान है ॥ ५ ॥
हे नारद! जो व्यक्ति भगवतीकी सेवासे वंचित ॥ ५ है तथा भगवान् श्रीहरिको बिना नैवेद्य अर्पण किये ही भोजन ग्रहण करता है, उसका अशौच केवल दाहपर्यन्त बना रहता है और वह कोई भी शुभ कृत्य ॥ करनेके योग्य नहीं रह जाता ॥ ६ ॥
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५६० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४४
ब्रह्मा श्राद्धादिकं सृष्ट्वा जगाम पितृहेतवे ।
न प्राप्नुवन्ति पितरो ददति ब्राह्मणादयः ॥
सर्वे च जग्मुः क्षुधिताः खिन्नास्तु ब्रह्मणः सभाम् ।
सर्वं निवेदनं चक्रुस्तमेव जगतां विधिम् ॥
ब्रह्मा च मानसीं कन्यां ससृजे च मनोहराम् ।
रूपयौवनसम्पन्नां शतचन्द्रनिभाननाम् ॥
विद्यावतीं गुणवतीमतिरूपवतीं सतीम् ।
श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् ॥
विशुद्धां प्रकृतेरंशां सस्मितां वरदां शुभाम् ।
स्वधाभिधां च सुदतीं लक्ष्मीलक्षणसंयुताम् ॥
शतपद्मपदन्यस्तपादपद्मं च बिभ्रतीम् ।
पत्नीं पितॄणां पद्मास्यां पद्मजां पद्मलोचनाम् ॥
पितृभ्यश्च ददौ ब्रह्मा तुष्टेभ्यस्तुष्टिरूपिणीम् ।
ब्राह्मणानां चोपदेशं चकार गोपनीयकम् ॥
स्वधान्तं मन्त्रमुच्चार्य पितृभ्यो देयमित्यपि ।
क्रमेण तेन विप्राश्च पित्रे दानं ददुः पुरा ॥
स्वाहा शस्ता देवदाने पितृदाने स्वधा स्मृता ।
सर्वत्र दक्षिणा शस्ता हतं यज्ञमदक्षिणम् ॥
पितरो देवता विप्रा मुनयो मनवस्तथा ।
पूजां चक्रुः स्वधां शान्तां तुष्टुवुः परमादरात् ॥
देवादयश्च सन्तुष्टाः परिपूर्णमनोरथाः ।
विप्रादयश्च पितरः स्वधादेवीवरेण च ॥
इस प्रकार ब्रह्माजी पितरोंके लिये श्राद्ध आदिका ७ विधान करके चले गये, किंतु ब्राह्मण आदि जो श्राद्धीय पदार्थ अर्पण करते थे, उन्हें पितरगण प्राप्त नहीं कर पाते थे ॥ ७ ॥
अतः क्षुधासे व्याकुल तथा उदास मनवाले सभी ८ पितर ब्रह्माजीकी सभामें गये और उन्होंने जगत्का विधान करनेवाले उन ब्रह्माको सारी बात बतायी ॥ ८ ॥
तब ब्रह्माजीने एक मनोहर मानसी कन्याका ९ सृजन किया । वह रूप तथा यौवनसे सम्पन्न थी और उसका मुख सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमान् था । वह साध्वी विद्या, गुण तथा परम रूपसे सम्पन्न थी । उसका वर्ण श्वेत चम्पाके समान उज्ज्वल था १० और वह रत्नमय आभूषणोंसे सुशोभित थी । विशुद्ध, मूलप्रकृतिकी अंशरूपा, वरदायिनी तथा कल्याणमयी वह मन्द - मन्द मुसकानसे युक्त थी । लक्ष्मी के लक्षणोंसे ११ । युक्त स्वधा नामक वह देवी सुन्दर दाँतोंवाली थी । शतदलकमलके ऊपर रखे चरणकमलवाली वह देवी अतिशय सुशोभित हो रही थी । पितरोंकी पत्नीस्वरूपा उस कमलोद्भवा स्वधादेवीके मुख तथा नेत्र कमलके १२ समान थे । ब्रह्माजीने उस तुष्टिरूपिणी देवीको सन्तुष्ट पितरोंको समर्पित कर दिया । उसी समय ब्रह्माजीने ब्राह्मणों को यह गोपनीय उपदेश भी प्रदान किया कि १३ आपलोगोंको अन्तमें स्वधायुक्त मन्त्रका उच्चारण करके ही पितरोंको कव्य पदार्थ अर्पण करना चाहिये । तभीसे ब्राह्मणलोग उसी क्रमसे पितरोंको कव्य प्रदान करने लगे ॥ ९ – १४ ॥ १४ -देवताओंके लिये हव्य प्रदान करते समय स्वाहा और पितरोंको कव्य प्रदान करते समय स्वधाका उच्चारण श्रेष्ठ माना गया है । दक्षिणा सर्वत्र प्रशस्त १५ मानी गयी है; क्योंकि दक्षिणाविहीन यज्ञ विनष्ट हो जाता है ॥१५ ॥
उस समय पितरों, देवताओं, ब्राह्मणों, मुनियों तथा मनुगणोंने परम आदरपूर्वक शान्तिस्वरूपिणी १६ भगवती स्वधाकी पूजा तथा स्तुति की ॥ १६ ॥
भगवती स्वधाके वरदानसे पितरगण, देवता तथा विप्र आदि परम सन्तुष्ट तथा पूर्ण मनोरथवाले हो १७ | गये ॥ १७ ॥
