देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 831–840

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840

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८२२ ते सर्वे पादरजसा पावयन्ति गृहं मम को मदन्यो भवेद् धन्यो भवतां समनुग्रहात् स्थेयं सर्वैः सुखेनैव सन्ध्याजपपरायणैः व्यास उवाच इति सर्वान्समाश्वास्य गौतमो मुनिराद् ततः गायत्रीं प्रार्थयामास भक्तिसन्नतकन्धरः नमो देवि महाविद्ये वेदमातः परात्परे व्याहृत्यादिमहामन्त्ररूपे. प्रणवरूपिणि साम्यावस्थात्मिके मातर्नमो ह्रींकाररूपिणि ॥ स्वाहास्वधास्वरूपे त्वां नमामि सकलार्थदाम् भक्तकल्पलतां देवीमवस्थात्रयसाक्षिणीम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ । चरणरजसे मेरे आश्रमको पवित्र बना रहे हैं । आपलोगोंके ॥ १४ अनुग्रहसे मुझसे बढ़कर धन्य दूसरा कौन है? सन्ध्या और जपमें निरन्तर संलग्न रहनेवाले आप सभी लोग । सुखपूर्वक यहाँ रहिये ॥ ११–१४३ ॥ व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] इस प्रकार सभी ॥ १५ ब्राह्मणोंको आश्वस्त करके मुनिराज गौतम भक्ति-भावसे सिर झुकाकर गायत्रीकी प्रार्थना करने लगे-। हे देवि! आपको नमस्कार है । आप महाविद्या, ॥ १६ वेदमाता और परात्परस्वरूपिणी हैं । व्याहृति आदि महामन्त्रों तथा प्रणवके स्वरूपवाली, साम्यावस्थामें । विराजमान रहनेवाली तथा ह्रींकार स्वरूपवाली हे मातः! आपको नमस्कार है ॥ १५ - १७ ॥ १७ स्वाहा और स्वधा - रूपसे शोभा पानेवाली हे । देवि! मैं आपको प्रणाम करता हूँ । सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली, भक्तोंके लिये कल्पलतासदृश, तीनों ॥ १८ अवस्थाओंकी साक्षिणी -स्वरूपा, तुरीयावस्थासे अतीत

तुर्यातीतस्वरूपां च सच्चिदानन्दरूपिणीम् ।

सर्ववेदान्तसंवेद्यां सूर्यमण्डलवासिनीम् ॥

प्रातर्बालां रक्तवर्णां मध्याह्ने युवतीं पराम् ।

सायाह्ने कृष्णवर्णां तां वृद्धां नित्यं नमाम्यहम् ॥

. सर्वभूतारणे देवि क्षमस्व परमेश्वरि ।

इति स्तुता जगन्माता प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ ॥

पूर्णपात्रं ददौ तस्मै येन स्यात्सर्वपोषणम् ।

उवाच मुनिमम्बा सा यं यं कामं त्वमिच्छसि ॥

तस्य पूर्तिकरं पात्रं मया दत्तं भविष्यति ।

इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी गायत्री परमा कला ॥

अन्नानां राशयस्तस्मान्निर्गताः पर्वतोपमाः ।

षड्रसा विविधा राजंस्तृणानि विविधानि च ॥

भूषणानि च दिव्यानि क्षौमानि वसनानि च ।

यज्ञानां च समारम्भाः पात्राणि विविधानि च ॥

स्वरूपवाली, सच्चिदानन्द - स्वरूपिणी, सभी वेदान्तों की वेद्यविषयरूपा, सूर्यमण्डलमें विराजमान रहनेवाली, १ ९ प्रात: कालमें बाल्यावस्था तथा रक्तवर्णवाली, मध्याह्नकालमें श्रेष्ठ युवतीकी भाँति शोभा पानेवाली और सायंकालमें वृद्धास्वरूपिणी तथा कृष्णवर्णवाली २० उन भगवतीको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ । सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाली हे परमेश्वरि! हे देवि! आप क्षमा करें ॥ १८–२०३ ॥ २१ गौतमजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर जगज्जननी भगवतीने उन्हें अपना प्रत्यक्ष दर्शन दिया । उन्होंने उन गौतमऋषिको एक ऐसा पूर्णपात्र प्रदान किया, जिसके २२ द्वारा सबका भरण - पोषण हो सके ॥ २१३ ॥

उन जगदम्बाने मुनिसे कहा - आप जिस - जिस वस्तुकी कामना करेंगे, मेरे द्वारा प्रदत्त यह पूर्णपात्र २३ । उसकी पूर्ति करनेवाला सिद्ध होगा ॥२२३ ॥

ऐसा कहकर श्रेष्ठ कलास्वरूपिणी भगवती । गायत्री अन्तर्धान हो गयीं । हे राजन्! उस पात्रसे २४ पर्वतके समान विशाल अन्नराशि, छः प्रकारके रस, भाँति - भाँतिके तृण, दिव्य आभूषण, रेशमी वस्त्र, यज्ञोंकी सामग्रियाँ तथा अनेक प्रकारके पात्र २५ | निकले ॥ २३–२५ ॥

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अ ० ९ ९ ]

