देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 581–590

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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५७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४६ नारद उवाच षष्ठी मङ्गलचण्डी च मनसा प्रकृतेः कला उत्पत्तिमासां चरितं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः श्रीनारायण उवाच षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता बालकानामधिष्ठात्री विष्णुमाया च बालदा मातृकासु च विख्याता देवसेनाभिधा च या प्राणाधिकप्रिया साध्वी स्कन्दभार्या च सुव्रता आयुः प्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्धियोगिनी तस्याः पूजाविधिं ब्रह्मन्नितिहासमिदं शृणु यच्छुतं धर्मवकोण सुखदं पुत्रदं परम् ॥

राजा प्रियव्रतश्चासीत्स्वायम्भुवमनोः सुतः ।

योगीन्द्रो नोद्वहद्भार्यां तपस्यासु रतः सदा ॥

ब्रह्माज्ञया च यत्नेन कृतदारो बभूव ह ।

सुचिरं कृतदारश्च न लेभे तनयं मुने ॥

पुत्रेष्टियज्ञं तं चापि कारयामास कश्यपः ।

मालिन्यै तस्य कान्तायै मुनिर्यज्ञचरुं ददौ ॥

भुक्त्वा च तं चरुं तस्याः सद्यो गर्भो बभूव ह ।

दधार तं च सा देवी दैवं द्वादशवत्सरम् ॥

ततः सुषाव सा ब्रह्मन् कुमारं कनकप्रभम् ।

सर्वावयवसम्पन्नं मृतमुत्तारलोचनम् ॥

तं दृष्ट्वा रुरुदुः सर्वा नार्यश्च बान्धवस्त्रियः ।

मूर्च्छामवाप तन्माता पुत्रशोकेन भूयसा ॥

नारदजी बोले - भगवती षष्ठी, मंगलचण्डी और । मनसादेवी मूलप्रकृतिकी कला हैं; मैं इनकी उत्पत्ति तथा इनका चरित्र साररूपमें सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

॥ ३ श्रीनारायण बोले - मूलप्रकृतिके छठे अंशसे जो देवी आविर्भूत हैं, वे भगवती षष्ठी कही गयी हैं । ये बालकोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं । इन्हें विष्णुमाया और । बालदा भी कहा जाता है । ये मातृकाओंमें देवसेना ॥ ४ नामसे प्रसिद्ध हैं । उत्तम व्रतका पालन करनेवाली तथा साध्वी ये भगवती षष्ठी स्वामी कार्तिकेयकी भार्या हैं । और उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं । ये बालकों को ॥ ५ आयु प्रदान करनेवाली, उनका भरण - पोषण करनेवाली तथा उनकी रक्षा करनेवाली हैं । ये सिद्धयोगिनी देवी । अपने योगके प्रभावसे शिशुओंके पास निरन्तर विराजमान ॥ ६ रहती हैं ॥ ४-६ ॥ हे ब्रह्मन्! उन षष्ठीदेवीकी पूजाविधि तथा । यह इतिहास भी सुनिये, जिसे मैंने धर्मदेवके मुखसे ७ सुना है; यह आख्यान पुत्र तथा परम सुख प्रदान करनेवाला है ॥७ ॥

स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत नामवाले एक राजा थे । योगिराज प्रियव्रत विवाह नहीं करना चाहते ८ थे । वे सदा तपस्याओंमें संलग्न रहते थे, किंतु ब्रह्माजीकी आज्ञा तथा उनके प्रयत्नसे उन्होंने विवाह कर लिया ॥ ८ ॥

९ हे मुने! विवाह करनेके अनन्तर बहुत समयतक जब उन्हें पुत्रप्राप्ति नहीं हुई, तब महर्षि कश्यपने उनसे पुत्रेष्टियज्ञ कराया । मुनिने उनकी प्रिय भार्या १० मालिनीको यज्ञचरु प्रदान किया । उस चरुको ग्रहण कर लेनेपर उन्हें शीघ्र ही गर्भ स्थित हो गया । वे देवी उस गर्भको दिव्य बारह वर्षोंतक ११ धारण किये रहीं ॥ ९ –११ ॥ हे ब्रह्मन्! तत्पश्चात् उन्होंने स्वर्णसदृश कान्तिवाले, शरीरके समस्त अवयवोंसे सम्पन्न, मरे १२ हुए तथा उलटी आँखोंवाले पुत्रको जन्म दिया ॥ १२ ॥।

उसे देखकर सभी स्त्रियाँ तथा बान्धवोंकी पत्नियाँ रोने लगीं और महान् पुत्रशोकके कारण १३ । उसकी माता मूर्च्छित हो गयीं ॥ १३ ॥

