देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 551–560

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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५४२ तथैव कर्मसूत्रेण फलं धाता ददाति च । यस्याज्ञया सृष्टमिदं तं च नारायणं भज

स विधाता विधातुश्च पातुः पाता जगत्त्रये ।

स्रष्टुः स्रष्टा च संहर्तुः संहर्ता कालकालकः ॥

महाविपत्तौ संसारे यः स्मरेन्मधुसूदनम् ।

विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शङ्करः ॥

इत्येवमुक्त्वा तत्त्वज्ञः समालिङ्ग्य सुरेश्वरम् ।

दत्त्वा शुभाशिषं चेष्टं बोधयामास नारद ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४१ [ अतः हे देवराज! ] जिनकी आज्ञासे इस ॥ ८ ९ जगत्की सृष्टि हुई है, उन भगवान् नारायणकी आप आराधना कीजिये । वे भगवान् नारायण त्रिलोकीमें विधाताके भी विधाता, पालन करनेवालेके भी पालक, सृष्टि करनेवाले भी स्रष्टा, संहार करनेवालेके भी ९ ० संहारक और कालके भी काल हैं ॥ ८ ९ - ९ ० ॥ जो मनुष्य इस संसारमें घोर विपत्तिके समयमें भगवान् मधुसूदनका स्मरण करता है, उसके लिये ९ १ उस विपत्तिमें भी सम्पत्ति उत्पन्न हो जाती है - ऐसा भगवान् शंकरने कहा है ॥ ९ १ ॥ हे नारद! ऐसा कहकर तत्त्वज्ञानी बृहस्पतिने देवराज इन्द्रको हृदयसे लगाकर और शुभाशीर्वाद ९ २ । देकर उन्हें अभीष्ट बात समझा दी॥९ २ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे लक्ष्म्युत्पत्तिवर्णनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः ब्रह्माजीका इन्द्र तथा देवताओंको साथ लेकर श्रीहरिके पास जाना, श्रीहरिका उनसे लक्ष्मीके रुष्ट होनेके कारणोंको बताना, समुद्रमन्थन तथा उससे श्रीनारायण उवाच

हरिं ध्यात्वा हरिर्ब्रह्मन् जगाम ब्रह्मणः सभाम् ।

बृहस्पतिं पुरस्कृत्य सर्वैः सुरगणैः सह ॥

शीघ्रं गत्वा ब्रह्मलोकं दृष्ट्वा च कमलोद्भवम् ।

प्रणेमुर्देवताः सर्वाः सहेन्द्रा गुरुणा सह ॥

वृत्तान्तं कथयामास सुराचार्यो विधिं प्रति ।

प्रहस्योवाच तच्छ्रुत्वा महेन्द्रं कमलासनः ॥

ब्रह्मोवाच

वत्स मद्वंशजातोऽसि प्रपौत्रो मे विचक्षणः ।

बृहस्पतेश्च शिष्यस्त्वं सुराणामधिपः स्वयम् ॥

मातामहश्च दक्षस्ते विष्णुभक्तः प्रतापवान् ।

कुलत्रयं यस्य शुद्धं कथं सोऽहङ्कृतो भवेत् ॥

माता पतिव्रता यस्य पिता शुद्धो जितेन्द्रियः ।

मातामहो मातुलश्च कथं सोऽहङ्कृतो भवेत् ॥

लक्ष्मीजीका प्रादुर्भाव श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मन्! भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके देवराज इन्द्र बृहस्पतिको आगे करके १ सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माकी सभा में गये ॥ १ ॥

इन्द्रसमेत सभी देवताओंने गुरु बृहस्पति के साथ शीघ्र ही ब्रह्मलोक जाकर पद्मयोनि ब्रह्माजीका दर्शन २ करके उन्हें प्रणाम किया ॥ २ ॥

तत्पश्चात् देवगुरु बृहस्पतिने ब्रह्माजीसे सारा ३ वृत्तान्त कहा । उसे सुनकर ब्रह्माजी हँस करके देवराज इन्द्रसे कहने लगे ॥ ३ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे वत्स! तुम मेरे वंशमें उत्पन्न ४ हुए हो और मेरे बुद्धिमान् प्रपौत्र हो, इसके अतिरिक्त बृहस्पतिके शिष्य हो और स्वयं देवताओंके स्वामी हो । परम प्रतापी तथा विष्णुभक्त दक्षप्रजापति तुम्हारे ५ नाना हैं । जिसके तीनों कुल पवित्र हों, वह पुरुष अहंकारी कैसे हो सकता है? जिसकी माता पतिव्रता, ६ पिता शुद्धस्वरूप और नाना तथा मामा जितेन्द्रिय हों,

पृष्ठ 552

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अ ० ४१ ]

