देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 671–680

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 671–680

पृष्ठ 671

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६६२ रवेर्दिने यः कुरुते प्राणी दन्तस्य धावनम् सविता भक्षितस्तेन स्वकुलं तेन घातितम् प्रतिपद्दर्शषष्ठीषु नवम्येकादशीरवौ । दन्तानां काष्ठसंयोगाद्दहत्यासप्तमं कुलम् कृत्वालं पादशौचं ह्यमलमथ जलं त्रिः पिबेद् द्विर्विसृज्य तर्जन्याङ्गुष्ठवत्या सजलमभिमृशे-न्नासिकारन्ध्रयुग्मम् अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां नयनयुगयुतं कर्णयुग्मं कनिष्ठा-ङ्गुष्ठाभ्यां नाभिदेशे हृदयमथ तले-नाङ्गुलीभिः शिरांसि ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ । जो मनुष्य रविवारको दन्तधावन करता है, उसने ॥ ४० मानो सूर्यका ही भक्षण कर लिया तथा अपने कुलका स्वयं विनाश कर लिया । साथ ही प्रतिपदा, अमावास्या, ॥ ४१ षष्ठी, नवमी, एकादशी तथा रविवारको काष्ठसे दन्तधावन करनेसे वह व्यक्ति अपनी सात पीढ़ियोंको जला डालता है ॥ ४०-४१ ॥ पाद - प्रक्षालन करके तीन बार शुद्ध जलसे आचमन करनेके पश्चात् दो बार मुख पोंछ लेना चाहिये । तदनन्तर जल लेकर तर्जनी तथा अँगूठेसे दोनों नासिकाछिद्रोंका, अँगूठे तथा अनामिकासे दोनों नेत्रों तथा दोनों कानोंका, कनिष्ठा तथा अँगूठेसे नाभिस्थलका, हाथके तलसे हृदयका और सभी ४२ । अँगुलियोंसे सिरका स्पर्श करना चाहिये ॥ ४२ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे शौचविधिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः सदाचार - वर्णन और रुद्राक्ष धारणका माहात्म्य श्रीनारायण उवाच

( शुद्धं स्मार्तं चाचमनं पौराणं वैदिकं तथा ।

तान्त्रिकं श्रौतमित्याहुः षड्विधं श्रुतिचोदितम् ॥

विण्मूत्रादिकशौचं च शुद्धं च परिकीर्तितम् ।

स्मार्तं पौराणिकं कर्म आचान्ते विधिपूर्वकम् ॥

वैदिकं श्रौत्रमित्यादि ब्रह्मयज्ञादिपूर्वकम् । अस्त्रविद्यादिकं कर्म तान्त्रिको विधिरुच्यते ॥ )

स्मृत्वा चोङ्कारगायत्रीं निबध्नीयाच्छिखां तथा ।

पुनराचम्य हृदयं बाहू स्कन्धौ च संस्पृशेत् ॥

क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तोच्छिष्टे तथानृते ।

पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ॥

अग्निरापश्च वेदाश्च सोमः सूर्योऽनिलस्तथा ।

सर्वे नारद विप्रस्य कर्णे तिष्ठन्ति दक्षिणे ॥

श्रीनारायण बोले- ( शुद्ध, स्मार्त, पौराणिक, वैदिक, तान्त्रिक तथा श्रौत - यह छः प्रकारका श्रुति-प्रतिपादित आचमन कहा गया है । मल - मूत्रादिके विसर्जनके पश्चात् शुद्धिके लिये किया जानेवाला आचमन शुद्ध आचमन कहा गया है । कर्मके पूर्व किया गया आचमन स्मार्त तथा पौराणिक कहा जाता है । ब्रह्मयज्ञ ( वेदपाठ ) आरम्भ करनेके पूर्व किया गया आचमन वैदिक तथा श्रौत एवं अस्त्र - विद्या आदि कर्मोंके प्रारम्भसे पूर्व कृत आचमन तान्त्रिक आचमन कहा जाता है | ) ॐकार तथा गायत्री मन्त्रका स्मरण करके शिखाबन्धन करे । तत्पश्चात् आचमन करके हृदय, १ दोनों भुजाओं तथा दोनों स्कन्धोंका स्पर्श करे ॥१ ॥

छींकने, थूकने, दाँतोंसे जूठनका स्पर्श हो जाने, झूठ बोलने तथा पतितोंसे बातचीत हो जानेपर २ शुद्धिहेतु दाहिने कानका स्पर्श करना चाहिये । हे नारद! अग्नि, जल, चारों वेद, चन्द्रमा, सूर्य तथा वायु — ये सब ब्राह्मणके दाहिने कानपर विराजमान ३ | रहते हैं ॥ २-३ ॥

