देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 871–873
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 871–873
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८६२ श्रीमद्देवीभागवत जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया । तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४ परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि । इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः । तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः । कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७ जगदम्ब! मातः! मैंने तुम्हारे चरणोंकी सेवा कभी नहीं की, देवि! तुम्हें अधिक धन भी समर्पित नहीं किया; तथापि मुझ जैसे अधमपर जो तुम अनुपम स्नेह करती हो, इसका कारण यही है कि ॥ संसारमें कुपुत्र पैदा हो सकता है, किंतु कहीं भी कुमाता नहीं होती ॥ ४ ॥
गणेशजीको जन्म देनेवाली माता पार्वती! [ अन्य देवताओंकी आराधना करते समय ] मुझे नाना प्रकारकी सेवाओंमें व्यग्र रहना पड़ता था, इसलिये पचासी वर्षसे अधिक अवस्था बीत जानेपर मैंने देवताओंको छोड़ दिया है, अब उनकी सेवा-पूजा मुझसे नहीं हो पाती; अतएव उनसे कुछ भी सहायता मिलनेकी आशा नहीं है । इस समय यदि तुम्हारी कृपा नहीं होगी तो मैं अवलम्बरहित होकर ॥ किसकी शरणमें जाऊँगा ॥५ ॥
माता अपर्णा! तुम्हारे मन्त्रका एक अक्षर भी कानमें पड़ जाय तो उसका फल यह होता है कि मूर्ख चाण्डाल भी मधुपाकके समान मधुर वाणीका उच्चारण करनेवाला उत्तम वक्ता हो जाता है, दीन मनुष्य भी करोड़ों स्वर्ण - मुद्राओंसे सम्पन्न हो चिरकालतक निर्भय विहार करता रहता है । जब मन्त्रके एक अक्षरके श्रवणका ऐसा फल है तो जो लोग विधिपूर्वक जपमें लगे रहते हैं, उनके जपसे प्राप्त होनेवाला उत्तम फल कैसा होगा? इसको कौन मनुष्य जान सकता ॥ है ॥ ६ ॥
भवानी! जो अपने अंगोंमें चिताकी राख -भभूत लपेटे रहते हैं, जिनका विष ही भोजन है, जो दिगम्बरधारी ( नग्न रहनेवाले ) हैं, मस्तकपर जटा और कण्ठमें नागराज वासुकिको हारके रूपमें धारण करते हैं तथा जिनके हाथमें कपाल ( भिक्षापात्र ) शोभा पाता है, ऐसे भूतनाथ पशुपति भी जो एकमात्र ' जगदीश ' की पदवी धारण करते हैं, इसका क्या कारण है? यह महत्त्व उन्हें कैसे मिला; यह केवल तुम्हारे पाणिग्रहणकी परिपाटीका फल है; तुम्हारे साथ ॥ । विवाह होनेसे ही उनका महत्त्व बढ़ गया ॥७ ॥
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देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ८६३ न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः । अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८ ॥
नाराधितासि विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः । श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ ९ ॥
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि । नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ १० ॥
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि । अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ ११ ॥
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥ १२ ॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं मुखमें चन्द्रमाकी शोभा धारण करनेवाली माँ! मुझे मोक्षकी इच्छा नहीं है, संसारके वैभवकी भी अभिलाषा नहीं है; न विज्ञानकी अपेक्षा है, न सुखकी आकांक्षा; अतः तुमसे मेरी यही याचना है कि मेरा जन्म ' मृडानी, रुद्राणी, शिव, शिव, भवानी'-इन नामोंका जप करते हुए बीते ॥ ८ ॥
माँ श्यामा! नाना प्रकारकी पूजन - सामग्रियोंसे कभी विधिपूर्वक तुम्हारी आराधना मुझसे न हो सकी । सदा कठोर भावका चिन्तन करनेवाली मेरी वाणीने कौन - सा अपराध नहीं किया है! फिर भी तुम स्वयं ही प्रयत्न करके मुझ अनाथपर जो किंचित् कृपादृष्टि रखती हो, माँ! यह तुम्हारे ही योग्य है । तुम्हारी -जैसी दयामयी माता ही मेरे जैसे कुपुत्रको भी आश्रय दे सकती है ॥९ ॥
माता दुर्गे! करुणासिन्धु महेश्वरी! मैं विपत्तियोंमें फँसकर आज जो तुम्हारा स्मरण करता हूँ [ पहले कभी नहीं करता रहा ], इसे मेरी शठता न मान लेना; क्योंकि भूख - प्यास से पीड़ित बालक माताका ही स्मरण करते हैं ॥ १० ॥
जगदम्ब! मुझपर जो तुम्हारी पूर्ण कृपा बनी हुई है, इसमें आश्चर्यकी कौन - सी बात है, पुत्र अपराध - पर - अपराध क्यों न करता जाता हो, फिर भी माता उसकी उपेक्षा नहीं करती ॥ ११ ॥
महादेवि! मेरे समान कोई पातकी नहीं है और तुम्हारे समान दूसरी कोई पापहारिणी नहीं है; ऐसा । जानकर जो उचित जान पड़े, वह करो ॥ १२ ॥
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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श्रीदुर्गाजीकी आरती जगजननी जय! जय!! ( मा! जगजननी जय! जय!! ) भयहारिणि, भवतारिणि, भवभामिनि जय! जय ॥ टेक ॥
तू ही सत - चित - - I सुखमय शुद्ध ब्रह्मरूपा ।
सत्य सनातन सुन्दर पर- शिव सुर- भूपा ॥ जग ० ॥
आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी ।
अमल अनन्त अगोचर अज आनन्दराशी ॥ जग ० ॥
अविकारी, अघहारी, अकल, कलाधारी ।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर सँहारकारी ॥ जग ० ॥
तू विधिवधू, रमा, तू उमा, महामाया ।
मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी, जाया ॥ जग ० ॥
राम, कृष्ण तू, सीता, व्रजरानी राधा ।
तू वांछाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा ॥ जग ० ॥
दश विद्या, नव दुर्गा, नानाशस्त्रकरा ।
अष्टमातृका, योगिनि, नव नव रूप धरा ॥ जग ० ॥
तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू ।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू ॥ जग ० ॥
सुर - मुनि - मोहिनि सौम्या तू शोभाधारा । विवसन विकट- सरूपा तू ही स्नेह - सुधामयि, रत्नविभूषित तू तू ही, मूलाधारनिवासिनि, कालातीता काली, शक्ति शक्तिधर तू भेदप्रदर्शिनि वाणी हम अति दीन दुखी , प्रलयमयी धारा ॥ जग ० ॥
तू अति गरलमना ।
तू ही अस्थि - तना ॥ जग ० ॥
इह - पर- सिद्धिप्रदे ।
कमला तू वरदे ॥ जग ० ॥
ही नित्य अभेदमयी ।
विमले! वेदत्रयी ॥ जग ० ॥
मा! विपत - जाल घेरे ।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे ॥ जग ० ॥
निज स्वभाववश जननी! दयादृष्टि कीजै ।
करुणा कर करुणामयि! चरण - शरण दीजै ॥ जग ० ॥