देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 631–640
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640
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६२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
कालराज महाबाहो भक्तानां भयहारक ।
कथं दूरयसे पुर्याः काशीपुर्यास्त्वमीश्वरः ॥
त्वं काशीवासविघ्नानां नाशको भक्तरक्षकः ।
मां किं दूरयसे स्वामिन् भक्तार्तिविनिवारक ॥
परापवादो नोक्तो मे न पैशुन्यं न चानृतम् ।
केन कर्मविपाकेन काश्या दूरं करोषि माम् ॥
एवं प्रार्थ्य च तं कालनाथं कुम्भोद्भवो मुनिः ।
जगाम साक्षिविघ्नेशं सर्वविघ्ननिवारणम् ॥
तं दृष्ट्वाभ्यर्च्य सम्प्रार्थ्य ततः पुर्या विनिर्गतः ।
लोपामुद्रापतिः श्रीमानगस्त्यो दक्षिणां दिशम् ॥
काशीविरहसन्तप्तो महाभाग्यनिधिर्मुनिः ।
संस्मृत्यानुक्षणं काशीं जगाम सह भार्यया ॥
तपोयानमिवारुह्य निमिषार्धेन वै मुनिः ।
अग्रे ददर्श तं विन्ध्यं रुद्धाम्बरमथोन्नतम् ॥
चकम्पे चाचलस्तूर्णं दृष्ट्वैवाग्रे स्थितं मुनिम् ।
गिरिः खर्वतरो भूत्वा विवक्षुरवनीमिव ॥
दण्डवत्पतितो भूमौ साष्टाङ्गं भक्तिभावितः ।
तं दृष्ट्वा नम्रशिखरं विन्ध्यं नाम महागिरिम् ॥
प्रसन्नवदनोऽगस्त्यो मुनिर्विन्ध्यमथाब्रवीत् ।
वत्सैवं तिष्ठ तावत्त्वं यावदागम्यते मया ॥
अशक्तोऽहं गण्डशैलारोहणे तव पुत्रक ।
एवमुक्त्वा मुनिर्याम्यदिशं प्रति गमोत्सुकः ॥
आरुह्य तस्य शिखराण्यवारुहदनुक्रमात् ।
गतो याम्यदिशं चापि श्रीशैलं प्रेक्ष्य वर्त्मनि ॥
मलयाचलमासाद्य तत्राश्रमपरोऽभवत् । [ वहाँ पहुँचकर वे कहने लगे- ] हे भक्तोंका भय दूर करनेवाले महाबाहो कालराज! आप काशीपुरीके ९ अधिपति हैं, मुझे इस पुरीसे दूर क्यों कर रहे हैं? ॥ ९ ॥ आप तो काशीमें निवास करनेवाले प्राणियोंकी
बाधाओंका नाश करनेवाले तथा भक्तजनोंके रक्षक हैं, १० तो फिर हे भक्तोंका दुःख दूर करनेवाले स्वामिन्! मुझे क्यों दूर कर रहे हैं? ॥ १० ॥ मैंने दूसरोंके लिये कभी
निन्दित वचन नहीं कहा, चुगली नहीं की तथा मिथ्या-११ भाषण नहीं किया, तो मेरे किस कर्मके परिणामस्वरूप आप मुझे काशीसे दूर कर रहे हैं? ॥ ११ ॥
उन कालभैरवसे ऐसी प्रार्थना करके कुम्भयोनि १२ अगस्त्यमुनि समस्त विघ्नोंका नाश करनेवाले साक्षीविनायकके पास गये ॥१२ ॥
उन साक्षीविनायकका दर्शन, पूजन तथा स्तवन १३ करके लोपामुद्रापति श्रीमान् अगस्त्य उस पुरीसे दक्षिण दिशाकी ओर निकल पड़े ॥ १३ ॥
काशीत्यागसे सन्तप्त महान् भाग्यशाली १४ अगस्त्यमुनि प्रतिक्षण काशीका स्मरण करते हुए अपने तपोबलरूपी विमानपर चढ़कर अपनी भार्याके साथ आधे निमेषमें ही वहाँ पहुँच गये और मुनिने १५ देखा कि सामने विन्ध्यगिरिने अत्यन्त ऊँचे उठकर आकाशको आच्छादित कर रखा है ॥ १४-१५ ॥ मुनिको समक्ष उपस्थित देखकर विन्ध्यपर्वत तेजीसे १६ काँपने लगा । वह पर्वत पूर्णरूपसे अभिमानरहित होकर कुछ कहने के विचारसे उनके सम्मुख पृथ्वीकी भाँति विनयावनत हो भक्ति - भावनासे युक्त होकर दण्डकी १७ भाँति भूमिपर गिरकर साष्टांग प्रणाम करने लगा ॥ १६३ ॥
तब उस विन्ध्य नामक महागिरिको उस समय नम्र शिखरवाला देखकर प्रसन्न मुखवाले अगस्त्यमुनिने १८ विन्ध्याचलसे कहा- हे वत्स! जबतक मैं लौटकर आता हूँ तबतक तुम इसी प्रकार स्थित रहो; क्योंकि हे पुत्र! मैं तुम्हारे उच्च शिखरपर चढ़नेमें असमर्थ हूँ ॥ १७ - १८३ ॥ १ ९ इस प्रकार कहकर दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करने की इच्छावाले अगस्त्यमुनि उस विन्ध्यके शिखरों पर चढ़कर क्रमशः नीचे पृथ्वीपर उतर आये और वहाँसे २० दक्षिण दिशाकी ओर चल पड़े । मार्गमें श्रीशैलका अवलोकन करते हुए मलयाचलपर आकर आश्रममें निवास करने लगे ॥ १ ९ -२०३ ॥
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अ ०८ ] दशम सापि देवी तत्र विन्ध्यमागता मनुपूजिता ॥ २१ लोकेषु प्रथिता विन्ध्यवासिनीति च शौनक । सूत उवाच एतच्चरित्रं परमं शत्रुनाशनमुत्तमम् ॥ २२
अगस्त्यविन्ध्यनगयोराख्यानं पापनाशनम् ।
राज्ञां विजयदं तच्च द्विजानां ज्ञानवर्धनम् ॥ २३
वैश्यानां धान्यधनदं शूद्राणां सुखदं तथा ।
धर्मार्थी धर्ममाप्नोति धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥ २४
