देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 861–870

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 861–870

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८५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३

दीक्षाविधं विधानेन जग्राह नृपसत्तमः ।

तत आहूय धौम्यादीन्नवरात्रसमागमे ॥

अम्बायज्ञं चकाराशु वित्तशाठ्यविवर्जितः ।

ब्राह्मणैः पाठयामास पुराणं त्वेतदुत्तमम् ॥

श्रीदेव्यग्रेऽम्बिकाप्रीत्यै देवीभागवतं परम् ।

ब्राह्मणान्भोजयामासाप्यसंख्यातान्सुवासिनीः ॥

कुमारीर्वटुकादींश्च दीनानाथांस्तथैव च ।

द्रव्यप्रदानैस्तान्सर्वान् सन्तोष्य वसुधाधिपः ॥

समाप्य यज्ञं संस्थाने संस्थितो यावदेव हि ।

तावदेव हि चाकाशान्नारदः समवातरत् ॥

रणयन्महतीं वीणां ज्वलदग्निशिखोपमः ।

ससम्भ्रमः समुत्थाय दृष्ट्वा तं नारदं मुनिम् ॥

आसनाद्युपचारैश्च पूजयामास भूमिपः ।

कृत्वा तु कुशलप्रश्नं पप्रच्छागमकारणम् ॥

राजोवाच

कुत आगमनं साधो ब्रूहि किं करवाणि ते ।

सनाथोऽहं कृतार्थोऽहं त्वदागमनकारणात् ॥

इति राज्ञो वचः श्रुत्वा प्रोवाच मुनिसत्तमः ।

अद्याश्चर्यं मया दृष्टं देवलोके नृपोत्तम ॥

तन्निवेदयितुं प्राप्तस्त्वत्सकाशे सुविस्मितः ।

पिता ते दुर्गतिं प्राप्तो निजकर्मविपर्ययात् ॥

स एवायं दिव्यरूपवपुर्भूत्वाधुनैव हि ।

देवदेवैः स्तुतः सम्यगप्सरोभिः समन्ततः ॥

विमानवरमारुह्य मणिद्वीपं गतोऽभवत् ।

देवीभागवतस्यास्य श्रवणोत्थफलेन च ॥

अम्बामखफलेनापि पिता ते सुगतिं गतः ।

धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि जीवितं सफलं तव ॥

नरकादुद्धृतस्तातस्त्वया तु कुलभूषण ।

देवलोके स्फीतकीर्तिस्तवाद्य विपुलाभवत् ॥

तत्पश्चात् महाराजने नवरात्रके आनेपर धौम्य ६ आदि मुनियोंको बुलाकर धनकी कृपणता किये बिना शीघ्रतापूर्वक अम्बायज्ञ आरम्भ कर दिया । इसमें उन्होंने भगवती जगदम्बाकी प्रसन्नताके लिये उनके ७ समक्ष ब्राह्मणोंके द्वारा इस परम उत्तम देवीभागवत-महापुराणका पाठ कराया ॥ ५ – ७३ ॥ इस यज्ञमें उन्होंने असंख्य ब्राह्मणों, सुवासिनी ८ स्त्रियों, कुमारी कन्याओं, ब्रह्मचारियों, दोनों तथा अनाथको भोजन कराया । तत्पश्चात् धन - दानके द्वारा उन ९ | सभीको पूर्ण सन्तुष्ट करनेके बाद पृथ्वीपति जनमेजय यज्ञ समाप्त करके ज्यों ही अपने स्थानपर विराजमान हुए, उसी समय प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान १० | तेजवाले देवर्षि नारद अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए आकाशसे उतरे ॥ ८ – १०३ ॥ उन नारदमुनिको देखकर आश्चर्यचकित हो ११ महाराज जनमेजय अपने आसनसे उठ खड़े हुए और उन्होंने आसन आदि उपचारोंसे उनका पूजन किया । १२ तत्पश्चात् वे कुशल क्षेमसम्बन्धी प्रश्न करके उनके आनेका कारण पूछने लगे ॥ ११-१२ ॥ राजा बोले- हे साधो! आप कहाँसे आ रहे हैं? आप मुझे यह बताइये कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ? १३ मैं आपके आगमनसे सनाथ और कृतार्थ हो गया हूँ ॥ १३ ॥

राजाकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारदने कहा – हे नृपश्रेष्ठ! आज मैंने देवलोकमें एक १४ । आश्चर्यजनक घटना देखी है । उसीको बतानेके लिये मैं विस्मित अपने १५ दुर्गतिमें पड़े करके श्रेष्ठ १६ अप्सराओंसे मणिद्वीपको इस होकर आपके पास आया हूँ ॥ १४३ ॥

विपरीत कर्मोंके कारण आपके पिताजी हुए थे । वे ही अब दिव्य शरीर धारण विमानपर चढ़कर श्रेष्ठ देवताओं तथा चारों ओरसे भलीभाँति स्तुत होते हुए

चले गये हैं । १५ - १६३ ॥

देवीभागवतके श्रवणजनितफल तथा १७ देवीयज्ञके फलसे ही आपके पिताजी उत्तम गतिको प्राप्त हुए हैं । हे कुलभूषण! आप धन्य तथा कृतकृत्य हो गये हैं और आपका जीवन सफल हो गया । १८ आपने नरकसे अपने पिताजीका उद्धार कर दिया है और आज देवलोकमें आपकी महान् कीर्ति और १ ९ । अधिक विस्तृत हो गयी है॥१७–१९ ॥

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अ ० १३ ] सूत उवाच नारदोक्तं समाकर्ण्य प्रेमगद्गदितान्तरः । पपात पादाम्बुजयोर्व्यासस्याद्भुतकर्मणः

