देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 821–830

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830

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८१२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७

कृतभस्मावलेपश्च संविशेद् गुरुसन्निधौ ।

ततो गुरुः स्वकीयात्तु हृदयान्निर्गतां शिवाम् ॥

प्रविष्टां शिष्यहृदये भावयेत्करुणानिधिः ।

पूजयेद् गन्धपुष्पाद्यैरैक्यं वै भावयंस्तयोः ॥

ततस्त्रिंशो दक्षकर्णे शिष्यस्योपदिशेद् गुरुः ।

महामन्त्रं महादेव्याः स्वहस्तं शिरसि न्यसन् ॥

अष्टोत्तरशतं मन्त्रं शिष्योऽपि प्रजपेन्मुने ।

दण्डवत्प्रणमेद्भूमौ तं गुरुं देवतात्मकम् ॥

सर्वस्वमर्पयेत्तस्मै यावज्जीवमनन्यधीः ।

ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दत्त्वा ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत् ॥

सुवासिनी: कुमारीश्च बटुकांश्चैव सर्वशः ।

दीनानाथान्दरिद्रांश्च वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥

कृतार्थतां स्वस्य बुद्ध्वा नित्यमाराधयेन्मनुम् ।

इति ते कथितः सम्यग्दीक्षाविधिरनुत्तमः ॥

विमृश्यैतदशेषेण भज देवीपदाम्बुजम् ।

नान्यस्तु परमो धर्मो ब्राह्मणस्यात्र विद्यते ॥

वैदिकः स्वस्वगृह्येोक्तक्रमेणोपदिशेन्मनुम् ।

तान्त्रिकस्तन्त्ररीत्या स्थितिरेषा सनातनी ॥

तत्तदुक्तप्रयोगांस्ते ते ते कुर्युर्न चान्यथा । श्रीनारायण उवाच इति सर्वं मयाख्यातं यत्पृष्टं नारद त्वया ॥

अतः परं पराम्बाया भज नित्यं पदाम्बुजम् ।

नित्यमाराध्य तच्चाहं निर्वृतिं परमां गतः ॥

व्यास उवाच

इति राजन्नारदाय प्रोक्त्वा सर्वमनुत्तमम् ।

समाधिमीलिताक्षस्तु दध्यौ देवीपदाम्बुजम् ॥

गुरुदेव यह भावना करें कि भगवती शिवा उनके १४३ हृदयसे निकलकर अब शिष्यके हृदयमें प्रविष्ट हो गयी हैं । अतः शिष्य तथा देवी उन दोनोंमें तादात्म्यकी भावना करते हुए वे गन्ध - पुष्प आदिसे शिष्यका १४४ | पूजन करें ॥ १४० - १४४ ॥ तत्पश्चात् गुरु अपना दाहिना हाथ शिष्यके सिरपर रखते हुए उसके दाहिने कानमें महाभगवतीके १४५ महामन्त्रका तीस बार उपदेश करें । हे मुने! इसके बाद शिष्य उस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे । पुनः पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर उन देवतास्वरूप १४६ गुरुको प्रणाम करे ॥ १४५-१४६ ॥ इसके बाद शिष्य जीवनभरके लिये गुरुके प्रति अनन्यबुद्धिवाला होकर गुरुके प्रति एकनिष्ठ भावसे १४७ अपना सर्वस्व उन्हें अर्पण कर दे । तदनन्तर ऋत्विजोंको दक्षिणा देकर ब्राह्मणों, सौभाग्यवती स्त्रियों, कन्याओं और बटुकोंको भलीभाँति भोजन कराये । साथ ही १४८ धनकी कृपणतासे रहित होकर दीनों, अनाथों तथा दरिद्रोंको सन्तुष्ट करे । अपनेको कृतार्थ समझकर मन्त्रकी नित्य उपासना करे । इस प्रकार दीक्षाकी यह १४ ९ | उत्तम विधि मैंने आपको बतला दी ॥ १४७ – १४ ९ ॥ इस विषय में पूर्णरूपसे विचार करके अब आप देवीके चरण - कमलका सेवन कीजिये । ब्राह्मणके १५० लिये इसके अतिरिक्त कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है ॥ १५० ॥

वैदिक पुरुष अपने - अपने गृह्यसूत्रमें कहे गये नियमके अनुसार तथा तान्त्रिक पुरुष तन्त्र - पद्धतिके १५१ अनुसार मन्त्रका उपदेश करें; यही सनातन नियम है । जिनके लिये जो - जो प्रयोग बताये गये हैं, उन्हें उसीका उपयोग करना चाहिये; दूसरे नियमोंका नहीं ॥ १५१३ ॥

श्रीनारायण बोले- हे नारद! आपने जो पूछा १५२ था, वह सब मैंने बता दिया । अब आप पराम्बा भगवतीके पदारविन्दकी नित्य उपासना कीजिये । मैं भी उसी चरणकमलकी नित्य आराधना करके परम १५३ शान्तिको प्राप्त हुआ हूँ ॥ १५२-१५३ ॥ व्यासजी बोले – हे राजन्! इस प्रकार यह सम्पूर्ण उत्तम प्रसंग नारदजीसे कहकर श्रेष्ठ मुनियोंके भी शिरोमणि भगवान् नारायण अपने नेत्र १५४ | बन्द करके समाधिस्थ होकर भगवतीके चरण-

