गर्ग संहिता — पृष्ठ 431–440
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440
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अध्याय ९ ] पूजोपचार तथा पूजन - प्रकारका वर्णन ४२५ अष्टगन्ध और दीपमें कपूर देना चाहिये । पीले रंगका यज्ञोपवीत, वस्त्रमें पीताम्बर, भूषणके स्थानपर सोना और गन्ध स्थानमें कुङ्कुम तथा चन्दन देने चाहिये । फूलोंमें तुलसीकी मञ्जरी, अक्षतोंमें चावल और नैवेद्यमें नाना प्रकारके पक्वान्न और षट्स भोजन - पदार्थ उत्तम माने गये हैं । जलमें केवल गङ्गाजल और यमुनाजल । राजन्! भोजनोपरान्त आचमनके जलमें जायफल और कङ्कोल मिला । ताम्बूल लौंग और इलायची मिला दे । दक्षिणाके इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीविज्ञानखण्डके वर्णन ' नामक आठवाँ स्थानपर सुवर्ण अर्पण करे । प्रदक्षिणाके प्रकरणमें घूमना और आरतीमें गौका घृत लेना योग्य है । महाराज! प्रार्थनामें भगवान् श्रीहरिकी प्रेमलक्षण-युक्त भक्ति करना और नमस्कारके स्थानपर अत्यन्त नम्र होकर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करना चाहिये । तदनन्तर पूजकको चाहिये कि वह पवित्र होकर द्वादशाक्षर मन्त्रसे शिखा बाँध ले और पूजाकी सभी सामग्रियाँ आगे रखकर भगवान्के सामने बैठ जाय ॥ १–२४ ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' पूजा - विधिका अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय पूजोपचार तथा पूजन - प्रकारका वर्णन श्रीव्यासजी बोले – महाराज! पूजन - सामग्री अर्पण करनेके सुन्दर मन्त्र वेदमें कहे गये हैं । मैं तुम्हारे लिये उनका वर्णन करता हूँ । एकाग्र मन होकर सुनो ॥१ ॥
( मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए पूजा करनी चाहिये । मन्त्र अर्थसहित निम्नलिखित हैं । ) आवाहन – गोलोकधामाधिपते रमापते गोविन्द दामोदर दीनवत्सल । राधापते माधव सात्वतां पते सिंहासनेऽस्मिन् मम सम्मुखो भव ॥ गोविन्द! आप गोलोक धामके स्वामी हैं । दीनोंपर दया करना आपका स्वभाव है । दामोदर! आप लक्ष्मी एवं राधिकाजी प्राणनाथ हैं । यादवोंके अधीश्वर हैं । माधव! इस सिंहासनपर मेरे सामने आप विराजमान होइये ॥ २ ॥
आसन - श्रीपद्मरागस्फुरदूर्ध्वपृष्ठं महार्हवैडूर्यखचित्पदाब्जम् 1 वैकुण्ठ वैकुण्ठपते गृहाण पीतं तडिद्घाटककुम्भखण्डम् ॥ वैकुण्ठपते! इस आसनके ऊपरकी पीठपर नीलम चमक रहा है । पायोंमें वैदूर्यमणि ( पुखराज ) जड़ी गयी है । यह बिजलीके समान चमकती हुई सुवर्णकी कलशियोंसे युक्त है । कृपया आप इसे ग्रहण कीजिये ॥ ३ ॥
पाद्य - परं स्थितं निर्मलरौक्मपात्रे समाहृतं बिन्दुसरोवराद्धि । योगेश देवेश जगन्निवास गृहाण पाद्यं प्रणमामि पादौ ॥ देवेश! स्वच्छ सुवर्णके पात्रमें बिन्दुसरोवरसे लाकर उत्तम जल रखा गया है । योगेश! आप जगत्के
अधिष्ठाता हैं । मैं आपके चरणोंको प्रणाम करता हूँ ।
आप इस पाद्यको स्वीकार करें ॥ ४ ॥
अर्घ्य - जलजचम्पकपुष्पसमन्वितं विमलमर्घ्यमनर्घदरस्थितम् प्रतिगृहाण रमारमण प्रभो दु यदुनाथ यदूत्तम ॥ रमा - रमण प्रभो! यदुपते! यदुनाथ! यदूत्तम! कमल तथा चम्पाके पुष्पोंसे समन्वित तथा शङ्खमें भरे हुए इस निर्मल उत्तम अर्घ्यको ग्रहण करें ॥ ५ ॥
स्नान - काश्मीरपाटीरविमिश्रितेन सुमल्लिकोशीरवता जलेन ।
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४२६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीविज्ञानखण्ड स्नानं कुरु त्वं यदुनाथ देव गोविन्द गोपालक तीर्थपाद ॥ गोविन्द! आप यादवोंके स्वामी तथा गौओंकी रक्षा करनेवाले हैं । आपके चरण तीर्थस्वरूप हैं । भगवन्! केसर, चन्दन, चमेली और खससे सुवासित यह जल है । आप इससे स्नान कीजिये ॥ ६ ॥
मधुपर्क – मध्याह्नचण्डार्कभवश्रमापहं सिताङ्गसम्पर्कमनोहरं परम् । गृहाण विष्णो मधुपर्कमेनं संदृश्य पीताम्बर सात्वतां पते ॥ यदुपते! आप पीताम्बर धारण करनेवाले हैं । आपके लिये मधुपर्क तैयार है । यह मध्याह्नके प्रचण्ड मार्तण्डके उत्तापजनित श्रमको दूर करनेवाला है । मिश्रीके मिल जानेसे यह अत्यन्त मनोहर हो गया है । भगवन्! आप इसकी ओर दृष्टि डालकर इसे स्वीकार करनेकी कृपा करें ॥७ ॥