जनः पैतृकदोषेण दोषान्मातामहस्य च ।

गुरुदोषात्त्रिभिर्दोषैर्हरिदोषी भवेद् ध्रुवम् ॥

सर्वान्तरात्मा भगवान् सर्वदेहेष्ववस्थितः ।

यस्य देहात्स प्रयाति स शवस्तत्क्षणं भवेत् ॥

मनोऽहमिन्द्रियेशं च ज्ञानरूपो हि शङ्करः ।

विष्णुप्राणा च प्रकृतिर्बुद्धिर्भगवती सती ॥

निद्रादयः शक्तयश्च ताः सर्वाः प्रकृतेः कलाः ।

आत्मनः प्रतिबिम्बश्च जीवो भोगशरीरभृत् ॥

आत्मनीशे गते देहात्सर्वे यान्ति ससम्भ्रमाः ।

यथा वर्त्मनि गच्छन्तं नरदेवमिवानुगाः ॥

अहं शिवश्च शेषश्च विष्णुर्धर्मो महाविराट् ।

यूयं यदंशा भक्ताश्च तत्पुष्पं न्यक्कृतं त्वया ॥

शिवेन पूजितं पादपद्मं पुष्पेण येन च ।

तत्र दुर्वाससा दत्तं दैवेन न्यक्कृतं त्वया ॥

तत्पुष्पं मस्तके यस्य कृष्णपादाब्जप्रच्युतम् ।

सर्वेषां च सुराणां च तत्पूजापुरतो भवेत् ॥

दैवेन वञ्चितस्त्वं हि दैवं च बलवत्तरम् ।

भाग्यहीनं जनं मूढं को वा रक्षितुमीश्वरः ॥

सा श्रीर्गताधुना कोपात्कृष्णनिर्माल्यवर्जनात् ।

अधुना गच्छ वैकुण्ठं मया च गुरुणा सह ॥

निषेव्य तत्र श्रीनाथं श्रियं प्राप्स्यति मद्वरात् । नवम स्कन्ध ५४३ वह अहंकारयुक्त कैसे हो सकता है? पिताके दोष, ७ नानाके दोष और गुरुके दोष – इन्हीं तीन दोषोंसे ही मनुष्य भगवान् श्रीहरिका द्रोही हो जाता है ॥ ४–७ ॥ सभीकी अन्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सभी प्राणियों के शरीरमें विराजमान रहते हैं । वे भगवान् जिसके ८ शरीरसे निकल जाते हैं, वह प्राणी उसी क्षण शव हो जाता है ॥ ८ ॥

मैं प्राणियों शरीरमें इन्द्रियोंका स्वामी मन बनकर रहता हूँ, शंकर ज्ञानका रूप धारण करके रहते हैं और ९ विष्णुकी प्राणस्वरूपा भगवती श्रीराधा मूलप्रकृतिके रूपमें और साध्वी भगवती दुर्गा बुद्धिरूपमें विराजमान हैं । निद्रा आदि सभी शक्तियाँ भगवती प्रकृतिकी कलाएँ हैं । आत्माका प्रतिबिम्ब भोगशरीर धारण करके जीवरूपमें १० प्रतिष्ठित है | शरीरके स्वामीरूप आत्माके देहसे निकल जानेपर ये सब उसीके साथ तुरंत उसी प्रकार चले जाते हैं, जैसे मार्गमें चलते हुए राजाके पीछे - पीछे उसके अनुचर आदि चलते हैं ॥ ९ –११ ॥ ११ मैं, शिव, शेषनाग, विष्णु, धर्म, महाविराट् तथा तुम सब लोग जिनके अंश तथा भक्त हैं; उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके पवित्र पुष्पका तुमने अपमान कर दिया है ॥ १२ ॥

१२ शंकरजीने जिस पुष्पसे भगवान् श्रीहरिके चरणकमलकी पूजा की थी, वही पुष्प मुनि दुर्वासाके द्वारा तुम्हें प्रदान किया गया था; किंतु तुमने दैववश १३ उसका तिरस्कार कर दिया ॥१३ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलसे च्युत वह पुष्प जिसके मस्तकपर स्थान पाता है, उसकी पूजा सभी देवताओंमें सबसे पहले होती है ॥ १४ ॥

१४ तुम तो दैवके द्वारा ठग लिये गये हो । प्रारब्ध सबसे अधिक बलशाली होता है । भाग्यहीन तथा मूर्ख व्यक्तिकी रक्षा करनेमें कौन समर्थ है? ॥ १५ ॥

भगवान् श्रीकृष्णको अर्पित किये जानेवाले १५ पुष्पका तुम्हारे द्वारा त्याग किये जानेके कारण वे भगवती श्रीदेवी कोप करके इस समय तुम्हारे पाससे चली गयी हैं । अतः तुम इसी समय मेरे तथा गुरु बृहस्पतिके साथ वैकुण्ठ चलो । मेरे वरके प्रभावसे १६ वहाँपर लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरिकी सेवा करके तुम लक्ष्मीको पुनः प्राप्त कर लोगे ॥ १६३ ॥

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५४४ एवमुक्त्वा च स ब्रह्मा सर्वैः सुरगणैः सह तत्र गत्वा परब्रह्म भगवन्तं सनातनम् । दृष्ट्वा तेजः स्वरूपं तं प्रज्वलन्तं स्वतेजसा ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डशतकोटिसमप्रभम् 1 शान्तमनादिमध्यान्तं लक्ष्मीकान्तमनन्तकम्