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अ ० ३ ] एकादश स्कन्ध ६६३

ततस्तु गत्वा नद्यादौ प्रातः स्नानं विशोधनम् ।

समाचरेन्मुनिश्रेष्ठ देहसंशुद्धिहेतवे ॥ ४

अत्यन्तमलिनो देहो नवद्वारैर्मलं वहन् ।

सदास्ते तच्छोधनाय प्रातः स्नानं विधीयते ॥ ५

अगम्यागमनात्पापं यच्च पापं प्रतिग्रहात् ।

रहस्याचरितं पापं मुच्यते स्नानकर्मणा ॥ ६

अस्नातस्य क्रियाः सर्वा भवन्ति विफला यतः ।

तस्मात्प्रातश्चरेत्स्नानं नित्यमेव दिने दिने ॥ ७

दर्भयुक्तश्चरेत्स्नानं तथा सन्ध्याभिवन्दनम् ।

सप्ताहं प्रातरस्नायी सन्ध्याहीनस्त्रिभिर्दिनैः ॥ ८

द्वादशाहमनग्निः सन्द्विजः शूद्रत्वमाप्नुयात् ।

अल्पत्वाद्धोमकालस्य बहुत्वात्स्नानकर्मणः ॥ ९

प्रातर्न तु तथा स्नायाद्धोमकाले विगर्हितः ।

गायत्र्यास्तु परं नास्ति इह लोके परत्र च ॥१०

गायन्तं त्रायते यस्माद् गायत्रीत्यभिधीयते ।

प्रणवेन तु संयुक्तां व्याहृतित्रयसंयुताम् ॥ ११

वायुं वायौ जयेद्विप्रः प्राणसंयमनत्रयात् ।

ब्राह्मणः श्रुतिसम्पन्नः स्वधर्मनिरतः सदा ॥ १२

स वैदिकं जपेन्मन्त्रं लौकिकं न कदाचन ।

गौशृङ्गे सर्षपो यावत् तावद्येषां न स स्थिरः ॥ १३ ।

हे मुनिश्रेष्ठ! तत्पश्चात् नदी आदिपर जाकर देह - शुद्धिके लिये विधिपूर्वक प्रातः कालिक स्नान करना चाहिये । नौ द्वारोंसे निरन्तर मल निकालनेवाला शरीर अत्यन्त अशुद्ध रहता है, अतएव उसकी शुद्धिके लिये प्रभात - वेलामें स्नान किया जाता है । अगम्या स्त्रीके साथ गमन करने, प्रतिग्रह स्वीकार करने तथा एकान्तमें निन्द्य कर्म करनेसे जो पाप लगता है, उन सभीसे मनुष्य प्रातः स्नान कर लेनेसे मुक्त हो जाता है ॥ ४–६ ॥ चूँकि प्रात: स्नान न करनेवालेकी सभी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं, अतएव प्रतिदिन प्रातः कालीन स्नान अवश्य ही करना चाहिये ॥ ७ ॥

स्नान तथा सन्ध्यावन्दन - कार्य कुशसहित करना चाहिये । सात दिनोंतक प्रात: काल स्नान न करनेवाला, तीन दिनोंतक सन्ध्योपासन न करनेवाला तथा बारह दिनोंतक अग्निकर्म ( हवन ) न करनेवाला द्विज शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ८३ ॥

स्नानादिके अधिक समय - साध्य होनेके फलस्वरूप हवन - कर्मके लिये कम समय बचनेके कारण प्रात: काल उस प्रकार स्नान न करे कि होम - कार्य उचित समयपर सम्पन्न न हो पानेसे कर्ताको निन्दाका पात्र बनना पड़े ॥ ९ ३ ॥ गायत्रीसे बढ़कर इस लोक तथा परलोकमें दूसरा कुछ भी नहीं है । चूँकि यह उच्चारण करनेवालेकी रक्षा करती है, अतः इसे गायत्री नामसे अभिहित किया जाता है ॥१० ॥

तीन बार प्राणायाम करके विप्रको प्राणवायुको अपानवायुमें नियन्त्रित करना चाहिये और प्रणव ( ॐकार ) तथा व्याहृतियों ( भूर्भुवः स्वः ) -सहित गायत्री - जप करना चाहिये ॥ ११३ ॥

श्रुति - सम्पन्न ब्राह्मणको सदा अपने धर्मका पालन करना चाहिये । उसे वैदिक मन्त्रका जप करना चाहिये, लौकिक मन्त्रका जप कभी नहीं करना चाहिये ॥ १२३ ॥

गायकी सींगपर सरसों जितने समयतक स्थिर रह सकती है, उतने समय भी जिनका प्राणवायु प्राणायाम - कालमें नहीं रुकता, वे अपने दोनों पक्षों

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६६४ न तारयन्त्युभौ पक्षौ पितॄनेकोत्तरं शतम् सगर्भो जपसंयुक्तस्त्वगर्भो ध्यानमात्रकः स्नानाङ्गतर्पणं कृत्वा देवर्षिपितृतोषकम् । शुद्धे वस्त्रे परीधाय जलाद् बहिरुपागतः विभूतिधारणं कार्यं रुद्राक्षाणां च धारणम् । क्रमयोगेन कर्तव्यं सर्वदा जपसाधकैः रुद्राक्षान्कण्ठदेशे दशनपरिमिता-नमस्तके विंशती द्वे षट् षट् कर्णप्रदेशे करयुगलकृते द्वादश द्वादशैव । बाह्वोरिन्दोः कलाभिर्नयनयुगकृते त्वेकमेकं शिखायां वक्षस्यष्टाधिकं यः कलयति शतकं स स्वयं नीलकण्ठः ॥ बद्ध्वा स्वर्णेन रुद्राक्षं रजतेनाथवा मुने । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ । ( माता - पिता ) - की एक सौ एक पीढ़ियोंके पितरोंको ॥ १४ कभी नहीं तार सकते । जपसहित किया गया प्राणायाम सगर्भ और केवल ध्यानयुक्त प्राणायाम अगर्भ नामवाला है॥१३-१४ ॥ ॥ १५ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको सन्तुष्ट करनेके निमित्त स्नानांग - तर्पण करना चाहिये । पुनः जलसे बाहर आकर दो शुद्ध वस्त्र धारण करके विभूति तथा ॥ १६ रुद्राक्षकी माला धारण करनी चाहिये । इस प्रकार जप- साधना करनेवालोंको क्रमसे यह सब सदैव करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥ जो व्यक्ति अपने कण्ठमें बत्तीस, मस्तकपर चालीस, दोनों कानोंमें छः - छः, दोनों हाथोंमें बारह-बारह, दोनों बाहुओंमें चन्द्रकलाके बराबर सोलह-सोलह, दोनों नेत्रोंमें एक - एक, शिखामें एक तथा वक्ष: स्थलपर एक सौ आठ रुद्राक्ष धारण करता है, वह साक्षात् नीलकण्ठ शिव हो जाता है ॥ १७ ॥

हे मुने! सोने अथवा चाँदीके तारमें पिरोकर मनुष्यको शिखामें, दोनों कानोंमें, यज्ञोपवीतमें, हाथमें, १७ कण्ठमें तथा उदरपर श्रीपंचाक्षर मन्त्र ' नमः शिवाय ' अथवा प्रणव ( ओंकार ) - के जपके साथ समाहित शिखायां धारयेन्नित्यं कर्णयोर्वा समाहितः ॥ १८ होकर रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥

यज्ञोपवीते हस्ते वा कण्ठे तुन्देऽथवा नरः ।

श्रीमत्पञ्चाक्षरेणैव प्रणवेन तथापि वा ॥

निर्व्याजभक्त्या मेधावी रुद्राक्षं धारयेन्मुदा ।

रुद्राक्षधारणं साक्षाच्छिवज्ञानस्य साधनम् ॥

रुद्राक्षं यच्छिखायां तत्तारतत्त्वमिति स्मरेत् ।

कर्णयोरुभयोर्ब्रह्मन् देवं देवीं च भावयेत् ॥

यज्ञोपवीते वेदांश्च तथा हस्ते दिशः स्मरेत् ।

कण्ठे सरस्वतीं देवीं पावकं चापि भावयेत् ॥

सर्वाश्रमाणां वर्णानां रुद्राक्षाणां च धारणम् ।

कर्तव्यं मन्त्रतः प्रोक्तं द्विजानां नान्यवर्णिनाम् ॥

मेधावी पुरुषको निष्कपट भक्तिके साथ प्रसन्नतापूर्वक रुद्राक्ष धारण करना चाहिये; क्योंकि रुद्राक्ष धारण करना साक्षात् शिवज्ञानकी प्राप्तिका १ ९ साधन है ॥ २० ॥

जो रुद्राक्ष शिखामें धारण किया जाता है, उसे तारक तत्त्वकी भाँति समझना चाहिये । हे ब्रह्मन्! दोनों २० कानोंमें धारण किये गये रुद्राक्षमें शिव तथा शिवाकी भावना करनी चाहिये । यज्ञोपवीतमें धारण किये गये रुद्राक्षको चारों वेद तथा हाथमें धारण किये गये २१ रुद्राक्षको दिशाएँ जानना चाहिये । कण्ठमें धारित रुद्राक्षको देवी सरस्वती तथा अग्निके तुल्य मानना चाहिये ॥ २१-२२ ॥ २२ सभी आश्रमों तथा वर्णोंके लोगोंके लिये रुद्राक्ष-धारण करनेका विधान है । द्विजोंको मन्त्रोच्चारण के साथ रुद्राक्ष धारण करना चाहिये, किंतु अन्य वर्णके २३ लोगोंको नहीं ॥ २३ ॥

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अ ० ३ ] एकादश

रुद्राक्षधारणाद्रुद्रो भवत्येव न संशयः ।

पश्यन्नपि निषिद्धांश्च तथा शृण्वन्नपि स्मरन् ॥ २४

जिघ्रन्नपि तथा चाश्नन् प्रलपन्नपि सन्ततम् ।

कुर्वन्नपि सदा गच्छन्विसृजन्नपि मानवः ॥ २५

रुद्राक्षधारणादेव सर्वपापैर्न लिप्यते ।

अनेन भुक्तं देवेन भुक्तं यत्तु तथा भवेत् ॥ २६

पीतं रुद्रेण तत्पीतं घ्रातं घ्रातं शिवेन तत् ।

रुद्राक्षधारणे लज्जा येषामस्ति महामुने ॥ २७

तेषां नास्ति विनिर्मोक्ष: संसाराज्जन्मकोटिभिः ।

रुद्राक्षधारिणं दृष्ट्वा परिवादं करोति यः ॥ २८

उत्पत्तौ तस्य साङ्कर्यमस्त्येवेति विनिश्चयः ।

रुद्राक्षधारणादेव रुद्रो रुद्रत्वमाप्नुयात् ॥ २ ९

मुनयः सत्यसङ्कल्पा ब्रह्मा ब्रह्मत्वमागतः ।

रुद्राक्षधारणाच्छ्रेष्ठं न किञ्चिदपि विद्यते ॥ ३०

रुद्राक्षधारिणे भक्त्या वस्त्रं धान्यं ददाति यः ।

सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति ॥ ३१

रुद्राक्षधारिणं श्राद्धे भोजयेत विमोदतः ।

पितृलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ३२

रुद्राक्षधारिणः पादौ प्रक्षाल्याद्भिः पिबेन्नरः ।

सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥ ३३

हारं वा कटकं वापि सुवर्णं वा द्विजोत्तमः ।

रुद्राक्षसहितं भक्त्या धारयन् रुद्रतामियात् ॥ ३४

रुद्राक्षं केवलं वापि यत्र कुत्र महामते ।

समन्त्रकं वा मन्त्रेण रहितं भाववर्जितम् ॥ ३५

यो वा को वा नरो भक्त्या धारयेल्लज्जयापि वा ।

सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग्ज्ञानमवाप्नुयात् ॥ ३६

स्कन्ध ६६५ रुद्राक्ष धारण कर लेनेसे व्यक्ति साक्षात् रुद्ररूप हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है । निषिद्ध चीजोंको देखने, उनके विषयमें सुनने, उनका स्मरण करने, उन्हें सूँघने, खाने, निरन्तर उनके विषयमें बातचीत करने, सदा ऐसे कर्म करने, अपरित्याज्य अर्थात् विहितका परित्याग करनेपर रुद्राक्ष धारण कर लेनेसे मनुष्य सभी प्रकारके पापोंसे प्रभावित नहीं होता । ऐसे व्यक्तिने जो कुछ ग्रहण कर लिया, उसे मानो शिवजीने स्वीकार कर लिया, उसने जो भी पी लिया, उसे शिवजीने पी लिया तथा जो कुछ सूँघ लिया, उसे भी मानो शिवजीने ही सूँघ लिया ॥ २४ – २६३ ॥ हे महामुने! जो लोग रुद्राक्ष धारण करनेमें लज्जाका अनुभव करते हैं, करोड़ों जन्मोंमें भी संसारसे उनका मोक्ष नहीं हो सकता ॥ २७३ ॥

किसी रुद्राक्ष धारण करनेवालेको देखकर जो मनुष्य उसकी निन्दा करता है, उसके उत्पन्न होनेमें वर्णसंकरताका दोष निश्चितरूपसे विद्यमान होता है ॥ २८३ ॥

रुद्राक्ष धारण करनेसे ही रुद्र रुद्रत्वको प्राप्त हुए, मुनिगण सत्यसंकल्पवाले हुए तथा ब्रह्माजी ब्रह्मत्वको प्राप्त हुए । अतएव रुद्राक्ष धारण करनेसे अतिरिक्त कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है ॥ २ ९ -३० ॥ जो मनुष्य रुद्राक्ष धारण करनेवालेको भक्तिपूर्वक वस्त्र तथा अन्न प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको जाता है ॥ ३१ ॥