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अ ० ८ ] द्वादश स्कन्ध ८१३ नारायणस्तु भगवान् मुनिवर्यशिखामणिः । कमलका ध्यान करने लगे । नारदजीने भी उन परम नारदोऽपि ततो नत्वा गुरुं नारायणं परम् । गुरु भगवान् नारायणको प्रणाम करके भगवतीके दर्शनकी लालसासे तपस्या करनेके लिये उसी क्षण जगाम सद्यस्तपसे देवीदर्शनलालसः ॥ १५५ प्रस्थान कर दिया ॥ ९५४-१५५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे मन्त्रदीक्षाविधिवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः देवताओंका विजयगर्व तथा उमाका इन्द्रको जनमेजय उवाच भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रवतांवर द्विजातीनां तु सर्वेषां शक्त्युपास्तिः श्रुतीरिता सन्ध्याकालत्रयेऽन्यस्मिन् काले नित्यतया विभो तां विहाय द्विजाः कस्माद् गृह्णीयुश्चान्यदेवताः दृश्यन्ते वैष्णवाः केचिद् गाणपत्यास्तथापरे कापालिकाश्चीनमार्गरता वल्कलधारिणः दिगम्बरास्तथा बौद्धाश्चार्वार्का एवमादयः दृश्यन्ते बहवो लोके वेदश्रद्धाविवर्जिताः किमत्र कारणं ब्रह्मंस्तद्भवान् वक्तुमर्हति बुद्धिमन्तः पण्डिताश्च नानातर्कविचक्षणाः अपि सन्त्येव वेदेषु श्रद्धया तु विवर्जिताः न हि कश्चित्स्वकल्याणं बुद्ध्या हातुमिहेच्छति किमत्र कारणं तस्माद्वद वेदविदांवर मणिद्वीपस्य महिमा वर्णितो भवता पुरा कीदृक् तदस्ति यद्देव्याः परं स्थानं महत्तरम् । तच्चापि वद भक्ताय श्रद्दधानाय मेऽनघ प्रसन्नास्तु वदन्त्येव गुरवो गुह्यमप्युत भगवती उमाद्वारा उसका भंजन, भगवती दर्शन देकर ज्ञानोपदेश देना जनमेजय बोले – सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ | तथा समस्त धर्मोंको जाननेवाले हे भगवन्! सभी ॥ १ द्विजातियोंके लिये शक्तिकी उपासना नित्य होनेके कारण तीनों सन्ध्या - कालोंमें तथा अन्य समयमें भी । करणीय है - ऐसा श्रुतिका कथन है; तो फिर हे ॥ २ विभो! उन भगवतीको छोड़कर द्विजगण अन्य देवताओंकी उपासना क्यों करते हैं? ॥ १-२ ॥ । कुछ विष्णु उपासक, कुछ गणपतिके उपासक, ॥ ३ कुछ कापालिक, कुछ चीनमार्गी, कुछ वल्कलधारी, कुछ दिगम्बर, कुछ बौद्ध, कुछ चार्वाक आदि । दिखायी पड़ते हैं । इसी प्रकार लोकमें बहुत से ऐसे ॥ ४ लोग भी दिखायी देते हैं, जो वेदोंके प्रति श्रद्धा-भावसे रहित हैं । हे ब्रह्मन्! इसमें क्या कारण है? वह

मुझे बतानेकी आप कृपा कीजिये ॥ ३-४३ ॥

॥ ५

कुछ बुद्धिमान् पण्डित और अनेक प्रकारके तर्क । करनेमें दक्ष विद्वान् लोग भी हैं, जो वेदोंके प्रति श्रद्धासे विहीन हैं । कोई भी व्यक्ति जान - बूझकर ॥ ६ अपने कल्याणका परित्याग नहीं करना चाहता है, तो । फिर वे ऐसा क्यों करते हैं? हे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! ॥ ७ इसमें क्या कारण है; मुझे बतलाइये ॥५-६३ ॥ आपने पहले मणिद्वीपकी महिमाका वर्णन किया था । भगवतीका वह परम उत्तम स्थान कैसा ॥ ८ है? हे अनघ! आप मुझ श्रद्धावान् भक्तको इसे भी बताइये; क्योंकि प्रसन्न गुरुजन गुप्त बात भी बता । देते हैं ॥ ७-८ ॥

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८१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ सूत उवाच इति राज्ञो वचः श्रुत्वा भगवान् बादरायणः ॥

निजगाद ततः सर्वं क्रमेणैव मुनीश्वराः ।

यच्छ्रुत्वा तु द्विजातीनां वेदश्रद्धा विवर्धते ॥

व्यास उवाच

सम्यक्पृष्टं त्वया राजन् समये समयोचितम् ।

बुद्धिमानसि वेदेषु श्रद्धावांश्चैव लक्ष्यसे ॥

पूर्वं मदोद्धता दैत्या देवैर्युद्धं तु चक्रिरे ।

शतवर्षं महाराज महाविस्मयकारकम् ॥

नानाशस्त्रप्रहरणं नानामायाविचित्रितम् ।

जगत्क्षयकरं नूनं तेषां युद्धमभून्नृप ॥

पराशक्तिकृपावेशाद्देवैर्दैत्या जिता युधि ।

भुवं स्वर्गं परित्यज्य गताः पातालवेश्मनि ॥

ततः प्रहर्षिता देवाः स्वपराक्रमवर्णनम् ।

चक्रुः परस्परं मोहात्साभिमानाः समन्ततः ॥

जयोऽस्माकं कुतो न स्यादस्माकं महिमा यतः ।

सर्वोत्तरः कुत्र दैत्याः पामरा निष्पराक्रमाः ॥

सृष्टिस्थितिक्षयकरा वयं सर्वे यशस्विनः ।

अस्मदग्रे पामराणां दैत्यानां चैव का कथा ॥

पराशक्तिप्रभावं ते न ज्ञात्वा मोहमागताः ।

तेषामनुग्रहं कर्तुं तदैव जगदम्बिका ॥

प्रादुरासीत्कृपापूर्णा यक्षरूपेण भूमिप ।

कोटिसूर्यप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशीतलम् ॥

विद्युत्कोटिसमानाभं हस्तपादादिवर्जितम् ।

अदृष्टपूर्वं तद् दृष्ट्वा तेजः परमसुन्दरम् ॥

सविस्मयास्तदा प्रोचुः किमिदं किमिदं त्विति ।

दैत्यानां चेष्टितं किं वा माया कापि महीयसी ॥

सूतजी बोले – हे मुनीश्वरो! महाराज जनमेजयकी ९ यह बात सुनकर भगवान् वेदव्यासने उन्हें क्रमसे वह सब कुछ बतला दिया, जिसे सुनकर द्विजातियोंके मनमें वेदोंके प्रति श्रद्धा बढ़ जाती है ॥ ९ - १० ॥ १० व्यासजी बोले- हे राजन्! इस समय आपने जो पूछा है, वह अत्युत्तम तथा कालके अनुरूप ही है । आप बुद्धिमान् तथा वेदोंमें श्रद्धा रखनेवाले प्रतीत होते हैं ॥११ ॥

११ हे महाराज! पूर्वकालमें मदसे उन्मत्त दानवोंने देवताओंके साथ सौ वर्षोंतक एक अत्यन्त विस्मयकारक १२ युद्ध किया था ॥ १२ ॥