चतुर्भुजैः पार्षदैश्च सरस्वत्या युतं प्रभुम् ।

भक्त्या चतुर्भिर्वेदैश्च गङ्गया परिवेष्टितम् ॥

तं प्रणेमुः सुराः सर्वे मूर्ध्ना ब्रह्मपुरोगमाः ।

भक्तिनम्राः साश्रुनेत्रास्तुष्टुवुः परमेश्वरम् ॥

वृत्तान्तं कथयामास स्वयं ब्रह्मा कृताञ्जलिः ।

रुरुदुर्देवताः सर्वाः स्वाधिकाराच्च्युताश्च ताः ॥

स ददर्श सुरगणं विपद्ग्रस्तं भयाकुलम् ।

रत्नभूषणशून्यं च वाहनादिविवर्जितम् ॥

शोभाशून्यं हतश्रीकं निष्प्रभं सभयं परम् ।

उवाच कातरं दृष्ट्वा भयभीतिविभञ्जनः ॥

श्रीभगवानुवाच

मा भैर्ब्रह्मन् हे सुराश्च भयं किं वो मयि स्थिते ।

दास्यामि लक्ष्मीमचलां परमैश्वर्यवर्धिनीम् ॥

किञ्च मद्वचनं किञ्चिच्छ्रयतां समयोचितम् ।

हितं सत्यं सारभूतं परिणामसुखावहम् ॥

जनाश्चासंख्यविश्वस्था मदधीनाश्च सन्ततम् ।

यथा तथाहं मद्भक्तपराधीनो ऽस्वतन्त्रकः ॥

यं यं रुष्टो हि मद्भक्तो मत्परो हि निरङ्कुशः ।

तद्गृहेऽहं न तिष्ठामि पद्मया सह निश्चितम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४१ ॥ १७ [ हे नारद! ] ऐसा कहकर ब्रह्माजीने सभी देवताओंके साथ वैकुण्ठलोक पहुँचकर परब्रह्म सनातन भगवान् श्रीहरिको देखा । वे तेजस्वरूप ॥ १८ प्रभु अपने ही तेजसे देदीप्यमान हो रहे थे, वे ग्रीष्म ऋतुके मध्याह्नकालीन सौ करोड़ सूर्योकी प्रभासे युक्त थे, आदि - अन्त - मध्यसे रहित अनन्तरूप लक्ष्मीकान्त ॥ १ ९ भगवान् श्रीहरि शान्तभावसे विराजमान थे, वे प्रभु चार भुजाओंवाले पार्षदों तथा भगवती सरस्वतीके साथ सुशोभित हो रहे थे और चारों वेदोंसहित २० देवी गंगा भक्तिभावसे युक्त होकर उनके पास विराजमान थीं । उन प्रभुको देखकर ब्रह्माके अनुगामी सभी देवताओंने सिर झुकाकर उन्हें २१ प्रणाम किया । भक्ति तथा विनयसे युक्त होकर देवताओंने नेत्रोंमें आँसू भरकर उन परमेश्वरकी स्तुति की ॥ १७–२१ ॥ २२ तत्पश्चात् स्वयं ब्रह्माजीने हाथ जोड़कर भगवान् श्रीहरिसे सारा वृत्तान्त कहा । अपने अधिकारसे वंचित सभी देवता उस समय रो रहे थे ॥ २२ ॥

२३ उन भगवान् श्रीहरिने देखा कि सभी देवगण विपत्तिसे ग्रस्त, भयसे व्याकुल, रत्न तथा आभूषणसे विहीन, वाहन आदिसे रहित, शोभाशून्य, श्रीहीन, २४ निस्तेज तथा अत्यन्त भयग्रस्त हैं । उन्हें इस प्रकार कष्टसे व्याकुल देखकर संसारका भय दूर करनेवाले प्रभु कहने लगे ॥ २३-२४ ॥ श्रीभगवान् बोले - हे ब्रह्मन्! हे देवगण! आप लोग मत डरिये । मेरे रहते आपलोगों को किस २५ बातका भय है । मैं आपलोगोंको परम ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाली स्थिर लक्ष्मी प्रदान करूँगा । किंतु मेरी कुछ समयोचित बात सुनिये; जो हितकर, सत्य, सारभूत २६ तथा परिणाममें सुखकारी है ॥२५-२६ ॥ जैसे अनन्त ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले सभी प्राणी निरन्तर मेरे अधीन रहते हैं, वैसे ही मैं भी अपने २७ भक्तोंके अधीन रहता हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ । मेरे प्रति समर्पित मेरा निरंकुश भक्त जिस - जिसके ऊपर रुष्ट होता है, उसके घर मैं लक्ष्मीके साथ कभी नहीं २८ । ठहरता – यह निश्चित है ॥ २७-२८ ॥

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अ ० ४१ ]

दुर्वासाः शङ्करांशश्च वैष्णवो मत्परायणः ।

तच्छापादागतोऽहं च सलक्ष्मीको हि वो गृहात् ॥

यत्र शङ्खध्वनिर्नास्ति तुलसी न शिवार्चनम् ।

न भोजनं च विप्राणां न पद्मा तत्र तिष्ठति ॥

मद्भक्तानां च मे निन्दा यत्र ब्रह्मन् भवेत्सुराः ।

महारुष्टा महालक्ष्मीस्ततो याति पराभवम् ॥

मद्भक्तिहीनो यो मूढो भुङ्गे यो हरिवासरे ।

मम जन्मदिने वापि याति श्रीस्तद्गृहादपि ॥

मन्नामविक्रयी यश्च विक्रीणाति स्वकन्यकाम् ।

यत्रातिथिर्न भुङ्क्ते च मत्प्रिया याति तद्गृहात् ॥

यो विप्रः पुंश्चलीपुत्रो महापापी च तत्पतिः ।

पापिनो यो गृहं याति शूद्रश्राद्धान्नभोजकः ॥

महारुष्टा ततो याति मन्दिरात्कमलालया ।

शूद्राणां शवदाही च भाग्यहीनो द्विजाधमः ॥

याति रुष्टा तद्गृहाच्च देवाः कमलवासिनी ।

शूद्राणां सूपकारी यो ब्राह्मणो वृषवाहकः ॥

तत्तोयपानभीता च कमला याति तद्गृहात् ।

अशुद्धहृदयः क्रूरो हिंसको निन्दको द्विजः ॥

ब्राह्मणः शूद्रयाजी च याति देवी च तद्गृहात् ।

अवीरान्नं च यो भुङ्क्ते तस्माद्याति जगत्प्रसूः ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –18 A नवम स्कन्ध ५४५ भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न ऋषि दुर्वासा २ ९ महान् वैष्णव हैं तथा मेरे प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं । उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है, अतः मैं आपलोगोंके घरसे लक्ष्मीसहित चला आया हूँ ॥ २ ९ ॥ जहाँ शंखध्वनि नहीं होती, तुलसी नहीं रहतीं, ३० शिवकी पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणोंको भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहतीं ॥ ३० ॥

हे ब्रह्मन्! हे देवगण! जहाँ मेरी तथा मेरे भक्तोंकी निन्दा होती है, वहाँसे महालक्ष्मी अत्यन्त ३१ रुष्ट होकर चली जाती हैं और उसका पराभव हो जाता है ॥३१ ॥

जो मूर्ख मनुष्य मेरी भक्तिसे रहित है तथा एकादशी और मेरे जन्मके दिन ( जन्माष्टमी आदि ) -३२ को भोजन करता है, उसके भी घरसे लक्ष्मी चली जाती हैं ॥३२ ॥

जो व्यक्ति मेरे नामका तथा अपनी कन्याका विक्रय करता है और जिसके यहाँ अतिथि भोजन ३३ नहीं करता, उसके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ३३ ॥

जो ब्राह्मण वेश्याका पुत्र है अथवा उसका पति है, वह महापापी है । जो विप्र ऐसे पापीके घर जाता ३४है तथा शूद्रका श्राद्धान्न खाता है, उसके घरसे कमलासना महालक्ष्मी अत्यन्त रुष्ट होकर चली जाती हैं ॥ ३४३ ॥

