देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 641–650

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

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६३२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ त्रयी त्रिवर्गनिलया तुर्या तुर्यपदात्मिका । तीनोंका धाम होनेसे त्रयी अर्थात् तृतीया हैं । आप तुर्या पञ्चमी पञ्चभूतेशी षष्ठी षष्ठेश्वरीति च ॥ १६ अर्थात् सबसे परे होनेके कारण चतुर्थी भी हैं । आप सप्तमी सप्तवारेशी सप्तसप्तवरप्रदा अष्टमी वसुनाथा च नवग्रहमयीश्वरी नवरागकला रम्या नवसंख्या नवेश्वरी दशमी दशदिक्पूज्या दशाशाव्यापिनी रमा एकादशात्मका चैकादशरुद्रनिषेविता एकादशीतिथिप्रीता एकादशगंणाधिपा द्वादशी द्वादशभुजा द्वादशादित्यजन्मभूः त्रयोदशात्मिका देवी त्रयोदशगणप्रिया त्रयोदशाभिधा भिन्ना विश्वेदेवाधिदेवता चतुर्दशेन्द्रवरदा चतुर्दशमनुप्रसूः पञ्चाधिकदशी वेद्या पञ्चाधिकदशी तिथिः षोडशी षोडशभुजा षोडशेन्दुकलामयी षोडशात्मकचन्द्रांशुव्याप्तदिव्यकलेवरा एवंरूपासि देवेशि निर्गुणे तामसोदये त्वया गृहीतो भगवान्देवदेवो रमापतिः एतौ दुरासदौ दैत्यौ विक्रान्तौ मधुकैटभौ एतयोश्च वधार्थाय देवेशं प्रतिबोधय पंचमहाभूतों ( पृथ्वी, तेज, जल, वायु, आकाश ) - की ईश्वरी होनेके कारण पंचमी और काम - क्रोध - लोभ-। मोह - मद - मत्सर — इन छ: की अधिष्ठात्री होनेके कारण ॥ १७ षष्ठी हैं ॥ १५-१६ ॥ आप रवि आदि सातों वारोंकी ईश्वरी होनेके कारण तथा सात - सात वर प्रदान करनेके कारण । सप्तमी हैं तथा आठ वसुओंकी स्वामिनी होने के ॥ १८ कारण अष्टमी हैं । आप ही नवग्रहमयी ईश्वरी, रम्य की कला तथा नवेश्वरी होनेके कारण नवमी हैं । आप दसों दिशाओंमें व्याप्त रमारूपिणी हैं तथा । दसों दिशाओंमें पूजित होती हैं, अतएव दशमी कही

॥ १ ९ जाती हैं । १७ - १८ ॥

आप एकादश रुद्रद्वारा आराधित हैं, एकादशी तिथिके प्रति आपकी प्रीति है तथा आप ग्यारह । गणोंकी अधीश्वरी हैं; अतः आप एकादशी हैं ॥ १ ९ ॥ ॥ २० आप बारह भुजाओंवाली हैं तथा बारह आदित्योंको जन्म देनेवाली हैं, अतः द्वादशी हैं । आप मलमास-सहित तेरह मासस्वरूपा हैं, तेरह गणोंकी प्रिया हैं । और विश्वेदेवोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं, अतः आप ॥ २१ त्रयोदशी नामसे प्रसिद्ध हैं । आप चौदह इन्द्रोंको वर प्रदान करनेवाली तथा चौदह मनुओंको उत्पन्न करनेवाली हैं, अतएव चतुर्दशी हैं ॥ २०-२१ ॥ । आप पंचदशी अर्थात् कामराज - विद्यारूपा त्रिपुर-॥ २२ सुन्दरीरूपसे जानी जाती हैं तथा आप पंचदशी तिथि-रूपिणी हैं । सोलह भुजाओंवाली, चन्द्रमाकी सोलहवीं कलासे विभूषित तथा चन्द्रमाकी षोडश कलारूपी I किरणोंसे व्याप्त दिव्य विग्रहवाली होनेके कारण आप ॥ २३ षोडशी हैं । हे तमोगुणसे युक्त होकर प्रकट होनेवाली! हे निर्गुणे! हे देवेशि! आप इस प्रकारके विविध रूपवाली हैं ॥ २२-२३ ॥ । देवाधिदेव लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुको आपने ॥ २४ निद्राके वशवर्ती कर रखा है और ये दोनों मधु-कैटभ दानव अत्यन्त पराक्रमी तथा दुर्जेय हैं; अतएव आप इन दोनोंका संहार करनेके लिये देवेश्वर । विष्णुको जगाइये ॥ २४ ॥

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अ ० ११ ] मुनिरुवाच एवं स्तुता भगवती तामसी भगवत्प्रिया ॥

देवदेवं तदा त्यक्त्वा मोहयामास दानवौ ।

तदैव भगवान्विष्णुः परमात्मा जगत्पतिः ॥

प्रबोधमाप देवेशो ददृशे दानवोत्तमौ ।

तदा तौ दानवौ घोरौ दृष्ट्वा तं मधुसूदनम् ॥

युद्धाय कृतसङ्कल्पौ जग्मतुः सन्निधिं हरेः ।

युयुधे च ततस्ताभ्यां भगवान्मधुसूदनः ॥

पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः ।

तौ तदातिबलोन्मत्तौ जगन्मायाविमोहितौ ॥

व्रियतां वर इत्येवमूचतुः परमेश्वरम् ।

एवं तयोर्वचः श्रुत्वा भगवानादिपूरुषः ॥

वव्रे वध्यावुभौ मेऽद्य भवेतामिति निश्चितम् ।

तौ तदातिबलौ देवं पुनरेवोचतुर्हरिम् ॥

आवां जहि न यत्रोर्वी पयसा च परिप्लुता ।

तथेत्युक्त्वा भगवता गदाशङ्खभृता नृप ॥

कृत्वा चक्रेण वै छिन्ने जघने शिरसी तयोः ।

एवं देवी समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता नृप ॥

महाकाली महाराज सर्वयोगेश्वरेश्वरी । महालक्ष्म्यास्तथोत्पत्तिं निशामय महीपते दशम स्कन्ध ६३३ मुनि बोले - [ ब्रह्माजीके ] इस प्रकार स्तुति २५ करनेपर भगवान्‌को प्रिय तमोगुणमयी भगवतीने देवदेव विष्णु शरीरको छोड़कर उन दोनों दानवोंको मोहित कर दिया ॥ २५३ ॥