हे नृप! अनेक प्रकारके शस्त्रोंके प्रहार तथा अनेक प्रकारकी मायाओंके प्रयोगसे भरा उनका वह १३ युद्ध जगत्के लिये अत्यन्त विनाशकारी सिद्ध हुआ ॥ १३ ॥

उस समय पराशक्ति भगवतीकी कृपासे देवताओंने युद्धमें दैत्योंको जीत लिया और वे दैत्य भूलोक तथा १४ स्वर्ग छोड़कर पाताललोकमें चले गये ॥१४ ॥

इस विजयसे अत्यन्त हर्षित देवतागण मोहके कारण अभिमानयुक्त होकर चारों ओर परस्पर १५ अपने पराक्रमकी इस प्रकार चर्चा करने लगे – हमारी विजय क्यों न हो? क्योंकि हमारी महिमा सर्वोत्तम है । कहाँ ये अधम और पराक्रमहीन दैत्य तथा १६ कहाँ सृजन, पालन तथा संहार करनेवाले हम यशस्वी देवता! तो फिर हमारे सामने असहाय दैत्योंकी बात ही क्या॥१५–१७ ॥ १७ हे राजन्! पराशक्तिके प्रभावको न जाननेके कारण ही वे देवता मोहित हो गये थे । तब उनके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये दयामयी जगदम्बा एक १८ यक्षके रूपमें प्रकट हुईं ॥१८३ ॥

करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशवाले, करोड़ों १ ९ चन्द्रमाओंके समान अत्यन्त शीतल, करोड़ों विद्युत्के समान आभावाले और हाथ - पैर आदि अवयवोंसे रहित, पहले कभी न देखे गये उस परम सुन्दर तेजको २० | देखकर देवता महान् विस्मयमें पड़ गये और कहने लगे - यह क्या है! यह क्या है! यह दैत्योंकी चेष्टा है अथवा कोई बलवती माया है? देवताओंको २१ | आश्चर्यचकित करनेवाली यह माया किसके द्वारा

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अ ० ८ ]

केनचिन्निर्मिता वाथ देवानां स्मयकारिणी ।

सम्भूयते तदा सर्वे विचारं चक्रुरुत्तमम् ॥

यक्षस्य निकटे गत्वा प्रष्टव्यं कस्त्वमित्यपि ।

बलाबलं ततो ज्ञात्वा कर्तव्या तु प्रतिक्रिया ॥

ततो वह्निं समाहूय प्रोवाचेन्द्रः सुराधिपः ।

गच्छ वह्ने त्वमस्माकं यतोऽसि मुखमुत्तमम् ॥

ततो गत्वा तु जानीहि किमिदं यक्षमित्यपि ।

सहस्राक्षवचः श्रुत्वा स्वपराक्रमगर्भितम् ॥

वेगात्स निर्गतो वह्निर्ययौ यक्षस्य सन्निधौ ।

तदा प्रोवाच यक्षस्तं त्वं कोऽसीति हुताशनम् ॥

वीर्यं च त्वयि किं यत्तद्वद सर्वं ममाग्रतः ।

अग्निरस्मि तथा जातवेदा अस्मीति सोऽब्रवीत् ॥

सर्वस्य दहने शक्तिर्मयि विश्वस्य तिष्ठति ।

तदा यक्षं परं तेजस्तदग्रे निदधौ तृणम् ॥

दहैनं यदि ते शक्तिर्विश्वस्य दहनेऽस्ति हि ।

तदा सर्वबलेनैवाकरोद्यत्नं हुताशनः ॥

न शशाक तृणं दग्धुं लज्जितोऽगात्सुरान्प्रति ।

पृष्टे देवैस्तु वृत्तान्ते सर्वं प्रोवाच हव्यभुक् ॥

वृथाभिमानो ह्यस्माकं सर्वेशत्वादिके सुराः ।

ततस्तु वृत्रहा वायुं समाहूयेदमब्रवीत् ॥

त्वयि प्रोतं जगत्सर्वं त्वच्चेष्टाभिस्तु चेष्टितम् ।

त्वं प्राणरूपः सर्वेषां सर्वशक्तिविधारकः ॥

त्वमेव गत्वा जानीहि किमिदं यक्षमित्यपि ।

नान्यः कोऽपि समर्थोऽस्ति ज्ञातुं यक्षं परं महः ॥

द्वादश स्कन्ध ८१५ रची गयी है? तब उन सभी देवताओंने एकत्र होकर २२ उत्तम विचार किया कि यक्षके समीप जाकर पूछना चाहिये कि ' तुम कौन हो? ' इस प्रकार उसके बलाबलकी जानकारी कर लेनेके पश्चात् ही कोई २३ प्रतिक्रिया करनी चाहिये ॥ १ ९ –२३ ॥ तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने अग्निको बुलाकर उनसे कहा — ' हे अग्निदेव! आप जाइये । चूँकि आप ही हम लोगोंके उत्तम मुख हैं, इसलिये वहाँ जाकर २४ इसकी जानकारी कीजिये कि यह यक्ष कौन है ' ॥ २४३ ॥

हजार नेत्रोंवाले इन्द्रके मुखसे अपने प्रति पराक्रमसे युक्त वचन सुनकर वे अग्निदेव अत्यन्त वेगपूर्वक २५ निकल पड़े और शीघ्र ही यक्षके पास जा पहुँचे ॥ २५३ ॥

तब यक्षने उन अग्निसे पूछा - ' तुम कौन हो? तुममें कौन- -सा पराक्रम है? जो हो वह सब मुझे २६ बतलाओ ' ॥ २६३ ॥

इसपर उसने कहा — ‘ मैं अग्नि हूँ; मैं जातवेदा हूँ । सम्पूर्ण विश्वको दग्ध कर डालनेका सामर्थ्य २७ मुझमें विद्यमान है ' ॥ २७३ ॥

तब परम तेजस्वी यक्षने अग्निके समक्ष एक तृण रख दिया और कहा - ' यदि विश्वको भस्म करनेकी २८ शक्ति तुममें है, तो इसे जला दो ' ॥ २८३ ॥

तब अग्निने अपनी सम्पूर्ण शक्तिका प्रयोग करते हुए उस तृणको जलानेका प्रयास किया, किंतु वे उस २ ९ तृणको भस्म करनेमें समर्थ नहीं हुए और लज्जित होकर देवताओंके पास लौट गये ॥ २ ९ ३ ॥ देवताओंके द्वारा वृत्तान्त पूछे जानेपर अग्निदेवने सब कुछ बता दिया और कहा – हे ३० देवताओ! सर्वेश आदि बननेमें हमलोगोंका अभिमान सर्वथा व्यर्थ है ॥ ३०३ ॥