३५ हे देवगण! जो द्विजाधम शूद्रोंका शव जलाता है, वह भाग्यहीन हो जाता है । उससे रुष्ट होकर कमलवासिनी लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं ॥ ३५३ ॥

जो ब्राह्मण शूद्रोंके यहाँ भोजन पकानेका काम ३६ करता है तथा जो बैल हाँकता है, उसका जल पीनेसे लक्ष्मी डरती हैं और उसके घरसे चली जाती हैं ॥ ३६३ ॥

जो ब्राह्मण अशुद्ध हृदयवाला, क्रूर, हिंसक, ३७ दूसरोंकी निन्दा करनेवाला तथा शूद्रोंका यज्ञ कराने-वाला होता है, उसके घरसे भगवती लक्ष्मी चली जाती हैं । जो ब्राह्मण पति -पुत्रहीन स्त्रीका अन्न खाता है, उसके घरसे भी जगज्जननी लक्ष्मी चली ३८ | जाती हैं ॥ ३७-३८ ॥

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५४६ तृणं छिनत्ति नखरैस्तैर्वा यो विलिखेन्महीम् । निराशो ब्राह्मणो यत्र तद्गृहाद्याति मत्प्रिया सूर्योदयेद्विजो भुङ्गे दिवास्वापी च ब्राह्मणः दिवा मैथुनकारी च यस्तस्माद्याति मत्प्रिया आचारहीनो विप्रो यो यश्च शूद्रप्रतिग्रही अदीक्षितो हि यो मूढस्तस्माद्वै याति मत्प्रिया स्निग्धपादश्च नग्नो हि यः शेते ज्ञानदुर्बलः शश्वद्वदति वाचालो याति सा तद्गृहात्सती शिरः स्नातस्तु तैलेन योऽन्याङ्गं समुपस्पृशेत् । स्वाङ्गं च वादयेद्वाद्यं रुष्टा सा याति तद्गृहात् व्रतोपवासहीनो यः सन्ध्याहीनो ऽशुचिर्द्विजः विष्णुभक्तिविहीनस्तु तस्माद्याति च मत्प्रिया ब्राह्मणं निन्दयेद्यो हि तं च यो द्वेष्टि सन्ततम् जीवहिंस्रो दयाहीनो याति सर्वप्रसूस्ततः यत्र यत्र हरेरर्चा हरेरुत्कीर्तनं तथा तत्र तिष्ठति सा देवी सर्वमङ्गलमङ्गला यत्र प्रशंसा कृष्णस्य तद्भक्तस्य पितामह सा च कृष्णप्रिया देवी तत्र तिष्ठति सन्ततम् ॥ यत्र शङ्खध्वनिः शङ्खः शिला च तुलसीदलम् । तत्सेवा वन्दनं ध्यानं तत्र सा परितिष्ठति श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४१ जो नखोंसे निष्प्रयोजन तृण तोड़ता है अथवा ॥ ३ ९ नखोंसे भूमिको कुरेदता रहता है तथा जिसके यहाँसे ब्राह्मण निराश होकर चला जाता है, उसके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ३ ९ ॥ । जो ब्राह्मण सूर्योदयके समय भोजन करता है, ॥ ४० दिनमें शयन करता है तथा दिनमें मैथुन करता है, उसके यहाँसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४० ॥

। जो ब्राह्मण आचारहीन, शूद्रोंसे दान ग्रहण करनेवाला, दीक्षासे विहीन तथा मूर्ख है; उसके भी ॥ ४१ घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४१ ॥

जो अल्पज्ञ भींगे पैर अथवा नग्न होकर सोता । है तथा वाचालकी भाँति निरन्तर बोलता रहता है, उसके घर से वे साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४२ ॥

॥ ४२ जो व्यक्ति अपने सिरपर तेल लगाकर उसी हाथसे दूसरेके अंगका स्पर्श करता है और अपने किसी अंगको बाजेकी तरह बजाता है, उससे रुष्ट ॥ ४३ होकर वे लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं ॥ ४३ ॥

जो ब्राह्मण व्रत - उपवास नहीं करता, सन्ध्या-। वन्दन नहीं करता, सदा अपवित्र रहता है तथा भगवान् विष्णुकी भक्तिसे रहित है, उसके यहाँसे मेरी ॥ ४४ प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं ॥ ४४ ॥

जो व्यक्ति ब्राह्मणकी निन्दा करता है और उससे । सदा द्वेषभाव रखता है, जीवोंकी हिंसा करता है तथा प्राणियोंके प्रति दयाभाव नहीं रखता है; सबकी जननी ॥ ४५ लक्ष्मी उस व्यक्तिसे दूर चली जाती हैं ॥४५ ॥

जिस - जिस जगह भगवान् विष्णुकी पूजा होती । है तथा उनका गुणगान होता है, वहाँ सम्पूर्ण मंगलों को भी मंगल प्रदान करनेवाली वे भगवती ॥ ४६ लक्ष्मी निवास करती हैं ॥ ४६ ॥

हे पितामह! जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके । भक्तोंका यशोगान किया जाता है, वहाँ उन श्रीकृष्णकी ४७ प्रिया भगवती लक्ष्मी निरन्तर निवास करती हैं ॥ ४७ ॥

जहाँ शंखध्वनि होती है और शंख, शालग्रामशिला तथा तुलसीदल - ये रहते हैं एवं उनकी सेवा, वन्दना तथा ध्यान किया जाता है; वहाँ वे लक्ष्मी सर्वदा ॥ ४८ । निवास करती हैं ॥ ४८ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] 18 B