जो व्यक्ति प्रसन्न होकर रुद्राक्ष धारण करनेवालेको श्राद्धकर्ममें भोजन कराता है, वह पितृलोकको प्राप्त होता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ३२ ॥

रुद्राक्ष धारण करनेवालेके दोनों चरणोंको जलसे प्रक्षालित करके उस जलको पीनेवाला मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३३ ॥

भक्तिपूर्वक रुद्राक्षसहित हार, कड़ा या स्वर्णाभूषण धारण करनेवाला द्विजश्रेष्ठ रुद्रत्वको प्राप्त होता है ॥ ३४ ॥

हे महामते! जो कोई भी मनुष्य जहाँ - कहीं भी समन्त्रक या अमन्त्रक अथवा भावरहित होकर अथवा लज्जासे भी भक्तिपूर्वक केवल रुद्राक्ष धारण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सम्पूर्ण ज्ञानकी प्राप्ति कर लेता है ॥ ३५-३६ ॥

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६६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ अहो रुद्राक्षमाहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते । अहो, मैं रुद्राक्षमाहात्म्यका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ, अतएव पूर्ण प्रयत्नके साथ रुद्राक्ष धारण

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कुर्याद्रुद्राक्षधारणम् ॥ ३७ । करना चाहिये ॥ ३७ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सदाचारनिरूपणे रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अथ रुद्राक्षकी उत्पत्ति तथा नारद उवाच

एवंभूतानुभावोऽयं रुद्राक्षो भवतानघ ।

वर्णितो महतां पूज्यः कारणं तत्र किं वद ॥

श्रीनारायण उवाच

एवमेव पुरा पृष्टो भगवान् गिरिशः प्रभुः ।

षण्मुखेन च रुद्रस्तं यदुवाच शृणुष्व तत् ॥

ईश्वर उवाच

शृणु षण्मुख तत्त्वेन कथयामि समासतः ।

त्रिपुरो नाम दैत्यस्तु पुरासीत्सर्वदुर्जयः ॥

जितास्तेन सुराः सर्वे ब्रह्मविष्ण्वादिदेवताः ।

सर्वैस्तु कथिते तस्मिंस्तदाहं त्रिपुरं प्रति ॥

अचिन्तयं महाशस्त्रमघोराख्यं मनोहरम् ।

सर्वदेवमयं दिव्यं ज्वलन्तं घोररूपि यत् ॥

त्रिपुरस्य वधार्थाय देवानां तारणाय च ।

सर्वविघ्नोपशमनमघोरास्त्रमचिन्तयम् ॥

दिव्यवर्षसहस्त्रं तु चक्षुरुन्मीलितं मया ।

पश्चान्ममाकुलाक्षिभ्यः पतिता जलबिन्दवः ॥

तत्राश्रुबिन्दुतो जाता महारुद्राक्षवृक्षकाः ।

ममाज्ञया महासेन सर्वेषां हितकाम्यया ॥

बभूवुस्ते च रुद्राक्षा अष्टत्रिंशत्प्रभेदतः ।

सूर्यनेत्रसमुद्भूताः कपिला द्वादश स्मृताः ॥

चतुर्थोऽध्यायः उसके विभिन्न स्वरूपोंका वर्णन नारदजी बोले - हे अनघ! इस प्रकारका यह आपका महान् अनुग्रह है जो आपने रुद्राक्षके विषयमें १ बताया, यह महान् लोगोंके लिये पूज्य है, इसका क्या कारण है, इसे बताइये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] इसी तरहसे पूर्व कालमें षडानन स्कन्दकुमारने गिरिशायी भगवान् रुद्रसे पूछा था; तब उन्होंने उनसे जो कहा था, उसे २ आप सुनिये ॥ २ ॥

ईश्वर बोले - हे षडानन! सुनो, मैं [ रुद्राक्ष विषयमें ] संक्षेपमें यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ । प्राचीन कालमें सभी लोगोंसे अपराजेय त्रिपुर नामक ३ एक दैत्य था ॥३ ॥

उसने ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवताओंको जीत लिया था । तब सभी देवताओंके द्वारा उसके विषय में ४ मुझसे बतानेपर मैं समस्त देवताओंकी शक्ति से सम्पन्न, दिव्य, प्रज्वलित, भयानक रूपवाले तथा मनोहर ५ अघोर नामक एक महान् अस्त्रके विषयमें कल्पना करने लगा ॥ ४-५ ॥ उस त्रिपुरके संहार तथा देवताओंके उद्धारके ६ लिये मैं समस्त विघ्नोंका नाश करनेवाले उस अघोरास्त्र के लिये चिन्तन करता रहा और दिव्य एक हजार वर्षोंतक मैं नेत्र खोले रह गया । तत्पश्चात् अत्यन्त ७ । आकुल मेरे नेत्रोंसे जलकी बूँदें गिरने लगीं ॥ ६-७ ॥ उन अश्रु - बिन्दुओंसे रुद्राक्षके बड़े - बड़े वृक्ष उत्पन्न हो गये । हे महासेन! मेरी आज्ञासे सभी ८ लोगोंके कल्याणार्थ वे अड़तीस प्रकारके रुद्राक्ष हुए । मेरे सूर्यनेत्र ( दाहिने नेत्र ) - से उत्पन्न रुद्राक्ष कपिलवर्णके थे, वे बारह प्रकारके कहे गये हैं । मेरे चन्द्रनेत्र ( बायें ९ | नेत्र ) - से उत्पन्न रुद्राक्ष श्वेतवर्णवाले थे, वे क्रमसे