२६ उसी समय जगन्नाथ, परमात्मा, परमेश्वर भगवान् विष्णु जग गये और उन्होंने दानवोंमें श्रेष्ठ उन दोनों मधु - कैटभको देखा ॥ २६३ ॥

तभी उन दोनों भयंकर दानवोंने मधुसूदन विष्णुको २७ देखकर युद्ध करनेका निश्चय किया और वे भगवान्के पास पहुँच गये ॥ २७३ ॥

तब सर्वव्यापी भगवान् मधुसूदन उन दोनोंके २८ साथ पाँच हजार वर्षोंतक बाहुयुद्ध करते रहे ॥ २८३ ॥

तत्पश्चात् जगन्मायाके द्वारा विमोहित किये गये वे दोनों अत्यधिक बलसे उन्मत्त दानव परमेश्वर २ ९ विष्णुसे कहने लगे - आप [ हम दोनोंसे ] वरदान माँग लीजिये ॥ २ ९ ३ ॥ उन दोनोंकी यह बात सुनकर आदिपुरुष भगवान् ३० विष्णुने यह वर माँगा - तुम दोनों मेरे द्वारा आज ही मार दिये जाओ ॥ ३०३ ॥

इसके बाद अत्यन्त बलशाली उन दोनों दानवोंने ३१ भगवान् श्रीहरिसे पुन: कहा – जिस स्थानपर पृथ्वी जलमें डूबी हुई न हो, वहींपर आप हमारा वध कीजिये ॥ ३१३ ॥

हे राजन्! ‘ वैसा ही होगा ' - यह कहकर गदा ३२ तथा शंख धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने उनके मस्तकोंको अपनी जाँघपर रखकर चक्रसे काट दिया ॥ ३२३ ॥

३३ हे नृप! हे महाराज! इस प्रकार ब्रह्माजी स्तवन करनेपर सभी योगेश्वरोंकी ईश्वरी महाकाली भगवती प्रकट हुई थीं । हे महीपते! अब आप ॥ ३४ । महालक्ष्मीकी उत्पत्तिके विषयमें सुनिये ॥ ३३-३४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे देवीमाहात्म्ये मधुकैटभवधवर्णनं नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

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६३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ अथ द्वादशोऽध्यायः समस्त देवताओंके तेजसे भगवती महिषमर्दिनीका प्राकट्य और उनके द्वारा महिषासुर का वध, शुम्भ निशुम्भका अत्याचार और देवीद्वारा चण्ड - मुण्डसहित शुम्भ निशुम्भका वध मुनिरुवाच

महिषीगर्भसम्भूतो महाबलपराक्रमः ।

देवान्सर्वान्पराजित्य महिषोऽभूज्जगत्प्रभुः ॥

सर्वेषां लोकपालानामधिकारान्महासुरः ।

बलान्निर्जित्य बुभुजे त्रैलोक्यैश्वर्यमद्भुतम् ॥

ततः पराजिताः सर्वे देवा: स्वर्गपरिच्युताः ।

ब्रह्माणं च पुरस्कृत्य ते जग्मुर्लोकमुत्तमम् ॥

यत्रोत्तमौ देवदेवौ संस्थितौ शङ्कराच्युतौ ।

वृत्तान्तं कथयामासुर्महिषस्य दुरात्मनः ॥

देवानां चैव सर्वेषां स्थानानि तरसासुरः ।

विनिर्जित्य स्वयं भुङ्गे बलवीर्यमदोद्धतः ॥

महिषासुरनामासौ दुष्टदैत्योऽमरेश्वरौ ।

वधोपायश्च तस्याशु चिन्त्यतामसुरार्दनौ ॥

एवं श्रुत्वा स भगवान्देवानामार्तियुग्वचः ।

चकार कोपं सुबहुं तथा शङ्करपद्मजौ ॥

एवं कोपयुतस्यास्य हरेरास्यान्महीपते ।

तेजः प्रादुरभूद्दिव्यं सहस्त्रार्कसमद्युति ॥

अथानुक्रमतस्तेजः सर्वेषां त्रिदिवौकसाम् ।

शरीरादुद्भवं प्राप हर्षयद्विबुधाधिपान् ॥

यदभूच्छम्भुजं तेजो मुखमस्योदपद्यत ।

केशा बभूवुर्याम्येन वैष्णवेन च बाहवः ॥

सौम्येन च स्तनौ जातौ माहेन्द्रेण च मध्यमः ।

वारुणेन ततो भूप जोरू सम्बभूवतुः ॥

नितम्बौ तेजसा भूमेः पादौ ब्राह्मेण तेजसा ।

पादाङ्गुल्यो भानवेन वासवेन कराङ्गुलीः ॥

मुनि बोले - [ - [ एक बार ] महिषीके गर्भसे उत्पन्न महान् बलशाली तथा पराक्रमी महिषासुर सभी देवताओंको पराजित करके सम्पूर्ण जगत्का स्वामी हो गया ॥ १ ॥

वह महान् असुर समस्त लोकपालोंके अधिकारोंको २ बलपूर्वक छीनकर तीनों लोकोंके अद्भुत ऐश्वर्यका भोग करने लगा ॥ २ ॥

सभी देवता उससे पराजित होकर स्वर्गसे ३ निष्कासित कर दिये गये । तत्पश्चात् वे ब्रह्माजीको आगे करके उस उत्तम लोकमें पहुँचे, जहाँ देवाधिदेव ४ भगवान् विष्णु तथा शिव विराजमान थे । वे उस दुरात्मा महिषासुरका वृत्तान्त बताने लगे - ॥३-४ ॥ हे देवेश्वरो! बल, वीर्य तथा मदसे उन्मत्त वह ५ महिषासुर नामक दुष्ट दैत्य सभी देवताओंके लोकोंको शीघ्र जीतकर उनपर स्वयं शासन कर रहा है । हे असुरोंका नाश करनेवाले! आप दोनों शीघ्र ही उस ६ महिषासुर के वधका कोई उपाय सोचिये॥५-६ ॥ तब देवताओंकी यह दुःखभरी वाणी सुनकर वे ७ भगवान् विष्णु, शिव तथा पद्मयोनि ब्रह्मा अत्यधिक कुपित हो उठे ॥ ७ ॥