तवानुग्रहतो देव कृतार्थोऽहं महामुने ।

किं मया प्रतिकर्तव्यं नमस्कारादृते तव ॥

अनुग्राह्यः सदैवाहमेवमेव त्वया मुने ।

इति राज्ञो वचः श्रुत्वाप्याशीर्भिरभिनन्द्य च ॥

उवाच वचनं श्लक्ष्णं भगवान् बादरायणः ।

राजन्सर्वं परित्यज्य भज देवीपदाम्बुजम् ॥

देवीभागवतं चैव पठ नित्यं समाहितः ।

अम्बामखं सदा भक्त्या कुरु नित्यमतन्द्रितः ॥

अनायासेन तेन त्वं मोक्ष्यसे भवबन्धनात् ।

सन्त्यन्यानि पुराणानि हरिरुद्रमुखानि च ॥

देवीभागवतस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।

सारमेतत्पुराणानां वेदानां चैव सर्वशः ॥

मूलप्रकृतिरेवैषा यत्र तु प्रतिपाद्यते ।

समं तेन पुराणं स्यात्कथमन्यन्नृपोत्तम ॥

पाठे वेदसमं पुण्यं यस्य स्याज्जनमेजय ।

पठितव्यं प्रयत्नेन तदेव विबुधोत्तमैः ॥

इत्युक्त्वा नृपवर्यं तं जगाम मुनिराट् ततः ।

जग्मुश्चैव यथास्थानं धौम्यादिमुनयोऽमलाः ॥

देवीभागवतस्यैव प्रशंसां चक्रुरुत्तमाम् ।

राजा शशास धरणीं ततः सन्तुष्टमानसः ।

देवीभागवतं चैव पठञ्छृण्वन्निरन्तरम् ॥

द्वादश स्कन्ध ८५३ सूतजी बोले - [ हे मुनीश्वरो! ] नारदजीका यह वचन सुनकर महाराज जनमेजयका हृदय प्रेमसे ॥ २० गद्गद हो गया और वे अद्भुत कर्मोंवाले व्यासजीके चरण - कमलोंपर गिर पड़े । [ वे कहने लगे– ] हे देव! आपकी कृपासे ही मैं कृतार्थ हुआ हूँ । २१ हे महामुने! नमस्कारके अतिरिक्त मैं आपके लिये विशेष कर ही क्या सकता हूँ । हे मुने! आप मुझपर इसी प्रकार अनुग्रह सदा करते रहें । २० - २१३ ॥ २२ राजाका यह वचन सुनकर भगवान् बादरायण व्यासने अपने आशीर्वचनोंसे उनका अभिनन्दनकर मधुर वाणीमें कहा - हे राजन्! सब कुछ त्याग करके २३ आप भगवतीके चरणकमलोंकी उपासना कीजिये और दत्तचित्त होकर नित्य देवीभागवतपुराणका पाठ कीजिये । साथ ही नित्य आलस्यरहित होकर भक्तिपूर्वक २४ देवीयज्ञका अनुष्ठान कीजिये; उसके फलस्वरूप आप भव - बन्धनसे अनायास ही छूट जायँगे ॥ २२ - २४३ ॥ यद्यपि विष्णुपुराण तथा शिवपुराण आदि अनेक २५ पुराण हैं, किंतु वे इस देवीभागवतपुराणकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते । यह देवीभागवत समस्त वेदों तथा पुराणोंका सारस्वरूप है । २५-२६ ॥ २६ हे नृपश्रेष्ठ! जिस देवीभागवतमें साक्षात् मूल-प्रकृतिका ही प्रतिपादन किया गया है, उसके समान अन्य कोई पुराण भला कैसे हो सकता है? ॥ २७ ॥

२७ हे जनमेजय! जिस देवीभागवतपुराणका पाठ करनेसे वेद - पाठके समान पुण्य प्राप्त होता है, उसका पाठ श्रेष्ठ विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक करना २८ | चाहिये ॥ २८ ॥

उन नृपश्रेष्ठ जनमेजयसे ऐसा कहकर मुनिराज व्यास चले गये । उसके बाद विमलात्मा धौम्य आदि २ ९ मुनि भी अपने - अपने स्थानोंको चले गये । उन्होंने देवीभागवतकी ही श्रेष्ठ प्रशंसा की । तदनन्तर सन्तुष्ट मनवाले महाराज जनमेजय देवीभागवतपुराणका निरन्तर पाठ तथा श्रवण करते हुए पृथ्वीका शासन ३० | करने लगे ॥ २ ९ -३० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे जनमेजयेनाम्बामखकरण-देवीभागवतश्रवणपूर्वकं स्वपित्रुद्धारवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 863

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८५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ अथ चतुर्दशोऽध्यायः श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणकी महिमा सूत उवाच अर्धश्लोकात्मकं यत्तु देवीवक्त्राब्जनिर्गतम् । श्रीमद्भागवतं नाम वेदसिद्धान्तबोधकम् उपदिष्टं विष्णवे यद्वटपत्रनिवासिने शतकोटिप्रविस्तीर्णं तत्कृतं ब्रह्मणा पुरा तत्सारमेकतः कृत्वा व्यासेन शुकहेतवे अष्टादशसहस्त्रं तु द्वादशस्कन्धसंयुतम् देवीभागवतं नाम पुराणं ग्रथितं पुरा अद्यापि देवलोके तद् बहुविस्तीर्णमस्ति हि नानेन सदृशं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् पदे पदेऽश्वमेधस्य फलमाप्नोति मानवः पौराणिकं पूजयित्वा वस्त्राद्याभरणादिभिः व्यासबुद्ध्या तन्मुखात्तु श्रुत्वैतत्समुपोषितः ॥