वस्त्र - विभो सर्वतः प्रस्फुरत् प्रोज्ज्वलं च स्फुरद्रश्मिशून्यं परं दुर्लभं च । स्वतो निर्मितं पद्मकिञ्जल्कवर्णं गृहाणाम्बरं देव पीताम्बराख्यम् ॥ प्रभो! ' पीताम्बर ' नामक वस्त्र प्रस्तुत है । इसकी प्रभा अत्यन्त उज्ज्वल है, इसकी किरणें सब ओर छिटक रही हैं । परम दुर्लभ यह वस्त्र अपने - आप बना हुआ है । कमल केसर - जैसा इसका रंग है । कृपया आप इसे ग्रहण करें ॥ ८ ॥
यज्ञोपवीत - सुवर्णाभमापीतवर्णं सुमन्त्रैः परं प्रोक्षितं वेदविन्निर्मितं च । शुभं पञ्चकार्येषु नैमित्तिकेषु प्रभो यज्ञ यज्ञोपवीतं गृहाण ॥ भगवन्! सुवर्णके समान चमचमाता हुआ हलके पीले वर्णका यह यज्ञोपवीत है । उत्तम मन्त्रोंद्वारा भलीभाँति इसका प्रोक्षण हुआ है । वेदज्ञ ब्राह्मणोंने इसकी रचना की है । पाँच नैमित्तिक कर्मोंमें इसका उपयोग कल्याणदायक होता है । प्रभो! आप इसे ग्रहण कीजिये ॥ ९ ॥
आभूषण - कनकरत्नमयं मयनिर्मितं मदनरुक्कदनं सदनं रुचाम् । उषसि पूषसुवर्णविभूषणं सकललोकविभूषण गृह्यताम् ॥ अखिललोकविभूषण! सोने एवं रत्नोंसे बना हुआ यह सुवर्णमय भूषण उपस्थित है । यह मयके हाथकी कारीगरी है । कामदेवकी कान्तिको फीका करनेवाला यह प्रभाका भंडार है । भगवन्! प्रातः-कालीन सूर्यके समान चमचमाता यह भूषण आप स्वीकार कीजिये ॥ १० ॥
गन्ध - संध्येन्दुशोभं बहुमङ्गलं श्री काश्मीरपाठीरकपङ्कयुक्तम् स्वमण्डनं गन्धचयं गृहाण समस्तभूमण्डलभारहारिन् ॥ सायंकालके चन्द्रमाके समान शोभायमान, अनेक मङ्गलोंको देनेवाला, केसर एवं कपूरसे युक्त यह गन्ध-राशि आपका अलंकार है । सम्पूर्ण लोकोंके भारको दूर करनेवाले भगवन्! आप इसे ग्रहण कीजिये ॥ ११ ॥
अक्षत - ब्रह्मावर्ते ब्रह्मणा पूर्वमुप्तान् ब्राह्यैस्तोयैः सिञ्चितान् विष्णुना च । रुद्रेणाराद् रक्षितान् राक्षसेभ्यः साक्षाद् भूमन्नक्षतांस्त्वं गृहाण ॥ पहले ब्रह्माने ब्रह्मावर्त देशमें जिन्हें बोया था, भगवान् विष्णुने वेदमय जलसे जिनका सेचन किया तथा शंकरजीने समीप आकर राक्षसोंसे जिनकी रक्षा की, भगवन्! उन अक्षतोंको स्वयं आप ग्रहण कीजिये ॥ १२ ॥
पुष्प - मन्दारसंतानकपारिजात-कल्पद्रुम श्रीहरिचन्दनानाम् गृहाण पुष्पाणि हरे तुलस्या मिश्राणि साक्षान्नवमञ्जरीभिः ॥ भगवन्! मन्दार, संतानक, पारिजात, कल्पवृक्ष और हरिचन्दनके ये पुष्प उपस्थित हैं । नूतन मञ्जरियोंके साथ तुलसीपत्रोंका भी इनमें सम्मिश्रण हुआ है, आप इन्हें ग्रहण करें ॥ १३ ॥
धूप – लवङ्गपाटीरजचूर्णमिश्रं मनुष्यदेवासुरसौख्यदं च । सद्यःसुगन्धीकृतहर्म्यदेशं द्वारावतीभूप गृहाण धूपम् ॥
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अध्याय ९ ] पूजोपचार तथा द्वारकाधीश! जो लौंग एवं मलयागिरिके चूर्णसे मिश्रित है, देवता, दानव एवं मनुष्योंको आनन्दित करनेकी जिसमें शक्ति है तथा जो तत्काल महलोंको सुगन्धित बनानेवाला है, ऐसे धूपको आप ग्रहण कीजिये ॥ १४ ॥
दीप - तमोहारिणं ज्ञानमूर्ति मनोज्ञं लसद्वर्तिकर्पूरपूरं गवाज्यम् । जगन्नाथ देव प्रभो विश्वदीप स्फुरज्ज्योतिषं दीपमुख्यं गृहाण ॥ प्रभो! आप जगत्के स्वामी एवं विश्वको प्रकाशित करनेवाले हैं । अन्धकारका नाश करनेवाला ज्ञानस्वरूप यह प्रधान दीप आपके लिये तैयार है, जो बत्तियोंसे सजाया हुआ अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है । यह गायके घीसे पूर्ण है । साथ ही इसमें कपूर भी छोड़ा गया है । भगवन्! इस प्रकार चमचमाती हुई लौवाले इस दीपको स्वीकार करें ॥ १५ ॥
नैवेद्य – रसैः शरैर्वेदविधिव्यवस्थितं रसै रसाढ्यं च यशोमतीकृतम् । गृहाण नैवेद्यमिदं सुरोचकं गव्यामृतं सुन्दर नन्दनन्दन ॥ नन्दनन्दन! षड्ससे युक्त एवं वेदोक्त विधिसे तैयार किया हुआ नैवेद्य आपके लिये उपस्थित है । यह रसोंसे भरपूर और यशोदाजीने इसे बनाया है । स्वादिष्ट होनेके साथ गोघृतके प्रयोगसे यह अमृतमय बन गया है । अतः इसे आप ग्रहण कीजिये ॥ १६ ॥
जल - गङ्गोत्तरीवेगबलात् समुद्धृतं सुवर्णपात्रेण हिमांशुशीतलम् । सुनिर्मलाम्भो ह्यमृतोपमं जलं गृहाण राधावर भक्तवत्सल ॥ भक्तवत्सल! गङ्गोत्तरीकी धारासे यत्नपूर्वक प्राप्त किया हुआ यह अमृतमय जल है, जो हिमालयके टुकड़ेकी भाँति शीतल है । यह सुवर्णके पात्रमें रखा गया है और इससे अति निर्मल आभा निकल रही है । राधावर! आप इसे स्वीकार कीजिये ॥१७ ॥
आचमन - राधापते श्रीविरजापते प्रभो श्रियः पते सर्वपते च भूपते । पूजन - प्रकारका वर्णन ४२७ कङ्कोलजातीफलपुष्पवासितं परं गृहाणाचमनं दयानिधे ॥ राधापते! आप भगवती विरजाके स्वामी हैं । सर्वेश्वर! आप लक्ष्मीजीके प्राणनाथ एवं भूमण्डलके अधीश्वर हैं । दयानिधे! कङ्कोल, जायफल और पुष्पोंसे सुवासित यह उत्तम आचमनीय प्रभो! इसे ग्रहण कीजिये ॥ १८ ॥