हे महीपते! इस प्रकार कुपित उन भगवान् ८ विष्णुके मुखसे हजारों सूर्योकी कान्तिके समान दिव्य तेज उत्पन्न हुआ ॥८ ॥

इसके पश्चात् क्रमसे इन्द्र आदि सभी देवताओंके ९ शरीरसे उन देवाधिपोंको प्रसन्न करता हुआ तेज निकला ॥ ९ ॥ शिवके शरीरसे जो तेज निकला, उससे

मुख बना, यमराजके तेजसे केश बने तथा विष्णुके १० तेजसे भुजाएँ बनीं ॥ १० ॥

भूप! चन्द्रमा तेजसे दोनों स्तन हुए । इन्द्रके ११ तेजसे कटिप्रदेश, वरुणके तेजसे जंघा और ऊरु उत्पन्न हुए । पृथिवीके तेजसे दोनों नितम्ब, ब्रह्माके तेजसे दोनों चरण, सूर्यके तेजसे पैरोंकी अँगुलियाँ और वसुओंके १२ तेजसे हाथोंकी अँगुलियाँ निर्मित हुईं ॥ ११-१२ ॥

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अ ० १२ ] दशम

कौबेरेण तथा नासा दन्ताः सञ्जज्ञिरे तदा ।

प्राजापत्येनोत्तमेन तेजसा वसुधाधिप ॥ १३

पावकेन च सञ्जातं लोचनत्रितयं शुभम् ।

सान्ध्येन तेजसा जाते भृकुट्यौ तेजसां निधी ॥ १४

कर्णौ वायव्यतो जातौ तेजसो मनुजाधिप ।

सर्वेषां तेजसा देवी जाता महिषमर्दिनी ॥ १५

शूलं ददौ शिवो विष्णुश्चक्रं शङ्खं च पाशभृत् ।

हुताशनो ददौ शक्तिं मारुतश्चापसायकौ ॥ १६

वज्रं महेन्द्रः प्रददौ घण्टां चैरावताद् गजात् ।

कालदण्डं यमो ब्रह्मा चाक्षमालाकमण्डलू ॥ १७

दिवाकरो रश्मिमालां रोमकूपेषु सन्ददौ ।

कालः खड्गं तथा चर्म निर्मलं वसुधाधिप ॥ ९ ८

समुद्रो निर्मलं हारमजरे चाम्बरे नृप ।

चूडामणिं कुण्डले च कटकानि तथाङ्गदे ॥ १ ९

अर्धचन्द्रं निर्मलं च नूपुराणि तथा ददौ ।

ग्रैवेयकं भूषणं च तस्यै देव्यै मुदान्वितः ॥ २०

विश्वकर्मा चोर्मिकाश्च ददौ तस्यै धरापते ।

हिमवान्वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च ॥ २१

पानपात्रं सुरापूर्णं ददौ तस्यै धनाधिपः ।

शेषश्च भगवान्देवो नागहारं ददौ विभुः ॥ २२

अन्यैरशेषविबुधैर्मानिता सा जगन्मयी ।

तां तुष्टुवुर्महादेवीं देवा महिषपीडिताः ॥ २३

नानास्तोत्रैर्महेशानीं जगदुद्भवकारिणीम् ।

तेषां निशम्य देवेशी स्तोत्रं विबुधपूजिता ॥ २४

महिषस्य वधार्थाय महानादं चकार ह ।

तेन नादेन महिषश्चकितोऽभूद्धरापते ॥ २५

आससाद जगद्धात्रीं सर्वसैन्यसमावृतः । स्कन्ध ६३५ हे पृथ्वीपते! कुबेरके तेजसे नासिका और प्रजापतिके उत्कृष्ट तेजसे दाँत उत्पन्न हुए । अग्नि तेजसे शुभकारक तीनों नेत्र उत्पन्न हुए, सन्ध्याके तेजसे कान्तिकी निधिस्वरूपा दोनों भृकुटियाँ उत्पन्न हुईं और वायुके तेजसे दोनों कान उत्पन्न हुए । हे नरेश! इस प्रकार सभी देवताओंके तेजसे भगवती महिषमर्दिनी प्रकट हुईं ॥ १३ – १५ ॥ शिवजीने उन्हें अपना शूल, विष्णुने चक्र, वरुणने शंख, अग्निने शक्ति और वायुने धनुष - बाण प्रदान किये ॥ १६ ॥

इन्द्रने वज्र तथा ऐरावत हाथीका घण्टा,, यमराजने कालदण्ड और ब्रह्माने अक्षमाला तथा कमण्डलु प्रदान किये ॥ १७ ॥

हे पृथ्वीपते! सूर्यने देवीके रोमछिद्रोंमें अपनी रश्मिमालाओंका संचार किया । कालने देवीको तलवार तथा स्वच्छ ढाल दी ॥ १८ ॥

हे राजन्! समुद्रने स्वच्छ हार, कभी जीर्ण न होनेवाले दो वस्त्र, चूड़ामणि, कुण्डल, कटक, बाजूबन्द, विमल अर्धचन्द्र, नूपुर तथा गलेमें धारण किया जानेवाला आभूषण अति प्रसन्न होकर उन भगवतीको प्रदान किये ॥ १ ९ -२० ॥ हे धरणीपते! विश्वकर्माने उन भगवतीको अँगूठियाँ दीं । हिमालयने उन्हें वाहनके रूपमें सिंह तथा विविध प्रकारके रत्न प्रदान किये । धनपति कुबेरने उन्हें सुरासे पूर्ण एक पानपात्र दिया तथा सर्वव्यापी भगवान् शेषनागने उन्हें नागहार प्रदान किया ॥ २१-२२ ॥ इसी प्रकार अन्य समस्त देवताओंने जगन्मयी भगवतीको सम्मानित किया । इसके बाद महिषासुरद्वारा पीडित देवताओंने जगत्की उत्पत्तिकी कारणस्वरूपिणी | उन महेश्वरी महाभगवतीकी अनेक स्तोत्रोंसे स्तुति की ॥२३३ ॥