लिखित्वा निजहस्तेन लेखकेनाथवा मुने ।

प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यां हेमसिंहसमन्वितम् ॥

दद्यात्पौराणिकायाथ दक्षिणां च पयस्विनीम् ।

सालङ्कृतां सवत्सां च कपिलां हेममालिनीम् ॥

भोजयेद् ब्राह्मणानन्तेऽप्यध्यायपरिसम्मितान् ।

सुवासिनीस्तावतीश्च कुमारीर्बटुकैः सह ॥

देवीबुद्ध्या पूजयेत्तान्वसनाभरणादिभिः ।

पायसान्नवरेणापि गन्धस्त्रक्कुसुमादिभिः ॥

पुराणदानेनैतेन भूदानस्य फलं लभेत् ।

इहलोके सुखी भूत्वाप्यन्ते देवीपुरं व्रजेत् ॥

* सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् ॥ ( कोई भी सनातन नहीं है । सूतजी बोले — पराम्बा देवीके मुखकमलसे वेद-सिद्धान्तका बोधक जो आधा श्लोक * निकला था और जिसका उपदेश स्वयं देवीने वट - पटपर शयन करनेवाले ॥ १ विष्णुको किया था, उसीको पूर्वकालमें ब्रह्माजीने सौ । करोड़ श्लोकोंके रूपमें विस्तृत कर दिया ॥ १-२ ॥ तत्पश्चात् व्यासजीने शुकदेवजीको पढ़ानेके ॥ २ लिये इसके सारभागको एकत्र करके अठारह हजार । श्लोकों तथा बारह स्कन्धोंसे युक्त श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराणकी रचना की । वह पुराण अब भी ॥ ३ देवलोकमें वैसे ही विस्तृतरूपसे विद्यमान है ॥ ३-४ ॥ । इस पुराणके समान पुण्यदायक, पवित्र तथा पापनाशक दूसरा कोई पुराण नहीं है । इसके एक-॥ ४ एक पदका पाठ करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है ॥ ५ ॥

। हे मुने! स्वयं अपने हाथसे देवीभागवतपुराण ॥ ५ लिखकर या किसी लेखकसे लिखवाकर पुराणका वाचन करनेवाले विद्वान्‌को इसे देकर वस्त्र तथा आभूषण । आदिसे उनकी पूजा करके उनके प्रति व्यासबुद्धि ६ रखकर नियमपूर्वक उनके मुखसे इस पुराणका श्रवण करना चाहिये । कथाकी समाप्तिके दिन भाद्रपदपूर्णिमा तिथिको स्वर्णसिंहासनपर स्थापित करके इस पुराणका ७ दान उस पौराणिक विद्वान्‌को करना चाहिये । पुनः दक्षिणाके रूपमें उन्हें विविध अलंकारों तथा सोनेके हारसे विभूषित और बछड़ेसे युक्त दूध देनेवाली ८ कपिला गौ प्रदान करनी चाहिये॥६–८ ॥ कथाके अन्तमें पुराणमें जितने अध्याय हैं; उतने ही ब्राह्मणों तथा उतनी ही सुवासिनियोंको, उतनी ही ९ कुमारियों और बालकोंके साथ भोजन कराना चाहिये । उन सबमें देवीकी भावना करके वस्त्र, आभूषण, चन्दन, माला, पुष्प आदिसे उनकी पूजा करे एवं उत्तम १० पायसान्न ( खीर ) - का भोजन कराये ॥ ९ -१० ॥ मनुष्य इस पुराणके दानसे पृथ्वीके दानका फल प्राप्त करता है और इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें ११ देवीलोकको प्राप्त होता है ॥११ ॥

श्रीमद्देवीभा ० १ । १५ । ५२ ) अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा

पृष्ठ 864

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अ ० १४ ]

नित्यं यः शृणुयाद्भक्त्या देवीभागवतं परम् ।

न तस्य दुर्लभं किञ्चित्कदाचित्क्वचिदस्ति हि ॥

अपुत्रो लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात् ।

विद्यार्थी प्राप्नुयाद्विद्यां कीर्तिमण्डितभूतलः ॥

वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवन्ध्या च याङ्गना । श्रवणादस्य तद्दोषान्निवर्तेत न संशयः

