देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 661–670

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670

पृष्ठ 661

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६५२

दिवि दुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।

पेठुर्वेदान्मुनिश्रेष्ठा गन्धर्वाद्या जगुस्तथा ॥

मृदङ्गमुरजावीणाढक्काडमरुनिःस्वनैः I घण्टाशङ्खनिनादैश्च व्याप्तमासीज्जगत्त्रयम् ॥

नानास्तोत्रैस्तदा स्तुत्वा मूर्ध्याधायाञ्जलींस्तथा ।

जय मातर्जयेशानीत्येवं सर्वे समूचिरे ॥

ततस्तुष्टा महादेवी वरान्दत्त्वा पृथक्पृथक् ।

स्वस्मिंश्च विपुलां भक्तिं प्रार्थिता तैर्ददौ च ताम् ॥

पश्यतामेव देवानामन्तर्धानं गता ततः ।

इति ते सर्वमाख्यातं भ्रामर्याश्चरितं महत् ॥

पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ।

श्रुतमाश्चर्यजनकं संसारार्णवतारकम् ॥

एवं मनूनां सर्वेषां चरितं पापनाशनम् ।

देवीमाहात्म्यसंयुक्तं पठञ्शृण्वञ्शुभप्रदम् ॥

यश्चैतत्पठते नित्यं शृणुयाद्योऽनिशं नरः ।

सर्वपापविनिर्मुक्तो देवीसायुज्यमाप्नुयात् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ आकाशमें दुन्दुभियाँ बज उठीं, अप्सराएँ नृत्य १२० करने लगीं, गन्धर्व आदि गाने लगे तथा श्रेष्ठ मुनिगण वेदपाठ करने लगे । मृदंग, ढोल, वीणा, ढाक, डमरू, घण्टा और शंख आदिकी ध्वनियोंसे तीनों लोक व्याप्त हो गये ॥ १२०-१२१ ॥ १२१ उस समय अनेकविध स्तोत्रोंसे देवीका स्तवन करके अपनी अंजलियाँ मस्तकपर रखकर सभी देवता कहने लगे - हे मातः! आपकी जय हो । हे ईशानि! १२२ आपकी जय हो ॥ १२२ ॥

उनके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना करनेपर उनपर परम प्रसन्न भगवती महादेवीने उन देवताओंको पृथक् - पृथक् वर प्रदान करके उन्हें अपनी विपुल १२३ भक्ति प्रदान की । इसके बाद देवताओंके देखते - देखते वे अन्तर्धान हो गयीं ॥ १२३१/२ ॥ [ हे नारद! ] इस प्रकार मैंने आपसे भगवती १२४ भ्रामरीके सम्पूर्ण महिमाशाली चरित्रका वर्णन कर दिया, जिसके पढ़ने तथा सुननेवालोंके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । सुननेमें आश्चर्यजनक यह [ देवीचरित्र ] संसाररूपी सागरसे पार कर देनेवाला १२५ | है | १२४-१२५ ॥ इसी प्रकार अन्य सभी मनुओंका चरित्र भी पापको नष्ट करनेवाला, देवीके माहात्म्यसे परिपूर्ण तथा पढ़ने - सुननेवालेके लिये कल्याणप्रद १२६ है ॥ १२६ ॥

जो मनुष्य इस चरित्रको नित्य पढ़ता है तथा निरन्तर सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर देवी-१२७ | सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ १२७ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे भ्रामरीचरित्रवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

॥ दशमः स्कन्धः समाप्तः ॥

पृष्ठ 662

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॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण एकादशः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः भगवान् नारायणका नारदजीसे देवीको प्रसन्न करनेवाले सदाचारका वर्णन नारद उवाच

भगवन् भूतभव्येश नारायण सनातन ।

आख्यातं परमाश्चर्यं देवीचारित्रमुत्तमम् ॥

प्रादुर्भावः परो मातुः कार्यार्थमसुरगुहाम् ।

अधिकाराप्तिरुक्तात्र देवीपूर्णकृपावशात् ॥

अधुना श्रोतुमिच्छामि येन प्रीणाति सर्वदा ।

स्वभक्तान्परिपुष्णाति तमाचारं वद प्रभो ॥

श्रीनारायण उवाच

शृणु नारद तत्त्वज्ञ सदाचारविधिक्रमम् ।

यदनुष्ठानमात्रेण देवी प्रीणाति सर्वदा ॥

प्रातरुत्थाय कर्तव्यं यद् द्विजेन दिने दिने ।

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि द्विजानामुपकारकम् ॥

उदयास्तमयं यावद् द्विजः सत्कर्मकृद्भवेत् ।

नित्यनैमित्तिकैर्युक्तः काम्यैश्चान्यैरगर्हितैः ॥

आत्मनश्च सहायार्थं पिता माता न तिष्ठति ।

न पुत्रदारा न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलम् ॥

तस्माद्धर्मं सहायार्थं नित्यं सञ्चिनु साधनैः ।

धर्मेणैव सहायात्तु तमस्तरति दुस्तरम् ॥

नारद बोले - हे भगवन्! हे भूतभव्येश! हे नारायण! हे सनातन! आपने भगवतीके परम विस्मयकारक एवं श्रेष्ठ चरित्रका वर्णन किया । साथ ही आपके १ द्वारा असुरद्रोही देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके निमित्त माता भगवतीके उत्तम प्राकट्य तथा देवीकी पूर्ण कृपासे उनकी अधिकार - प्राप्तिका वर्णन भी २ किया गया॥१-२ ॥ हे प्रभो! अब मैं उस आचारके विषयमें सुनना चाहता हूँ, जिससे भगवती अपने भक्तोंपर सदा प्रसन्न ३ होती हैं तथा उनका पालन - पोषण करती हैं, उसे बताइये ॥ ३ ॥