उन देवताओंकी स्तुति सुनकर देवपूजित सुरेश्वरी महिषासुर के वधके लिये उच्च स्वरसे गर्जना करने लगीं ॥ २४३ ॥

भूपते! महिषासुर उस नादसे चकित हो उठा और अपने सभी सैनिकोंको साथमें लेकर जगद्धात्री भगवतीके पास पहुँचा ॥ २५३ ॥

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६३६ ततः स युयुधे देव्या महिषाख्यो महासुरः शस्त्रास्त्रैर्बहुधा क्षिप्तैः पूरयन्नम्बरान्तरम् । चिक्षुरो ग्रामणीः सेनापतिर्दुर्धरदुर्मुखौ बाष्कलस्ताम्रकश्चैव बिडालवदनोऽपरः । एतैश्चान्यैरसंख्यातैः संग्रामान्तकसन्निभैः

योधैः परिवृतो वीरो महिषो दानवोत्तमः ।

ततः सा कोपताम्राक्षी देवी लोकविमोहिनी ॥

जघान योधान्समरे देवी महिषमाश्रितान् ।

ततस्तेषु हतेष्वेव स दैत्यो रोषमूर्च्छितः ॥

आससाद तदा देवीं तूर्णं मायाविशारदः ।

रूपान्तराणि सम्भेजे मायया दानवेश्वरः ॥

तानि तान्यस्य रूपाणि नाशयामास सा तदा ।

ततोऽन्ते माहिषं रूपं बिभ्राणममरार्दनम् ॥

पाशेन बद्ध्वा सुदृढं छित्त्वा खड्गेन तच्छिरः ।

पातयामास महिषं देवी देवगणान्तकम् ॥

हाहाकृतं ततः शेषं सैन्यं भग्नं दिशो दश ।

तुष्टुवुर्देवदेवेशीं सर्वे देवा: प्रमोदिताः ॥

एवं लक्ष्मीः समुत्पन्ना महिषासुरमर्दिनी ।

राजञ्छृणु सरस्वत्याः प्रादुर्भावो यथाभवत् ॥

एकदा शुम्भनामासीद्दैत्यो मदबलोत्कटः ।

निशुम्भश्चापि तद्भ्राता महाबलपराक्रमः ॥

तेन सम्पीडिता देवाः सर्वे भ्रष्टश्रियो नृप ।

हिमवन्तमथासाद्य देवीं तुष्टुवुरादरात् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ ॥ २६ तत्पश्चात् महिष नामक वह प्रबल दानव अपने द्वारा छोड़े गये विविध शस्त्रास्त्रोंसे सम्पूर्ण आकाश-मण्डलको आच्छादित करते हुए भगवतीके साथ युद्ध ॥ २७ करने लगा ॥ २६३ ॥

प्रधान सेनापति चिक्षुरके अतिरिक्त दुर्धर, दुर्मुख, बाष्कल, ताम्र तथा विडालवदन - इन सभीसे तथा संग्राममें यमराजकी भाँति भयंकर अन्य असंख्य ॥ २८ योद्धाओं से वह दानवश्रेष्ठ पराक्रमी महिषासुर घिरा हुआ था ॥ २७-२८३ ॥ तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखोंवाली उन जगन्मोहिनी २ ९ भगवतीने युद्धभूमिमें महिषासुरके अधीनस्थ मुख्य योद्धाओंको मार डाला ॥ २ ९ ३ ॥ उन योद्धाओंके मारे जानेके अनन्तर परम ३० मायावी वह महिषासुर क्रोधसे मूच्छित होकर देवीके समक्ष शीघ्रतासे आ खड़ा हुआ ॥ ३०३ ॥

वह दानवेन्द्र महिष अपनी मायाके प्रभावसे अनेक प्रकारके रूप धारण कर लेता था; किंतु वे देवी ३१ । उसके उन सभी रूपोंको नष्ट कर डालती थीं ॥ ३१३ ॥

तब अन्तमें महिषका रूप धारण किये हुए उस देवपीडक तथा देवगणोंके लिये यमराजतुल्य ३२ महिषासुरको पाशमें दृढ़तापूर्वक बाँधकर भगवतीने अपने खड्गसे उसका सिर काटकर [ पृथ्वीपर ] गिरा दिया ॥ ३२-३३ ॥ इससे [ दानवी सेनामें ] हाहाकार मच गया और ३३ उसकी शेष सेना दसों दिशाओंमें भाग गयी । समस्त देवगण इससे अति प्रसन्न होकर देवदेवेश्वरी भगवतीकी स्तुति करने लगे ॥ ३४ ॥

३४ महिषासुरका वध करनेवाली देवी महालक्ष्मीका इस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ था । हे राजन्! जिस प्रकार सरस्वतीका आविर्भाव हुआ; अब आप वह वृत्तान्त ३५ सुनिये ॥ ३५ ॥

एक समयकी बात है - अपने मद तथा बलका अहंकार करनेवाला शुम्भ नामक दैत्य था । महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न निशुम्भ नामक उसका एक ३६ | भाई भी था ॥ ३६ ॥

हे नृप! उस शुम्भसे सन्तापित सभी देवता राज्यविहीन होकर हिमालयपर्वतपर जाकर श्रद्धापूर्वक ३७ । भगवतीका स्तवन करने लगे ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 646