यद्यदिष्टमभूद्राजन् मुनेस्तस्य महात्मनः ।

तत्सर्वं निर्गतं तस्माद् गायत्रीपूर्णपात्रतः ॥

अथाहूय मुनीन्सर्वान्मुनिराड् गौतमस्तदा ।

धनं धान्यं भूषणानि वसनानि ददौ मुदा ॥

गोमहिष्यादिपशवो निर्गताः पूर्णपात्रतः ।

निर्गतान्यज्ञसम्भारान्स्त्रुक्स्त्रुवप्रभृतीन्ददौ ॥

ते सर्वे मिलिता यज्ञांश्चक्रिरे मुनिवाक्यतः ।

स्थानं तदेव भूयिष्ठमभवत्स्वर्गसन्निभम् ॥

यत्किञ्चित् त्रिषु लोकेषु सुन्दरं वस्तु दृश्यते ।

तत्सर्वं तत्र निष्पन्नं गायत्रीदत्तपात्रतः ॥

देवाङ्गनासमा दाराः शोभन्ते भूषणादिभिः ।

मुनयो देवसदृशा वस्त्रचन्दनभूषणैः ॥

नित्योत्सवः प्रववृते मुनेराश्रममण्डले ।

न रोगादिभयं किञ्चिन्न च दैत्यभयं क्वचित् ॥

स मुनेराश्रमो जातः समन्ताच्छतयोजनः ।

अन्ये च प्राणिनो येऽपि तेऽपि तत्र समागताः ॥

तांश्च सर्वान्पुपोषायं दत्त्वाभयमथात्मवान् ।

नानाविधैर्महायज्ञैर्विधिवत्कल्पितैः सुराः ॥

सन्तोषं परमं प्रापुर्मुनेश्चैव जगुर्यशः ।

सभायां वृत्रहा भूयो जगौ श्लोकं महायशाः ॥

अहो अयं नः किल कल्पपादपो मनोरथान्पूरयति प्रतिष्ठितः । क्व हविर्वपा वा सुदुर्लभा यत्र तु जीवनाशा ॥ द्वादश स्कन्ध ८२३ हे राजन्! उन महात्मा गौतमको जिस - जिस २६ पदार्थकी अभिलाषा होती थी, वे सभी पदार्थ भगवती गायत्रीके द्वारा प्रदत्त उस पूर्णपात्रसे निकल आते थे ॥ २६ ॥

२७ इसके बाद मुनिवर गौतमने सभी मुनियोंको बुलाकर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक धन - धान्य, आभूषण तथा वस्त्र आदि प्रदान किये । उस पूर्णपात्रसे निर्गत गाय - भैंस आदि पशु तथा स्रुक् - स्रुवा आदि यज्ञकी २८ सामग्रियाँ सभी मुनियोंको दी गयीं ॥ २७-२८ ॥ तदनन्तर वे सभी मुनि एकत्र होकर गौतमऋषिकी आज्ञासे नानाविध यज्ञ करने लगे । इस प्रकार वह २ ९ आश्रम स्वर्गके समान एक अत्यन्त दिव्य स्थान हो गया ॥ २ ९ ॥ तीनों लोकोंमें जो कुछ भी सुन्दर वस्तु दृष्टिगत ३० होती, वह सब कुछ गायत्रीके द्वारा दिये गये पात्रसे प्राप्त हो जाती थी ॥ ३० ॥

मुनियोंकी स्त्रियाँ भूषण आदिके द्वारा देवांगनाओंकी ३१ भाँति और मुनिगण वस्त्र, चन्दन तथा आभूषणोंसे देवताओंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३१ ॥

गौतमऋषिके आश्रममें चारों ओर नित्य उत्सव मनाया जाने लगा । किसीको भी रोग आदिका कोई ३२ भी भय नहीं था और दैत्योंका कहीं भी भय नहीं रहा ॥ ३२ ॥

गौतममुनिका वह आश्रम चारों ओरसे सौ ३३ योजनके विस्तारवाला हो गया; और भी अन्य जिन प्राणियोंको इसकी जानकारी हुई, वे भी वहाँ आ गये तब आत्मज्ञानी गौतममुनिने उन्हें अभय प्रदान करके ३४ | उन सभीके भरण - पोषणका समुचित प्रबन्ध कर दिया । अनेक प्रकारके महायज्ञोंके विधिपूर्वक सम्पन्न हो जानेसे देवतागण परम प्रसन्न हुए और मुनिका ३५ यशोगान करने लगे । वृत्रासुरका संहार करनेवाले महान् यशस्वी इन्द्रने भी अपनी सभामें बार - बार यह

श्लोक कहा - अहो, इस समय ये गौतमऋषि हमारे

लिये साक्षात् कल्पवृक्षके रूपमें प्रतिष्ठित होकर हमारे सभी मनोरथ पूर्ण कर रहे हैं, अन्यथा इस दुष्कालमें जहाँ जीवनकी आशा भी अत्यन्त दुर्लभ थी, फिर ३६ । हमलोग हवि कैसे प्राप्त करते? ॥३३–३६ ॥

पृष्ठ 833

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८२४

इत्थं द्वादशवर्षाणि पुपोष मुनिपुङ्गवान् ।

पुत्रवन्मुनिराड् गर्वगन्धेन परिवर्जितः ॥

गायत्र्याः परमं स्थानं चकार मुनिसत्तमः ।

यत्र सर्वैर्मुनिवरैः पूज्यते जगदम्बिका ॥

त्रिकालं परया भक्त्या पुरश्चरणकर्मभिः ।

अद्यापि यत्र देवी सा प्रातर्बाला तु दृश्यते ॥

मध्याह्ने युवती वृद्धा सायंकाले तु दृश्यते ।

तत्रैकदा समायातो नारदो मुनिसत्तमः ॥

रणयन्महतीं गायन्गायत्र्याः परमान्गुणान् ।

निषसाद सभामध्ये मुनीनां भावितात्मनाम् ॥

गौतमादिभिरत्युच्चैः पूजितः शान्तमानसः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ इस प्रकार वे मुनिवर गौतम अभिमानकी गन्धतकसे ३७ | रहित होकर बारह वर्षोंतक उन श्रेष्ठ मुनियोंका पुत्रवत् पालन - पोषण करते रहे ॥ ३७ ॥

उन मुनिश्रेष्ठ गौतमने गायत्रीकी उपासनाहेतु ३८ एक पवित्र स्थलका निर्माण कराया, जहाँ सभी श्रेष्ठ मुनिगण पुरश्चरण आदि कर्मोंके द्वारा परम भक्तिके साथ तीनों कालों – प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकालमें ३ ९ भगवती जगदम्बाकी पूजा करते थे । उस स्थानपर आज भी वे भगवती प्रातः काल बाला - रूपमें, मध्याह्न-कालमें युवतीके रूपमें तथा सायंकालमें वृद्धाके रूपमें ४० दृष्टिगोचर होती हैं ॥ ३८-३९ ३ ॥ एक बार मुनिश्रेष्ठ नारदजी अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए और गायत्रीके उत्तम गुणोंका गान करते हुए वहाँ आये और पुण्यात्मा मुनियोंकी सभा में ४१ बैठ गये ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् गौतम आदि श्रेष्ठ मुनियोंसे विधिवत् पूजित होकर शान्त मनवाले नारदजी गौतमकी कथाश्चकार विविधा यशसो गौतमस्य च ॥ ४२