पृष्ठ 676

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अ ० ४ ] एकादश

सोमनेत्रोत्थिताः श्वेतास्ते षोडशविधाः क्रमात् ।

वह्निनेत्रोद्भवाः कृष्णा दश भेदा भवन्ति हि ॥। १०

श्वेतवर्णश्च रुद्राक्षो जातितो ब्राह्म उच्यते ।

क्षात्रो रक्तस्तथा मिश्रो वैश्यः कृष्णस्तु शूद्रकः ॥ ११

एकवक्त्रः शिवः साक्षाद् ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।

द्विवक्त्रो देवदेव्यो स्याद् विविधं नाशयेदघम् ॥ १२

त्रिवक्त्रस्त्वनलः साक्षात्स्त्रीहत्यां दहति क्षणात् ।

चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति ॥ १३

पञ्चवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निर्नाम नामतः ।

अभक्ष्यभक्षणोद्भूतैरगम्यागमनोद्भवैः ॥ १४

मुच्यते सर्वपापैस्तु पञ्चवक्त्रस्य धारणात् ।

षड्वक्त्रः कार्तिकेयस्तु स धार्यो दक्षिणे करे ॥ १५

ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ।

सप्तवक्त्रो महाभागो ह्यनङ्गो नाम नामतः ॥ १६

तद्धारणान्मुच्यते हि स्वर्णस्तेयादिपातकैः ।

अष्टवक्त्रो महासेन साक्षाद्देवो विनायकः ॥ १७

अन्नकूटं तूलकूटं स्वर्णकूटं तथैव च ।

दुष्टान्वयस्त्रियं वाथ संस्पृशंश्च गुरुस्त्रियम् ॥ १८

एवमादीनि पापानि हन्ति सर्वाणि धारणात् ।

विघ्नास्तस्य प्रणश्यन्ति याति चान्ते परं पदम् ॥ १ ९

भवन्त्ये गुणाः सर्वे ह्यष्टवक्त्रस्य धारणात् । स्कन्ध ६६७ सोलह प्रकारके हैं । इसी प्रकार अग्निनेत्र ( तीसरे नेत्र ) - से उत्पन्न रुद्राक्ष कृष्णवर्णके थे, उनके दस भेद हैं ॥ ८-१० ॥ श्वेतवर्णका रुद्राक्ष जातिसे ब्राह्मण, रक्तवर्णका रुद्राक्ष क्षत्रिय, मिश्रवर्णका रुद्राक्ष वैश्य तथा कृष्णवर्णका रुद्राक्ष शूद्र कहा जाता है ॥११ ॥

एकमुखी रुद्राक्ष साक्षात् शिवस्वरूप है, वह ब्रह्महत्या - तकके पापको मिटा देता है । दोमुखी रुद्राक्ष देवी - देवता – इन दोनोंका स्वरूप है, वह दो प्रकारके पापोंका शमन करता है । तीन मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् अग्निस्वरूप है, वह स्त्री - वधजनित पापको क्षणभरमें भस्म कर डालता है । चार मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्मास्वरूप है, वह नरवधजनित पापको दूर करता है ॥ १२-१३ ॥ पंचमुखी रुद्राक्ष साक्षात् कालाग्नि नामवाले रुद्रका स्वरूप है । पंचमुखी रुद्राक्षके धारण करनेसे मनुष्य अभक्ष्य वस्तुओंके भक्षणसे उत्पन्न होनेवाले तथा अगम्या नारीके साथ सहवास करनेसे लगे हुए सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १४३ ॥

छः मुखवाला रुद्राक्ष कार्तिकेयका स्वरूप है, उसे दाहिने हाथमें धारण करना चाहिये | इसे धारण करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १५३ ॥

सप्तमुखी रुद्राक्ष अनंग नामवाले महाभाग्यशाली कामदेवका रूप है । उसे धारण करनेसे मनुष्य स्वर्णकी चोरी आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १६३ ॥

हे महासेन! आठ मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् विनायक देव है । इसे धारण करनेसे अन्न, वस्त्र तथा स्वर्ण आदिकी विपुल मात्रामें प्राप्ति होती है । धारण करनेपर यह रुद्राक्ष दूषित कुलकी स्त्री तथा गुरुपत्नीके साथ संसर्ग करनेसे लगनेवाले पापों और इसी प्रकारके अन्यान्य पापोंको भी नष्ट कर देता है । उस मनुष्यकी सभी विघ्न - बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं तथा अन्तमें वह परमपदको प्राप्त होता है । ये सभी गुण अष्टमुखी रुद्राक्षके धारण करनेसे फलीभूत होते हैं ॥ १७–१९ ३ ॥

पृष्ठ 677

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६६८ नववक्त्रो भैरवस्तु धारयेद्वामबाहुके भुक्तिमुक्तिप्रदः प्रोक्तो मम तुल्यबलो भवेत् । भ्रूणहत्यासहस्राणि ब्रह्महत्याशतानि च सद्यः प्रलयमायान्ति नववक्त्रस्य धारणात् । दशवक्त्रस्तु देवेशः साक्षाद्देवो जनार्दनः