कामानवाप्नुयात्कामी भक्त्या चास्य सकृच्छ्रवात् ।
एवं स्वायम्भुवमनुर्देवीमाराध्य भक्तितः ॥ २५
लेभे राज्यं धरायाश्च निजमन्वन्तराश्रयम् ।
इत्येतद्वर्णितं सौम्य मया मन्वन्तराश्रितम् ।
आद्यं चरित्रं श्रीदेव्याः किं पुनः कथयामि ते ॥ २६
स्कन्ध ६२३ मनुके द्वारा पूजित वे भगवती भी वहीं विन्ध्यगिरिपर आ गयीं । हे शौनक! वे ही देवी समस्त लोकोंमें विन्ध्यवासिनी नामसे विख्यात हो गयीं ॥ २१३ ॥
सूतजी बोले - हे मुनियो! इन देवीका चरित्र परम पावन तथा शत्रुओंका नाश करनेवाला है । अगस्त्य तथा विन्ध्यगिरिका यह उपाख्यान समस्त पापों को नष्ट कर देनेवाला है । यह आख्यान राजाओंको विजय दिलाता है तथा द्विजोंके ज्ञानकी वृद्धि करता है । यह वैश्योंके लिये धन - धान्यदायक तथा शूद्रोंके लिये सुखप्रद है । इस आख्यानके भक्तिपूर्वक एक बार श्रवण करनेसे धर्म चाहनेवाला धर्म प्राप्त करता है, | धनकी अभिलाषा रखनेवाला धन प्राप्त कर लेता है और सकाम पुरुष अपने सभी मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है | २२ - २४३ ॥ इस प्रकार स्वायम्भुव मनुने भक्तिपूर्वक देवीकी आराधना करके अपने मन्वन्तरपर्यन्त पृथ्वीका राज्य प्राप्त किया । हे सौम्य! मन्वन्तरसे सम्बन्ध रखनेवाले भगवती श्रीदेवीके इस आद्य चरित्रका वर्णन मैंने कर दिया; अब आगे किस प्रसंगका वर्णन आपसे | करूँ? ॥ २५-२६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे विन्ध्यवृद्ध्यवरोधवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः स्वारोचिष, उत्तम, तामस शौनक उवाच
आद्यो मन्वन्तरः प्रोक्तो भवता चायमुत्तमः ।
अन्येषामुद्भवं ब्रूहि मनूनां दिव्यतेजसाम् ॥
सूत उवाच
एवमाद्यस्य चोत्पत्तिं श्रुत्वा स्वायम्भुवस्य हि ।
अन्येषां क्रमशस्तेषां सम्भूतिं परिपृच्छति ॥।
नारदः परमो ज्ञानी देवीतत्त्वार्थकोविदः । नारद उवाच मनूनां मे समाख्याहि सूत्पत्तिं च सनातन ॥ और रैवत नामक मनुओंका वर्णन शौनकजी बोले – [ हे सूतजी! ] यह तो आपने आदिमन्वन्तरका उत्तम उपाख्यान कहा, अब १ दिव्य तेजवाले अन्य मनुओंकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये ॥१ ॥
सूतजी बोले- इसी प्रकार भगवतीके तात्त्विक रहस्योंको पूर्णरूपेण जाननेवाले परम ज्ञानी देवर्षि २ नारदजीने भी आद्य स्वायम्भुव मनुकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनकर क्रमशः अन्य मनुओंके प्रादुर्भावके विषयमें भगवान् नारायणसे पूछा था ॥ २३ ॥
नारदजी बोले - हे सनातन! मनुओंकी उत्तम ३ उत्पत्तिके विषयमें मुझे भलीभाँति बताइये ॥ ३ ॥
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६२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ श्रीनारायण उवाच
प्रथमोऽयं मनुः स्वायम्भुव उक्तो महामुने ।
देव्याराधनतो येन प्राप्तं राज्यमकण्टकम् ॥
प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुपुत्रौ महौजसौ ।
राज्यपालनकर्तारौ विख्यातौ वसुधातले ॥
द्वितीयश्च मनुः स्वारोचिष उक्तो मनीषिभिः ।
प्रियव्रतसुतः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥
स स्वारोचिषनामापि कालिन्दीकूलतो मनुः ।
निवासं कल्पयामास सर्वसत्त्वप्रियङ्करः ॥
जीर्णपत्राशनो भूत्वा तपः कर्तुमनुव्रतः ।
देव्या मूर्तिं मृण्मयीं च पूजयामास भक्तितः ॥
एवं द्वादश वर्षाणि वनस्थस्य तपस्यतः ।
देवी प्रादुरभूत्तात सहस्त्रार्कसमद्युतिः ॥
ततः प्रसन्ना देवेशी स्तवराजेन सुव्रता ।
ददौ स्वारोचिषायैव सर्वमन्वन्तराश्रयम् ॥
आधिपत्यं जगद्धात्री तारिणीति प्रथामगात् ।
एवं स्वारोचिषमनुस्तारिण्याराधनात्ततः ॥
आधिपत्यं च लेभे स सर्वारातिविवर्जितम् ।
धर्मं संस्थाप्य विधिवद्राज्यं पुत्रैः समं विभुः ॥
भुक्त्वा जगाम स्वर्लोकं निजमन्वन्तराश्रयात् ।
तृतीय उत्तमो नाम प्रियव्रतसुतो मनुः ॥
गङ्गाकूले तपस्तप्त्वा वाग्भवं सञ्जपन् रहः ।
वर्षाणि त्रीण्युपवसन् देव्यनुग्रहमाविशत् ॥
स्तुत्वा देवीं स्तोत्रवरैर्भक्तिभावितमानसः ।
राज्यं निष्कण्टकं लेभे सन्ततिं चिरकालिकीम् ॥