श्रीनारायण बोले- हे तत्त्वोंके ज्ञाता नारद! जिस सदाचारके अनुष्ठानसे देवी सर्वदा प्रसन्न रहती ४ हैं, उसकी विधिके विषयमें अब आप क्रमसे सुनिये ॥४ ॥

प्रातःकाल उठकर द्विजको प्रतिदिन जिस आचारका पालन करना चाहिये; अब मैं द्विजोंका उपकार ५ करनेवाले उस आचारका भलीभाँति वर्णन करूँगा ॥ ५ ॥

द्विजको सूर्योदयसे लेकर सूर्यास्तपर्यन्त नित्य, नैमित्तिक तथा अनिन्द्य काम्य कर्मोंसे युक्त होकर ६ सत्कर्मोंमें संलग्न रहना चाहिये ॥६ ॥

पिता, माता, पुत्र, पत्नी तथा बन्धु - बान्धव कोई भी [ परलोकमें ] आत्माके सहायतार्थ उपस्थित नहीं ७ रहते; केवल धर्म ही उपस्थित होता है । अतः आत्मकल्याणके लिये समस्त साधनोंसे धर्मका नित्य संचय करना चाहिये । धर्मके ही साहाय्यसे मनुष्य ८ । दुस्तर अन्धकारको पार कर लेता है ॥ ७-८ ॥

पृष्ठ 663

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६५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १

आचारः प्रथमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च ।

तस्मादस्मिन्समायुक्तो नित्यं स्यादात्मनो द्विजः ॥ ९

आचाराल्लभते चायुराचाराल्लभते प्रजाः ।

आचारादन्नमक्षय्यमाचारो हन्ति पातकम् ॥ १०

आचारः परमो धर्मो नृणां कल्याणकारकः ।

इह लोके सुखी भूत्वा परत्र लभते सुखम् ॥ ११

अज्ञानान्धजनानां तु मोहितैर्भ्रामितात्मनाम् ।

धर्मरूपो महादीपो मुक्तिमार्गप्रदर्शकः ॥ १२

आचारात्प्राप्यते श्रैष्ठ्यमाचारात्कर्म लभ्यते ।

कर्मणो जायते ज्ञानमिति वाक्यं मनोः स्मृतम् ॥ १३

सर्वधर्मवरिष्ठोऽयमाचारः परमं तपः ।

तदेव ज्ञानमुद्दिष्टं तेन सर्वं प्रसाध्यते ॥ १४

यस्त्वाचारविहीनोऽत्र वर्तते द्विजसत्तमः ।

स शूद्रवद् बहिष्कार्यो यथा शूद्रस्तथैव सः ॥ १५

आचारो द्विविधः प्रोक्तः शास्त्रीयो लौकिकस्तथा ।

उभावपि प्रकर्तव्यौ न त्याज्यौ शुभमिच्छता ॥ १६

ग्रामधर्मा जातिधर्मा देशधर्माः कुलोद्भवाः ।

परिग्राह्या नृभिः सर्वैर्नैव ताल्लङ्घयेन्मुने ॥ १७

दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः ।

दुःखभागी च सततं व्याधिना व्याप्त एव च ॥ १८

परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ ।

धर्ममप्यसुखोदर्कं लोकविद्विष्टमेव च ॥ १ ९ ।

आचार ही प्रथम ( मुख्य ) धर्म है - ऐसा श्रुतियों तथा स्मृतियोंमें कहा गया है, अतएव द्विजको चाहिये कि वह अपने कल्याणके लिये इस सदाचार के पालनमें नित्य संलग्न रहे ॥ ९ ॥

मनुष्य आचारसे आयु प्राप्त करता है, आचारसे सन्तानें प्राप्त करता है तथा आचारसे अक्षय अन्न प्राप्त करता है । यह आचार पापको नष्ट कर देता है ॥ १० ॥

आचार मनुष्योंका परम धर्म है तथा उनके लिये कल्याणप्रद है । सदाचारी व्यक्ति इस लोकमें सुखी रहकर परलोकमें भी सुख प्राप्त करता है ॥ ११ ॥

मोहसे भ्रमित चित्तवाले तथा अज्ञानान्धकारमें भटकनेवाले लोगोंके लिये यह आचार धर्मरूपी महान् दीपक बनकर उन्हें मुक्तिका मार्ग दिखाता है ॥ १२ ॥

आचारसे श्रेष्ठता प्राप्त होती है, आचारसे ही सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति होती है और सत्कर्मसे ज्ञान उत्पन्न होता है - मनुका यह प्रसिद्ध वचन है ॥ १३ ॥

यह आचार सभी धर्मोंसे श्रेष्ठ तथा परम तप है । उसीको ज्ञान भी कहा गया है । उसीसे सब कुछ सिद्ध कर लिया जाता है ॥ १४ ॥

द्विजश्रेष्ठ होकर भी जो इस लोकमें आचारसे रहित है, वह शूद्रकी भाँति बहिष्कारके योग्य है; क्योंकि जैसा शूद्र है वैसा ही वह भी है ॥ १५ ॥

आचार शास्त्रीय तथा लौकिक- भेदसे दो प्रकारका कहा गया है । अपना कल्याण चाहनेवालेको इन दोनों ही आचारोंका सम्यक् पालन करना चाहिये और उनसे कभी भी विरत नहीं होना चाहिये ॥ १६ ॥

हे मुने! सभी मनुष्योंको ग्रामधर्म, जातिधर्म, देशधर्म तथा कुलधर्मोका भलीभाँति पालन करना चाहिये, उनका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिये ॥ १७ ॥

दुराचारी पुरुष लोकमें निन्दित होता है, दुःख प्राप्त करता है और रोगसे सदा ग्रस्त रहता है ॥ १८ ॥