पृष्ठ 582

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अ ० ४६ ] नवम

श्मशानं च ययौ राजा गृहीत्वा बालकं मुने ।

रुरोद तत्र कान्तारे पुत्रं कृत्वा स्ववक्षसि ॥ १४

नोत्सृजद् बालकं राजा प्राणांस्त्यक्तुं समुद्यतः ।

ज्ञानयोगं विसस्मार पुत्रशोकात्सुदारुणात् ॥ १५

एतस्मिन्नन्तरे तत्र विमानं च ददर्श सः ।

शुद्धस्फटिकसंकाशं मणिराजविनिर्मितम् ॥ १६

तेजसा ज्वलितं शश्वच्छोभितं क्षौमवाससा ।

नानाचित्रविचित्राढ्यं पुष्पमालाविराजितम् ॥ १७

ददर्श तत्र देवीं च कमनीयां मनोहराम् ।

श्वेतचम्पकवर्णाभां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ॥ १८

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां रत्नभूषणभूषिताम् ।

कृपामयीं योगसिद्धां भक्तानुग्रहकातराम् ॥ १ ९

दृष्ट्वा तां पुरतो राजा तुष्टाव परमादरात् ।

चकार पूजनं तस्या विहाय बालकं भुवि ॥ २०

पप्रच्छ राजा तां तुष्टां ग्रीष्मसूर्यसमप्रभाम् ।

तेजसा ज्वलितां शान्तां कान्तां स्कन्दस्य नारद ॥ २१

राजोवाच

का त्वं सुशोभने कान्ते कस्य कान्तासि सुव्रते ।

कस्य कन्या वरारोहे धन्या मान्या च योषिताम् ॥ २२

नृपेन्द्रस्य वचः श्रुत्वा जगन्मङ्गलचण्डिका ।

उवाच देवसेना सा देवानां रणकारिणी ॥ २३

देवानां दैत्यग्रस्तानां पुरा सेना बभूव सा ।

जयं ददौ सा तेभ्यश्च देवसेना च तेन सा ॥ २४

स्कन्ध ५७३ हे मुने! उस बालकको लेकर राजा प्रियव्रत श्मशान गये और वहाँ निर्जन स्थानमें पुत्रको अपने वक्षसे लगाकर रुदन करने लगे । राजाने उस पुत्रको नहीं छोड़ा । वे प्राणत्याग करनेको तत्पर हो गये । अत्यन्त दारुण पुत्रशोकके कारण राजाका ज्ञानयोग विस्मृत हो गया ॥ १४-१५ ॥ इसी बीच वहाँ उन्होंने शुद्ध स्फटिकमणिके समान प्रकाशमान, बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित, तेजसे निरन्तर देदीप्यमान, रेशमी वस्त्रसे सुशोभित, अनेक प्रकारके अद्भुत चित्रोंसे विभूषित और पुष्प तथा मालाओंसे सुसज्जित एक विमान देखा । साथ ही उन्होंने उस विमानमें कमनीय, मनोहर, श्वेत चम्पाके वर्णके समान आभावाली, सदा स्थायी रहनेवाले तारुण्यसे सम्पन्न, मन्द मन्द मुसकानयुक्त, प्रसन्न मुखमण्डलवाली, रत्ननिर्मित आभूषणोंसे अलंकृत, कृपाकी साक्षात् मूर्ति, योगसिद्ध और भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये परम आतुर प्रतीत होनेवाली देवीको भी देखा ॥ १६–१९ ॥ उन देवीको समक्ष देखकर राजाने उस बालकको भूमिपर रखकर परम आदरपूर्वक उनका स्तवन तथा पूजन किया । हे नारद! तत्पश्चात् राजा प्रियव्रत प्रसन्नताको प्राप्त, ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान प्रभावाली, अपने तेजसे देदीप्यमान तथा शान्त स्वभाववाली उन कार्तिकेयप्रिया [ भगवती षष्ठी ] -से | पूछने लगे - ॥ २०-२१ ॥ राजा बोले- हे सुशोभने! हे कान्ते! हे सुव्रते! हे वरारोहे! समस्त स्त्रियोंमें परम धन्य तथा आदरणीय तुम कौन हो, किसकी भार्या हो और किसकी पुत्री हो? ॥२२ ॥

[ हे नारद! ] नृपेन्द्र प्रियव्रतकी बात सुनकर जगत्का कल्याण करनेमें दक्ष तथा देवताओंके लिये संग्राम करनेवाली भगवती देवसेना उनसे कहने लगीं । वे देवी प्राचीनकालमें दैत्योंके द्वारा पीडित देवताओंकी सेना बनी थीं । उन्होंने उन्हें विजय प्रदान किया था, इसलिये वे देवसेना नामसे । विख्यात हैं ॥ २३-२४ ॥

पृष्ठ 583

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५७४ श्रीदेवसेनोवाच

ब्रह्मणो मानसी कन्या देवसेनाहमीश्वरी ।

सृष्ट्वा तां मनसा धाता ददौ स्कन्दाय भूमिप ॥

मातृकासु च विख्याता स्कन्दभार्या च सुव्रता ।

विश्वे षष्ठीति विख्याता षष्ठांशा प्रकृतेः परा ॥

अपुत्राय पुत्रदाहं प्रियादात्री प्रियाय च । धनदाहं दरिद्रेभ्यः कर्मिभ्यश्च स्वकर्मदा सुखं दुःखं भयं शोको हर्षो मङ्गलमेव च । सम्पत्तिश्च विपत्तिश्च सर्वं भवति कर्मणा कर्मणा बहुपुत्रश्च वंशहीनः स्वकर्मणा 1 कर्मणा मृतपुत्रश्च कर्मणा चिरजीवनः ॥