श्रीनारायण बोले- हे महामुने! मैंने इन आद्य स्वायम्भुव मनुका वर्णन कर दिया, जिन्होंने देवीकी उपासनासे निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया । उन मनुके ४ प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामक महान् तेजस्वी दो पुत्र हुए । राज्यका भलीभाँति पालन करनेवाले वे दोनों भूलोक में अति प्रसिद्ध हुए॥४-५ ॥ ५ विद्वानोंने स्वारोचिष मनुको द्वितीय मनु कहा है । अमित पराक्रमवाले वे श्रीमान् स्वारोचिष मनु राजा प्रियव्रतके पुत्र थे ॥ ६ ॥
६ सभी प्राणियोंका हित करनेवाले वे स्वारोचिष नामक मनु यमुनाके तटपर निवास करने लगे । वे सूखे पत्तोंके आहारपर रहकर एक महान् व्रतीके रूपमें ७ तपस्या करनेमें संलग्न हो गये और भगवतीकी मृण्मयी मूर्ति बनाकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करने लगे ॥ ७-८ ॥ ८ हे तात! इस प्रकार वनमें रहकर बारह वर्षोंतक तपस्या करनेवाले उन मनुके समक्ष हजारों सूर्योंके समान तेजवाली देवी प्रकट हो गयीं ॥ ९ ॥
९ तत्पश्चात् उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उन देवेश्वरीने उस स्तवराजसे प्रसन्न होकर स्वारोचिष मनुको सम्पूर्ण मन्वन्तरका आधिपत्य प्रदान कर दिया । १० उसी समयसे भगवती जगद्धात्रीको तारिणी मानकर उनकी उपासना करनेकी प्रथा चल पड़ी ॥ १०३ ॥
इस प्रकार स्वारोचिष मनुने उन तारिणीदेवीकी ११ | उपासना से समस्त शत्रुओंसे रहित राज्य प्राप्त कर लिया । इसके अनन्तर वे ऐश्वर्यसम्पन्न मनु विधिपूर्वक धर्मकी स्थापना करके पुत्रोंके साथ अपना राज्य १२ भोगकर अन्तमें अपने मन्वन्तरका अधिकार त्यागकर स्वर्गलोक चले गये ॥ ११-१२३ ॥ इसके बाद प्रियव्रतके उत्तम नामक पुत्र १३ तृतीय मनु हुए । उन्होंने गंगाके तटपर रहकर एकान्तमें निरन्तर भगवतीके वाग्भव मन्त्रका जप करते हुए तीन वर्षोंतक तप करके देवीका अनुग्रह १४ प्राप्त किया ॥ १३-१४ ॥ भक्तिपूर्ण मनसे उत्तम स्तोत्रोंके द्वारा भगवतीकी स्तुति करके उन्होंने निष्कंटक राज्य तथा दीर्घजीवी १५ सन्तान प्राप्त की ॥ १५ ॥
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अ ० ९ ]
राज्योत्थान्यानि सौख्यानि भुक्त्वा धर्मान्युगस्य च ।
सोऽप्याजगाम पदवीं राजर्षिवरभाविताम् ॥
चतुर्थस्तामसो नाम प्रियव्रतसुतो मनुः ।
नर्मदादक्षिणे कूले समाराध्य जगन्मयीम् ॥
महेश्वरीं कामराजकूटजापपरायणः ।
वासन्ते शारदे काले नवरात्रसपर्यया ॥
तोषयामास देवेश जलजाक्षीमनूपमाम् ।
तस्याः प्रसादमासाद्य नत्वा स्तोत्रैरनुत्तमैः ॥
अकण्टकं महद्राज्यं बुभुजे गतसाध्वसः ।
पुत्रान्बलोद्धताञ्छूरान्दश वीर्यनिकेतनान् ॥
उत्पाद्य निजभार्यायां जगामाम्बरमुत्तमम् ।
पञ्चमो मनुराख्यातो रैवतस्तामसानुजः ॥
कालिन्दीकूलमाश्रित्य जजाप कामसंज्ञकम् ।
बीजं परमवाग्दर्पदायकं साधकाश्रयम् ॥
एतदाराधनादाप स्वाराज्यर्द्धिमनुत्तमाम् ।
बलमप्रहतं लोके सर्वसिद्धिविधायकम् ॥
सन्ततिं चिरकालीनां पुत्रपौत्रमयीं शुभाम् ।
धर्मान्व्यस्य व्यवस्थाप्य विषयानुपभुज्य च ।
जगामाप्रतिमः शूरो महेन्द्रालयमुत्तमम् ॥
दशम स्कन्ध ६२५ राज्यसे प्राप्त होनेवाले सुखोंका भोग करके १६ तथा युग - धर्मों का पालन करके वे अन्य श्रेष्ठ राजर्षियोंद्वारा प्राप्त पदपर पहुँच गये ॥ १६ ॥
तामस नामवाले चौथे मनु प्रियव्रतके पुत्र थे १७ नर्मदा नदीके दक्षिणी तटपर गुह्य कामबीज मन्त्रका सतत जप करते हुए उन्होंने जगद्व्यापिनी महेश्वरीकी आराधना की । चैत्र तथा आश्विनमासके नवरात्रमें १८ उपासनाके द्वारा उन्होंने कमलके समान नेत्रोंवाली अनुपमेय देवेश्वरीको सन्तुष्ट किया । १७ - १८३ ॥ अति श्रेष्ठ स्तोत्रोंसे देवीका स्तवन करके उनकी १ ९ कृपा प्राप्तकर तामस मनुने नि: शंक होकर निष्कण्टक विशाल राज्यका भोग किया ॥ १ ९ ३ ॥ अपनी भार्यासे दस ओजस्वी, शक्तिशाली तथा पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करके वे उत्तम लोकको प्राप्त २० हुए ॥ २०३ ॥