जो अर्थ तथा काम धर्मसे रहित हों, उनका त्याग कर देना चाहिये । साथ ही लोकविरुद्ध धर्मको भी छोड़ देना चाहिये; क्योंकि वह परिणाममें दु: खदायी होता है ॥१ ९ ॥

पृष्ठ 664

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अ ० १ ] एकादश नारद उवाच

बहुत्वादिह शास्त्राणां निश्चयः स्यात्कथं मुने ।

कियत्प्रमाणं तद् ब्रूहि धर्ममार्गविनिर्णये ॥ २०

श्रीनारायण उवाच

श्रुतिस्मृती उभे नेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम् ।

एतत्त्रयोक्त एव स्याद्धर्मो नान्यत्र कुत्रचित् ॥ २१

विरोधो यत्र तु भवेत्त्रयाणां च परस्परम् ।

श्रुतिस्तत्र प्रमाणं स्याद् द्वयोर्द्वैधे स्मृतिर्वरा ॥ २२

श्रुतिद्वैधं भवेद्यत्र तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ ।

स्मृतिद्वैधं तु यत्र स्याद्विषयः कल्प्यतां पृथक् ॥ २३

पुराणेषु क्वचिच्चैव तन्त्रदृष्टं यथातथम् ।

धर्मं वदन्ति तं धर्मं गृह्णीयान्न कथञ्चन ॥ २४

वेदाविरोधि चेत्तन्त्रं तत्प्रमाणं न संशयः ।

प्रत्यक्षश्रुतिरुद्धं यत्तत्प्रमाणं भवेन्न च ॥ २५

सर्वथा वेद एवासौ धर्ममार्गप्रमाणकः ।

तेनाविरुद्धं यत्किञ्चित्तत्प्रमाणं न चान्यथा ॥ २६

यो वेदधर्ममुज्झित्य वर्ततेऽन्यप्रमाणतः ।

कुण्डानि तस्य शिक्षार्थं यमलोके वसन्ति हि ॥ २७

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वेदोक्तं धर्ममाश्रयेत् ।

स्मृतिः पुराणमन्यद्वा तन्त्रं वा शास्त्रमेव च ॥ २८

तन्मूलत्वे प्रमाणं स्यान्नान्यथा तु कदाचन ।

ये कुशास्त्राभियोगेन वर्तयन्तीह मानवान् ॥ २ ९

अधोमुखोर्ध्वपादास्ते यास्यन्ति नरकार्णवम् । स्कन्ध ६५५ नारदजी बोले - हे मुने! जगत्में तो शास्त्रोंका बाहुल्य है; ऐसी स्थितिमें कुछ भी कैसे निश्चित किया जाय । धर्ममार्गका निर्णय करनेवाले कितने प्रमाण हैं; यह मुझे बताइये ॥ २० ॥

श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] श्रुति तथा स्मृति दोनों नेत्र हैं तथा पुराणको हृदय कहा गया है । इन तीनोंमें जो भी कहा गया है, वही धर्म है, इसके अतिरिक्त कहीं भी नहीं ॥२१ ॥

इन तीनोंमें जहाँ परस्पर विरोध हो, वहाँ श्रुतिको प्रमाण मानना चाहिये । इसी प्रकार स्मृति तथा पुराण में विरोध होनेपर स्मृति श्रेष्ठ है ॥ २२ ॥

श्रुतिमें जहाँ दो वचनोंमें परस्पर विरोध हो तो वहाँ वे दोनों ही वचन धर्म हैं । यदि स्मृतिमें द्वैध-स्थिति हो जाय तो प्रसंगानुसार पृथक् - पृथक् विषय कल्पित कर लेने चाहिये ॥ २३ ॥

पुराणोंमें कही - कहीं तन्त्र भी सूक्ष्मरूपसे व्याख्यायित किये गये हैं । जिसे धर्म बताया गया है, उसीको धर्मरूपसे ग्रहण करना चाहिये, किसी अन्यको किसी भी तरह नहीं ॥ २४ ॥

यदि तन्त्रका वचन वेदविरोधी नहीं है तो उसकी प्रामाणिकतामें सन्देह नहीं है, किंतु श्रुतिसे जो प्रत्यक्ष विरुद्ध हो, वह वचन प्रमाण नहीं हो सकता ॥ २५ ॥

वेद ही पूर्णरूपसे धर्म - मार्गके प्रमाण हैं । उस वेदराशिसे विरोध न रखनेवाला जो कुछ भी है, वही प्रमाण है; दूसरा नहीं ॥ २६ ॥

वेद - प्रतिपादित धर्मको छोड़कर जो अन्यको प्रमाण मानकर व्यवहार करता है, उसे दण्डित करनेके लिये यमलोकमें नरककुण्ड स्थित हैं । अतएव सभी प्रयत्नोंसे वेदोक्त धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये । स्मृति, पुराण, तन्त्र, शास्त्र तथा अन्य ग्रन्थ - इनके वेदमूलक होनेकी स्थितिमें ही वे प्रमाण होते हैं; इसके विपरीत वे कभी भी प्रमाण नहीं हो सकतें ॥ २७-२८३ ॥ जो लोग इस लोक मनुष्योंको निन्दित शास्त्रोंका उपदेश करते हैं, वे मुख नीचे तथा पैर ऊपर किये हुए नरकसागर जायँगे ॥ २ ९ ३ ॥

पृष्ठ 665

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६५६ कामाचाराः पाशुपतास्तथा वै लिङ्गधारिणः