ब्रह्मर्षे देवसदसि देवराट् तव यद्यशः ।

जगौ बहुविधं स्वच्छं मुनिपोषणजं परम् ॥

श्रुत्वा शचीपतेर्वाणीं त्वां द्रष्टुमहमागतः ।

धन्योऽसि त्वं मुनिश्रेष्ठ जगदम्बाप्रसादतः ॥

इत्युक्त्वा मुनिवर्यं तं गायत्रीसदनं ययौ ।

ददर्श जगदम्बां तां प्रेमोत्फुल्लविलोचनः ॥

तुष्टाव विधिवद्देवीं जगाम त्रिदिवं पुनः ।

अथ तत्र स्थिता येते ब्राह्मणा मुनिपोषिताः ॥

उत्कर्षं तु मुनेः श्रुत्वासूयया खेदमागताः ।

यथास्य न यशो भूयात्कर्तव्यं सर्वथैव हि ॥

काले समागते पश्चादिति सर्वैस्तु निश्चितम् ।

ततः कालेन कियताप्यभूद् वृष्टिर्धरातले ॥

यश - सम्बन्धी विविध कथाओंका वर्णन करने लगे - हे ब्रह्मर्षे! देवराज इन्द्रने मुनियोंके भरण-पोषणसे सम्बन्धित आपकी विमल कीर्तिका गान ४३ देवताओंकी सभामें अनेक प्रकारसे किया है । शचीपति इन्द्रकी वही वाणी सुनकर आपका दर्शन करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ । हे मुनिश्रेष्ठ! जगदम्बाकी ४४ कृपासे आप धन्य हैं ॥ ४२–४४ ॥ उन मुनिवर गौतमसे ऐसा कहकर नारदजी गायत्री - सदनमें गये । प्रेमसे प्रफुल्लित नेत्रोंवाले नारदजीने ४५ वहाँ उन भगवती जगदम्बाका दर्शन किया और विधिवत् उनकी स्तुति की । तत्पश्चात् उन्होंने स्वर्गके लिये प्रस्थान किया । इसके बाद वहाँपर मुनि गौतमके ४६ द्वारा पालित - पोषित जो ब्राह्मण थे, वे मुनिका उत्कर्ष सुनकर ईर्ष्यासे दुःखी हो गये । कुछ समय बीतने के बाद उन सभीने यह निश्चय किया कि किसी भी ४७ प्रकारसे हमलोगोंको सर्वथा वही प्रयत्न करना चाहिये, जिससे इस गौतमऋषिका यश न बढ़े ॥ ४५–४७३ ॥ हे महाराज! कुछ कालके अनन्तर पृथ्वीतलपर ४८ । वृष्टि भी होने लगी और सभी देशोंमें सुभिक्ष हो गया ।

पृष्ठ 834

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अ ० ९ ] द्वादश

सुभिक्षमभवत्सर्वदेशेषु नृपसत्तम ।

श्रुत्वा वार्तां सुभिक्षस्य मिलिताः सर्ववाडवाः ॥ ४ ९

गौतमं शप्तुमुद्योगं हा हा राजन् प्रचक्रिरे ।

धन्यौ तेषां च पितरौ ययोरुत्पत्तिरीदृशी ॥ ५०

कालस्य महिमा राजन् वक्तुं केन हि शक्यते ।

गौर्निर्मिता माययैका मुमूर्षुर्जरती नृप ॥ ५१

जगाम सा च शालायां होमकाले मुनेस्तदा ।

हुहुंशब्दैर्वारिता सा प्राणांस्तत्याज तत्क्षणे ॥ ५२

गौर्हतानेन दुष्टेनेत्येवं ते चुक्रुशुर्द्विजाः ।

होमं समाप्य मुनिराड् विस्मयं परमं गतः ॥ ५३

समाधिमीलिताक्षः संश्चिन्तयामास कारणम् ।

कृतं सर्वं द्विजैरेतदिति ज्ञात्वा तदैव सः ॥५४

दधार कोपं परमं प्रलये रुद्रकोपवत् ।

शशाप च ऋषीन्सर्वान्कोपसंरक्तलोचनः ॥ ५५

वेदमातरि गायत्र्यां तद्ध्याने तन्मनोर्जपे ।

भवतानुन्मुखा यूयं सर्वथा ब्राह्मणाधमाः ॥५६

वेदे वेदोक्तयज्ञेषु तद्वार्तासु तथैव च ।

भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः ॥ ५७

शिवे शिवस्य मन्त्रे च शिवशास्त्रे तथैव च ।

भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः ॥ ५८

मूलप्रकृत्या: श्रीदेव्यास्तद्ध्याने तत्कथासु च ।

भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः ॥ ५ ९

देवीमन्त्रे तथा देव्या: स्थानेऽनुष्ठानकर्मणि ।

भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः ॥ ६०

देव्युत्सवदिदृक्षायां देवीनामानुकीर्तने ।

भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः ॥ ६१

देवीभक्तस्य सान्निध्ये देवीभक्तार्चने तथा ।

भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः ॥ ६२ ।

स्कन्ध ८२५ सर्वत्र सुभिक्षकी बात सुनकर वे ब्राह्मण एकत्र हो गये और हे राजन्! हाय - हाय! वे गौतमको शाप देनेका प्रयत्न करने लगे । वे माता - पिता भी आज धन्य हो गये, जिनके यहाँ ऐसे [ कृतघ्न ब्राह्मण - ] पुत्रोंका जन्म हुआ है ॥ ४८- ५० ॥ हे राजन्! कालकी महिमा भला कौन जान सकता है? उस समय उन ब्राह्मणोंने मायाके द्वारा एक मरणासन्न वृद्ध गाय बनायी, जब मुनि हवन कर रहे थे, उसी समय वह गाय यज्ञशालामें पहुँची । मुनि गौतमने ' हुं हुं ' शब्दोंसे उसे आनेसे रोका; उसी क्षण उसने अपने प्राण त्याग दिये ॥ ५१-५२ ॥ तब वे ब्राह्मण जोर - जोर से कहने लगे कि इस दुष्ट गौतमने गौकी हत्या कर दी । तब मुनिराज गौतम हवन समाप्त करनेके पश्चात् इस घटना से अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे । वे अपने नेत्र बन्द करके समाधिमें स्थित होकर इसके कारणपर विचार करने लगे । यह सब कुछ ब्राह्मणोंने ही किया है - ऐसा जानकर उन्होंने प्रलयकालीन रुद्रके क्रोधके समान परम कोप किया । इस प्रकार कोपसे लाल नेत्रोंवाले उन गौतमने सभी ऋषियोंको यह शाप दे दिया-• ' अधम ब्राह्मणो! तुमलोग वेदमाता गायत्रीकी उपासना, ध्यान और उनके मन्त्र - जपसे सर्वथा विमुख हो जाओ । हे अधम ब्राह्मणो! वेद, वेदोक्त यज्ञों तथा वेदसम्बन्धी वार्ताओंसे तुम सभी सदा वंचित रहो । हे अधम ब्राह्मणो! तुम सभी शिवोपासना, शिव - मन्त्रके जप तथा शिव - सम्बन्धी शास्त्रोंसे सर्वदा विमुख हो जाओ ॥ ५३–५८ ॥ हे अधम ब्राह्मणो! मूलप्रकृति भगवती श्रीदेवीकी उपासना, उनके ध्यान तथा उनकी कथाओंसे तुमलोग सदा विमुख हो जाओ । हे अधम ब्राह्मणो! देवीके मन्त्र - जप, उनकी प्रतिष्ठास्थली तथा उनके अनुष्ठान-कर्मसे तुमलोग सदा पराङ्मुख हो जाओ ॥ ५ ९ -६० ॥ हे अधम ब्राह्मणो! देवीका उत्सव देखने तथा उनके नामोंके कीर्तनसे तुम सब सदा विमुख रहो । हे अधम ब्राह्मणो! देवी - भक्तके समीप रहने तथा देवी-भक्तोंकी अर्चना करनेसे तुम सभी लोग सर्वदा विमुख रहो ॥ ६१-६२ ॥