तामस मनुके अनुज रैवतको पाँचवाँ मनु कहा गया है । यमुनाके तटपर रहकर उन्होंने परम वाक्-२१ शक्ति तथा प्रतिष्ठा प्रदान करनेवाले एवं साधकोंके लिये आश्रयस्वरूप कामबीजसंज्ञक मन्त्रका जप किया ॥ २१-२२ ॥ २२ भगवतीकी इस आराधनासे उन्होंने उत्तम समृद्धिसे सम्पन्न अपना राज्य तथा जगत्में सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला अप्रतिहत बल प्राप्त कर २३ लिया । उन्होंने शुभ तथा पुत्र - पौत्रसे सम्पन्न सन्तति प्राप्त की । पुनः लोकमें धर्मकी स्थापना करके, राज्यकी व्यवस्था करके तथा राज्य - सुख भोगकर अप्रतिम शूर उन रैवत मनुने उत्तम इन्द्रपुरीके लिये २४ | प्रस्थान किया ॥ २३-२४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां दशमस्कन्धे मनूत्पत्तिवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः चाक्षुष मनुकी कथा, उनके द्वारा देवीकी आराधनाका वर्णन श्रीनारायण उवाच श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] अब आप अथातः श्रूयतां चित्रं देवीमाहात्म्यमुत्तमम् । जगदम्बाका अद्भुत तथा उत्तम माहात्म्य और अंगके पुत्र मनुने जिस तरहसे श्रेष्ठ राज्य प्राप्त किया था,
अङ्गपुत्रेण मनुना यथाप्तं राज्यमुत्तमम् ॥ १ । उसे सुनिये ॥ १ ॥
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६२६ अङ्गस्य राज्ञः पुत्रोऽभूच्चाक्षुषो मनुरुत्तमः । षष्ठः सुपुलहं नाम ब्रह्मर्षिं शरणं गतः
ब्रह्मर्षे त्वामहं प्राप्तः शरणं प्रणतार्तिहन् ।
शाधि मां किङ्करं स्वामिन् येनाहं प्राप्नुयां श्रियम् ॥
मेदिन्याश्चाधिपत्यं मे स्याद्यथावदखण्डितम् ।
अव्याहतं भुजबलं शस्त्रास्त्रनिपुणं क्षमम् ॥
सन्ततिश्चिरकालीनाप्यखण्डं वय उत्तमम् ।
अन्तेऽपवर्गलाभश्च स्यात्तथोपदिशाद्य मे ॥
इत्येवं वचनं तस्य मनोः कर्णपथेऽभवत् ।
प्रत्युवाच मुनिः श्रीमान् देव्याः संराधनं परम् ॥
राजन्नाकर्णय वचो मम श्रोत्रसुखं महत् ।
शिवामाराधयाद्य त्वं तत्प्रसादादिदं भवेत् ॥
चाक्षुष उवाच
कीदृगाराधनं देव्यास्तस्याः परमपावनम् ।
केनाकारेण कर्तव्यं कारुण्याद्वक्तुमर्हसि ॥
मुनिरुवाच राजन्नाकर्ण्यतां देव्याः पूजनं परमव्ययम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९
राजा अंगके उत्तम पुत्र चाक्षुष छठें मनु हुए ।
॥ सुपुलह नामक ब्रह्मर्षिकी शरणमें गये ॥ २ ॥
[ उन्होंने सुपुलहसे कहा— ] शरणागतोंके कष्टोंको दूर करनेवाले हे ब्रह्मर्षे! मैं आपकी शरणमें आया हूँ । ३ हे स्वामिन्! मुझ सेवकको ऐसी शिक्षा दीजिये; जिससे मैं ' श्री ' प्राप्त कर सकूँ, पृथ्वीपर मेरा अखण्ड आधिपत्य हो जाय, मेरी भुजाओंमें अप्रतिहतबल हो ४ जाय तथा अस्त्र - शस्त्रके प्रयोगमें मैं निपुण तथा समर्थ हो जाऊँ, मेरी सन्तानें चिरकालतक जीवित रहें, मैं अखण्डित उत्तम आयुवाला हो जाऊँ तथा आपके ५ उपदेशसे अन्तमें मुझे मोक्षलाभ हो जाय ॥३–५ ॥ उन चाक्षुष मनुका यह वचन जब मुनि पुलहके कानमें पड़ा तब उन श्रीमान्ने कहा - हे राजन्! कानोंको ६ महान् सुख प्रदान करनेवाली मेरी बात सुनिये --देवीकी आराधना सबसे बढ़कर है । इस समय आप कल्याणी जगदम्बाकी उपासना कीजिये, उन्हींके अनुग्रहसे ७ आपको यह सब सुलभ हो जायगा ॥ ६-७ ॥ चाक्षुष बोले- उन देवीकी परम पावन आराधनाका क्या स्वरूप है तथा उसे किस प्रकार करना चाहिये? इसे आप मेरे ऊपर दया करके ८ बतायें ॥ ८ ॥
मुनि बोले - हे राजन्! देवीके परम सनातन पूजनके विषयमें सुनिये । देवीके अव्यक्त वाग्भव मन्त्रका सतत जप करना चाहिये । इस मन्त्रको वाग्भवं बीजमव्यक्तं सञ्जप्यमनिशं तथा ॥ ९ | त्रिकाल जपनेवाला मनुष्य भोग तथा मोक्ष प्राप्त कर त्रिकालं सञ्जपन्मर्त्यो भुक्तिमुक्ती लभेत्तु हि न बीजं वाग्भवादन्यदस्ति राजन्यनन्दन जपात्सिद्धिकरं वीर्यबलवृद्धिकरं परम् एतस्य जापात्पाद्योऽपि सृष्टिकर्ता महाबलः विष्णुर्यज्जपतः सृष्टिपालकः परिकीर्तितः महेश्वरोऽपि संहर्ता यज्जपादभवन्नृप ॥ लोकपालास्तथान्येऽपि निग्रहानुग्रहक्षमाः । यदाश्रयादभूवंस्ते बलवीर्यमदोद्धताः लेता है । हे राजनन्दन! इस वाग्भव बीजसे बढ़कर । अन्य कोई बीजमन्त्र नहीं है ॥९ -१० ॥ ॥ १० जप करनेसे यह मन्त्र श्रेष्ठ सिद्धियाँ प्रदान करता है और वीर्य तथा बलकी वृद्धि करता है । इस । मन्त्रका जप करके ही ब्रह्माजी महाबली तथा सृजन ॥ ११ करनेकी क्षमतावाले बन गये । हे राजन्! इसी बीजका जप करके भगवान् विष्णु सृष्टिपालक कहे गये तथा । इसीके जपसे भगवान् शंकर जगत्का संहार करनेवाले १२ हुए ॥ ११-१२ ॥ इन्हींका आश्रय लेकर अन्यान्य लोकपाल भी निग्रह तथा अनुग्रह करनेमें समर्थ और बल तथा ॥ १३ । वीर्यसे सम्पन्न हुए हैं ॥१३ ॥