कर्मणा गुणवांश्चैव कर्मणा चाङ्गहीनकः ।

कर्मणा बहुभार्यश्च भार्याहीनश्च कर्मणा ॥

कर्मणा रूपवान्धर्मी रोगी शश्वत्स्वकर्मणा ।

कर्मणा च भवेद्वयाधिः कर्मणारोग्यमेव च ॥

तस्मात्कर्म परं राजन् सर्वेभ्यश्च श्रुतौ श्रुतम् ।

इत्येवमुक्त्वा सा देवी गृहीत्वा बालकं मुने ॥

महाज्ञानेन सा देवी जीवयामास लीलया ।

राजा ददर्श तं बालं सस्मितं कनकप्रभम् ॥

देवसेना च पश्यन्तं नृपमापृच्छ्य सा तदा ।

गृहीत्वा बालकं देवी गगनं गन्तुमुद्यता ॥

पुनस्तुष्टाव तां राजा शुष्ककण्ठोष्ठतालुकः ।

नृपस्तोत्रेण सा देवी परितुष्टा बभूव ह ॥

उवाच तं नृपं ब्रह्मन् वेदोक्तं कर्मनिर्मितम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४६ श्रीदेवसेना बोलीं- हे राजन्! मैं ब्रह्माकी मानसी कन्या हूँ । सबपर शासन करनेवाली मैं २५ ' देवसेना ' नामसे विख्यात हूँ । विधाताने अपने मनसे मेरी सृष्टि करके स्वामी कार्तिकेयको सौंप दिया । मातृकाओंमें विख्यात मैं स्वामी कार्तिकेयकी पतिव्रता २६ भार्या हूँ । भगवती परा - - प्रकृतिका प्र षष्ठांश होनेके कारण मैं विश्वमें ' षष्ठी ' - इस नामसे प्रसिद्ध हूँ । मैं पुत्रहीनको पुत्र, पतिको प्रिय पत्नी, दरिद्रोंको धन ॥ २७ देनेवाली और कर्म करनेवालोंको उनके कर्मका फल प्रदान करनेवाली हूँ ॥ २५–२७ ॥ हे राजन्! सुख, दुःख, भय, शोक, हर्ष, मंगल, ॥ २८ सम्पत्ति और विपत्ति - यह सब कर्मानुसार होता है । अपने कर्मसे मनुष्य अनेक पुत्रोंवाला होता है, कर्मसे ही वह वंशहीन होता है, कर्मसे ही उसे २ ९ मरा हुआ पुत्र होता है और कर्मसे ही वह पुत्र दीर्घजीवी होता है । मनुष्य कर्मसे ही गुणी, कर्मसे ही अंगहीन, कर्मसे ही अनेक पत्नियोंवाला तथा ३० कर्मसे ही भार्याहीन होता है । कर्मसे ही मनुष्य रूपवान् तथा कर्मसे ही निरन्तर रोगग्रस्त रहता है, कर्मसे ही व्याधि तथा कर्मसे ही नीरोगता होती है । ३१ अतः हे राजन्! कर्म सबसे बलवान् है - ऐसा श्रुतिमें कहा गया है ॥ २८–३११ / २ ॥ हे मुने! इस प्रकार कहकर उन भगवती षष्ठीने बालकको लेकर अपने महाज्ञानके द्वारा ३२ खेल - खेलमें उसे जीवित कर दिया । अब राजा प्रियव्रत स्वर्णकी प्रभाके समान कान्तिसे सम्पन्न तथा मुसकानयुक्त उस बालकको देखने लगे । उसी ३३ समय वे भगवती देवसेना बालकको देख रहे राजासे कहकर उस बालकको ले करके आकाशमें जानेको उद्यत हो गयीं ॥ ३२–३४ ॥ ३४ [ यह देखकर ] शुष्क कण्ठ, ओष्ठ तथा तालुवाले वे राजा उन भगवतीकी स्तुति करने लगे, तब राजाके स्तोत्रसे वे देवी षष्ठी अत्यन्त प्रसन्न हो ३५ गयीं और हे ब्रह्मन्! उन राजासे कर्मनिर्मित वेदोक्त वचन कहने लगीं ॥ ३५३ ॥

पृष्ठ 584

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अ ० ४६ ] देव्युवाच त्रिषु लोकेषु त्वं राजा स्वायम्भुवमनोः सुतः ॥

मम पूजां च सर्वत्र कारयित्वा स्वयं कुरु ।

तदा दास्यामि पुत्रं ते कुलपद्मं मनोहरम् ॥

सुव्रतं नाम विख्यातं गुणवन्तं सुपण्डितम् ।

जातिस्मरं च योगीन्द्रं नारायणकलात्मकम् ॥

शतक्रतुकरं श्रेष्ठं क्षत्रियाणां च वन्दितम् ।

मत्तमातङ्गलक्षाणां धृतवन्तं बलं शुभम् ॥

धनिनं गुणिनं शुद्धं विदुषां प्रियमेव च ।

योगिनां ज्ञानिनां चैव सिद्धिरूपं तपस्विनाम् ॥

यशस्विनं च लोकेषु दातारं सर्वसम्पदाम् ।

इत्येवमुक्त्वा सा देवी तस्मै तद्बालकं ददौ ॥

राजा चकार स्वीकारं पूजार्थं च प्रियव्रतः ।

जगाम देवी स्वर्गं च दत्त्वा तस्मै शुभं वरम् ॥

आजगाम सहामात्यः स्वगृहं हृष्टमानसः ।

आगत्य कथयामास वृत्तान्तं पुत्रहेतुकम् ॥

श्रुत्वा बभूवुः सन्तुष्टा नरा नार्यश्च नारद ।

मङ्गलं कारयामास सर्वत्र पुत्रहेतुकम् ॥

देवीं च पूजयामास ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ ।

राजा च प्रतिमासेषु शुक्लषष्ठ्यां महोत्सवम् ॥

षष्ठ्या देव्याश्च यत्नेन कारयामास सर्वतः ।

बालानां सूतिकागारे षष्ठाहे यत्नपूर्वकम् ॥

तत्पूजां कारयामास चैकविंशतिवासरे ।

बालानां शुभकार्ये च शुभान्नप्राशने तथा ॥

सर्वत्र वर्धयामास स्वयमेव चकार ह ।

ध्यानं पूजाविधानं च स्तोत्रं मत्तो निशामय ॥

यच्छुतं धर्मवकोण कौथुमोक्तं च सुव्रत । नवम स्कन्ध ५७५ देवी बोलीं- तुम स्वायम्भुव मनुके पुत्र हो ३६ और तीनों लोकोंके राजा हो । तुम सर्वत्र मेरी पूजा कराकर स्वयं भी करो, तभी मैं तुम्हें कुलके कमलस्वरूप यह मनोहर पुत्र प्रदान करूँगी । यह सुव्रत नामसे विख्यात ३७ होगा, यह गुणी तथा विद्वान् होगा, इसे पूर्वजन्मकी बातें याद रहेंगी, यह योगीन्द्र होगा तथा भगवान् नारायणकी कलासे सम्पन्न होगा, यह क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ ३८ तथा सभीके द्वारा वन्दनीय होगा और सौ अश्वमेधयज्ञ करनेवाला होगा । यह बालक लाखों मतवाले हाथियों के समान बल धारण करेगा तथा महान् कल्याणकारी ३ ९ होगा । यह धनी, गुणवान्, शुद्ध, विद्वानोंका प्रिय और योगियों, ज्ञानियों तथा तपस्वियोंका सिद्धिस्वरूप, समस्त लोकोंमें यशस्वी तथा सभीको समस्त सम्पदाएँ ४० प्रदान करनेवाला होगा ॥ ३६–४० ३ ॥ ऐसा कहकर उन देवीने वह बालक राजाको दे ४ ९ दिया । राजा प्रियव्रतने भी पूजाकी बातें स्वीकार कर लीं । तब भगवती भी उन्हें कल्याणकारी वर देकर स्वर्ग चली गयीं और राजा प्रसन्नचित्त होकर मन्त्रियों के ४२ साथ अपने घर आ गये । घर आकर उन्होंने पुत्रविषयक वृत्तान्त सबसे कहा । हे नारद! उसे सुनकर समस्त नर

तथा नारी परम प्रसन्न हुए । ४१ - ४३३ ॥

४३ राजाने पुत्र - प्राप्ति उपलक्ष्यमें सर्वत्र मंगलोत्सव कराया, भगवती षष्ठीकी पूजा की तथा ब्राह्मणोंको ४४ धन प्रदान किया ॥ ४४३ ॥

उसी समयसे राजा प्रियव्रत प्रत्येक महीने में शुक्लपक्ष षष्ठी तिथिको भगवती षष्ठीका महोत्सव ४५ प्रयत्नपूर्वक सर्वत्र कराने लगे ॥ ४५३ ॥