तत्पश्चात् वृत्रासुरका संहार करनेवाले इन्द्रने ३१ वायुको बुलाकर यह कहा – सम्पूर्ण जगत् आपमें व्याप्त है और आपकी ही चेष्टाओंसे यह क्रियाशील है । आप प्राणरूप होकर सभी प्राणियोंमें सम्पूर्ण ३२ । शक्तिका संचार करते हैं । आप ही जाकर यह जानकारी प्राप्त कीजिये कि यह यक्ष कौन है? क्योंकि अन्य कोई भी उस परम तेजस्वी यक्षको ३३ । जाननेमें समर्थ नहीं है ॥ ३१–३३ ॥

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८१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८

सहस्त्राक्षवचः श्रुत्वा गुणगौरवगुम्फितम् ।

साभिमानो जगामाशु यत्र यक्षं विराजते ॥

यक्षं दृष्ट्वा ततो वायुं प्रोवाच मृदुभाषया ।

कोऽसि त्वं त्वयि का शक्तिर्वद सर्वं ममाग्रतः ॥

ततो यक्षवचः श्रुत्वा गर्वेण मरुदब्रवीत् ।

मातरिश्वाहमस्मीति वायुरस्मीति चाब्रवीत् ॥

वीर्यं तु मयि सर्वस्य चालने ग्रहणेऽस्ति हि ।

मच्चेष्टया जगत्सर्वं सर्वव्यापारवद्भवेत् ॥

इति श्रुत्वा वायुवाणीं निजगाद परं महः ।

तृणमेतत्तवाग्रे यत्तच्चालय यथेप्सितम् ॥

नोचेद् गर्वं विहायैनं लज्जितो गच्छ वासवम् ।

श्रुत्वा यक्षवचो वायुः सर्वशक्तिसमन्वितः ॥

उद्योगमकरोत्तच्च स्वस्थानान्न चचाल ह ।

लज्जितोऽगाद्देवपार्श्वे हित्वा गर्वं स चानिलः ॥

वृत्तान्तमवदत्सर्व गर्वनिर्वापकारणम् ।

नैतज्ज्ञातुं समर्थाः स्म मिथ्यागर्वाभिमानिनः ॥

अलौकिकं भाति यक्षं तेजः परमदारुणम् ।

ततः सर्वे सुरगणाः सहस्राक्षं समूचिरे ॥

देवरा s सि यस्मात्त्वं यक्षं जानीहि तत्त्वतः ।

तत इन्द्रो महागर्वात्तद्यक्षं समुपाद्रवत् ॥

प्राद्रवच्च परं तेजो यक्षरूपं परात्परम् ।

अन्तर्धानं ततः प्राप तद्यक्षं वासवाग्रतः ॥

अतीव लज्जितो जातो वासवो देवराडपि ।

यक्षसम्भाषणाभावाल्लघुत्वं प्राप चेतसि ॥

गुण और गौरवसे समन्वित इन्द्रकी बात सुनकर ३४ वे वायुदेव अभिमानसे भर उठे और शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये, जहाँ यक्ष विराजमान था ॥ ३४ ॥

तब वायुको देखकर यक्षने मधुर वाणीमें कहा— ३५ तुम कौन हो? तुममें कौन - सी शक्ति है? यह सब मेरे सामने बतलाओ ॥ ३५ ॥

यक्षका वचन सुनकर वायुने गर्वपूर्वक कहा-' मैं मातरिश्वा हूँ; मैं वायु हूँ । सबको संचालित

३६ करने तथा ग्रहण करनेकी शक्ति मुझमें विद्यमान है ।

मेरी चेष्टासे ही सम्पूर्ण जगत् सब प्रकारके व्यवहार-वाला होता है ' ॥ ३६-३७ ॥

३७ वायुकी यह वाणी सुनकर परम तेजस्वी यक्षने कहा – - तुम्हारे सामने यह जो तृण रखा हुआ है, उसे तुम अपनी इच्छा अनुसार गतिमान् कर दो; अन्यथा ३८ इस अभिमान का त्याग करके लज्जित हो इन्द्रके पास लौट जाओ ॥ ३८ ॥

यक्षका वचन सुनकर वायुदेवने अपनी सम्पूर्ण ३ ९ शक्ति लगाकर उस तृणको उड़ानेका प्रयत्न किया, किंतु वह तृण अपने स्थानसे हिलातक नहीं । तब वे पवनदेव लज्जित होकर अभिमानका त्याग करके इन्द्रके पास चले गये ॥ ३ ९ -४० ॥ ४० उन्होंने अभिमानको चूर करनेवाला सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाते हुए कहा - ' मिथ्या गर्व तथा अभिमान करनेवाले हमलोग इस यक्षको जाननेमें समर्थ नहीं ४१ हैं । परम प्रचण्ड तेजवाला यह यक्ष अलौकिक प्रतीत हो रहा है ' ॥ ४१३ ॥

तत्पश्चात् सभी देवताओंने सहस्र नेत्रोंवाले ४२ | इन्द्रसे कहा - ' आप देवताओंके स्वामी हैं, अतः अब आप ही यक्षके विषयमें ठीक - ठीक जाननेका प्रयत्न कीजिये ' ॥ ४२३ ॥

तब इन्द्र अत्यन्त अभिमानपूर्वक उस यक्षके ४३ पास गये । उनके पहुँचते ही यक्षरूप परात्पर परम तेज शीघ्र ही अदृश्य हो गया । जब वह यक्ष इन्द्रके सामनेसे अन्तर्हित हो गया तब देवराज इन्द्र अत्यन्त ४४ लज्जित हो गये और यक्षके उनसे बाततक न करनेके कारण वे मनमें अपनेको छोटा समझने लगे । वे सोचने लगे कि अब मुझे देवताओंके समाजमें नहीं ४५ जाना चाहिये; क्योंकि वहाँ देवताओंके समक्ष अपनी