पृष्ठ 556

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अ ० ४१ ] नवम

शिवलिङ्गार्चनं यत्र तस्य चोत्कीर्तनं शुभम् ।

दुर्गार्चनं तद्गुणाश्च तत्र पद्मनिवासिनी ॥ ४ ९

विप्राणां सेवनं यत्र तेषां च भोजनं शुभम् ।

अर्चनं सर्वदेवानां तत्र पद्ममुखी सती ॥ ५०

इत्युक्त्वा च सुरान्सर्वान् रमामाह रमापतिः ।

क्षीरोदसागरे जन्म कलयाकलयेति च ॥५१

इत्युक्त्वा तां जगन्नाथो ब्रह्माणं पुनराह च ।

मथित्वा सागरं लक्ष्मीं देवेभ्यो देहि पद्मज ॥ ५२

इत्युक्त्वा कमलाकान्तो जगामान्तः पुरं मुने ।

देवाश्चिरेण कालेन ययुः क्षीरोदसागरम् ॥ ५३

मन्थानं मन्दरं कृत्वा कूर्मं कृत्वा च भाजनम् ।

कृत्वा शेषं मन्थपाशं ममन्थुरसुराः सुराः ॥ ५४

धन्वन्तरिं च पीयूषमुच्चैःश्रवसमीप्सितम् ।

नानारत्नं हस्तिरत्नं प्रापुर्लक्ष्मीं सुदर्शनम् ॥ ५५

वनमालां ददौ सा च क्षीरोदशायिने मुने ।

सर्वेश्वराय रम्याय विष्णवे वैष्णवी सती ॥ ५६

देवैः स्तुता पूजिता च ब्रह्मणा शङ्करेण च ।

ददौ दृष्टिं सुरगृहे ब्रह्मशापविमोचनात् ॥ ५७

प्रापुर्देवाः स्वविषयं दैत्यग्रस्तं भयङ्करम् ।

महालक्ष्मीप्रसादेन वरदानेन नारद ॥ ५८

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –18 C स्कन्ध ५४७ जहाँ शिवलिंगकी पूजा तथा उनके गुणोंका शुभ कीर्तन और भगवती दुर्गाका पूजन तथा उनका गुणगान किया जाता है, वहाँ पद्मनिवासिनी देवी लक्ष्मी वास करती हैं ॥ ४ ९ ॥ जहाँ ब्राह्मणोंकी सेवा होती है, उन्हें उत्तम भोजन कराया जाता है और सभी देवताओंकी पूजा होती है, वहाँ कमलके समान मुखवाली साध्वी लक्ष्मी विराजमान रहती हैं ॥ ५० ॥

[ हे नारद! ] समस्त देवताओंसे ऐसा कहकर लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरिने लक्ष्मीजीसे कहा— क्षीरसागरके यहाँ तुम अपनी एक कलासे जन्म ग्रहण करो ॥ ५१ ॥

लक्ष्मीजीसे ऐसा कहकर जगत्प्रभु श्रीहरिने ब्रह्माजीसे पुनः कहा — हे कमलोद्भव! आप समुद्रमन्थन करके उससे प्रकट होनेवाली लक्ष्मी देवताओंको सौंप दीजिये ॥ ५२ ॥

हे मुने! ऐसा कहकर लक्ष्मीपति भगवान् श्रीहरि अन्तःपुरमें चले गये और देवताओंने भी कुछ कालके अनन्तर क्षीरसागरकी ओर प्रस्थान किया ॥ ५३ ॥

समस्त देवताओं तथा राक्षसोंने मन्दराचल-पर्वतको मथानी, कच्छपको आधार और शेषनागको मथानीकी रस्सी बनाकर समुद्रमन्थन किया । उसके परिणामस्वरूप उन्हें धन्वन्तरि, अमृत, इच्छित उच्चैःश्रवा नामक अश्व, अनेकविध रत्न, हाथियोंमें रत्नस्वरूप ऐरावत, लक्ष्मी, सुदर्शन चक्र और वनमाला आदि प्राप्त हुए । हे मुने! तब विष्णुपरायणा साध्वी लक्ष्मीने वह वनमाला क्षीरसागरमें शयन करनेवाले मनोहर सर्वेश्वर श्रीविष्णुको समर्पित कर दी ॥ ५४ - ५६ ॥ तत्पश्चात् ब्रह्मा, शिव तथा देवताओंके द्वारा पूजा तथा स्तुति किये जानेपर भगवती लक्ष्मीने देवताओंके भवनपर अपनी कृपादृष्टि डाली, फलस्वरूप वे देवगण मुनि दुर्वासाके शापसे मुक्त हो गये । हे नारद! इस प्रकार महालक्ष्मी के अनुग्रह तथा वरदानसे उन देवताओंने दैत्योंके द्वारा अधिकृत किये गये तथा भयंकर बना दिये गये अपने राज्यको पुनः प्राप्त कर | लिया ॥ ५७-५८ ॥

पृष्ठ 557

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५४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४२ इत्येवं कथितं सर्वं लक्ष्म्युपाख्यानमुत्तमम् । इस प्रकार मैंने लक्ष्मीका अत्यन्त उत्तम, सुखप्रद तथा सारभूत सम्पूर्ण उपाख्यान आपसे कह दिया, सुखदं सारभूतं च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ५ ९ अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे श्रीलक्ष्म्युपाख्यानवर्णनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः इन्द्रद्वारा भगवती लक्ष्मीका षोडशोपचार पूजन एवं स्तवन नारद उवाच