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अ ० १२ ] दशम देवा ऊचुः

जय देवेशि भक्तानामार्तिनाशनकोविदे ।

दानवान्तकरूपे त्वमजरामरणेऽनघे ॥ ३८

देवेशि भक्तिसुलभे महाबलपराक्रमे ।

विष्णुशङ्करब्रह्मादिस्वरूपेऽनन्तविक्रमे ॥३ ९

सृष्टिस्थितिकरे नाशकारिके कान्तिदायिनि ।

महाताण्डवसुप्रीते मोददायिनि माधवि ॥ ४०

प्रसीद देवदेवेशि प्रसीद करुणानिधे ।

निशुम्भशुम्भसम्भूतभयापाराम्बुवारिधे ॥ ४१

उद्धरास्मान् प्रपन्नार्तिनाशिके शरणागतान् ।

एवं संस्तुवतां तेषां त्रिदशानां धरापते ॥ ४२

प्रसन्ना गिरिजा प्राह ब्रूत स्तवनकारणम् ।

एतस्मिन्नन्तरे यस्याः कोशरूपात्समुत्थिता ॥ ४३

कौशिकी सा जगत्पूज्या देवान्प्रीत्येदमब्रवीत् ।

प्रसन्नाहं सुरश्रेष्ठाः स्तवेनोत्तमरूपिणी ॥ ४४

व्रियतां वर इत्युक्ते देवाः संवव्रिरे वरम् ।

शुम्भनामावरो भ्राता निशुम्भस्तस्य विश्रुतः ॥ ४५

त्रैलोक्यमोजसाक्रान्तं दैत्येन बलशालिना ।

तद्बधश्चिन्त्यतां देवि दुरात्मा दानवेश्वरः ॥ ४६

बाधते सततं देवि तिरस्कृत्य निजौजसा । देव्युवाच देवशत्रुं पातयिष्ये निशुम्भं शुम्भमेव च ॥ ४७ स्वस्थास्तिष्ठत भद्रं वः कण्टकं नाशयामि वः । स्कन्ध ६३७ देवता बोले- हे भक्तोंका कष्ट दूर करनेमें परम दक्ष देवेश्वरि! हे दानवोंके लिये यमराजस्वरूपिणि! हे जरा - मरणसे रहित! हे अनघे! आपकी जय हो ॥ ३८ ॥

हे देवेश्वरि! हे भक्तिसे प्राप्त होनेवाली! हे महान् बल तथा पराक्रमवाली! हे ब्रह्मा-विष्णु - महेशस्वरूपिणि! हे अनन्त शौर्यशालिनि! हे सृजन तथा पालन करनेवाली! हे संहार करनेवाली! हे कान्तिप्रदे! हे महाताण्डवमें प्रीति रखनेवाली! हे मोददायिके! हे माधवि! हे देवदेवेश्वरि! आप हमपर प्रसन्न होइये । हे करुणानिधे! प्रसन्न होइये । हे शरणमें आये हुए प्राणियोंके दुःखका नाश करनेवाली! शुम्भ तथा निशुम्भसे उत्पन्न महान् भयरूपी अपार समुद्रसे हम शरणागत देवताओंका उद्धार कीजिये ॥ ३ ९ –४१३ ॥ हे महाराज सुरथ! इस प्रकार उन देवताओंके स्तुति करनेपर हिमाद्रितनया पार्वती प्रसन्न हो गयीं और बोलीं- आपलोग इस स्तुतिका उद्देश्य बताइये ॥४२३ ॥

इसी बीच उनके शरीररूपी कोशसे जगद्वन्द्या कौशिकीदेवी प्रकट हुईं और वे बड़ी प्रसन्नतापूर्वक देवताओंसे कहने लगीं ॥ ४३३ ॥

हे सुरश्रेष्ठ! उत्तमस्वरूपिणी मैं आपलोगोंकी स्तुति से प्रसन्न हूँ, अतः आपलोग वर माँग लीजिये । देवीके ऐसा कहनेपर देवताओंने इस प्रकार वर माँगा – शुम्भ नामक एक प्रसिद्ध दानव है तथा निशुम्भ नामवाला उसका एक लघु भ्राता भी है I । उस बलवान् दैत्यने अपने पराक्रमसे तीनों लोकोंको आतंकित कर रखा है । हे देवि! उसके वधका कोई उपाय सोचिये, क्योंकि हे भगवति! वह कुत्सित आत्मावाला दानवेन्द्र शुम्भ अपने बलसे हमें अपमानित करके सदा पीडित करता रहता है ॥ ४४–४६३ ॥ श्रीदेवी बोलीं- मैं देवताओंके शत्रु शुम्भ तथा निशुम्भको मार गिराऊँगी । आपलोग निश्चिन्त रहिये । आपलोगोंका कल्याण होगा । मैं आपलोगोंके कंटकरूप दैत्यका विनाश अभी करती हूँ ॥ ४७३ ॥

पृष्ठ 647

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६३८ इत्युक्त्वा देवदेवेशी देवान्सेन्द्रान्दयामयी जगामादर्शनं सद्यो मिषतां त्रिदिवौकसाम् देवाः समागता हृष्टाः सुवर्णाद्रिगुहां शुभाम्

चण्डमुण्डौ पश्यतःस्म भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः ।

दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं देवीं लोकविमोहिनीम् ॥

कथयामासतू राज्ञे भृत्यौ तौ चण्डमुण्डकौ ।

देव सर्वासुरश्रेष्ठ रत्नभोगार्ह मानद ॥

अपूर्वा कामिनी दृष्टा चावाभ्यां रिपुमर्दन ।

तस्याः सम्भोगयोग्यत्वमस्त्येव तव साम्प्रतम् ॥

तां समानय चार्वङ्गीं भुङ्क्ष्व सौख्यसमन्वितः ।

तादृशी नासुरी नारी न गन्धर्वी न दानवी ॥

न मानवी नापि देवी यादृशी सा मनोहरा ।

एवं भृत्यवचः श्रुत्वा शुम्भः परबलार्दनः ॥

दूतं सम्प्रेषयामास सुग्रीवं नाम दानवम् ।

स दूतस्त्वरितं गत्वा देव्याः सविधमादरात्॥

वृत्तान्तं कथयामास देव्यै शुम्भस्य यद्वचः ।

देवि शुम्भासुरो नाम त्रैलोक्यविजयी प्रभुः ॥

सर्वेषां रत्नवस्तूनां भोक्ता मान्यो दिवौकसाम् ।

तदुक्तं शृणु मे देवि रत्नभोक्ताहमव्ययः ॥

त्वं चापि रत्नभूतासि भज मां चारुलोचने ।

सर्वेषु यानि रत्नानि देवासुरनरेषु च ॥

तानि मय्येव सुभगे भज मां कामजै रसैः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ ॥ ४८ इन्द्रसहित सभी देवताओंसे ऐसा कहकर करुणामयी देवदेवेश्वरी उन देवताओंके देखते - देखते । शीघ्र ही अन्तर्धान हो गयीं ॥ ४८३ ॥