तप्तमुद्राङ्किता ये च वैखानसमतानुगाः ।

ते सर्वे निरयं यान्ति वेदमार्गबहिष्कृताः ॥

वेदोक्तमेव सद्धर्मं तस्मात्कुर्यान्नरः सदा ।

उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं किं मयाद्य कृतं कृतम् ॥

दत्तं वा दापितं वापि वाक्येनापि च भाषितम् ।

उपपापेषु सर्वेषु पातकेषु महत्स्वपि ॥

अवाप्य रजनीयामं ब्रह्मध्यानं समाचरेत् ।

ऊरुस्थोत्तानचरणः सव्ये चोरौ तथोत्तरम् ॥

उत्तानं किञ्चिदुत्तानं मुखमवष्टभ्य चोरसा ।

निमीलिताक्षः सत्त्वस्थो दन्तैर्दन्तान्न संस्पृशेत् ॥

तालुस्थाचलजिह्वश्च संवृतास्यः सुनिश्चलः ।

सन्निरुद्धेन्द्रियग्रामो नातिनिम्नस्थितासनः ॥

द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्राणायाममुपक्रमेत् ।

ततो ध्येयः स्थितो योऽसौ हृदये दीपवत्प्रभुः ॥

धारयेत्तत्र चात्मानं धारणां धारयेद् बुधः ।

सधूमश्च विधूमश्च सगर्भश्चाप्यगर्भकः ॥

सलक्ष्यश्चाप्यलक्ष्यश्च प्राणायामस्तु षड्विधः ।

प्राणायामसमो योगः प्राणायाम इतीरितः ॥

प्राणायाम इति प्रोक्तो रेचपूरककुम्भकैः ।

वर्णत्रयात्मका ह्येते रेचपूरककुम्भकाः ॥

स एव प्रणवः प्रोक्तः प्राणायामश्च तन्मयः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ॥ ३० स्वेच्छाचारी, पाशुपतमार्गावलम्बी, लिंगधारी, तप्त मुद्रासे अंकित तथा वैखानस मत माननेवाले जो भी लोग हैं, वेदमार्गसे विचलित होनेके कारण वे सभी

नरक जाते हैं । ३०-३१ ॥

३१ अतएव मनुष्यको सदा वेदोक्त सद्धर्मका ही पालन करना चाहिये । उसे सावधान होकर बार - बार विचार करना चाहिये कि आज मैंने कौन - कौन - सा ३२ कार्य किया, क्या दिया, क्या दिलाया अथवा वाणीसे कैसा सम्भाषण किया? यह भी सोचना चाहिये कि अत्यन्त दारुण सभी पातकों तथा उपपातकोंमें कहीं ३३ मेरी प्रवृत्ति तो नहीं हो गयी॥३२-३३ ॥ रात्रिके चौथे प्रहरमें [ उठकर ] ब्रह्मध्यान करना चाहिये | जंघाओं पर पैरको ऊपरकी ओर करके ( पद्मासनमें ) बैठे, बायीं जंघापर दाहिना पैर उत्तान ३४ करके रखना चाहिये । हनु ( ठुड्डी ) - को वक्ष: स्थलसे लगाकर नेत्रोंको बन्द करके सहज भावमें स्थित होकर बैठना चाहिये, दाँतोंका दाँतोंसे स्पर्श नहीं ३५ करना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ जिह्वाको तालुके समीप अचल स्थितिमें रखे, मुँह बन्द किये रहे, शान्तचित्त रहे, इन्द्रियसमूहोंपर नियन्त्रण रखे तथा बहुत नीचे आसनपर स्थित न हो । ३६ दो बार अथवा तीन बार प्राणायाम करना चाहिये । तत्पश्चात् दीपकस्वरूप जो प्रभु हृदयमें अवस्थित हैं, उनका ध्यान करना चाहिये । इस प्रकार विद्वान् ३७ व्यक्तिको अपने हृदयमें परमात्माके विराजमान रहनेकी धारणा करनी चाहिये ॥ ३६-३७३ ॥ सधूम ( श्वाससहित ), विधूम ( श्वासरहित ), सगर्भ ( मन्त्र - जपसहित ), अगर्भ ( मन्त्ररहित ), सलक्ष्य ३८ ( इष्टदेवके ध्यानसहित ) और अलक्ष्य ( ध्यानरहित ) – यह छ: प्रकारका प्राणायाम होता है । प्राणायाममें वायुका नियमन किया जाता है, अतएव इस प्राणायामको ३ ९ ही योग कहा गया है॥३८-३९ ॥ यह प्राणायाम भी रेचक, पूरक तथा कुम्भक भेदोंवाला कहा गया है । रेचक, पूरक तथा कुम्भक-संज्ञक प्राणायाम वर्णत्रयात्मक है, इसीको प्रणव ४० कहा गया है । उस प्रणवमें तन्मय हो जाना ही प्राणायाम है ॥ ४०३ ॥

पृष्ठ 666

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अ ० १ ] एकादश इडया वायुमारोप्य पूरयित्वोदरे स्थितम् ॥ ४१

शनैः षोडशमात्राभिरन्यया तं विरेचयेत् ।

एवं सधूमः प्राणानामायामः कथितो मुने ॥ ४२

आधारे लिङ्गनाभिप्रकटितहृदये तालुमूले ललाटे द्वे पत्रे षोडशारे द्विदशदशदलद्वादशार्धे चतुष्के । वासान्ते बालमध्ये डफकठसहिते कण्ठदेशे स्वराणां हंक्षंतत्त्वार्थयुक्तं सकलदलगतं वर्णरूपं नमामि ॥ ४३ अरुणकमलसंस्था तद्रजःपुञ्जवर्णा हरनियमितचिह्ना पद्मतन्तुस्वरूपा । रविहुतवहराकानायकास्यस्तनाढ्या सकृदपि यदि चित्ते संवसेत्स्यात्स मुक्तः ॥ ४४