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अ ० ४४ ] इत्येवं कथितं सर्वं स्वधोपाख्यानमेव च सर्वेषां च तुष्टिकरं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि नारद उवाच स्वधापूजाविधानं च ध्यानं स्तोत्रं महामुने । श्रोतुमिच्छामि यनेन वद वेदविदांवर श्रीनारायण उवाच ध्यानं च स्तवनं ब्रह्मन् वेदोक्तं सर्वमङ्गलम् । सर्वं जानासि च कथं ज्ञातुमिच्छसि वृद्धये शरत्कृष्णत्रयोदश्यां मघायां श्राद्धवासरे स्वधां सम्पूज्य यत्नेन ततः श्राद्धं समाचरेत् स्वधां नाभ्यर्च्य यो विप्रः श्राद्धं कुर्यादहंमतिः न भवेत्फलभाक्सत्यं श्राद्धस्य तर्पणस्य च ब्रह्मणो मानसीं कन्यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् । पूज्यां वै पितृदेवानां श्राद्धानां फलदां भजे इति ध्यात्वा शिलायां वा ह्यथवा मङ्गले घटे दद्यात्पाद्यादिकं तस्यै मूलेनेति श्रुतौ श्रुतम् ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहेति च महामुने समुच्चार्य तु सम्पूज्य स्तुत्वा तां प्रणमेद् द्विजः स्तोत्रं शृणु मुनिश्रेष्ठ ब्रह्मपुत्र विशारद सर्ववाञ्छाप्रदं नृणां ब्रह्मणा यत्कृतं पुरा श्रीनारायण उवाच स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नरः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत् नवम स्कन्ध ५६१ । हे नारद! इस प्रकार मैंने सभी प्राणियोंको ॥ १८ तुष्टि प्रदान करनेवाला यह सम्पूर्ण स्वधाका उपाख्यान आपसे कह दिया; अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १८ ॥
नारदजी बोले - वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हे महामुने! मैं भगवती स्वधाकी पूजाका विधान, उनका ध्यान ॥ १ ९ तथा स्तोत्र सुनना चाहता हूँ; यत्नपूर्वक बतलाइये ॥ १ ९ ॥ श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मन्! आप समस्त प्राणियोंका मंगल करनेवाला भगवती स्वधाका वेदोक्त ध्यान तथा स्तवन आदि सब कुछ जानते ही हैं तो फिर उसे क्यों जानना चाहते हैं? तो भी लोगोंके कल्याणार्थ ॥ २० मैं उसे आपको बता रहा हूँ - शरत्कालमें आश्विनमासके कृष्णपक्ष त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रमें अथवा । श्राद्धके दिन यत्नपूर्वक देवी स्वधाकी विधिवत् पूजा ॥ २१ करके श्राद्ध करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥ अहंकारयुक्त बुद्धिवाला जो विप्र भगवती स्वधाका पूजन किये बिना ही श्राद्ध करता है, वह श्राद्ध तथा
।
तर्पणका फल प्राप्त नहीं करता, यह सत्य है ॥ २२ ॥
॥ २२ मैं सर्वदा स्थिर यौवनवाली, पितरों तथा देवताओंकी पूज्या और श्राद्धका फल प्रदान करनेवाली ब्रह्माकी मानसी कन्या भगवती स्वधाकी आराधना करता हूँ-॥ २३ इस प्रकार ध्यान करके शिला अथवा मंगलमय कलशपर उनका आवाहनकर मूलमन्त्रसे उन्हें पाद्य । आदि उपचार अर्पण करने चाहिये - ऐसा श्रुतिमें प्रसिद्ध है ॥ २३-२४ ॥ ॥ २४ हे महामुने! द्विजको चाहिये कि ' ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा ' इस मन्त्रका उच्चारण करके । उनकी विधिवत् पूजा तथा स्तुति करके उन्हें प्रणाम ॥ २५ करे ॥ २५ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! हे ब्रह्मपुत्र! हे विशारद! अब । आप सभी मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाले ॥२६ उस स्तोत्रको सुनिये, जिसका पूर्वकालमें ब्रह्माजीने पाठ किया था ॥ २६ ॥
श्रीनारायण बोले- ' स्वधा ' शब्दका उच्चारण करने मात्र मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है । वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा वाजपेययज्ञका फल ॥ २७ प्राप्त कर लेता है ॥ २७ ॥