सूतिकागृहमें बालकोंके जन्मके छठें दिन, इक्कीसवें दिन, बालकोंसे सम्बन्धित किसी भी ४६ मांगलिक कार्यमें तथा शुभ अन्नप्राशनके अवसरपर भगवतीकी पूजा कराने लगे और स्वयं भी करने लगे, इस प्रकार उन्होंने सर्वत्र भगवतीकी पूजाका ४७ प्रचार कराया ॥ ४६-४७३ ॥ हे सुव्रत! अब आप मुझसे भगवती षष्ठीके ४८ ध्यान, पूजाविधान तथा स्तोत्रको सुनिये, जिसे मैंने धर्मदेवके मुखसे सुना था और जो सामवेदकी कौथुमशाखामें वर्णित है ॥ ४८३ ॥

पृष्ठ 585

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५७६ शालग्रामे घटे वाथ वटमूलेऽथवा मुने भित्त्यां पुत्तलिकां कृत्वा पूजयेद्वा विचक्षणः षष्ठांशां प्रकृतेः शुद्धां प्रतिष्ठाप्य च सुप्रभाम्

सुपुत्रदां च शुभदां दयारूपां जगत्प्रसूम् ।

श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् ॥

पवित्ररूपां परमां देवसेनां परां भजे । इति ध्यात्वा स्वशिरसि पुष्पं दत्त्वा विचक्षणः

पुनर्ध्यात्वा च मूलेन पूजयेत्सुव्रतां सतीम् ।

पाद्यार्थ्याचमनीयैश्च गन्धपुष्पप्रदीपकैः ॥

नैवेद्यैर्विविधैश्चापि फलेन शोभनेन च ।

ॐ ह्रीं षष्ठीदेव्यै स्वाहेति विधिपूर्वकम् ॥

अष्टाक्षरं महामन्त्रं यथाशक्ति जपेन्नरः ।

ततः स्तुत्वा च प्रणमेद्भक्तियुक्तः समाहितः ॥

स्तोत्रं च सामवेदोक्तं वरं पुत्रफलप्रदम् ।

अष्टाक्षरं महामन्त्रं लक्षधा यो जपेत्ततः ॥

सुपुत्रं स लभेन्नूनमित्याह कमलोद्भवः ।

स्तोत्रं शृणु मुनिश्रेष्ठ सर्वकामशुभावहम् ॥

वाञ्छाप्रदं च सर्वेषां गूढं वेदेषु नारद ।

नमो देव्यै महादेव्यै सिद्ध्यै शान्त्यै नमो नमः ॥

शुभायै देवसेनायै षष्ठ्यै देव्यै नमो नमः ।

वरदायै पुत्रदायै धनदायै नमो नमः ॥

सुखदायै मोक्षदायै षष्ठ्यै देव्यै नमो नमः ।

सृष्ट्यै षष्ठांशरूपायै सिद्धायै च नमो नमः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४६ ॥ ४ ९ हे मुने! शालग्राम, कलश अथवा वटके मूलमें अथवा दीवालपर पुत्तलिका बनाकर भगवती प्रकृति । छठें अंशसे प्रकट होनेवाली, शुद्धस्वरूपिणी तथा दिव्य ॥ ५० प्रभासे सम्पन्न षष्ठीदेवीको प्रतिष्ठित करके बुद्धिमान् मनुष्यको उनकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४ ९ -५० ॥ ' उत्तम पुत्र प्रदान करनेवाली, कल्याणदायिनी, ५१ दयास्वरूपिणी, जगत्की सृष्टि करनेवाली, श्वेत चम्पाके पुष्पकी आभाके समान वर्णवाली, रत्नमय आभूषणोंसे अलंकृत, परम पवित्रस्वरूपिणी तथा अतिश्रेष्ठ परा भगवती देवसेनाकी मैं आराधना करता हूँ । ' विद्वान् ॥ ५२ पुरुषको चाहिये कि इस विधिसे ध्यान करके [ हाथमें लिये हुए ] पुष्पको अपने मस्तकसे लगाकर उसे भगवतीको अर्पण कर दे । पुनः ध्यान करके मूलमन्त्रके ५३ उच्चारणपूर्वक पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, गन्ध, पुष्प, दीप, विविध प्रकारके नैवेद्य तथा सुन्दर फल आदि उपचारोंके द्वारा उत्तम व्रतमें निरत रहनेवाली साध्वी ५४ भगवती देवसेनाकी पूजा करनी चाहिये और उस मनुष्यको ' ॐ ह्रीं षष्ठीदेव्यै स्वाहा ' इस अष्टाक्षर महामन्त्रका अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक जप भी करना चाहिये । तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर भक्तिपूर्वक ५५ स्तुति करके देवीको प्रणाम करना चाहिये । पुत्र – फल प्रदान करनेवाला यह उत्तम स्तोत्र सामवेद में वर्णित है । जो मनुष्य भगवती षष्ठीके अष्टाक्षर महामन्त्रका एक ५६ लाख जप करता है, वह निश्चितरूपसे सुन्दर पुत्र प्राप्त करता है - ऐसा ब्रह्माजीने कहा है ॥ ५१–५६३ ॥ मुनिश्रेष्ठ! अब आप सम्पूर्ण शुभ कामनाओंको ५७ प्रदान करनेवाले, सभी प्राणियोंको वांछित फल प्रदान करनेवाले तथा वेदोंमें रहस्यमय रूपसे प्रतिपादित स्तोत्रका श्रवण कीजिये ॥ ५७३ ॥

५८ देवीको नमस्कार है, महादेवीको नमस्कार है, भगवती सिद्धि एवं शान्तिको नमस्कार है । शुभा, देवसेना तथा देवी षष्ठीको बार - बार नमस्कार है । वरदा, पुत्रदा तथा धनदा देवीको बार - बार नमस्कार ५ ९ है । सुखदा, मोक्षदा तथा भगवती षष्ठीको बार - बार नमस्कार है । मूलप्रकृतिके छठें अंशसे अवतीर्ण, सृष्टिस्वरूपिणी तथा सिद्धस्वरूपिणी भगवतीको बार-६० | बार नमस्कार है । माया तथा सिद्धयोगिनी षष्ठीदेवीको

पृष्ठ 586

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अ ० ४६ ] मायायै सिद्धयोगिन्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः । सारायै शारदायै च परादेव्यै नमो नमः बालाधिष्ठातृदेव्यै च षष्ठीदेव्यै नमो नमः कल्याणदायै कल्याण्यै फलदायै च कर्मणाम् प्रत्यक्षायै स्वभक्तानां षष्ठ्यै देव्यै नमो नमः । पूज्यायै स्कन्दकान्तायै सर्वेषां सर्वकर्मसु देवरक्षणकारिण्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः । शुद्धसत्त्वस्वरूपायै वन्दितायै नृणां सदा