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अ ० ९ ] दशम स्कन्ध ६२७
एवं त्वमपि राजन्य महेशीं जगदम्बिकाम् ।
समाराध्य महद्धिं च लप्स्यसेऽचिरकालतः ॥
एवं स मुनिवर्येण पुलहेन प्रबोधितः ।
अङ्गपुत्रस्तपस्तप्तुं जगाम विरजां नदीम् ॥
स च तेपे तपस्तीव्रं वाग्भवस्य जपे रतः ।
बीजस्य पृथिवीपालः शीर्णपर्णाशनो विभुः ॥
प्रथमेऽब्दे पल्लवाशो द्वितीये तोयभक्षणः ।
तृतीयेऽब्दे पवनभुक् तस्थौ स्थाणुरिवाचलः ॥
एवं द्वादश वर्षाणि त्यक्ताहारस्य भूभुजः ।
वाग्भवं जपतो नित्यं मतिरासीच्छुभान्विता ॥
तथा च देव्याः परमं मन्त्रं सञ्जपतो रहः ।
प्रादुरासीज्जगन्माता साक्षाच्छ्रीपरमेश्वरी ॥
तेजोमयी दुराधर्षा सर्वदेवमयीश्वरी ।
उवाचाङ्गतनूजं तं प्रसन्ना ललिताक्षरम् ॥
देव्युवाच
पृथिवीपाल ते यत्स्याच्चिन्तितं परमं वरम् ।
तद् ब्रूहि सम्प्रदास्यामि तपसा ते सुतोषिता ॥
चाक्षुष उवाच
जानासि देवदेवेशि यत्प्रार्थ्यं मनसेप्सितम् ।
अन्तर्यामिस्वरूपेण तत्सर्वं देवपूजिते ॥
तथापि मम भाग्येन जातं यत्तव दर्शनम् ।
ब्रवीमि देवि मे देहि राज्यं मन्वन्तराश्रितम् ॥
देव्युवाच
दत्तं मन्वन्तरस्यास्य राज्यं राजन्यसत्तम ।
पुत्रा महाबलास्ते च भविष्यन्ति गुणाधिकाः ॥
राज्यं निष्कण्टकं भावि मोक्षोऽन्ते चापि निश्चितः । हे राजन्य! इसी प्रकार आप भी महेश्वरी १४ जगदम्बाकी सम्यक् आराधना करके थोड़े ही समयमें महान् समृद्धि प्राप्त कर लेंगे ॥ १४ ॥
इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ पुलहसे उपदिष्ट होकर वे १५ अंगपुत्र चाक्षुष मनु तप करनेके लिये विरजानदीके तटपर् गये ॥१५ ॥
वे ऐश्वर्यशाली राजा चाक्षुष जीर्ण - शीर्ण पत्तोंके १६ आहारपर रहकर भगवतीके वाग्भव बीजके जपमें निरन्तर रत रहते हुए उग्र तपस्या करने लगे ॥ १६ ॥
वे प्रथम वर्षमें पत्तोंके आहारपर, दूसरे १७ वर्षमें जल पीकर और तीसरे वर्षमें केवल वायुका आहार करते हुए ठूंठ वृक्षकी भाँति अविचल स्थित रहे ॥ १७ ॥
१८ आहार छोड़कर बारह वर्षोंतक वाग्भव बीजका निरन्तर जप करते हुए राजा चाक्षुषकी बुद्धि परम पवित्र हो गयी ॥ १८ ॥
१ ९ इस प्रकार देवीके उस परम पवित्र मन्त्रका एकान्तमें जप करते हुए उन राजाके समक्ष जगन्माता परमेश्वरी भगवती साक्षात् प्रकट हो गयीं । किसीसे भी २० पराभूत न होनेवाली तेजस्विनी सर्वदेवमयी भगवती प्रसन्न होकर ललितवाणीमें उन अंगपुत्र चाक्षुषसे कहने लगीं - ॥ १ ९ -२० ॥ देवी बोलीं- हे पृथ्वीपाल! तुमने अपने मनमें २१ जो भी श्रेष्ठ वर सोचा हो, उसे बताओ, तुम्हारे तपसे परम सन्तुष्ट मैं उसे अवश्य दूँगी ॥ २१ ॥
चाक्षुष बोले- हे देवदेवेश्वरि! हे देवपूजिते! मैं जिस मनोवांछित वरके लिये आपसे प्रार्थना करना चाहता हूँ, उसे आप अन्तर्यामी स्वरूपवाली होनेके २२ कारण भलीभाँति जानती हैं, तथापि हे देवि! मेरे सौभाग्यसे यदि आपका दर्शन हो गया है तो मैं आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि आप मुझे मन्वन्तरसे २३ सम्बन्धित राज्य प्रदान करें । २२-२३ ॥ देवी बोलीं- हे नृपश्रेष्ठ! इस मन्वन्तरका राज्य मैंने तुम्हें दे दिया, तुम्हारे पुत्र भी अत्यधिक गुणवान् तथा महान् बलशाली होंगे । तुम्हारा राज्य २४ निष्कंटक होगा तथा अन्तमें तुम्हें निश्चितरूपसे मोक्ष मिलेगा ॥ २४३ ॥
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६२८ एवं दत्त्वा परं देवी मनवे वरमुत्तमम् जगामादर्शनं सद्यस्तेन भक्त्या च संस्तुता । सोऽपि राजा मनुः षष्ठः प्रसादात्तु तदाश्रयात् बभूव मनुमान्योऽसौ सार्वभौमसुखैर्वृतः । पुत्रास्तस्य बलोद्युक्ताः कार्यभारसहादृताः देवीभक्ताश्च शूराश्च महाबलपराक्रमाः । अन्यत्र माननीयाश्च महाराज्यसुखास्पदाः
एवं च चाक्षुषमनुर्देव्याराधनतः प्रभुः ।
बभूव मनुवर्योऽसौ जगामान्ते शिवापदम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० ॥ २५ इस प्रकार उन चाक्षुष मनुके द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुत वे देवी उन्हें अत्यन्त उत्तम वर प्रदान करके शीघ्र ही अन्तर्धान हो गयीं ॥ २५३ ॥