यद्गेहे पुस्तकं चैतत्पूजितं यदि तिष्ठति ।

तद्गेहं न त्यजेन्नित्यं रमा चैव सरस्वती ॥

नेक्षन्ते तत्र वेतालडाकिनीराक्षसादयः ।

ज्वरितं तु नरं स्पृष्ट्वा पठेदेतत्समाहितः ॥

मण्डलान्नाशमाप्नोति ज्वरो दाहसमन्वितः ।

शतावृत्त्यास्य पठनात्क्षयरोगो विनश्यति ॥

प्रतिसन्ध्यं पठेद्यस्तु सन्ध्यां कृत्वा समाहितः ।

एकैकमस्य चाध्यायं स नरो ज्ञानवान्भवेत् ॥

शकुनांश्चैव वीक्षेत कार्याकार्येषु चैव हि ।

तत्प्रकारः पुरस्तात्तु कथितोऽस्ति मया मुने ॥

नवरात्रे पठेन्नित्यं शारदीयेऽतिभक्तितः ।

तस्याम्बिका तु सन्तुष्टा ददातीच्छाधिकं फलम् ॥

वैष्णवैश्चैव शैवैश्च रमोमा प्रीयते सदा ।

सौरैश्च गाणपत्यैश्च स्वेष्टशक्तेश्च तुष्टये ॥

पठितव्यं प्रयत्नेन नवरात्रचतुष्टये ।

वैदिकैर्निजगायत्रीप्रीतये नित्यशो मुने ॥

पठितव्यं प्रयत्नेन विरोधो नात्र कस्यचित् ।

उपासना तु सर्वेषां शक्तियुक्तास्ति सर्वदा ॥

द्वादश स्कन्ध ८५५ जो इस श्रेष्ठ श्रीमद्देवीभागवतका नित्य भक्तिपूर्वक १२ श्रवण करता है, उसके लिये कुछ भी कहीं और कभी दुर्लभ नहीं है । इसके श्रवणसे पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्र, धन चाहनेवालेको धन और विद्याके अभिलाषीको १३ विद्याकी प्राप्ति हो जाती है, साथ ही सम्पूर्ण पृथ्वीलोकमें वह कीर्तिमान् हो जाता है ॥ १२-१३ ॥ जो स्त्री वन्ध्या, काकवन्ध्या अथवा मृतवन्ध्या हो; वह इस पुराणके श्रवणसे उस दोषसे मुक्त हो ॥ १४ जाती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १४ ॥

यह पुराण जिस घरमें विधिपूर्वक पूजित होकर स्थित रहता है, उस घरको लक्ष्मी तथा सरस्वती कभी १५ नहीं छोड़तीं और वेताल, डाकिनी तथा राक्षस आदि वहाँ झाँकतेतक नहीं । यदि ज्वरग्रस्त मनुष्यको स्पर्श करके एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका पाठ किया १६ | जाय तो दाहक ज्वर उसके मण्डलको छोड़कर भाग जाता है । इसकी एक सौ आवृत्तिके पाठसे क्षयरोग समाप्त हो जाता है॥१५–१७ ॥ १७ जो मनुष्य प्रत्येक सन्ध्याके अवसरपर दत्तचित्त होकर सन्ध्या - विधि सम्पन्न करके इस पुराण एक - एक अध्यायका पाठ करता है, वह ज्ञानवान् हो १८ | जाता है ॥ १८ ॥

कार्य - अकार्यके अवसरोंपर इस पुराणके द्वारा शकुनका भी विचार करना चाहिये । हे मुने! उसकी १ ९ विधिका वर्णन मेरे द्वारा पहले किया जा चुका है ॥ १ ९ ॥ शारदीय नवरात्रमें परम भक्तिसे इस पुराणका नित्य पाठ करना चाहिये । इससे जगदम्बा उस व्यक्तिपर प्रसन्न होकर उसकी अभिलाषासे भी २० अधिक फल प्रदान करती हैं ॥ २० ॥

वैष्णव, शैव, सौर तथा गाणपत्यजनोंको अपने-अपने इष्टदेवकी शक्तिकी सन्तुष्टिके लिये चैत्र, २१ आषाढ़, आश्विन और माघ –इन मासोंके चारों नवरात्रोंमें इस पुराणका प्रयत्नपूर्वक पाठ करना चाहिये; इससे रमा, उमा आदि शक्तियाँ उसपर सदा २२ प्रसन्न रहती हैं । हे मुने! इसी प्रकार वैदिकोंको भी अपनी गायत्रीकी प्रसन्नताके लिये इसका नित्य पाठ करना चाहिये । इस पुराण में कहीं किसीका विरोधवचन २३ । नहीं है । [ वैष्णव, सौर आदि ] सभी जनोंकी उपासना

पृष्ठ 865

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८५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४