पृष्ठ 835

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८२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ शिवोत्सवदिदृक्षायां शिवभक्तस्य पूजने भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः रुद्राक्षे बिल्वपत्रे च तथा शुद्धे च भस्मनि भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः श्रौतस्मार्त सदाचारे ज्ञानमार्गे तथैव च भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः अद्वैतज्ञाननिष्ठायां शान्तिदान्त्यादिसाधने भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः नित्यकर्माद्यनुष्ठानेऽप्यग्निहोत्रादिसाधने भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः स्वाध्यायाध्ययने चैव तथा प्रवचनेऽपि च भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः गोदानादिषु दानेषु पितृश्राद्धेषु चैव हि भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः कृच्छ्रचान्द्रायणे चैव प्रायश्चित्ते तथैव च भवतानुन्मुखा यूयं सर्वदा ब्राह्मणाधमाः श्रीदेवीभिन्नदेवेषु श्रद्धाभक्तिसमन्विताः शङ्खचक्राद्यङ्किताश्च भवत ब्राह्मणाधमाः कापालिकमतासक्ता बौद्धशास्त्ररताः सदा पाखण्डाचारनिरता भवत ब्राह्मणाधमाः पितृमातृसुताभ्रातृकन्याविक्रयिणस्तथा भार्याविक्रयिणस्तद्वद्भवत ब्राह्मणाधमाः वेदविक्रयिणस्तद्वत्तीर्थविक्रयिणस्तथा धर्मविक्रयिणस्तद्वद्भवत ब्राह्मणाधमाः पाञ्चरात्रे कामशास्त्रे तथा कापालिके मते बौद्धे श्रद्धायुता यूयं भवत ब्राह्मणाधमाः । हे अधम ब्राह्मणो! भगवान् शिवका उत्सव देखने ॥ ६३ तथा शिवभक्तका पूजन करनेसे तुम सदा विमुख रहो । हे अधम ब्राह्मणो! रुद्राक्ष, बिल्वपत्र तथा शुद्ध भस्मसे । तुमलोग सर्वदा वंचित रहो ॥ ६३-६४ ॥ ॥ ६४ हे अधम ब्राह्मणो! श्रौतस्मार्त - सम्बन्धी सदाचार तथा ज्ञान - मार्गसे तुमलोग सदा वंचित रहो । हे अधम । ब्राह्मणो! अद्वैत ज्ञाननिष्ठा और शम - दम आदि ॥ ६५ साधनोंसे तुमलोग सर्वदा विमुख रहो॥६५-६६ ॥ हे अधम ब्राह्मणो! नित्यकर्म आदिके अनुष्ठान । तथा अग्निहोत्र आदि सम्पन्न करनेसे भी तुमलोग ॥ ६६ सदा वंचित हो जाओ ॥ ६७ ॥

हे अधम ब्राह्मणो! स्वाध्याय- अध्ययन तथा ॥ ६७ प्रवचन आदिसे भी तुम सभी लोग सर्वदा विमुख रहो ॥ ६८ ॥

। हे अधम ब्राह्मणो! गौ आदिके दान और ॥ ६८ पितरोंके श्राद्धकर्मसे तुम सभी लोग सदाके लिये विमुख हो जाओ ॥ ६ ९ ॥ । हे अधम ब्राह्मणो! कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रतों ॥ ६ ९ तथा पाप आदिके प्रायश्चित्त कर्मोंसे तुम सभी लोग सर्वदाके लिये विमुख हो जाओ ॥ ७० ॥

। हे अधम ब्राह्मणो! तुमलोग देवी भगवतीके ॥ ७० अतिरिक्त अन्य देवताओंके प्रति श्रद्धा तथा भक्तिसे युक्त होकर और शंख - चक्र आदिका चिह्न धारण । करनेवाले हो जाओ ॥ ७१ ॥

॥७१ हे अधम ब्राह्मणो! तुमलोग कापालिक मतमें । आसक्त, बौद्ध शास्त्रोंके परायण तथा पाखण्डपूर्ण आचारमें निरत रहो ॥ ७२ ॥

॥ ७२ हे अधम ब्राह्मणो! तुमलोग पिता, माता, पुत्री, 1 भाई, कन्या और पत्नीका विक्रय करनेवाले व्यक्तियोंके ॥ ७३ समान हो जाओ ॥ ७३ ॥

हे अधम ब्राह्मणो! वेदका विक्रय करनेवाले, 1 तीर्थ बेचनेवाले और धर्म बेचनेवाले व्यक्तियोंके समान ॥ ७४ तुमलोग हो जाओ ॥ ७४ ॥

हे अधम ब्राह्मणो! तुमलोग पांचरात्र, कामशास्त्र, । कापालिक मत और बौद्ध मतके प्रति श्रद्धा रखनेवाले ॥ ७५ | हो जाओ ॥ ७५ ॥

पृष्ठ 836

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अ ० ९ ]