ग्रहाश्चैव पिशाचाश्च वेताला ब्रह्मराक्षसाः ।

पन्नगाश्चोपशाम्यन्ति दशवक्त्रस्य धारणात् ॥

वक्त्रैकादशरुद्राक्षो रुद्रैकादशकं स्मृतम् ।

शिखायां धारयेद्यो वै तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

अश्वमेधसहस्त्रस्य वाजपेयशतस्य च ।

गवां शतसहस्त्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् ॥

तत्फलं लभते शीघ्रं वक्त्रैकादशधारणात् ।

द्वादशास्यस्य रुद्राक्षस्यैव कर्णे तु धारणात् ॥

आदित्यास्तोषिता नित्यं द्वादशास्ये व्यवस्थिताः ।

गोमेधे चाश्वमेधे च यत्फलं तदवाप्नुयात् ॥

शृङ्गिणां शस्त्रिणां चैव व्याघ्रादीनां भयं न हि ।

न च व्याधिभयं तस्य नैव चाधिः प्रकीर्तितः ॥

न च किञ्चिद्भयं तस्य न च व्याधिः प्रवर्तते ।

न कुतश्चिद्भयं तस्य सुखी चैवेश्वरो भवेत् ॥

हस्त्यश्वमृगमार्जारसर्पमूषकदर्दुरान् खरांश्च श्वशृगालांश्च हत्वा बहुविधानपि ॥

मुच्यते नात्र सन्देहो वक्त्रद्वादशधारणात् ।

वक्त्रत्रयोदशो वत्स रुद्राक्षो यदि लभ्यते ॥

कार्तिकेयसमो ज्ञेयः सर्वकामार्थसिद्धिदः ।

रसो रसायनं चैव तस्य सर्वं प्रसिद्ध्यति ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ ॥ २० नौ मुखवाला रुद्राक्ष भैरवस्वरूप है, इसे बायीं भुजापर धारण करना चाहिये । यह भोग तथा मोक्ष देनेवाला बताया गया है । इसे धारण करनेवाला मेरे ॥ २१ समान बलवान् हो जाता है । हजारों भ्रूणहत्या तथा सैकड़ों ब्रह्महत्याके पाप इस नौमुखी रुद्राक्षके धारण करनेसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ २०-२१३ ॥ ॥ २२ दसमुखी रुद्राक्ष साक्षात् देवेश्वर जनार्दन है । इस दस मुखवाले रुद्राक्ष धारण करनेसे ग्रहों, पिशाचों, बेतालों, ब्रह्मराक्षसों तथा पन्नगोंसे उत्पन्न होनेवाले २३ विघ्न शान्त हो जाते हैं । २२-२३ ॥ ग्यारह मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् एकादश रुद्र है । जो मनुष्य इसे शिखामें धारण करता है, उसके पुण्यफलके विषयमें सुनो । मनुष्य हजारों अश्वमेधयज्ञ २४ करने, वाजपेय - यज्ञ करने और सम्यक्रूपसे लाखों गायोंके दान करनेसे जो फल प्राप्त करता है, वही फल उसे ग्यारहमुखी रुद्राक्ष धारण करनेसे शीघ्र ही २५ प्राप्त हो जाता है || २४-२५३ ॥ बारह मुखवाले रुद्राक्षको कानमें धारण करनेसे द्वादश आदित्य प्रसन्न हो जाते हैं; क्योंकि वे रुद्राक्ष २६ बारहों मुखपर विराजमान रहते हैं । अश्वमेध करनेसे जो फल मिलता है, वह फल केवल इसे धारण करनेमात्रसे मनुष्यको प्राप्त हो जाता है । उसे सींगवाले २७ जानवरों, व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं तथा शस्त्रधारी शत्रुओंका भय नहीं होता । उसे शारीरिक तथा मानसिक कष्टका भी भय नहीं होता । उसे किसी २८ तरहका रोग नहीं होता तथा वह कहीं से भी किसी तरहके भयसे ग्रस्त न रहते हुए सदा सुख तथा ऐश्वर्यसे सम्पन्न रहता है । द्वादशमुखी रुद्राक्ष धारण २ ९ करनेवाला मनुष्य हाथी, घोड़े, मृग, बिल्ली, सर्प, चूहे, मेढक, गर्दभ, कुत्ते, सियार तथा अनेक प्रकारके जानवरोंको मारनेसे लगनेवाले पापसे मुक्त हो जाता ३० है; इसमें संशय नहीं है | २६ – ३०३ ॥ हे वत्स! तेरहमुखी रुद्राक्ष यदि प्राप्त हो जाय तो उसे कार्तिकेयके सदृश जानना चाहिये । वह सभी ३१ प्रकारकी कामनाओं, अर्थों तथा सिद्धियोंको देनेवाला है । उसके लिये रस - रसायन - सब कुछ सिद्ध हो जाता है तथा समस्त प्रकारके भोग्य - पदार्थ उसे प्राप्त ३२ हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । हे

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अ ० ५ ] एकादश

तस्यैव सर्वभोग्यानि नात्र कार्या विचारणा ।

मातरं पितरं चैव भ्रातरं वा निहन्ति यः ॥ ३३

मुच्यते सर्वपापेभ्यो धारणात्तस्य षण्मुख ।

चतुर्दशास्यो रुद्राक्षो यदि लभ्येत पुत्रक ॥ ३४ ।

धारयेत्सततं मूर्ध्नि तस्य पिण्डः शिवस्य तु ।

किं मुने बहुनोक्तेन वर्णनेन पुनः पुनः ॥ ३५

पूज्यते सन्ततं देवैः प्राप्यते च परा गतिः ।

रुद्राक्ष एकः शिरसा धार्यो भक्त्या द्विजोत्तमैः ॥ ३६

षड्विंशद्भिः शिरोमाला पञ्चाशद्धृदयेन तु ।

कलाक्षैर्बाहुवलये अर्काक्षैर्मणिबन्धनम् ॥ ३७

अष्टोत्तरशतैर्माला पञ्चाशद्भिः षडानन ।

अथवा सप्तविंशत्या कृत्वा रुद्राक्षमालिकाम् ॥ ३८

धारणाद्वा जपाद्वापि ह्यनन्तं फलमश्नुते ।

अष्टोत्तरशतैर्माला रुद्राक्षैर्धार्यते यदि ॥ ३ ९

क्षणे क्षणेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति षण्मुख ।

त्रिःसप्तकुलमुद्धृत्य शिवलोके महीयते ॥ ४० ।

स्कन्ध ६६ ९ षडानन! अपने माता - पिता अथवा भाईका वध करनेवाला व्यक्ति भी उस रुद्राक्षको धारण करने मात्र से समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३१-३३३ ॥ हे पुत्र! यदि किसीको चौदह मुखवाला रुद्राक्ष मिल जाय और वह उसे निरन्तर अपने मस्तकपर धारण करे तो उसका शरीर साक्षात् शिवतुल्य हो जाता है ॥३४३ ॥

[ श्रीनारायण बोले- ] हे मुने! अधिक कहने तथा बार - बार वर्णन करनेसे क्या प्रयोजन? देवतालोग भी उसकी निरन्तर पूजा करते हैं और अन्तमें उसे परमगति मिलती है ॥ ३५३ ॥