हिंसाक्रोधवर्जितायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ।

धनं देहि प्रियां देहि पुत्रं देहि सुरेश्वरि ॥

मानं देहि जयं देहि द्विषो जहि महेश्वरि । धर्मं देहि यशो देहि षष्ठीदेव्यै नमो नमः

देहि भूमिं प्रजां देहि विद्यां देहि सुपूजिते ।

कल्याणं च जयं देहि षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥

इति देवीं च संस्तूय लेभे पुत्रं प्रियव्रतः ।

यशस्विनं च राजेन्द्रः षष्ठीदेव्याः प्रसादतः ॥

षष्ठीस्तोत्रमिदं ब्रह्मन् यः शृणोति तु वत्सरम् ।

अपुत्रो लभते पुत्रं वरं सुचिरजीविनम् ॥

वर्षमेकं च यो भक्त्या सम्पूज्येदं शृणोति च । सर्वपापाद्विनिर्मुक्तो महावन्ध्या प्रसूयते

वीरं पुत्रं च गुणिनं विद्यावन्तं यशस्विनम् ।

सुचिरायुष्यवन्तं च सूते देवीप्रसादतः ॥

काकवन्ध्या च या नारी मृतवत्सा च या भवेत् ।

वर्षं श्रुत्वा लभेत्पुत्रं षष्ठीदेवीप्रसादतः ॥

रोगयुक्ते च बाले च पिता माता शृणोति चेत् ।

मासेन मुच्यते बालः षष्ठीदेवीप्रसादतः ॥

नवम स्कन्ध ५७७ बार - बार नमस्कार है । सारस्वरूपिणी, शारदा तथा ॥ ६१ परादेवीको बार- बार नमस्कार है । बालकोंकी अधिष्ठात्री देवीको नमस्कार है । षष्ठीदेवीको बार - बार नमस्कार । है । कल्याण प्रदान करनेवाली, कल्याणस्वरूपिणी, सभी ॥ ६२ कर्मोंके फल प्रदान करनेवाली तथा अपने भक्तोंको प्रत्यक्ष दर्शन देनेवाली देवी षष्ठीको बार - बार नमस्कार है । सम्पूर्ण कार्योंमें सभीके लिये पूजनीय तथा देवताओंकी ॥ ६३ रक्षा करनेवाली स्वामी कार्तिकेयकी भार्या देवी षष्ठीको बार - बार नमस्कार है । शुद्धसत्त्वस्वरूपिणी, मनुष्योंके ॥ ६४ लिये सदा वन्दनीय तथा क्रोध - हिंसासे रहित षष्ठीदेवीको बार - बार नमस्कार है । हे सुरेश्वरि! आप मुझे धन दीजिये, प्रिय भार्या दीजिये, पुत्र प्रदान कीजिये, मान ६५ प्रदान कीजिये तथा विजय प्रदान कीजिये और हे महेश्वरि! मेरे शत्रुओंका संहार कर डालिये । मुझे धर्म दीजिये और कीर्ति दीजिये, आप षष्ठीदेवीको बार-॥ ६६ बार नमस्कार है । हे सुपूजिते! भूमि दीजिये, प्रजा दीजिये, विद्या दीजिये, कल्याण और जय प्रदान कीजिये, आप षष्ठीदेवीको बार - बार नमस्कार है ॥ ५८–६७ ॥ ६७ इस प्रकार भगवती षष्ठीकी स्तुति करके महाराज प्रियव्रतने षष्ठीदेवीकी कृपासे यशस्वी पुत्र प्राप्त कर ६८ | लिया ॥ ६८ ॥

हे ब्रह्मन्! जो एक वर्षतक भगवती षष्ठीके इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह पुत्रहीन मनुष्य सुन्दर ६ ९ तथा दीर्घजीवी पुत्र प्राप्त कर लेता है । जो एक वर्षतक भक्तिपूर्वक देवी षष्ठीकी विधिवत् पूजा करके इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त ॥ ७० हो जाता है । महावन्ध्या स्त्री भी इसके श्रवणसे प्रसवके योग्य हो जाती है और वह भगवती षष्ठीकी कृपासे ७१ वीर, गुणी, विद्वान्, यशस्वी तथा दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न करती है । यदि कोई स्त्री काकवन्ध्या अथवा मृतवत्सा हो तो भी वह एक वर्षतक इस स्तोत्रका ७२ श्रवण करके षष्ठीदेवीके अनुग्रहसे पुत्र प्राप्त कर लेती है । पुत्रके व्याधिग्रस्त हो जानेपर यदि माता-पिता एक मासतक इस स्तोत्रको सुनें तो षष्ठीदेवीकी ७३ । कृपासे वह बालक रोगमुक्त हो जाता है । ६ ९ -७३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे षष्ठ्युपाख्यानवर्णनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -19 A

पृष्ठ 587

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५७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४७ अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः भगवती मंगलचण्डी तथा श्रीनारायण उवाच