स्थितिः सैव गतिर्यात्रा मतिश्चिन्ता स्तुतिर्वचः ।

अहं सर्वात्मको देवः स्तुतिः सर्वं त्वदर्चनम् ॥ ४५

अहं देवी न चान्योऽस्मि ब्रह्मैवाहं न शोकभाक् ।

सच्चिदानन्दरूपोऽहं स्वात्मानमिति चिन्तयेत् ॥ ४६

प्रकाशमानां प्रथमे प्रयाणे प्रतिप्रयाणेऽप्यमृतायमानाम् अन्तःपदव्यामनुसञ्चरन्ती-मानन्दरूपामबलां प्रपद्ये ॥ ४७ । स्कन्ध ६५७ इडा नाड़ीसे वायुको ऊपर खींचकर उदरमें पूर्णरूपसे स्थित कर लेनेके अनन्तर पुनः दूसरी ( पिंगला ) नाड़ीसे धीरे - धीरे सोलह मात्रामें उस वायुको निकालना चाहिये । हे मुने! इस प्रकार यह सधूमप्राणायाम कहा गया है ॥ ४१-४२ ॥ मूलाधार, लिंग, नाभि, हृदय, कंठ तथा ललाट ( भ्रूमध्य ) - में क्रमशः चतुर्दल, षड्दल, दशदल, द्वादशदल, षोडशदल तथा द्विदल कमल विद्यमान हैं । मूलाधारचक्रमें वँ, शँ, षँ, सँ वर्णों; स्वाधिष्ठानचक्रमें बँ, भँ, मँ, यँ, रँ, लँ वर्णों; मणिपूरकचक्रमें डँ, ढ, णँ, तँ, थ, द, धँ, नँ, पँ, फँ वर्णों; अनाहतचक्रमें कँ, खँ, गँ, घँ, डँ, चँ, छँ, जँ, झ, ञ, टँ, ठँ वर्णों; विशुद्धाख्यचक्र ( कण्ठदेश ) - में सभी सोलह स्वरों तथा आज्ञाचक्रमें हँ, क्षं वर्णोंवाले द्विदल पद्ममें विराजमान तत्त्वार्थयुक्त उन ब्रह्मस्वरूप सभी वर्णोंको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४३ ॥

जिसके चित्तमें एक बार भी अरुणकमलासना, पद्मरागके पुंजके समान वर्णवाली, शिवलिंगसे अंकित, कमलतन्तुके समान सूक्ष्म स्वरूपवाली, सूर्य - अग्नि-चन्द्र ( -रूपी नेत्रों ) - से आलोकित मुखमण्डल और उन्नत स्तनोंसे सुशोभित जगदम्बाका निवास हो जाता है, वही मुक्त है ॥ ४४ ॥

वे भगवती ही स्थिति हैं, वे ही गति हैं, वे ही यात्रा हैं, वे ही मति हैं, वे ही चिन्ता हैं, वे ही स्तुति हैं और वे ही वाणी हैं । मैं सर्वात्मा देवता हूँ और मेरे द्वारा की गयी स्तुति ही आपकी समस्त अर्चना है, मैं स्वयं देवीरूप हूँ, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं । मैं ही ब्रह्म हूँ, मुझमें शोक व्याप्त नहीं हो सकता और मैं सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ - ऐसा अपनेको समझना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ प्रथम प्रयाणके समय अर्थात् मूलाधारसे ब्रह्मरन्ध्रकी ओर ( जाते समय ) विद्युत् - सदृश प्रकाशमान, प्रतिप्रयाणमें अमृतसदृश प्रतीतिवाली तथा अन्तिम प्रयाणमें सुषुम्ना नाड़ीमें संचरित होनेवाली आनन्दस्वरूप भगवती कुण्डलिनीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥४७ ॥

पृष्ठ 667

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६५८ ततो निजब्रह्मरन्ध्रे ध्यायेत्तं गुरुमीश्वरम् । उपचारैर्मानसैश्च पूजयेत्तु यथाविधि स्तुवीतानेन मन्त्रेण साधको नियतात्मवान् ।

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ तत्पश्चात् अपने ब्रह्मरन्ध्रमें ईश्वररूप उन गुरुका ॥ ४८ ध्यान करना चाहिये और मानसिक उपचारोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये । पुनः साधकको संयतचित्त होकर इस मन्त्रसे गुरुकी प्रार्थना करनी चाहिये— ' गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ' गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही देवता हैं, गुरु ही महेश्वर शिव हैं और गुरु ही परब्रह्म हैं; उन श्रीगुरुको नमस्कार ४ ९ | है ॥ ४८-४९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे प्रातश्चिन्तनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

O अथ द्वितीयोऽध्यायः शौचाचारका वर्णन श्रीनारायण उवाच आचारहीनं न पुनन्ति वेदा यदप्यधीताः सह षड्भिरङ्गैः । छन्दांस्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ॥

ब्राह्मे मुहूर्त्ते चोत्थाय तत्सर्वं सम्यगाचरेत् ।

रात्रेरन्तिमयामे तु वेदाभ्यासं चरेद् बुधः ॥

किञ्चित्कालं ततः कुर्यादिष्टदेवानुचिन्तनम् ।

योगी तु पूर्वमार्गेण ब्रह्मध्यानं समाचरेत् ॥

जीवब्रह्मैक्यता येन जायते तु निरन्तरम् ।

जीवन्मुक्तश्च भवति तत्क्षणादेव नारद ॥

पञ्चपञ्च उषःकालः सप्तपञ्चारुणोदयः ।

अष्टपञ्चभवेत्प्रातः शेषः सूर्योदयः स्मृतः ॥

प्रातरुत्थाय यः कुर्याद्विण्मूत्रं द्विजसत्तमः ।

नैर्ऋत्यामिषुविक्षेपमतीत्याभ्यधिकं भुवः ॥

श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] छहों अंगों सहित अधीत किये गये वेद भी आचारविहीन व्यक्तिको पवित्र नहीं कर सकते । पढ़े गये छन्द ( वेद ) ऐसे आचारहीन प्राणीको उसी भाँति मृत्युकालमें छोड़ देते हैं, जैसे पंख निकल आनेपर पक्षी अपना घोंसला १ त्याग देते हैं ॥ १ ॥