ताम्बूल - जातीफलैलासुलवङ्गनाग-वल्लीदलैः पूगफलैश्च मुक्तासुधाखादिरसारयुक्तं गृहाण ताम्बूलमिदं रमेश! जायफल, इलायची, लौंग, सुपारी, मोतीकी भस्म और खैरके सारसे ताम्बूल स्वीकार कीजिये ॥१ ९ ॥ दक्षिणा - नाकपालवसुपालमौलिभि-र्वन्दिताङ्घ्रियुगल प्रभो दक्षिणां परिगृहाण माधव प्रस्तुत है ।
संयुतम् ।
रमेश ॥
नागकेसर, युक्त यह
हरे ।
लोकदक्षवर दक्षिणापते ॥
प्रभो! नाकपाल और वसुपालोंके मुकुटोंसे आपके युगल चरण - कमलकी पूजा हुई है । आप दक्षिणाके पति हैं । प्राणियोंको धन प्रदान करनेमें आप बड़े कुशल हैं । भगवन्! आप यह दक्षिणा ग्रहण करें ॥ २० ॥
नीराजन - प्रस्फुरत्परमदीप्तिमङ्गलं गोघृताक्तनवपञ्चवर्तिकम् 1 आर्तिकं परिगृहाण चार्तिहन् पुण्यकीर्तिविशदीकृतावने 11 आर्तिहन्! श्रेष्ठ प्रकाशसे युक्त दीप्तिमयी यह मङ्गलमय आरती है । गायके घीसे भीगी हुई चौदह बत्तियाँ इसमें लगी हैं । अपनी पवित्र कीर्तिका विस्तार करनेवाले भगवन्! आप इसे ग्रहण कीजिये ॥२१ ॥
नमस्कार – नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्त्रमूर्तये सहस्त्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे 1 सहस्त्रनाम्ने पुरुषाय शाश्व सहस्त्रकोटीयुगधारिणे नमः ॥ जो अनन्त हैं, जिनके हजारों विग्रह हैं, जिनके चरण, जंघा, बाहु, ऊरु, मस्तक एवं नेत्रोंकी संख्या भी
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४२८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीविज्ञानखण्ड हजारोंकी है, जो नित्य हैं, जिनके हजारों नाम हैं तथा जो करोड़ों युगोंको धारण करनेवाले हैं, उन परम पुरुष भगवान्के लिये मेरा नमस्कार है ॥ २२ ॥
प्रदक्षिणा – समस्ततीर्थयज्ञदानपूर्तकादिजं फलम् ।
लभेत् परस्य शाश्वतं करोति यः प्रदक्षिणाम् ॥
जो मनुष्य परम प्रभु भगवान् की प्रदक्षिणा करता है, उसके लिये सम्पूर्ण तीर्थ, यज्ञ, दान तथा पूर्त ( कुँआ, बावली, पोखरा आदि खुदवाने, बगीचा लगवाने आदिसे उत्पन्न हुआ ) फल सुलभ हो जाता है ॥ २३ ॥
प्रार्थना - हरे मत्समः पातकी नास्ति भूमौ तथा त्वत्समो नास्ति पापापहारी । इति त्वं च मत्वा जगन्नाथ देव यथेच्छा भवेत्ते तथा मां कुरु त्वम् ॥ भगवन्! जगत्में मेरे समान कोई पापी नहीं है और आपके समान कोई पापका हरण करनेवाला भी नहीं है । प्रभो! यह समझकर, हे जगन्नाथ! फिर आपको जो उचित जान पड़े, वैसा ही मेरे साथ कीजिये ॥ २४ ॥
स्तुति - संज्ञानमात्रं सदसत्परं मह-च्छश्वत्प्रशान्तं विभवं समं महत् । त्वां ब्रह्म वन्दे हि सुदुर्गमं परं सदा स्वधाम्ना परिभूतकैतवम् ॥ जो चेतनास्वरूप हैं, सत् एवं असत्से परे हैं, जो नित्य हैं, जिनका विराट्रूप है, जो शान्तमूर्ति हैं, ऐश्वर्यस्वरूप हैं, सर्वत्र सम हैं, जिन्हें पाना अत्यन्त कठिन है तथा जिन्होंने अपने तेजसे मायाको सदा तिरस्कृत कर रखा है, उन आप परम ब्रह्मकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ २५ ॥
महामते! इस प्रकार इन मन्त्रोंद्वारा देवेश्वर भगवान्की पूजा करे । फिर श्रीविष्णुको प्रणाम करके यत्नपूर्वक उनके सर्वाङ्गका पूजन करना चाहिये । फिर —
ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने ।
विशुद्धसत्वधीस्थाय महाहंसाय धीमहि ॥
( २७ ) — इस मन्त्रका उच्चारण करके प्राणायाम करे । तदनन्तर भगवान् विष्णु, मधुसूदन, वामन, त्रिविक्रम, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर, संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, अधोक्षज और भगवान् पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके लिये मेरा नमस्कार है । ( यों नमस्कार करना चाहिये । ) इसी प्रकार पैर, गुल्फ, जानु, ऊरु, कटि, उदर, पीठ, भुजा, कंधे, कान, नाक, अधर, नेत्र और भगवान्के सिरमें मैं अलग - अलग पूजा करता हूँ-यों कहकर सर्वाङ्ग - पूजा करनी चाहिये । फिर सखी, सखा, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, असि, धनुष, बाण, हल, मुसल, कौस्तुभमणि, वनमाला, श्रीवत्स, पीताम्बर, नीलाम्बर, वंशी, बेंत आदि तथा तालध्वज एवं गरुडध्वजसे युक्त रथ सुमति सारथि, गरुड, कुमुद, नन्द, महाबल, कुमुदाक्ष आदि एवं विष्वक्सेन दुर्गा, गणेश, दिक्पाल, वरुण, नवग्रह मातृकाओंका आवाहन करे । इनके ॐ कार लगाकर चतुर्थ्यन्तका प्रयोग शब्द जोड़ दे । तत्पश्चात् मन्त्रोंद्वारा पूजन करे । , दारुक और सुनन्द, चण्ड, , शिव, ब्रह्मा, और षोडश-नामके साथ करके ' नमः ' इन सबका
ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥
- इस मन्त्रसे सौ बार आहुति देनी चाहिये । फिर भगवान्की प्रदक्षिणा करके महाभोग निवेदित करे । तत्पश्चात् पृथ्वीपर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करके यह मन्त्र पढ़े - ' ध्येयं सदा ' इत्यादि । ( इसका भाव यह है - ) जो निरन्तर ध्यान करने योग्य हैं, जिनके प्रभावसे अपमानित नहीं होना पड़ता, जो मनोरथको पूर्ण करनेवाले हैं, जो तीर्थोंके आधार हैं, शिव एवं ब्रह्माजीने जिनका स्तवन किया है, जो शरण देनेमें कुशल हैं, भृत्योंका दुःख दूर करना जिनका स्वभाव है, जो प्रणतजनोंका पालन करनेवाले तथा संसाररूपी समुद्रके लिये जहाज हैं, भगवान् पुरुषोत्तम! आपके उन चरण - कमलोंको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २६ – ३० ॥ राजन्! इस प्रकार भक्त भगवान्को प्रणाम करके भगवद्भक्तोंके साथ विधिवत् पुनः आरती करे । उस समय विवेकी पुरुषको चाहिये कि घड़ी, घण्टा, वीणा, बाँसुरी, करताल और मृदङ्ग आदि बाजोंके साथ भगवान्का कीर्तन करे । उस समय भगवद्भक्तजन
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अध्याय १० ] परमात्माका स्वरूप - निरूपण ४२ ९ प्रेममें विह्वल हुए भगवान्के सामने नाचते हैं, उनके जय - जयकारकी ध्वनि प्रकट करते रहते हैं । और वे भगवान्की सुन्दर लीला - कथाका गान करने लगते हैं । तदनन्तर प्रभुको पुनः नमस्कार करके सूर्यके समान उज्ज्वल मन्दिरमें महात्मा श्रीकृष्णचन्द्रको भलीभाँति शयन कराये ॥ ३१–३४ ॥ राजन्! इस प्रकार जो दत्तचित होकर भगवान् श्रीकृष्णकी सेवा करता है, उसे स्वर्गके रहनेवाले देवतालोग प्रणाम किया करते हैं । महाराज! वह श्रीहरिका भक्त भी मृत्युके अवसरपर स्वर्गमें पैर रखकर भगवान्के परमधाम गोलोकको, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, चला जाता है । यह भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी सेवाका विधान है । मैंने इसका वर्णन कर दिया । यह मनुष्योंको चारों पदार्थ देनेवाला है । अब तुम फिर क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३५-३७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीविज्ञानखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' पूजोपचार तथा पूजन - प्रकारका वर्णन ' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय परमात्माका स्वरूप - निरूपण राजा उग्रसेनने कहा- आप भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप हैं । आपने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की । आपके श्रीमुखसे साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा -पद्धति विस्तारपूर्वक मैंने सुन ली । इससे मैं सफल-जीवन हो गया । अहो! प्राणियोंमें बड़ी मूर्खता भरी हुई है । वे लोभ, मोह और मदके कारण मतवाले हो गये हैं । इसीसे उन्हें विराग उत्पन्न नहीं होता और न कभी वे भगवान्का भजन ही करते हैं । भगवन्! जगत् की यह मोहिका शक्ति बड़ी अद्भुत है । प्रभो! यह मोह कैसे उत्पन्न हुआ और किस प्रकार इसकी निवृत्ति होगी, यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥१-३ ॥ श्रीव्यासजी बोले- जिस प्रकार जलमें कई चन्द्रमा दिखायी पड़ते हैं, जलके चञ्चल वेगसे वे दृष्टिगोचर होते हैं, किंतु वास्तवमें हैं कुछ नहीं, बिलकुल प्रतिबिम्ब मात्र हैं, ठीक वैसे ही परम प्रभुकी प्रतिबिम्बरूपी यह माया फैली हुई है । उसीके प्रभावसे ' मेरा और मैं ' का भाव उत्पन्न हो जानेपर संसार कायम हो जाता है । माया, काल, अन्तःकरण और देहसे गुणोंकी उत्पत्ति होती है । मनुष्य इनके द्वारा विपरीत कर्म करता हुआ बन्धनमें पड़ जाता है । इन्द्रियोंका ही यह प्रभाव है कि दर्पणमें बालक, बालूमें जल और रस्सीमें साँपका भान होने लगता है । राजन्! यह जगत् मोहमय है । इसमें रजोगुण और तमोगुण कूट-कूटकर भरे हैं । कभी - कभी सत्त्वगुणका भी प्रादुर्भाव होता है । यह मनका विलास है, विकारमात्र है और भ्रमरूप है । अलातचक्रके समान यह शीघ्रतापूर्वक परिवर्तित होता रहता है— इस प्रकार जानो । ' मैंने यह कर दिया, यह करता हूँ और यह करूँगा; यह मेरा है, यह तेरा है; मैं सुखी हूँ, मैं दुःखमें पड़ गया; लोग मुझसे बिना कारण प्रेम करनेवाले हैं ' - इस प्रकार मनुष्य कहता रहता है । मेरा तो यह मत है कि मनुष्य अहंकारके कारण सुध - बुध खो बैठा है॥४-७ ॥ राजा उग्रसेनने पूछा- ब्रह्मन्! कृपापूर्वक मुझ-से परमात्माके लक्षणोंका वर्णन कीजिये । साथ ही यह भी बताइये कि विद्वानोंने पूजा - पद्धतिमें भगवान् श्रीकृष्णके लक्षण कितने प्रकारके बतलाये हैं? ॥ ८ ॥