हरेरुत्कीर्तनं भद्रं श्रुतं तज्ज्ञानमुत्तमम् ।

ईप्सितं लक्ष्म्युपाख्यानं ध्यानं स्तोत्रं वद प्रभो ॥

श्रीनारायण उवाच

स्नात्वा तीर्थे पुरा शक्रो धृत्वा धौते च वाससी ।

घटं संस्थाप्य क्षीरोदे षड् देवान् पर्यपूजयत् ॥

गणेशं च दिनेशं च वह्निं विष्णुं शिवं शिवाम् ।

एतान् भक्त्या समभ्यर्च्य पुष्पगन्धादिभिस्तदा ॥

आवाह्य च महालक्ष्मीं परमैश्वर्यरूपिणीम् ।

पूजाञ्चकार देवेशो ब्रह्मणा च पुरोधसा ॥

पुरः स्थितेषु मुनिषु ब्राह्मणेषु गुरौ हरौ ।

देवादिषु सुदेशे च ज्ञानानन्दे शिवे मुने ॥

पारिजातस्य पुष्पं च गृहीत्वा चन्दनोक्षितम् ।

ध्यात्वा देवीं महालक्ष्मीं पूजयामास नारद ॥

ध्यानं च सामवेदोक्तं यद्दत्तं ब्रह्मणे पुरा ।

हरिणा तेन ध्यानेन तन्निबोध वदामि ते ॥

सहस्त्रदलपद्मस्थकर्णिकावासिनीं पराम् ।

शरत्पार्वणकोटीन्दुप्रभामुष्टिकरां पराम् ॥

नारदजी बोले - हे प्रभो! मैंने भगवान् श्रीहरिका कल्याणप्रद गुणानुवाद, उनका उत्तम ज्ञान तथा १ भगवती लक्ष्मीका अभीष्ट उपाख्यान सुना । अब उन देवीके ध्यान तथा स्तोत्रके विषयमें बताइये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] प्राचीन कालकी बात है । इन्द्रने क्षीरसमुद्रके तटपर तीर्थस्नान करके दो स्वच्छ वस्त्र धारण करनेके बाद कलशकी २ स्थापना करके श्रीगणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वती – इन छः देवताओंकी विधिवत् पूजा की । गन्ध, पुष्प आदिसे भक्तिपूर्वक इन देवोंकी ३ पूजा करके देवेश्वर इन्द्रने ब्रह्माजी तथा अपने पुरोहित गुरु बृहस्पतिके द्वारा निर्दिष्ट विधानके अनुसार परम ऐश्वर्यमयी भगवती महालक्ष्मीका आवाहन करके उनकी पूजा की । हे मुने! उस समय ४ उस पावन स्थलपर अनेक मुनि, ब्राह्मणसमुदाय, गुरु बृहस्पति, श्रीहरि, देवगण तथा ज्ञानानन्द भगवान् शिव आदि विराजमान थे ॥२-५ ॥ ५ हे नारद! इन्द्रने पारिजातका चन्दन - चर्चित पुष्प लेकर पूर्वकालमें भगवान् श्रीहरिने ब्रह्माजीको सामवेद में वर्णित जो ध्यान बतलाया था, उसी ध्यानके द्वारा भगवती महालक्ष्मीका ध्यान करके उनका ६ पूजन किया, मैं वही ध्यान तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ६-७ ॥ ' ये पराम्बा महालक्ष्मी सहस्रदलवाले कमलपर ७ स्थित कर्णिकाके ऊपर विराजमान हैं, वे श्रेष्ठ भगवती शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी कान्तिका हरण करनेवाली हैं, अपने ही तेजसे देदीप्यमान हैं, ८ | इन मनोहर देवीका दर्शन अत्यन्त सुखप्रद है, ये 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] - 18 D

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अ ० ४२ ]

स्वतेजसा प्रज्वलन्तीं सुखदृश्यां मनोहराम् ।

प्रतप्तकाञ्चननिभशोभां मूर्तिमतीं सतीम् ॥

रत्नभूषणभूषाढ्यां शोभितां पीतवाससा ।

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ॥

सर्वसम्पत्प्रदात्रीं च महालक्ष्मीं भजे शुभाम् ।

ध्यानेनानेन तां ध्यात्वा नानागुणसमन्विताम् ॥

सम्पूज्य ब्रह्मवाक्येन चोपचाराणि षोडश ।

ददौ भक्त्या विधानेन प्रत्येकं मन्त्रपूर्वकम् ॥

प्रशस्तानि प्रकृष्टानि वराणि विविधानि च ।

अमूल्यरत्नसारं च निर्मितं विश्वकर्मणा ॥

आसनं च विचित्रं च महालक्ष्मि प्रगृह्यताम् ।

शुद्धं गङ्गोदकमिदं सर्ववन्दितमीप्सितम् ॥

पापेध्मवह्निरूपं च गृह्यतां कमलालये ।

पुष्पचन्दनदूर्वादिसंयुतं जाह्नवीजलम् ॥

शङ्खगर्भस्थितं स्वयं गृह्यतां पद्मवासिनि ।

सुगन्धिपुष्पतैलं च सुगन्धामलकीफलम् ॥

देहसौन्दर्यबीजं च गृह्यतां श्रीहरेः प्रिये ।

कार्पासजं च कृमिजं वसनं देवि गृह्यताम् ॥

रत्नस्वर्णविकारं च देहभूषाविवर्धनम् ।

शोभायै श्रीकरं रत्नं भूषणं देवि गृह्यताम् ॥

सर्वसौन्दर्यबीजं च सद्यः शोभाकरं परम् ।

वृक्षनिर्यासरूपं च गन्धद्रव्यादिसंयुतम् ॥

श्रीकृष्णकान्ते धूपं च पवित्रं प्रतिगृह्यताम् ।

सुगन्धियुक्तं सुखदं चन्दनं देवि गृह्यताम् ॥

नवम स्कन्ध ५४ ९ साध्वी महालक्ष्मी मूर्तिमान् होकर तपाये हुए सुवर्णके ९ समान शोभित हो रही हैं, रत्नमय आभूषणोंसे अलंकृत तथा पीताम्बरसे सुशोभित हो रही हैं, इनके प्रसन्न मुखमण्डलपर मन्द मन्द मुसकान विराज रही है, ये सर्वदा स्थिर रहनेवाले यौवनसे सम्पन्न हैं— १० ऐसी कल्याणमयी तथा सर्वसम्पत्तिदायिनी महालक्ष्मीकी मैं उपासना करता हूँ ' ॥ ८ - १०३ ॥ हे नारद! इस प्रकार ध्यान करके इन्द्रने ११ ब्रह्माजीके कथनानुसार सोलह पूजनोपचारोंसे अनेक गुणोंवाली उन भगवती महालक्ष्मीकी पूजा की, उन्होंने १२ प्रत्येक प्रशस्त, किये ॥ १३ हे अमूल्य कीजिये हे १४ भक्तिके साथ मन्त्रपूर्वक विधानके अनुसार उपचार अर्पित किया । इन्द्रने विविध प्रकारके उत्कृष्ट तथा श्रेष्ठ उपचार इस प्रकार समर्पित ११-१२३ ॥ महालक्ष्मि! विश्वकर्माके द्वारा निर्मित रत्नसारस्वरूप इस विचित्र आसनको ग्रहण ॥ १३३ ॥