विद्वान् पुरुषको ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर आचारसम्बन्धी सभी कर्मोंको भलीभाँति सम्पादित करना चाहिये और रातके अन्तिम प्रहरमें वेदाभ्यास करना चाहिये । २ तत्पश्चात् योगी पुरुष कुछ समय अपने इष्टदेवका चिन्तन करे और पुनः पूर्वोक्त मार्गसे ब्रह्मका ध्यान करे ॥ २-३ ॥ ३ हे नारद! ऐसा निरन्तर करनेसे जब जीव तथा ब्रह्ममें ऐक्य स्थापित हो जाता है, तब उसी क्षण वह जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥

४ रात्रिके अन्तमें पचपन घड़ीके बाद उषःकाल, सत्तावन घड़ीके बाद अरुणोदयकाल तथा अट्ठावन घड़ीके बाद प्रातःकाल होता है । इसके बादवाला शेष समय सूर्योदयकाल कहा गया है ॥५ ॥

५ श्रेष्ठ द्विजको प्रातः काल उठकर नैर्ऋत्यदिशामें धनुषसे छोड़े गये बाणद्वारा तय की गयी दूरीसे भी आगेकी भूमिपर जाकर मल - मूत्रका त्याग करना ६ | चाहिये ॥ ६ ॥

पृष्ठ 668

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अ ० २ ] विण्मूत्रेऽपि च कर्णस्थ आश्रमे प्रथमे द्विजः निवीतं पृष्ठतः कुर्याद्वानप्रस्थगृहस्थयोः कृत्वा यज्ञोपवीतं तु पृष्ठतः कण्ठलम्बितम् विण्मूत्रं तु गृही कुर्यात्कर्णस्थं प्रथमाश्रमी अन्तर्धाय तृणैर्भूमिं शिरः प्रावृत्य वाससा वाचं नियम्य यत्नेन ष्ठीवनश्वासवर्जितः न फालकृष्टे न जले न चितायां न पर्वते जीर्णदेवालये कुर्यान्न वल्मीके न शाद्वले न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन्न पथि स्थितः सन्ध्ययोरुभयोर्जप्ये भोजने दन्तधावने पितृकार्ये च दैवे च तथा मूत्रपुरीषयोः उत्साहे मैथुने वापि तथा वै गुरुसन्निधौ यागे दाने ब्रह्मयज्ञे द्विजो मौनं समाचरेत् देवता ऋषयः सर्वे पिशाचोरगराक्षसाः इतो गच्छन्तु भूतानि बहिर्भूमिं करोम्यहम् इति सम्प्रार्थ्य पश्चात्तु कुर्याच्छौचं यथाविधि वाय्वग्नी विप्रमादित्यमापः पश्यंस्तथैव गाः न कदाचन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् उदङ्मुखो दिवा कुर्याद्रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः तत आच्छाद्य विण्मूत्रं लोष्ठपर्णतृणादिभिः गृहीतलिङ्ग उत्थाय स गच्छेद्वारिसन्निधौ पात्रे जलं गृहीत्वा तु गच्छेदन्यत्र चैव हि एकादश स्कन्ध ६५ ९ । ब्रह्मचर्य - आश्रममें स्थित द्विजको मल - मूत्र त्यागते ॥ ७ समय यज्ञोपवीत अपने कानपर रख लेना चाहिये । वानप्रस्थ तथा गृहस्थ यज्ञोपवीतको आगे लटकाकर पीठपर कर ले ॥७ ॥

। गृहस्थको यज्ञोपवीत कण्ठीके समान पीठकी ॥ ८ ओर लटकाकर और प्रथम आश्रममें स्थित ब्रह्मचारीको यज्ञोपवीत कानपर रखकर मल - मूत्रका त्याग करना । चाहिये ॥ ८ ॥

॥ ९ तृणोंसे भूमिको ढँककर, सिरको वस्त्रसे आच्छादित करके, मौन हो करके, थूकने तथा श्वासक्रियासे रहित । होकर मल - मूत्रका त्याग करना चाहिये ॥९ ॥

जोती हुई भूमिपर, जलमें, चिताके स्थानपर, ॥ १० पर्वतपर, जीर्ण देवस्थलोंपर, वल्मीक ( बिमौट ) - पर तथा हरी घासपर, मल - मूत्र नहीं करना चाहिये ॥ मल- - मूत्रका त्याग न तो जीव - जन्तुवाले गड्डोंमें, न तो ॥ ११ चलते हुए और न तो रास्तेमें स्थित होकर ही करे ॥ १०३ ॥