श्रीव्यासजी बोले- सनातन प्रभु जन्म और मरणसे रहित हैं । शोक और मोह उनके पास भी नहीं फटकते । युवावस्था तथा बुढ़ापा आदिका कोई भेद उनमें नहीं है । अहंकार - मद, दुःख - सुख, भय, रोग, क्षुधा, पिपासा, कामना, रति और मानसिक व्याधि— इनके वे अविषय हैं । मुनीश्वरोंने जिस आत्माको पहचाना है, वह निरीह है, बिना देहका है, सर्वत्र उसकी गति है, वह अहंकारशून्य है, शुद्धबल है,
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४३० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीविज्ञानखण्ड उसमें सभी गुण रहते हैं, वह स्वतः सबसे परे है, निष्कल एवं स्वयं मङ्गलरूप है और ज्ञानका साकार विग्रह है । वह आत्मा इस जगत्के सो जानेपर भी जागता रहता है । यह देहधारी मनुष्य उसे नहीं जानता किंतु वह सबको जानता रहता है । वही आद्यपुरुष है । वह सबको देखता है; किंतु यह प्राणी उसका साक्षात्कार नहीं कर पाता । उस स्वच्छ एवं मलसे रहित आत्माकी मैं उपासना करता हूँ॥९ –११ ॥ जिस प्रकार घटसे आकाश, काष्ठसे अग्नि एवं धूलसे पवन व्याप्त नहीं होता तथा रंगोंसे स्वच्छ स्फटिकमणिमें किसी प्रकारकी विरूपता नहीं आती, ठीक वैसे ही यह सनातन पुरुष गुणोंके रहते हुए भी उनसे लिपायमान नहीं होता । वह ' सत् ' शब्दसे वाच्य परमात्मा लक्षणा, व्यञ्जना, वाक्चातुरी अर्थों, पदस्फोटपरायण शब्दों तथा सर्वोत्तम गुणियोंके द्वारा भी ज्ञानका विषय नहीं होता; फिर लौकिक प्राणी तो उसे जान ही कैसे सकता है? भूमण्डलपर उसे कितने लोग ' कर्ता ', कितने ' कर्म ', कितने ' काल ', कितने ' परम सुन्दर ' तथा कितने ' विचार ' कहते हैं । परंतु वेदान्तज्ञानी तो उसे ' ब्रह्म ' ही कहते हैं । उस परब्रह्मको कालसे उत्पन्न होनेवाले गुण स्पर्श नहीं करते । माया, इन्द्रिय, चित्त, मन, बुद्धि और महत्तत्त्व भी उसका ग्रहण नहीं कर सकते, वेद वर्णन नहीं कर पाता तथा अग्निमें चिनगारीकी भाँति उसमें सभी प्राणी विलीन हो जाते हैं । वही परमात्मा सर्वोपरि विराजमान है । जिन्हें संत - जन हिरण्यगर्भ, परमात्मतत्त्व और भगवान् वासुदेव कहते हैं, उन्हीं श्रेष्ठतम देवके स्वरूपका विचार करके मोह छोड़कर आसक्तिरहित होकर विचरे ॥ १२ – १६ ॥ जिस प्रकार एक ही चन्द्रमा अनेक जलपात्रोंमें अलग - अलग दीखता है तथा एक ही अग्नि अनन्त काष्ठोंमें वर्तमान है, उसी प्रकार एक ही परम प्रभु भगवान् अपने द्वारा बनाये हुए विभिन्न जीवोंके भीतर एवं बाहर विराज रहे हैं । जिस प्रकार सूर्योदय हो जानेपर रात्रिसम्बन्धी अन्धकार नष्ट हो जाता है और घरकी वस्तुएँ मनुष्योंके दृष्टिगोचर होने लगती हैं, ठीक वैसे ही ज्ञानका प्रादुर्भाव होते ही अज्ञानरूपी अन्धकार भाग जाता है । फिर तो शरीरमें ही मनुष्यको ब्रह्मकी उपलब्धि हो जाती है । जैसे इन्द्रियोंकी प्रवृत्तियाँ अलग-अलग हैं, उनके भेदसे गुणोंके एक ही विषयमें नाना अर्थकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार अनन्त परम प्रभु भगवान्का तेजोमय स्वरूप एक ही है, जब कि मुनियोंके शास्त्र अनेक हैं, जिनके कारण उसका भेद-पूर्वक वर्णन किया गया है । जो पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र साक्षात् श्रीहरि हैं, अपने भक्तोंपर कृपा करना जिनका स्वभाव बन गया हैं, जो कैवल्यनाथ हैं तथा जिन्होंने राजा नृगका उद्धार किया है, उन स्वयं पूर्णब्रह्म परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ॥