मातृकन्यागामिनश्च भगिनीगामिनस्तथा ।

परस्त्रीलम्पटाः सर्वे भवत ब्राह्मणाधमाः ॥

युष्माकं वंशजाताश्च स्त्रियश्च पुरुषास्तथा ।

मद्दत्तशापदग्धास्ते भविष्यन्ति भवत्समाः ॥

किं मया बहुनोक्तेन मूलप्रकृतिरीश्वरी ।

गायत्री परमा भूयाद्युष्मासु खलु कोपिता ॥

अन्धकूपादिकुण्डेषु युष्माकं स्यात्सदा स्थितिः । व्यास उवाच वाग्दण्डमीदृशं कृत्वाप्युपस्पृश्य जलं ततः ॥

जगाम दर्शनार्थं च गायत्र्याः परमोत्सुकः ।

प्रणनाम महादेवीं सापि देवी परात्परा ॥

ब्राह्मणानां कृतिं दृष्ट्वा स्मयं चित्ते चकार ह ।

अद्यापि तस्या वदनं स्मययुक्तं च दृश्यते ॥

उवाच मुनिवर्यं तं स्मयमानमुखाम्बुजा ।

भुजङ्गायार्पितं दुग्धं विषायैवोपजायते ॥

शान्तिं कुरु महाभाग कर्मणो गतिरीदृशी ।

इति देवीं प्रणम्याथ ततोऽगात्स्वाश्रमं प्रति ॥

ततो विप्रैः शापदग्धैर्विस्मृता वेदराशयः ।

गायत्री विस्मृता सर्वैस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

ते सर्वेऽथ मिलित्वा तु पश्चात्तापयुतास्तथा ।

प्रणेमुर्मुनिवर्यं तं दण्डवत्पतिता भुवि ॥

नोचुः किञ्चन वाक्यं तु लज्जयाधोमुखाः स्थिताः ।

प्रसीदेति प्रसीदेति प्रसीदेति पुनः पुनः ॥

प्रार्थयामासुरभितः परिवार्य मुनीश्वरम् । द्वादश स्कन्ध ८२७ हे अधम ब्राह्मणो! तुमलोग माता, कन्या, भगिनी ७६ तथा परायी स्त्रियोंके साथ व्यभिचार करनेवाले हो जाओ ॥ ७६ ॥

तुम्हारे वंशमें उत्पन्न स्त्रियाँ तथा पुरुष मेरे द्वारा ७७ दिये हुए इस शापसे दग्ध होकर तुमलोगोंके ही समान हो जायँगे ॥ ७७ ॥

मेरे अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन! मूलप्रकृति ७८ परमेश्वरी भगवती गायत्रीका अवश्य ही तुमलोगोंपर महान् कोप है । अत: तुमलोगोंका अन्धकूप आदि नरककुण्डोंमें सदा वास होगा ॥ ७८३ ॥

व्यासजी बोले- इस प्रकारका वाग्दण्ड देकर गौतममुनिने आचमन किया और तत्पश्चात् भगवती ७ ९ गायत्रीके दर्शनार्थ अत्यन्त उत्सुक होकर वे देवी-मन्दिर गये । वहाँ उन्होंने महादेवीको प्रणाम किया । वे परात्परा भगवती गायत्री भी ब्राह्मणोंकी कृतघ्नताको ८० देखकर स्वयं अपने मनमें चकित हो रही थीं और आज भी उनका मुख आश्चर्यसे युक्त दिखायी पड़ता है ॥७ ९ –८१ ॥ ८१ आश्चर्ययुक्त मुखकमलवाली भगवती गायत्रीने उन मुनिवर गौतमसे कहा - ' हे महाभाग! सर्पको दिया गया दुग्ध उसके विषको ही बढ़ानेवाला होता ८२ है । अब आप धैर्य धारण कीजिये; क्योंकि कर्मकी ऐसी ही गति होती है । ' तत्पश्चात् भगवतीको प्रणामकर गौतमजी अपने आश्रमके लिये चल ८३ दिये॥८२-८३ ॥ तब शापदग्ध वे ब्राह्मण वेदोंको भूल गये । उन सभीको गायत्री मन्त्र भी विस्मृत हो गया । ऐसी ८४ आश्चर्यकारी घटना हुई ॥ ८४ ॥

अब वे सभी ब्राह्मण एकत्र होकर पश्चात्ताप करने लगे और दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिरकर उन्होंने ८५ मुनिवर गौतमको प्रणाम किया ॥८५ ॥

लज्जासे अपने मुख नीचे की ओर किये हुए वे कुछ भी वाक्य नहीं बोल सके । वे चारों ओरसे ८६ मुनीश्वरको घेरकर बार - बार यही प्रार्थना करने लगे - आप प्रसन्न हो जाइये, प्रसन्न हो जाइये, प्रसन्न हो जाइये ॥ ८६३ ॥

पृष्ठ 837

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८२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ करुणापूर्णहृदयो मुनिस्तान्समुवाच ह ॥