[ शिवजी बोले- ] हे षडानन उत्तम द्विजोंको भक्तिपूर्वक एक रुद्राक्ष सिरपर धारण करना चाहिये । छब्बीस रुद्राक्षोंकी माला बनाकर उसे सिरपर, पचास रुद्राक्षकी माला हृदयपर, सोलह रुद्राक्षकी माला बाहु - वलयपर तथा बारह रुद्राक्षकी माला मणिबन्धपर धारण करना चाहिये । एक सौ आठ रुद्राक्षोंकी माला अथवा पचास रुद्राक्षोंकी माला अथवा सत्ताईस रुद्राक्षोंकी माला बनाकर उसे धारण करने अथवा उससे जप करनेसे अनन्त फल प्राप्त होता है ॥ ३६ – ३८३ ॥ हे षडानन! यदि कोई मनुष्य एक सौ आठ रुद्राक्षोंसे निर्मित माला धारण करता है, तो वह प्रतिक्षण अश्वमेध -- यज्ञ करनेका फल प्राप्त करता है और अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके अन्तमें शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ३ ९ -४० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः जपमालाका स्वरूप तथा रुद्राक्ष - धारणका विधान ईश्वर उवाच ईश्वर बोले - हे षडानन! अब मैं जपमालाका लक्षणं जपमालायाः शृणु वक्ष्यामि षण्मुख । लक्षण बताऊँगा, उसे सुनो । रुद्राक्षके मुखको ब्रह्मा तथा बिन्दु ( ऊपरी भाग ) - को रुद्र कहा गया है I रुद्राक्षस्य मुखं ब्रह्मा बिन्दू रुद्र इतीरितः ॥ १ रुद्राक्षका पुच्छ ( नीचेका भाग ) विष्णुरूप है, यह विष्णुः पुच्छं भवेच्चैव भोगमोक्षफलप्रदम् । भोग तथा मोक्षका फल प्रदान करता है ॥ १३ ॥

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६७० पञ्चविंशतिभिश्चाक्षैः पञ्चवक्त्रैः सकण्टकैः

रक्तवर्णैः सितैर्मिश्रैः कृतरन्ध्रविदर्भितैः ।

अक्षसूत्रं प्रकर्तव्यं गोपुच्छवलयाकृति ॥

वक्त्रं वक्त्रेण संयोज्य पुच्छं पुच्छेन योजयेत् ।

मेरुमूर्ध्वमुखं कुर्यात्तदूर्ध्वं नागपाशकम् ॥

एवं संग्रथितां मालां मन्त्रसिद्धिप्रदायिनीम् ।

प्रक्षाल्य गन्धतोयेन पञ्चगव्येन चोपरि ॥

ततः शिवाम्भसाक्षाल्य ततो मन्त्रगणान् न्यसेत् ।

स्पृष्ट्वा शिवास्त्रमन्त्रेण कवचेनावगुण्ठयेत् ॥

मूलमन्त्रं न्यसेत्पश्चात्पूर्ववत्कारयेत्तथा ।

सद्योजातादिभिः प्रोक्ष्य यावदष्टोत्तरं शतम् ॥

मूलमन्त्रं समुच्चार्य शुद्धभूमौ निधाय च ।

तस्योपरि न्यसेत्साम्बं शिवं परमकारणम् ॥

प्रतिष्ठिता भवेन्माला सर्वकामफलप्रदा ।

यस्य देवस्य यो मन्त्रस्तां तेनैवाभिपूजयेत् ॥

मूर्ध्नि कण्ठेऽथवा कर्णे न्यसेद्वा जपमालिकाम् ।

रुद्राक्षमालया चैवं जप्तव्यं नियतात्मना ॥

कण्ठे मूर्ध्नि हृदि प्रान्ते कर्णे बाहुयुगेऽथवा । रुद्राक्षधारणं नित्यं भक्त्या परमया युतः ।

किमत्र बहुनोक्तेन वर्णनेन पुनः पुनः ।

रुद्राक्षधारणं नित्यं तस्मादेतत्प्रशस्यते ॥

स्नाने दाने जपे होमे वैश्वदेवे सुरार्चने ।

प्रायश्चित्ते तथा श्राद्धे दीक्षाकाले विशेषतः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ ॥ २ श्वेतवर्ण या रक्तवर्ण या मिश्रित वर्णवाले, छिद्रयुक्त, अखण्डित तथा काँटेदार पाँच मुखवाले पचीस रुद्राक्षोंसे गायकी पूँछके आकारकी एक ३ अक्षमाला बनानी चाहिये ॥ २-३ ॥ [ माला बनानेके लिये ] एक दानेका मुख दूसरे दानेके मुखसे संयोजित करते हुए एक दानेका पुच्छ ( नुकीला भाग ) दूसरे दानेके पुच्छसे जोड़ते जाना ४ चाहिये । सुमेरुका मुख ऊपरकी तरफ और नागपाश उसके ऊपर करना चाहिये ॥ ४ ॥

इस प्रकार गूँथी गयी मन्त्र - सिद्धिप्रदायिनी मालाको ५ पहले गन्धोदक और बादमें पंचगव्यसे विधिवत् प्रक्षालित करके तथा पुन: शिवाभिषिक्त जलसे स्नान करानेके पश्चात् इसमें मन्त्रोंका न्यास करना चाहिये । ६ शिवास्त्रमन्त्रसे स्पर्श करके कवच - मन्त्र ( हुम् ) -से अवगुंठन करना चाहिये ॥ ५-६ ॥ इसके बाद मूलमन्त्रसे पूर्ववत् न्यास करे तथा ७ गुरु आदिसे न्यास कराये । पुनः सद्योजात आदि मन्त्रोंसे एक सौ आठ बार उसपर जलसे प्रोक्षण करनेके पश्चात् मूलमन्त्रका उच्चारण करके उसे शुद्ध भूमिपर रखकर उसके ऊपर जगत् के परम कारण ८ साम्बसदाशिवका न्यास करना चाहिये ॥ ७-८ ॥ इस प्रकार प्रतिष्ठित की गयी माला समस्त कामनाओंका फल प्रदान करनेवाली होती है । जिस ९ देवताका जो मन्त्र सिद्ध करना हो, उसी मन्त्रसे उस मालाका पूजन करना चाहिये ॥ ९ ॥