तच्छक्तेरेव तोषार्थं पठितव्यं सदा द्विजैः ।

स्त्रीशूद्रो न पठेदेतत्कदापि च विमोहितः ॥

शृणुयाद् द्विजवक्त्रात्तु नित्यमेवेति च स्थितिः ।

किं पुनर्बहुनोक्तेन सारं वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥

वेदसारमिदं पुण्यं पुराणं द्विजसत्तमाः ।

वेदपाठसमं पाठे श्रवणे च तथैव हि ॥

सच्चिदानन्दरूपां तां गायत्रीप्रतिपादिताम् ।

नमामि ह्रींमयीं देवीं धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

इति सूतवचः श्रुत्वा नैमिषीयास्तपोधनाः ।

पूजयामासुरत्युच्चैः सूतं पौराणिकोत्तमम् ॥

प्रसन्नहृदयाः सर्वे देवीपादाम्बुजार्चकाः ।

निर्वृतिं परमां प्राप्ताः पुराणस्य प्रभावतः ॥

नमश्चक्रुः पुनः सूतं क्षमाप्य च मुहुर्मुहुः ।

संसारवारिधेस्तात प्लवोऽस्माकं त्वमेव हि ॥

इति स मुनिवराणामग्रतः श्रावयित्वा

सकलनिगमगुह्यं दौर्गमेतत्पुराणम् ।

नतमथ मुनिसङ्कं वर्धयित्वाशिषाम्बा-चरणकमलभृङ्गो निर्जगामाथ सूतः ॥

सदा शक्तियुक्त ही होती है, इसलिये शक्तिको सन्तुष्ट २४ करनेके लिये द्विजोंको इस पुराणका सदा पाठ करना चाहिये । स्त्रियों तथा शूद्रोंको चाहिये कि वे अज्ञानवश इसका कभी पाठ न करें, अपितु वे ब्राह्मणके मुखसे ही इसका नित्य श्रवण करें, यही २५ मर्यादा है । अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं आपको इसका वास्तविक सार बताऊँगा ॥ २१ - २५ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो! यह पुराण परम पवित्र तथा वेदोंका सारस्वरूप है । इसके पढ़ने तथा सुननेसे २६ वेदपाठके समान फल प्राप्त होता है ॥२६ ॥

गायत्री नामसे प्रतिपादित उन सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी ह्रींमयी भगवतीको मैं प्रणाम करता हूँ, २७ वे हमारी बुद्धिको प्रेरणा प्रदान करें-सच्चिदानन्दरूपां तां गायत्रीप्रतिपादिताम् । नमामि ह्रींमयीं देवीं धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ २७ ॥

पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीका यह वचन सुनकर २८ नैमिषारण्यवासी तपोधन मुनियोंने बड़े समारोहके साथ उनका सम्मान किया ॥ २८ ॥

भगवतीके चरणकमलोंके उपासक वे सभी मुनि प्रसन्न हृदयवाले हो गये । इस पुराणके प्रभावसे वे २ ९ परम शान्तिको प्राप्त हुए ॥ २ ९ ॥ मुनियोंने सूतजीको नमस्कार किया और बार-बार क्षमा - प्रार्थना करके कहा- हे तात! इस संसार -३० सागरसे पार करनेके लिये आप ही निश्चितरूपसे हमारे लिये नौकास्वरूप हैं ॥३० ॥

इस प्रकार सभी श्रेष्ठ मुनियोंके समक्ष सभी वेदोंके गुह्य विषयरूप इस दुर्गाचरित्रप्रतिपादक श्रीमद्देवीभागवत - पुराणको विनयसम्पन्न मुनिजनोंको सुनाकर तथा उनके आशीर्वादसे वृद्धिको प्राप्त होकर भगवतीके चरणकमलोंके भृंगस्वरूप सूतजी वहाँसे ३१ | चले गये ॥३१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण-श्रवणफलवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

22 ॥ द्वादशः स्कन्धः समाप्तः ॥ ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण सम्पूर्णम् ॥ [ सम्पूर्णोऽयं ग्रन्थः ]