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अ ० ८ ] द्वादश स्कन्ध ८१७

अतः परं न गन्तव्यं मया तु सुरसंसदि ।

किं मया तत्र वक्तव्यं स्वलघुत्वं सुरान्प्रति ॥ ४६

देहत्यागो वरस्तस्मान्मानो हि महतां धनम् ।

माने नष्टे जीवितं तु मृतितुल्यं न संशयः ॥ ४७

इति निश्चित्य तत्रैव गर्वं हित्वा सुरेश्वरः ।

चरित्रमीदृशं यस्य तमेव शरणं गतः ॥ ४८

तस्मिन्नेव क्षणे जाता व्योमवाणी नभस्तले ।

मायाबीजं सहस्राक्ष जप तेन सुखी भव ॥ ४ ९

ततो जजाप परमं मायाबीजं परात्परम् ।

लक्षवर्षं निराहारो ध्यानमीलितलोचनः ॥ ५०

अकस्माच्चैत्रमासीयनवम्यां मध्यगे रवौ ।

तदेवाविरभूत्तेजस्तस्मिन्नेव स्थले पुनः ॥ ५१

तेजोमण्डलमध्ये तु कुमारीं नवयौवनाम् ।

भास्वज्जपाप्रसूनाभां बालकोटिरविप्रभाम् ॥ ५२

बालशीतांशुमुकुटां वस्त्रान्तर्व्यञ्जितस्तनीम् ।

चतुर्भिर्वरहस्तैस्तु वरपाशाङ्कुशाभयान् ॥५३

दधानां रमणीयाङ्गीं कोमलाङ्गलतां शिवाम् ।

भक्तकल्पद्रुमामम्बां नानाभूषणभूषिताम् ॥५४

त्रिनेत्रां मल्लिकामालाकबरीजूटशोभिताम् ।

चतुर्दिक्षु चतुर्वेदैर्मूर्तिमद्भिरभिष्टुताम् ॥ ५५

दन्तच्छटाभिरभितः पद्मरागीकृतक्षमाम् ।

प्रसन्नस्मेरवदनां कोटिकन्दर्पसुन्दराम् ॥ ५६

रक्ताम्बरपरीधानां रक्तचन्दनचर्चिताम् ।

उमाभिधानां पुरतो देवीं हैमवतीं शिवाम् ॥ ५७

निर्व्याजकरुणामूर्ति सर्वकारणकारणाम् ।

ददर्श वासवस्तत्र प्रेमगद्गदितान्तरः ॥ ५८ ।

इस हीनताके विषयमें क्या बताऊँगा । अतः शरीरका त्याग कर देना ही मेरे लिये अच्छा होगा; क्योंकि मान ही महापुरुषोंका धन होता है । मानके नष्ट हो जानेपर मनुष्यका जीवित रहना मृत्युके समान है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४३–४७ ॥ यह निश्चय करके देवराज इन्द्र अभिमान त्यागकर उन्हीं पराशक्तिकी शरणमें गये, जिनकी ऐसी अद्भुत लीला है ॥ ४८ ॥

उसी क्षण गगन - मण्डलमें यह आकाशवाणी हुई - ' हे सहस्राक्ष! तुम मायाबीजका जप करो और उससे सुखी हो जाओ ' ॥ ४ ९ ॥ तब इन्द्रने नेत्र बन्द करके देवीका ध्यान करते हुए निराहार रहकर एक लाख वर्षतक अतिश्रेष्ठ परम मायाबीजका जप किया ॥ ५० ॥

एक दिन चैत्रमासके शुक्ल पक्षमें नवमी तिथिको मध्याह्नकालमें उसी स्थलपर सहसा एक महान् तेज प्रकट हुआ ॥५१ ॥

इन्द्रने उस तेजमण्डलके मध्यमें नूतन यौवनसे सम्पन्न, कुमारी अवस्थामें विद्यमान, प्रभायुक्त जपाकुसुमकी कान्तिसे सम्पन्न, प्रातः कालीन करोड़ों सूर्यकी प्रभासे सुशोभित, द्वितीयाके चन्द्रमासदृश मुकुट धारण किये हुई, वस्त्रके अन्दरसे परिलक्षित होते हुए वक्ष: स्थलवाली, अपने चारों श्रेष्ठ हाथोंमें वर - पाश-अंकुश और अभयमुद्रा धारण करनेवाली, अत्यन्त मनोहर अंगोंसे सम्पन्न, कोमल लताके समान अंगोंवाली, कल्याणस्वरूपिणी, भक्तोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूपा, नानाविध आभूषणोंसे सुशोभित, तीन नेत्रोंवाली, अपनी वेणीमें चमेलीकी माला धारण की हुई, चारों दिशाओंमें स्थित होकर मूर्तिमान् चारों वेदोंद्वारा स्तुत होती हुई, अपने दाँतोंकी प्रभासे वहाँकी भूमिको पद्मरागमय बना देनेवाली, प्रसन्नता तथा मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली, करोड़ों कामदेवके समान सुन्दर रक्तवर्णके वस्त्र धारण की हुई, लालचन्दनसे अनुलिप्त विग्रहवाली, समस्त कारणोंकी भी कारण तथा बिना किसी हेतुके साक्षात् करुणाकी मूर्तिस्वरूपा उमा नामसे विख्यात जगदम्बा हैमवती भगवती शिवाको अपने समक्ष देखा । इससे इन्द्रका अन्तःकरण प्रेमसे गद्गद हो उठा ॥ ५२-५८ ॥

पृष्ठ 827

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८१८

प्रेमाश्रुपूर्णनयनो रोमाञ्चिततनुस्ततः ।

दण्डवत्प्रणनामाथ पादयोर्जगदीशितुः ॥

तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्भक्तिसन्नतकन्धरः ।

उवाच परमप्रीतः किमिदं यक्षमित्यपि ॥

प्रादुर्भूतं च कस्मात्तद्वद सर्वं सुशोभने ।

इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रोवाच करुणार्णवा ॥

रूपं मदीयं ब्रह्मैतत्सर्वकारणकारणम् ।

मायाधिष्ठानभूतं तु सर्वसाक्षि निरामयम् ॥

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॥

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म तदेवाहुश्च ह्रींमयम् ।

द्वे बीजे मम मन्त्रौ स्तो मुख्यत्वेन सुरोत्तम ॥

भागद्वयवती यस्मात्सृजामि सकलं जगत् ।

तत्रैकभागः सम्प्रोक्तः सच्चिदानन्दनामकः ॥

मायाप्रकृतिसंज्ञस्तु द्वितीयो भाग ईरितः ।

सा च माया परा शक्तिः शक्तिमत्यहमीश्वरी ॥

चन्द्रस्य चन्द्रिकेवेयं ममाभिन्नत्वमागता । साम्यावस्थात्मिका चैषा माया मम सुरोत्तम ।