१७–२० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- इस प्रकार कहकर भगवान् वेदव्यासजीने राजा उग्रसेनसे जानेके लिये स्वीकृति ली । तत्पश्चात् सम्पूर्ण यादवोंके देखते - देखते वे वहीं अन्तर्धान हो गये । मैंने भगवान् श्रीहरिके प्रति भक्ति बढ़ानेवाला यह ' विज्ञानखण्ड ' तुम्हें कह सुनाया । इसका विस्तृत वर्णन किया गया है । इसे श्रोतागणोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला कहा गया है । गर्गाचार्यने इसका वर्णन किया है । अतएव गर्गसंहिता नामसे इस ग्रन्थकी प्रसिद्धि हुई है । यह संहिता सम्पूर्ण दोषोंको हरनेवाली, परम पवित्र तथा चारों प्रकारके मनोरथोंको देनेवाली है । ( अबतक ) गोलोक, वृन्दावन, गिरिराज, माधुर्य, मथुरा, द्वारका, विश्वजित्, बलभद्र तथा विज्ञान - इन नौ खण्डोंमें इसका वर्णन हुआ है । महाराज! जिस प्रकार नौ उत्तम रसोंसे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका श्रीविग्रह विभूषित है तथा भारत आदि नौ वर्षोंसे पृथ्वी अत्यन्त सुशोभित है, ठीक वैसे ही इन नौ खण्डोंद्वारा मुनिप्रणीत यह ' गर्गसंहिता ' निरन्तर शोभा पा रही है । जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी अँगुलियोंमें तपाये हुए सुवर्णकी मुद्रिका नौ रत्नोंसे अलंकृत है, वैसे ही चतुर्वर्गफलको देनेवालीके रूपमें यह गर्गसंहिता सर्ग और विसर्ग आदि नौ अङ्गोंसे सुशोभित है । महाराज! जो पुरुष भक्तिपूर्वक निरन्तर मुनिप्रणीत गर्गसंहिताका श्रवण करते हैं, उन्हें संसारमें प्रचुर सुख मिलता है । और अन्तमें वे गोलोकधामको चले जाते हैं । यदि वन्ध्या स्त्री भी अनेक पुत्रोंकी उत्कट लालसासे युक्त हो
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अध्याय १० ] परमात्माका स्वरूप - निरूपण ४३१ पीताम्बरधर भगवान् श्रीकृष्णकी वन्दना करके इस संहिताका श्रवण करे तो वह शीघ्र ही अपने घरके आँगनमें बहुत - से बालकोंको घुमाती हुई निरन्तर उनके साथ - साथ घूमने लगती है । इस कथाको सुनकर रोगी मनुष्य रोगोंसे, भयभीत पुरुष भयसे तथा बन्धनप्राप्त पुरुष बन्धनसे मुक्त हो जाता है । निर्धनको विपुल सम्पत्ति मिल जाती है और मूर्ख तुरंत ही पण्डित हो सकता है । जो धनाढ्य राजा कार्तिकके महीनेमें मुनिप्रणीत ' गर्गसंहिता ' का श्रवण करता है, निस्संदेह वह चक्रवर्ती राजा हो जायगा और बड़े - बड़े राजालोग उसकी चरणपादुकाको उठाकर रखेंगे । वह मनकी चालके समान तेज चलनेवाले सिन्धुदेशवासी घोड़ों और विन्ध्यगिरिपर उत्पन्न होनेवाले विशाल हाथियोंसे सम्पन्न होगा । वैतालिक आदि उसका यशोगान करेंगे और वारवधूजन उसकी सेवा करेंगी । जिसके सोनेके सींग हों, ताँबेकी पीठ हो, चाँदीके खुर हों और जिसे आभूषणोंसे सजाया गया हो - जो प्रत्येक खण्डको सुननेके बाद ऐसी दो गौओंका दान करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं । जनकजी! वही यदि निष्कामभावसे समूची ' गर्गसंहिता ' का श्रवण करता है तो भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण उसके हृदय -कमलपर सदा निवास करने लगते हैं ॥ २१ - ३३ ॥ श्रीगर्गजी बोले- ब्रह्मन्! इस प्रकार कहकर दिव्यदर्शी भगवान् नारद मुनि राजा बहुलाश्वसे अनुमति लेकर सबके देखते - देखते आकाशमें चले गये । तब महाराज बहुलाश्वने भगवान् श्रीहरिकी इस संहिताको सुनकर श्रीकृष्णचन्द्रमें मन लगाये हुए अपनेको भलीभाँति कृतकृत्य समझ लिया । ब्रह्मन्! तुम्हारे प्रश्न करनेपर मैंने यह संहिता कही है । किन्हींके द्वारा सुनने अथवा पाठ करानेसे भी यह करोड़ यज्ञोंका फल देनेवाली होती है ॥ ३४-३६ ॥ श्रीशौनकजीने कहा – मुनिवर! आपका सङ्ग मिल जानेपर मैं धन्य एवं कृतार्थ हो गया । साथ ही भगवान् श्रीकृष्णमें प्रेम बढ़ानेवाली यह उत्तम भक्ति भी मुझे प्राप्त हो गयी । जो मुनियोंके विशाल हृदयरूपी मानसरोवरमें विचरनेवाले राजहंस हैं, सम्पूर्ण आनन्दोंसे पूर्ण मधुर नाद करनेवाली जिनकी बाँसुरी है, जिनकी कला संसारमें फैली हुई है, जिन्होंने शूरसेनके वंशमें अवतार धारण किया है तथा संत पुरुषोंने जिनकी प्रशंसा गायी है, वे अपने बाहुबलसे कंसका वध करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारी रक्षा करें । इस प्रकार मुनिवर गर्गाचार्यने सम्पूर्ण मुनियोंको आशीर्वाद दिया । साथ ही उनसे आज्ञा माँगी और प्रसन्नमन हो, जानेके लिये तैयार हो गये । फिर सर्ग - विसर्ग आदि नौ अङ्गोंसे युक्त ' गर्ग-संहिता ' का, जो स्वर्ग प्रदान करनेवाली तथा चारों पदार्थोंको देनेमें कुशल है, प्रतिपादन करके गर्गजी गर्गाचलपर चले गये । मैं भगवान् श्रीराधापतिके उन युगल चरण - कमलोंको अपने हृदयमें स्थापित करता हूँ, जो शरद् ऋतुके विकसित कमलोंकी शोभा धारण करनेके कारण उनके अत्यन्त द्वेषपात्र हो रहे हैं, मुनिरूपी भ्रमर जिनका निरन्तर सेवन करते हैं, जो वज्र और कमलके चिह्नोंसे आवृत हैं, जिनपर सोनेके नूपुर चमक रहे हैं, जिन्होंने भक्तोंके तापका सदा ही निवारण किया है तथा जिनकी दिव्य ज्योति छिटक रही है ॥ ३७–४० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीविज्ञानखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' परमात्माका स्वरूप-निरूपण नामक ' दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