पृष्ठ 866

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[ ८५७ ] ॥ श्रीदुर्गायन्त्रम् ॥ श्रीदुर्गायन्त्रम् नमः योगिनीभ्यो नमः पूर्व वज्रसंयुताय इन्द्राय नमः गणेशाय नमः भ्रान्त्यै नमः विष्णुमायाय नमः नमः ब्राह्म्यै नमः चेतनायें नमः = मात्रे बुधे माहेश्वर्ये नमः पुष्ट्ये • नमः पद्मजाय निद्रायै नमः सहिताय नमः नमः नमः तुष्टयै चामुण्डायै सरस्वती सुधाये धाय नमः नमः कुबेराय स्मृत्यै नमः नमः उत्तर शम्भवे ऐन्द्रये गदासंयुताय नमः नमः धृत्यै नमः भ्रामय भीमायें दुर्गा नमः सहिताय पार्वती । नमः छायायै श्रियासहिताय कौमार्यै नमः नमः शाकम्मयों नमः की १ ) दण्डसंयुताय दक्षिण ॐ यमाय नमः हरये वैष्णव्यै नमः नमः नमः: जात्ये नमः नमः नारसिंहयै नमः नमः वटुकाय सिंहाय लक्ष्म्यै लज्जाये कीन्र्यैनमः नमः नमः वारायै शान्तय नमः महिषासुराय क्षेत्रपालकाय नमः प्रहाय नमः नमः नमः वरुणाय पाशसंयुताय पश्चिम [ सन्दर्भ - श्रीमद्देवीभागवत स्कन्ध ९, अ ० ५० ]

पृष्ठ 867

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[ ८५८ ] ॥ श्रीगायत्रीयन्त्रम् ॥ ॐ प्रचोदयात् Jan या वरेण्यं तत्सवितुः र्गो ॐ तत धि भूः नही सत्यं ॐ ॐ भर्गो ॐ भुवः स्वः नः ॐ वि तपः: ४ देवस्य नःयो N स्य ॐ 2 [ श्रीमद्देवीभागवतके गायत्री - प्रकरणसे सम्बद्ध ]

पृष्ठ 868

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[ ८५ ९ ] नमः नमः शूलाय ईशानाय नमः श्री गायत्रीयन्त्रम् पराजितायै नमः वज्राय नमः इन्द्राय नमः नमः आदित्याय नमः केतवे ब्राह्म्यै नमः नमः राहवे सावित्र्यै नमः कान्त्यै नमः सबैसिद्धिप्रदायिकायै माहेश्वर्यै नमः नमः आदित्याय नमः लक्ष्म्यै विमलायै नमः संध्यायै तत्सवितु नमः नमः ब्रह्मणे दुर्गायैनमः प्रचोदयात्सर्वात्मने नमः नमः नमः पद्मारुपायैनमः / विष्णवे रवये शक्त्यै अग्नये नमः नमः सोमाय नमः शनैश्चराय नमः नमः भूः तमोपहारिण्यै नमः नमः नमः दुर्गायै गदायै सोमाय प्रभायै नमः व्यापिन्येनमः नमः चामुंडायै नमः पराशोभायै नमः सरस्वत्यै सदाशिवाय नः स्वः यो नमः धियो नमः प्रज्ञायै सावित्यै Abstr नमः नमः ईश्वराय धीमहि शुक्राय ईशान्यै नमः नमः वरेण्यं नमः विष्णवे नमः भुवः नमः भानवे सरस्वत्यै शिवाय नमः नमः नमः नमः भगोदेवस्य सूक्ष्मायै रुद्राय भास्कराय नमः नमः विद्यायै कौमार्यै दण्डाय प्रभाविन्यै यमाय नमः नमः नमःनमः भौमाय नमः नमः उषसे वैष्णव्यै नमः नमः पद्मालयायै नमः इन्द्राण्यै नमः विश्वलयायै नमः विश्वयोन्यै वाराह्यनमः सौम्याय नमः नमः गुरवे नमः वायवे नमः वरुणाय अङ्कुशायनमः नमः पाशाय नमः पावत्ये श्री विश्वामित्रकल्प अ. १२/१३ से निर्ऋतंय खङ्गाय नमः नमः ३५ के आधार पर [ श्रीमद्देवीभागवतके गायत्री प्रकरणसे सम्बद्ध ]

पृष्ठ 869

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८६० श्रीमद्देवीभागवत सप्तश्लोकी दुर्गा शिव उवाच

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।

कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥

देव्युवाच

शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम् ।

मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥

विनियोगः ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः ।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १ ॥

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो: स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ २ ॥

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे 1 सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥ ।