कृष्णावतारपर्यन्तं कुम्भीपाके भवेत्स्थितिः ।

न मे वाक्यं मृषा भूयादिति जानीथ सर्वथा ॥

ततः परं कलियुगे भुवि जन्म भवेद्धि वाम् ।

मदुक्तं सर्वमेतत्तु भवेदेव न चान्यथा ॥

मच्छापस्य विमोक्षार्थं युष्माकं स्याद्यदीषणा ।

तर्हि सेव्यं सदा सर्वैर्गायत्रीपदपङ्कजम् ॥

व्यास उवाच

इति सर्वान्विसृज्याथ गौतमो मुनिसत्तमः ।

प्रारब्धमिति मत्वा तु चित्ते शान्तिं जगाम ह ॥

एतस्मात्कारणाद्राजन् गते कृष्णे तु धीमति ।

कलौ युगे प्रवृत्ते तु कुम्भीपाकात्तु निर्गताः ॥

भुवि जाता ब्राह्मणाश्च शापदग्धाः पुरा तु ये ।

सन्ध्यात्रयविहीनाश्च गायत्रीभक्तिवर्जिताः ॥

वेदभक्तिविहीनाश्च पाखण्डमतगामिनः ।

अग्निहोत्रादिसत्कर्मस्वधास्वाहाविवर्जिताः ॥

मूलप्रकृतिमव्यक्तां नैव जानन्ति कर्हिचित् ।

तप्तमुद्राङ्किताः केचित्कामाचाररताः परे ॥

कापालिका: कौलिकाश्च बौद्धा जैनास्तथापरे ।

पण्डिता अपि ते सर्वे दुराचारप्रवर्तकाः ॥

लम्पटाः परदारेषु दुराचारपरायणाः ।

कुम्भीपाकं पुनः सर्वे यास्यन्ति निजकर्मभिः ॥

तस्मात्सर्वात्मना राजन् संसेव्या परमेश्वरी ।

न विष्णूपासना नित्या न शिवोपासना तथा ॥

नित्या चोपासना शक्तेर्यां विना तु पतत्यधः ।

सर्वमुक्तं समासेन यत्पृष्टं तत्त्वयानघ ॥

८७ इसपर मुनिका हृदय करुणासे भर आया और वे उन ब्राह्मणोंसे बोले – ' कृष्णावतारपर्यन्त तुमलोगोंको कुम्भीपाक नरकमें वास करना ८८ पड़ेगा; क्योंकि मेरा वचन मिथ्या कदापि नहीं हो सकता - इसे तुमलोग भलीभाँति जान लो । तत्पश्चात् कलियुगमें भूमण्डलपर तुमलोगोंका जन्म होगा । ८ ९ मेरे द्वारा कही गयी ये सारी बातें अन्यथा नहीं हो सकतीं । यदि मेरे शापसे मुक्तिकी तुमलोगोंको इच्छा है, तो तुम सब भगवती गायत्रीके चरणकमलकी सदा ९ ० उपासना करो ' ॥ ८७ – ९ ० ॥ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ गौतमने सभी ब्राह्मणोंको विदा कर दिया । तत्पश्चात् ' यह सब ९ १ प्रारब्धका प्रभाव है'- ऐसा मानकर उन्होंने अपना चित्त शान्त कर लिया । हे राजन्! यही कारण है कि बुद्धिसम्पन्न भगवान् श्रीकृष्णके महाप्रयाण करनेके ९ २ पश्चात् कलियुग आनेपर वे सभी ब्राह्मण कुम्भीपाक नरककुण्डसे निकल आये ॥ ९ १ - ९ २ ॥ इस प्रकार पूर्वकालमें शापसे दग्ध वे ब्राह्मण ९ ३ भूमण्डलपर उत्पन्न हुए; जो त्रिकाल सन्ध्यासे हीन, भगवती गायत्रीकी भक्तिसे विमुख, वेदोंके प्रति श्रद्धारहित, पाखण्डमतका अनुसरण करनेवाले, अग्निहोत्र आदि ९ ४ सत्कर्म न करनेवाले और स्वाहा स्वधासे रहित हैं । उनमें कुछ ऐसे हैं, जो मूलप्रकृति तथा अव्यक्तस्वरूपिणी गायत्रीके विषयमें कुछ भी नहीं जानते । कोई - कोई ९ ५ तप्तमुद्रा धारण करके स्वेच्छाचार - परायण हो गये हैं । उनमेंसे कुछ कापालिक, कौलिक, बौद्ध तथा जैनमतको माननेवाले हैं, वे सभी पण्डित होते हुए भी दुराचारके ९ ६ प्रवर्तक हैं । परायी स्त्रियोंके साथ दुराचार करनेवाले सभी लम्पट अपने कुत्सित कर्मोंके कारण पुनः उसी ९ ७ कुम्भीपाक नरककुण्डमें जायँगे ॥९ ३ – ९ ७ ॥ अतएव हे राजन्! हर प्रकारसे परमेश्वरीकी उपासना करनी चाहिये । न विष्णुकी उपासना नित्य ९ ८ है और न तो शिवकी ही उपासना नित्य है; केवल शक्तिकी उपासना नित्य है, जिसके न करनेसे मनुष्यका अधःपतन हो जाता है । हे निष्पाप! आपने मुझसे जो ९९ । पूछा था, वह सब मैंने संक्षेपमें बता दिया । अब आप

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अ ० १० ] द्वादश स्कन्ध ८२ ९ अतः परं मणिद्वीपवर्णनं शृणु सुन्दरम् । मणिद्वीपका मनोरम वर्णन सुनिये, जो जगत्‌को उत्पन्न करनेवाली आदिशक्तिस्वरूपिणी भुवनेश्वरीका परमधाम

यत्परं स्थानमाद्याया भुवनेश्या भवारणेः ॥ १०० । है ॥ ९ ८ – १०० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे ब्राह्मणादीनां गायत्रीभिन्नान्यदेवोपासना श्रद्धाहेतुनिरूपणं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

अथ दशमोऽध्यायः मणिद्वीपका वर्णन व्यास उवाच

ब्रह्मलोकादूर्ध्वभागे सर्वलोकोऽस्ति यः श्रुतः ।

मणिद्वीपः स एवास्ति यत्र देवी विराजते ॥

सर्वस्मादधिको यस्मात्सर्वलोकस्ततः स्मृतः ।

पुरा पराम्बयैवायं कल्पितो मनसेच्छया ॥

सर्वादौ निजवासार्थं प्रकृत्या मूलभूतया ।

कैलासादधिको लोको वैकुण्ठादपि चोत्तमः ॥

गोलोकादपि सर्वस्मात्सर्वलोकोऽधिकः स्मृतः ।

न तत्समं त्रिलोक्यां तु सुन्दरं विद्यते क्वचित् ॥

छत्रीभूतं त्रिजगतो भवसन्तापनाशकम् ।

छायाभूतं तदेवास्ति ब्रह्माण्डानां तु सत्तम ॥

बहुयोजनविस्तीर्णो गम्भीरस्तावदेव हि ।

मणिद्वीपस्य परितो वर्तते तु सुधोदधिः ॥

मरुत्सङ्घट्टनोत्कीर्णतरङ्गशतसङ्कलः 1 रत्नाच्छवालुकायुक्तो झषशङ्खसमाकुलः ॥ वीचिसङ्घर्षसञ्जातलहरीकणशीतलः 1 नानाध्वजसमायुक्तनानापोतगतागतैः ॥

विराजमानः परितस्तीररत्नद्रुमो महान् ।

तदुत्तरमयोधातुनिर्मितो गगने ततः ॥

सप्तयोजनविस्तीर्णः प्राकारो वर्तते महान् । व्यासजी बोले - [ हे महाराज जनमेजय! ] ब्रह्मलोकसे ऊपरके भागमें जो सर्वलोक सुना गया १ है, वही मणिद्वीप है; जहाँ भगवती विराजमान रहती हैं ॥ १ ॥