॥ श्रीमद्गर्गसंहिता, विज्ञानखण्ड सम्पूर्ण ॥ [ श्रीगर्ग संहिताके नौ खण्ड पूरे हो गये । ' अश्वमेध ' का प्रसङ्ग शेष रह गया, उसे सुनानेके लिये महर्षि गर्गाचार्यजी पुनः कथाका आरम्भ करेंगे और अश्वमेधखण्ड सुनायेंगे । तब गर्गसंहिता पूर्ण होगी । ]
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4-पारिजातहरण
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श्रीहरिः ॐ दामोदर हृषीकेश वासुदेव नमोऽस्तु ते श्रीगर्ग संहिता ( अश्वमेधखण्ड ) पहला अध्याय अश्वमेध कथाका उपक्रम; गर्ग - वज्रनाभ - संवाद
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
नमः श्रीकृष्णचन्द्राय नमः संकर्षणाय च ।
नमः प्रद्युम्नदेवायानिरुद्धाय नमो नमः ॥२ ॥
सर्वव्यापी भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर, उनकी लीलाकथाको भाषामें अभिव्यक्त करनेवाली वाग्देवता सरस्वती तथा भगवदीय लीलाओंका विस्तारसे वर्णन करनेवाले मुनिवर वेदव्यासको प्रणाम करके जय ( इतिहास - पुराण आदि ) का उच्चारण करे । भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार, संकर्षणको भी नमस्कार, प्रद्युम्नदेवको नमस्कार तथा अनिरुद्धको भी नमस्कार है॥१-२ ॥ श्रीगजी कहते हैं - एक समयकी बात है, ऋषियोंकी सभामें रोमहर्षण सूतके पुत्र उग्रश्रवाजी पधारे । उन्हें आया हुआ देख शौनकजीने उन्हें प्रणाम किया और ( कुशल- प्रश्नके अनन्तर ) अभिवादन -पूर्वक इस प्रकार कहा ॥१ ॥
शौनक बोले- महामते! आपके मुखसे मैंने सम्पूर्ण शास्त्र, पुराण तथा श्रीहरिके नाना प्रकारके निर्मल लीलाचरित्र सुने । पूर्वकालमें गर्गाचार्यजीने मेरे सामने गर्गसंहिता सुनायी थी, जिसमें श्रीराधा और माधवकी महिमाका अनेक प्रकारसे और अधिकाधिक वर्णन हुआ है । सूतनन्दन! आज मैं पुनः आपसे सब दुःखोंको हर लेनेवाली श्रीकृष्णकी कथा सुनना चाहता हूँ । आप सोच - विचारकर वह कथा मुझसे कहिये ॥ २–४ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— शौनकजीके साथ अठासी हजार ऋषियोंने भी जब यही जिज्ञासा व्यक्त की, तब रोमहर्षणकुमार सूतने भगवान् श्रीकृष्णके चरणार-विन्दोंका स्मरण करके इस प्रकार कहा ॥५ ॥
सौति बोले- अहो शौनकजी! आप धन्य हैं, जिनकी बुद्धि इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्रके युगल-चरणारविन्दोंका मकरन्दपान करनेके लिये लालायित है । वैष्णवजनोंका समागम प्राप्त हो, इसे देवतालोग श्रेष्ठ बताते हैं; क्योंकि वैष्णवोंके सङ्गसे भगवान् श्रीकृष्णकी वह कथा सुननेको मिलती है, जो समस्त पापोंका विनाश करनेवाली है । श्रीकृष्णचन्द्रका चरित्र समस्त कल्मषका निवारण करनेवाला है । उसको थोड़ा - थोड़ा ब्रह्माजी जानते हैं और थोड़ा - ही - थोड़ा भगवान् उमावल्लभ शिव । मेरे जैसा कोई मच्छर उसे क्या जान सकेगा? भगवान् वासुदेवकी लीला - कथा एक समुद्र है, जिसमें डूबकर मोहित ब्रह्मा आदि देवता भी कुछ कह नहीं सकेंगे । ( फिर मुझ जैसा मनुष्य क्या कह सकता है? ) यादवराज भूपालशिरोमणि उग्रसेन-के यज्ञप्रवर अश्वमेधका अनुष्ठान देखकर लौटे हुए गर्गाचार्यने एक दिन अपने मनका उद्गार इस प्रकार प्रकट किया- ' यादवेश्वर! राजा उग्रसेन धन्य हैं, जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे द्वारकापुरीमें क्रतुश्रेष्ठ अश्वमेधका सम्पादन किया । उस यज्ञको देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ है । मैंने अपनी संहितामें परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णकी प्रत्यक्ष देखी - सुनी लीला - कथाओंका ठीक वैसा ही वर्णन