प्रलये सर्वजगतो मदभिन्नैव तिष्ठति ।

प्राणिकर्मपरीपाकवशतः पुनरेव हि ॥

रूपं तदेवमव्यक्तं व्यक्तीभावमुपैति च ।

अन्तर्मुखा तु यावस्था सा मायेत्यभिधीयते ॥

बहिर्मुखा तु या माया तमः शब्देन सोच्यते ।

बहिर्मुखात्तमोरूपाज्जायते सत्त्वसम्भवः ॥

रजोगुणस्तदैव स्यात्सर्गादौ सुरसत्तम । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ प्रेमाश्रुओंसे पूर्ण नयनवाले तथा रोमांचित शरीरवाले ५ ९ इन्द्रने उन जगदीश्वरीके चरणोंमें दण्डकी भाँति गिरकर प्रणाम किया और अनेक प्रकारके स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की | भक्ति भावसे सम्पन्न हो सिर ६० झुकाकर परम प्रसन्नतापूर्वक इन्द्रने देवीसे कहा- हे सुशोभने! यह यक्ष कौन था और किसलिये प्रकट हुआ था? यह सब आप मुझे बतलाइये ॥ ५ ९ -६०३ ॥ ६१ उनकी यह बात सुनकर करुणासागर भगवतीने कहा - यह मेरा ही रूप है; यही ब्रह्म है जो मायाका अधिष्ठानस्वरूप, सबका साक्षी, निर्विकार और समस्त ६२ कारणोंका भी कारण है ॥ ६१-६२ ॥ सभी वेद जिस पदका बार - बार प्रतिपादन करते हैं, समस्त तप भी तपश्चरणके द्वारा जिस पदकी प्राप्तिको बताते हैं और साधकगण जिसकी प्राप्तिकी अभिलाषासे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उसी पदको ६३ मैं तुम्हें नामपूर्वक बतलाती हूँ ॥ ६३ ॥

उसीको ' ॐ ' एक अक्षरवाला ब्रह्म कहते हैं और वही ' ह्रीं ' रूप भी है । हे सुरश्रेष्ठ! ह्रीं ६४ और ॐ ये दो मेरे मुख्य बीजमन्त्र हैं । इन्हीं दो भागोंसे सम्पन्न होकर मैं सम्पूर्ण जगत्‌का सृजन करती हूँ । उनमें एक भाग सच्चिदानन्द नामवाला ६५ कहा गया है और दूसरा भाग मायाप्रकृति संज्ञावाला कहा गया है । वह माया ही परा शक्ति है और सम्पूर्ण ६६ जगत्पर प्रभुत्व रखनेवाली वह शक्तिशालिनी देवी मैं ही हूँ ॥ ६४–६६ ॥ यह माया चन्द्रमाकी चाँदनीकी भाँति अभिन्नरूपसे ६७ । सर्वदा मुझमें विराजमान रहती है । हे सुरोत्तम! साम्यावस्थास्वरूपिणी मेरी यह माया सम्पूर्ण जगत्के प्रलय होते समय भी मुझसे भिन्न नहीं रहती है । ६८ प्राणियोंके कर्मपरिपाकवश मायाका वही अव्यक्तरूप पुनः व्यक्तरूप धारण कर लेता है ॥ ६७-६८ ॥ जो अवस्था अन्तर्मुखी है, वह माया कही जाती ६ ९ है और जो बहिर्मुखी अवस्थावाली माया है, वह तम ( अविद्या ) नामसे कही जाती है । तमोरूपिणी उस बहिर्मुखी मायासे प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है । हे ७० सुरश्रेष्ठ! सृष्टिके आदिमें यह माया रजोगुणरूपसे विद्यमान रहती है ॥ ६ ९ -७० ३ ॥

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अ ० ८ ] द्वादश स्कन्ध ८१ ९ गुणत्रयात्मकाः प्रोक्ता ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः रजोगुणाधिको ब्रह्मा विष्णुः सत्त्वाधिको भवेत् तमोगुणाधिको रुद्रः सर्वकारणरूपधृक् स्थूलदेहो भवेद् ब्रह्मा लिङ्गदेहो हरिः स्मृतः रुद्रस्तु कारणो देहस्तुरीया त्वहमेव हि साम्यावस्था तु या प्रोक्ता सर्वान्तर्यामिरूपिणी । अत ऊर्ध्वं परं ब्रह्म मद्रूपं रूपवर्जितम्

निर्गुणं सगुणं चेति द्विधा मद्रूपमुच्यते ।

निर्गुणं मायया हीनं सगुणं मायया युतम् ॥

साहं सर्वं जगत्सृष्ट्वा तदन्तः सम्प्रविश्य च । प्रेरयाम्यनिशं जीवं यथाकर्म यथाश्रुतम् सृष्टिस्थितितिरोधाने प्रेरयाम्यहमेव हि । ब्रह्माणं च तथा विष्णुं रुद्रं वै कारणात्मकम् मद्भयाद्वाति पवनो भीत्या सूर्यश्च गच्छति इन्द्राग्निमृत्यवस्तद्वत्साहं सर्वोत्तमा स्मृता मत्प्रसादाद्भवद्भिस्तु जयो लब्धोऽस्ति सर्वथा युष्मानहं नर्तयामि काष्ठपुत्तलिकोपमान् ॥ कदाचिद्देवविजयं दैत्यानां विजयं क्वचित् । स्वतन्त्रा स्वेच्छया सर्वं कुर्वे कर्मानुरोधतः तां मां सर्वात्मिकां यूयं विस्मृत्य निजगर्वतः अहङ्कारावृतात्मानो मोहमाप्ता दुरन्तकम् अनुग्रहं ततः कर्तुं युष्मद्देहादनुत्तमम् । निःसृतं सहसा तेजो मदीयं यक्षमित्यपि ॥ ७१ ब्रह्मा, विष्णु और महेश- ये देवता त्रिगुणात्मक कहे गये हैं । ब्रह्मामें रजोगुणकी अधिकता, विष्णुमें । सत्त्वगुणकी अधिकता तथा सभी कारणोंके स्वरूपवाले ॥ ७२ रुद्रमें तमोगुणकी अधिकता रहती है ॥ ७१ - ७२ ॥ ब्रह्मा स्थूलदेहवाले हैं । विष्णु लिंगदेहवाले तथा । रुद्र कारणदेहवाले कहे गये हैं । जो सर्वान्तर्यामिस्वरूपिणी ॥ ७३ साम्यावस्था कही गयी है, वह तुरीयरूपा मैं ही हूँ और इसके भी ऊपर जो निराकार परब्रह्म है, वह भी मेरा ही रूप है ॥ ७३-७४ ॥ निर्गुण तथा सगुण - यह मेरा दो प्रकारका रूप ॥ ७४ कहा जाता है । मायासे रहित रूप निर्गुण और मायायुक्त रूप सगुण है । वही मैं सम्पूर्ण जगत्की रचना करके उसके भीतर भलीभाँति प्रविष्ट होकर ७५ जीवको उसके कर्म तथा शास्त्र के अनुसार निरन्तर प्रेरित करती रहती हूँ ॥ ७५-७६ ॥ ब्रह्माको सृष्टि करने, विष्णुको जगत्का पालन ॥ ७६ करने और कारणरूप रुद्रको संहार करनेके लिये मैं. ही प्रेरणा प्रदान करती हूँ ॥७७ ॥