शिवजी बोले – हे देवि! तुम भक्तोंके लिये सुलभ हो और समस्त कर्मोंका विधान करनेवाली हो । कलियुगमें कामनाओंकी सिद्धि - हेतु यदि कोई उपाय हो तो उसे अपनी वाणीद्वारा सम्यक् - रूपसे व्यक्त करो । देवीने कहा- हे देव! आपका मेरे ऊपर बहुत स्नेह है । कलियुगमें समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला जो साधन है वह बतलाऊँगी, सुनिये! उसका नाम है ' अम्बास्तुति ' । विनियोग — ॐ इस दुर्गासप्तश्लोकी स्तोत्रमन्त्रके नारायण ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है, श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता हैं, श्रीदुर्गा प्रसन्नताके लिये सप्तश्लोकी दुर्गापाठमें इसका विनियोग किया जाता है । वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियोंके भी चित्तको बलपूर्वक खींचकर मोहमें डाल देती हैं ॥ १ ॥

माँ दुर्गे! आप स्मरण करनेपर सब प्राणियोंका भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषोंद्वारा चिन्तन करनेपर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं । दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करनेके लिये सदा ही दयार्द्र रहता हो ॥ २ ॥

नारायणि! आप सब प्रकारका मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हैं, आप ही कल्याणदायिनी शिवा हैं, आप सब पुरुषार्थोंको सिद्ध करनेवाली, शरणागत - वत्सला, तीन नेत्रोंवाली गौरी हैं; आपको नमस्कार है ॥ ३ ॥

शरणागतों, दीनों एवं पीड़ितोंकी रक्षामें संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवि! आपको नमस्कार है ॥४ ॥

सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि! सब भयोंसे हमारी रक्षा कीजिये आपको नमस्कार है ॥५ ॥

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देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ८६१ रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।

एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥

देवि! आप प्रसन्न होनेपर सब रोगोंको नष्ट कर देती हैं और कुपित होनेपर मनोवांछित सभी कामनाओंका नाश कर देती हैं । जो लोग आपकी शरणमें हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं; आपकी ६ ॥ शरणमें गये हुए मनुष्य दूसरोंको शरण देनेवाले हो जाते हैं ॥६ ॥

सर्वेश्वरि! आप इसी प्रकार तीनों लोकोंकी समस्त बाधाओंको शान्त करें और हमारे शत्रुओंका ७ ॥ नाश करती रहें ॥७ ॥

॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा । देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति माँ! मैं न मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र; अहो! मुझे स्तुतिका भी ज्ञान नहीं है । न आवाहनका पता है, न । ध्यानका । स्तोत्र और कथाकी भी जानकारी नहीं है । न तो तुम्हारी मुद्राएँ जानता हूँ और न मुझे व्याकुल होकर विलाप करना ही आता है; परंतु एक बात ॥ १ ॥

जानता हूँ, केवल तुम्हारा अनुसरण - तुम्हारे पीछे चलना । जो कि सब क्लेशोंको - समस्त दुःख-विपत्तियों को हर लेनेवाला है ॥ १ ॥

सबका उद्धार करनेवाली कल्याणमयी माता! मैं पूजाकी विधि नहीं जानता, मेरे पास धनका भी । अभाव है, मैं स्वभावसे भी आलसी हूँ तथा मुझसे ठीक - ठीक पूजाका सम्पादन हो भी नहीं सकता; इन सब कारणोंसे तुम्हारे चरणोंकी सेवामें जो त्रुटि हो ॥ २ ॥ गयी है, उसे क्षमा करना; क्योंकि कुपुत्रका होना

सम्भव है, किंतु कहीं भी कुमाता नहीं होती ॥ २ ॥

माँ! इस पृथ्वीपर तुम्हारे सीधे - सादे पुत्र तो बहुत- -से हैं, किंतु उन सबमें मैं ही अत्यन्त चपल तुम्हारा बालक हूँ; मेरे - जैसा चंचल कोई विरला । ही होगा । शिवे! मेरा जो यह त्याग हुआ है, यह तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है; क्योंकि संसारमें कुपुत्रका होना सम्भव है, किंतु कहीं भी ॥ ३ ॥ कुमाता नहीं होती ॥ ३ ॥