॥ २६ वे राजा चाक्षुष मनु भी भगवतीकी कृपासे उनका आश्रय प्राप्तकर छठें मनुके रूपमें प्रतिष्ठित हुए और वे सम्मान्य मनु सार्वभौम सुखोंसे सम्पन्न हो ॥ २७ गये । उनके पुत्र बलवान्, कार्यभार सँभालनेमें दक्ष, देवीभक्त, शूरवीर, महान् बलशाली, पराक्रमी, सर्वत्र समादर प्राप्त करनेवाले तथा महान् राज्यसुखके ॥ २८ अधिष्ठान थे ॥ २६–२८ ॥ इस प्रकार प्रभुतासम्पन्न वे चाक्षुष मनु भगवतीकी आराधनाके प्रभावसे मनुश्रेष्ठके रूपमें प्रतिष्ठित हुए २ ९ । और अन्तमें देवीके परम धामको प्राप्त हुए ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे देवीचरित्रे चाक्षुषमनुवृत्तवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः वैवस्वत मनुका भगवतीकी कृपासे मन्वन्तराधिप होना, सावर्णि मनुके पूर्वजन्मकी कथा श्रीनारायण उवाच श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] राजा वैवस्वत सप्तमो मनुराख्यातो मनुर्वैवस्वतः प्रभुः । सातवें मनु कहे गये हैं । समस्त राजाओंमें मान्य तथा श्राद्धदेवः परानन्दभोक्ता मान्यस्तु भूभुजाम् ॥ १ | दिव्य आनन्दका भोग करनेवाले वे श्राद्धदेव भी कहे स च वैवस्वतमनुः परदेव्याः प्रसादतः तथा तत्तपसा चैव जातो मन्वन्तराधिपः अष्टमो मनुराख्यातः सावर्णिः प्रथितः क्षितौ स जन्मान्तर आराध्य देवीं तद्वरलाभतः जातो मन्वन्तरपतिः सर्वराजन्यपूजितः महापराक्रमी धीरो देवीभक्तिपरायणः नारद उवाच कथं जन्मान्तरे तेन मनुनाराधनं कृतम् देव्याः पृथिव्युद्भवायास्तन्ममाख्यातुमर्हसि श्रीनारायण उवाच चैत्रवंशसमुद्भूतो राजा स्वारोचिषेऽन्तरे सुरथो नाम विख्यातो महाबलपराक्रमः जाते हैं ॥१ ॥
। वे वैवस्वत मनु पराम्बा भगवतीकी तपस्या करके ॥ २ उनके अनुग्रहसे मन्वन्तरके अधिपति बन गये ॥ २ ॥
। आठवें मनु भूलोकमें सावर्णि नामसे विख्यात ॥ ३ हुए । पूर्वजन्ममें देवीकी आराधना करके तथा उनसे वरदान प्राप्तकर वे मन्वन्तरके अधिपति हो गये । वे । सभी राजाओंसे पूजित, धीर, महापराक्रमी तथा ॥ ४ देवीभक्तिपरायण थे ॥ ३-४ ॥ नारदजी बोले - उन सावर्णि मनुने पूर्वजन्ममें । भगवतीकी पार्थिव मूर्तिकी किस प्रकार आराधना की ॥ ५ थी; इसे मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥
श्रीनारायण बोले- स्वारोचिष मन्वन्तरमें चैत्रवंशमें उत्पन्न सुरथ नामसे विख्यात एक राजा । हुए । वे महान् बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न, गुणग्राही, ॥ ६ धनुर्धर, माननीय, श्रेष्ठ, कवि, कुशल, धनसंग्रह
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अ ० १० ] गुणग्राही धनुर्धारी मान्यः श्रेष्ठः कविः कृती । धनसंग्रहकर्ता च दाता याचकमण्डले अरीणां मर्दनो मानी सर्वास्त्रकुशलो बली । तस्यैकदा बभूवुस्ते कोलाविध्वंसिनो नृपाः शत्रवः सैन्यसहिताः परिवार्यैनमूर्जिताः । दशम स्कन्ध ६२ ९ करनेवाले तथा याचकोंको दान देनेवाले, शत्रुओंका ॥ ७ दमन करनेवाले, मानी, सभी अस्त्रोंके संचालनमें परम दक्ष तथा बलवान् थे ॥ ६-७ ॥ एक बार कोलाविध्वंसी * नामक क्षत्रिय राजा ॥ ८ उनके शत्रु हो गये । महान् बलशाली शत्रुओंने सेनाके साथ चढ़ाई करके सम्मानके धनी उन राजा सुरथकी नगरीको घेर लिया ॥८ - ९ ॥ रुरुधुर्नगरीं तस्य राज्ञो मानधनस्य हि ॥ ९ तत्पश्चात् शत्रुओंका विनाश करनेवाले वे
तदा स सुरथो नाम राजा सैन्यसमावृतः ।
निर्ययौ नगरात्स्वीयात्सर्वशत्रुनिबर्हणः ॥
तदा स समरे राजा सुरथः शत्रुभिर्जितः ।
अमात्यैर्मन्त्रिभिश्चैव तस्य कोशगतं धनम् ॥
हृतं सर्वमशेषेण तदातप्यत भूमिपः ।
निष्कासितश्च नगरात्स राजा परमद्युतिः ॥
जगामाश्वमथारुह्य मृगयामिषतो वनम् ।
एकाकी विजनेऽरण्ये बभ्रामोद्भ्रान्तमानसः ॥
मुनेः कस्यचिदागत्य स्वाश्रमं शान्तमानसः ।
प्रशान्तजन्तुसंयुक्तं मुनिशिष्यगणैर्युतम् ॥
उवास कञ्चित्कालं स राजा परमशोभने ।
आश्रमे मुनिवर्यस्य दीर्घदृष्टेः सुमेधसः ॥
एकदा स महीपालो मुनिं पूजावसानके ।
काले गत्वा प्रणम्याशु पप्रच्छ विनयान्वितः ॥
मुने मम मनोदुःखं बाधते चाधिसम्भवम् ।
ज्ञाततत्त्वस्य भूदेव निष्प्रज्ञस्य च सन्ततम् ॥
शत्रुभिर्निर्जितस्यापि हृतराज्यस्य सर्वशः ।
तथापि तेषु मनसि ममत्वं जायते स्फुटम् ॥
किं करोमि क्व गच्छामि कथं शर्म लभे मुने ।
त्वदनुग्रहमाशासे वद वेदविदां वर ॥
* ' कोलाविध्वंसी ' यह किसी विशेष कुलके राजा सुरथ सेनासे सुसज्जित होकर अपने नगरसे निकल पड़े ॥१० ॥