वायु मेरे भयसे प्रवाहित होता है और सूर्य मेरा ॥ ७७ भय मानकर निरन्तर गति करता रहता है । उन्हींकी भाँति इन्द्र, अग्नि और यम भी मेरे भयसे अपने - अपने । कार्य सम्पन्न करते हैं । इसीलिये मैं सर्वश्रेष्ठ कही ॥ ७८ गयी हूँ ॥ ७८ ॥

आप सभी देवताओंने मेरी ही कृपासे सब । प्रकारकी विजय प्राप्त की है । मैं आपलोगोंको कठपुतलीके समान नचाती रहती हूँ ॥७ ९ ॥ ७ ९ मैं कभी देवताओंकी विजय कराती हूँ और कभी दैत्योंकी । मैं स्वतन्त्र होकर अपनी इच्छासे सभीके कर्म - विपाकके अनुसार सब कुछ सम्पादित ॥ ८० करती हूँ ॥८० ॥

अहंकारसे आवृत बुद्धिवाले तुमलोग अपने । गर्वसे वैसी प्रभाववाली मुझ सर्वात्मिका भगवतीको ॥ ८१ भूलकर दुःखदायी. मोहको प्राप्त हो गये थे । इसलिये तुमलोगों पर अनुग्रह करनेके लिये तुमलोगोंके शरीरसे मेरा दिव्य तेज निकलकर यक्षके रूपमें प्रकट हो गया ॥ ८२ था ॥ ८१-८२ ॥

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८२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९

अतः परं सर्वभावैर्हित्वा गर्वं तु देहजम् ।

मामेव शरणं यात सच्चिदानन्दरूपिणीम् ॥ ८३

व्यास उवाच

इत्युक्त्वा च महादेवी मूलप्रकृतिरीश्वरी ।

अन्तर्धानं गता सद्यो भक्त्या देवैरभिष्टुता ॥ ८४

ततः सर्वे स्वगर्वं तु विहाय पदपङ्कजम् ।

सम्यगाराधयामासुर्भगवत्याः परात्परम् ॥ ८५

त्रिसन्ध्यं सर्वदा सर्वे गायत्रीजपतत्पराः ।

यज्ञभागादिभिः सर्वे देवीं नित्यं सिषेविरे ॥ ८६

एवं सत्ययुगे सर्वे गायत्रीजपतत्पराः ।

तारहृल्लेखयोश्चापि जपे निष्णातमानसाः ॥ ८७

न विष्णूपासना नित्या वेदेनोक्ता तु कुत्रचित् ।

न विष्णुदीक्षा नित्यास्ति शिवस्यापि तथैव च ॥ ८८

गायत्र्युपासना नित्या सर्ववेदैः समीरिता ।

यया विना त्वधः पातो ब्राह्मणस्यास्ति सर्वथा ॥ ८ ९

तावता कृतकृत्यत्वं नान्यापेक्षा द्विजस्य हि ।

गायत्रीमात्रनिष्णातो द्विजो मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ९ ०

कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादिति प्राह मनुः स्वयम् ।

विहाय तां तु गायत्रीं विष्णूपास्तिपरायणः ॥ ९ १

शिवोपास्तिरतो विप्रो नरकं याति सर्वथा ।

तस्मादाद्ययुगे राजन् गायत्रीजपतत्पराः ।

देवीपदाम्बुजरता आसन्सर्वे द्विजोत्तमाः ॥ ९ २

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां अब तुमलोग अपने देहसे उत्पन्न गर्वका सब प्रकारसे त्याग करके मुझ सच्चिदानन्दस्वरूपिणी भगवतीकी ही शरणमें आ जाओ ॥ ८३ ॥

व्यासजी बोले --- [ हे जनमेजय! ] ऐसा कहकर मूलप्रकृतिरूपा सर्वेश्वरी महादेवी देवताओंके द्वारा भक्ति-पूर्वक सुपूजित होकर तत्काल अन्तर्धान हो गयीं ॥ ८४ ॥

तत्पश्चात् सभी देवता अपने अभिमानका त्याग करके भगवतीके परात्पर चरणकमलकी विधिवत् आराधना करने लगे । वे सब तीनों सन्ध्याओंमें सदा गायत्री - जपमें संलग्न रहते थे और यज्ञ - भाग आदि द्वारा नित्य भगवतीकी उपासना करते थे॥८५-८६ ॥ इस प्रकार सत्ययुगमें सभी लोग गायत्री - जपमें तत्पर थे और वे प्रणव तथा हृल्लेखाके जपमें भी दत्तचित्त रहते थे ॥८७ ॥

वेदके द्वारा कहीं भी विष्णुकी उपासना तथा विष्णु - दीक्षा नित्य नहीं कही गयी है; उसी प्रकार शिवकी भी उपासना तथा दीक्षा नित्य नहीं कही गयी है, किंतु गायत्रीकी उपासना सभी वेदोंके द्वारा नित्य कही गयी है, जिसके बिना ब्राह्मणका सब प्रकार अध: पतन हो जाता है । द्विज केवल उतनेसे ही कृतकृत्य हो जाता है, उसे किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं रहती । केवल गायत्री - उपासनामें ही तत्पर रहकर द्विज मोक्ष प्राप्त कर लेता है, चाहे वह अन्य कार्य करे अथवा न करे - ऐसा मनुने स्वयं कहा है । उन गायत्रीके बिना विष्णु तथा शिवकी उपासनामें संलग्न रहनेवाला विप्र सब प्रकारसे नरकगामी होता है । इसीलिये हे राजन्! सत्ययुगमें सभी उत्तम द्विजगण गायत्रीजप तथा भगवतीके चरणकमलकी उपासनामें निरन्तर संलग्न रहते थे ॥८८ – ९ २ ॥ द्वादशस्कन्धे पराशक्तेराविर्भाववर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