कथितं षष्ठ्युपाख्यानं ब्रह्मपुत्र यथागमम् ।

देवी मङ्गलचण्डी च तदाख्यानं निशामय ॥ १

तस्याः पूजादिकं सर्वं धर्मवक्त्रेण यच्छ्रुतम् ।

श्रुतिसम्मतमेवेष्टं सर्वेषां विदुषामपि ॥ २

दक्षा या वर्तते चण्डी कल्याणेषु च मङ्गला ।

मङ्गलेषु च या दक्षा सा च मङ्गलचण्डिका ॥ ३

पूज्या या वर्तते चण्डी मङ्गलोऽपि महीसुतः ।

मङ्गलाभीष्टदेवी या सा वा मङ्गलचण्डिका ॥ ४

मङ्गलो मनुवंश्यश्च सप्तद्वीपधरापतिः ।

तस्य पूज्याभीष्टदेवी तेन मङ्गलचण्डिका ॥ ५

मूर्तिभेदेन सा दुर्गा मूलप्रकृतिरीश्वरी ॥

कृपारूपातिप्रत्यक्षा योषितामिष्टदेवता ॥

प्रथमे पूजिता सा च शङ्करेण परात्परा ।

त्रिपुरस्य वधे घोरे विष्णुना प्रेरितेन च ॥ ७

ब्रह्मन् ब्रह्मोपदेशेन दुर्गतेन च सङ्कटे ।

आकाशात्पतिते याने दैत्येन पातिते रुषा ॥ ८

ब्रह्मविष्णूपदिष्टश्च दुर्गां तुष्टाव शङ्करः ।

सा च मङ्गलचण्डी या बभूव रूपभेदतः ॥ ९

उवाच पुरतः शम्भोर्भयं नास्तीति ते प्रभो ।

भगवान्वृषरूपश्च सर्वेशस्ते भविष्यति ॥ १०

युद्धशक्तिस्वरूपाहं भविष्यामि न संशयः ।

मायात्मना च हरिणा सहायेन वृषध्वज ॥ ११

जहि दैत्यं स्वशत्रुं च सुराणां पदघातकम् । 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –19 B भगवती मनसाका आख्यान श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मपुत्र! आगमशास्त्रके अनुसार मैंने षष्ठीदेवीका आख्यान कह दिया, अब भगवती मंगलचण्डीका आख्यान और उनका पूजा-विधान आदि सुनिये, जिसे मैंने धर्मदेवके मुखसे सुना था । यह उपाख्यान श्रुतिसम्मत है तथा सभी विद्वानोंको अभीष्ट है ॥१-२ ॥ कल्याण करनेमें सुदक्षा जो चण्डी अर्थात् प्रतापवती हैं तथा मंगलोंके मध्यमें जो प्रचण्ड मंगला हैं, वे देवी ' मंगलचण्डिका ' नामसे विख्यात हैं । अथवा भूमिपुत्र मंगल भी जिन चण्डीकी पूजा करते हैं तथा जो भगवती उन मंगलकी अभीष्ट देवी हैं, वे ' मंगलचण्डिका ' नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ३-४ ॥ मनुवंशमें उत्पन्न मंगल नामक एक राजा सात द्वीपोंवाली सम्पूर्ण पृथ्वीके स्वामी थे । ये भगवती उनकी पूज्य अभीष्ट देवी थीं, इससे भी वे । ' मंगलचण्डिका " ' नामसे विख्यात हैं ॥५ ॥

वे ही मूर्तिभेदसे मूलप्रकृति भगवती दुर्गा हैं । कृपारूपिणी होकर वे देवी साक्षात् प्रकट होनेवाली हैं और स्त्रियोंकी अभीष्ट देवता हैं ॥ ६ ॥

सर्वप्रथम भगवान् शंकरने विष्णुकी प्रेरणा से तथा ब्रह्माजीके उपदेशसे उन परात्परा भगवतीकी पूजा की थी । हे ब्रह्मन्! त्रिपुरासुरके घोर वधके समय जब शिवजी संकटमें पड़ गये थे और उस दैत्य द्वारा रोषपूर्वक उनका विमान आकाशसे नीचे गिरा दिया गया था, तब ब्रह्मा और विष्णुका उपदेश मानकर दुर्गतिको प्राप्त भगवान् शंकरने भगवती दुर्गाकी स्तुति की । वे मंगलचण्डी ही थीं; जिन्होंने केवल रूप बदल लिया था, वे शिवजीके सामने प्रकट होकर बोलीं- हे प्रभो! अब आपको कोई भय नहीं है, सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि वृषरूपमें आपका वाहन बनेंगे और मैं युद्धमें शक्तिस्वरूपा होकर आपकी सहायता करूँगी, इसमें सन्देह नहीं है । हे वृषध्वज! तब मायास्वरूप भगवान् श्रीहरिकी सहायता से आप देवताओंको पदच्युत कर देनेवाले अपने शत्रु उस त्रिपुरदैत्यका वध कर डालेंगे ॥ ७- ११३ ॥

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अ ० ४७ ] इत्युक्त्वान्तर्हिता देवी शम्भो: शक्तिर्बभूव सा ॥

विष्णुदत्तेन शस्त्रेण जघान तमुमापतिः ।

मुनीन्द्र पतिते दैत्ये सर्वे देवा महर्षयः ॥

तुष्टुवुः शङ्करं देवं भक्तिनम्रात्मकन्धराः ।

सद्यः शिरसि शम्भोश्च पुष्पवृष्टिर्बभूव ह ॥

ब्रह्मा विष्णुश्च सन्तुष्टो ददौ तस्मै शुभाशिषम् ।

ब्रह्मविष्णूपदिष्टश्च सुस्नातः शङ्करस्तथा ॥

पूजयामास तां भक्त्या देवीं मङ्गलचण्डिकाम् ।

पाद्यार्थ्याचमनीयैश्च वस्त्रैश्च विविधैरपि ॥

पुष्पचन्दननैवेद्यैर्भक्त्या नानाविधैर्मुने ।

छागैर्मेषैश्च महिषैर्गवयैः पक्षिभिस्तथा ॥

वस्त्रालङ्कारमाल्यैश्च पायसैः पिष्टकैरपि ।

मधुभिश्च सुधाभिश्च फलैर्नानाविधैरपि ॥

सङ्गीतैर्नर्तकैर्वाद्यैरुत्सवैर्नामकीर्तनैः 1 ध्यात्वा माध्यन्दिनोक्तेन ध्यानेन भक्तिपूर्वकम् ॥

ददौ द्रव्याणि मूलेन मन्त्रेणैव च नारद ।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवि मङ्गलचण्डिके ॥

हूँ हूँ फट् स्वाहाप्येकविंशाक्षरो मनुः ।

पूज्यः कल्पतरुश्चैव भक्तानां सर्वकामदः ॥

दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ।

ध्यानं च श्रूयतां ब्रह्मन् वेदोक्तं सर्वसम्मतम् ॥

देवीं षोडशवर्षीयां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ।

बिम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् ॥

श्वेतचम्पकवर्णाभां सुनीलोत्पललोचनाम् ।

जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ॥

संसारसागरे घोरे ज्योतीरूपां सदा भजे ।

देव्याश्च ध्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –19 C नवम स्कन्ध ५७ ९ १२ हे मुनिवर! ऐसा कहकर वे भगवती अन्तर्धान हो गयीं और उसी क्षण वे भगवान् शिवकी शक्ति बन गयीं । तत्पश्चात् उमापति शंकरने विष्णुजीके द्वारा १३ दिये गये शस्त्रसे उस दैत्यको मार डाला । उस दैत्यके धराशायी हो जानेपर सभी देवता तथा महर्षिगण भक्तिपूर्वक अपना सिर झुकाकर भगवान् शिवकी १४ स्तुति करने लगे ॥ १२-१३३ ॥ उसी क्षण भगवान् शिवके सिरपर पुष्पोंकी वर्षा १५ होने लगी । ब्रह्मा तथा विष्णुने परम प्रसन्न होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिया ॥ १४३ ॥