कमलालये! पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये वह्निस्वरूप, सबके द्वारा वन्दित तथा अभिलषित और परम पवित्र इस गंगाजलको [ पाद्यके रूपमें ] स्वीकार कीजिये ॥ १४३ ॥

१५ हे पद्मवासिनि! पुष्प, चन्दन, दूर्वा आदिसे युक्त इस शंखमें स्थित गंगाजलको सुन्दर अर्घ्यके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ १५३ ॥

१६ हे श्रीहरिप्रिये! सुगन्धित पुष्पोंसे सुवासित तैल तथा सुगन्धपूर्ण आमलकीचूर्ण — इन देहसौन्दर्यके बीजरूप स्नानीय उपचारोंको आप ग्रहण कीजिये । हे देवि! १७ कपास तथा रेशमसे निर्मित इस वस्त्रको आप स्वीकार कीजिये ॥ १६-१७ ॥ हे देवि! स्वर्ण तथा रत्नोंसे निर्मित, देहसौन्दर्यकी १८ वृद्धि करनेवाले, ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले, सम्पूर्ण सुन्दरताके कारणस्वरूप तथा शीघ्र ही शोभा प्रदान करनेवाले इस श्रेष्ठ रत्नमय आभूषणको अपनी शोभाके लिये आप ग्रहण कीजिये 1 । हे श्रीकृष्णकान्ते! १ ९ वृक्षसे रसके रूपमें निकले हुए तथा सुगन्धित द्रव्योंसे युक्त यह पवित्र धूप आप ग्रहण करें । हे देवि! सुगन्धसे परिपूर्ण तथा सुखप्रद इस चन्दनको आप २० | स्वीकार कीजिये ॥ १८–२० ॥

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५५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४२

जगच्चक्षुः स्वरूपं च पवित्रं तिमिरापहम् ।

प्रदीपं सुखरूपं च गृह्यतां च सुरेश्वरि ॥

नानोपहाररूपं च नानारससमन्वितम् ।

अतिस्वादुकरं चैव नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥

अन्नं ब्रह्मस्वरूपं च प्राणरक्षणकारणम् ।

तुष्टिदं पुष्टिदं चैव देव्यन्नं प्रतिगृह्यताम् ॥

शाल्यन्नजं सुपक्वं च शर्करागव्यसंयुतम् ।

स्वादुयुक्तं महालक्ष्मि परमान्नं प्रगृह्यताम् ॥

शर्करागव्यपक्वं च सुस्वादु सुमनोहरम् ।

स्वस्तिकं नाम नैवेद्यं गृहाण परमेश्वरि ॥

नानाविधानि रम्याणि पक्वान्नानि फलानि च ।

सुरभिस्तनसंत्यक्तं सुस्वादु सुमनोहरम् ॥

मर्त्यामृतं सुगव्यं च गृह्यतामच्युतप्रिये ।

सुस्वादु रससंयुक्तमिक्षुवृक्षसमुद्भवम् ॥

अग्निपक्वमतिस्वादु गुडं च प्रतिगृह्यताम् ।

यवगोधूमसस्यानां चूर्णरेणुसमुद्भवम् ॥

सुपक्वं गुडगव्याक्तं मिष्टान्नं देवि गृह्यताम् ।

सस्यचूर्णोद्भवं पक्वं स्वस्तिकादिसमन्वितम् ॥

मया निवेदितं भक्त्या नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ।

शीतवायुप्रदं चैव दाहे च सुखदं परम् ॥

कमले गृह्यतां चेदं व्यजनं श्वेतचामरम् ।

ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम् ॥

जिह्वाजाड्यच्छेदकरं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ।

सुवासितं सुशीतं च पिपासानाशकारणम् ॥

जगज्जीवनरूपं च जीवनं देवि गृह्यताम् । हे सुरेश्वरि! जगत्के लिये चक्षुस्वरूप, अन्धकार २१ दूर करनेवाले, सुखरूप तथा परम पवित्र इस दीपकको आप स्वीकार कीजिये ॥ २१ ॥

नाना प्रकारके उपहारस्वरूप अनेकविध रसोंसे २२ युक्त तथा अत्यन्त स्वादिष्ट इस नैवेद्यको आप स्वीकार कीजिये । अन्न ब्रह्मस्वरूप होता है, यह प्राणरक्षाका परम कारण है, तुष्टि तथा पुष्टि प्रदान २३ करता है, अतः हे देवि! आप इस अन्नको ग्रहण कीजिये ॥ २२-२३ ॥ हे महालक्ष्मि! शर्करा और गोघृत मिलाकर २४ अगहनी चावलसे तैयार किये गये इस स्वादिष्ट पक्वान्नको परमान्नके रूपमें आप स्वीकार करें । हे परमेश्वरि! शर्करा और घृतमें पकाया गया यह २५ स्वादिष्ट तथा अत्यन्त मनोहर स्वस्तिक नामक नैवेद्य आप ग्रहण करें ॥ २४-२५ ॥ हे अच्युतप्रिये! ये अनेक प्रकारके सुन्दर पक्वान्न २६ तथा फल और सुरभीधेनुके स्तनसे दुहे गये मृत्युलोकके लिये अमृतस्वरूप, अत्यन्त मनोहर तथा सुस्वादु दुग्धको आप स्वीकार कीजिये । ईखसे निकाले गये २७ अत्यन्त स्वादिष्ट रसको अग्निपर पकाकर निर्मित किये गये इस परम स्वादिष्ट गुड़को आप स्वीकार कीजिये । हे देवि! जौ, गेहूँ आदिके चूर्णमें गुड़ तथा २८ गायका घृत मिलाकर भलीभाँति पकाये गये इस मिष्टान्नको आप ग्रहण कीजिये । मैंने धान्यके चूर्णसे बनाये गये तथा स्वस्तिक आदिसे युक्त यह पका २ ९ हुआ नैवेद्य आपको भक्तिपूर्वक अर्पण किया है, इसे स्वीकार करें ॥ २६-२९ ३ ॥ हे कमले! शीतल वायु प्रदान करनेवाला और ३० उष्णकालमें परम सुखदायक यह पंखा तथा स्वच्छ चँवर ग्रहण कीजिये ॥ ३०३ ॥

कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थोंसे सुवासित तथा ३१ जिह्वाकी जड़ताको दूर करनेवाले इस उत्तम ताम्बूलको आप स्वीकार करें ॥ ३१ ॥

हे देवि! प्यास बुझानेवाले, अत्यन्त शीतल, ३२ सुवासित तथा जगत्के लिये जीवनस्वरूप इस जलको स्वीकार कीजिये ॥ ३२३ ॥

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अ ० ४२ ] देहसौन्दर्यबीजं च सदा शोभाविवर्धनम् ॥

कार्पासजं च कृमिजं वसनं देवि गृह्यताम् ।

रक्तस्वर्णविकारं च देहभूषादिवर्धनम् ॥

शोभाधारं श्रीकरं च भूषणं देवि गृह्यताम् ।

नानाऋतुषु निर्माणं बहुशोभाश्रयं परम् ॥

सुरभूपप्रियं शुद्धं माल्यं देवि प्रगृह्यताम् ।

शुद्धिदं शुद्धरूपं च सर्वमङ्गलमङ्गलम् ॥

गन्धवस्तूद्भवं रम्यं गन्धं देवि प्रगृह्यताम् ।

पुण्यतीर्थोदकं चैव विशुद्धं शुद्धिदं सदा ॥

गृह्यतां कृष्णकान्ते त्वं रम्यमाचमनीयकम् ।

रत्नसारादिनिर्माणं पुष्पचन्दनचर्चितम् ॥

रत्नभूषणभूषाढ्यं सुतल्पं देवि गृह्यताम् ।

यद्यद् द्रव्यमपूर्वं च पृथिव्यामपि दुर्लभम् ॥

देवभूषार्हभोग्यं च तद् द्रव्यं देवि गृह्यताम् ।

द्रव्याण्येतानि दत्त्वा च मूलेन देवपुङ्गवः ॥

मूलं जजाप भक्त्या च दशलक्षं विधानतः ।

जपेन दशलक्षेण मन्त्रसिद्धिर्बभूव ह ॥

मन्त्रश्च ब्रह्मणा दत्तः कल्पवृक्षश्च सर्वतः ।

लक्ष्मीर्माया कामवाणी ङेऽन्ता कमलवासिनी ॥

वैदिको मन्त्रराजोऽयं प्रसिद्धः स्वाहयान्वितः ।

कुबेरोऽनेन मन्त्रेण परमैश्वर्यमाप्तवान् ॥

नवम स्कन्ध ५५१ ३३ हे देवि! देहसौन्दर्यके मूल कारण तथा सदा शोभा बढ़ानेवाले इस सूती तथा रेशमी वस्त्रको आप ग्रहण करें ॥ ३३३ ॥

हे देवि! रक्तस्वर्णनिर्मित, शरीरकी शोभा आदिकी ३४ वृद्धि करनेवाला, सौन्दर्यका आधार तथा कान्तिवर्धक यह आभूषण ग्रहण कीजिये ॥ ३४३ ॥

हे देवि! विविध ऋतुओंके पुष्पोंसे गूँथी गयी, ३५ अत्यधिक शोभाके आश्रयस्वरूप तथा देवराज इन्द्रके लिये भी परम प्रिय इस श्रेष्ठ तथा पवित्र मालाको आप स्वीकार करें ॥ ३५३ ॥

हे देवि! सुगन्धित द्रव्योंसे सम्पन्न, सभी ३६ | मंगलोंका भी मंगल करनेवाले, शुद्धि प्रदान करनेवाले तथा शुद्धस्वरूप इस दिव्य चन्दनको आप ग्रहण कीजिये ॥ ३६३ ॥

३७ हे कृष्णकान्ते! यह पवित्र तीर्थजल स्वयं शुद्ध है तथा दूसरोंको भी सदा शुद्धि प्रदान करनेवाला है, इस दिव्य जलको आप आचमनके रूपमें ग्रहण कीजिये ॥ ३७३ ॥

३८ हे देवि! अमूल्य रत्नोंसे निर्मित, पुष्प तथा चन्दनसे चर्चित और वस्त्र - आभूषण तथा श्रृंगार-सामग्री से सम्पन्न इस दिव्य शय्याको आप स्वीकार करें । हे देवि! इस पृथ्वीपर जो भी अपूर्व तथा दुर्लभ ३ ९ द्रव्य शरीरकी शोभावृद्धिके योग्य हैं, उन समस्त द्रव्योंको आपको अर्पण कर रहा हूँ, आप ग्रहण कीजिये ॥ ३८-३९ ३ ॥ ४० [ हे मुने! ] मूलमन्त्र पढ़ते हुए ये उपचार भगवतीको समर्पित करके देवराज इन्द्रने विधानके अनुसार भक्तिपूर्वक उनके मूल मन्त्रका दस लाख जप किया । उस दस लाख जपसे इन्द्रको मन्त्रकी सिद्धि ४१ हो गयी ॥ ४०-४१ ॥ सभीके लिये कल्पवृक्षके समान यह मूलमन्त्र उन्हें ब्रह्माजीके द्वारा प्रदान किया गया था । पूर्वमें ४२ लक्ष्मीबीज ( श्रीं ), मायाबीज ( ह्रीं ), कामबीज ( क्लीं ) और वाणीबीज ( ऐं ) ) - - का प्रयोग करके कमलवासिनी इस शब्दके अन्तमें ' ङे ' ( चतुर्थी ) विभक्ति लगाकर पुनः ' स्वाहा ' शब्द जोड़ देनेपर ' ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ४३ | ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा ' – यही मन्त्र वैदिक मन्त्रराजके