। दोनों सन्ध्याओंमें, जपकालमें, भोजन समय, दन्तधावन करते समय, पितृ तथा देव - कार्य ॥ १२ सम्पन्न करते समय, मल - मूत्रके उत्सर्गके समय, हर्षातिरेककी स्थितिमें, मैथुन करते समय, गुरुकी । सन्निधिमें, यज्ञ करते समय, दान देते समय तथा ॥ १३ ब्रह्मयज्ञ ( स्वाध्याय ) - के समय द्विजको मौन धारण किये रहना चाहिये ॥ ११-१२३ ॥ । शौचसे पूर्व ऐसा उच्चारण करना चाहिये - सभी देवता, ऋषि, पिशाच, नाग, राक्षस तथा भूत - समुदाय ॥ १४ यहाँसे चले जायँ; क्योंकि मैं यहाँ मल - त्याग करना चाहता हूँ । इस प्रकार प्रार्थना करके विधिपूर्वक शौच । करना चाहिये ॥ १३-१४ ॥ ॥ १५ वायु, अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य, जल तथा गौको देखते हुए मल - मूत्रका त्याग कभी नहीं करना चाहिये ॥ दिनमें उत्तर दिशाकी ओर तथा रातमें दक्षिण दिशाकी ॥ १६ ओर मुख करके मल - मूत्रका त्याग करना चाहिये । तत्पश्चात् मल - मूत्रको मिट्टीके ढेलों, पत्तों, तृण आदिसे ढँक करके पुनः उठकर जननेन्द्रियको पकड़े । हुए जलके निकट जाना चाहिये । पात्रमें जल लेकर ॥ १७ वहाँसे दूसरे स्थानपर जाना चाहिये ॥ १५ – १७ ॥

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६६० गृहीत्वा मृत्तिकां कूलाच्छ्रेतां ब्राह्मणसत्तमः रक्तां पीतां तथा कृष्णां गृह्णीयुश्चान्यवर्णकाः अथवा या यत्र देशे सैव ग्राह्या द्विजोत्तमैः अन्तर्जलाद्देवगृहाद्वल्मीकान्मूषकोत्करात् कृतशौचावशिष्टाच्च न ग्राह्याः पञ्चमृत्तिकाः मूत्रात्तु द्विगुणं शौचे मैथुने त्रिगुणं स्मृतम् ॥ एका लिङ्गे करे तिस्र उभयोर्मृद्द्द्वयं स्मृतम् । मूत्रशौचं समाख्यातं शौचे तद् द्विगुणं स्मृतम् विट्शौचे लिङ्गदेशे तु प्रदद्यान्मृत्तिकाद्वयम् । पञ्चापाने दशैकस्मिन्नुभयोः सप्त मृत्तिकाः वामपादं पुरस्कृत्य पश्चाद्दक्षिणमेव च । प्रत्येकं च चतुर्वारं मृत्तिकां लेपयेत्सुधीः

एवं शौचं गृहस्थस्य द्विगुणं ब्रह्मचारिणः ।

त्रिगुणं वानप्रस्थस्य यतीनां च चतुर्गुणम् ॥

आर्द्रामलकमाना तु मृत्तिका शौचकर्मणि ।

प्रत्येकं तु सदा ग्राह्या नातो न्यूना कदाचन ॥

एतद्दिवा स्याद्विट्शौचं तदर्धं निशि कीर्तितम् ।

आतुरस्य तदर्थं तु मार्गस्थस्य तदर्धकम् ॥

स्त्रीशूद्राणामशक्तानां बालानां शौचकर्मणि ।

यथा गन्धक्षयः स्यात्तु तथा कुर्यादसंख्यकम् ॥

गन्धलेपक्षयो यावत्तावच्छौचं विधीयते ।

सर्वेषामेव वर्णानामित्याह भगवान्मनुः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ । शुद्धिके लिये जलाशयके तटसे श्रेष्ठ ब्राह्मणको ॥ १८ श्वेत, क्षत्रियको लाल, वैश्यको पीली तथा शूद्रको काली मिट्टी लेनी चाहिये अथवा जिस स्थानपर जो । मिट्टी उपलब्ध हो जाय; उत्तम द्विजको वही ले लेनी चाहिये । पानीके अन्दरसे, देवालयसे, वल्मीकसे तथा ॥ १ ९ चूहेके बिलसे गृहीत और शौचसे अवशिष्ट - ये । पाँच मिट्टियाँ ग्राह्य नहीं हैं ॥ १८-१९ ३ ॥ मूत्र - त्यागकी अपेक्षा मल - - त्यागमें दोगुनी २० तथा मैथुनके बाद तीन गुनी शुद्धि कही गयी है । मूत्र - त्यागके पश्चात् लिंगमें एक बार, बायें हाथमें तीन बार और पुनः दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी ॥ २१ लगाना बताया गया है; इसे मूत्र - शौच कहा गया है । मल - शौचमें यही क्रिया दोगुनी कही गयी है । मल - त्यागके पश्चात् शुद्धिहेतु लिंगमें दो बार, गुदामें पाँच बार तथा दोनों हाथोंमें ग्यारह बार मिट्टी ॥ २२ लगानी चाहिये ॥ २०-२२ ॥ उत्तम बुद्धिवाले पुरुषको पहले अपने बायें पैर तथा बादमें दाहिने पैर में - इस प्रकार प्रत्येकमें चार-॥ २३ चार बार मिट्टी लगाकर शुद्धि करनी चाहिये ॥ २३ ॥

शुद्धि सम्बन्धी यह नियम गृहस्थोंके लिये है । ब्रह्मचारीको इससे दुगुनी, वानप्रस्थको तीन गुनी तथा २४ संन्यासीको चार गुनी शुद्धि करनेका विधान है ॥ २४ ॥

शौचकर्ममें प्रत्येक बार आर्द्र आँवले के बराबर मिट्टी सदा लेनी चाहिये, इससे कम कभी नहीं लेनी चाहिये । दिनमें मल त्यागके बादकी २५ शुद्धिका यही नियम है । रात्रिमें इससे आधे, रोगीके लिये उससे आधे तथा मार्गमें स्थित व्यक्तिके लिये उससे भी आधे परिमाणमें शुद्धिका विधान २६ बताया गया है ॥ २५-२६ ॥ स्त्रियों, शूद्रों, अशक्तजनों तथा बालकोंके लिये शौचकर्ममें मिट्टी लगानेकी कोई संख्या नहीं है । २७ जितनी बारमें दुर्गन्ध समाप्त हो जाय, उतनी बार मिट्टी लगानी चाहिये । जबतक दुर्गन्धि मिट नहीं जाती, तबतक बार - बार मिट्टीके अनुलेपनसे शुद्धि-कर्म करनेका विधान है । यह नियम सभी वर्णोंके २८ । लिये है - ऐसा भगवान् मनुने कहा है ॥ २७-२८ ॥