१० वे राजा सुरथ युद्धमें शत्रुओंके द्वारा जीत लिये गये । उनके अमात्यों तथा मन्त्रियोंने अवसर पाकर उनके कोषमें ११ स्थित सम्पूर्ण धनका पूरी तरहसे हरण कर लिया । इससे राजाको महान् सन्ताप हुआ । वे परम तेजस्वी राजा सुरथ नगरसे निष्कासित कर दिये गये ॥ ११-१२ ॥ १२ तत्पश्चात् वे एक अश्वपर चढ़कर आखेट करनेके बहाने वनमें गये और भ्रमित चित्तवाले वे उस निर्जन वनमें अकेले घूमने लगे ॥ १३ ॥
१३ पुनः शान्त स्वभाववाले पशुओंसे युक्त तथा मुनिशिष्योंसे परिपूर्ण [ सुमेधा ] मुनिके आश्रम में पहुँच जानेपर उनके चित्तको शान्ति मिली ॥ १४ ॥
१४ उन राजाने दूरदृष्टिवाले मुनिवर सुमेधाऋषिके परम रमणीक आश्रममें कुछ कालतक निवास किया ॥ १५ ॥
एक दिन राजा सुरथ मुनिके पूजनकृत्यकी १५ समाप्तिपर शीघ्र उनके पास पहुँचकर प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक उनसे पूछने लगे —॥१६ ॥
१६ हे मुने! मेरा मन अत्यधिक मानसिक कष्टके कारण सदा सन्तप्त रहता है । हे भूदेव! इस दुःखने सभी तत्त्वोंके ज्ञाता होनेपर भी मुझे अज्ञानी - सा बना १७ दिया है । मैं शत्रुओंसे पराजित कर दिया गया हूँ तथा राज्यच्युत हो गया हूँ, फिर भी उनके प्रति मेरे मनमें बार - बार ममता उत्पन्न हो रही है ॥ १७-१८ ॥ १८ हे मुने! मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ तथा किस प्रकार शान्ति प्राप्त करूँ? हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! अब
तो मैं एकमात्र आपसे ही अनुग्रहकी आशा करता हूँ ।
१ ९ । इस कष्टके निवारणका कोई उपाय बताइये ॥ १ ९ ॥
क्षत्रियोंकी संज्ञा है । दक्षिणमें ' कोला ' नगरी प्रसिद्ध है, वह प्राचीन कालमें राजधानी थी । जिन क्षत्रियोंने उसपर आक्रमण करके उसका विध्वंस किया, वे ' कोलाविध्वंसी ' कहलाये ।
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६३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ मुनिरुवाच
आकर्णय महीपाल महाश्चर्यकरं परम् ।
देवीमाहात्म्यमतुलं सर्वकामप्रदं परम् ॥
जगन्मयी महामाया महामाया विष्णुब्रह्महरोद्भवा ॥ सा बलादपहृत्यैव जन्तूनां मानसानि हि ॥
मोहाय प्रतिसंयच्छेदिति जानीहि भूमिप ।
सा सृजत्यखिलं विश्वं सा पालयति सर्वदा ॥
संहारे हररूपेण संहरत्येव भूमिप ।
महामाया कालरात्रिर्दुरत्यया ॥
विश्वसंहारिणी काली कमला कमलालया ।
तस्यां सर्वं जगज्जातं तस्यां विश्वं प्रतिष्ठितम् ॥
लयमेष्यति तस्यां च तस्मात्सैव परात्परा ।
तस्या देव्याः प्रसादश्च यस्योपरि भवेन्नृप ।
स एव मोहमत्येति नान्यथा धरणीपते ॥
मुनि बोले - हे राजन्! आप अत्यन्त विस्मयकारी, अनुपम तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्रेष्ठ २० देवी - माहात्म्यका श्रवण कीजिये ॥ २० ॥
वे विश्वमयी महामाया ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशको भी उत्पन्न करनेवाली हैं । वे ही प्राणियोंके २१ मनको बलपूर्वक आकृष्ट करके मोहित कर देती हैं; हे राजन्! इस रहस्यको आप भलीभाँति जान लीजिये । हे पृथ्वीपते! वे ही समग्र विश्वका सृजन २२ करती हैं, सर्वदा पालन करती हैं तथा अन्तमें रुद्ररूपसे संहार करती हैं । वे महामाया सभी मनोरथ पूर्ण २३ करनेवाली, विश्वका संहार करनेवाली तथा दुर्धर्ष कालरात्रिरूपा साक्षात् काली हैं और वे ही कमल-निवासिनी महालक्ष्मी हैं । यह जगत् उन्हींसे उत्पन्न २४ हुआ है, उन्हींमें स्थित भी है और अन्तमें उन्हींमें विलीन भी हो जायगा, अतएव वे भगवती परात्परा हैं । हे राजन्! उन भगवतीकी कृपा जिसके ऊपर हो जाती है, वही इस मोहजालसे मुक्त होता है; हे भूपते! २५ । इसमें सन्देह नहीं है ॥ २१–२५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे सुरथनृपतिवृत्तवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
अथैकादशोऽध्यायः सावर्णि मनुके पूर्वजन्मकी कथाके भगवान् विष्णुद्वारा राजोवाच
का सा देवी त्वया प्रोक्ता ब्रूहि कालविदां वर ।
का मोहयति सत्त्वानि कारणं किं भवेद् द्विज ॥ १
कस्मादुत्पद्यते देवी किंरूपा सा किमात्मिका ।
सर्वमाख्याहि भूदेव कृपया मम सर्वतः ॥ २
मुनिरुवाच
राजन् देव्याः स्वरूपं ते वर्णयामि निशामय ।