तत्पश्चात् हे मुने! ब्रह्मा तथा विष्णुका उपदेश १६ मानकर भगवान् शंकरने विधिवत् स्नान करके पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, अनेक प्रकारके वस्त्र, पुष्प, चन्दन, भाँति - भाँति के नैवेद्य, वस्त्रालंकार, माला, खीर, पिष्टक, १७ मधु, सुधा, अनेक प्रकारके फल आदि उपचारों, संगीत, नृत्य, वाद्य, उत्सव तथा नामकीर्तन आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक १८ उन देवी मंगलचण्डिकाका पूजन किया ॥ १५- - -१८३ ॥ हे नारद! माध्यन्दिनशाखामें बताये गये ध्यानमन्त्रके द्वारा भगवती मंगलचण्डीका भक्तिपूर्वक ध्यान करके १ ९ उन्होंने मूल मन्त्रसे ही सभी द्रव्य अर्पण किये । ‘ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवि मङ्गलचण्डिके हुं हुं फट् स्वाहा ' यह इक्कीस अक्षरोंवाला मन्त्र पूजनीय तथा २० भक्तोंको समस्त अभीष्ट प्रदान करनेवाला कल्पवृक्ष ही है । दस लाख जप करनेसे इस मन्त्रकी सिद्धि निश्चितरूपसे हो जाती है ॥ १ ९ – २१३ ॥ २१ हे ब्रह्मन्! अब वेदोक्त तथा सर्वसम्मत ध्यानका श्रवण कीजिये - ' सोलह वर्षकी अवस्थावाली, सर्वदा सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न, बिम्बाफलके समान होठोंवाली, २२ सुन्दर दन्तपंक्तिवाली, शुद्धस्वरूपिणी, शरत्कालीन कमलके समान मुखवाली, श्वेत चम्पाके वर्णकी आभावाली, विकसित नीलकमलके सदृश नेत्रोंवाली, २३ जगत्का पालन - पोषण करनेवाली, सभीको सम्पूर्ण सम्पदाएँ प्रदान करनेवाली और घोर संसारसागरमें पड़े २४ हुए प्राणियोंके लिये ज्योतिस्वरूपिणी भगवतीकी मैं सदा आराधना करता हूँ । ' हे मुने! यह भगवती मंगलचण्डिकाका ध्यान है, अब उनका स्तवन २५ | सुनिये ॥ २२ - २५ ॥

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५८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४७ महादेव उवाच

रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मङ्गलचण्डिके ।

हारि विपदां राशेर्हर्षमङ्गलकारिके ॥

हर्षमङ्गलदक्षे च हर्षमङ्गलदायिके ।

शुभे मङ्गलदक्षे च शुभे मङ्गलचण्डिके ॥

मङ्गले मङ्गलार्हे च सर्वमङ्गलमङ्गले ।

सतां मङ्गलदे देवि सर्वेषां मङ्गलालये ॥

पूज्ये मङ्गलवारे च मङ्गलाभीष्टदेवते ।

पूज्ये मङ्गलभूपस्य मनुवंशस्य सन्ततम् ॥

मङ्गलाधिष्ठातृदेवि मङ्गलानां च मङ्गले ।

संसारमङ्गलाधारे मोक्षमङ्गलदायिनि ॥

सारे च मङ्गलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् ।

प्रतिमङ्गलवारे च पूज्ये मङ्गसुखप्रदे ॥

स्तोत्रेणानेन शम्भुश्च स्तुत्वा मङ्गलचण्डिकाम् ।

प्रतिमङ्गलवारे च पूजां दत्त्वा गतः शिवः ॥

प्रथमे पूजिता देवी शिवेन सर्वमङ्गला ।

द्वितीये पूजिता सा च मङ्गलेन ग्रहेण च ॥

तृतीये पूजिता भद्रा मङ्गलेन नृपेण च ।

चतुर्थे मङ्गले वारे सुन्दरीभिः प्रपूजिता ॥

पञ्चमे मङ्गलाकाङ्क्षिनरैर्मङ्गलचण्डिका ।

पूजिता प्रतिविश्वेषु विश्वेशपूजिता सदा ॥

ततः सर्वत्र सम्पूज्या बभूव परमेश्वरी ।

देवैश्च मुनिभिश्चैव मानवैर्मनुभिर्मुने ॥

देव्याश्च मङ्गलस्तोत्रं यः शृणोति समाहितः ।

तन्मङ्गलं भवेत्तस्य न भवेत्तदमङ्गलम् ।

वर्धते पुत्रपौत्रैश्च मङ्गलं च दिने दिने ॥

महादेवजी बोले- जगत्की माता, विपत्तिराशिका नाश करनेवाली, हर्ष तथा मंगल उत्पन्न करनेवाली, २६ हर्ष तथा मंगल देनेमें प्रवीण, हर्ष तथा मंगल प्रदान करनेवाली, कल्याणकारिणी, मंगल करनेमें दक्ष, शुभस्वरूपिणी, मंगलरूपिणी, मंगल करनेमें परम २७ योग्यतासम्पन्न, समस्त मंगलोंकी भी मंगलरूपा, सज्जनोंको मंगल प्रदान करनेवाली, सभी मंगलोंकी आश्रय-स्वरूपिणी, मंगलवारके दिन पूजी जानेवाली, मंगलग्रहकी २८ अभीष्ट देवी, मनुवंशमें उत्पन्न राजा मंगलके लिये सदा पूजनीया, मंगलकी अधिष्ठात्री देवी, मंगलोंके लिये भी मंगल, संसारके समस्त मंगलों की २ ९ आधारस्वरूपा, मोक्षरूप मंगल प्रदान करनेवाली, साररूपिणी, मंगलाधार, सभी कर्मोंकी फलस्वरूपिणी तथा मंगलवारको पूजित होनेपर सबको महान् ३० सुख प्रदान करनेवाली हे देवि मंगलचण्डिके! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥ २६–३१ ॥ भगवान् शिव इस स्तोत्रसे देवी मंगलचण्डिकाकी ३१ स्तुति करके तथा प्रत्येक मंगलवारको उनकी पूजा करके वहाँसे [ अपने लोक ] चले गये ॥ ३२ ॥