॥ ४ ९ तत्पश्चात् सभी देवता हर्षित होकर सुमेरुपर्वतकी सुन्दर कन्दरामें चले गये । इधर, शुम्भ निशुम्भके चण्ड - मुण्ड नामक दो सेवकोंने [ उन देवीको ] देख लिया ॥ ४ ९ ३ ॥ ५० तब उन दोनों चण्ड - मुण्ड नामवाले दानव-सेवकोंने सम्पूर्ण लोकको मोहित करनेवाली सर्वांगसुन्दरी भगवतीको देखकर अपने राजा शुम्भके पास आकर ५१ उससे कहा ॥५० ॥

हे देव! हे समस्त असुरोंमें श्रेष्ठ! हे रत्नोंका भोग करनेयोग्य! हे मान प्रदान करनेवाले! हे शत्रुदलन! ५२ हम दोनोंने अभी - अभी एक अद्वितीय कामिनी देखी है । उसके साथ भोग करनेयोग्य एकमात्र आप ही हैं । अतएव इसी समय सुन्दर अंगोंवाली उस स्त्रीको ले आइये और सुखपूर्वक उसका भोग कीजिये । जैसी ५३ मनोहर वह स्त्री है, वैसी न कोई असुर - नारी है, न गन्धर्व - नारी, न दानव - नारी, न मानव - नारी और न तो कोई देवनारी ही है ॥ ५१-५३३ ॥ ५४ इस प्रकार अपने सेवककी बात सुनकर शत्रुके बलका मर्दन करनेवाले शुम्भने सुग्रीव नामक दानवको दूतके रूपमें भेजा ॥ ५४३ ॥

उस दूतने तत्काल देवीके पास पहुँचकर शुम्भकी ५५ जो बात थी, उस वृत्तान्तको आदरपूर्वकयथाविधि देवीसे कह दिया ॥ ५५३ ॥

हे देवि! शुम्भ नामक असुर तीनों लोकोंके ५६ विजेता राजा हैं । सभी रत्न - सामग्रियोंका भोग करनेवाले उस शुम्भका सभी देवता भी सम्मान करते हैं ॥ ५६३ ॥

उन्होंने जो कहा है, उसे मुझसे सुनिये - हे ५७ देवि! मैं नित्य सभी रत्नोंका उपभोग करनेवाला हूँ, तुम भी रत्न - स्वरूपा हो, अतएव हे सुलोचने! मेरा वरण कर लो । समस्त देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंके पास जो - जो रत्न थे, वे सब इस समय मेरे पास हैं । ५८ अतएव हे सुभगे! कामजन्य रसोंके द्वारा तुम मेरे साथ भोग करो ॥ ५७-५८३ ॥

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अ ० १२ ] देव्युवाच सत्यं वदसि हे दूत दैत्यराजप्रियङ्करम् ॥ प्रतिज्ञा या मया पूर्वं कृता साप्यनृता कथम् भवेत्तां शृणु मे दूत या प्रतिज्ञा मया कृता यो मे दर्पं विधुनुते यो मे बलमपोहति । यो मे प्रतिबलो भूयात्स एव मम भोगभाक् तत एनां प्रतिज्ञां मे सत्यां कृत्वासुरेश्वरः गृह्णातु पाणिं तरसा तस्याशक्यं किमत्र हि तस्माद् गच्छ महादूत स्वामिनं ब्रूहि चादृतः । प्रतिज्ञां चापि मे सत्यां विधास्यति बलाधिकः एवं वाक्यं महादेव्याः समाकर्ण्य स दानवः कथयामास शुम्भाय देव्या वृत्तान्तमादितः तदाप्रियं दूतवाक्यं शुम्भः श्रुत्वा महाबलः कोपमाहारयामास महान्तं दनुजाधिपः ततो धूम्राक्षनामानं दैत्यं दैत्यपतिः प्रभुः आदिदेश शृणु वचो धूम्राक्ष मम चादृतः तां दुष्टां केशपाशेषु धृत्वाप्यानीयतां मम समीपमविलम्बेन शीघ्रं गच्छस्व मे पुरः इत्यादेशं समासाद्य दैत्येशो धूम्रलोचनः षष्ट्यासुराणां सहितः सहस्राणां महाबलः तुहिनाचलमासाद्य देव्याः सविधमेव सः उच्चैर्देवीं जगादाशु भज दैत्यपतिं शुभे शुम्भं नाम महावीर्यं सर्वभोगानवाप्नुहि नोचेत्केशान्गृहीत्वा त्वां नेष्ये दैत्यपतिं प्रति इत्युक्ता सा ततो देवी दैत्येन त्रिदशारिणा उवाच दैत्य यद् ब्रूषे तत्सत्यं ते महाबल राजा शुम्भासुरस्त्वं च किं करिष्यसि तद्वद दशम स्कन्ध ६३ ९ देवी बोलीं- हे दूत! तुम दैत्यराज शुम्भके ५ ९ लिये प्रियकर तथा सत्य बात कह रहे हो, किंतु मैंने पूर्वकालमें जो प्रतिज्ञा की है, वह भी मिथ्या कैसे हो । सकती है? हे दूत! मैंने जो प्रतिज्ञा की है, उसे तुम ॥ ६० | सुनो ॥ ५ ९ -६० ॥ जो मेरा अभिमान चूर कर देगा, जो मेरे बलको निष्प्रभावी बना देगा तथा मेरे समान बलशाली ॥ ६१ होगा, वही मेरे साथ भोग करनेका अधिकारी हो । सकता है ॥ ६१ ॥

॥ ६२ अतएव वह असुराधिपति मेरी इस प्रतिज्ञाको सत्य सिद्ध करके तत्काल मेरा पाणिग्रहण कर ले | इस लोकमें ऐसा क्या है, जिसे वह नहीं कर सकता? ॥ ६२ ॥