चूँकि यह सभी लोकोंसे श्रेष्ठ है, इसलिये इसे २ सर्वलोक कहा गया है । पूर्वकालमें मूलप्रकृतिस्वरूपिणी पराम्बा भगवतीने सबसे प्रारम्भमें अपने निवासहेतु स्वेच्छा से इसका निर्माण किया था । यह लोक ३ कैलास, वैकुण्ठ और गोलोकसे भी महान् तथा उत्तम है । समस्त लोकोंसे श्रेष्ठ होनेके कारण यह सर्वलोक कहा गया है । तीनों लोकोंमें उसके समान सुन्दर ४ स्थान कहीं नहीं है ॥२-४ ॥ हे सत्तम! वह मणिद्वीप तीनों जगत्‌का छत्रस्वरूप तथा सांसारिक सन्तापोंका नाश करनेवाला है और ५ सभी ब्रह्माण्डोंका भी छायास्वरूप वही है ॥ ५ ॥

उस मणिद्वीपके चारों ओर अनेक योजन विस्तारवाला तथा परिमाणमें उतना ही गहरा अमृतका ६ सागर विद्यमान है, जो पवनके आघातसे उठी हुई सैकड़ों तरंगोंसे परिपूर्ण, रत्नमयी स्वच्छ बालुकासे युक्त, मत्स्य और शंखोंसे सम्पन्न, तरंगोंके परस्पर ७ संघर्षसे उत्पन्न बड़ी - बड़ी लहरोंद्वारा विकीर्ण शीतल जल - कणोंसे शोभायमान और अनेक प्रकारकी ध्वजाओंसे युक्त नानाविध आवागमनवाले पोतोंसे ८ मण्डित है॥६–८ ॥ उस सुधासागरके चारों ओर तटोंपर रत्नमय वृक्ष विराजमान हैं । उसके उत्तर तरफ लौहधातुकी बनी ९ हुई सात योजन विस्तारवाली एक गगनस्पर्शी महान् चहारदीवारी है ॥ ९ ३ ॥

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८३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० नानाशस्त्रप्रहरणा नानायुद्धविशारदाः ॥ १० उसमें अनेक प्रकारके शस्त्रोंके प्रहारमें दक्ष तथा नानाविध युद्धकलाओंमें पारंगत बहुत - से रक्षक सभी

रक्षका निवसन्त्यत्र मोदमानाः समन्ततः ।

ओर आनन्दपूर्वक निवास करते हैं ॥ १०३ ॥

चतुर्द्वारसमायुक्तो द्वारपालशतान्वितः ॥ ११ हे राजन्! उस परकोटेमें चार द्वार तथा सैकड़ों

नानागणैः परिवृतो देवीभक्तियुतैर्नृप ।

दर्शनार्थं समायान्ति ये देवा जगदीशितुः ॥

तेषां गणा वसन्त्यत्र वाहनानि च तत्र हि ।

विमानशतसङ्घर्षघण्टास्वनसमाकुलः ॥

हयहेषाखुराघातबधिरीकृतदिङ्मुखः 1 गणैः किलकिलारावैर्वेत्रहस्तैश्च ताडिताः ॥

सेवका देवसङ्घानां भ्राजन्ते तत्र भूमिप ।

तस्मिन्कोलाहले राजन्न शब्दः केनचित्क्वचित् ॥

कस्यचिच्छ्रयतेऽत्यन्तं नानाध्वनिसमाकुले ।

पदे पदे मिष्टवारिपरिपूर्णसरांसि च ॥

वाटिका विविधा राजन् रत्नद्रुमविराजिताः ।

तदुत्तरं महासारधातुनिर्मितमण्डलः ॥

सालोऽपरो महानस्ति गगनस्पर्शि यच्छिरः ।

तेजसा स्याच्छतगुणः पूर्वसालादयं परः ॥

गोपुरद्वारसहितो बहुवृक्षसमन्वितः ।

या वृक्षजातयः सन्ति सर्वास्तास्तत्र सन्ति च ॥

निरन्तरं पुष्पयुताः सदा फलसमन्विताः ।

नवपल्लवसंयुक्ताः परसौरभसङ्कुलाः ॥

पनसा बकुला लोध्राः कर्णिकाराश्च शिंशपाः ।

देवदारुकाञ्चनारा आम्राश्चैव सुमेरवः ॥

लिकुचा हिङ्गुलाश्चैला लवङ्गाः कट्फलास्तथा ।

पाटला मुचुकुन्दाश्च फलिन्यो जघनेफलाः ॥

द्वारपाल हैं । भगवतीमें भक्ति रखनेवाले अनेक गणोंसे वह चारों ओरसे घिरा हुआ है । जो देवता भगवती १२ जगदीश्वरीके दर्शनार्थ आते हैं, उनके गण तथा वाहन यहाँ रहते हैं॥११-१२३ ॥ यह सैकड़ों विमानोंकी घरघराहट तथा घंटा-१३ ध्वनिसे सदा परिपूर्ण रहता है । घोड़ोंकी हिनहिनाहट तथा उनके खुरोंके आघातकी ध्वनिसे दिशाएँ बधिर-१४ सी हो जाती हैं । हे राजन्! किलकिलाहटकी ध्वनि करते हुए तथा हाथमें बेंत लिये हुए देवी - गणोंके द्वारा ताडित देवताओंके सेवक वहाँ सदा विराजमान रहते १५ हैं ॥ १३-१४३ ॥ हे राजन्! उस कोलाहलमें कोई किसीकी बात नहीं सुन पाता । अनेक प्रकारकी ध्वनियोंसे मिश्रित १६ उस स्थानपर अत्यधिक चेष्टा करनेपर ही किसीकी बात सुनी जा सकती है । हे राजन्! वहाँ स्थान-स्थानपर मीठे जलसे परिपूर्ण सरोवर और रत्नमय १७ वृक्षोंसे युक्त अनेक प्रकारके उद्यान सुशोभित हो रहे हैं ॥ १५-१६३ ॥ उस परकोटेके आगे कांस्य धातुसे बना हुआ १८ उससे भी विशाल दूसरा मण्डलाकार परकोटा है, जिसका शिखर आकाशको छूता रहता है । यह परकोटा पहले परकोटेसे तेजमें सौ गुना अधिक १ ९ है ॥ १७-१८ ॥ गोपुर और द्वारसे शोभा पानेवाला यह प्राकारमण्डल २० अनेक वृक्षोंसे युक्त है । वृक्षोंकी जितनी जातियाँ होती हैं, वे सब वहाँपर हैं । वे वृक्ष सदा फूलों और फलोंसे लदे रहते हैं तथा वे नये - नये पल्लवों और उत्तम २१ सुगन्धसे सदा परिपूर्ण रहते हैं ॥ १ ९ -२० ॥ कटहल, मौलसिरी, लोध, कर्णिकार, शीशम, देवदारु, कचनार, आम, सुमेरु, लिकुच, हिंगुल, २२ इलायची, लौंग, कट्फल, पाटल, मुचुकुन्द, फलिनी,