यथा चोत्पतिता देवी येन वा सा जगन्मयी ॥ ३
प्रसंगमें मधु - कैटभकी उत्पत्ति और उनके वधका वर्णन राजा बोले- हे कालज्ञान रखनेवालोंमें श्रेष्ठ! आपने जिन देवीका वर्णन किया है, वे कौन हैं, वे प्राणियोंको क्यों मोहित करती हैं और हे द्विज! इसमें क्या कारण है? वे देवी किसलिये आविर्भूत होती हैं, उनका स्वरूप क्या है तथा उनका स्वभाव कैसा है? हे भूदेव! इन सभी बातोंको कृपा करके सम्यक् प्रकारसे मुझे बताइये॥१-२ ॥ मुनि बोले - हे राजन्! वे जगन्मयी भगवती जिस प्रकार उत्पन्न हुईं, जिनसे उत्पन्न हुईं तथा उन देवीका जैसा स्वरूप है - इन सबका मैं आपसे वर्णन कर रहा हूँ; ध्यानसे सुनिये ॥ ३ ॥
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अ ० ११ ]
यदा नारायणो देवो विश्वं संहृत्य योगराट् ।
आस्तीर्य शेषं भगवान् समुद्रे निद्रितोऽभवत् ॥
तदा प्रस्वापवशगो देवदेवो जनार्दनः ।
तत्कर्णमलसञ्जातौ दानवौ मधुकैटभौ ॥
ब्रह्माणं हन्तुमुद्युक्तौ दानवौ घोररूपिणौ ।
तदा कमलजो देवो दृष्ट्वा तौ मधुकैटभौ ॥
निद्रितं देवदेवेशं चिन्तामाप दुरत्ययाम् ।
निद्रितो भगवानीशो दानवौ च दुरासदौ ॥
किं करोमि क्व गच्छामि कथं शर्म लभे ह्यहम् ।
एवं चिन्तयतस्तस्य पद्मयोनेर्महात्मनः ॥
बुद्धिः प्रादूरभूत्तात तदा कार्यप्रसाधिनी ।
यस्या वशं गतो देवो निद्रितो भगवान् हरिः ॥
तां देवीं शरणं यामि निद्रां सर्वप्रसूतिकाम् । ब्रह्मोवाच देवि देवि जगद्धात्रि भक्ताभीष्टफलप्रदे ॥
जगन्माये महामाये समुद्रशयने शिवे ।
त्वदाज्ञावशगाः सर्वे स्वस्वकार्यविधायिनः ॥
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिर्मदोत्कटा व्यापिनी वशगा मान्या महानन्दैकशेवधिः ॥
महनीया महाराध्या माया मधुमती मही ।
परापराणां सर्वेषां परमा त्वं प्रकीर्तिता ॥
लज्जा पुष्टिः क्षमा कीर्तिः कान्तिः कारुण्यविग्रहा ।
कमनीया जगद्वन्द्या जाग्रदादिस्वरूपिणी ॥
परमा परमेशानी परानन्दपरायणा ।
एकाप्येकस्वरूपा च सद्वितीया द्वयात्मिका ॥
दशम स्कन्ध ६३१ [ कल्पके अन्तमें ] जब योगराट् भगवान् नारायण ४ विश्वका संहार करके समुद्रके भीतर शेषनागकी शय्यापर योगनिद्रामें सोये हुए थे । तब उन देवदेव भगवान् जनार्दनके निद्राके वशीभूत हो जानेपर उनके कानोंके मैलसे मधु तथा कैटभ नामक दो दानव उत्पन्न हुए । भयंकर आकृतिवाले वे दोनों दानव ब्रह्माजीको मारनेको उद्यत हो गये ॥ ४ - ५३ ॥ तब पद्मयोनि ब्रह्मदेव उन मधु - कैटभ दानवोंको ६ तथा देवदेव नारायणको निद्रित देखकर घोर चिन्तामें पड़ गये ॥ ६३ ॥
भगवान् विष्णु तो निद्राकी अवस्थामें हैं और ये ७ दोनों दानव दुर्जेय हैं । ऐसी स्थितिमें मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ तथा किस प्रकार शान्ति प्राप्त करूँ? हे तात! इस प्रकार चिन्तन कर रहे कमलयोनि महात्मा ८ ब्रह्माके मनमें कार्य सिद्ध करनेवाली यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि निद्रित अवस्थावाले ये भगवान् विष्णुदेव इस समय जिनकी अधीनताको प्राप्त हैं, सबको उत्पन्न ९ करनेवाली उन्हीं निद्रा देवीकी शरणमें मैं भी चला जाऊँ ॥ ७ – ९ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे देवि! हे जगत्का पालन करनेवाली देवि! हे भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान १० करनेवाली! हे जगन्माये! हे महामाये! हे समुद्रमें शयन करनेवाली! हे शिवे! आपकी आज्ञाके अधीन होकर ही सभी अपना - अपना कार्य सम्पादित करते ११ हैं ॥ १०-११ ॥ आप ही कालरात्रि हैं, आप ही महारात्रि हैं तथा आप ही भयंकर मोहरात्रि हैं । आप सर्वव्यापिनी, भक्तोंके वशीभूत, सम्माननीया तथा महान् आनन्दकी १२ एकमात्र सीमा हैं । आप ही महनीया, महाराध्या, माया, मधुमती, मही तथा पर- अपर सभीमें श्रेष्ठतम कही गयी हैं ॥ १२-१३ ॥ १३ आप लज्जा, पुष्टि, क्षमा, कीर्ति, कान्ति, करुणाकी प्रतिमूर्ति, कमनीया, विश्ववन्द्या तथा जाग्रत् - स्वप्न-सुषुप्तिके स्वरूपवाली हैं ॥ १४ ॥
१४ आप ही परमा, परमेशानी तथा परमानन्दपरायणा हैं । आप ही एका ( अद्वितीया ) हैं, अतएव आप प्रथमा हैं । आप ही सद्वितीया ( मायासहित ) होनेके १५ । कारण द्वितीया भी हैं । आप ही धर्म - अर्थ- -काम- -इन