पृष्ठ 670

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अ ० २ ] वामहस्तेन शौचं तु कुर्याद्वै दक्षिणेन न नाभेरधो वामहस्तो नाभेरूर्ध्वं तु दक्षिणः शौचकर्मणि विज्ञेयो नान्यथा द्विजपुङ्गवैः जलपात्रं न गृह्णीयाद्विण्मूत्रोत्सर्जने बुधः गृह्णीयाद्यदि मोहेन प्रायश्चित्तं चरेत्ततः । मोहाद्वाप्यथवालस्यान्न कुर्याच्छौचमात्मनः

जलाहारस्त्रिरात्रः स्यात्ततो जापाच्च शुध्यति ।

देशकालद्रव्यशक्तिस्वोपपत्तीश्च सर्वशः ॥

ज्ञात्वा शौचं प्रकर्तव्यमालस्यं नात्र धारयेत् ।

पुरीषोत्सर्जने कुर्याद् गण्डूषान्द्वादशैव तु ॥

चतुरो मूत्रविक्षेपे नातो न्यूनान्कदाचन ।

अधोमुखं नरः कृत्वा त्यजेत्तं वामतः शनैः ॥

आचम्य च ततः कुर्याद्दन्तधावनमादरात् ।

कण्टकिक्षीरवृक्षोत्थं द्वादशाङ्गुलमव्रणम् ॥

कनिष्ठिकाग्रवत्स्थूलं पूर्वार्धे कृतकूर्चकम् ।

करञ्जोदुम्बरौ चूतः कदम्बो लोध्रचम्पकौ ।

बदरीति द्रुमाश्चेति प्रोक्ता दन्तप्रधावने ॥

अन्नाद्याय व्यूहध्वंसे सोमो राजायमागमत् ।

स मे मुखं प्रक्षाल्य तेजसा च भगेन च ॥

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च ।

ब्रह्मप्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो देहि वनस्पते ॥

अभावे दन्तकाष्ठस्य प्रतिषिद्धदिनेषु च ।

अपां द्वादशगण्डूषैर्विदध्याद्दन्तधावनम् ॥

एकादश स्कन्ध ६६१ । शुद्धि - कार्य दाहिने हाथसे न करके सदा बायें ॥ २ ९ हाथसे ही करना चाहिये । नाभिसे नीचे बायें हाथ तथा इससे ऊपर दाहिने हाथका प्रयोग करना चाहिये ॥ शौचकर्मके सम्बन्धमें श्रेष्ठ द्विजोंको यही नियम समझना चाहिये, इसके विपरीत नहीं ॥ २ ९ ३ ॥ ॥ ३० मल - मूत्रका त्याग करते समय विद्वान्‌को जलपात्र हाथमें नहीं लिये रहना चाहिये । यदि अज्ञानतावश लेता है तो बादमें प्रायश्चित्त करना चाहिये । मोह ॥ ३१ अथवा आलस्यवश यदि वह अपनी शुद्धि नहीं करता तो [ इसके प्रायश्चित्तस्वरूप ] तीन रात केवल जलके आहारपर रहना चाहिये । इसके बाद गायत्रीजपसे ३२ शुद्धि हो जाती है ॥ ३०-३१३ ॥ देश, काल, द्रव्य, शक्ति तथा अपने साधनोंपर भलीभाँति विचार करके शुद्धिकार्य करना चाहिये; इसमें आलस्य नहीं करना चाहिये ॥ ३२३ ॥

३३ मल - त्यागके उपरान्त शुद्धिके लिये बारह बार तथा मूत्र त्यागके उपरान्त चार बार कुल्ला करना चाहिये; इससे कम कभी नहीं करना चाहिये । ३४ मनुष्यको चाहिये कि मुख नीचे करके कुल्लेका जल धीरे - धीरे अपने बायीं ओर फेंके ॥ ३३-३४ ॥ तत्पश्चात् आचमन करके सावधानीपूर्वक दन्त-३५ धावन करना चाहिये । इसके लिये काँटे तथा दूधवाले वृक्षसे बारह अंगुलके प्रमाणवाली, छिद्ररहित, कनिष्ठिका अँगुली अग्र भागके सदृश मोटाईवाली तथा आधे भागतक कूर्चके समान बनायी गयी दातौन लेनी चाहिये । करंज, गूलर, आम, कदम्ब, लोध, चम्पा ३६ तथा बेरके वृक्ष दन्तधावनके लिये उत्तम कहे गये हैं ॥ ३५-३६ ॥ [ उस समय ऐसी प्रार्थना करे ] अन्न आदिको ३७ सुपाच्य बनाने तथा विघ्नोंको दूर करनेके लिये स्वयं ये [ वनस्पतियोंके ] राजा सोम यहाँ आये हुए हैं । वे अपने तेज तथा ऐश्वर्यसे मेरे मुखका प्रक्षालन करें । हे वनस्पते! आप मुझे आयु, बल, यश, तेज, प्रजा, ३८ पशु, धन, ब्रह्मज्ञान तथा मेधा प्रदान करें ॥ ३७-३८ ॥ दन्तकाष्ठके अभावमें अथवा निषिद्ध तिथियों में जलसे बारह बार कुल्ला कर लेनेसे दन्तधावनकी ३ ९ । विधि पूर्ण हो जाती है ॥३ ९ ॥