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II गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड किया है । उस संहितामें मैंने अश्वमेध यज्ञकी कथाका उल्लेख नहीं किया है, अतः अब पुनः उस अश्वमेधकी ही कथा कहूँगा । कलियुगमें उस कथाके श्रवणमात्र से भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्योंको शीघ्र ही भोग तथा मोक्ष प्रदान करते हैं ' ॥६–१४ ॥ शौनक! ऐसा कहकर श्रीगर्गमुनिने श्रीकृष्णभक्ति -से प्रेरित हो उग्रसेनके अश्वमेध यज्ञकी कथा कही । ' अश्वमेधचरित्र ' का उन्होंने एक सुन्दर नाम रख दिया – ' सुमेरु । ' मुने! ऐसा करके भगवान् गर्गाचार्य कृतकृत्य हो गये । यादवकुलके परम गुरु तथा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीगर्गमुनिने आठ दिनोंतक अश्वमेध यज्ञकी कथा कही; फिर वे नरेश्वर वज्रसे मिलनेके लिये श्रीहरिकी मथुरापुरीमें आये । ज्ञानिशिरोमणि गर्गमुनिको वहाँ आकाशसे उतरा देख वज्रनाभने द्विजोंके साथ उठकर उन्हें नमस्कार किया । बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन देकर उन्होंने गुरुजीके दोनों चरण - कमल पखारे और फूल -मालाओंसे मुनिका पूजन करके उन्हें मिष्टान्न निवेदन किया । सोलह वर्षकी अवस्था और सुपुष्ट शरीरवाले विशालबाहु श्यामसुन्दर कमलनयन वज्रनाभने गुरुके चरणोदकको लेकर सिरपर रखा और दोनों हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा । वज्रनाभ सौ सिंहोंके समान उद्भट शक्तिशाली थे ॥ १५ - २१ ॥ वज्रनाभने कहा— ब्रह्मन्! आपको नमस्कार है । आपका स्वागत है । हम आपकी क्या सेवा करें? मैं आपको भगवत्स्वरूप मानता हूँ । आप ब्रह्मर्षियोंमें परम श्रेष्ठ हैं । गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु रुद्र हैं, गुरु ही बृहस्पति हैं तथा गुरुदेव साक्षात् नारायण हैं; उन श्रीगुरुको नमस्कार है । मुनिश्रेष्ठ! मनुष्योंके लिये आपका दर्शन दुर्लभ है । देव! विशेषतः हम जैसे विषयासक्त चित्तवाले लोगोंके लिये तो वह अत्यन्त दुर्लभ है । गर्गाचार्य! मेरे कुलके आचार्य! तेजस्विन्! योगभास्कर! आपके दर्शनमात्रसे हम कुटुम्बसहित पवित्र हो गये ॥ २२–२५ ॥ यदुकुलतिलक राजा वज्रनाभका वचन सुनकर मुनीन्द्रवर्य महान् महात्माने श्रीहरिके चरणारविन्द का चिन्तन करते हुए तत्काल नृपेश्वर वज्रनाभसे प्रसन्नतापूर्वक कहा - ' युवराज! महाराज! यदु-वंशशिरोमणे! तुमने सब सत्कर्म ही किया है; पृथ्वीपर रहनेवाले सब लोगोंका पालन किया है । वत्स! तुमने भूतलपर धर्मको स्थापित किया है । विष्णुरात ( दिल्लीपति परीक्षित् ) तुम्हारे मित्र होंगे तथा अन्य नरेश भी तुम्हारे वशमें रहेंगे । नृपश्रेष्ठ! तुम धन्य हो, तुम्हारी मथुरापुरी धन्य है, तुम्हारी सारी प्रजाएँ धन्य हैं तथा तुम्हारी व्रजभूमि धन्य है । तुम श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धका भजन करते हुए उत्तम भोग भोगो । नरेश्वर! निश्शङ्क होकर राज्य करो'॥२६–३० ॥ उग्रश्रवा सूत कहते हैं — गर्गजीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा वज्रनाभ श्रीकृष्ण, संकर्षण, पितामह प्रद्युम्न तथा पिता अनिरुद्धका विरहावस्थामें स्मरण करके गद्गदकण्ठ हो गये । उनका मुख आँसुओंकी धारासे परिपूर्ण हो गया । गर्गने देखा, राजा वज्रनाभ दुःखी हो नीचेकी ओर मुख किये भूमिपर खड़े हैं । यह देख उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और वे उनका दुःख शान्त करते हुए - से बोले॥३१-३२ ॥ गर्गने पूछा- राजेन्द्र! क्यों रो रहे हो? मेरे रहते तुम्हें क्या भय है? तुम अपने दुःखका समस्त कारण मेरे सामने कहो ॥ ३३३ ॥
उनकी यह बात सुनकर भी राजा दुःखमग्न होने के कारण कुछ बोल न सके । जब गुरुने पुनः पूछा तो वे गद्गदवाणीमें इस प्रकार बोले ॥३४३ ॥
राजाने कहा - देव! श्रीकृष्ण संकर्षण आदि समस्त यादव मुझे यहाँ छोड़ परलोकमें चले गये, यह सोचकर ही मैं दुःखी हो गया । ब्रह्मन्! स्वामी, अमात्य, मित्र, राष्ट्र ( जनपद ), कोष, दुर्ग और सेना-राजाके ये सातों अङ्ग मुझ एकाकीके लिये प्रीतिकारक नहीं होते हैं । मैंने भगवान् श्रीकृष्णका चरित्र न तो देखा है और न किसीसे सुना ही है; आप वह चरित्र मुझसे कहिये । मैंने अपनी आँखोंसे तो केवल यादवोंका संहार ही देखा है, अतः मेरा दुःख दूर नहीं हो रहा है । चतुर्व्यूह - रूपधारी श्रीहरिने पहले जिस पुरीको सुशोभित किया था, वह भी समुद्रमें डूब गयी और भगवान् श्रीकृष्ण भी भक्तिके परमधाम गोलोकको