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अ ० १० ] द्वादश

तालास्तमालाः सालाश्च कङ्कोला नागभद्रकाः ।

पुन्नागाः पीलव: साल्वका वै कर्पूरशाखिनः ॥ २३

अश्वकर्णा हस्तिकर्णास्तालपर्णाश्च दाडिमाः ।

गणिका बन्धुजीवाश्च जम्बीराश्च कुरण्डकाः ॥ २४

चाम्पेया बन्धुजीवाश्च तथा वै ' कनकद्रुमाः ।

कालागुरुद्रुमाश्चैव तथा चन्दनपादपाः ॥ २५

खर्जूरा यूथिकास्तालपर्ण्यश्चैव तथेक्षवः ।

क्षीरवृक्षाश्च खदिराश्चिञ्चाभल्लातकास्तथा ॥ २६

रुचकाः कुटजा वृक्षा बिल्ववृक्षास्तथैव च ।

तुलसीनां वनान्येवं मल्लिकानां तथैव च ॥ २७

इत्यादितरुजातीनां वनान्युपवनानि च ।

नानावापीशतैर्युक्तान्येवं सन्ति धराधिप ॥ २८

कोकिलारावसंयुक्ता गुञ्जद्भ्रमरभूषिताः ।

निर्यासस्त्राविणः सर्वे स्निग्धच्छायास्तरूत्तमाः ॥ २ ९

नानाऋतुभवा वृक्षा नानापक्षिसमाकुलाः ।

नानारसस्त्राविणीभिर्नदीभिरतिशोभिताः ॥३०

पारावतशुकव्रातसारिकापक्षमारुतैः 1 हंसपक्षसमुद्भूतावातव्रातैश्चलद्द्द्रुमम् ॥३१ सुगन्धग्राहिपवनपूरितं तद्वनोत्तमम् । सहितं हरिणीयूथैर्धावमानैरितस्ततः । ३२

नृत्यद्बर्हिकदम्बस्य केकारावैः सुखप्रदैः ।

नादितं तद्वनं दिव्यं मधुस्रावि समन्ततः ॥ ३३

कांस्यसालादुत्तरे तु ताम्रसालः प्रकीर्तितः ।

चतुरस्त्रसमाकार उन्नत्या सप्तयोजनः ॥ ३४

द्वयोस्तु सालयोर्मध्ये सम्प्रोक्ता कल्पवाटिका ।

येषां तरूणां पुष्पाणि काञ्चनाभानि भूमिप ॥ ३५

पत्राणि काञ्चनाभानि रत्नबीजफलानि च ।

दशयोजनगन्धो हि प्रसर्पति समन्ततः ॥ ३६

तद्वनं रक्षितं राजन् वसन्तेनर्तुनानिशम् ।

पुष्पसिंहासनासीनः पुष्पच्छत्रविराजितः ॥ ३७

पुष्पभूषाभूषितश्च पुष्पासवविघूर्णितः ।

मधुश्रीर्माधव श्रीश्च द्वे भार्ये तस्य सम्मते ॥ ३८ ।

स्कन्ध ८३१ जघनेफल, ताल, तमाल, साल, कंकोल, नागभद्र, नागकेसर, पीलु, साल्व, कर्पूरशाखी, अश्वकर्ण, हस्तिकर्ण, तालपर्ण, दाडिम, गणिका, बन्धुजीव, जम्भीरी नीबू, कुरण्डक, चम्पा, बन्धुजीव, धतूरा, कालागुरु, चन्दन, खजूर, जूही, तालपर्णी, ईख, क्षीरवृक्ष, खैर, इमली, भेलावा, बिजौरा नीबू, कुटज तथा बिल्वके वृक्ष वहाँ सुशोभित रहते हैं । तुलसी तथा मल्लिकाके वन भी वहाँ विद्यमान हैं । हे राजन्! अनेक जातिवाले वृक्षोंके वन तथा उपवन यहाँ शोभायमान हैं, जो सैकड़ों बावलियोंसे युक्त हैं ॥ २१–२८ ॥ कोयलोंकी मीठी ध्वनिसे युक्त, भौंरोके गुंजारसे भूषित तथा शीतल छाया प्रदान करनेवाले वे सभी उत्तम वृक्ष निरन्तर रसस्राव करते रहते हैं । अनेक ऋतुओंमें उत्पन्न होनेवाले वे वृक्ष अनेक प्रकारके पक्षियोंसे सदा युक्त रहते हैं । वे अनेकविध रस प्रवाहित करनेवाली नदियोंसे सर्वदा सुशोभित रहते हैं । कबूतर, तोता, मैना तथा हंस आदि पक्षियोंके पंखोंसे निकली हुई वायुसे वहाँके वृक्ष सदा हिलते रहते हैं । सुगन्धि - मिश्रित पवनसे परिपूर्ण वह वन इधर - उधर दौड़ती हुई हरिणियोंके समूहोंसे सदा शोभा प्राप्त करता है । नाचते हुए मोरोंकी सुखदायक केका - ध्वनियोंसे मुखरित वह दिव्य वन सदा मधुका

स्राव करता रहता है । २ ९ - ३३ ॥

उस कांस्यके प्राकारके आगे ताम्रकी चहारदीवारी बतायी गयी है, जो आकारमें चौकोर तथा ऊँचाईमें सात योजन परिमाणवाली है । हे राजन्! उन दोनों प्राकारोंके मध्यमें एक कल्पवाटिका कही गयी है, जिसके वृक्षोंके पुष्प तथा पत्ते सुवर्ण - सदृश आभावाले हैं और बीज तथा फल रत्नके समान हैं । वहाँ चारों ओर दस योजनतक सुगन्ध फैली रहती है ॥ ३४-३६ ॥ हे राजन्! वसन्त ऋतु उस वनकी सदा सुरक्षा करता रहता है । पुष्पके भूषणसे विभूषित, पुष्प - छत्रसे सुशोभित तथा पुष्पके आसवका सेवन करके मदमत्त वह वसन्त पुष्पके सिंहासनपर विराजमान रहता है । मधुश्री तथा माधव श्री नामक मुसकानयुक्त मुखवाली उसकी दो प्रिय भार्याएँ हैं, जो सदा पुष्पोंके गुच्छोंका