अथ नवमोऽध्यायः भगवती गायत्रीकी कृपासे गौतमके द्वारा अनेक ब्राह्मणपरिवारोंकी रक्षा, ब्राह्मणोंकी कृतघ्नता और गौतमके द्वारा ब्राह्मणोंको घोर शाप - प्रदान व्यास उवाच व्यासजी बोले- हे विभो! एक समयकी बात कदाचिदथ काले तु दशपञ्चसमा विभो । है, प्राणियोंको कर्म - फलका भोग करानेके लिये इन्द्रने प्राणिनां कर्मवशतो न ववर्ष शतक्रतुः ॥ १ पन्द्रह वर्षोंतक वृष्टि नहीं की ॥१ ॥

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अ ० ९ ] द्वादश अनावृष्ट्यातिदुर्भिक्षमभवत्क्षयकारकम् गृहे गृहे शवानां तु संख्या कर्तुं न शक्यते ॥ २

केचिदश्वान्वराहान्वा भक्षयन्ति क्षुधार्दिताः ।

शवानि च मनुष्याणां भक्षयन्त्यपरे जनाः ॥ ३

बालकं बालजननी स्त्रियं पुरुष एव च ।

भक्षितुं चलिताः सर्वे क्षुधया पीडिता नराः ॥ ४

ब्राह्मणा बहवस्तत्र विचारं चक्रुरुत्तमम् ।

तपोधनो गौतमोऽस्ति स नः खेदं हरिष्यति ॥ ५

सर्वैर्मिलित्वा गन्तव्यं गौतमस्याश्रमेऽधुना ।

गायत्री जपसंसक्तगौतमस्याश्रमेऽधुना ॥ ६

सुभिक्षं श्रूयते तत्र प्राणिनो बहवो गताः ।

एवं विमृश्य भूदेवाः साग्निहोत्राः कुटुम्बिनः ॥ ७

सगोधनाः सदासाश्च गौतमस्याश्रमं ययुः ।

पूर्वदेशाद्ययुः केचित्केचिद्दक्षिणदेशतः ॥ ८

पाश्चात्या औत्तराहाश्च नानादिग्भ्यः समाययुः ।

दृष्ट्वा समाजं विप्राणां प्रणनाम स गौतमः ॥

आसनाद्युपचारैश्च पूजयामास वाडवान् ।

चकार कुशलप्रश्नं ततश्चागमकारणम् ॥ १०

ते सर्वे स्वस्ववृत्तान्तं कथयामासुरुत्स्मयाः ।

दृष्ट्वा तान्दुःखितान्विप्रानभयं दत्तवान्मुनिः ॥ ११

युष्माकमेतत्सदनं भवद्दासोऽस्मि सर्वथा ।

का चिन्ता भवतां विप्रा मयि दासे विराजति ॥ १२

धन्योऽहमस्मिन्समये यूयं सर्वे तपोधनाः ।

येषां दर्शनमात्रेण दुष्कृतं सुकृतायते ॥ १३ ।

स्कन्ध ८२१ इस अनावृष्टिके कारण घोर विनाशकारी दुर्भिक्ष पड़ गया । घर - घरमें शवोंकी संख्याका आकलन नहीं किया जा सकता था ॥ २ ॥

क्षुधासे पीड़ित कुछ लोग घोड़ों और सूअरोंका भक्षण कर जाते थे और कुछ लोग मनुष्यों के शवतक खा जाते थे । माता अपने बच्चेको और पुरुष पत्नीको खा जाते थे । इस प्रकार सभी लोग क्षुधासे पीड़ित होकर एक - दूसरेको खानेके लिये दौड़ | पड़ते थे॥३-४ ॥ तब बहुत - से ब्राह्मणोंने एकत्र होकर यह उत्तम विचार प्रस्तुत किया कि महर्षि गौतम तपस्याके महान् धनी हैं । वे हमारे कष्टका निवारण कर देंगे । अतएव इस समय हम सभी लोगोंको मिलकर गौतमके आश्रममें चलना चाहिये । सुना गया है कि गायत्रीजपमें निरन्तर संलग्न रहनेवाले गौतमके आश्रम में इस समय भी सुभिक्ष है और बहुत लोग वहाँ गये हुए हैं ॥ ५-६३ ॥ इस प्रकार परस्पर विचार करके वे सभी ब्राह्मण अग्निहोत्रकी सामग्री, अपने परिवारजनों, गोधन तथा दासोंको साथमें लेकर गौतमऋषिके आश्रमपर गये । कुछ लोग पूर्व दिशासे, कुछ लोग दक्षिण दिशासे, कुछ लोग पश्चिम दिशासे और कुछ लोग उत्तर दिशासे - – इस प्रकार अनेक स्थलोंसे लोग वहाँ पहुँच गये ॥ ७-८३ ॥ ब्राह्मणोंके उस समाजको देखकर उन गौतमऋषि प्रणाम किया और आसन आदि उपचारोंसे विप्रोंकी पूजा की । तत्पश्चात् महर्षि गौतमने उनका कुशल-क्षेम तथा उनके वहाँ आनेका कारण पूछा ॥ ९ -१० ॥ उन सभी ब्राह्मणोंने उदास होकर अपना - अपना वृत्तान्त कहा । मुनि गौतमने उन विप्रोंको दुःखित देखकर उन्हें अभय प्रदान किया । [ और कहा— ] हे विप्रो! यह आश्रम आपलोगोंका घर है और मैं हर तरहसे आपलोगोंका दास हूँ । मुझ दासके रहते आपलोगोंको चिन्ता किस बात की? आप सभी तपोधन ब्राह्मण यहाँ आये हैं, इसलिये मैं अपनेको धन्य मानता हूँ । जिनके दर्शनमात्रसे दुष्कृत भी सुकृतमें परिणत हो जाता है, वे सभी विप्रगण अपने