॥ ६३ इसलिये हे महादूत! तुम जाओ और अपने स्वामीसे आदरपूर्वक यह बात कहो । वह अत्यधिक बलवान् । शुम्भ मेरी प्रतिज्ञाको अवश्य सत्य सिद्ध कर देगा ॥ ६३ ॥

॥ ६४ महादेवीका यह वचन सुनकर उस दानव -दूतने - त आरम्भसे लेकर अन्ततक देवीका वृत्तान्त शुम्भसे कह । दिया ॥ ६४ ॥

॥ ६५ तब दूतकी अप्रिय बात सुनकर महाबली दानवराज । शुम्भ अत्यधिक कुपित हो उठा ॥ ६५ ॥

तत्पश्चात् उस दानवपति बलशाली शुम्भने ॥ ६६ धूम्राक्ष नामक दैत्यको आदेश दिया - हे धूम्राक्ष! । सावधान होकर मेरी बात सुनो । तुम उस दुष्टाको

उसके केशपाश पकड़कर मेरे पास शीघ्र ले आओ ।

॥ ६७

अब तुम मेरे सामनेसे शीघ्र चले जाओ ॥ ६६-६७ ॥

। ऐसा आदेश प्राप्तकर वह महाबली दैत्येश ॥ ६८ धूम्रलोचन साठ हजार असुरोंके साथ चल पड़ा और शीघ्र ही देवीके पास हिमालयपर्वतपर पहुँचकर उसने । उच्च स्वरमें देवीसे कहा - हे कल्याणि! तुम शीघ्र ही ॥ ६ ९ महान् पराक्रमी शुम्भ नामक दैत्यपतिका वरण कर लो और सभी प्रकारके सुखोपभोग प्राप्त करो अन्यथा । तुम्हारे केश पकड़कर मैं तुम्हें दैत्यराजके पास ले ॥ ७० चलूँगा ॥ ६८–७० ॥ । देवशत्रु दैत्यके ऐसा कहनेपर उन भगवतीने कहा- हे महाबली दैत्य! यह जो तुम बोल रहे हो, ॥ ७१ वह तो ठीक है, किंतु यह बताओ कि तुम्हारे राजा । शुम्भासुर तथा तुम मेरा क्या कर लोगे? ॥ ७१ ॥

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६४० इत्युक्तो दैत्यपोऽधावत्तूर्णं शस्त्रसमन्वितः

भस्मसात्तं चकाराशु हुङ्कारेण महेश्वरी ।

ततः सैन्यं वाहनेन देव्या भग्नं महीपते ॥

दिशो दशाभजच्छीघ्रं हाहाभूतमचेतनम् ।

तद्वृत्तान्तं समाश्रुत्य स शुम्भो दैत्यराड् विभुः ॥

चुकोप च महाकोपाद् भ्रुकुटीकुटिलाननः ।

ततः कोपपरीतात्मा दैत्यराजः प्रतापवान् ॥

चण्डं मुण्डं रक्तबीजं क्रमतः प्रेषयद्विभुः ।

ते च गत्वा त्रयो दैत्या विक्रान्ता बहुविक्रमाः ॥

देवीं ग्रहीतुमारब्धयत्नास्ते ह्यभवन्बलात् ।

तानापतत एवासौ जगद्धात्री मदोत्कटा ॥

शूलं गृहीत्वा वेगेन पातयामास भूतले ।

ससैन्यान्निहताञ्छ्रुत्वा दैत्यांस्त्रीन्दानवेश्वरौ ॥

शुम्भश्चैव निशुम्भश्च समाजग्मतुरोजसा ।

निशुम्भश्चैव शुम्भश्च कृत्वा युद्धं महोत्कटम् ॥

देव्याश्च वशगौ जातौ निहतौ च तयासुरौ ।

इति दैत्यवरं शुम्भं घातयित्वा जगन्मयी ॥

विबुधैः संस्तुता तद्वत्साक्षाद्वागीश्वरी परा ।

एवं ते वर्णितो राजन् प्रादुर्भावोऽतिरम्यकः ॥

काल्याश्चैव महालक्ष्म्याः सरस्वत्याः क्रमेण च ।

परा परेश्वरी देवी जगत्सर्गं करोति च ॥

पालनं चैव संहारं सैव देवी दधाति हि ।

तां समाश्रय देवेशीं जगन्मोहनिवारिणीम् ॥

महामायां पूज्यतमां सा कार्यं ते विधास्यति । श्रीनारायण उवाच इति राजा वचः श्रुत्वा मुनेः परमशोभनम् ॥

देवीं जगाम शरणं सर्वकामफलप्रदाम् ।

निराहारो यतात्मा च तन्मनाश्च समाहितः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ ॥ ७२ देवीके ऐसा कहनेपर वह दैत्य सेनापति धूम्राक्ष शस्त्र लेकर बड़ी तेजीसे देवीकी ओर दौड़ा, किंतु महेश्वरीने अपने हुंकारमात्रसे उसे तत्क्षण भस्म कर ७३ दिया ॥ ७२३ ॥

हे महीपते! देवीका वाहन सिंह भी दैत्यसेनाको नष्ट करने लगा । सम्पूर्ण सेना हाहाकार मचाती हुई ७४ बेसुध होकर दसों दिशाओंमें तेजीसे तितर - बितर हो गयी ॥ ७३३ ॥