जपमालाको मस्तकपर, गलेमें अथवा कानपर १० धारण करना चाहिये और संयतचित्त होकर रुद्राक्षमालासे ही जप करना चाहिये । परम श्रद्धासे युक्त होकर रुद्राक्षकी माला कण्ठमें, मस्तकपर, हृदयपर, पार्श्वभागमें, ११ कानमें तथा दोनों भुजाओं पर नित्य धारण करनी चाहिये ॥ १०- ०-११ ॥ रुद्राक्षके सम्बन्धमें अधिक कहने तथा बार - बार वर्णन करनेसे क्या लाभ? अतः नित्य रुद्राक्ष धारण १२ करना श्रेयस्कर है । विशेष करके स्नान, दान, जप, होम, बलिवैश्वदेव, देवपूजन, प्रायश्चित्त कर्म, श्राद्ध तथा दीक्षाके समय इसे अवश्य धारण करना १३ | चाहिये ॥ १२-१३ ॥

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अ ०५ ] एकादश

अरुद्राक्षधरो भूत्वा यत्किञ्चित्कर्म वैदिकम् ।

कुर्वन्विप्रस्तु मोहेन नरके पतति ध्रुवम् ॥ १४

रुद्राक्षं धारयेन्मूर्ध्नि कण्ठे सूत्रे करेऽथवा ।

सुवर्णमणिसम्भिन्नं शुद्धं नान्यैर्धृतं शिवम् ॥ १५

नाशुचिर्धारयेदक्षं सदा भक्त्यैव धारयेत् ।

रुद्राक्षतरुसम्भूतवातोद्भूततृणान्यपि ॥१६

पुण्यलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ।

रुद्राक्षं धारयन्पापं कुर्वन्नपि च मानवः ॥ १७

सर्वं तरति पाप्मानं जाबालश्रुतिराह हि ।

पशवो हि च रुद्राक्षधारणाद्यान्ति रुद्रताम् ॥ १८

किमु ये धारयन्ति स्म नरा रुद्राक्षमालिकाम् ।

रुद्राक्षः शिरसा ह्येको धार्यो रुद्रपरैः सदा ॥ १ ९

ध्वंसनं सर्वदुःखानां सर्वपापविमोचनम् ।

व्याहरन्ति च नामानि ये शम्भोः परमात्मनः ॥ २०

रुद्राक्षालङ्कृता ये च ते वै भागवतोत्तमाः ।

रुद्राक्षधारणं कार्यं सर्वश्रेयोऽर्थिभिर्नृभिः ॥ २१

कर्णपाशे शिखायां च कण्ठे हस्ते तथोदरे ।

महादेवश्च विष्णुश्च ब्रह्मा तेषां विभूतयः ॥ २२

देवाश्चान्ये तथा भक्त्या खलु रुद्राक्षधारिणः ।

गोत्रर्षयश्च सर्वेषां कूटस्था मूलरूपिणः ॥ २३

तेषां वंशप्रसूताश्च मुनयः सकला अपि ।

श्रौतधर्मपराः शुद्धाः खलु रुद्राक्षधारिणः ॥ २४

श्रद्धा न जायते साक्षाद्वेदसिद्धे विमुक्तिदे ।

बहूनां जन्मनामन्ते महादेवप्रसादतः ॥ २५

रुद्राक्षधारणे वाञ्छा स्वभावादेव जायते ।

रुद्राक्षस्य तु माहात्म्यं जाबालैरादरेण तु ॥ २६ ।

स्कन्ध ६७१ रुद्राक्ष धारण न करके मोहपूर्वक कुछ भी वैदिक कृत्य सम्पन्न करनेवाला ब्राह्मण निश्चितरूपसे नरकमें पड़ता है ॥ १४ ॥

सुवर्ण अथवा मणिसे जटित रुद्राक्ष मस्तक, कण्ठ, यज्ञोपवीत अथवा हाथमें धारण करना चाहिये । अन्य व्यक्तिके द्वारा धारण किया हुआ रुद्राक्ष अपने लिये शुद्ध तथा कल्याणकारी नहीं होता है ॥१५ ॥

अपवित्र अवस्थामें रुद्राक्ष नहीं धारण करना चाहिये; सर्वदा पवित्र अवस्थामें ही इसे भक्तिपूर्वक धारण करना चाहिये । रुद्राक्षके वृक्षसे चली हुई वायुके सम्पर्कमें आकर उगे हुए तृण भी पुण्यलोकमें जाते हैं और वहाँसे पुनः वे इस लोकमें नहीं आते ॥ १६३ ॥

रुद्राक्ष धारण करनेवाला मनुष्य पाप करके भी सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है - ऐसा जाबालोपनिषद्में कहा गया है । रुद्राक्षधारणसे पशु भी रुद्रत्वको प्राप्त हो जाते हैं; फिर मनुष्य होकर जो लोग रुद्राक्षकी माला धारण करते हैं, उनकी बात ही क्या! शिवभक्तोंको एक रुद्राक्ष सिरपर सर्वदा अवश्य धारण करना चाहिये, इससे उनके सभी दुःखोंका नाश हो जाता है तथा सभी पापोंकी समाप्ति हो जाती है । जो लोग परमात्मा शिवके नामोंका उच्चारण करते हैं तथा जो रुद्राक्षसे अलंकृत रहते हैं, वे ही भगवान्‌के श्रेष्ठ भक्त होते हैं । अपने समस्त कल्याणकी कामना करनेवाले मनुष्यको कर्णपाशमें, शिखामें, कण्ठमें, हाथमें तथा उदरपर रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ १७–२१३ ॥ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, उनकी विभूतियाँ तथा सभी देवता भक्तिपूर्वक अवश्य ही रुद्राक्ष धारण करते हैं । गोत्रप्रवर्तक ऋषिगण, सभीके कूटस्थ मूल पुरुष, उनके वंशज तथा शुद्ध आत्मावाले श्रौतधर्मावलम्बी लोग भी रुद्राक्ष अवश्य धारण करते हैं ॥ २२ –२४ ॥ यदि आरम्भमें साक्षात् वेद- प्रतिपादित तथा मुक्तिदायक रुद्राक्षको धारण करनेमें श्रद्धा न उत्पन्न हो, तो भी अनेक जन्मोंके बाद भगवान् शिवके अनुग्रहसे रुद्राक्ष धारण करनेके प्रति स्वाभाविक रूपसे इच्छा उत्पन्न हो जाती है । जाबालशाखाके सभी मुनिलोग अत्यन्त आदरपूर्वक रुद्राक्षके माहात्म्यका