इस प्रकार सर्वप्रथम भगवान् शिवके द्वारा ३२ वे सर्वमंगला देवी मंगलचण्डिका पूजित हुईं । दूसरी बार मंगलग्रहने उनकी पूजा की, तीसरी बार ३३ राजा मंगलने उन कल्याणमयी देवीकी पूजा की । चौथी बार मंगलवारके दिन भद्र महिलाओंने उनकी पूजा की । तत्पश्चात् पाँचवीं बार अपने कल्याणकी ३४ कामना रखनेवाले पुरुषोंने देवी मंगलचण्डिकाका पूजन किया । इस तरह विश्वेश्वर शिवके द्वारा पूजित ये भगवती सभी लोकोंमें पूजी जाने लगीं । ३५ हे मुने! तदनन्तर सभी देवताओं, मुनियों, मानवों तथा मनुओंके द्वारा भगवती मंगलचण्डिका सर्वत्र पूजित हो गयीं ॥ ३३-३६ ॥ ३६ जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर भगवती मंगलचण्डिकाके इस मंगलमय स्तोत्रका श्रवण करता है, उसका सदा मंगल होता है और उसका अमंगल कभी नहीं होता, पुत्र - पौत्रोंसहित उसके मंगलकी ३७ दिन - प्रतिदिन वृद्धि होती रहती है ॥३७ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —19 D

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अ ० ४७ ] श्रीनारायण उवाच

उक्तं द्वयोरुपाख्यानं ब्रह्मपुत्र यथागमम् ।

श्रूयतां मनसाख्यानं यच्छ्रुतं धर्मवक्त्रतः ॥

सा च कन्या भगवती कश्यपस्य च मानसी ।

तेनैव मनसा देवी मनसा या च दीव्यति ॥

मनसा ध्यायते या च परमात्मानमीश्वरम् ।

तेन सा मनसा देवी तेन योगेन दीव्यति ॥

आत्मारामा च सा देवी वैष्णवी सिद्धयोगिनी ।

त्रियुगं च तपस्तप्त्वा कृष्णस्य परमात्मनः ॥

जरत्कारुशरीरं च दृष्ट्वा यत्क्षीणमीश्वरः ।

गोपीपतिर्नाम चक्रे जरत्कारुरिति प्रभुः ॥

वाञ्छितं च ददौ तस्यै कृपया च कृपानिधिः ।

पूजां च कारयामास चकार च स्वयं प्रभुः ॥

स्वर्गे च नागलोके च पृथिव्यां ब्रह्मलोकतः । भृशं जगत्सु गौरी सा सुन्दरी च मनोहरा ।

जगद्गौरीति विख्याता तेन सा पूजिता सती ।

शिवशिष्या च सा देवी तेन शैवी प्रकीर्तिता ॥

विष्णुभक्तातीव शश्वद्वैष्णवी तेन कीर्तिता ।

नागानां प्राणरक्षित्री यज्ञे पारीक्षितस्य च ॥

नागेश्वरीति विख्याता सा नागभगिनीति च ।

विषं संहर्तुमीशा या तेन विषहरी स्मृता ॥

सिद्धयोगं हरात्प्राप तेन सा सिद्धयोगिनी ।

महाज्ञानं च योगं च मृतसञ्जीवनीं पराम् ॥

महाज्ञानयुतां तां च प्रवदन्ति मनीषिणः । नवम स्कन्ध ५८१ श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मपुत्र! मैंने आगमशास्त्रके अनुसार देवी षष्ठी और मंगलचण्डिका— ३८ इन दोनोंके उपाख्यानका वर्णन कर दिया; अब आप भगवती मनसाका आख्यान सुनिये, जिसे मैंने धर्मदेव मुखसे सुना है ॥ ३८ ॥

वे भगवती कश्यपकी मानसी कन्या हैं तथा वे ३ ९ मनसे ध्यान करनेपर प्रकाशित होती हैं; इसीलिये ' मनसा ' देवी नामसे विख्यात हैं । वे मनसे परब्रह्म परमात्माका ध्यान करती हैं तथा उसी ध्यानयोगके ४० द्वारा प्रकाशित होती हैं, इसीलिये वे देवी ' मनसा'-इस नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ३ ९ -४० ॥ आत्मामें रमण करनेवाली तथा सिद्धयोगिनी उन ४१ | वैष्णवी देवीने तीन युगोंतक तप करके परमात्मा श्रीकृष्णका दर्शन प्राप्त किया । उस समय गोपीपति भगवान् श्रीकृष्णने उनके वस्त्र और शरीरको जीर्ण ४२ देखकर उनका नाम ' जरत्कारु ' रख दिया । कृपानिधि श्रीकृष्णने उन देवीको कृपापूर्वक वाञ्छित वर प्रदान किया । उन प्रभुने उनकी स्वयं पूजा की तथा और ४३ लोगोंसे भी उनकी पूजा करायी॥४१–४३ ॥ ब्रह्मलोकसे लेकर स्वर्गमें, पृथ्वीलोकमें तथा नागलोकमें सर्वत्र ये पूजित होने लगीं । सम्पूर्ण जगत्में ४४ ये अत्यधिक गौरवर्णा, सुन्दरी तथा मनोहारिणी हैं, अतः ये साध्वी ' जगद्गौरी ' – इस नामसे विख्यात होकर पूजित हैं । वे देवी भगवान् शिवकी शिष्या हैं, ४५ इसलिये ' शैवी ' कही गयी हैं । वे सदा भगवान् विष्णुकी परम भक्तिमें संलग्न रहती हैं, इसलिये ' वैष्णवी ' कही गयी हैं ॥ ४४-४५३ ॥ परीक्षित्पुत्र राजा जनमेजयके यज्ञमें उन्होंने ४६ नागोंकी प्राणरक्षा की थी, अतः वे ‘ नागेश्वरी ’ तथा ' नागभगिनी ' नामसे विख्यात हुईं । वे विषका हरण करनेमें समर्थ हैं, अतः ' विषहरी ' कही गयी हैं । ४७ उन्होंने भगवान् शिवसे सिद्धयोग प्राप्त किया था, इसलिये वे ' सिद्धयोगिनी ' कही जाती हैं । साथ ही शिवजीसे उन्होंने महाज्ञान, योग तथा परम ४८ मृतसंजीवनीविद्या प्राप्त की थी, अतः विद्वान् पुरुष उन्हें ' महाज्ञानयुता ' कहते हैं ॥ ४६ – ४८३ ॥