७५ दैत्यराज पराक्रमी शुम्भ यह वृत्तान्त सुनकर बड़ा कुपित हुआ और अत्यन्त क्रोधपूर्वक उसकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं । उस प्रतापी दैत्यराजने कोपाविष्ट ७६ होकर क्रमशः चण्ड मुण्ड तथा रक्तबीज [ नामक दैत्यों ] - को भेजा । वे तीनों बलशाली और क्रूर दैत्य वहाँ जाकर बलपूर्वक देवीको पकड़नेका यत्न करने ७७ लगे । तब मदोन्मत्त होकर जगदम्बा शूल लेकर वेगपूर्वक उनकी ओर दौड़ीं और उन्होंने उन्हें ७८ धराशायी कर दिया ॥ ७४–७७३ ॥ उन तीनों दैत्योंको सेनासहित मारा गया सुनकर दानवराज शुम्भ और निशुम्भ तेजीसे वहाँ आ पहुँचे । ७ ९ | देवीके साथ भयंकर युद्ध करनेके अनन्तर वे दोनों असुर उनके अधीन हो गये और अन्तमें उनके द्वारा मार डाले गये॥७८-७९ ३ ॥ ८० तत्पश्चात् दैत्यश्रेष्ठ शुम्भका वध करके वे साक्षात् वागीश्वरी पराम्बा जगन्मयी सरस्वती भगवती ८१ महालक्ष्मीकी भाँति देवताओंके द्वारा स्तुत हुईं ॥ ८०३ ॥

हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे क्रमश: काली, महालक्ष्मी तथा सरस्वतीके अत्यन्त सुन्दर प्रादुर्भावका ८२ | वर्णन कर दिया ॥ ८१३ ॥

वे ही परमा परमेश्वरी भगवती समस्त जगत्की रचना करती हैं और वे ही देवी पालन तथा संहारकार्य ८३ भी सम्पादित करती हैं । [ हे राजन्! ] आप सांसारिक मोहको दूर करनेवाली उन्हीं पूज्यतमा महामाया देवेश्वरीका आश्रय लीजिये; वे ही आपका कार्य ८४ सिद्ध करेंगी ॥ ८२-८३३३ ॥ श्रीनारायण बोले- मुनि ( सुमेधा ) - की यह परम सुन्दर बात सुनकर राजा सुरथ सभी वांछित फल ८५ । प्रदान करनेवाली भगवतीकी शरण में गये । निराहार

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अ ० १३ ]

देवीमूर्तिं मृण्मयीं च पूजयामास भक्तितः ।

पूजनान्ते बलिं तस्यै निजगात्रासृजं ददत् ॥

तदा प्रसन्ना देवेशी जगद्योनिः कृपावती ।

प्रादुर्बभूव पुरतो वरं ब्रूहीति भाषिणी ॥

स राजा निजमोहस्य नाशनं ज्ञानमुत्तमम् ।

राज्यं निष्कण्टकं चैव याचति स्म महेश्वरीम् ॥

देव्युवाच

राजन्निष्कण्टकं राज्यं ज्ञानं वै मोहनाशनम् ।

भविष्यति मया दत्तमस्मिन्नेव भवे तव ॥

अन्यच्च शृणु भूपाल जन्मान्तरविचेष्टितम् ।

भानोर्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता भवान् ॥

तत्र मन्वन्तरस्यापि पतित्वं बहुविक्रमम् ।

सन्ततिं बहुलां चापि प्राप्स्यते मद्वराद्भवान् ॥

एवं दत्त्वा वरं देवी जगामादर्शनं तदा ।

सोऽपि देव्याः प्रसादेन जातो मन्वन्तराधिपः ॥

एवं ते वर्णितं साधो सावर्णेर्जन्म कर्म च ।

एतत्पठंस्तथा शृण्वन्देव्यनुग्रहमाप्नुयात् ॥

दशम स्कन्ध ६४१ रहते हुए एकाग्रचित्त होकर संयत आत्मावाले वे राजा ८६ सुरथ तन्मनस्क होकर देवीकी पार्थिव मूर्तिकी भक्तिपूर्वक पूजा करने लगे । पूजाकी समाप्तिपर उन्होंने देवीको अपने शरीरके रक्तसे बलि प्रदान किया ॥ ८४–८६ ॥ ८७ तब दयामयी जगन्माता देवेश्वरी प्रसन्न होकर उनके समक्ष प्रकट हो गयीं और कहने लगीं - वर माँगो । इसपर उन राजा सुरथने महेश्वरीसे अपने ८८ मोहका नाश करनेवाले उत्तम ज्ञान तथा निष्कंटक राज्यकी याचना की ॥ ८७-८८ ॥ देवी बोलीं- हे राजन्! मैं आपको वर प्रदान करती हूँ कि इसी जन्ममें आपको निष्कंटक राज्य ८ ९ तथा मोहका नाश करनेवाला ज्ञान प्राप्त होगा । हे भूपाल! अब आप अपने दूसरे जन्मके विषयमें सुनिये । आप उस जन्ममें सूर्यके अंशसे जन्म लेकर ९ ० सावर्णि मनु होंगे । मेरे वरदानसे आप उस जन्ममें भी मन्वन्तरका स्वामित्व, अत्यधिक पराक्रम तथा बहुत-सी सन्तानें प्राप्त करेंगे ॥ ८ ९ - ९ १ ॥ ९ १ ऐसा वर देकर भगवती उसी समय अन्तर्धान हो गयीं । वे राजा सुरथ भी देवीके अनुग्रहसे मन्वन्तरके अधिपति हो गये ॥९ २ ॥ ९ २ हे साधो! इस प्रकार मैंने सावर्णि मनुके जन्म तथा कर्मका वर्णन कर दिया । इसको पढ़ने तथा सुननेवाला व्यक्ति भगवतीकी कृपा प्राप्त कर ९ ३ | लेता है ॥ ९ ३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे देवीचरित्रसहितं सावर्णिमनुवृत्तान्तवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः मनुपुत्रोंकी तपस्या, भगवतीका उन्हें मन्वन्तराधिपति होनेका वरदान देना, दैत्यराज अरुणकी तपस्या और ब्रह्माजीका वरदान, देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति और भगवतीका भ्रामरीके रूपमें अवतार लेकर अरुणका वध करना श्रीनारायण उवाच श्रीनारायण बोले- - — [ | हे नारद! ] इसके बाद अथातः श्रूयतां शेषमनूनां चित्रमुद्भवम् । अब आप शेष मनुओंकी अद्भुत उत्पत्तिके विषयमें सुनिये, जिसके स्मरणमात्रसे देवीभक्ति उत्पन्न हो यस्य स्मरणमात्रेण देवीभक्तिः प्रजायते ॥ १ जाती है ॥ १ ॥

1898 श्रीमद्देवी... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –21 A